भारत ने ब्लैक सी में एक जहाज पर हुए हमले में भारतीय नाविक की मौत के मामले में यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को तलब किया है। भारतीय नाविकों की यूनियनों ने हमले के लिए यूक्रेनी ड्रोन को जिम्मेदार बताया है। विदेश मंत्रालय ने इस मामले को यूक्रेन के सामने मजबूती से उठाया है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जहाज एमवी ओमोर्फी पर 18 जुलाई को ब्लैक सी से गुजरते समय हमला हुआ था। मंत्रालय ने पिछले हफ्ते जारी एक बयान में कहा था कि यह हमला कथित तौर पर रूसी क्षेत्रीय जलक्षेत्र में हुआ। हमले के समय जहाज पर 10 क्रू मेंबर सवार थे। इनमें 3 भारतीय नागरिक थे। हमले में भारतीय क्रू मेंबर और चीफ ऑफिसर सागर गुप्ता की मौत हो गई। जहाज पर मौजूद दो अन्य भारतीय क्रू मेंबर सुरक्षित बताए गए हैं। भारत ने हमले की निंदा की भारत ने जहाज पर हुए हमले की कड़ी निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि कमर्शियल शिपिंग और नागरिक क्रू मेंबर पर हमले स्वीकार नहीं किए जा सकते। मंत्रालय ने सभी पक्षों से समुद्री आवाजाही की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वैश्विक व्यापार के मुक्त प्रवाह को बनाए रखने की अपील की है। भारत का कहना है कि कमर्शियल शिपिंग रूट्स की सुरक्षा जरूरी है और नागरिक नाविकों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला जहाज था एमवी ओमोर्फी एमवी ओमोर्फी मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला बल्क कैरियर है। इसे 2010 में बनाया गया था। यह उस क्षेत्र में संचालित हो रहा था, जहां रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच व्यापारी जहाजों पर बार-बार हमले हुए हैं। इस घटना ने ब्लैक सी क्षेत्र में काम कर रहे भारतीय नाविकों के सामने बढ़ते सुरक्षा जोखिम को भी सामने रखा है। भारतीय नाविक दुनिया की मर्चेंट नेवी में सबसे बड़े समूहों में शामिल हैं। भारतीय नाविकों और शिपिंग कंपनियों को एडवाइजरी भारतीय अधिकारियों ने नाविकों और शिपिंग कंपनियों को एडवाइजरी जारी कर ब्लैक सी या उसके आसपास के इलाकों में काम से पहले सुरक्षा जोखिमों का सावधानी से आकलन करने को कहा है। एडवाइजरी में नाविकों और शिपिंग कंपनियों को समुद्री मार्गों की पुष्टि करने, इंश्योरेंस कवरेज की जांच करने और इमरजेंसी प्रक्रियाओं को समझने की सलाह दी गई है। अधिकारियों ने कहा है कि किसी भी असाइनमेंट को स्वीकार करने से पहले इन पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। हमले में यूक्रेनी ड्रोन के इस्तेमाल का आरोप भारतीय नाविकों की यूनियनों ने इस हमले के लिए यूक्रेनी ड्रोन को जिम्मेदार बताया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यूक्रेन की ओर से इस आरोप की पुष्टि का उल्लेख नहीं है। हमले की जिम्मेदारी और इसकी पूरी परिस्थितियों को लेकर उपलब्ध कॉपी में आगे की जानकारी नहीं दी गई है। भारत ने इससे पहले भी कमर्शियल शिपिंग लेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। नई दिल्ली लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि समुद्री रास्तों से होने वाले वैश्विक व्यापार को सुरक्षित रखा जाए और नागरिक नाविकों की सुरक्षा से किसी भी स्थिति में समझौता न हो।
जेफरी एपस्टीन की मौत से ठीक पहले बनाई गई ट्रस्ट में उनकी गर्लफ्रेंड को सबसे ज्यादा हिस्सा देने का खुलासा हुआ है। जेफरी एपस्टीन की संपत्ति के दस्तावेजों में कहीं एक बेशकीमती हीरे की अंगूठी का जिक्र है, जिसे शादी के विचार के साथ एक महिला के लिए रखा गया था। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, वह महिला 37 वर्षीय बेलारूसी डेंटिस्ट डॉ. कैरिना शुलियाक हैं। कैरिना, एपस्टीन की गर्लफ्रेंड थी और दोनों करीब आठ साल तक साथ रहे थे। कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बेलारूस में जन्मी अमेरिकी डेंटिस्ट डॉ. कैरिना शुलियाक को जेफरी एपस्टीन की संपत्ति से 100 मिलियन डॉलर तक मिल सकता है।
एपस्टीन की संपत्ति का बड़ा हिस्सा डॉ. कैरिना के नाम
डॉ. कैरिना शुलियाक हाल तक अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के ब्रुकलिन में डेंटिस्ट के रूप में काम कर रही थीं। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि वह जेफरी एपस्टीन की करीबी साथी थीं। बताया जाता है कि अगस्त 2019 में न्यूयॉर्क की जेल में आत्महत्या करने से पहले एपस्टीन ने आखिरी बार उन्हें ही फोन किया था। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों करीब आठ साल तक रिश्ते में रहे। अपनी मौत से कुछ समय पहले जेफरी एपस्टीन ने अपनी वसीयत में बदलाव किया था और अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा डॉ. कैरिना शुलियाक के नाम कर दिया था। यह भी दावा किया गया है कि उन्होंने उन्हें 33 कैरेट की हीरे की अंगूठी दी थी। एक हाथ से लिखे गए नोट में कथित तौर पर एपस्टीन ने लिखा था कि यह अंगूठी “शादी के इरादे से” दी गई थी।
मिल सकते हैं 100 मिलियन डॉलर
जेफरी एपस्टीन की मौत के समय उनकी कुल संपत्ति करीब 600 मिलियन डॉलर आंकी गई थी। हालांकि, बाद में पीड़ितों को मुआवजा देने, समझौता राशि चुकाने और अन्य कानूनी खर्चों के बाद उनकी बची हुई संपत्ति 120 से 200 मिलियन डॉलर के बीच मानी जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संपत्ति में से डॉ. कैरिना शुलियाक को 100 मिलियन डॉलर तक मिल सकते हैं।
कौन हैं डॉ. कैरिना शुलियाक
रिपोर्ट्स के मुताबिक, डॉ. कैरिना शुलियाक साल 2010 में स्टूडेंट वीजा पर बेलारूस से अमेरिका के न्यूयॉर्क आई थीं। उनका सपना डेंटिस्ट बनने का था। बताया जाता है कि जेफरी एपस्टीन ने उन्हें कोलंबिया यूनिवर्सिटी के डेंटल स्कूल में दाखिला दिलाने में मदद की थी। इतना ही नहीं, उन्होंने उनकी पढ़ाई, रहने के लिए घर और दूसरे खर्च भी उठाए थे। रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि एपस्टीन ने शादी के जरिए उन्हें अमेरिकी ग्रीन कार्ड दिलाने में मदद की थी। इसके बाद वर्ष 2018 में डॉ. कैरिना शुलियाक अमेरिका की नागरिक बन गईं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जेफरी एपस्टीन ने डॉ. कैरिना शुलियाक की डेंटल स्कूल की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाया था।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उनका दाखिला होने के बाद उन्होंने उनकी मां को भी बेलारूस से अमेरिका बुलाने का इंतजाम कराया था। बताया जाता है कि वर्ष 2012 में डॉ. कैरिना शुलियाक ने एक संदेश में एपस्टीन का धन्यवाद करते हुए लिखा था कि उन्होंने उनकी पढ़ाई, रहने के लिए घर और उनके माता-पिता की मदद की। उन्होंने उस मैसेज में एपस्टीन को “सबसे नेक इंसान” भी बताया था। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. कैरिना शुलियाक ने कभी खुद को जेफरी एपस्टीन के पीड़ितों में शामिल नहीं बताया। वहीं, अमेरिकी जांच एजेंसियों ने भी उन पर एपस्टीन के यौन तस्करी से जुड़े मामलों में किसी तरह की संलिप्तता का आरोप नहीं लगाया है। जेफरी एपस्टीन ने 10 अगस्त 2019 को न्यूयॉर्क के मैनहट्टन स्थित मेट्रोपॉलिटन करेक्शनल सेंटर जेल में आत्महत्या कर ली थी। उस समय वह संघीय स्तर पर यौन तस्करी के आरोपों का सामना कर रहे थे और उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा था। अधिकारियों ने उनकी मौत को आधिकारिक तौर पर आत्महत्या माना था।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुक्रवार को कहा कि उन्हें नहीं लगता कि चीन या रूस ईरान युद्ध में शामिल हैं। हालांकि उन्होंने धमकी दी कि अगर दोनों देशों ने इस युद्ध में दखल दिया तो इसके गंभीर नतीजे होंगे और यह उनके लिए अच्छा नहीं होगा। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हाल ही में बीजिंग में हुई उनकी मुलाकात के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उन्हें भरोसा दिया था कि वे किसी भी हाल में ईरान को हथियार नहीं देंगे। चीनी कंपनियों के लिए भी यही चीज लागू है। ट्रम्प ने कहा मुझे जिनपिंग पर यकीन है। उन्होंने यह भी कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी उनसे कहा था कि वे ईरान को हथियार नहीं बेचेंगे। ट्रम्प ने कहा कि यूक्रेन जंग के बावजूद उनकी पुतिन से बातचीत जारी है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका सीधे यूक्रेन को हथियार नहीं बेचता, बल्कि नाटो देशों को बेचता है। नाटो देश इन हथियारों की पूरी कीमत चुकाते हैं। उसके बाद वे इन्हें किस तरह आगे भेजते हैं, इसकी उन्हें जानकारी नहीं होती। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. नेतन्याहू अमेरिका जाएंगे, जंग के बाद पहली बार ट्रम्प से मुलाकात: इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सोमवार को अमेरिका रवाना होंगे। वह राष्ट्रपति ट्रम्प से मुलाकात करेंगे। दोनों नेताओं की यह मुलाकात ईरान जंग शुरू होने के बाद पहली बार होगी। 2. कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार: ईरान-अमेरिका में लगातार बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड का भाव मई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। 3. कुवैत में 3 अमेरिकी ठिकानों पर हमला: ईरान ने शुक्रवार को कुवैत में मौजूद अमेरिका के तीन सैन्य ठिकानों पर ड्रोन हमला किया है। इसमें कैंप अरिफजान, कैंप दोहा और कैंप अदैरी को निशाना बनाया गया। 4. ईरान बोला- अमेरिका के आगे नहीं झुकेंगे: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि ईरान अमेरिका के सामने झुकेगा नहीं और उसकी धमकियां भी बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्होंने यह बयान किर्गिस्तान में SCO के विदेश मंत्रियों की बैठक में दिया। 5. होर्मुज में 28 क्रू मेंबर्स वाले LPG टैंकर पर हमला: ईरान के जलक्षेत्र में एक LPG टैंकर पर हमला हुआ। मोजाम्बिक के झंडे वाला यह टैंकर दिशा 28 भारतीय चालक दल के सदस्यों को लेकर जा रहा था। भारतीय दूतावास ने पुष्टि की है कि सभी भारतीय सुरक्षित हैं। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऐसा बयान जारी किया है, जो दिखने में चीन और रूस को दी जारी एक धमकी की तरह मालूम पड़ रहा है। उन्होंने ईरान का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान के मामले में जिन दो बड़े देशों का अक्सर जिक्र किया जाता है, वे इसमें शामिल नहीं हो रहे हैं।इसके
क्या इंसान हमेशा के लिए जिंदा रह सकते हैं? अधिकतर लोगों का जवाब ‘नहीं’ होगा। लेकिन हाल में एक नई स्टडी में चौंकाने वाली चीजें सामने आई हैं। रिसर्च करने वालों ने पाया है कि भले ही भविष्य की दवाएं बुढ़ापे के हर उस लक्षण को सीमित समय तक ठीक करने में कामयाब हो, फिर भी जीवन भर जमा होने वाले रैंडम DNA म्यूटेशन इंसानों की औसत उम्र को लगभग 156 साल तक ही सीमित रख सकते हैं।
‘npj Aging’ में पब्लिश हुई यह स्टडी ऐसे समय में आई है, जब लंबी उम्र से जुड़ी साइंस में दिलचस्पी बढ़ रही है। रिसर्चर और बायोटेक कंपनियां ऐसे इलाज खोज रही हैं, जिनसे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके या उसे उलटा भी जा सके।
रूस के स्कोल्कोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (स्कोल्टेक) के वैज्ञानिकों ने एक मैथमैटिकल मॉडल का इस्तेमाल करके यह अंदाजा लगाया कि अगर उम्र बढ़ने की हर उस प्रक्रिया को खत्म कर दिया जाए, जिसे उलटा जा सकता है-जैसे बीमारी, हार्मोन में कमी और सेल में होने वाले दूसरे बदलाव-और सिर्फ़ ‘सोमैटिक म्यूटेशन’ (समय के साथ सेल में अपने-आप होने वाली रैंडम DNA गड़बड़ियां) ही बाकी रहें, तो इंसान कितने समय तक जीवित रह सकता है।
उनकी स्टडी से पता चला कि सिर्फ़ सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) की वजह से इंसानों की औसत उम्र 146 से 194 साल के बीच ही सीमित रहेगी, जिसमें 156 साल का अनुमान सबसे अहम है।
एक्सपेरिमेंटल स्टडीज़ के उलट, यह रिसर्च भविष्य में लोग कितने समय तक जीवित रहेंगे, इस बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि यह एक ‘थॉट एक्सपेरिमेंट’ (सोच-विचार पर आधारित प्रयोग) है। इसका मकसद उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के एक खास कारण के असर को अलग करके यह समझना है कि उम्र तय करने में उसकी कितनी भूमिका होती है।
जब भी कोशिकाएं (सेल्स) विभाजित होती हैं, तो DNA में छोटी-मोटी गलतियां हो सकती हैं। हालांकि शरीर ज़्यादातर नुकसान की मरम्मत कर लेता है, लेकिन कुछ म्यूटेशन रह जाते हैं और दशकों तक जमा होते रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कुछ कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं और धीरे-धीरे कोशिकाओं के काम करने की क्षमता को कमज़ोर कर देते हैं।
रिसर्चर्स ने पाया कि सबसे बड़ी चुनौती उन अंगों से जुड़ी है जो खराब हो चुकी कोशिकाओं को आसानी से नहीं बदल पाते। त्वचा और लिवर जैसे टिश्यू लगातार खुद को नया करते रहते हैं और थ्योरी के हिसाब से इस मॉडल में हज़ारों सालों तक काम करते रह सकते हैं, लेकिन दिमाग और दिल ऐसा नहीं कर पाते।
इन अंगों में मौजूद खास कोशिकाएं—न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स—शायद ही कभी दोबारा बनती हैं, जिसका मतलब है कि पूरी ज़िंदगी DNA को होने वाला नुकसान जमा होता रहता है। को-ऑथर येवगेनी एफिमोव ने कहा, “न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स उम्र को सीमित करने वाले मुख्य कारक थे।”
सिर्फ़ DNA को होने वाले नुकसान के असर को समझने के लिए, रिसर्चर्स ने सबसे पहले एक काल्पनिक “ऐसे इंसान” का मॉडल बनाया जिसकी उम्र बढ़ने के साथ मरने का खतरा नहीं बढ़ता था। उस स्थिति में, औसत जीवनकाल 1,759 साल तक पहुंच गया।
हालांकि, जब सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) को शामिल किया गया, तो जीवनकाल तेज़ी से घटकर लगभग 156 साल रह गया। इससे पता चलता है कि सैद्धांतिक अमरता और इंसानों की असल उम्र के बीच के अंतर का एक बड़ा कारण DNA को होने वाला नुकसान है।
इन नतीजों से यह भी पता चलता है कि DNA म्यूटेशन ही बुढ़ापे का एकमात्र कारण नहीं हैं। मुख्य लेखक और कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट दिमित्री क्रियुकोव ने ज़ोर देकर कहा कि इस स्टडी का मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि इंसान आखिरकार 156 साल तक जिएंगे।
यह एक गणितीय अनुमान है (भले ही सावधानी से किया गया हो), न कि एक्सपेरिमेंट से मिला डेटा।” लिंक्डइन पर लिखते हुए उन्होंने कहा कि जीवनकाल की गणना की गई सीमाएं “किसी निश्चित नतीजे का ऐलान” नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि “सोमैटिक म्यूटेशन, भले ही अकेले बुढ़ापे का कारण बनने में आश्चर्यजनक रूप से कमज़ोर हों, लेकिन दूसरी प्रक्रियाओं के साथ मिलकर अहम भूमिका निभा सकते हैं।”
रिसर्चर का कहना है कि उनका सबसे बड़ा योगदान जीवनकाल का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक नया फ़्रेमवर्क है जो वैज्ञानिकों को यह मापने में मदद कर सकता है कि बुढ़ापे में अलग-अलग बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं का कितना योगदान है। नतीजों पर टिप्पणी करते हुए, फार्मासिस्ट और रीजेनरेटिव मेडिसिन रिसर्चर एगले पाविडे ने न्यूज़वीक को बताया कि यह स्टडी बुढ़ापे की जटिलता को और पुख्ता करती है।
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच करीब दो दशक से अटके परमाणु समझौते पर बुधवार को हस्ताक्षर हुए, लेकिन 24 घंटे के भीतर ही यह डील अटक गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने समझौते में नई शर्त जोड़ दी है। उन्होंने कहा कि डील तभी आगे बढ़ेगी, जब सऊदी अरब अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इजराइल से राजनयिक रिश्ते सामान्य करेगा। ट्रम्प ने यह भी कहा कि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) की अनुमति नहीं मिलेगी। बिना बताए डील की घोषणा से ट्रम्प नाराज वॉशिंगटन में हुए हस्ताक्षर समारोह में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट शामिल हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प इस बात से नाराज थे कि राइट ने उनकी मंजूरी के बिना समझौते की घोषणा कर दी। इसके बाद फॉक्स न्यूज और वॉल स्ट्रीट जर्नल में हुई आलोचना से उनकी नाराजगी और बढ़ गई। रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस ने ऊर्जा विभाग से समझौते की घोषणा टालने को कहा था, लेकिन विभाग ने हस्ताक्षर समारोह भी किया और मीडिया में इसकी जानकारी भी दी। हालांकि व्हाइट हाउस का कहना है कि अब्राहम अकॉर्ड्स की शर्त शुरू से ही ट्रम्प की नीति का हिस्सा थी। वहीं ऊर्जा विभाग ने किसी भी मतभेद से इनकार किया। ट्रम्प की नई शर्त ने सऊदी को भी चौंकाया CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प की घोषणा से सऊदी अरब भी हैरान रह गया। समझौते के मसौदे में कुछ शर्तें पूरी होने पर सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलने की बात थी, लेकिन ट्रम्प ने इसे सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया। दोनों देशों ने करीब दो दशक पहले परमाणु ऊर्जा सहयोग की पहल की थी। पिछले साल अक्टूबर में प्रारंभिक सहमति बनी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध और कांग्रेस की संभावित आपत्तियों के कारण समझौता महीनों तक अटका रहा। पिछले सप्ताह ऊर्जा विभाग को लगा कि ट्रम्प की मंजूरी मिल गई है, जिसके बाद इसकी घोषणा कर दी गई। परमाणु एक्सपर्ट्स ने यूरेनियम संवर्धन की अनुमति और IAEA के अतिरिक्त सुरक्षा प्रोटोकॉल की गैरमौजूदगी पर चिंता जताई। वहीं समर्थकों का तर्क था कि अगर अमेरिका पीछे हटता है तो चीन या रूस सऊदी अरब में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर सकते हैं। आखिर अब्राहम अकॉर्ड्स है क्या, जिसे लेकर डील अटक गई? दरअसल, अब्राहम अकॉर्ड्स 2020 में अमेरिका की पहल पर हुआ ऐसा समझौता है, जिसके तहत कुछ अरब देशों ने पहली बार इजराइल के साथ अपने रिश्ते सामान्य किए। यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान इसके तहत इजराइल से जुड़ चुके हैं। अब अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इसी समझौते का हिस्सा बने। ट्रम्प का मानना है कि अगर सऊदी इजराइल से रिश्ते सामान्य करता है, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका का रणनीतिक गठजोड़ और मजबूत होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाइडेन प्रशासन भी सऊदी परमाणु समझौते को इजराइल से रिश्ते सामान्य करने से जोड़कर आगे बढ़ा रहा था। हालांकि 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और गाजा युद्ध के बाद यह प्रक्रिया रुक गई। सऊदी का कहना है कि फिलिस्तीन के लिए अलग राज्य का रास्ता साफ हुए बिना वह इजराइल से आधिकारिक रिश्ते नहीं बनाएगा। यही वजह है कि अब न्यूक्लियर डील भी इस शर्त पर अटक गई है। ट्रम्प ने यूरेनियम एनरिचमेंट पर इनकार क्यों किया परमाणु बिजलीघर चलाने के लिए यूरेनियम को एक खास स्तर तक एनरिच (संवर्धित) किया जाता है। लेकिन यही तकनीक अगर बहुत अधिक स्तर तक पहुंच जाए, तो उसी यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में भी किया जा सकता है। इसलिए यूरेनियम एनरिचमेंट को दुनिया की सबसे संवेदनशील परमाणु तकनीकों में माना जाता है। यही वजह है कि अमेरिका आमतौर पर किसी भी देश को अपनी जमीन पर यूरेनियम एनरिचमेंट की अनुमति देने से बचता है। उसे आशंका रहती है कि भविष्य में इस तकनीक का इस्तेमाल सैन्य कार्यक्रम के लिए भी हो सकता है। सऊदी अरब को लेकर भी यही चिंता है, इसलिए ट्रम्प ने साफ कर दिया कि न्यूक्लियर डील होगी, लेकिन यूरेनियम एनरिचमेंट की इजाजत नहीं मिलेगी। ——————— अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौते से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ईरान जंग के बीच अमेरिका का सऊदी से परमाणु समझौता:इजराइल के विरोध के बावजूद ट्रम्प की मंजूरी; एक्सपर्ट बोले- परमाणु हथियारों का खतरा बढ़ेगा सऊदी अरब ने बुधवार को अमेरिका के साथ एक अहम परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके तहत अमेरिका, सऊदी अरब को असैन्य (बिजली बनाने के लिए) परमाणु तकनीक देगा। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब पूरे मिडिल ईस्ट में युद्ध और तनाव का माहौल है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
Gift Nifty Indictor: भारतीय बाजार आज 24, जुलाई को एक और कमजोर सेशन के लिए तैयार हैं। गिफ्ट निफ्टी पर ग्लोबल इक्विटी में बिकवाली और तेल की कीमतों में तेज गिरावट का असर देखने को मिल रहा है। निफ्टी 50 की परफॉर्मेंस का शुरुआती इंडिकेटर, गिफ्ट निफ्टी सुबह 8 बजे 23,656.50 के लेवल के आसपास ट्रेड कर रहा था, जो निफ्टी फ्यूचर्स के पिछले क्लोज 23,873.60 से 205 पॉइंट्स नीचे है।
बता दें कि गुरुवार को, बेंचमार्क में लगातार चौथे सेशन में गिरावट जारी रही, जो 6 जून के बाद से उनकी सबसे लंबी गिरावट का सिलसिला था, क्योंकि ब्रेंट क्रूड की ऊंची कीमतों ने सेंटिमेंट पर असर डाला। निफ्टी 50 126.65 पॉइंट्स या 0.53% गिरकर 23,869.60 पर आ गया, जबकि सेंसेक्स 363.66 पॉइंट्स या 0.47% गिरकर 76,391.39 पर आ गया।
शुक्रवार को एशियाई मार्केट भी नीचे ट्रेड कर रहे थे, पिछले सेशन से हो रही गिरावट जारी रही क्योंकि तेल की ज़्यादा कीमतों और टेक्नोलॉजी स्टॉक्स में बिकवाली के एक और दौर ने महंगाई और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले इन्वेस्टमेंट के आउटलुक को लेकर चिंता बढ़ा दी। जापान का निक्केई 225 2.46 परसेंट गिरा, साउथ कोरिया का कोस्पी 3.04 परसेंट गिरा, ऑस्ट्रेलिया का ASX 200 0.57 परसेंट गिरा और चीन का शंघाई कंपोजिट 0.01 परसेंट फिसला।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच तेल की कीमतों में तेज़ी आने से गुरुवार को U.S. इक्विटीज़ तेज़ी से नीचे बंद हुईं, जबकि इन्वेस्टर्स दुनिया की दो सबसे बड़ी कंपनियों की तिमाही कमाई का अंदाज़ा लगा रहे थे। अल्फाबेट के नतीजों ने बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस खर्च को लेकर चिंता बढ़ा दी।
डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 506.93 पॉइंट्स या 0.97 परसेंट गिरकर 51,711.65 पर आ गया। S&P 500 1.21 परसेंट गिरकर 7,408.30 पर आ गया, जबकि नैस्डैक कंपोजिट 2.15 परसेंट गिरकर 25,137.69 पर आ गया। टेक्नोलॉजी-हैवी इंडेक्स पर अल्फाबेट में 7 परसेंट और टेस्ला में 14 परसेंट की गिरावट का असर पड़ा, जो उनकी अर्निंग्स रिपोर्ट के बाद आई।
रेड सी में टैंकरों पर हूथी हमलों के बाद मिडिल ईस्ट संघर्ष में एक नया मोर्चा खुलने के बाद ब्रेंट क्रूड $100 प्रति बैरल से ऊपर ट्रेड कर रहा था, जबकि प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले बढ़ाने की धमकी दी थी। ग्लोबल बेंचमार्क गुरुवार को दो महीने में पहली बार $100 के निशान से ऊपर चढ़ गया और इस हफ्ते इसमें लगभग 14 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट $92 प्रति बैरल के करीब ट्रेड कर रहा था।
ट्रंप ने रेड सी में जहाजों पर और हमले होने पर ईरान और हूथी दोनों के लिए “बड़ी मिलिट्री सज़ा” की चेतावनी दी और एक्सियोस को बताया कि वह ईरान पर “बड़े हमले” पर विचार कर रहे हैं।
तेल बाज़ार रूस के ब्लैक सी कोस्ट पर कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम टर्मिनल पर हुए हमलों से भी जूझ रहा है, जो कज़ाकिस्तान का ज़्यादातर क्रूड एक्सपोर्ट करता है। मिडिल ईस्ट में महीनों से चल रहे संघर्ष के कारण ग्लोबल इन्वेंटरी कम हो गई है, जिससे सप्लाई कम होने और बड़े पैमाने पर आर्थिक झटके का खतरा बढ़ गया है।
इस महीने तेल की कीमतों में तेज़ी आई है क्योंकि फ़ारस की खाड़ी में US और ईरान के बीच दुश्मनी बढ़ गई है, जिससे होर्मुज़ स्ट्रेट से ट्रैफ़िक में रुकावट आई है और क्रूड ऑयल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस के फ्लो पर असर पड़ा है। रेड सी में ईरान-समर्थित हूथी मिलिटेंट्स द्वारा सऊदी अरब के टैंकरों पर पहले हमलों ने पूरे इलाके में सप्लाई में बड़े पैमाने पर रुकावटों को लेकर चिंताएं और बढ़ा दी हैं।
निफ्टी- बैंक निफ्टी के लिए क्या होगा आज आउटलुक
आज बैंक निफ्टी के आउटलुक पर बात करते हुए एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने कहा कि बैंक निफ्टी के नेगेटिव बायस के साथ ट्रेड करने की उम्मीद है, जिससे हाल के सेशन में देखी गई लगातार कमजोरी और बढ़ेगी। इंडेक्स अपने मुख्य रेजिस्टेंस लेवल से नीचे बना हुआ है और अपने 200-दिन के EMA (56,495) से थोड़ा ऊपर बना हुआ है, जिससे पता चलता है कि बेयर्स शॉर्ट-टर्म ट्रेंड पर मजबूती से कंट्रोल में हैं। टेक्निकल नजरिए से, 56,800–56,900 ज़ोन तुरंत रेजिस्टेंस है, इसके बाद 57,200–57,300 ज़ोन और ऊपर है।
नीचे की तरफ, 56,400–56,300 ज़ोन तुरंत सपोर्ट बना हुआ है, जो पिछले सेशन में मजबूत बना हुआ था। इस लेवल से नीचे एक बड़ा ब्रेक सेलिंग प्रेशर बढ़ सकता है और इंडेक्स 56,000–55,800 सपोर्ट ज़ोन की ओर खिंच सकता है। कुल मिलाकर, शॉर्ट-टर्म टेक्निकल आउटलुक बेयरिश बना हुआ है, इंडेक्स के शॉर्ट-टर्म टेक्निकल स्ट्रक्चर में काफ़ी सुधार लाने और मोमेंटम को बुल्स के पक्ष में करने के लिए 57,000 मार्क से ऊपर लगातार मूव जरूरी होगा।
पीएल कैपिटल के हेड एडवाइजरी विक्रम कासट ने कहा, “तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर चढ़ने और जियोपॉलिटिकल तनाव बढ़ने के कारण बाज़ार फिर से साफ़ तौर पर रिस्क-ऑफ मोड में आ गए हैं। मज़बूत कॉर्पोरेट फंडामेंटल्स पर सख्त फाइनेंशियल हालात और बढ़ते रिस्क से बचने की प्रवृत्ति का असर पड़ सकता है। निफ्टी के लिए, 23,600 एक मुख्य सपोर्ट लेवल बना हुआ है, जबकि 24,000 तुरंत रेजिस्टेंस है।”
Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी दे रहा संकेत, कमजोर हो सकती है भारतीय बाजार की शुरुआत
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सऊदी अरब ने बुधवार को अमेरिका के साथ एक अहम परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके तहत अमेरिका, सऊदी अरब को असैन्य (बिजली बनाने के लिए) परमाणु तकनीक देगा। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब पूरे मिडिल ईस्ट में युद्ध और तनाव का माहौल है। इस समझौते को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। वह पिछले पांच साल से भी ज्यादा समय से यह समझौता चाह रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक इजराइल समेत अमेरिका के कई अधिकारी और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि यदि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की तकनीक मिल गई, तो भविष्य में वह परमाणु हथियार बनाने की दिशा में भी बढ़ सकता है। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में परमाणु हथियारों की नई होड़ शुरू होने का खतरा पैदा हो सकता है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले कई बार कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है, तो सऊदी अरब भी परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में कदम उठाएगा। यह समझौता विवादों में क्यों है? ट्रम्प ने समझौते से इजराइल को हटाया इस समझौते की शुरुआत जो बाइडेन के राष्ट्रपति रहते हुई थी। तब अमेरिका चाहता था कि परमाणु समझौते के बदले सऊदी अरब, इजराइल को औपचारिक मान्यता दे और दोनों देश राजनयिक संबंध स्थापित करें। इस प्रस्ताव के तहत अमेरिका, सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी, आधुनिक हथियार और असैन्य परमाणु कार्यक्रम में सहयोग देने को तैयार था। बदले में सऊदी अरब से उम्मीद थी कि वह इजराइल के साथ दूतावास खोलेगा, राजदूत नियुक्त करेगा और आधिकारिक संबंध शुरू करेगा। हालांकि, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजराइल पर हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध की वजह से यह प्लान फेल हो गया। सऊदी कहने लगा कि जब तक एक अलग फिलिस्तीन राष्ट्र नहीं बन जाता तब तक वे इजराइल को मान्यता नहीं देंगे। बाद में ट्रम्प ने रणनीति बदली और इजराइल के साथ रिश्तों को इस समझौते से अलग कर दिया। मिडिल ईस्ट में सऊदी का प्रभाव बढ़ेगा परमाणु बिजलीघर (न्यूक्लियर रिएक्टर) बनने में 10 साल या उससे भी ज्यादा समय लग सकता है। इसलिए इस समझौते के बाद सऊदी अरब लंबे समय तक अमेरिका की परमाणु तकनीक और मदद पर निर्भर रहेगा। इससे दोनों देशों के बीच सुरक्षा, कारोबार और आपसी रिश्ते पहले से ज्यादा मजबूत होने की उम्मीद है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी की एक्सपर्ट कैरेन यंग के मुताबिक, सऊदी अरब सिर्फ आज के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को ध्यान में रखकर यह कदम उठा रहा है। उनका कहना है कि यह समझौता सिर्फ परमाणु बिजली बनाने तक सीमित नहीं है। इससे सऊदी अरब की राजनीतिक ताकत बढ़ेगी और मिडिल ईस्ट में उसका प्रभाव भी पहले से ज्यादा मजबूत होगा। अमेरिका को क्या फायदा होगा? इस समझौते से अमेरिका को दो बड़े फायदे मिल सकते हैं। 1. अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब में परमाणु बिजली संयंत्र बनाने के अरबों डॉलर के ठेके मिल सकते हैं। 2. अमेरिका को सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम पर नजदीकी नजर रखने का मौका मिलेगा, जिससे उसे हथियारों के प्रसार को लेकर अपनी चिंताओं पर नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है। रूस-चीन भी मदद को तैयार थे अगर अमेरिका के साथ यह समझौता किसी वजह से नहीं हो पाता, तो सऊदी अरब के पास दूसरे विकल्प भी हैं। दरअसल, सऊदी कई बार चेतावनी दे चुका था कि अगर उसे अमेरिका इसमें मदद नहीं करेगा तो वे चीन, रूस, फ्रांस या दक्षिण कोरिया जैसे दूसरे देशों से परमाणु तकनीक ले लेंगे। चीन की सरकारी कंपनी चाइना नेशनल न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन (CNNC) पहले ही न्यूक्लियर प्लांट बनाने में रुचि दिखा चुकी है। रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम भी सऊदी अरब के साथ शुरुआती समझौते कर चुकी है। इसके अलावा दक्षिण कोरिया और फ्रांस भी संभावित साझेदार माने जा रहे हैं। ट्रम्प का फैसला बदलना संसद के लिए मुश्किल अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई सांसदों ने इस समझौते का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है न सिर्फ इससे मिडिल ईस्ट में परमाणु हथियारों की होड़ को बढ़ावा मिलेगा बल्कि ईरान के लिए भी अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने की संभावना कम कर देगा। हालांकि इन विरोधों के बावजूद संसद के लिए इस समझौते को रोकना आसान नहीं होगा। आने वाले दिनों में इस समझौते को मंजूरी के लिए संसद में पेश किया जाएगा। लेकिन यदि संसद इसे रोकना चाहती है, तो उसे इस संबंध में संयुक्त प्रस्ताव (जॉइंट रिजोल्यूशन) पारित करना होगा। यदि राष्ट्रपति उस प्रस्ताव पर वीटो लगा देते हैं, तो संसद को उस वीटो को पलटने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाना होगा। यही वजह है कि राजनीतिक विरोध के बावजूद इस समझौते के लागू होने की संभावना अधिक मानी जा रही है।
असम से पिछले 10 वर्षों में कितने अवैध विदेशी नागरिकों को उनके देशों में वापस भेजा गया है, इसका आधिकारिक आंकड़ा अब सामने आ गया है। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक असम विधानसभा में सरकार ने जानकारी दी है कि पिछले 10 सालों में राज्य से करीब 2100 अवैध विदेशी नागरिकों को निर्वासित, निष्कासित या वापस भेजा गया है। बाहर निकाले गए इन अवैध विदेशियों में सबसे बड़ी संख्या बांग्लादेशी नागरिकों की है। ये संख्या 2023 है।
असम समझौता क्रियान्वयन मंत्री अतुल बोरा ने विधानसभा में एक सवाल के जवाब में यह जानकारी साझा की। कांग्रेस विधायक अब्दुल रहीम अहमद के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि 2016 से लेकर 30 जून 2026 तक कुल 2089 अवैध विदेशी नागरिकों को राज्य से बाहर निकाला गया है। इनमें बांग्लादेश के 2023 नागरिकों के अलावा म्यांमार के 39 और नाइजीरिया के 18 नागरिक शामिल हैं। इसके अलावा अफगानिस्तान, यूक्रेन और रूस से 2-2 नागरिकों को जबकि पाकिस्तान, केन्या और युगांडा से 1-1 नागरिक को उनके देश वापस भेजा गया है।
सबसे ज्यादा कार्रवाई साल 2025 में हुई
अगर साल-दर-साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस 10 साल के समय में सबसे ज्यादा कार्रवाई वर्ष 2025 में हुई। पिछले साल 1811 लोगों को वापस भेजा गया। इनमें नाइजीरिया के एक नागरिक को छोड़कर सभी अवैध विदेशी बांग्लादेश से थे। वहीं चालू वर्ष में 30 जून 2026 तक 263 घुसपैठियों को वापस भेजा जा चुका है। ये पिछले एक दशक में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। इनमें से 261 बांग्लादेश के और 2 रूस के नागरिक हैं।
इसी दौरान राइजर दल के विधायक अखिल गोगोई के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए मंत्री ने धार्मिक आंकड़ों का भी ब्योरा दिया। उन्होंने बताया कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 31 मई 2026 तक राज्य में कुल 172673 अवैध विदेशी चिह्नित किए गए हैं। इन चिह्नित विदेशियों में 111414 मुस्लिम, 61189 हिंदू और बाकी ईसाई या दूसरे धर्मों के अनुयायी शामिल हैं।
कार्रवाई के कानूनी आधार पर बात करते हुए अतुल बोरा ने स्पष्ट किया कि अवैध बांग्लादेशियों को वापस भेजने का काम गृह मंत्रालय के 2 मई 2025 के पत्र में तय दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जा रहा है। वहीं सीमावर्ती देश में घुसपैठियों का निष्कासन ‘इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950’ के प्रावधानों के तहत किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि निष्कासन और वापस भेजने की यह पूरी प्रक्रिया देश के मौजूदा कानूनों के तहत ही पूरी की जा रही है।
असमिया व्यक्ति की परिभाषा क्या है?
इसके अलावा विधानसभा में जब मंत्री से यह पूछा गया कि असमिया व्यक्ति की परिभाषा क्या है, तो उन्होंने इसे बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय बताया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर विभिन्न राष्ट्रवादी संगठनों और हितधारकों के साथ चर्चा जारी है। सरकार सभी वर्गों की राय, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बिप्लब कुमार शर्मा समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सही समय पर निर्णय लेगी।
आपको बता दें कि यह समिति 1985 के असम समझौते की धारा 6 को लागू करने की सिफारिशों के लिए 2019 में गृह मंत्रालय द्वारा गठित की गई थी। इसका उद्देश्य मूल असमिया आबादी की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान को सुरक्षा देना है। मंत्री ने बताया कि सेवानिवृत्त जज की इस रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकार ने आवश्यक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
भारत में चीन के नए मिलिट्री डिप्लोमैट यू जियान ने भारतीय सेना का धन्यवाद किया है। उन्होंने कहा कि भारत ने केरल तट के पास आग लगने वाले मालवाहक जहाज से 12 चीनी नागरिकों को बचाया था। चीन यह एहसान कभी नहीं भूलेगा। यू जियान ने यह बात मंगलवार को नई दिल्ली में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की स्थापना की 99वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में कही। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के नेताओं की कोशिशों से भारत-चीन संबंध फिर से सुधार की राह पर लौटे हैं। दरअसल, 9 जून 2025 को सिंगापुर के झंडे वाला कंटेनर जहाज एमवी वान हाई 503 केरल के अझिक्कल तट से करीब 44 समुद्री मील दूर आग लगने के बाद विस्फोट का शिकार हो गया था। यह जहाज कोलंबो से न्हावा शेवा जा रहा था और उस पर 22 चालक दल के सदस्य सवार थे। जहाज में आग लगने और बचाव से जुड़ी 5 तस्वीरें कोलंबो से मुंबई जा रहा था जहाज जहाज श्रीलंका की राजधानी कोलंबो से मुंबई जा रहा था। रास्ते में जहाज के एक कंटेनर में विस्फोट हुआ, जिसके बाद उसमें आग लग गई। जहाज पर कुल 22 क्रू मेंबर्स सवार थे। भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल के त्वरित रेस्क्यू ऑपरेशन के जरिए 18 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया था। बचाए गए लोगों में से 5 लोग घायल हुए थे, जिनमें 2 गंभीर रूप से झुलसे थे। 4 लोग लापता हो गए थे, जिन्हें मृत मान लिया गया। जहाज पर चीन और ताइवान के कुल 14 लोग सवार थे। इनमें 8 चीन के और 6 ताइवान के थे। बचाव कार्य के लिए कोस्ट गार्ड के 5 जहाज, 2 विमान और 1 हेलिकॉप्टर तैनात किए गए थे। चीन ने भारतीय कोस्ट गार्ड को शुक्रिया कहा था उस समय भारत की मदद के लिए चीन के दूतावास ने भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल का धन्यवाद किया था। सिंगापुर के उच्चायुक्त ने भी भारत की तारीफ की थी। बचाव अभियान के बाद भी भारतीय एजेंसियों ने कई दिनों तक जहाज में लगी आग बुझाने और उसे सुरक्षित स्थान तक ले जाने का अभियान चलाया। 13 जून को भारतीय नौसेना ने हेलिकॉप्टर से बचाव दल को जहाज पर उतारा था। तटरक्षक बल, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि जहाज बहकर केरल तट तक न पहुंचे। 2020 के बाद बिगड़े थे भारत-चीन के रिश्ते भारत और चीन के रिश्तों में 2020 में उस समय बड़ी खटास आ गई, जब पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच तनाव बढ़ गया। उसी साल जून में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय और 4 चीनी सैनिकों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद भारत ने साफ कहा था कि जब तक सीमा पर शांति और स्थिरता बहाल नहीं होगी, तब तक दोनों देशों के संबंध सामान्य नहीं हो सकते। अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं रिश्ते करीब चार साल तक जारी तनाव के बाद अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच देपसांग और डेमचोक में गश्त को लेकर समझौता हुआ। इसके बाद दोनों देशों की सेनाओं ने पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी की। इसी के बाद रूस के कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच औपचारिक द्विपक्षीय बैठक हुई। इसके बाद अगस्त 2025 में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में दोनों नेताओं की फिर मुलाकात हुई। यह प्रधानमंत्री मोदी की सात साल बाद चीन की पहली यात्रा थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच पांच साल से बंद सीधी उड़ानें दोबारा शुरू हुईं। साथ ही कैलाश मानसरोवर यात्रा भी फिर से बहाल कर दी गई। —————————– चीन से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… चीन में डिलीवरी बॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान मिला:ग्राहक की फटकार के बाद लेखक बने, खाना पहुंचाते हुए कई कविताएं लिखीं चीन में फूड डिलीवरी का काम करने वाले 56 वर्षीय वांग जिबिंग को देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों में से एक लू शुन साहित्य पुरस्कार मिला है। वे खाना पहुंचाने के बीच मिले खाली समय में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर कविताएं लिखते थे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

