111 साल की महिला ने बताया लंबी उम्र का राज, रोज खाती हैं मछली और लेती हैं 2 झपकी

सोशल मीडिया पर चीन की वांग गेयिंग की कहानी काफी वायरल हो रही है। 111 साल की चीनी महिला वांग गेयिंग की लंबी उम्र लोगों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है। गेयिंग ने बताया कि, लंबी उम्र के लिए हमेशा कोई खास या मुश्किल तरीका अपनाना जरूरी नहीं होता। उनके रोजमर्रा के जीवन की साधारण आदतें और आसान दिनचर्या ही उनकी लंबी और स्वस्थ जिंदगी का हिस्सा रही हैं। सोशल मीडिया पर ये कहानी काफी वायरल हो रही है। आइए जानते हैं इनकी पूरी कहानी

चीन के जिआंग्सू प्रांत के रुगाओ शहर की रहने वाली वांग गेयिंग 111 साल की उम्र में भी अपने रोजमर्रा के काम खुद करने की कोशिश करती हैं। 100 साल की उम्र पार करने के बाद भी उनकी एक्टिव बनी हुई है। उनकी दिनचर्या की आदतें उन्हें इस उम्र में भी एक्टिव और आत्मनिर्भर रखती हैं।

100 साल की उम्र में करती है काम

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, वांग गेयिंग उम्र बढ़ने के बावजूद काफी एक्टिव रही हैं। 100 साल की उम्र में भी वह खेतों में काम करती थीं और मूंगफली व तरबूज तोड़ने जैसे कामों में हाथ बंटाती थीं। 111 साल की वांग आज भी घर के छोटे-मोटे काम खुद करती हैं। वह टेबल साफ करती हैं, कपड़े तह करती हैं और घर के दूसरे हल्के कामों में हाथ बंटाती हैं। परिवार के लोग उन्हें कई बार आराम करने की सलाह देते हैं, लेकिन वांग के मुताबिक, शरीर को एक्टिव रखना जरूरी है। वह किसी खास एक्सरसाइज रूटीन का पालन नहीं करतीं, बल्कि घर के काम करते हुए ही उनका शरीर चलता-फिरता रहता है। उनका कहना है कि इससे शरीर के अंग सक्रिय रहते हैं और ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर बना रहता है।

वांग की लंबी उम्र को उनके शहर रुगाओ से भी जोड़कर देखा जाता है। चीन के पूर्वी हिस्से में स्थित जिआंग्सू प्रांत का ये शहर लंबे समय से अपनी ज्यादा उम्र तक जीने वाली आबादी के लिए जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्होंने 100 साल या उससे ज्यादा की उम्र पूरी की है।

रुगाओ में 672 लोग है 100 के पार

जियांगहाई इवनिंग न्यूज के मुताबिक, फरवरी तक रुगाओ में 100 साल या उससे ज्यादा उम्र के 672 लोग जीवित थे। इसी वजह से यह शहर चीन के उन इलाकों में शामिल है, जहां इतनी ज्यादा उम्र तक पहुंचने वाले लोगों की संख्या काफी अधिक है। शोध में रुगाओ की मिट्टी में मौजूद खनिजों और स्थानीय वातावरण में पाए जाने वाले सूक्ष्म तत्वों का भी अध्ययन किया गया है। साइंटिस्ट्स ने रुगाओ के वातावरण को समझने के लिए वहां की मिट्टी, फसलों और पीने के पानी की जांच की है।

खान-पान का रखती है ध्यान

शोध के मुताबिक, रुगाओ का स्थानीय वातावरण लोगों की सेहत और लंबी उम्र से जुड़ा हो सकता है, हालांकि इसकी कोई एक वजह साफ नहीं है। वहीं, वांग कम मात्रा में अलग-अलग तरह का खाना खाती हैं। उन्हें मछली पसंद है और वह ज्यादा खाने से बचती हैं। वांग की दिनचर्या में सिर्फ खान-पान और शारीरिक गतिविधियां ही शामिल नहीं हैं, बल्कि वह छोटी-छोटी खुशियों को भी महत्व देती हैं। वह हर दिन कोई न कोई अच्छा काम करने की कोशिश करती हैं। कभी वह परिवार के किसी सदस्य की तारीफ करती हैं तो कभी किसी पुराने दोस्त को छोटा सा संदेश भेजती हैं। जब कोई बात वांग को परेशान करती है, तो वह उसे लेकर रातभर चिंता करने के बजाय सो जाना पसंद करती हैं।

वांग का सोने-जागने का समय भी तय है। वह शाम 7 बजे सोती हैं और सुबह 7 बजे उठती हैं। दिन में एक-दो बार आराम भी करती हैं। वांग अपने परिवार की पांच पीढ़ियों के साथ रहती हैं और उनका एक पोता 60 साल का है। पांच पीढ़ियों के परिवार के साथ रहते हुए भी वह अपनी क्षमता के अनुसार रोजमर्रा के काम खुद करती हैं।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

क्या इंसान मैक्सिमम 156 साल तक जिंदा रह सकता है? वैज्ञानिकों को इस नई स्टडी में जो पता चला उसे जानिए

क्या इंसान हमेशा के लिए जिंदा रह सकते हैं? अधिकतर लोगों का जवाब ‘नहीं’ होगा। लेकिन हाल में एक नई स्टडी में चौंकाने वाली चीजें सामने आई हैं। रिसर्च करने वालों ने पाया है कि भले ही भविष्य की दवाएं बुढ़ापे के हर उस लक्षण को सीमित समय तक ठीक करने में कामयाब हो, फिर भी जीवन भर जमा होने वाले रैंडम DNA म्यूटेशन इंसानों की औसत उम्र को लगभग 156 साल तक ही सीमित रख सकते हैं।

‘npj Aging’ में पब्लिश हुई यह स्टडी ऐसे समय में आई है, जब लंबी उम्र से जुड़ी साइंस में दिलचस्पी बढ़ रही है। रिसर्चर और बायोटेक कंपनियां ऐसे इलाज खोज रही हैं, जिनसे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके या उसे उलटा भी जा सके।

रूस के स्कोल्कोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (स्कोल्टेक) के वैज्ञानिकों ने एक मैथमैटिकल मॉडल का इस्तेमाल करके यह अंदाजा लगाया कि अगर उम्र बढ़ने की हर उस प्रक्रिया को खत्म कर दिया जाए, जिसे उलटा जा सकता है-जैसे बीमारी, हार्मोन में कमी और सेल में होने वाले दूसरे बदलाव-और सिर्फ़ ‘सोमैटिक म्यूटेशन’ (समय के साथ सेल में अपने-आप होने वाली रैंडम DNA गड़बड़ियां) ही बाकी रहें, तो इंसान कितने समय तक जीवित रह सकता है।

उनकी स्टडी से पता चला कि सिर्फ़ सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) की वजह से इंसानों की औसत उम्र 146 से 194 साल के बीच ही सीमित रहेगी, जिसमें 156 साल का अनुमान सबसे अहम है।

एक्सपेरिमेंटल स्टडीज़ के उलट, यह रिसर्च भविष्य में लोग कितने समय तक जीवित रहेंगे, इस बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि यह एक ‘थॉट एक्सपेरिमेंट’ (सोच-विचार पर आधारित प्रयोग) है। इसका मकसद उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के एक खास कारण के असर को अलग करके यह समझना है कि उम्र तय करने में उसकी कितनी भूमिका होती है।

जब भी कोशिकाएं (सेल्स) विभाजित होती हैं, तो DNA में छोटी-मोटी गलतियां हो सकती हैं। हालांकि शरीर ज़्यादातर नुकसान की मरम्मत कर लेता है, लेकिन कुछ म्यूटेशन रह जाते हैं और दशकों तक जमा होते रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कुछ कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं और धीरे-धीरे कोशिकाओं के काम करने की क्षमता को कमज़ोर कर देते हैं।

रिसर्चर्स ने पाया कि सबसे बड़ी चुनौती उन अंगों से जुड़ी है जो खराब हो चुकी कोशिकाओं को आसानी से नहीं बदल पाते। त्वचा और लिवर जैसे टिश्यू लगातार खुद को नया करते रहते हैं और थ्योरी के हिसाब से इस मॉडल में हज़ारों सालों तक काम करते रह सकते हैं, लेकिन दिमाग और दिल ऐसा नहीं कर पाते।

इन अंगों में मौजूद खास कोशिकाएं—न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स—शायद ही कभी दोबारा बनती हैं, जिसका मतलब है कि पूरी ज़िंदगी DNA को होने वाला नुकसान जमा होता रहता है। को-ऑथर येवगेनी एफिमोव ने कहा, “न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स उम्र को सीमित करने वाले मुख्य कारक थे।”

सिर्फ़ DNA को होने वाले नुकसान के असर को समझने के लिए, रिसर्चर्स ने सबसे पहले एक काल्पनिक “ऐसे इंसान” का मॉडल बनाया जिसकी उम्र बढ़ने के साथ मरने का खतरा नहीं बढ़ता था। उस स्थिति में, औसत जीवनकाल 1,759 साल तक पहुंच गया।

हालांकि, जब सोमैटिक म्यूटेशन (शरीर की कोशिकाओं में होने वाले बदलाव) को शामिल किया गया, तो जीवनकाल तेज़ी से घटकर लगभग 156 साल रह गया। इससे पता चलता है कि सैद्धांतिक अमरता और इंसानों की असल उम्र के बीच के अंतर का एक बड़ा कारण DNA को होने वाला नुकसान है।

इन नतीजों से यह भी पता चलता है कि DNA म्यूटेशन ही बुढ़ापे का एकमात्र कारण नहीं हैं। मुख्य लेखक और कंप्यूटेशनल बायोलॉजिस्ट दिमित्री क्रियुकोव ने ज़ोर देकर कहा कि इस स्टडी का मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि इंसान आखिरकार 156 साल तक जिएंगे।

यह एक गणितीय अनुमान है (भले ही सावधानी से किया गया हो), न कि एक्सपेरिमेंट से मिला डेटा।” लिंक्डइन पर लिखते हुए उन्होंने कहा कि जीवनकाल की गणना की गई सीमाएं “किसी निश्चित नतीजे का ऐलान” नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि “सोमैटिक म्यूटेशन, भले ही अकेले बुढ़ापे का कारण बनने में आश्चर्यजनक रूप से कमज़ोर हों, लेकिन दूसरी प्रक्रियाओं के साथ मिलकर अहम भूमिका निभा सकते हैं।”

रिसर्चर का कहना है कि उनका सबसे बड़ा योगदान जीवनकाल का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक नया फ़्रेमवर्क है जो वैज्ञानिकों को यह मापने में मदद कर सकता है कि बुढ़ापे में अलग-अलग बायोलॉजिकल प्रक्रियाओं का कितना योगदान है। नतीजों पर टिप्पणी करते हुए, फार्मासिस्ट और रीजेनरेटिव मेडिसिन रिसर्चर एगले पाविडे ने न्यूज़वीक को बताया कि यह स्टडी बुढ़ापे की जटिलता को और पुख्ता करती है।