दिन में दिखेगा रात जैसा नजारा! इस तारीख को कुछ मिनटों के लिए गायब हो जाएगा सूरज

12 अगस्त को आसमान एक ऐसे दुर्लभ नजारे का गवाह बनने वाला है, जिसे देखने के लिए दुनियाभर के लोग इंतजार कर रहे हैं। कुछ देशों में दिन के उजाले में कुछ मिनटों के लिए अंधेरा छा जाएगा। यही वजह है कि इस खगोलीय घटना को बेहद खास माना जा रहा है।

 

खगोलीय घटना

पूर्ण सूर्य ग्रहण तब होता है, जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आकर सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है। इस दौरान कुछ समय के लिए दिन में भी शाम जैसा अंधेरा महसूस होता है। कई जगहों पर तापमान थोड़ा कम हो जाता है और वातावरण भी सामान्य दिनों से अलग दिखाई देता है। यह एक दुर्लभ खगोलीय घटना मानी जाती है।

 

 

दिखाई देने वाली जगहें

यह पूर्ण सूर्य ग्रहण सबसे पहले उत्तरी रूस में दिखाई देगा। इसके बाद ग्रीनलैंड, आइसलैंड, स्पेन और पुर्तगाल के उत्तर-पूर्वी हिस्सों से होकर गुजरेगा। इसके अलावा यूरोप के कई देशों, कनाडा, अमेरिका के उत्तरी क्षेत्रों और उत्तर-पश्चिम अफ्रीका में सूर्य ग्रहण देखा जा सकेगा। भारत में यह सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा।

 

 

भारत पर असर

चूंकि यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहां सूतक काल मान्य नहीं माना जाएगा। ऐसे में भारत में सामान्य दिनचर्या पर इसका कोई प्रभाव नहीं रहेगा। जो लोग धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हैं, वे अपनी आस्था के अनुसार नियमों का पालन कर सकते हैं।

 

 

ग्रहण का समय

स्पेन में पूर्ण सूर्य ग्रहण सूर्यास्त से ठीक पहले दिखाई देगा और इसकी अवधि दो मिनट से भी कम होगी। बर्गोस शहर में करीब 1 मिनट 48 सेकंड तक पूरा अंधेरा रहेगा। वहीं, कुछ अन्य देशों में भी पूर्ण ग्रहण ढाई मिनट से कम समय तक दिखाई देगा। लेकिन आंशिक सूर्य ग्रहण लगभग 1 घंटा 45 मिनट तक देखा जा सकेगा।

 

 

दुर्लभ नजारा

पूर्ण सूर्य ग्रहण हर साल हर जगह दिखाई नहीं देता। यह केवल पृथ्वी की एक संकरी पट्टी से ही गुजरता है। कई क्षेत्रों में ऐसा नजारा दोबारा देखने के लिए दशकों या सैकड़ों साल तक इंतजार करना पड़ सकता है। यही वजह है कि इसे बेहद दुर्लभ और खास खगोलीय घटना माना जाता है।

 

 

धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में सूर्य ग्रहण का विशेष महत्व माना जाता है। ग्रहण के समय कई लोग पूजा-पाठ, मंत्र जाप और भगवान का स्मरण करते हैं। कुछ लोग ग्रहण के दौरान भोजन बनाने या खाने से भी परहेज करते हैं। ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान और घर की सफाई करने की परंपरा भी कई जगहों पर निभाई जाती है।

 

 

रखें ये सावधानियां

सूर्य ग्रहण को कभी भी नंगी आंखों से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि इससे आंखों को गंभीर नुकसान हो सकता है। साधारण धूप का चश्मा, काला शीशा या एक्स-रे फिल्म भी सेफ नहीं माने जाते। ग्रहण देखने के लिए हमेशा सोलर व्यूइंग ग्लास या फिल्टर का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

सांप काटने से होने वाली मौतों पर लगेगा ब्रेक! नई रिसर्च में मिला सांपों के अंदर छिपा एंटीवेनम का रहस्य

सांप के जहर का इलाज अब खुद सांपों से मिलने वाले समाधान से संभव हो सकता है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है, जो भविष्य में एंटीवेनम बनाने के तरीके को पूरी तरह बदल सकती है। शोधकर्ताओं को जहरीले सांपों के खून में ऐसे प्राकृतिक प्रोटीन मिले हैं, जो उनके घातक विष को निष्क्रिय करने की क्षमता रखते हैं। यह खोज इसलिए खास है क्योंकि मौजूदा एंटीवेनम कई सीमाओं के साथ आते हैं और हर तरह के सांप के जहर पर समान रूप से असरदार नहीं होते। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।

उनका मानना है कि प्रकृति में मौजूद इस सुरक्षा प्रणाली की मदद से आने वाले समय में ज्यादा प्रभावी, सुरक्षित और किफायती एंटीवेनम तैयार किए जा सकते हैं, जिससे दुनियाभर में सांप के काटने से होने वाली मौतों को कम करने में मदद मिल सकती है।

सांप खुद अपने जहर से कैसे बचते हैं?

वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि जहरीले सांप अपने ही विष से प्रभावित क्यों नहीं होते। शोधकर्ताओं के अनुसार, सांपों के शरीर में मौजूद कुछ खास प्रोटीन एक तरह की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली की तरह काम करते हैं। शोध टीम के प्रमुख सीन बी. कैरोल ने कहा कि प्रकृति ने पहले ही इस समस्या का समाधान खोज रखा है, जिसे इंसान अब समझने की कोशिश कर रहा है।

हर साल लाखों लोग होते हैं सांप के काटने का शिकार

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जहरीले सांपों के काटने से हर साल दुनिया में करीब 80 हजार से 1.40 लाख लोगों की मौत होती है। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग स्थायी विकलांगता का शिकार भी हो जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में समय पर इलाज न मिलने की वजह से यह समस्या और गंभीर बन जाती है।

मौजूदा एंटीवेनम में हैं कई सीमाएं

फिलहाल सांप के जहर का इलाज घोड़ों या भेड़ों जैसे जानवरों में जहर डालकर तैयार किए गए एंटीबॉडी से किया जाता है। हालांकि, यह प्रक्रिया महंगी होती है और अलग-अलग प्रजातियों के सांपों के जहर पर इसकी प्रभावशीलता भी सीमित हो सकती है। कई मामलों में इससे मरीजों में गंभीर एलर्जी या इम्यून रिएक्शन का खतरा भी रहता है।

FETUA-3 प्रोटीन ने दिखाई नई उम्मीद

साल 2022 में वैज्ञानिकों ने FETUA-3 नामक एक सुरक्षा प्रोटीन की पहचान की थी, जो सांप के जहर में मौजूद खतरनाक टॉक्सिन परिवार को रोक सकता है। नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने FETUA प्रोटीन परिवार के कई रूपों का परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि अलग-अलग प्रोटीन को मिलाकर बनाया गया मिश्रण जहर को बेअसर करने में ज्यादा प्रभावी साबित हुआ।

पुराने एंटीवेनम से 10 गुना ज्यादा असरदार

प्रयोगशाला परीक्षणों में वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए प्रोटीन मिश्रण ने मौजूदा भेड़-आधारित एंटीवेनम की तुलना में करीब 10 गुना ज्यादा प्रभावी क्षमता दिखाई। इसने न सिर्फ रैटलस्नेक के जहर को पूरी तरह निष्क्रिय किया, बल्कि कई अन्य वाइपर प्रजातियों के विष से भी सुरक्षा प्रदान की।

अब कई तरह के जहरीले टॉक्सिन पर हो रहा काम

शोधकर्ता अब इसी तकनीक का इस्तेमाल सांपों के अन्य प्रमुख विषैले टॉक्सिन समूहों पर कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में प्रकृति से प्रेरित लैब में तैयार एंटीवेनम इंसानों के इलाज के लिए उपलब्ध हो सकते हैं। सीन कैरोल के अनुसार, इस तकनीक से बड़ी मात्रा में एंटीवेनम तैयार किया जा सकता है, जिससे दुनिया भर में सांप काटने की समस्या से निपटने में मदद मिल सकती है।

पहला इस्तेमाल इंसानों से पहले जानवरों में संभव

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नई तकनीक का शुरुआती व्यावसायिक इस्तेमाल पशु चिकित्सा में हो सकता है। इसके बाद इसे इंसानों के इलाज के लिए विकसित किया जा सकता है। सबसे खास बात यह है कि जिस प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तलाश वैज्ञानिक दशकों से कर रहे थे, उसका जवाब खुद सांपों के शरीर में मौजूद था।

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क्या इंसान मैक्सिमम 156 साल तक जिंदा रह सकता है? वैज्ञानिकों को इस नई स्टडी में जो पता चला उसे जानिए

क्या इंसान हमेशा के लिए जिंदा रह सकते हैं? अधिकतर लोगों का जवाब ‘नहीं’ होगा। लेकिन हाल में एक नई स्टडी में चौंकाने वाली चीजें सामने आई हैं। रिसर्च करने वालों ने पाया है कि भले ही भविष्य की दवाएं बुढ़ापे के हर उस लक्षण को सीमित समय तक ठीक करने में कामयाब हो, फिर भी जीवन भर जमा होने वाले रैंडम DNA म्यूटेशन इंसानों की औसत उम्र को लगभग 156 साल तक ही सीमित रख सकते हैं।

‘npj Aging’ में पब्लिश हुई यह स्टडी ऐसे समय में आई है, जब लंबी उम्र से जुड़ी साइंस में दिलचस्पी बढ़ रही है। रिसर्चर और बायोटेक कंपनियां ऐसे इलाज खोज रही हैं, जिनसे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके या उसे उलटा भी जा सके।

रूस के स्कोल्कोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (स्कोल्टेक) के वैज्ञानिकों ने एक मैथमैटिकल मॉडल का इस्तेमाल करके यह अंदाजा लगाया कि अगर उम्र बढ़ने की हर उस प्रक्रिया को खत्म कर दिया जाए, जिसे उलटा जा सकता है-जैसे बीमारी, हार्मोन में कमी और सेल में होने वाले दूसरे बदलाव-और सिर्फ़ ‘सोमैटिक म्यूटेशन’ (समय के साथ सेल में अपने-आप होने वाली रैंडम DNA गड़बड़ियां) ही बाकी रहें, तो इंसान कितने समय तक जीवित रह सकता है।

उनकी स्टडी से पता चला कि सिर्फ़ सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) की वजह से इंसानों की औसत उम्र 146 से 194 साल के बीच ही सीमित रहेगी, जिसमें 156 साल का अनुमान सबसे अहम है।

एक्सपेरिमेंटल स्टडीज़ के उलट, यह रिसर्च भविष्य में लोग कितने समय तक जीवित रहेंगे, इस बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि यह एक ‘थॉट एक्सपेरिमेंट’ (सोच-विचार पर आधारित प्रयोग) है। इसका मकसद उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के एक खास कारण के असर को अलग करके यह समझना है कि उम्र तय करने में उसकी कितनी भूमिका होती है।

जब भी कोशिकाएं (सेल्स) विभाजित होती हैं, तो DNA में छोटी-मोटी गलतियां हो सकती हैं। हालांकि शरीर ज़्यादातर नुकसान की मरम्मत कर लेता है, लेकिन कुछ म्यूटेशन रह जाते हैं और दशकों तक जमा होते रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कुछ कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं और धीरे-धीरे कोशिकाओं के काम करने की क्षमता को कमज़ोर कर देते हैं।

रिसर्चर्स ने पाया कि सबसे बड़ी चुनौती उन अंगों से जुड़ी है जो खराब हो चुकी कोशिकाओं को आसानी से नहीं बदल पाते। त्वचा और लिवर जैसे टिश्यू लगातार खुद को नया करते रहते हैं और थ्योरी के हिसाब से इस मॉडल में हज़ारों सालों तक काम करते रह सकते हैं, लेकिन दिमाग और दिल ऐसा नहीं कर पाते।

इन अंगों में मौजूद खास कोशिकाएं—न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स—शायद ही कभी दोबारा बनती हैं, जिसका मतलब है कि पूरी ज़िंदगी DNA को होने वाला नुकसान जमा होता रहता है। को-ऑथर येवगेनी एफिमोव ने कहा, “न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स उम्र को सीमित करने वाले मुख्य कारक थे।”

सिर्फ़ DNA को होने वाले नुकसान के असर को समझने के लिए, रिसर्चर्स ने सबसे पहले एक काल्पनिक “ऐसे इंसान” का मॉडल बनाया जिसकी उम्र बढ़ने के साथ मरने का खतरा नहीं बढ़ता था। उस स्थिति में, औसत जीवनकाल 1,759 साल तक पहुंच गया।

हालांकि, जब सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) को शामिल किया गया, तो जीवनकाल तेज़ी से घटकर लगभग 156 साल रह गया। इससे पता चलता है कि सैद्धांतिक अमरता और इंसानों की असल उम्र के बीच के अंतर का एक बड़ा कारण DNA को होने वाला नुकसान है।

इन नतीजों से यह भी पता चलता है कि DNA म्यूटेशन ही बुढ़ापे का एकमात्र कारण नहीं हैं। मुख्य लेखक और कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट दिमित्री क्रियुकोव ने ज़ोर देकर कहा कि इस स्टडी का मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि इंसान आखिरकार 156 साल तक जिएंगे।

यह एक गणितीय अनुमान है (भले ही सावधानी से किया गया हो), न कि एक्सपेरिमेंट से मिला डेटा।” लिंक्डइन पर लिखते हुए उन्होंने कहा कि जीवनकाल की गणना की गई सीमाएं “किसी निश्चित नतीजे का ऐलान” नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि “सोमैटिक म्यूटेशन, भले ही अकेले बुढ़ापे का कारण बनने में आश्चर्यजनक रूप से कमज़ोर हों, लेकिन दूसरी प्रक्रियाओं के साथ मिलकर अहम भूमिका निभा सकते हैं।”

रिसर्चर का कहना है कि उनका सबसे बड़ा योगदान जीवनकाल का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक नया फ़्रेमवर्क है जो वैज्ञानिकों को यह मापने में मदद कर सकता है कि बुढ़ापे में अलग-अलग बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं का कितना योगदान है। नतीजों पर टिप्पणी करते हुए, फार्मासिस्ट और रीजेनरेटिव मेडिसिन रिसर्चर एगले पाविडे ने न्यूज़वीक को बताया कि यह स्टडी बुढ़ापे की जटिलता को और पुख्ता करती है।