Axis Bank के CFO पुनीत शर्मा ने दिया इस्तीफा, HDFC Bank के बन सकते हैं नए CFO

Axis Bank ने सोमवार को बताया कि उसके चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) पुनीत शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। बैंक ने कहा कि वह अपने प्रोफेशनल करियर के अगले चरण में आगे बढ़ना चाहते हैं। फिलहाल बैंक ने उनके उत्तराधिकारी के नाम का ऐलान नहीं किया है।

पुनीत शर्मा ने 28 जून 2026 को इस्तीफा दिया था। वह 31 अगस्त 2026 को कारोबार खत्म होने के बाद बैंक छोड़ देंगे। पुनीत शर्मा 6 मार्च 2020 से Axis Bank के CFO हैं। उनके पास बैंकिंग, वित्तीय संस्थानों और कंसल्टिंग सेक्टर में 23 साल से ज्यादा का अनुभव है।

HDFC Bank जा सकते हैं पुनीत

HDFC Bank अपने अगले चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर (CFO) के तौर पर पुनीत की नियुक्ति कर सकता है। इस मामले से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, अगर नियुक्ति होती है तो यह इस साल निजी बैंकिंग सेक्टर के बड़े लीडरशिप बदलावों में से एक होगा।

पुनीत शर्मा मौजूदा CFO श्रीनिवासन वैद्यनाथन की जगह ले सकते हैं। उनका कार्यकाल अक्टूबर 2026 में पूरा हो रहा है। CNBC-TV18 के मुताबिक, HDFC Bank की नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी सोमवार को बैठक करेगी, जिसमें इस नियुक्ति पर चर्चा हो सकती है।

HDFC Bank में पहले भी हुआ बड़ा बदलाव

अगर पुनीत शर्मा की नियुक्ति होती है, तो वह ऐसे समय में HDFC Bank की फाइनेंस टीम की कमान संभालेंगे, जब बैंक लीडरशिप बदलाव की तैयारी कर रहा है।

हाल ही में भाविन लखपतवाला भी HDFC Bank छोड़कर RBL Bank में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और CFO बने हैं। उन्हें HDFC Bank में CFO पद का संभावित आंतरिक दावेदार माना जा रहा था।

Axis Bank में 6 साल का अनुभव

पुनीत शर्मा मार्च 2020 से Axis Bank में ग्रुप हेड और CFO हैं। फाइनेंस के अलावा वे लीगल, सेक्रेटेरियल, इन्वेस्टर रिलेशंस और प्रोक्योरमेंट की जिम्मेदारी भी संभालते हैं। वह Axis Finance और Axis Securities के बोर्ड में भी नॉमिनी डायरेक्टर हैं।

उनके कार्यकाल में Axis Bank ने Citibank India के कंज्यूमर बिजनेस का अधिग्रहण और इंटीग्रेशन पूरा किया। बैंक ने सफलतापूर्वक पूंजी जुटाई और टेक्नोलॉजी-डिजिटल बैंकिंग में निवेश भी बढ़ाया।

Tata Capital में भी अहम भूमिका

Axis Bank से पहले पुनीत शर्मा 12 साल से ज्यादा समय तक Tata Capital में रहे। वहां वह ग्रुप CFO बने और फाइनेंस, ट्रेजरी, टैक्सेशन, इन्वेस्टर रिलेशंस और कॉरपोरेट स्ट्रैटेजी की जिम्मेदारी संभाली।

अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने Citibank, Boston Consulting Group और Lovelock & Lewes (अब PwC India का हिस्सा) में भी काम किया। वह चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और कॉस्ट अकाउंटेंट हैं।

इस मामले पर पूछे गए सवालों पर पुनीत शर्मा ने कोई टिप्पणी नहीं की है। HDFC Bank और Axis Bank की ओर से भी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

China’s Footprint in Bangladesh Explainer: मोंगला से चटगांव तक, बांग्लादेश में ऐसा क्या कर रहा चीन कि भारत को करनी चाहिए चिंता

बांग्लादेश में चीन की बढ़ती गतिविधियां भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चिंता बनती जा रही हैं। जानकारी के मुताबिक, चीन की मौजूदगी अब केवल व्यापार और आर्थिक परियोजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ऐसे क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, जिनका भविष्य में सैन्य महत्व हो सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों का मानना है कि बांग्लादेश में हो रहे हालात इस बात का संकेत हैं कि चीन की लंबे समय से चली आ रही रणनीति अब जमीन पर दिखाई देने लगी है। इसका असर भारत की पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बांग्लादेश के बंदरगाहों, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और रक्षा सहयोग में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत की चिंता बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे निगरानी, सैन्य गतिविधियों और क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।

मोंगला बंदरगाह को लेकर बढ़ी चिंता

खुफिया सूत्रों के अनुसार, बांग्लादेश का मोंगला बंदरगाह अब रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि बांग्लादेश सरकार ने मोंगला बंदरगाह के पास 110 एकड़ जमीन का आर्थिक क्षेत्र चीन की एक सरकारी कंपनी को आवंटित किया है। खुफिया एजेंसियों का कहना है कि यह वही जमीन है, जिसे वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुए एक द्विपक्षीय समझौते के तहत भारत के लिए तय किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि मोंगला बंदरगाह की रणनीतिक स्थिति और समुद्री गतिविधियों में इसकी अहम भूमिका को देखते हुए यह घटनाक्रम भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बंदरगाहों में चीन के निवेश से बढ़ी चिंता

एक्सपर्ट्स की माने तो चिंता सिर्फ बंदरगाहों के विकास तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मोंगला और चटगांव बंदरगाहों में चीन की बढ़ती भागीदारी से उसे इस इलाके की समुद्री गतिविधियों पर पहले से ज्यादा नजर रखने का अवसर मिल सकता है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि इन बंदरगाहों में तैयार किए गए आधुनिक ढांचे और उपकरण भविष्य में रणनीतिक रूप से अहम साबित हो सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बंदरगाहों पर इस्तेमाल होने वाली कई आधुनिक क्रेन और अन्य सुविधाएं चीन की कंपनी शंघाई झेनहुआ हेवी इंडस्ट्रीज (ZPMC) ने तैयार की हैं। इसी वजह से भारत की सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए हुए हैं।

यदि इन बंदरगाह प्रणालियों को चीन समर्थित LOGINK लॉजिस्टिक्स नेटवर्क से जोड़ा जाता है, तो इससे जहाजों की आवाजाही, माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स से जुड़े डेटा पर नजर रखना आसान हो सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ऐसी व्यवस्था चीन को बंगाल की खाड़ी में समुद्री गतिविधियों की ज्यादा जानकारी जुटाने में मदद कर सकती है।

भारतीय सैन्य गतिविधियों की निगरानी को लेकर बढ़ी चिंता

खुफिया एजेंसियों के अनुसार, एक बड़ी चिंता यह भी है कि भविष्य में चीन बांग्लादेश में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी से जुड़े सिस्टम तैनात कर सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ऐसे सिस्टम रेडियो, माइक्रोवेव और रडार सिग्नलों को पकड़ने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो इन प्रणालियों का इस्तेमाल भारतीय सेना की कुछ संचार गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि सुकना स्थित भारतीय सेना की 33 कोर से जुड़े सिग्नलों की निगरानी की आशंका जताई गई है।

जांच एजेंसियों के आकलन के मुताबिक, मोंगला और चटगांव बंदरगाह के आसपास चीन से जुड़े बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल भविष्य में निगरानी के लिए किया जा सकता है। हालांकि, ये सभी बातें खुफिया सूत्रों के आकलन और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक, यदि इस तरह का निगरानी नेटवर्क तैयार होता है तो इससे बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना की गतिविधियों की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि नौसेना के जहाजों की आवाजाही पर पहले की तुलना में ज्यादा नजर रखी जा सकती है।

आकलन में यह भी कहा गया है कि विशाखापत्तनम और कोलकाता से निकलने वाले भारतीय नौसैनिक जहाजों को इस क्षेत्र से गुजरते समय अधिक निगरानी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, ये दावे खुफिया सूत्रों के आकलन और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

तीस्ता परियोजना को लेकर भी बढ़ी रणनीतिक चिंता

खुफिया सूत्रों के अनुसार, चिंता केवल बंदरगाहों तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि बांग्लादेश ने तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना में चीन की भागीदारी को भी मंजूरी दे दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना में काम करने वाले चीनी इंजीनियर, जल विशेषज्ञ और तकनीकी कर्मचारी भारत के रणनीतिक रूप से अहम सिलीगुड़ी कॉरिडोर के आसपास अपनी मौजूदगी बढ़ा सकते हैं।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर, देश के मुख्य हिस्से को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण संकरा रास्ता है। खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि इस इलाके के आसपास चीन की बढ़ती मौजूदगी भविष्य में भारत की सुरक्षा के लिहाज से चिंता का विषय बन सकती है। हालांकि, ये दावे खुफिया सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

चीन की बड़ी क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा 

खुफिया सूत्रों के अनुसार, इन सभी घटनाक्रमों को चीन की एक व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि चीन प्रस्तावित चीन-म्यांमार-बांग्लादेश आर्थिक गलियारे के जरिए इस क्षेत्र की प्रमुख समुद्री परियोजनाओं और बंदरगाहों को आपस में जोड़ने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना का उद्देश्य अलग-अलग देशों के बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को एक-दूसरे से जोड़ना है। इसमें पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह, म्यांमार का क्यौकफ्यू बंदरगाह और बांग्लादेश का मोंगला बंदरगाह शामिल बताए जा रहे हैं।

खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि यदि यह नेटवर्क तैयार होता है, तो भारत के समुद्री क्षेत्र के आसपास एक मजबूत और आपस में जुड़ा लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित हो सकता है। हालांकि, ये दावे खुफिया सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

IIP Data: मई में इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की बढ़ी रफ्तार, बिजली और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने दिखाया दम

IIP Data: भारत का इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन मई 2026 में बढ़कर 5.1% हो गया। अप्रैल में यह 4.9% था। इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बिजली और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अच्छी बढ़त की वजह से इंडस्ट्रियल ग्रोथ तेज हुई है। यह आंकड़ा दिखाता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद देश में घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने संभाली कमान

IIP में सबसे ज्यादा करीब 76% हिस्सेदारी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की है। मई में इस सेक्टर की ग्रोथ 5.5% रही। हालांकि, अप्रैल के मुकाबले इसमें मामूली नरमी रही, लेकिन कुल मिलाकर रफ्तार बनी रही।

इस दौरान इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट, फैब्रिकेटेड मेटल, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा।

इन सेक्टरों में सबसे ज्यादा तेजी

मई में इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट सेक्टर का प्रोडक्शन 20.8% बढ़ा। वहीं, फैब्रिकेटेड मेटल प्रोडक्ट्स में 15.5%, मोटर व्हीकल्स में 14.5%, अन्य ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट में 14.3% और कंप्यूटर व इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स में 11.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे साफ है कि निवेश से जुड़े सेक्टरों में मांग मजबूत बनी हुई है।

बिजली उत्पादन में उछाल

मई में बिजली और गैस सेक्टर का उत्पादन 9.9% बढ़ा। अकेले बिजली उत्पादन में 11.1% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसकी बड़ी वजह गर्मियों के दौरान बिजली की बढ़ी हुई मांग रही।

माइनिंग सेक्टर अब भी दबाव में

दूसरी ओर माइनिंग और क्वारिंग सेक्टर का प्रदर्शन कमजोर रहा। मई में इसका उत्पादन 1.6% घट गया। हालांकि, अप्रैल में इसमें 3.7% की गिरावट आई थी। कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और गैर-धातु खनिजों के कमजोर उत्पादन का असर इस सेक्टर पर पड़ा।

कुछ सेक्टरों में रही कमजोरी

सभी सेक्टरों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। गारमेंट्स का उत्पादन 8.8% घटा। प्रिंटिंग सेक्टर में 10.3% की गिरावट आई। रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का उत्पादन 4.7% और केमिकल्स का उत्पादन 1.3% घट गया।

कैपिटल गुड्स में बनी रही मजबूती

निवेश से जुड़े कैपिटल गुड्स का उत्पादन मई में 12.9% बढ़ा। अप्रैल में इसकी ग्रोथ 12% थी। इससे संकेत मिलता है कि मशीनरी और उपकरणों की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। वहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन गुड्स में 5.8% और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में 7.2% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

हालांकि, कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स की ग्रोथ सिर्फ 3.6% रही। इससे रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामान की मांग अभी भी कमजोर नजर आती है।

ICRA ने क्या कहा?

ICRA के प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट राहुल अग्रवाल ने कहा कि मई में मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ घटकर 5.5% रह गई, जबकि अप्रैल में यह 6.1% थी। उन्होंने बताया कि 23 में से 15 मैन्युफैक्चरिंग सब-सेक्टरों की रफ्तार धीमी हुई है। वहीं, माइनिंग सेक्टर में लगातार पांचवें महीने गिरावट दर्ज की गई। हालांकि इसकी रफ्तार पहले से कुछ कम रही।

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टूव्हीलर और थ्रीव्हीलर मेकर Bajaj Auto Ltd शेयर बायबैक कर रही है। इसके लिए ​विंडो 1 जुलाई 2026 से खुलेगी और 7 जुलाई को बंद होगी। बायबैक का साइज ₹5,632.8 करोड़ है। कंपनी ने एनटाइटलमेंट रेशियो की घोषणा कर दी है। बायबैक में कंपनी अपने शेयरहोल्डर्स से ₹10 प्रति शेयर फेस वैल्यू वाले 46.94 लाख इक्विटी शेयर वापस खरीदने वाली है। शेयरों की यह संख्या कंपनी के कुल इक्विटी शेयरों का 1.68% है। Bajaj Auto के शेयर बायबैक की कीमत ₹12,000 प्रति शेयर तय की गई है।

इस तरह कंपनी इस बायबैक के लिए ₹5,633 करोड़ (₹5,632,80,00,000) खर्च करेगी। इस रकम में अन्य खर्च, ब्रोकरेज फीस और लागू टैक्स शामिल नहीं हैं। इस शेयर बायबैक के लिए रिकॉर्ड डेट 24 जून थी। रिकॉर्ड डेट से एक दिन पहले मार्केट क्लोजिंग टाइम तक जिन लोगों के नाम शेयरों के लाभार्थी मालिकों के तौर पर रजिस्टर ऑफ मेंबर्स ऑफ द कंपनी या डिपॉजिटरीज के रिकॉर्ड्स में रहे होंगे, वे बायबैक में हिस्सा लेने के पात्र होंगे।

Bajaj Auto ने क्या रखा है बायबैक रेशियो?

बायबैक ऑफर के तहत छोटे शेयरहोल्डर्स के लिए रिजर्व कैटेगरी में आने वाले पात्र शेयरहोल्डर रिकॉर्ड डेट (24 जून) पर अपने पास मौजूद हर 61 इक्विटी शेयरों के लिए 17 इक्विटी शेयर टेंडर कर सकते हैं, यानि कि बेचने के लिए पेश कर सकते हैं। जनरल कैटेगरी में आने वाले शेयरहोल्डर रिकॉर्ड डेट पर उनके पास मौजूद हर 525 इक्विटी शेयरों पर 17 इक्विटी शेयर टेंडर कर सकते हैं। कंपनी के प्रमोटर्स, प्रमोटर ग्रुप की कंपनियों और कंपनी का कंट्रोल रखने वाले लोगों ने संकेत दिया है कि वे बायबैक में हिस्सा नहीं लेंगे। स्टॉक एक्सचेंजेस पर बिड्स के सेटलमेंट की लास्ट डेट 14 जुलाई है।

कंपनी ने इस बायबैक की घोषणा 6 मई को तिमाही और सालाना नतीजे जारी करने के साथ की थी। शेयरहोल्डर्स ने प्रपोजल को मंजूरी 14 मई को दी। इससे पहले बजाज ऑटो ने साल 2024 में शेयर बायबैक किया था। उस वक्त कंपनी ने शेयरहोल्डर्स से कुल इक्विटी शेयरों का 1.41% हिस्सा ₹10,000 प्रति शेयर की कीमत पर वापस खरीदा था।

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सोमवार को Bajaj Auto के शेयर में गिरावट

Bajaj Auto के शेयर में 29 जून को 2% की गिरावट रही। BSE पर कीमत ₹9628.15 पर बंद हुई। कंपनी का मार्केट कैप ₹2.69 लाख करोड़ से ज्यादा है। शेयर 3 साल में निवेशकों का पैसा डबल कर चुका है। मार्च 2026 तिमाही के अंत तक कंपनी में प्रमोटर्स के पास 55.01% हिस्सेदारी थी। बजाज ऑटो के अब लगभग 3 लाख खुदरा शेयरधारक हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Market Outlook : बाजार में बढ़त का सिलसिला थमा, जानिए 30 जून को कैसी रह सकती है इसकी चाल

Market Outlook : भारतीय इक्विटी इंडेक्स का दो दिन से जारी बढ़त का सिलसिला 29 जून को टूट गया और बाजार गिरावट के साथ बंद हुए। निफ्टी 24,000 के नीचे रहा। कारोबारी सत्र के अंत में सेंसेक्स 372.10 अंक या 0.48 प्रतिशत गिरकर 76,728.37 पर और निफ्टी 109.75 अंक या 0.46 प्रतिशत गिरकर 23,946.25 पर बंद हुआ। लगभग 1681 शेयरों में बढ़त हुई,2471 शेयरों में गिरावट आई और 202 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।

निफ्टी में सबसे ज्यादा गिरने वाले शेयरों में कोटक महिंद्रा बैंक,M&M,मारुति सुजुकी,अदाणी एंटरप्राइजेज और इंटरग्लोब एविएशन शामिल रहे। जबकि बढ़त वाले शेयरों में मैक्स हेल्थकेयर,कोल इंडिया,डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज,एटरनल और ट्रेंट शामिल रहे।

सेक्टरों की बात करें तो ऑटो इंडेक्स में 2% की गिरावट आई। जबकि PSU बैंक,मीडिया,IT और ऑयल एंड गैस इंडेक्स में 1-1% की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर,मेटल,फार्मा और हेल्थकेयर इंडेक्स में 1-1% की बढ़त हुई। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.4 प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स 0.6 प्रतिशत नीचे आया।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के हेड ऑफ रिसर्च विनोद नायर का कहना है कि US-ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते के टिके रहने को लेकर निवेशकों के सतर्क नजरिए के कारण अहम साइकोलॉजिकल लेवल के पास प्रॉफिट बुकिंग जारी रही। फिलहाल बाजार में निकट भविष्य के लिए कोई साफ दिशा नहीं दिख रही है। सप्लाई की कमी,लगातार बने महंगाई क दबाव और कमजोर मॉनसून की संभावनाओं के बीच Q1FY27 अर्निंग्स सीजन को लेकर उम्मीदें कमजोर बनी हुई हैं। इन सभी का असर मार्जिन पर पड़ने की आशंका है। बाजार में हर तरफ बिकवाली रही। हालांकि,फ़ार्मा और हेल्थकेयर जैसे डिफेंसिव सेक्टर ने बेहतर प्रदर्शन किया, क्योंकि इनकी मांग में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता और इनकी अर्निंग का अनुमान लगाना आसान होता है।

निवेशक US के आने वाले’नॉन-फ़ार्म पेरोल’डेटा को लेकर भी सतर्क हैं। यह डेटा फेडरल रिज़र्व की पॉलिसी की दिशा पर असर डाल सकता है और ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की मौजूदा उम्मीदों को या तो मज़बूत कर सकता है या उनमें कमी ला सकता है। घरेलू बाजार से FII की निकासी में कमी और AI-आधारित ग्लोबल मार्केट के जोश का ठंडा होना,आगे चलकर बाजार के सेंटीमेंट को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकता है।

LKP सिक्योरिटीज में सीनियर टेक्निकल एनालिस्ट रूपक डे का कहना है कि निफ्टी ने हफ्ते की शुरुआत कमजोरी के साथ की और पूरे समय दबाव में रहा,क्योंकि इंडेक्स ऑवर्ली चार्ट पर 50EMA के नीचे आ गया। मोमेंटम इंडिकेटर भी कमजोर रहा और RSI में’बेयरिश क्रॉसओवर’दिखा,जो बताता है कि निकट भविष्य में सेंटीमेंट कमजोर रह सकता है।

मंगलवार को NSE की मंथली एक्सपायरी के कारण एकआध दिन उतार-चढ़ाव ज्यादा रह सकता है। हालांकि,जब तक इंडेक्स 23,800 के सपोर्ट लेवल के ऊपर बना हुआ है,तब तक शॉर्ट-टर्म ट्रेंड पॉजिटिव बना रहेगा। जब तक निफ्टी 23,800 के नीचे नहीं जाता,तब तक गिरावट पर खरीदारी की रणनीति अपनानी चाहिए। ऊपरी स्तर पर 24,200 के तत्काल रेजिस्टेंस के तौर पर काम करते रहने की संभावना है।

कोटक सिक्योरिटीज के हेड इक्विटी रिसर्च श्रीकांत चौहान का कहना है कि आज बेंचमार्क इंडेक्स में ऊंचे लेवल पर प्रॉफिट बुकिंग देखी गई। निफ्टी 110 अंक गिरकर बंद हुआ,जबकि सेंसेक्स में 372 अंकों की गिरावट आई। सेक्टर की बात करें तो फार्मा,हेल्थकेयर और मेटल इंडेक्स में लगभग 1 प्रतिशत की तेजी आई,जबकि ऑटो इंडेक्स में 1.65 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

टेक्निकल तौर पर सुस्त शुरुआत के बाद बाजार में पूरे दिन ऊंचे लेवल पर बिकवाली का दबाव देखा गया। डेली चार्ट पर एक’बेयरिश कैंडल’भी बनी,जो मौजूदा लेवल से और कमजोरी आने का संकेत देती है।

अब निफ्टी में 24,000 का लेवल डे ट्रेडर्स के लिए एक अहम रेफरेंस प्वाइंट होगा। इस लेवल के नीचे,निफ्टी 50-दिन के SMA(सिंपल मूविंग एवरेज)या 23,800–23,750 के लेवल को फिर से टेस्ट कर सकता है। दूसरी ओर,24,000 के ऊपर जाने पर तेजी 24,150–24,200 तक जारी रह सकती है। इंट्राडे मार्केट का ट्रेंड किसी खास दिशा में नहीं है। इसलिए,डे ट्रेडर्स के लिए लेवल-बेस्ड ट्रेडिंग सबसे अच्छी रणनीति होगी।

 

Trading Strategy: बाजार में रीबैलेंसिंग की बिकवाली की वजह से भी बना थोड़ा दबाव,आज और कल की चाल को ना समझें बड़ा ट्रेंड

 

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Netweb Share Price: डेटा सेंटर कंपनी का स्टॉक 10% टूटा, जानिए किस वजह से आई इतनी बड़ी गिरावट

Netweb Share Price: डेटा सेंटर कंपनी Netweb Technologies India के शेयर सोमवार को कारोबार के दौरान 10% तक टूट गए। इसकी वजह कंपनी का फंड जुटाने की योजना रही।

शेयर कारोबार के दौरान 4,450 रुपये तक गिर गया। आखिर में यह 9.34% की गिरावट के साथ 4,482 रुपये पर बंद हुआ।

1 जुलाई को होगी बोर्ड बैठक

Netweb Technologies ने एक्सचेंज फाइलिंग में बताया कि 1 जुलाई को बोर्ड की बैठक होगी। इस बैठक में एक या एक से ज्यादा फंड जुटाने के प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा। मंजूरी मिलने पर बोर्ड इन्हें आगे बढ़ा सकता है।

कैसे जुटाया जा सकता है फंड?

Netweb Technologies इक्विटी शेयर, प्रेफरेंस शेयर, कन्वर्टिबल या नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर, वारंट या दूसरे इक्विटी लिंक्ड सिक्योरिटीज जारी कर फंड जुटा सकती है। जरूरत के हिसाब से इनमें से एक या एक से ज्यादा विकल्प अपनाए जा सकते हैं।

कई रास्तों पर विचार

Netweb Technologies ने कहा कि फंड जुटाने के लिए क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP), प्राइवेट प्लेसमेंट, फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (FPO), राइट्स इश्यू या कानून के तहत उपलब्ध किसी अन्य तरीके का इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर जरूरत पड़ी, तो इस प्रस्ताव में ग्रीनशू ऑप्शन भी शामिल किया जा सकता है।

Netweb के शेयरों का हाल

Netweb का शेयर सोमवार 9.34% की गिरकर 4,482 रुपये पर बंद हुआ। हालांकि, पिछले 6 महीने के दौरान इसमें 45.58% की तेजी आई है। वहीं, 1 साल में इसने 142% का मल्टीबैगर रिटर्न दिया है। कंपनी का मार्केट कैप 25.52 हजार करोड़ रुपये है।

Netweb का बिजनेस

Netweb Technologies हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (HPC) और AI सर्वर बनाने वाली कंपनी है। यह डेटा सेंटर और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर सॉल्यूशंस भी देती है। कंपनी सरकारी संस्थानों, रिसर्च संगठनों और बड़े एंटरप्राइज ग्राहकों के लिए सुपरकंप्यूटर और एडवांस्ड कंप्यूटिंग सिस्टम तैयार करती है।

HAL Dividend: सरकारी डिफेंस कंपनी देगी ₹10 का डिविडेंड, जानिए रिकॉर्ड डेट समेत पूरी डिटेल

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Aluminium Prices: स्क्रैप सप्लाई बढ़ने से गिरेगी एल्युमिनियम की कीमतें, InCred का अनुमान $2,400–2,700 तक जा सकता है भाव

Aluminium Prices: ज्यादातर एनालिस्ट को उम्मीद है कि लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर एल्युमिनियम की कीमतें लगभग $3,200–3,300 प्रति टन रहेगी। लेकिन InCred रिसर्च सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर और हेड सतीश कुमार को उम्मीद है कि कीमतें गिरकर $2,400–2,700 प्रति टन पर आ जाएंगी।

CNBC TV18 से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि हाल की तेजी ज्यादातर प्राइमरी एल्युमिनियम मार्केट की वजह से आई है, लेकिन रीसायकल किए गए मेटल या स्क्रैप की बढ़ती उपलब्धता से कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि “कुल एल्युमिनियम सप्लाई में स्क्रैप का हिस्सा लगभग 32 से 33% होता है और इसलिए यह बहुत जरूरी भूमिका निभाता है।” “जब भी एल्युमिनियम की कीमतें बढ़ेंगी, तो आप देखेंगे कि 6 महीने बाद मार्केट में स्क्रैप की बाढ़ आ जाएगी, और यह असल में एक बैलेंस बनाने वाले फैक्टर का काम करता है।”

उन्हें उम्मीद है कि रिसाइकल किया गया एल्युमीनियम, नवीन फ्लोरीन का एक बड़ा हिस्सा पूरा करेगा, जिससे नई कैपेसिटी की जरूरत कम हो जाएगी। उन्होंने बताया कि चीन ने पहले ही अपनी प्राइमरी एल्युमीनियम कैपेसिटी 45 ​​मिलियन टन पर लिमिट कर दी है, जबकि वह घरेलू रीसाइक्लिंग और इंपोर्ट के जरिए स्क्रैप का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।

उनका अनुमान है कि अकेले प्राइमरी एल्युमीनियम का मार्केट थोड़ा कमजोर रहेगा, जिसकी डिमांड लगभग 75 मिलियन टन सप्लाई से ज्यादा होगी। लेकिन एक बार रीसायकल किया गया स्क्रैप जुड़ने के बाद दुनिया भर में एल्युमीनियम की कुल डिमांड और सप्लाई बढ़कर लगभग 105–107 मिलियन टन हो जाती है, जिससे पूरा मार्केट मेटल की कमी के बजाय मोटे तौर पर बैलेंस्ड हो जाता है।

कुमार ने कहा, “प्राइमरी मेटल ठीक लग रहा है। मार्केट में कमी है, लेकिन अगर हम स्क्रैप को भी ध्यान में रखें तो मुझे यह एक बैलेंस्ड सिनेरियो जैसा लग रहा है।”

एल्युमीनियम की कीमतों में तेज करेक्शन से प्रोड्यूसर्स की कमाई पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कंपनियों की वैल्यूएशन अभी इस उम्मीद में की जा रही है कि एल्युमीनियम की कीमतें $3,500 प्रति टन के आसपास रहेंगी। अगर कीमतें उनके टारगेट के करीब आती हैं तो कमाई का अनुमान और वैल्यूएशन दबाव में आ सकते हैं, हालांकि उन्होंने अपनी ऑफिशियल कवरेज वाली कंपनियों पर कोई कमेंट नहीं किया।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

खेत बेचने पर कितना लगता है टैक्स? ITR में कहां और कैसे दिखाएं यह कमाई, जानिए टैक्स विभाग के जरूरी नियम

Tax on Agricultural Land Sale: भारत में कृषि भूमि यानी खेत बेचने को लेकर आम तौर पर यही माना जाता है कि इस पर कोई टैक्स नहीं लगता है। लेकिन टैक्स नियमों के मुताबिक यह पूरी तरह सच नहीं है। कृषि भूमि बेचने पर टैक्स लगेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह जमीन ‘ग्रामीण’ इलाके में आती है या ‘शहरी’ इलाके में।

कई बार टैक्स न लगने के बावजूद, ITR में इस कमाई की जानकारी न देना या गलत जगह दिखाना आपको मुश्किल में डाल सकता है और इनकम टैक्स विभाग का नोटिस आ सकता है। आइए आपको बताते हैं कि कृषि भूमि की बिक्री पर टैक्स का क्या नियम है और इसे रिटर्न में कैसे दर्ज करें।

ग्रामीण कृषि भूमि: यहां नहीं लगता कोई कैपिटल गेन्स टैक्स

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 2(14) के तहत, ‘ग्रामीण कृषि भूमि’ को कैपिटल एसेट यानी पूंजीगत संपत्ति नहीं माना जाता है।

टैक्स छूट: चूंकि यह कैपिटल एसेट नहीं है, इसलिए इसे बेचने पर होने वाले मुनाफे पर कोई ‘कैपिटल गेन्स टैक्स’ नहीं लगता है।

ITR में कहां दिखाएं: चूंकि यह कमाई पूरी तरह टैक्स-फ्री है, इसलिए इसे आईटीआर के Schedule EI यानी टैक्स-फ्री आमदनी वाले कॉलम में दिखाना चाहिए। कई लोग इसे गलती से Schedule CG में दिखा देते हैं, जिससे सिस्टम ऑटोमैटिक टैक्स कैलकुलेट कर लेता है और बेवजह परेशानी खड़ी होती है।

शहरी कृषि भूमि: देना होगा टैक्स, लेकिन यहां मिलेगी राहत

अगर आपकी कृषि भूमि ‘शहरी’ दायरे में आती है, तो इसकी बिक्री से होने वाला मुनाफा पूरी तरह टैक्स के दायरे में आएगा। हालांकि, टैक्सपेयर्स को राहत देने के लिए इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54B बनाई गई है। इसके तहत अगर आप जमीन बेचने से मिले पैसों से कोई दूसरी कृषि भूमि खरीद लेते हैं, तो आप टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं।

कैसे तय होता है कि जमीन ‘ग्रामीण’ है या ‘शहरी’?

कोई भी खेती की जमीन सिर्फ इसलिए ग्रामीण नहीं हो जाती क्योंकि वहां खेती हो रही है। टैक्स नियमों के अनुसार, नजदीकी नगर पालिका की आबादी और वहां से हवाई दूरी के आधार पर इसका फैसला होता है:

स्थानीय निकाय की आबादीनगर पालिका सीमा से जरूरी  न्यूनतम दूरी जमीन का वर्गीकरण
10,000 से 1 लाख के बीच2 किलोमीटर से ज्यादा दूर होना जरूरीग्रामीण (Tax-Free)
1 लाख से 10 लाख के बीच6 किलोमीटर से ज्यादा दूर होना जरूरीग्रामीण (Tax-Free)
10 लाख से अधिक 8 किलोमीटर से ज्यादा दूर होना जरूरीग्रामीण (Tax-Free)

अगर जमीन इन तय सीमाओं के भीतर आती है, तो उसे ‘शहरी कृषि भूमि’ माना जाएगा और उस पर टैक्स लगेगा।

इनकम टैक्स नोटिस से बचना है, तो पास रखें ये 4 दस्तावेज

टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर भविष्य में इनकम टैक्स विभाग आपसे इस टैक्स छूट को लेकर स्पष्टीकरण मांगता है, तो आपके पास ये दस्तावेज होने चाहिए:

तहसीलदार का सर्टिफिकेट: स्थानीय राजस्व प्राधिकारी से मिला एक आधिकारिक प्रमाण पत्र, जो नजदीकी नगर पालिका से जमीन की सटीक हवाई दूरी और वहां की आबादी की पुष्टि करता हो।

राज्य के राजस्व रिकॉर्ड: जमीन के आधिकारिक दस्तावेज जैसे 7/12 एक्सट्रैक्ट, RTC, या जमाबंदी, जो यह साबित करें कि जमीन आधिकारिक तौर पर कृषि भूमि ही है।

खेती करने का सबूत: बीज, खाद के बिल, सिंचाई के रिकॉर्ड या मंडी की रसीदें, जिससे यह साबित हो सके कि जमीन पर वास्तव में खेती की जा रही थी।

बैंक ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड: रजिस्टर्ड सेल डीड और बैंक स्टेटमेंट, जो यह साबित करें कि पूरा लेनदेन वैध तरीके से हुआ है और कोई अवैध नकद लेनदेन नहीं हुआ है।

अक्सर होने वाली गलतियां जो लाती हैं टैक्स नोटिस

पूरी तरह छिपा लेना: कई लोग सोचते हैं कि टैक्स नहीं लगना है तो आईटीआर में क्यों बताएं? यह सबसे बड़ी गलती है। सब-रजिस्ट्रार ऑफिस जमीन की रजिस्ट्री की जानकारी टैक्स विभाग को देता है, जो आपके एआईएस (AIS) में दिखती है। अगर आप इसे ITR में नहीं दिखाएंगे, तो डेटा मिसमैच का नोटिस आ सकता है।

खेती न होने पर भी छूट का दावा: अगर कोई जमीन कृषि भूमि के रूप में दर्ज है लेकिन सालों से वहां कोई खेती नहीं हुई है, तो विभाग आपकी छूट को खारिज कर सकता है। इसलिए कृषि आय या ऑपरेशन्स का सबूत रखना बेहद जरूरी है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।