बिना पर्चे के नहीं मिलेंगी ये दवाएं, CDSCO ने पेनकिलर्स और एंटीबायोटिक्स को लेकर कड़े किए नियम!

कई लोग बिना डॉक्टर से पूछे दर्द, बुखार या दूसरी बीमारी होने पर पेनकिलर या एंटीबायोटिक ले लेते हैं। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, CDSCO (Central Drugs Standard Control Organisation) ने पेनकिलर और एंटीबायोटिक के गलत और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को लेकर यह एडवाइजरी जारी की है। जिसमें संस्था ने डॉक्टरों, फार्मासिस्टों, अस्पतालों और आम लोगों को सोच-समझकर इन दवाओं का इस्तेमाल करने को कहा है। जिन लोगों को पहले से किडनी की बीमारी है या किडनी पर असर पड़ने का खतरा है, उन्हें पेनकिलर लेने से पहले डॉक्टर को अपनी कंडीशन जरूर बतानी चाहिए। एडवाइजरी में ऐसे पेशेंट के लिए दवा लेने से पहले डॉक्टर या हेल्थकेयर प्रोफेशनल से बात करने पर जोर दिया गया है।

किडनी के मरीज खुद से न लें ये मेडिसिन

यदि दर्द, बुखार या कोई दूसरा लक्षण बार-बार हो रहा है, तो हर बार खुद से पेनकिलर या एंटीबायोटिक लेना सही तरीका नहीं है। ऐसी सिचुएशन में डॉक्टर से कंसल्ट करना बहुत जरुरी है। बार-बार गलत दवा लेने से शरीर को नुकसान हो सकता है।

पेनकिलर और एंटीबायोटिक का इस्तेमाल न करने के कारण

आम पेनकिलर में इस्तेमाल होने वाली NSAIDs दवाओं का जरूरत से ज्यादा या लंबे समय तक इस्तेमाल नुकसान पहुंचा सकता है। इसी तरह एंटीबायोटिक भी हर तरह के बुखार या सर्दी-जुकाम में काम नहीं करते। इसलिए इन दवाओं को अपनी मर्जी से खाना बिल्कुल भी ठीक नहीं है।

डॉक्टर भी दवा की डोज लिखने से पहले रखे ये ध्यान

CDSCO ने डॉक्टरों से कहा है कि मरीज की उम्र, बीमारी और दूसरी बिमारियों को ध्यान में रखकर ही NSAIDs और एंटीबायोटिक लिखे जाएं। जहां दवा जरूरी हो, वहां भी जरूरत के हिसाब से ही दवा देने को कहा गया है। मरीज की जरूरत के हिसाब से ही एंटीबायोटिक, डोज और दिन तय होना चाहिए।

मेडिकल स्टोर करें इन नियमों का पालन

एडवाइजरी में फार्मासिस्ट, केमिस्ट और दवा सप्लायर को भी नियमों का पालन करने की सलाह दी है। कई पेनकिलर और एंटीबायोटिक ऐसी कैटेगरी में आते हैं, जिन्हें बिना रजिस्टर्ड डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के बेचना नियमों के खिलाफ है। इसलिए दुकानदारों से ऐसी दवाओं को बिना पर्ची के नहीं देने को कहा गया है।

अस्पतालों को भी दिए ये निर्देश

अस्पतालों और हेल्थकेयर संस्थानों से कहा गया है कि वे इन दवाओं को सही तरीके से लिखने और उनके इस्तेमाल करने के लिए अपने सिस्टम को मजबूत करें। दवा लिखने से पहले मरीजों को सही जानकारी देने पर ध्यान देने को कहा गया है। साथ ही, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के ड्रग कंट्रोल अधिकारियों से डॉक्टरों, केमिस्टों और आम लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाने को कहा गया है।

पेनकिलर और एंटीबायोटिक ऐसी दवाएं हैं, जिन्हें लोग अक्सर छोटी परेशानी में भी आसानी से इस्तेमाल कर लेते हैं। लेकिन हर दर्द या बुखार में एक जैसी दवा लेना सही नहीं होता। खासकर जब कोई समस्या बार-बार हो रही हो या पहले से किडनी की बीमारी हो, तो डॉक्टर की सलाह लेना ज्यादा जरूरी हो जाता है। दवा जरूरत के हिसाब से और सही तरीके से ली जाए, तो इसके गलत इस्तेमाल से होने वाले नुकसान का खतरा कम किया जा सकता है।

भारत में स्टेम सेल थेरेपी का किया गलत इस्तेमाल तो फंस जाएंगे! सरकार ने नियमों का सख्ती से पालन करने के लिए जारी की गाइडलाइन

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्टेम सेल थेरेपी में नियमों का सख्ती से पालन करने जारी की गाइडलाइन

स्टेम सेल थेरेपी को लेकर सरकार ने एक बार फिर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जरूरी गाइडलाइन दी हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 16 सितंबर 2026 को उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एडवाइजरी जारी की है, जिन्होंने स्टेम सेल थेरेपी से जुड़े नियमों के लिए ‘क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010’ को अपनाया है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट के 30 जनवरी 2026 के एक फैसले के बाद उठाया गया है। एडवाइजरी में स्टेम सेल थेरेपी के इस्तेमाल और इसके रेगुलेशन से जुड़े नियमों को बताया है।

स्टेम सेल थेरेपी के नियम

नई एडवाइजरी में स्टेम सेल थेरेपी को लेकर मौजूदा नियमों को एक बार फिर साफ किया गया है। इसके मुताबिक, स्टेम सेल थेरेपी को हर बीमारी के सामान्य इलाज के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे ‘स्टैंडर्ड केयर’ यानी सामान्य क्लिनिकल इलाज का हिस्सा केवल उन्हीं बीमारियों या स्वास्थ्य समस्याओं के लिए बनाया जा सकता है, जिन्हें स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की मंजूर सूची में शामिल किया गया है।

ऑटिज्म में सिर्फ मंजूर क्लिनिकल ट्रायल

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर यानी ASD के मामले में एडवाइजरी ने स्थिति को और साफ किया है। ऑटिज्म के इलाज के लिए किसी भी तरह की स्टेम सेल थेरेपी को सामान्य इलाज के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसी थेरेपी केवल विधिवत मंजूर क्लिनिकल ट्रायल के तहत ही की जा सकती है। इसके लिए 2017 में ICMR और DBT की ओर से जारी नेशनल गाइडलाइंस फॉर स्टेम सेल रिसर्च और समय-समय पर सरकार की ओर से जारी दूसरे लागू निर्देशों का पालन करना होगा।

राज्यों और अस्पतालों को दी जाने वाली जानकारियां

मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि स्टेम सेल थेरेपी से जुड़े नियमों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की जानकारी सभी संबंधित अधिकारियों और संस्थानों तक पहुंचाई जाए। इसमें राज्य और जिला स्तर पर काम करने वाले नियामक अधिकारी, सरकारी अस्पताल, प्राइवेट क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट और स्टेम सेल रिसर्च या इलाज से जुड़े दूसरे संस्थान शामिल हैं। इसका मकसद यह है कि हर स्तर पर एक जैसे नियम लागू हों और किसी भी संस्थान में बिना जरूरी मंजूरी के स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल न किया जाए।

नियमों की अनदेखी करने पर होगा ये एक्शन

एडवाइजरी में यह भी बताया गया है कि स्टेम सेल थेरेपी से जुड़े नियमों का पालन नहीं करने पर संबंधित लोगों और संस्थानों को कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के 30 जनवरी 2026 के फैसले में भी कानूनी निर्देशों का पालन नहीं करने के परिणामों का जिक्र किया गया है। नियमों का उल्लंघन करने पर डॉक्टर के खिलाफ पेशेवर कदाचार के तहत कार्रवाई हो सकती है। इसके अलावा क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स से जुड़े कानून के तहत रजिस्ट्रेशन रद्द करने या जुर्माना लगाने जैसी कार्रवाई का भी प्रावधान है।

बिना मंजूरी ट्रीटमेंट और प्रमोशन पर भी रोक

स्टेम सेल थेरेपी से जुड़े नियम सिर्फ इलाज करने तक सीमित नहीं हैं। नेशनल मेडिकल कमीशन ने 5 सितंबर 2026 की अपनी एडवाइजरी में भी कहा है कि स्टेम सेल थेरेपी केवल मंजूर स्वास्थ्य समस्याओं के लिए ही सामान्य क्लिनिकल इलाज के तौर पर दी जा सकती है। मंजूर स्थितियों के अलावा ऐसी थेरेपी देना, मरीज को इसकी सलाह देना, इसका प्रमोशन करना या एडवर्टिसमेंट करना गलत माना जा सकता है।

स्टेम सेल थेरेपी को लेकर सरकार ने नियमों के साथ NMC ने स्टेट मेडिकल काउंसिलों से यह भी कहा है कि सामने आने वाले कथित नियम उल्लंघन के मामलों की जांच की जाए और जांच के बाद यदि किसी रजिस्टर्ड डॉक्टर पर प्रोफेशनल मिसकंडक्ट साबित होता है, तो उसके खिलाफ लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए। ऐसे में स्टेम सेल थेरेपी से जुड़े डॉक्टरों और संस्थानों के लिए जरूरी है कि वे तय नियमों, मंजूर क्लिनिकल ट्रायल और सरकारी रेगुलेशन का पालन करते हुए ही इलाज या रिसर्च से जुड़ा काम करें।

आंदोलन के बाद छत्रपति संभाजीनगर लौटे CJP प्रमुख अभिजीत दीपके की तबीयत बिगड़ी, डॉक्टरों ने दी आराम की सलाह

Abhijit Dipke Cockroach Janata Party

Abhijit Deepke health news: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में आंदोलन का झंडा बुलंद करने वाले 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके अचानक अस्वस्थ हो गए हैं। शनिवार को अपने गृह जिले छत्रपति संभाजीनगर स्थित आवास पर समर्थकों और लोगों से मुलाकात के दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद डॉक्टरों ने उनकी जांच कर उन्हें पूरी तरह से आराम करने की सख्त सलाह दी है।

क्या हुआ था उस वक्त?

शनिवार सुबह करीब 11:45 बजे अभिजीत दीपके अपने घर के पार्किंग एरिया में उनसे मिलने पहुंचे लोगों और कार्यकर्ताओं से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें तेज बेचैनी महसूस हुई और वे अचानक बातचीत छोड़कर घर के पिछले हिस्से में चले गए, जहां उन्हें उल्टी हुई। इसके बाद वे मीडियाकर्मियों से बिना बातचीत किए सीधे अपने कमरे में चले गए। दीपके के पिता भगवान दीपके ने स्थिति को देखते हुए तुरंत डॉक्टरों की टीम को बुलाया। ALSO READ: बड़ा धमाका! अब यूपी के भाजपा नेता की बेटी ने किया CJP का समर्थन, जानिए कौन हैं यशस्विनी राजे सिंह?

 

डॉ. विशाल लहाने ने दीपके के आवास पर जाकर उनका मेडिकल चेकअप किया। जांच के बाद डॉ. लहाने ने बताया कि उनका रक्तचाप (BP) सामान्य से थोड़ा कम (100/60) पाया गया है। दरअसल, अत्यधिक तनाव और घबराहट की वजह से उन्हें जी मिचलाने, बार-बार उल्टी और दस्त की समस्या हुई है।  डॉक्टरों ने उन्हें ड्रिप (ग्लूकोज) चढ़ाई है। फिलहाल उन्हें बुखार नहीं है और उन्हें पूरी तरह से आराम करने को कहा गया है। यदि सेहत में सुधार नहीं होता है, तो ब्लड टेस्ट कराए जाएंगे। ALSO READ: धमकी के बाद छिपकर रहे थे दीपके के माता-पिता, CJP नए आंदोलन की तैयारी में

कौन हैं अभिजीत दीपके?

अभिजीत दीपके महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले एक चर्चित सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक एवं प्रमुख हैं। अपने अनोखे और लीक से हटकर विरोध प्रदर्शनों के कारण वे सोशल मीडिया और स्थानीय राजनीति में काफी चर्चा में रहते हैं।

 

जुलाई के आखिरी हफ्ते में (25 जुलाई के आसपास) दीपके दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे थे। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान भी उन्होंने बताया था कि वे टाइफाइड से पीड़ित हैं और उनका इलाज चल रहा है। दिल्ली के उग्र आंदोलन, लगातार भागदौड़ और टाइफाइड के बावजूद आराम न करने की वजह से उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई।

क्या इंसान मैक्सिमम 156 साल तक जिंदा रह सकता है? वैज्ञानिकों को इस नई स्टडी में जो पता चला उसे जानिए

क्या इंसान हमेशा के लिए जिंदा रह सकते हैं? अधिकतर लोगों का जवाब ‘नहीं’ होगा। लेकिन हाल में एक नई स्टडी में चौंकाने वाली चीजें सामने आई हैं। रिसर्च करने वालों ने पाया है कि भले ही भविष्य की दवाएं बुढ़ापे के हर उस लक्षण को सीमित समय तक ठीक करने में कामयाब हो, फिर भी जीवन भर जमा होने वाले रैंडम DNA म्यूटेशन इंसानों की औसत उम्र को लगभग 156 साल तक ही सीमित रख सकते हैं।

‘npj Aging’ में पब्लिश हुई यह स्टडी ऐसे समय में आई है, जब लंबी उम्र से जुड़ी साइंस में दिलचस्पी बढ़ रही है। रिसर्चर और बायोटेक कंपनियां ऐसे इलाज खोज रही हैं, जिनसे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके या उसे उलटा भी जा सके।

रूस के स्कोल्कोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (स्कोल्टेक) के वैज्ञानिकों ने एक मैथमैटिकल मॉडल का इस्तेमाल करके यह अंदाजा लगाया कि अगर उम्र बढ़ने की हर उस प्रक्रिया को खत्म कर दिया जाए, जिसे उलटा जा सकता है-जैसे बीमारी, हार्मोन में कमी और सेल में होने वाले दूसरे बदलाव-और सिर्फ़ ‘सोमैटिक म्यूटेशन’ (समय के साथ सेल में अपने-आप होने वाली रैंडम DNA गड़बड़ियां) ही बाकी रहें, तो इंसान कितने समय तक जीवित रह सकता है।

उनकी स्टडी से पता चला कि सिर्फ़ सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) की वजह से इंसानों की औसत उम्र 146 से 194 साल के बीच ही सीमित रहेगी, जिसमें 156 साल का अनुमान सबसे अहम है।

एक्सपेरिमेंटल स्टडीज़ के उलट, यह रिसर्च भविष्य में लोग कितने समय तक जीवित रहेंगे, इस बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि यह एक ‘थॉट एक्सपेरिमेंट’ (सोच-विचार पर आधारित प्रयोग) है। इसका मकसद उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के एक खास कारण के असर को अलग करके यह समझना है कि उम्र तय करने में उसकी कितनी भूमिका होती है।

जब भी कोशिकाएं (सेल्स) विभाजित होती हैं, तो DNA में छोटी-मोटी गलतियां हो सकती हैं। हालांकि शरीर ज़्यादातर नुकसान की मरम्मत कर लेता है, लेकिन कुछ म्यूटेशन रह जाते हैं और दशकों तक जमा होते रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कुछ कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं और धीरे-धीरे कोशिकाओं के काम करने की क्षमता को कमज़ोर कर देते हैं।

रिसर्चर्स ने पाया कि सबसे बड़ी चुनौती उन अंगों से जुड़ी है जो खराब हो चुकी कोशिकाओं को आसानी से नहीं बदल पाते। त्वचा और लिवर जैसे टिश्यू लगातार खुद को नया करते रहते हैं और थ्योरी के हिसाब से इस मॉडल में हज़ारों सालों तक काम करते रह सकते हैं, लेकिन दिमाग और दिल ऐसा नहीं कर पाते।

इन अंगों में मौजूद खास कोशिकाएं—न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स—शायद ही कभी दोबारा बनती हैं, जिसका मतलब है कि पूरी ज़िंदगी DNA को होने वाला नुकसान जमा होता रहता है। को-ऑथर येवगेनी एफिमोव ने कहा, “न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स उम्र को सीमित करने वाले मुख्य कारक थे।”

सिर्फ़ DNA को होने वाले नुकसान के असर को समझने के लिए, रिसर्चर्स ने सबसे पहले एक काल्पनिक “ऐसे इंसान” का मॉडल बनाया जिसकी उम्र बढ़ने के साथ मरने का खतरा नहीं बढ़ता था। उस स्थिति में, औसत जीवनकाल 1,759 साल तक पहुंच गया।

हालांकि, जब सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) को शामिल किया गया, तो जीवनकाल तेज़ी से घटकर लगभग 156 साल रह गया। इससे पता चलता है कि सैद्धांतिक अमरता और इंसानों की असल उम्र के बीच के अंतर का एक बड़ा कारण DNA को होने वाला नुकसान है।

इन नतीजों से यह भी पता चलता है कि DNA म्यूटेशन ही बुढ़ापे का एकमात्र कारण नहीं हैं। मुख्य लेखक और कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट दिमित्री क्रियुकोव ने ज़ोर देकर कहा कि इस स्टडी का मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि इंसान आखिरकार 156 साल तक जिएंगे।

यह एक गणितीय अनुमान है (भले ही सावधानी से किया गया हो), न कि एक्सपेरिमेंट से मिला डेटा।” लिंक्डइन पर लिखते हुए उन्होंने कहा कि जीवनकाल की गणना की गई सीमाएं “किसी निश्चित नतीजे का ऐलान” नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि “सोमैटिक म्यूटेशन, भले ही अकेले बुढ़ापे का कारण बनने में आश्चर्यजनक रूप से कमज़ोर हों, लेकिन दूसरी प्रक्रियाओं के साथ मिलकर अहम भूमिका निभा सकते हैं।”

रिसर्चर का कहना है कि उनका सबसे बड़ा योगदान जीवनकाल का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक नया फ़्रेमवर्क है जो वैज्ञानिकों को यह मापने में मदद कर सकता है कि बुढ़ापे में अलग-अलग बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं का कितना योगदान है। नतीजों पर टिप्पणी करते हुए, फार्मासिस्ट और रीजेनरेटिव मेडिसिन रिसर्चर एगले पाविडे ने न्यूज़वीक को बताया कि यह स्टडी बुढ़ापे की जटिलता को और पुख्ता करती है।