Stock Split: एक साल में 190% और 5 साल में 1000% चढ़ी कीमत, अब 10 टुकड़ों में टूटेगा शेयर

चांदनी मशीन्स लिमिटेड का स्टॉक, स्प्लिट होने वाला है। कंपनी का 10 रुपये फेस वैल्यू वाला शेयर, 1 रुपये फेस वैल्यू वाले 10 शेयरों में टूट जाएगा। रिकॉर्ड डेट 29 अक्टूबर 2026 है। इस तारीख तक जिन लोगों के नाम शेयरों के लाभार्थी मालिकों के तौर पर रजिस्टर ऑफ मेंबर्स ऑफ द कंपनी या डिपॉजिटरीज के रिकॉर्ड्स में दर्ज होंगे, उनके शेयर स्प्लिट हो जाएंगे। कंपनी ने इस कॉरपोरेट एक्शन को सितंबर महीने में मंजूरी दी थी।

चांदनी मशीन्स में सितंबर 2026 के आखिर तक प्रमोटर्स के पास 20.97 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। स्टॉक स्प्लिट में एक कंपनी अपने मौजूदा शेयरों को छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है। इससे निवेशकों के पास शेयरों की संख्या बढ़ जाती है लेकिन उसी अनुपात में प्रति शेयर कीमत घट जाती है। निवेशकों के निवेश की कुल वैल्यू नहीं बदलती।

इस कदम का मकसद शेयरों को किफायती बनाना होता है। बहुत ज्यादा कीमत वाले शेयर छोटे निवेशकों की पहुंच से बाहर हो जाते हैं। स्प्लिट के बाद शेयर सस्ते हो जाते हैं, जिससे अधिक नए निवेशक जुड़ने की संभावना रहती है।

Chandni Machines का शेयर एक साल में 190 प्रतिशत मजबूत

कंपनी के शेयर की कीमत वर्तमान में BSE पर 102.13 रुपये है। मार्केट कैप 71 करोड़ रुपये से ज्यादा है। शेयर साल 2026 में अब तक 40 प्रतिशत चढ़ा है। एक साल में कीमत लगभग 190 प्रतिशत मजबूत हुई है। 3 साल में शेयर लगभग 340 प्रतिशत और 5 साल में 1000 प्रतिशत से ज्यादा बढ़त देख चुका है। शेयर का BSE पर 52 सप्ताह का एडजस्टेड हाई 127.74 रुपये और एडजस्टेड लो 34 रुपये है।

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कंपनी की वित्तीय सेहत

चांदनी मशीन्स का अप्रैल-जून 2026 तिमाही में स्टैंडअलोन बेसिस पर रेवेन्यू सालाना आधार पर लगभग 72 प्रतिशत गिरकर 44.50 लाख रुपये रहा। एक साल पहले यह 25.89 करोड़ रुपये था। जून 2026 तिमाही में कंपनी ने 1.98 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा दर्ज किया। एक साल पहले समान तिमाही में कंपनी 74.68 लाख रुपये के मुनाफे में थी। खर्च 3.74 करोड़ रुपये के रहे, जो जून 2025 तिमाही में 26 करोड़ रुपये के थे।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Neogen Chemicals Share Price: एनालिस्ट की पसंद बना ये केमिकल स्टॉक, दे सकता है 24% का रिटर्न

Neogen Chemicals Share Price: पिछले 6 महीनों में अच्छे रिटर्न के बाद घरेलू ब्रोकरेज फर्म ‘एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग’ ने Neogen Chemicals पर कवरेज शुरू किया है। उन्होंने इसे ‘Buy’ की रेटिंग दी है और ₹3,050 का टारगेट प्राइस तय किया है। इसका मतलब है कि ₹2,482 के मौजूदा मार्केट प्राइस से इसमें लगभग 23% की तेजी आ सकती है।

ब्रोकरेज का मानना ​​है कि स्पेशलिटी केमिकल्स बनाने वाली यह कंपनी अब कमाई में तेज बढ़ोतरी के दौर में प्रवेश करने वाली है। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि कंपनी का बैटरी केमिकल्स का कारोबार बढ़ रहा है, जिसे घरेलू बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, ग्राहकों की मंजूरी और चीन के बाहर की सप्लाई चेन में मिल रहे मौकों का समर्थन मिल रहा है।

एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग ने कहा Neogen Chemicals के पास एक मजबूत स्पेशलिटी केमिकल्स कारोबार है और साथ ही बैटरी के क्षेत्र में भी बड़े मौके हैं। चूंकि प्लांट काफी हद तक तैयार हो चुके हैं और ग्राहकों द्वारा मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है, इसलिए मुख्य रुकावटें अब पीछे छूट गई हैं। अब कमाई में तेजी आना बाकी है, जो विकास और री-रेटिंग का एक बेहतरीन मौका बनाता है।”

ब्रोकरेज को उम्मीद है कि FY26 से FY30 के बीच Neogen का रेवेन्यू, EBITDA और टैक्स के बाद का एडजस्टेड प्रॉफिट (PAT) क्रमशः 45%, 49% और 87% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा। हालांकि, इस निवेश की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई सुविधाएं समय पर शुरू होती हैं या नहीं, ग्राहक कितना माल खरीदते हैं, और कंपनी अपने बढ़े हुए कर्ज को कैसे संभालती है।

ब्रोकरेज स्टॉक पर बुलिश क्यों

आने वाले वर्षों में बैटरी केमिकल्स, नियोजेन के विकास का सबसे बड़ा जरिया बनने की उम्मीद है। इसकी सब्सिडियरी कंपनी, ‘नियोजेन आयोनिक्स’, बैटरी इलेक्ट्रोलाइट और लिथियम हेक्साफ्लोरोफॉस्फेट (LiPF6) बनाती है। LiPF6 एक महत्वपूर्ण सॉल्ट है जिसका इस्तेमाल लिथियम-आयन बैटरी में किया जाता है। कंपनी इसके लिए ‘MU आयोनिक सॉल्यूशंस’ की जापानी मैन्युफैक्चरिंग तकनीक का इस्तेमाल करती है और जापान की ‘मोरिता’ के साथ एक जॉइंट वेंचर के जरिए अपना सॉल्ट कारोबार चलाती है।

एंटीक का अनुमान है कि नियोजेन के कुल रेवेन्यू में बैटरी केमिकल्स का हिस्सा FY26 के 4% से बढ़कर FY30 तक 62% हो जाएगा। FY26 तक यह सेगमेंट घाटे में था, क्योंकि उस दौरान इलेक्ट्रोलाइट और सॉल्ट बनाने की सुविधाएं तैयार हो रही थीं और ग्राहकों से मंजूरी लेने की प्रक्रिया चल रही थी। ब्रोकरेज को उम्मीद है कि FY27 तक यह कारोबार EBITDA के स्तर पर ‘ब्रेक-ईवन’ (यानी बिना नुकसान या मुनाफे की स्थिति) तक पहुंच जाएगा। एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग का कहना है कि, “कमीशनिंग में देरी के कारण काम की गति (रैंप-अप) कुछ आगे खिसक गई है, लेकिन इससे मध्यम अवधि की कमाई के अनुमानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि FY30E (वित्त वर्ष 2030) के हमारे अनुमान जिन क्षमताओं और ग्राहकों की मंजूरी पर आधारित हैं, वे पहले से ही मौजूद हैं।”

ब्रोकरेज का मानना ​​है कि ग्राहकों द्वारा दी जाने वाली योग्यता(क्वालिफिकेशन) कंपनी को एक प्रतिस्पर्धी बढ़त दिला सकती है। इस तरह की मंजूरी मिलने में 12-24 महीने लग सकते हैं, और एक बार किसी उत्पाद को मंजूरी मिल जाने के बाद, बैटरी निर्माता आमतौर पर अपने सप्लायर को बदलना नहीं चाहते। नियोजेन ने अमेरिका के तीन इलेक्ट्रोलाइट निर्माताओं के साथ अपने प्लांट का अंतिम ऑडिट पूरा कर लिया है। इससे कंपनी उन अमेरिकी टैक्स-क्रेडिट नियमों से जुड़ी मांग को पूरा करने की स्थिति में आ गई है, जो 2027 से कुछ चीनी सप्लायरों से सामान लेने पर रोक लगाते हैं।

भारत में बैटरी निर्माण क्षमता बढ़ने के साथ, घरेलू स्तर पर भी अवसर बढ़ सकते हैं। नियोजेन की दहेज और पाखाजन इकाइयां स्थानीय सेल निर्माताओं को सेवा देने के लिए तैयार हैं, जबकि इसकी लिथियम सॉल्ट क्षमता निर्यात के अतिरिक्त अवसर प्रदान करती है। बैटरी रसायनों के अलावा, कंपनी का स्पेशलिटी केमिकल्स का स्थापित कारोबार कमाई का एक स्थिर आधार देता है। इसे कॉन्ट्रैक्ट सिंथेसिस एंड मैन्युफैक्चरिंग (CSM), एडवांस्ड इंटरमीडिएट्स और दहेज प्लांट में आग लगने की घटना के बाद उत्पादन में हुए सुधार से भी मजबूती मिलती है।

स्टॉक का परफॉर्मेंस

इस केमिकल स्टॉक में पिछले 3 महीनों में 14%, 6 महीनों में 64% और पिछले 1 साल में 70% की तेजी आई है। हालांकि, हाल के समय में इसमें 1 हफ्ते में 2% और पिछले 1 महीने में 0.3% की गिरावट देखी गई है। अक्टूबर 2026 में यह स्टॉक अपने 52-हफ्तों के उच्चतम स्तर ₹2785 पर पहुंच गया था, जबकि दिसंबर 2025 में यह अपने 52-हफ्तों के निचले स्तर ₹978 पर था।

 

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Daily Voice : अमेरिकी मध्यावधि चुनाव बाजार के लिए कर सकते हैं ट्रिगर का काम, चुनिंदा आईटी शेयरों पर रहे नजर

Daily Voice : IT शेयरों में हालिया तेजी भले ही अभी किसी टिकाऊ रिकवरी का संकेत न हो,लेकिन हर उछाल पर आईटी शेयरों में बिकवाली की एकतरफा रणनीति अपनाना भी जल्दबाजी हो सकती है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजे बाजारों के लिए एक ट्रिगर का काम कर सकते हैं,लेकिन इस बात की संभावना कम है कि केवल इसी वजह से बाजार में कोई बड़ी तेजी या कच्चे तेल में भारी गिरावट आएगी। ये बातें अल्फएक्यूरेट एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक और संस्थापक राजेश कोठारी ने मनीकंट्रोल से हुई एक बातचीत में कही हैं।

उन्होंने आगे कहा कि आईटी शेयरों में आई हालिया तेजी पॉजिटिव संकेत है लेकिन निवेशकों को अभी यह नहीं मान लेना चाहिए कि इस सेक्टर में टिकाऊ तेजी की शुरुआत हो गई है। पोर्टफोलियो में कोई बदलाव करने से पहले तेल सप्लाई की स्थिति,डॉलर,बॉन्ड यील्ड और कॉर्पोरेट अर्निंग पर नजर रखने की जरूरत है।

आईटी में तीन बातों पर नजर रखने की जरूरत

राजेश कोठारी के मुताबिक IT शेयरों में हालिया तेजी उत्साहजनक है,लेकिन इसे एक टिकाऊ तेजी मान लेने में सावधानी बरतने की जरूरत है। बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तेजी इंडस्ट्री की अर्निंग आउटलुक से मेल खाती है या यह सिर्फ ‘ओवरसोल्ड’लेवल्स से आई खरीदारी है? हमें आईटी में तीन बातों पर नजर रखने की जरूरत है:

मांग की स्थिति: विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप में टाले जा सकने वाला टेक्नोलॉजी खर्च (discretionary technology spending)अहम बना हुआ है। बेहतर सौदे हासिल करने का नतीजा रेवेन्यू ग्रोथ के रूप में दिखना चाहिए।

AI से बदलाव और अवसर: AI कमाई के नए स्रोत पैदा कर सकता है, लेकिन यह पारंपरिक बिलिंग मॉडल को भी बदल सकता है और कीमतों पर दबाव डाल सकता है।

वैल्यूएशन और अर्निंग आउटलुक: भारी तेजी के बाद, जिन शेयरों की कीमत उनकी कमाई की संभावनाओं से आगे निकल गई है, उनमें मुनाफावसूली (प्रॉफिट-टेकिंग) देखने को मिल सकती है।

राजेश कोठारी का मानना ​​है कि आईटी सेक्टर में तेजी आने पर हर शेयर बेच देने की रणनीति जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन इस तेजी के पीछे भागना भी कोई समझदारी नहीं है। आईटी में उन कंपनियों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए जिनकी ग्रोथ की संभावनाएं बेहतर हो रही हैं, जिनके ग्राहकों के साथ मजबूत संबंध हैं और जिनके पास AI से कमाई करने के ठोस मौके हैं। ऐसी कंपनियों से दूर रहने की जरूरत है जो अभी भी कमजोर मांग से जूझ रही हैं।

क्या आप कंजम्पशन सेक्टर को लेकर सतर्क हैं? कंजम्पशन डिमांड और इससे जुड़े शेयरों पर आपकी क्या राय है?

राजेश कोठारी ने कहा कि कंजम्पशन सेक्टर को लेकर पूरी तरह सतर्क रहने के बजाय,चुनिंदा रुख अपनाना पसंद करेंगे। जरूरी चीजों पर होने वाले खर्च और गैर-जरूरी (वैकल्पिक) चीजों पर होने वाले खर्च के बीच का अंतर समझना जरूरी है। कई ‘फास्ट फ्रीक्वेंसी’ डेटा इंडिकेटर कंजम्पशन ट्रेंड में सुधार दिखा रहे हैं (जैसे रिटेल क्रेडिट ग्रोथ, टू-व्हीलर की बिक्री में बढ़ोतरी, आदि)।

इस सेक्टर में ऐसी कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जिनके पास मजबूत ब्रांड, अच्छा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, कीमतों को तय करने की ताकत, अच्छी बैलेंस शीट और सही वैल्यूएशन हों। वैकल्पिक उपभोग (discretionary consumption) के सेक्टर में केवल कीमतों में बढ़ोतरी पर निर्भर रहने के बजाय, बिक्री की मात्रा (volume) में बढ़त के संकेतों पर भी नजर रखने की जरूरत है।

क्या आप आने वाले समय में ‘अल नीनो’ (El Niño) को बड़ा जोखिम मानते हैं? इसका महंगाई, ग्रामीण मांग और भारत के विकास पर क्या असर पड़ सकता है?

इसके जवाब उन्होंने कहा कि ‘अल नीनो’ एक जोखिम तो है,लेकिन इसे देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि भारत के विकास का पूरा आउटलुक ही खराब हो जाएगा। कोई निष्कर्ष निकालने से पहले फसल उत्पादन, जलाशयों के जल-स्तर, खाने-पीने की चीजों की कीमतों के रुझान और ग्रामीण मांग के इंडीकेटरों पर नजर रखने की जरूरत है।

Q2FY27 में बैंकों के नतीजे कैसे रह सकते है? क्या इनके मौजूदा वैल्यूएशन अच्छे लग रहे है या इन स्तरों से आगे बढ़ने की गुंजाइश सीमित है?

इसके जवाब में राजेश कोठारी ने कहा कि बैंक शेयरों का प्रदर्शन उत्साहजनक है। ज़्यादातर बैंकों ने लोन वितरण (डिस्बर्समेंट) में अच्छी बढ़ोतरी और मज़बूत एसेट क्वालिटी की जानकारी दी है। अच्छे बैंकों में मध्यम अवधि के नजरिए निवेश के अच्छे मौके दिख रहे हैं लेकिन वैल्यूएशन के नजरिए से चुनिंदा शेयरों पर ही दांव लगाने की सलाह होगी।

ऐसे बैंकों पर फोकस करने की सलाह होगी जिनकी अर्निंग ग्रोथ को टिकाऊ कोर इनकम,अच्छी एसेट क्वालिटी और मजबूत फंडिंग फ्रेंचाइजी का सपोर्ट हासिल हो। अगले दो से तीन तिमाहियों में मार्जिन में सुधार की स्थिति कैसी रहती है, इस पर भी नजर रहनी चाहिए।

 

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

ड्रैगन फ्रूट की खेती से छप्परफाड़ कमाई! महाराष्ट्र के किसान ने अपनाया ऐसा तरीका, आज सालाना ₹2 करोड़ का कारोबार!

किसान अगर कुछ नया करने की ठान ले, तो खेती से भी करोड़ों रुपये कमाए जा सकते हैं। महाराष्ट्र के सोलापुर के रहने वाले महेश असाबे ने इसे सच कर दिखाया है। उनके परिवार ने कुछ साल पहले सिर्फ 3 एकड़ जमीन पर ड्रैगन फ्रूट उगाना शुरू किया था। आज उनका फार्म 60 एकड़ तक फैल चुका है और सालाना कारोबार करीब 2 करोड़ रुपये पहुंच गया है। खास बात यह है कि महेश ने खेती को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीक अपनाई और दूसरे देशों से भी सीख ली। उनकी यह कहानी उन किसानों के लिए खास है, जो खेती से अपनी आमदनी बढ़ाना चाहते हैं।

पिता ने शुरू की थी खेती

महेश असाबे महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के अकोला गांव के रहने वाले हैं। उनका परिवार पहले मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करता था। महेश ने एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग में बीटेक किया और इसके बाद एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग एंड फूड प्रोसेसिंग में एमटेक की पढ़ाई पूरी की।

साल 2013-14 में उनके पिता ने ड्रैगन फ्रूट की खेती करने का फैसला लिया। उन्होंने इस फल के बारे में पढ़ा था और जाना था कि इसकी खेती में अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है। सूखे इलाकों में भी इसकी खेती की जा सकती है। यही बात उन्हें इस फसल की ओर खींच लाई।

बांग्लादेश से मंगाए 9,000 पौधे

ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू करना परिवार के लिए एक नया प्रयोग था। इसके लिए उन्होंने बांग्लादेश से करीब 9,000 पौधे मंगवाए। Startup Pedia के मुताबिक, पौधों पर शुरुआती निवेश करीब ₹9.9 लाख था। परिवार ने तीन एकड़ जमीन पर खेती शुरू की। साल 2015-16 में पहली फसल तैयार हुई और प्रति एकड़ करीब पांच टन उत्पादन मिला। उपज बेचकर परिवार को लगभग ₹5 लाख की कमाई हुई।

धीरे-धीरे ड्रैगन फ्रूट की मांग और कीमत बढ़ने लगी। साल 2017 तक परिवार इसे ₹150 से ₹250 प्रति किलो के भाव पर बेचने लगा। इससे खेती को बड़े स्तर पर ले जाने का हौसला मिला।

इजरायल और वियतनाम से सीखी खेती की नई तकनीक

महेश ने खेती को सिर्फ पारंपरिक तरीके तक सीमित नहीं रखा। पढ़ाई के दौरान वह 45 दिनों के प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए इजरायल गए। वहां उन्होंने पानी का बेहतर इस्तेमाल, आधुनिक कृषि तकनीक और उत्पादन बढ़ाने के तरीके सीखे। साल 2018 में उन्होंने वियतनाम का दौरा भी किया, जहां ड्रैगन फ्रूट की खेती के तरीकों को समझा। लौटकर उन्होंने अपने खेत में एक-एक एकड़ के अलग-अलग प्रदर्शन प्लॉट तैयार किए, ताकि खेती की विभिन्न तकनीकों को आजमाया जा सके।

3 एकड़ से 60 एकड़ तक पहुंचा फार्म

आज महेश असाबे Rukmini Farms and Nursery का संचालन करते हैं। उनके फार्म में ड्रैगन फ्रूट के अलावा अनार, सीताफल और अमरूद भी उगाए जाते हैं।

खेती में पानी बचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन और तालाब जैसी सुविधाएं विकसित की गईं। निराई जैसे नियमित कामों में मशीनों का इस्तेमाल भी शुरू किया गया, जिससे खेती को संभालना आसान हुआ।

ड्रैगन फ्रूट से ₹1.25 करोड़ की सालाना कमाई

Startup Pedia के मुताबिक, महेश ड्रैगन फ्रूट की खेती से हर साल करीब ₹1.25 करोड़ कमाते हैं। उनके फार्म में सालाना लगभग 200 टन ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन होता है। दूसरे फलों से होने वाली कमाई को जोड़ दें, तो उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब ₹2 करोड़ पहुंच जाता है।

महेश की कहानी बताती है कि खेती में नई तकनीक अपनाना, बाजार की मांग समझना और लगातार सीखते रहना कितना महत्वपूर्ण है। तीन एकड़ से शुरू हुआ उनका सफर आज दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

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नीलकंठ मिश्रा ने भारतीय शेयर बाजारों में तेजी नहीं टिकने की बताई बड़ी वजह, सोमवार को भी FII ने की 1148 करोड़ रुपये की बिकवाली

विदेशी निवेशकों की बिकवाली रुकने का नाम नहीं ले रही है। फॉरेन इनवेस्टर्स ने 19 अक्तूबर यानी सोमवार को भी बिकवाली की। इससे पिछले हफ्ते की अच्छी तेजी के बाद हफ्ते के पहले दिन बाजार में बड़ी बिकवाली देखने को मिली। निफ्टी 1.11 फीसदी यानी 257 अंक गिरकर 22,888 पर बंद हुआ। सेंसेक्स 1.17 फीसदी यानी 876 अंक गिरकर 73,852 पर क्लोज हुआ। विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार को लेकर जब तक बदलेगा नहीं, तब तक बाजार में तेजी टिक नहीं पाएगी।

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल का बड़ा असर 

वर्ल्ड बैंक में एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर-इंडिया नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि अमेरिका में बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड की वजह से भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी घट रही है। निवेश के जटिल नियमों का असर भी फॉरेन इनवेस्टर्स के इनवेस्टमेंट पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सिर्फ टैक्स घटाने से काम नहीं चलेगा। इनवेस्टमेंट प्रोसेस को आसान बनाना होगा, नियमों को पारदर्शी बनाना होगा और फैसले लेने की प्रक्रिया तेज करनी होगी। उन्होंने कहा कि रुपये पर जितना दिख रहा है, उससे ज्यादा दबाव है।

अमेरिका और भारतीय बाजार में रिटर्न के बीच का फर्क घटा

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर फॉरेन इनवेस्टर्स को भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट में निवेश में फायदा नहीं दिखता है। अमेरिका और भारत में रिटर्न के बीच का फर्क घट गया है, जिससे निवेश के लिहाज से भारत का अट्रैक्शन कम हुआ है। हाल में 10 साल के बॉन्ड की यील्ड अमेरिका में कई दशकों के सबसे हाई लेवल पर पहुंच गई। न सिर्फ अमेरिका बल्कि यूरोपीय देशों में भी बॉन्ड यील्ड बढ़ी है। यील्ड में उछाल से अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश में दिलचस्पी बढ़ी है।

भारतीय बाजार में घट रही विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी

मिश्रा ने एक उदाहरण की मदद से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका में बॉन्ड यील्ड 2 फीसदी और भारत में 8 फीसदी है, तो भारत में निवेश करने में फायदा है। लेकिन, अगर अमेरिका में यील्ड बढ़कर 5.3 फीसदी हो जाती है और भारत में 7.3 फीसदी रहती है भारत में निवेश में दिलचस्पी कम हो जाती है। इसका मतलब है कि फॉरेन इनवेस्टर्स को भारत में निवेश करने में फायदा नहीं दिखता। ऐसी स्थिति में वे भारत की जगह अमेरिका में इनवेस्ट करना पसंद करेंगे।

FIIs ने सोमवार को शुद्ध रूप से की 1,148 करोड़ की बिकवाली

स्टॉक एक्सचेंजों के प्रोविजनल डेटा के मुताबिक, फॉरेन इनवेस्टर्स ने 19 अक्तूबर को भारतीय बाजार में शुद्ध रूप से 1,148 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। उन्होंने 11,240.64 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। लेकिन, 12,389.28 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने शुद्ध रूप से 3,201.19 करोड़ रुपये की खरीदारी की। फॉरेन इनवेस्टर्स की बिकवाली के बीच DII ने लगातार खरीदारी कर भारतीय शेयर बाजार को सहारा दिया है।

अब औपचारिकता भी नहीं?

इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में सचमुच ऐसी राय बनी गई है! 

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की ताजा भारत यात्रा के सिलसिले में यह उचित सवाल उठा है कि क्या अमेरिका अब भारत के साथ अपने संबंध में कूटनीतिक मर्यादा का पालन करने की जरूरत भी नहीं समझ रहा है। अरबपति अमेरिकी कारोबारी इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर ऐसी ही राय डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में बनी है। इसलिए रुबियो भारतीय कारोबारियों- खासकर रिलायंस ग्रुप के साथ व्यापारिक वार्ता के लिए सीधे मुंबई और जामनगर पहुंच रहे हैं।

इस यात्रा का कार्यक्रम बनने के बाद भारत स्थित अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने “उम्मीद” जताई कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर रुबियो से मिलने जाएंगे। बाद में खबर आई कि जयशंकर सचमुच मुंबई जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम है। यह दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन भारत जैसे ‘रणनीतिक सहयोगियों’ को जूनियर पार्टनर के रूप में देखता है और इस पर नरेंद्र मोदी सरकार को कोई एतराज नहीं है! रुबियो की यात्रा का मकसद अमेरिका में रिलायंस ग्रुप के रिफाइनरी लगाने की योजना को आगे बढ़ाना है। ट्रंप प्रशासन दुनिया भर से पूंजी और उत्पादक विशेषज्ञता को जुटाने के प्रयास में लगा है, ताकि अमेरिका में औद्योगिक ढांचा फिर से खड़ा हो सके।

इस क्रम में भारतीय पूंजीपतियों पर उसकी खास निगाह है, जो सहज ही इस योजना में भागीदार बनने को उतावले दिखे हैं। अंबानी, रुइया, अडानी जैसे भारतीय समूह अमेरिका में बड़े निवेश का इरादा दिखा चुके हैं। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए यह नई चुनौती है, जिसे खुद अभी अपने विकास के लिए बड़े पूंजी निवेश एवं कारोबारी महारत की जरूरत है। हैरतअंगेज है कि पूंजी निवेश की पलट गई इस दिशा पर ना तो भारत में कोई बहस है, और ना ही देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिहाज से इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। जबकि इस दौर में अमेरिका सहित तमाम देश पूंजी प्रवाह को निर्देशित कर रहे हैं। बहरहाल, सबसे दुखद यह संदेश है कि अमेरिका भारत सरकार की संप्रभु प्रतिष्ठा का भी अब ख्याल नहीं रख रहा है।

गले मिलने का दिखावा और जबकि असल ताकत?

trump and musk

भारत जैसी विश्व व्यवस्था चाहता है, वैसी खुद क्यों नहीं बनाता?…. किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की बैठकों में भारत की वैश्विक हैसियत पर अक्सर ऐसे चर्चा होती है, मानो दुनिया की सबसे बड़ी मेज पर उसके लिए कुर्सी रखी जानी बाकी हो। पश्चिम को भारत का महत्व स्वीकार करना चाहिए। उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। ऐसी शर्तें नहीं थोपनी चाहिए जिनसे एक अनिवार्य साझेदार नाराज हो जाए। मान लिया गया है कि दुनिया की बड़ी शक्तियों में भारत का शामिल होना तय है। बस यह फैसला होना बाकी है कि उसे कहाँ बैठाया जाएगा।

इस सोच में दम है। भारत का विशाल बाजार, उसकी भौगोलिक स्थिति, तकनीकी प्रतिभा और सैन्य शक्ति उसे अंतरराष्ट्रीय सौदेबाजी में पर्याप्त ताकत देते हैं। क्वाड के जरिए सहयोग, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश और रक्षा उत्पादन में साझेदारी ऐसे साझा हित हैं जिन्हें कोई गंभीर सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। पश्चिम के दोहरे मानदंडों पर भारत की आपत्तियाँ भी बेबुनियाद नहीं हैं। जो देश अपनी सुविधा के अनुसार कभी संप्रभुता का सम्मान करते हैं और कभी उसकी अनदेखी, उन्हें दूसरों को सिद्धांतों पर कायम रहने का उपदेश देने का कितना अधिकार है?

लेकिन किसी देश का अनिवार्य होना उसे दबाव से सुरक्षित नहीं बना देता। उसकी उपयोगिता सौदेबाजी में ताकत जरूर देती है, मगर यह गारंटी नहीं कि उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा। कोई देश आपकी जरूरतों के कारण आपको गले भी लगा सकता है और आपकी कमजोरियों का फायदा उठाकर दबाव भी बना सकता है। निमंत्रण और शिकंजा, दोनों साथ आ सकते हैं।

यहीं भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की चमकदार कहानी भ्रामक हो जाती है। किसी ताकतवर देश के लिए उपयोगी होना और उस उपयोगिता की शर्तें स्वयं तय करने की ताकत रखना, दो अलग बातें हैं।

इस फर्क को समझने के लिए भारतीय रणनीतिकारों को विदेशों की ओर देखने की जरूरत नहीं है। अपने ही देश की कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था में इसका उदाहरण मौजूद है।

मुंबई हवाई अड्डे का नियंत्रण जीवीके समूह से अदाणी समूह के हाथों में जाने की घटना को देखें। जीवीके के पास एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति थी। हवाई अड्डे के संचालन का अनुभव था। बड़े निवेशकों से संबंध थे। इसके बावजूद कर्ज, वित्तीय कठिनाइयों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाइयों का सिलसिला उसके हवाई अड्डा कारोबार के आसपास बना। अंततः अदाणी समूह ने उसका नियंत्रण हासिल कर लिया।

बाद में जीवीके के उपाध्यक्ष ने इस बात से इनकार किया कि किसी दबाव के कारण हवाई अड्डा बेचना पड़ा। उनका यह खंडन भी घटनाक्रम का हिस्सा है। लेकिन उन परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनके कारण यह सौदा राजनीतिक विवाद का विषय बना। यहाँ मुद्दा सौदे को लेकर किसी एक विवादित दावे को सही या गलत ठहराना नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि किसी संपत्ति का मालिक होना कितना मायने रखता है, यदि उसे बनाए रखने के लिए जरूरी पूँजी, पहुँच या अनुमति किसी दूसरे के नियंत्रण में हो?

कंपनी की बैलेंस शीट पर अरबों की संपत्ति दिखाई दे सकती है, जबकि उसके पीछे छिपी निर्भरता नजर नहीं आती। कोई स्थापित कारोबारी तब तक सुरक्षित दिखाई देता है जब तक उसकी सुरक्षा की शर्तें नहीं बदलतीं।

संप्रभु देशों के सामने भी यही समस्या होती है। फर्क इतना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके परिणाम कहीं अधिक खतरनाक हो सकते हैं। अमेरिका अपने बाजार, तकनीक, वित्तीय व्यवस्था और सुरक्षा संबंधों तक पहुँच के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बना सकता है। जरूरी नहीं कि उसका नियंत्रण हर क्षेत्र में हो। दबाव प्रभावी बनाने के लिए इतना पर्याप्त है कि वह ऐसी किसी चीज तक पहुँच रोक सके जिसका विकल्प सामने वाला देश आसानी से नहीं खोज सकता।

भारत के पास भी सौदेबाजी के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। मगर असली सवाल यह है कि भारत अपनी किसी महत्वपूर्ण जरूरत की आपूर्ति रुकने पर कितने समय तक टिक सकता है? और दूसरी तरफ, अमेरिका या कोई दूसरा साझेदार भारत से मिलने वाले लाभ के बिना कितने समय तक रह सकता है?

रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इसी असमान सहनशक्ति में होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी गणितीय समीकरण के अनुसार चलते हैं। सरकारें गलत आकलन करती हैं। गठबंधन बदलते हैं। घरेलू विरोध के कारण नेताओं की समझौता करने की क्षमता सीमित होती है। आर्थिक और सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, जनमत और संस्थाओं के प्रति भरोसा भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

बड़ी शक्तियाँ अक्सर दूसरों से सहयोग के बदले उनके व्यवहार में बदलाव की माँग करती हैं। शर्तें लगाती हैं, जबकि अपने ऊपर वैसी ही निगरानी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करतीं। उनका पाखंड उन शर्तों को समाप्त नहीं करता। उलटे, निर्भर देश के लिए उनकी कीमत और बढ़ा देता है। इसलिए भारत के सामने दो परस्पर जुड़े काम हैं। पहला, ऐसी क्षमता विकसित करना जिससे वह बाहरी दबाव का सामना कर सके। दूसरा, ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करना जिससे दूसरे देश भी उसके साथ खड़े होने को तैयार हों।

इन दोनों का सीधा संबंध भारत की घरेलू शासन व्यवस्था से है। स्वतंत्र नियामक संस्थाएँ हों तो निवेश के लिए राजनीतिक पहुँच पर निर्भरता कम होती है। विश्वसनीय न्यायपालिका हो तो सत्ता के कृपापात्र समूहों से बाहर रहकर कारोबार खड़ा करने का जोखिम घटता है। खुली प्रतिस्पर्धा हो तो देश की उत्पादन क्षमता का आधार व्यापक बनता है। विश्वविद्यालयों में असहमति और स्वतंत्र विचार की गुंजाइश हो तो वह बौद्धिक स्वतंत्रता विकसित होती है जिसके बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता संभव नहीं।

यही संस्थाएँ किसी शक्तिशाली साझेदार के शर्तें लगाने पर देश को अधिक विकल्प देती हैं। इनके कमजोर होने पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा कुछ कंपनियों, कुछ फैसलों और कुछ व्यक्तियों पर निर्भर होती चली जाती है। मगर नई दिल्ली में भारत की ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन अक्सर व्यक्तिगत कूटनीति के इर्दगिर्द घूमता दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री का विदेशी नेताओं से गले मिलना इसकी सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है। सामने खड़े नेता से आत्मीयता दिखाई जाती है और उस दृश्य को भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में प्रसारित किया जाता है। गले मिलना आत्मीयता का संकेत हो सकता है। लेकिन उससे वह सब साबित नहीं होता जो तस्वीर देखकर नागरिकों को समझाया जाता है।

किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। भारत किस बात से इनकार कर सकता है? क्या हासिल कर सकता है? और मतभेद होने पर संबंध कितना दबाव सह सकता है?

व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

भारत की विदेश नीति के प्रचार और वास्तविक आचरण के बीच यह अंतर केवल व्यक्तिगत कूटनीति तक सीमित नहीं है। एक अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की भारत की माँग में भी यही सवाल उठता है।

नई दिल्ली का विरोध सही है जब शक्तिशाली देश नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ते हैं, असहमति जताने वालों को दंडित करते हैं या विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं। लेकिन जब ऐसे ही सवाल भारत के भीतर उठते हैं तो उसकी दलील का नैतिक वजन कम होने लगता है। मतदाता सूचियों को लेकर विवाद, विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चुनिंदा इस्तेमाल के आरोप, निवारक हिरासत और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध जैसे सवाल लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़े हैं। इंटरनेट बंद करने की कार्रवाइयों का लोगों की आजीविका और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच पर पड़ने वाला नुकसान भी दस्तावेजों में दर्ज है।

इन सवालों का उत्तर संप्रभुता का हवाला देकर नहीं दिया जा सकता। संप्रभुता तो यह तय करती है कि इनके जवाब देने की जिम्मेदारी किसकी है। ऐसा नहीं कि दूसरे देशों की आलोचना करने से पहले भारत को हर मामले में आदर्श बनना होगा। भारतीय नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा लेने का अधिकार वाशिंगटन को नहीं है। लेकिन जो सरकार दुनिया से कहती है कि साझा शक्ति और न्यायपूर्ण व्यवस्था के उसके दृष्टिकोण पर भरोसा किया जाए, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि अपने देश में उसे सौंपी गई सत्ता का इस्तेमाल कैसे होता है, इसकी पड़ताल होगी।

यही कसौटी व्यापार नीति पर भी लागू होती है।

भारत के पास कमजोर आजीविकाओं की रक्षा करने और अपनी औद्योगिक क्षमता विकसित करने के उचित कारण हैं। इन उद्देश्यों के पक्ष में ठोस तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन इनके नाम पर हर व्यापारिक बाधा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, जबकि दूसरे देशों की ऐसी ही पाबंदियों को मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के विरुद्ध बताया जाए।

एक न्यायसंगत व्यापार नीति को स्पष्ट करना चाहिए कि संरक्षण किसे दिया जा रहा है, उससे कौन-सी नई क्षमता विकसित होगी और कब संरक्षण पाने वाले उद्योगों को खुली प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। वरना रणनीतिक स्वायत्तता एक भव्य नाम बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे राजनीतिक पहुँच रखने वाले कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा से बचाने की व्यवस्था चलती रहेगी।

दुनिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने का भारत का दावा मजबूत है। लेकिन उसकी वास्तविक उपलब्धि इस पर निर्भर करेगी कि देश की विशाल आबादी और संस्थाएँ मिलकर कितनी व्यापक उत्पादन क्षमता, प्रतिभा और स्वतंत्र शक्ति विकसित करती हैं।

जिस देश में कारोबारी स्थापित कंपनियों को चुनौती दे सकते हों, नागरिक अधिकारियों से सवाल कर सकते हों और संस्थाएँ सत्ता की नाराजगी सह सकती हों, उसके पास कहीं अधिक ताकत होती है। उसकी तुलना में वह देश कमजोर स्थिति में होगा जहाँ अवसर और सफलता का रास्ता सत्ता तक विशेष पहुँच से होकर गुजरता हो।

ऐसी घरेलू शक्ति विकसित हो जाने से अमेरिका का दबाव, चीन की चुनौती या पश्चिम के दोहरे मानदंड समाप्त नहीं हो जाएँगे। लेकिन भारत के पास उनका सामना करने के अधिक विकल्प होंगे। साथ ही एक अलग विश्व व्यवस्था की उसकी माँग उन देशों को भी अधिक विश्वसनीय लगेगी जो स्वयं अपनी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाना चाहते हैं।

भारत यह तय नहीं कर सकता कि उससे अधिक शक्तिशाली देश उसकी निर्भरताओं की परीक्षा लेंगे या नहीं। लेकिन वह यह जरूर तय कर सकता है कि उसकी अपनी घरेलू व्यवस्था उन निर्भरताओं को बढ़ाएगी या कम करेगी।

कैमरे हटते ही गले मिलना समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो बचता है, वही असली ताकत है। भारत अपने बूते क्या बना सकता है, कितना दबाव सह सकता है और जिन नियमों पर दुनिया को चलने की सलाह देता है, उन पर स्वयं कितना भरोसा पैदा कर सकता है।

Powerica Share Price: ₹700 तक जा सकता है ₹565 का शेयर, इस कारण नुवामा हुआ बुलिश

Powerica  Share Price: नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज (Nuvama Institutional Equities) पावरिका लिमिटेड (Powerica Ltd) के शेयरों को लेकर बुलिश नजर आ रहा है। ब्रोकरेज फ्रर्म ने स्टॉक पर Buy रेटिंग दी है और इसके लिए 700 रुपये का टारगेट प्राइस दिया। जो मौजूदा लेवल से 20 फीसदी की तेजी दिखा रहा है । बता दें कि Powerica के शेयर अपने आईपीओ प्राइस ₹395 से लगभग 48% की तेजी आई है। सोमवार को ये 564.45 रुपये पर बंद हुआ। 2 अप्रैल 2026 को BSE और NSE पर लिस्ट होने के बाद, पिछले 6 महीनों में इस स्टॉक में 34.51% की बढ़त दर्ज की गई है।

ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि नुवामा का यह सकारात्मक नजरिया तीन मुख्य ग्रोथ ड्राइव पर टिका है। कंपनी के डीजल जनरेटर (DG) बिजनेस में सुधार, विंड इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर (IPP) पोर्टफोलियो का विस्तार, और रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइसेस (RECDs) के क्षेत्र में लंबे समय के अवसर।

स्टॉक पर क्या है ब्रोकरेज की राय

पावरिका का पावर-सॉल्यूशन पोर्टफोलियो काफी विविध है, जिसमें DG सेट, विंड पावर जनरेशन और RECDs शामिल हैं। नुवामा को उम्मीद है कि FY26 से FY29 के दौरान इन व्यवसायों से अच्छी कमाई होगी। इसके पीछे डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग, अधिक कुशल विंड टर्बाइन और एमिशन-कंट्रोल तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाना जैसे कारण हैं।

ब्रोकरेज का अनुमान है कि FY26 से FY29 के बीच, DG बिजनेस के टैक्स के बाद मुनाफे (PAT) में लगभग 21% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) देखने को मिलेगी। वहीं, विंड IPP के EBITDA (ब्याज, टैक्स, डेप्रिसिएशन और अमोर्टाइजेशन से पहले की कमाई) में 44% और RECD के PAT में 27% की CAGR रहने की उम्मीद है।

पावरिका का DG बिजनेस लगातार कैश जनरेट करने का एक मजबूत आधार है। भारत में कमिंस (Cummins) के लिए केवल तीन जनरेटर ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (GOEMs) में से एक होने के नाते, कंपनी को एक खास फायदा मिलता है।

भारत में डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है, खासकर दक्षिण और पश्चिमी भारत में, जिसका फायदा पावरिका को मिल सकता है। नुवामा ने बताया कि पावरिका के पास डेटा सेंटर से जुड़े लगभग ₹1,100 करोड़ के ऑर्डर हैं। इसकी तुलना में, FY26 में डेटा सेंटर से बिक्री लगभग ₹340 करोड़ रही थी, जो भविष्य में कंपनी की ग्रोथ की अच्छी संभावनाओं को दर्शाती है। ब्रोकरेज को उम्मीद है कि मार्जिन में सुधार आएगा, क्योंकि कंपनी कमिंस (Cummins) द्वारा बढ़ाई गई कीमतों का बोझ ग्राहकों पर डाल देगी। औद्योगिक पूंजीगत व्यय (industrial capital expenditure) में तेजी आने से इसे और बढ़ावा मिल सकता है।

हालांकि, यह सुधार इस बात पर निर्भर करता है कि पॉवरिका (Powerica) बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर कितनी अच्छी तरह डाल पाती है। नुवामा (Nuvama) ने चेतावनी दी है कि अगर कंपनी बढ़ती कमोडिटी लागत के बीच कीमतों में हुई बढ़ोतरी को खुद सहने या ग्राहकों पर डालने में विफल रहती है, तो इससे DG मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

पॉवरिका का विंड पावर (पवन ऊर्जा) कारोबार, नुवामा की निवेश थीसिस का एक और मुख्य आधार है। कंपनी की विंड कैपेसिटी, मिले हुए ‘लेटर ऑफ अवार्ड’ (LOAs) के सहारे, वित्त वर्ष 2029 तक लगभग 330 MW से बढ़कर 631 MW होने की उम्मीद है।

कंपनी का पोर्टफोलियो भी नए और अधिक कुशल टर्बाइनों की ओर बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2029 तक इनका हिस्सा 65% से बढ़कर लगभग 82% होने का अनुमान है। ये नई संपत्तियां 30% से अधिक का प्लांट लोड फैक्टर (PLF) और लगभग 80% का EBITDA मार्जिन दे सकती हैं, जिससे पूरे पोर्टफोलियो की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।

नुवामा को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2029 तक ब्लेंडेड PLF लगभग 29.4% और विंड बिजनेस का EBITDA मार्जिन लगभग 77% तक पहुंच जाएगा। इसी के आधार पर, वित्त वर्ष 2026 से वित्त वर्ष 2029 के बीच विंड IPP कारोबार के लिए 44% EBITDA CAGR (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) का अनुमान लगाया गया है।

पॉवरिका का RECD कारोबार अभी काफी छोटा है, लेकिन जैसे-जैसे उत्सर्जन नियंत्रण (emission-control) की जरूरतें बढ़ेंगी, यह विकास का एक महत्वपूर्ण जरिया बन सकता है। नुवामा के अनुसार, इसका संभावित बाजार लगभग 60,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें केवल पांच से छह प्रमाणित प्रतिस्पर्धी ही मौजूद हैं।

ब्रोकरेज ने बताया कि इस कारोबार में इक्विटी पर लगभग 47% रिटर्न मिलने की संभावना है। साथ ही, विभिन्न राज्यों में RECD से जुड़े नियमों का लागू होना और कंपनी की नए ऑर्डर हासिल करने की क्षमता, इसके लिए महत्वपूर्ण कारक होंगे।

नुवामा का मानना ​​है कि पॉवरिका की रिपोर्ट की गई कमाई, उसकी नकदी पैदा करने की वास्तविक क्षमता को पूरी तरह से नहीं दर्शाती है। FY26 में ऑपरेटिंग कैश फ्लो PAT का लगभग 170% रहा, जबकि इसके विंड एसेट्स इक्विटी पर लगभग 15–17% का कैश रिटर्न देते हैं।

ब्रोकरेज को उम्मीद है कि कंसोलिडेटेड रिटर्न ऑन इक्विटी FY27 के लगभग 12% से बढ़कर FY30 तक 14.4% हो जाएगा, क्योंकि नई विंड परियोजनाओं के लिए लगभग 70:30 के डेट-टू-इक्विटी अनुपात के साथ फंडिंग की जाएगी। नुवामा (Nuvama) के अनुसार वैल्यूएशन आकर्षक हैं। इसमें विंड बिजनेस के लिए FY29 में अनुमानित एंटरप्राइज वैल्यू-टू-EBITDA लगभग 6.8 गुना है, और DG सेट के लिए प्राइस-टू-अर्निंग मल्टीपल लगभग 21 गुना है।

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SBI की 444 दिनों की स्पेशल FD स्कीम! जानें ₹5 लाख और ₹10 लाख फिक्स कराने पर कितना मिलेगा रिटर्न

SBI Amrit Vrishti Scheme: देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की स्पेशल फिक्स्ड डिपॉजिट योजना ‘अमृत वृष्टि’ निवेशकों के बीच काफी लोकप्रिय है। अगर आप सुरक्षित जगह पर निवेश करके शानदार रिटर्न पाना चाहते हैं, तो यह खास 444 दिनों की योजना आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है। बैंक की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, जानिए इस स्पेशल टेन्योर स्कीम की हर एक जरूरी बात।

ब्याज दरें: किसे कितना मिलेगा फायदा?

इस योजना के तहत अलग-अलग आयु वर्ग के निवेशकों के लिए ब्याज दरें तय की गई हैं:

  1. आम नागरिक: 6.45% सालाना
  2. वरिष्ठ नागरिक: 6.95% सालाना (सामान्य नागरिकों से 0.50% ज्यादा)
  3. सुपर सीनियर सिटीजन (80 वर्ष से अधिक): 7.05% सालाना

स्कीम की मुख्य विशेषताएं और नियम

अवधि: इस एफडी की मैच्योरिटी अवधि ठीक 444 दिन (करीब 14.5 महीने) तय की गई है।

न्यूनतम और अधिकतम राशि: इस योजना में रिटेल डिपॉजिट के तहत ₹1,000 से निवेश की शुरुआत की जा सकती है, और अधिकतम राशि ₹3 करोड़ से कम होनी चाहिए।

कौन कर सकता है निवेश: भारत के सामान्य नागरिक, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) और अनिवासी भारतीय (NRIs) इसमें निवेश के पात्र हैं।

ब्याज भुगतान के विकल्प: निवेशक अपनी सुविधा के अनुसार ब्याज का भुगतान मासिक, त्रैमासिक, छमाही या सीधे मैच्योरिटी के समय ले सकते हैं।

लोन सुविधा: जरूरत पड़ने पर निवेशकों को इस एफडी पर लोन या ओवरड्राफ्ट की सुविधा भी मिलती है।

प्री-मैच्योर विड्रॉल यानी समय से पहले पैसे निकासी के नियम

अगर आपको मैच्योरिटी से पहले पैसों की जरूरत पड़ जाती है और आप एफडी तुड़वाते हैं, तो बैंक नियमों के तहत पेनल्टी काटता है:

₹5 लाख तक की राशि पर: 0.50% की पेनल्टी।

₹5 लाख से ₹3 करोड़ से कम राशि पर: 1.0% की पेनल्टी।

खास छूट: अगर एफडी को बुक करने के 7 दिनों के भीतर बंद किया जाता है, तो कोई ब्याज नहीं मिलता है। हालांकि, बैंक के कर्मचारियों और पेंशनर्स को इस पेनल्टी से छूट दी गई है।

कैसे कर सकते हैं आवेदन?

SBI की इस योजना का लाभ उठाने के लिए निवेशकों को बैंक जाने की भी जरूरत नहीं है, इसे घर बैठे ऑनलाइन भी शुरू किया जा सकता है:

  • SBI YONO App के जरिए।
  • एसबीआई की आधिकारिक इंटरनेट बैंकिंग पोर्टल से।
  • अपने नजदीकी एसबीआई की किसी भी शाखा में जाकर फॉर्म भरकर।

₹5 लाख और ₹10 लाख की FD पर कितना मिलेगा रिटर्न

एसबीआई की 444 दिनों वाली ‘अमृत वृष्टि’ एफडी में अगर आप 5 लाख रुपये का निवेश करते हैं, तो 6.45% सालाना ब्याज दर के हिसाब से आम नागरिकों को मैच्योरिटी पर लगभग ₹39,800 से ₹40,000 का ब्याज मिलेगा, जिससे कुल रकम बढ़कर करीब ₹5.40 लाख हो जाएगी; वहीं 6.95% की दर से वरिष्ठ नागरिकों को कुल ₹43,000 से ₹43,200 तक का रिटर्न मिलेगा, जिससे उनकी कुल रकम ₹5.43 लाख के पार पहुंच जाएगी।

इस स्कीम में ₹10 लाख की FD करने पर 6.45% सालाना चक्रवर्ती ब्याज दर के हिसाब से आम नागरिकों को मैच्योरिटी पर लगभग ₹80,000 से ₹80,500 तक का शुद्ध रिटर्न मिलेगा (कुल मैच्योरिटी रकम करीब ₹10.80 लाख हो जाएगी); वहीं 6.95% सालाना ब्याज दर के साथ वरिष्ठ नागरिकों को कुल ₹86,500 से ₹87,000 तक का ब्याज प्राप्त होगा, जिससे 444 दिनों बाद उनकी कुल जमा रकम बढ़कर लगभग ₹10.87 लाख पहुंच जाएगी।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।