आंदोलन के बाद छत्रपति संभाजीनगर लौटे CJP प्रमुख अभिजीत दीपके की तबीयत बिगड़ी, डॉक्टरों ने दी आराम की सलाह

Abhijit Dipke Cockroach Janata Party

Abhijit Deepke health news: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में आंदोलन का झंडा बुलंद करने वाले 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके अचानक अस्वस्थ हो गए हैं। शनिवार को अपने गृह जिले छत्रपति संभाजीनगर स्थित आवास पर समर्थकों और लोगों से मुलाकात के दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद डॉक्टरों ने उनकी जांच कर उन्हें पूरी तरह से आराम करने की सख्त सलाह दी है।

क्या हुआ था उस वक्त?

शनिवार सुबह करीब 11:45 बजे अभिजीत दीपके अपने घर के पार्किंग एरिया में उनसे मिलने पहुंचे लोगों और कार्यकर्ताओं से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें तेज बेचैनी महसूस हुई और वे अचानक बातचीत छोड़कर घर के पिछले हिस्से में चले गए, जहां उन्हें उल्टी हुई। इसके बाद वे मीडियाकर्मियों से बिना बातचीत किए सीधे अपने कमरे में चले गए। दीपके के पिता भगवान दीपके ने स्थिति को देखते हुए तुरंत डॉक्टरों की टीम को बुलाया। ALSO READ: बड़ा धमाका! अब यूपी के भाजपा नेता की बेटी ने किया CJP का समर्थन, जानिए कौन हैं यशस्विनी राजे सिंह?

 

डॉ. विशाल लहाने ने दीपके के आवास पर जाकर उनका मेडिकल चेकअप किया। जांच के बाद डॉ. लहाने ने बताया कि उनका रक्तचाप (BP) सामान्य से थोड़ा कम (100/60) पाया गया है। दरअसल, अत्यधिक तनाव और घबराहट की वजह से उन्हें जी मिचलाने, बार-बार उल्टी और दस्त की समस्या हुई है।  डॉक्टरों ने उन्हें ड्रिप (ग्लूकोज) चढ़ाई है। फिलहाल उन्हें बुखार नहीं है और उन्हें पूरी तरह से आराम करने को कहा गया है। यदि सेहत में सुधार नहीं होता है, तो ब्लड टेस्ट कराए जाएंगे। ALSO READ: धमकी के बाद छिपकर रहे थे दीपके के माता-पिता, CJP नए आंदोलन की तैयारी में

कौन हैं अभिजीत दीपके?

अभिजीत दीपके महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले एक चर्चित सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक एवं प्रमुख हैं। अपने अनोखे और लीक से हटकर विरोध प्रदर्शनों के कारण वे सोशल मीडिया और स्थानीय राजनीति में काफी चर्चा में रहते हैं।

 

जुलाई के आखिरी हफ्ते में (25 जुलाई के आसपास) दीपके दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे थे। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान भी उन्होंने बताया था कि वे टाइफाइड से पीड़ित हैं और उनका इलाज चल रहा है। दिल्ली के उग्र आंदोलन, लगातार भागदौड़ और टाइफाइड के बावजूद आराम न करने की वजह से उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई।

क्या इंसान मैक्सिमम 156 साल तक जिंदा रह सकता है? वैज्ञानिकों को इस नई स्टडी में जो पता चला उसे जानिए

क्या इंसान हमेशा के लिए जिंदा रह सकते हैं? अधिकतर लोगों का जवाब ‘नहीं’ होगा। लेकिन हाल में एक नई स्टडी में चौंकाने वाली चीजें सामने आई हैं। रिसर्च करने वालों ने पाया है कि भले ही भविष्य की दवाएं बुढ़ापे के हर उस लक्षण को सीमित समय तक ठीक करने में कामयाब हो, फिर भी जीवन भर जमा होने वाले रैंडम DNA म्यूटेशन इंसानों की औसत उम्र को लगभग 156 साल तक ही सीमित रख सकते हैं।

‘npj Aging’ में पब्लिश हुई यह स्टडी ऐसे समय में आई है, जब लंबी उम्र से जुड़ी साइंस में दिलचस्पी बढ़ रही है। रिसर्चर और बायोटेक कंपनियां ऐसे इलाज खोज रही हैं, जिनसे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके या उसे उलटा भी जा सके।

रूस के स्कोल्कोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (स्कोल्टेक) के वैज्ञानिकों ने एक मैथमैटिकल मॉडल का इस्तेमाल करके यह अंदाजा लगाया कि अगर उम्र बढ़ने की हर उस प्रक्रिया को खत्म कर दिया जाए, जिसे उलटा जा सकता है-जैसे बीमारी, हार्मोन में कमी और सेल में होने वाले दूसरे बदलाव-और सिर्फ़ ‘सोमैटिक म्यूटेशन’ (समय के साथ सेल में अपने-आप होने वाली रैंडम DNA गड़बड़ियां) ही बाकी रहें, तो इंसान कितने समय तक जीवित रह सकता है।

उनकी स्टडी से पता चला कि सिर्फ़ सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) की वजह से इंसानों की औसत उम्र 146 से 194 साल के बीच ही सीमित रहेगी, जिसमें 156 साल का अनुमान सबसे अहम है।

एक्सपेरिमेंटल स्टडीज़ के उलट, यह रिसर्च भविष्य में लोग कितने समय तक जीवित रहेंगे, इस बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि यह एक ‘थॉट एक्सपेरिमेंट’ (सोच-विचार पर आधारित प्रयोग) है। इसका मकसद उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के एक खास कारण के असर को अलग करके यह समझना है कि उम्र तय करने में उसकी कितनी भूमिका होती है।

जब भी कोशिकाएं (सेल्स) विभाजित होती हैं, तो DNA में छोटी-मोटी गलतियां हो सकती हैं। हालांकि शरीर ज़्यादातर नुकसान की मरम्मत कर लेता है, लेकिन कुछ म्यूटेशन रह जाते हैं और दशकों तक जमा होते रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कुछ कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं और धीरे-धीरे कोशिकाओं के काम करने की क्षमता को कमज़ोर कर देते हैं।

रिसर्चर्स ने पाया कि सबसे बड़ी चुनौती उन अंगों से जुड़ी है जो खराब हो चुकी कोशिकाओं को आसानी से नहीं बदल पाते। त्वचा और लिवर जैसे टिश्यू लगातार खुद को नया करते रहते हैं और थ्योरी के हिसाब से इस मॉडल में हज़ारों सालों तक काम करते रह सकते हैं, लेकिन दिमाग और दिल ऐसा नहीं कर पाते।

इन अंगों में मौजूद खास कोशिकाएं—न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स—शायद ही कभी दोबारा बनती हैं, जिसका मतलब है कि पूरी ज़िंदगी DNA को होने वाला नुकसान जमा होता रहता है। को-ऑथर येवगेनी एफिमोव ने कहा, “न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स उम्र को सीमित करने वाले मुख्य कारक थे।”

सिर्फ़ DNA को होने वाले नुकसान के असर को समझने के लिए, रिसर्चर्स ने सबसे पहले एक काल्पनिक “ऐसे इंसान” का मॉडल बनाया जिसकी उम्र बढ़ने के साथ मरने का खतरा नहीं बढ़ता था। उस स्थिति में, औसत जीवनकाल 1,759 साल तक पहुंच गया।

हालांकि, जब सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) को शामिल किया गया, तो जीवनकाल तेज़ी से घटकर लगभग 156 साल रह गया। इससे पता चलता है कि सैद्धांतिक अमरता और इंसानों की असल उम्र के बीच के अंतर का एक बड़ा कारण DNA को होने वाला नुकसान है।

इन नतीजों से यह भी पता चलता है कि DNA म्यूटेशन ही बुढ़ापे का एकमात्र कारण नहीं हैं। मुख्य लेखक और कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट दिमित्री क्रियुकोव ने ज़ोर देकर कहा कि इस स्टडी का मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि इंसान आखिरकार 156 साल तक जिएंगे।

यह एक गणितीय अनुमान है (भले ही सावधानी से किया गया हो), न कि एक्सपेरिमेंट से मिला डेटा।” लिंक्डइन पर लिखते हुए उन्होंने कहा कि जीवनकाल की गणना की गई सीमाएं “किसी निश्चित नतीजे का ऐलान” नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि “सोमैटिक म्यूटेशन, भले ही अकेले बुढ़ापे का कारण बनने में आश्चर्यजनक रूप से कमज़ोर हों, लेकिन दूसरी प्रक्रियाओं के साथ मिलकर अहम भूमिका निभा सकते हैं।”

रिसर्चर का कहना है कि उनका सबसे बड़ा योगदान जीवनकाल का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक नया फ़्रेमवर्क है जो वैज्ञानिकों को यह मापने में मदद कर सकता है कि बुढ़ापे में अलग-अलग बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं का कितना योगदान है। नतीजों पर टिप्पणी करते हुए, फार्मासिस्ट और रीजेनरेटिव मेडिसिन रिसर्चर एगले पाविडे ने न्यूज़वीक को बताया कि यह स्टडी बुढ़ापे की जटिलता को और पुख्ता करती है।