5,000 किलोमीटर की फ्लाइटों पर ईयू का उत्सर्जन शुल्क

Air India Flight

ओंकार सिंह जनौटी

अमेरिका ने यूरोपीय संघ की नई कार्बन उत्सर्जन योजना को लेकर एक बार फिर चिंता जताई है। लंबी दूरी की उड़ान पर शुल्क के इस प्रस्ताव से भारत और ब्राजील समेत कई देश नाखुश हैं। ALSO READ: कमजोर हो सकती है दुनिया की सबसे असरदार पर्यावरण नीति 'ईटीएस'

 

अमेरिकी परिवहन विभाग ने कहा है कि वह यूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के किसी भी विस्तार को लेकर “गहरी चिंता” में है। असल में यूरोपीय आयोग ने हाल में प्रस्ताव दिया है कि यूरोप से रवाना होने वाली कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर कार्बन उत्सर्जन शुल्क लागू किया जाएगा। यह यूरोप से उड़ान भरकर 5,000 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली फ्लाइटों पर लागू होगा।

 

2029 से लागू होने वाले इस कदम से जर्मनी, फ्रांस, इटली या डेनमार्क से रूस, सऊदी अरब, यूएई, तुर्की और मिस्र जाने वाली फ्लाइटें प्रभावित होंगी। हालांकि एक तरफ 5,000 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करने वाली उड़ानें इसके दायरे से बाहर रहेंगी। माना जा रहा है कि ईयू ने यह सीमा अमेरिका को नाराज ना करने के लिए रखी है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों के बीच हवाई दूरी 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है। इसके साथ ही भारत, जापान और चीन से यूरोप पहुंचने वाली उड़ानों पर पहले चरण में इसका असर नहीं पड़ेगा।

 

यूरोपीय संघ के जलवायु कमिश्नर होप्के वोएकस्त्रा कहते हैं, “उड्डयन ही एकमात्र ऐसा बड़ा सेक्टर है, जिसमें उत्सर्जन घटने के बजाए बढ़ रहा है।” यूरोपीय अधिकारी के मुताबिक उत्सर्जन व्यापार प्रणाली से जुड़े शुल्क में प्राइवेट जेट और चार्टर्ड उड़ानें भी आएंगी।

 

यूरोपीय संघ 2012 से सभी इंटरनेशनल फ्लाइटों को ETS के दायरे में लाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखा विरोध झेलना पड़ रहा है। यह विरोध अब भी जारी है। सोमवार को अमेरिका के परिवहन मंत्रालय के प्रवक्ता ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स के सामने ETS को लेकर गहरी चिंता जताई।

 

असल में यूरोपीय आयोग ने 17 जुलाई को ETS से जुड़े प्रस्ताव प्रकाशित किए। यह प्रस्ताव यूरोप से उड़ान भरने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को लेकर थे। इन प्रस्तावों के सामने आने के बाद अमेरिकी परिवहन मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “हम यूरोपीय आयोग के प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं और हम अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारों को बचाने के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं।” ALSO READ: दोहरे मापदंडों के चलते घिरे दिग्गज जर्मन नेता का इस्तीफा

 

क्यों ETS का विस्तार चाहता है ईयू

यूरोपीय संघ को लगता है कि जलवायु को गर्म करने वाली गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अगर संघ में कड़े नियम लागू किए जाते हैं, तो कई कंपनियां ईयू से बाहर निकलकर, करीबी पड़ोसी देशों में जा सकती हैं। इससे उत्सर्जन भी कम नहीं होगा और कंपनियां स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी तकनीक में निवेश करने के लिए भी प्रोत्साहित नहीं होंगी।

 

हालांकि ईयू के भीतर भी चेक गणराज्य, इटली और पोलैंड जैसे देश ETS का विरोध कर रहे हैं। इन देशों का कहना है कि इससे छोटे और मध्यम श्रेणी के उद्योगों व कारोबारों पर बेहताशा बोझ पड़ेगा जिससे वे बिखर सकते हैं।

 

वहीं आयोग का कहना है कि यूरोपीय संघ में परिवहन की वजह से होने वाला उत्सर्जन अभी कुल उत्सर्जन का 14 फीसदी है। यूरोपीय संघ के कुल सीओटू उत्सर्जन में एविएशन सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 4 फीसदी है। आयोग का कहना है कि अगर ETS जैसे कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक यह उत्सर्जन बढ़कर 90 फीसदी हो सकता है और इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार लंबी दूरी की उड़ानें होंगी। ALSO READ: चैट जीपीटी के ज्यादा इस्तेमाल से दिमाग कमजोर होने का डर

 

विरोध करने वालों की साफ चेतावनियां

ईयू से बाहर के देशों ने चेतावनी दी है कि ETS अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और जहाजरानी उद्योग को प्रभावित करेगा। इसका सीधा असर यूरोपीय बंदरगाहों से निकलने वाले विमानों और मालवाहक जहाजों पर पड़ेगा। अमेरिका, चीन, तुर्की और यूएई जैसे देश ETS को अंतरराष्ट्रीय परिवहन समझौतों का उल्लंघन  बता रहे हैं।

 

अमेरिका और अन्य कारोबारी साझेदार, यूरोपीय संघ को जवाबी कदमों की चेतावनी भी दे चुके हैं। ETS का विरोध कर रहे देशों का कहना है कि अगर यूरोपीय संघ कार्बन प्राइसिंग पॉलिसी पर आगे बढ़ा तो वे भी अपने उद्योगों को इसके वित्तीय बोझ से बचाएंगे।

 

ब्रिटेन के साथ साथ ETS को लेकर भारत और ब्राजील की भी आपत्तियां हैं। ब्राजील और भारत अंतरराष्ट्रीय सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेश (ICAO) के जरिए उड्डयन क्षेत्र में ETS का विरोध कर रहे हैं। दोनों देशों का आरोप है कि यूरोपीय देशों ने ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन किया है और अब जब उनका एविएशन सेक्टर विकास कर रहा है तो ब्रसेल्स उस पर बंदिशें लगाने की कोशिश कर रहा है।

 

Crude Oil Price: 2 महीने के हाई पर पहुंचा कच्चा तेल, ब्रेंट क्रूड $92 के पार, जानें वो वजह जिनके कारण बढ़ रही है कीमतें

Crude Oil Price: वेस्ट एशिया में मीडिएशन बातचीत में कोई खास प्रोग्रेस नहीं होने और US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के भी इसकी उम्मीदों को कम आंकने और साथ ही और हमलों की धमकी देने के बाद, क्रूड ऑयल की कीमतों में रात भर और बुधवार, 22 जुलाई को एशिया के शुरुआती ट्रेडिंग में भी बढ़त जारी रही।

ब्रेंट क्रूड की कीमतें $92 प्रति बैरल के लेवल को पार कर गईं, जो जून की शुरुआत में देखे गए लेवल तक पहुंच गईं। US क्रूड, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI), अब $85 प्रति बैरल के लेवल के पास ट्रेड कर रहा है, जो लगातार चौथे सेशन में चढ़ रहा है।

यमन में हूतियों की इस धमकी के बाद कि अगर और हमले हुए तो वे रेड सी और बाब अल-मंडेब स्ट्रेट में शिपिंग को रोक देंगे, तेल की कीमतों में बढ़त जारी रही। उन्होंने सऊदी अरब पर मैरीटाइम बैन भी लगा दिया है, और शिप मालिकों को सऊदी पोर्ट्स पर न आने के लिए ईमेल भेजे हैं।

US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने इन धमकियों का जवाब देते हुए कहा कि अगर यमन रेड सी में ट्रैफिक को रोकने की कोशिश करता है तो US जवाब देगा। उन्होंने जल्द ही पिकैक्स माउंटेन पर हमला करने की अपनी धमकी भी दोहराई, जिस पर US को शक है कि वह ईरान की न्यूक्लियर साइट है।

सालों में अपनी सबसे खराब तिमाही के बाद तेल की कीमतों में तेज़ी आई है, क्योंकि US और ईरान के बीच सीज़फ़ायर और होर्मुज़ स्ट्रेट में ट्रैफ़िक बढ़ाने के लिए MoU साइन करने के बाद ईरान युद्ध से हुई सारी कमाई खत्म हो गई थी। हालांकि, हाल के दिनों में कमर्शियल जहाजों पर ईरानी हमलों और US सेना की लगातार 10 रातों तक बमबारी ने रिस्क प्रीमियम को वापस ला दिया है।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हूथी धमकियों के बाद मंगलवार को लाल सागर में तीन तेल टैंकरों ने यू-टर्न ले लिया। एक चीन के लिए दो मिलियन बैरल सऊदी क्रूड ले जा रहा था, दूसरा मैंगलोर के लिए 7,00,000 बैरल ले जा रहा था और फिर स्वेज़ नहर की ओर मुड़ गया, जबकि तीसरा पाकिस्तान जा रहा था और उसने भी अपनी यात्रा छोड़ दी।

ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान US से मिलने के लिए बेताब है, लेकिन जब तक वे बात करने के लिए सही मायने में तैयार नहीं हो जाते, तब तक वे ऐसा करने में दिलचस्पी नहीं रखते। तेल की कीमतें और किस वजह से बढ़ रही हैं।

कीमतों में उछाल की ओर क्या है वजह

वेस्ट एशिया के अलावा, तेल की कीमतें और बढ़ने की एक और वजह यह है कि कज़ाकिस्तान को रूस के ब्लैक सी कोस्ट पर अपने मेन एक्सपोर्ट टर्मिनल पर क्रूड भेजना बंद करना पड़ रहा है, क्योंकि वहां कई हमले हुए हैं।

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम टर्मिनल सप्लाई लेना बंद करने वाला था क्योंकि कंपनियां अपने जहाज इस जगह पर भेजने से कतरा रही थीं।

कज़ाकिस्तान का लगभग 80% क्रूड एक्सपोर्ट इसी टर्मिनल से होता है। यह देश यूरोप को दूसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर भी है। यूक्रेन ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी नहीं ली है।

क्रूड पर गोल्डमैन सैक्स की चेतावनी

एनालिस्ट का मानना ​​है कि रेड सी के बंद होने से तेल की कीमतें फिर से $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, क्योंकि होर्मुज की गैर-मौजूदगी में यह सऊदी अरब के लिए एक ज़रूरी एक्सपोर्ट रूट बन गया था और ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन इसके लिए एक ज़रूरी सोर्स के तौर पर काम करती थी।

गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी है कि अगर ये रुकावटें जारी रहीं, तो कच्चे तेल की कीमतें साल की चौथी तिमाही तक वापस $120 प्रति बैरल पर आ सकती हैं, लेकिन उनका बेस केस अभी इसी समय के दौरान कच्चे तेल के $80 पर रहने को ही मान रहा है।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

अल्फांसो आम की फसल को गर्मी ने दिया झटका, फिर भी रिकॉर्ड 34 देशों तक पहुंचा भारत का हापुस

Indian Alphonso Mango Crop: बेमौसम गर्मी और जलवायु परिवर्तन की मार के बावजूद भारतीय अल्फांसो आम (हापुस) ने ग्लोबल बाजार में अपनी मिठास का परचम लहराया है। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में भीषण गर्मी और प्रतिकूल मौसम की वजह से अल्फांसो आम की पैदावार को भारी नुकसान हुआ लेकिन इसके बावजूद भारत ने चालू वित्त वर्ष में रिकॉर्ड 34 देशों तक हापुस आम का निर्यात करने में सफलता हासिल की है। वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने 21 जुलाई को लोकसभा में एक लिखित उत्तर के दौरान ये जानकारी दी है।

कोंकण में बेमौसम गर्मी की मार और लॉजिस्टिक्स का संकट

राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बताया कि महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र, विशेष रूप से रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों में अनियंत्रित और बेमौसम गर्मी और अनियमित जलवायु की वजह से अल्फांसो आम की फसल को काफी नुकसान पहुंचा है। इससे न सिर्फ उत्पादन प्रभावित हुआ बल्कि एक्सपोर्ट क्वॉलिटी वाले फलों की उपलब्धता पर भी असर पड़ा है। इसके अलावा निर्यातकों को कई अंतरराष्ट्रीय और लॉजिस्टिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। वेस्ट एशिया में जारी संकट की वजह से शिपमेंट में देरी हुई और बंदरगाहों पर भीड़ बढ़ गई। निर्यातकों को उच्च फ्रेट लागत, वॉर-रिस्क सरचार्ज और कंटेनरों की भारी किल्लत से जूझना पड़ा।

इसके बाद भी 24 से बढ़कर 34 देशों तक पहुंचा भारतीय हापुस

इन तमाम वैश्विक चुनौतियों, भाड़े में बढ़ोतरी और फसल के नुकसान के बावजूद भारत ने अल्फांसो आम के अंतरराष्ट्रीय बाजार का विस्तार जारी रखा है। वित्त वर्ष 2020-21 में जहां अल्फांसो आम सिर्फ 24 देशों में निर्यात होता था वहीं चालू वित्त वर्ष में यह दायरा बढ़कर 34 देशों तक पहुंच गया है। अमेरिका, बेल्जियम, संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी, आइसलैंड, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया और रूस सहित 15 से अधिक देशों में भारतीय आम को बढ़ावा देने के लिए प्रचार कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

जापान और नेपाल निर्यात पर सरकार का स्पष्टीकरण

निर्यात से जुड़े अन्य मुद्दों पर मंत्री ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया। नेपाल को आम के निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं है। नेपाल में जरूरी नियमों का पालन करते हुए आयात की अनुमति दी गई है। ‘नेशनल प्लांट प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशन’ (NPPO) भारतीय निर्यात सुविधाओं के 2026 प्री-सीजन निरीक्षण के दौरान जापानी अधिकारियों द्वारा उठाए गए मुद्दों को हल करने के लिए लगातार उनके संपर्क में है।

प्रभावित निर्यातकों के लिए सरकार का राहत पैकेज

लॉजिस्टिक्स में आए व्यवधानों और माल भाड़े के बोझ से प्रभावित निर्यातकों को सहयोग देने के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं लागू की हैं। एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन के तहत सरकार ने RELIEF पहल शुरू की है। इसके जरिए भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम के माध्यम से बीमाकृत निर्यातकों और पात्र MSMEs को सहायता दी जा रही है। ऐसा इसलिए ताकि उनके अतिरिक्त फ्रेट और बीमा बोझ को कम किया जा सके। वाणिज्य विभाग, एपीडा (APEDA) के माध्यम से अपनी वित्तीय सहायता योजना के तहत आम निर्यातकों को सहायता दे रहा है। इसका उद्देश्य एक्सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, गुणवत्ता अनुपालन और बाजार विकास को मजबूत करना है।

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यूक्रेन में शिप पर हमला, 4 भारतीयों की मौत:भारत ने कहा- कारोबारी जहाजों को निशाना बनाना निंदनीय; यूक्रेन बोला- रूसी मिसाइलों से हमला हुआ

यूक्रेन के ओडेसा पोर्ट से रवाना हुए कार्गो जहाज ‘MV गोल्डन लियो’ पर रविवार को हुए हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत हो गई। एक भारतीय गंभीर रूप से घायल है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है। भारत सरकार ने सोमवार को इसकी पुष्टि करते हुए हमले की कड़ी निंदा की और कहा कि कारोबारी जहाजों और निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाना पूरी तरह निंदनीय है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय दूतावास लगातार यूक्रेनी अधिकारियों के संपर्क में है और प्रभावित लोगों की हरसंभव मदद की जा रही है। उधर, यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक, गोल्डन लियो जहाज ओडेसा से मक्का लेकर रवाना हुआ था। पोर्ट से निकलने के कुछ देर बाद उस पर तीन रूसी क्रूज मिसाइलों से हमला किया गया। यूक्रेन की नौसेना ने कहा कि हमले के बाद जहाज में आग लग गई। रॉयटर्स के मुताबिक, समुद्र में जहाज से घना धुआं उठता देखा गया, जिसकी बाद में पहचान हुई। हमले के बाद की 3 तस्वीरें… जहाज पर कुल 17 क्रू मेंबर सवार थे, जिनमें 5 भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के मुताबिक, 19 जुलाई की शाम अफ्रीकी देश गिनी-बिसाऊ के झंडे वाले इस जहाज पर हमला हुआ। उस समय जहाज पर कुल 17 क्रू मेंबर थे, जिनमें पांच भारतीय शामिल थे। विदेश मंत्रालय ने मारे गए भारतीयों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायल भारतीय के जल्द स्वस्थ होने की कामना की। मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, भारत ऐसे हमलों की निंदा करता है। कारोबारी जहाजों और निर्दोष नागरिक क्रू को निशाना बनाना या समुद्री व्यापार और नेविगेशन की आजादी में बाधा डालना निंदनीय है और इससे बचा जाना चाहिए। वहीं, यूक्रेन के समुद्री बंदरगाह प्राधिकरण के मुताबिक घटना के बाद पूरी रात सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। हमले में नौ क्रू मेंबर और एक समुद्री पायलट की मौत हुई, जबकि 17 में से आठ क्रू मेंबर को सुरक्षित बचा लिया गया। ब्लैक सी में बढ़ता तनाव, कारोबार पर असर यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब रूस और यूक्रेन के बीच ब्लैक सी और सी ऑफ एजोव में सैन्य गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। इससे कारोबारी जहाजों और अनाज के निर्यात पर खतरा बढ़ गया है। 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद ब्लैक सी दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री इलाकों में शामिल हो गया। कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौतों से अनाज का निर्यात फिर शुरू हुआ था, लेकिन हाल के महीनों में बढ़े हमलों से यह व्यवस्था फिर प्रभावित हुई है। यूक्रेन लगातार रूस के ऊर्जा ढांचे और तेल टैंकरों को निशाना बना रहा है। वहीं रूस ने यूक्रेन के बंदरगाहों, ईंधन भंडारण केंद्रों और कार्गो जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं। रूस के रक्षा मंत्रालय ने भी दावा किया है कि उसकी सेना ने ओडेसा बंदरगाह पर ईंधन भंडारण केंद्रों पर हमला किया। वैश्विक अनाज कारोबार पर भी असर यूक्रेन दुनिया के कुल गेहूं निर्यात का करीब 6% और मक्का निर्यात का लगभग 11% हिस्सा देता है। लेकिन लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण ब्लैक सी के जरिए होने वाला यूक्रेन का अनाज निर्यात करीब एक-तिहाई तक प्रभावित हुआ है। दूसरी तरफ यूक्रेनी हमलों का असर रूस के अनाज कारोबार पर भी पड़ा है। रॉयटर्स के मुताबिक, यूक्रेन के हमलों के कारण रूस को सी ऑफ एजोव के रास्ते होने वाली जहाजों की आवाजाही सीमित करनी पड़ी है। इसी रास्ते से रूस के करीब एक-चौथाई अनाज का निर्यात होता है। —————– ये खबर भी पढ़ें… यूक्रेन के हमले से रूस में भी होर्मुज जैसा संकट:एजोव सागर में जहाजों की आवाजाही रुकी, 9 दिन में 116 जहाजों पर हमले हुए यूक्रेन के लगातार ड्रोन हमलों के बाद रूस को बड़ा झटका लगा है। इस सप्ताह हमलों की वजह से रूस को एजोव सागर के अहम समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही रोकनी पड़ी। इससे दुनिया के दूसरे देशों के साथ रूस का व्यापार प्रभावित होने लगा है। पूरी खबर पढ़ें…

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यूक्रेन के ओडेसा पोर्ट से रवाना हुए कार्गो जहाज ‘MV गोल्डन लियो’ पर रविवार को हुए हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत हो गई। एक भारतीय गंभीर रूप से घायल है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है। भारत सरकार ने सोमवार को इसकी पुष्टि करते हुए हमले की कड़ी निंदा की और कहा कि कारोबारी जहाजों और निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाना पूरी तरह गलत है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय दूतावास लगातार यूक्रेनी अधिकारियों के संपर्क में है और प्रभावित लोगों की हरसंभव मदद की जा रही है। उधर, यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक गोल्डन लियो जहाज ओडेसा से मक्का लेकर रवाना हुआ था। पोर्ट से निकलने के कुछ देर बाद उस पर तीन रूसी क्रूज मिसाइलों से हमला किया गया। यूक्रेन की नौसेना ने कहा कि हमले के बाद जहाज में आग लग गई। रॉयटर्स के मुताबिक, समुद्र में जहाज से घना धुआं उठता देखा गया, जिसकी बाद में पहचान हुई। हमले के बाद की 3 तस्वीरें… जहाज पर कुल 17 क्रू मेंबर सवार थे, जिनमें 5 भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के मुताबिक, 19 जुलाई की शाम अफ्रीकी देश गिनी-बिसाऊ के झंडे वाले इस जहाज पर हमला हुआ। उस समय जहाज पर कुल 17 क्रू मेंबर थे, जिनमें पांच भारतीय शामिल थे। विदेश मंत्रालय ने मारे गए भारतीयों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायल भारतीय के जल्द स्वस्थ होने की कामना की। मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, भारत ऐसे हमलों की निंदा करता है। कारोबारी जहाजों और निर्दोष नागरिक क्रू को निशाना बनाना या समुद्री व्यापार और नेविगेशन की आजादी में बाधा डालना निंदनीय है और इससे बचा जाना चाहिए। वहीं, यूक्रेन के समुद्री बंदरगाह प्राधिकरण के मुताबिक घटना के बाद पूरी रात सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। हमले में नौ क्रू मेंबर और एक समुद्री पायलट की मौत हुई, जबकि 17 में से आठ क्रू मेंबर को सुरक्षित बचा लिया गया। ब्लैक सी में बढ़ता तनाव, कारोबार पर असर यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब रूस और यूक्रेन के बीच ब्लैक सी और सी ऑफ एजोव में सैन्य गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। इससे कारोबारी जहाजों और अनाज के निर्यात पर खतरा बढ़ गया है। 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद ब्लैक सी दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री इलाकों में शामिल हो गया। कुछ अंतरराष्ट्रीय समझौतों से अनाज का निर्यात फिर शुरू हुआ था, लेकिन हाल के महीनों में बढ़े हमलों से यह व्यवस्था फिर प्रभावित हुई है। यूक्रेन लगातार रूस के ऊर्जा ढांचे और तेल टैंकरों को निशाना बना रहा है। वहीं रूस ने यूक्रेन के बंदरगाहों, ईंधन भंडारण केंद्रों और कार्गो जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं। रूस के रक्षा मंत्रालय ने भी दावा किया है कि उसकी सेना ने ओडेसा बंदरगाह पर ईंधन भंडारण केंद्रों पर हमला किया। वैश्विक अनाज कारोबार पर भी असर यूक्रेन दुनिया के कुल गेहूं निर्यात का करीब 6% और मक्का निर्यात का लगभग 11% हिस्सा देता है। लेकिन लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण ब्लैक सी के जरिए होने वाला यूक्रेन का अनाज निर्यात करीब एक-तिहाई तक प्रभावित हुआ है। दूसरी तरफ यूक्रेनी हमलों का असर रूस के अनाज कारोबार पर भी पड़ा है। रॉयटर्स के मुताबिक, यूक्रेन के हमलों के कारण रूस को सी ऑफ एजोव के रास्ते होने वाली जहाजों की आवाजाही सीमित करनी पड़ी है। इसी रास्ते से रूस के करीब एक-चौथाई अनाज का निर्यात होता है। —————– ये खबर भी पढ़ें… यूक्रेन के हमले से रूस में भी होर्मुज जैसा संकट:एजोव सागर में जहाजों की आवाजाही रुकी, 9 दिन में 116 जहाजों पर हमले हुए यूक्रेन के लगातार ड्रोन हमलों के बाद रूस को बड़ा झटका लगा है। इस सप्ताह हमलों की वजह से रूस को एजोव सागर के अहम समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही रोकनी पड़ी। इससे दुनिया के दूसरे देशों के साथ रूस का व्यापार प्रभावित होने लगा है। पूरी खबर पढ़ें…

Top News 20 July: संसद का मानसून सत्र, CJP का संसद मार्च, स्पेन बना फीफा वर्ल्ड चैंपियन

top news 20 july

Top News 20 July : संसद का मानसून सत्र आज से शुरू हो रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी का संसद मार्च आज, दिल्ली पुलिस ने नहीं दी अनुमति। ट्रंप ने रिपब्लिकन सांसदों से रूस पर प्रस्तावित प्रतिबंध विधेयक में ईरान को भी शामिल करने की मांग की है। स्पेन ने 16 साल बाद फीफा वर्ल्ड कप जीता। इंग्लैंड ने तीसरे वनडे में भारत और 27 रनों से हराया। 20 जुलाई की बड़ी खबरें : 

 

आज से संसद का मानसून सत्र

संसद का मानसून सत्र आज से शुरू हो रहा है। चढ़ावा चोरी, नीट परीक्षा आदि मामलों पर संसद में हंगामा हो सकता है। राष्ट्रगीत का अपमान करने वालों के खिलाफ कड़े प्रावधान वाला 'वंदे मातरम बिल' समेत पांच नए विधेयक भी इस सत्र में पेश होने जा रहे हैं। DMK ने परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पर सरकार को समर्थन देने के संकेत दिए।

 

CJP का संसद मार्च

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर धरना दे रहे कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े प्रदर्शनकारी आज संसद मार्च करेंगे। दिल्ली पुलिस ने मार्च की अनुमति नहीं दी है। राष्‍ट्रीय राजधानी में धारा 163 लागू। लिहाजा, जंतर-मंतर के चारों तरफ बैरिकेडिंग कर दी गई है।  

 

रूस पर शिकंजे वाले बिल में ईरान भी!

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रिपब्लिकन सांसदों से रूस पर प्रस्तावित प्रतिबंध विधेयक में ईरान को भी शामिल करने की मांग की है। यह विधेयक रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले शीर्ष देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने का प्रावधान करता है। इनमें भारत भी शामिल है।

 

स्पेन ने 16 साल बाद फीफा वर्ल्ड कप जीता

स्पेन ने अर्जेंटीना के 1-0  से हराकर दूसरी बार फीफा वर्ल्ड कप का खिताब जीत लिया। टीम ने न्यूयॉर्क के न्यू जर्सी स्टेडियम में खेले गए फाइनल में 2022 की चैंपियन अर्जेंटीना को 1-0 से हराया। स्पेन के लिए एक्स्ट्रा टाइम में फेरन टोरेस ने गोल किया। स्पेन ने इससे पहले 2010 में फीफा विश्‍व कप जीता था। फुटबॉल वर्ल्ड कप 2026 में सबसे ज्यादा गोल फ्रांस के किलियन एम्बाप्पे ने किए। उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में 10 गोल और 4 असिस्ट के साथ गोल्डन बूट अपने नाम किया। ALSO READ: स्पेन ने अर्जेंटीना का सपना तोड़ा, 1-0 से जीतकर दूसरी बार बना FIFA वर्ल्ड कप चैंपियन; फेरन टोरेस ने किया विजयी गोल

 

27 रनों से जीता इंग्लैंड

इंग्लैंड ने लॉर्ड्स के एतिहासिक मैदान पर भारत के खिलाफ 27 रनों से जीत पाकर 3 मैचों की सीरीज को 2-1 से अपने नाम कर लिया। पहले बल्लेबाजी करने उतरी इंग्लैंड की टीम ने 3 विकेट खोकर 387 रन बनाए। इसके जवाब में भारत की टीम रोहित शर्मा के शतक के बावजूद 360 रन ही बना सकी। ALSO READ: स्पेन ने अर्जेंटीना का सपना तोड़ा, 1-0 से जीतकर दूसरी बार बना FIFA वर्ल्ड कप चैंपियन; फेरन टोरेस ने किया विजयी गोल

Tariff on Russia Oil: भारत-चीन को ट्रंप दे सकते हैं बड़ा झटका, रूस से तेल खरीदने पर 100% टैरिफ वाले बिल को अमेरिका के 60 सीनेटर्स ने किया समर्थन

US Tariff on India-China: रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अब अमेरिका बड़ा एक्शन लेने जा रहा है। अमेरिकी संसद (सीनेट) में पेश किए गए 100 फीसदी तक का भारी टैरिफ वाले बिल को भारी समर्थन मिल रहा है। अमेरिका के 60 से ज्यादा सांसदों ने इस बिल को सपोर्ट किया है। अमेरिकी राष

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Dollar Vs INR : रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब रुपया, एक्सपर्ट्स से जानें आगे कैसी रह सकती है इसकी चाल

Dollar Vs Rupee : अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। जानकारों का मानना ​​है कि इस गिरावट की वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें,विदेशी निवेश में कमी,डॉलर की मजबूत मांग और अर्थव्यवस्था में स्ट्रक्चरल असंतुलन जैसे कई कारण हैं। 20 मई को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.83 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था। वहीं, आज शुक्रवार को यह 96.30 के आसपास कारोबार कर रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर से सिर्फ 0.55 प्रतिशत दूर दिख रहा है।

रुपए की हालिया गिरावट ने 5 जून के बाद हुई करेंसी की रिकवरी को खत्म कर दिया है,जिससे रुपया इस महीने एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल हो गया है।

तेल की कीमतों में उछाल से अर्थव्यवस्था की स्ट्रक्चरल कमजोरियां सामने आईं

इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के कोर एनालिटिकल ग्रुप के डायरेक्टर सौम्यजीत नियोगी का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपये के कमजोर होने में एक ट्रिगर का काम किया है,लेकिन यह इसकी मुख्य वजह नहीं है। नियोगी के मुताबिक,मज़बूत अमेरिकी डॉलर,टैरिफ की वजह से एक्सपोर्ट में आ रही मुश्किलें, चीन की आक्रामक डंपिंग और कमजोर ग्लोबल आउटलुक, इन सभी का असर रुपये पर पड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि करीब एक दशक तक भारत को कच्चे तेल की कम कीमतों का फायदा मिला,जिससे इन दबावों को झेलने में मदद मिली। लेकिन,हाल ही में तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने यह सहारा छीन लिया और अर्थव्यवस्था को कई मौजूदा ढ़ाचागत कमजेरियां उभर कर सामने आ गईं।

बंधन AMC के सीनियर इकोनॉमिस्ट श्रीजीत बालासुब्रमण्यन का कहना है कि रुपए में हाल में आई गिरावट को भारत के स्ट्रक्चरल करंट अकाउंट डेफिसिट के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। असल में भारत करंट अकाउंट डेफिसिट वाला देश है। हम एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई कि तुलना में इंपोर्ट पर ज्यादा खर्च करते हैं,और जब हमें बैलेंस ऑफ पेमेंट्स में सरप्लस मिलता भी है,तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कैपिटल इनफ्लो करंट अकाउंट डेफिसिट से ज़्यादा होता है। उन्होंने आगे कहा कि ढ़ाचागत रूप से,पिछले 10-15 सालों में रुपये की कीमत में सालाना लगभग 3-4 प्रतिशत की गिरावट आई है।

डॉलर की आवक में कमजोरी, इसकी निकासी की भरपाई करने में रही नाकाम

RBI के 5 जून के उपायों ने (जिनमें फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट बैंक (FCNR-B) डिपॉजिट के लिए इंसेंटिव भी शामिल थे) शुरुआत में बाजार का मूड बेहतर किया था। हालांकि,डॉलर की आवक उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। यह उम्मीद से कम ही रही।

आरित्या ब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड में रिसर्च हेड गौरव अरोड़ा ने बताया कि इस साल विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार से 36 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम निकाली है,जो पिछले साल की निकासी से ज्यादा है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल कैपिटल तेजी से AI और सेमीकंडक्टर-आधारित बाज़ारों,जैसे कि अमेरिका,ताइवान और दक्षिण कोरिया की ओर शिफ्ट हो रहा है।

गौरव अरोड़ा ने जून में भारत के 30.43 अरब डॉलर के व्यापार घाटे की ओर भी इशारा किया। यह घाटा मुख्य रूप से कच्चे तेल,इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात के कारण हुआ। साथ ही इसमें अमेरिकी डॉलर की मजबूती और फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर कोई खास जल्दबाजी न दिखाने का भी असर रहा।

बार्कलेज की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अब तक FCNR(B) के तहत केवल 5-6 अरब डॉलर का ही विदेशी निवेश आया है,जो शुरुआती अनुमानों से काफी कम है। इससे रुपये को मिलने वाला शॉर्ट टर्म सपोर्ट कम हो गया है।

डॉलर की बढ़ती मांग ने बनाया दबाव

फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स LLP में ट्रेजरी हेड और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनिल कुमार भंसाली ने कहा कि कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से रुपये पर दबाव बना हुआ है। उन्होंने कहा कि डॉलर की मांग बढ़ने के मुख्य कारणों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के अलावा,रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका द्वारा टैरिफ लगाने को लेकर बनी नई चिंताएं,विदेशी पोर्टफोलियो से पैसे की निकासी,रक्षा भुगतान,सरकारी कर्ज की अदायगी और विदेशों में कंपनियों के अधिग्रहण भी शामिल हैं।

भंसाली ने आगे कहा कि करेंसी में डॉलर का इनफ्लो बहुत कम है,जबकि एक्सपोर्टर अपनी डॉलर की कमाई को रोककर रख रहे हैं और इंपोर्टर तत्काल पेमेंट के लिए डॉलर खरीद रहे हैं और रुपया मजबूत होने पर फ़ॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट बुक कर रहे हैं। इससे रुपए पर दबाव बना हुआ है। इसके अलावा भारत में महंगाई बढ़ने लगी है,जबकि अमेरिका में महंगाई कम हुई है। इससे रुपये को पहले जो वैल्यूएशन का फायदा मिल रहा था,वह अब खत्म हो गया है।

उधर बालासुब्रमण्यन ने कहा कि मार्केट की स्थिति ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि जब मार्केट को उम्मीद होती है कि रुपया कमजोर होगा तो एक्सपोर्टर कम हेजिंग करते हैं क्योंकि कमजोर करेंसी से उन्हें फायदा होता है। जबकि दूसरी तरफ इम्पोर्टर ज्यादा आक्रामक तरीके से हेजिंग करते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और एक ऐसा चक्र बन जाता है जो रुपये पर और दबाव डालता है।

आगे का आउटलुक

जानकारों का मानना ​​है कि नियर टर्म दबाव के बावजूद आने वाले महीनों में FCNR(B) के तहत आने वाले फंड में बढ़ोतरी से रुपये को सहारा मिलेगा। बालासुब्रमण्यन को उम्मीद है कि ज्यादातर फंड अगस्त और सितंबर के दौरान आएगा,जिससे भारत को सितंबर तिमाही में बैलेंस ऑफ़ पेमेंट्स में सरप्लस हासिल करने में मदद मिलेगी।

नियोगी ने कहा कि अगर जियोपॉलिटिकल तनाव कम होते हैं तो FCNR(B) और दूसरे कैपिटल फ्लो की वजह से रुपये में मजबूती आ सकती है और यह साल के बाकी समय में औसतन 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर से नीचे आ सकता है।

द वेल्थ कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर और मार्केट स्ट्रैटेजी हेड,अक्षय चिंचालकर ने कहा कि रुपये के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.96 से सुधरकर 94.14 पर आने से बाजार की घबराहट तो कम हुई है,लेकिन इससे मेन ट्रेंड में कोई बदलाव नहीं आया है। डेली,वीकली और मंथली चार्ट पर टेक्निकल सेटअप मजबूती से डॉलर के पक्ष में बना हुआ है और एक साल तक एक ही दायरे में रहने के बाद डॉलर इंडेक्स का ऊपर की ओर बढ़ना (अपसाइड ब्रेकआउट) एक बहुत बड़ा सपोर्ट साबित हो रहा है।

चिंचालकर के मुताबिक डॉलर के मुकाबले रुपया 97 के आस-पास अपने पिछले रिकॉर्ड निचले स्तर को फिर से छू सकता है। गिरावट का यह ट्रेंड तभी खत्म होगा जब रुपया 94.96 के स्तर से ऊपर मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि अगर रुपया 97 के आसपास कोई सपोर्ट नहीं बना पाता है तो इसका अगला टारगेट 98 के आसपास हो सकता है। अगर रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से नीचे गिरता है तो यह 98.70 के स्तर तक जा सकता है।

 

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ट्रम्प का चुनावों पर राष्ट्र के नाम संबोधन शुरू:दावा- विदेशी दखल पर खुलासा करेंगे, ईरान-इकोनॉमी पर भी बोल सकते हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव सुरक्षा पर राष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं। व्हाइट हाउस के अनुसार, उनके भाषण का मुख्य फोकस अमेरिकी चुनावों में विदेशी दखल की कोशिशों पर है। ट्रम्प ईरान और अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी सरकार का पक्ष रख सकते हैं। व्हाइट हाउस प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने दावा किया है कि ट्रम्प अपने संबोधन में ऐसे दस्तावेज और निष्कर्ष पेश करेंगे, जो “लोगों को चौंका देंगे।” ट्रम्प प्रशासन चीन और अमेरिकी चुनावों से जुड़े कुछ दस्तावेज सार्वजनिक करने पर भी विचार कर रहा है। ट्रम्प लंबे समय से 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में धांधली और विदेशी दखल के आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों, राज्यों की ऑडिट रिपोर्ट और अदालतों को अब तक वोटिंग या मतगणना में किसी विदेशी छेड़छाड़ का सबूत नहीं मिला है। ऐसे में माना जा रहा है कि ट्रम्प अपने संबोधन में एक बार फिर इन मुद्दों को प्रमुखता से उठा सकते हैं। ट्रम्प के इस संबोधन पर इसलिए भी नजर रहेगी क्योंकि हाल के दिनों में उन्होंने चुनावी सुरक्षा, ईरान और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लगातार आक्रामक रुख अपनाया है। विदेशी दखल की कोशिश, वोटों में छेड़छाड़ का सबूत नहीं न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस, ईरान समेत कई देशों ने सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार, साइबर हमलों और हैक-लीक अभियानों के जरिए अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की। हालांकि, किसी भी जांच में यह साबित नहीं हुआ कि इन कोशिशों से वोटिंग, मतगणना या चुनावी नतीजों में कोई छेड़छाड़ हुई। अमेरिकी अधिकारियों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी नेटवर्क लंबे समय से सोशल मीडिया के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन इन अभियानों का मतदाताओं के फैसलों पर कितना असर पड़ा, इसका कोई ठोस आकलन अब तक सामने नहीं आया है। ट्रम्प के संबोधन से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए….

ड्रोन हमलों से रूस को पछाड़ने वाले रक्षामंत्री हटाए गए:जेलेंस्की के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतरे, इसी महीने प्रधानमंत्री को भी हटाया था

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रक्षा मंत्री मिखाइलो फेदोरोव को नियुक्ति के सिर्फ छह महीने बाद पद से हटा दिया। इस फैसले के बाद गुरुवार को युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। राजधानी कीव में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। इसके अलावा ओडेसा, ल्वीव और रूस के हमलों का लगातार सामना कर रहे खारकीव शहर में भी लोगों ने प्रदर्शन किया। खारकीव में 300 से ज्यादा लोग हाथों में तख्तियां लेकर सड़कों पर उतरे और “शर्म करो, शर्म करो” के नारे लगाए। 35 साल के फेडोरोव यूक्रेन के ड्रोन युद्ध कार्यक्रम का सबसे बड़ा चेहरा माने जाते थे। उन्हें यूक्रेन में ड्रोन और रोबोट की मदद से युद्ध लड़ने की रणनीति का प्रमुख समर्थक माना जाता था। उनके हटने से अब यह सवाल उठने लगे हैं कि रूस जैसी बड़ी सेना का मुकाबला करने के लिए यूक्रेन की नई तकनीक और ड्रोन पर आधारित रणनीति आगे भी पहले की तरह जारी रहेगी या नहीं। फेडोरोव को हटाया जाना जेलेंस्की सरकार में बड़े बदलाव का हिस्सा है। इसी फेरबदल में प्रधानमंत्री को भी हटाया गया है। पहले डिजिटल मंत्री थे, फिर बने रक्षा मंत्री रक्षा मंत्री बनने से पहले फेडोरोव यूक्रेन के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन (ई-गवर्नेंस) मंत्री थे। वे कई वर्षों तक जेलेंस्की के सबसे भरोसेमंद तकनीकी सलाहकार भी रहे। जनवरी में रक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने सेना में नई तकनीक, ड्रोन और रोबोट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया। उसी दौरान यूक्रेन के कई पुराने ड्रोन प्रोजेक्ट सफल होने लगे। यूक्रेन ने रूस के अंदर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक लगातार ड्रोन हमले किए और कब्जे वाले क्रीमिया को निशाना बनाकर वहां रूसी सेना की आपूर्ति और ठिकानों पर हमले किए। इन सफलताओं से यूक्रेन में लोगों का भरोसा बढ़ा कि नई तकनीक के जरिए रूस का मुकाबला किया जा सकता है। शुरुआत से ही सेना के जनरलों से मतभेद रहे कई रिपोर्ट्स के अनुसार, रक्षा मंत्री फेदोरोव को हटाने के पीछे भ्रष्टाचार या नाकामी नहीं, बल्कि सेना के शीर्ष जनरलों और कमांडर-इन-चीफ ओलेक्सांद्र सिरस्की के साथ उनका गहरा मतभेद था। जनवरी में रक्षा मंत्री बनने के तुरंत बाद से ही फेडोरोव की उनसे बहस होने लगी थी। फेडोरोव का मानना था कि भविष्य का युद्ध ड्रोन, रोबोट और नई तकनीक से लड़ा जाएगा। लेकिन सिरस्की का कहना था कि यह सोच पूरी तरह व्यावहारिक नहीं है। उनका मानना था कि युद्ध जीतने के लिए अब भी सैनिकों को मोर्चे पर जाकर लड़ना पड़ेगा। केवल ड्रोन से युद्ध नहीं जीता जा सकता। दोनों के बीच आपसी बातचीत भी बंद हो गई थी। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कमान के इस टकराव को सुलझाने के लिए सेना के जनरलों का पक्ष लिया और फेदोरोव को हटाने का फैसला किया।