Devshayani Ekadashi Vrat Ke Niyam: 25 जुलाई को योगनिद्रा में चले जाएंगे भगवान विष्णु, जानें हरिशयनी व्रत के ये अहम नियम

Devshayani Ekadashi Vrat Ke Niyam: हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी का व्रत किया जाता है। इस साल यह व्रत 25 जुलाई को किया जाएगा। इस दिन से भगवान विष्णु चार माह के लिए पाताल लोक में निवास करते हैं और योगनिद्रा में चले जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन से चतुर्मास लग जाते हैं और इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। शास्त्रों और पद्मपुराण के अनुसार, इस दिन व्रत में कुछ नियमों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए अन्यथा व्रत का फल अधूरा रह सकता है।

देवशयनी एकादशी व्रत के नियम

देवशयनी एकादशी व्रत में क्या करना चाहिए?

  • देवशयनी एकादशी के दिन व्रती को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए। शास्त्रों में ब्रह्ममुहूर्त में स्नान का खास महत्व बताया गया है। इसके पश्चात मन में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु को एकादशी के दिन पीले, पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत और नैवेद्य अवश्य अर्पित करना चाहिए। साथ ही, भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें। ज्योतिष एक्सपर्ट पिनाकी मिश्रा बताते हैं कि तुलसी दल के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
  • व्रती को श्रीहरि की पूजा के दौरान ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ द्वादशाक्षरी मंत्र का जप भी अवश्य करना चाहिए। वैष्णव परंपरा में इसे भगवान विष्णु के प्रमुख उपासना मंत्रों में से एक माना गया है।
  • ज्योतिष एक्सपर्ट बताते हैं कि यदि निर्जला या निराहार व्रत करना संभव न हो, तो ऐसी स्थिति में क्षमता और स्वास्थ्य अनुसार फलाहार करना चाहिए। क्योंकि, व्रत का उद्देश्य केवल भोजन त्याग नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों का संयम भी है।
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या अपनी क्षमता अनुसार अनुसार दान करें। साथ ही, इस व्रत में सेवा और दया का भी विशेष महत्व बताया गया है।

देवशयनी एकादशी व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?

  • भूलकर भी देवशयनी एकादशी के दिन तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से प्रतिकूल प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में एकादशी तिथि पर मांस, मदिरा और अन्य तामसिक चीजों से दूरी बनाए रखें।
  • एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि को करने का विधान होता है। इस दिन नियमानुसार पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
  • एकादशी व्रत में चावल सहित धान्य का सेवन करना वर्जित माना गया है। इस नियम का परिवार के सदस्यों को भी ख्याल रखना चाहिए।
  • भूलकर भी किसी असहाय या अन्य व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए। साथ ही, एकादशी के दिन अहिंसा जैसे कार्यों से भी बचना चाहिए।
  • कभी भी एकादशी के दिन कटु वचन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्रोध और असत्य से भी बचना चाहिए क्योंकि, यह व्रत केवल आहार का नहीं, बल्कि विचार और व्यवहार की शुद्धि का भी पर्व है।

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Azad Jayanti 2026: जयंती विशेष: चन्द्रशेखर आजाद के जीवन की ऐसी घटनाएं, जिन्हें हर युवा को जानना चाहिए

A photo reflecting the great freedom fighter Chandrashekhar Azads love for India, on the occasion of his birth anniversary

Chandra Shekhar Azad Biography: भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में कई नायक हुए, लेकिन पंडित चन्द्रशेखर 'आजाद' का व्यक्तित्व अद्वितीय है। वे केवल एक महान क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि आत्मसम्मान, संगठन कुशलता और अटूट निष्ठा के प्रतीक थे। उनका साहस, अनुशासन और नेतृत्व आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के युवाओं के लिए आजाद का जीवन केवल वीरता की कहानियों तक सीमित नहीं है; यह इस बात का अध्ययन है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में चरित्र का निर्माण कैसे किया जाता है। 

 

चन्द्रशेखर आजाद जयंती 2026 पर जानें उनके जीवन की प्रेरक घटनाएं, साहस, बलिदान, संघर्ष और ऐसे अनसुने तथ्य जो हर युवा को प्रेरित करते हैं।

 

1. 'आजाद' नाम का जन्म: 

1921 के असहयोग आंदोलन के दौरान मात्र 15 वर्ष का एक किशोर पुलिस की गिरफ्त में आया। अदालत में जब अंग्रेज जज ने सवाल पूछे, तो उस बालक के उत्तर ऐतिहासिक थे:

 

नाम: 'आजाद'

पिता का नाम: 'स्वतंत्रता'

पता: 'जेलखाना'

 

जज ने क्रुद्ध होकर 15 कोड़ों की सजा सुनाई। उस समय हर कोड़े की मार पर चमड़ी उधड़ जाती थी, लेकिन वह किशोर हर मार के साथ 'भारत माता की जय' का हुंकार भरता रहा।

 

* यह घटना केवल एक बच्चे के दुस्साहस की नहीं है। यह दर्शाती है कि जब कोई व्यक्ति अपने आत्म-बोध और राष्ट्र-बोध को पहचान लेता है, तो शारीरिक दर्द या भय उसके सामने बौना साबित हो जाता है। युवाओं के लिए सीख यह है कि अपने सिद्धांतों के लिए खड़े होने का साहस उम्र का मोहताज नहीं होता।

 

2. काकोरी कांड और संगठन पुनर्निर्माण

सन् 1925 का काकोरी ट्रेन एक्शन या काकोरी कांड क्रांतिकारी आंदोलन की महत्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद जब राम प्रसाद बिस्मिल्ला, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां और अन्य प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तो ऐसा लगा कि संगठन समाप्त हो जाएगा।

आजाद ने न केवल खुद को गिरफ्तारी से बचाया, बल्कि बिखर चुके आंदोलन को समेटा। उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) को पुनर्गठित कर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे युवाओं को जोड़कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का रूप दिया।

 

* आजाद केवल बंदूक उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे, वे एक बेहतरीन संगठनकर्ता और रणनीतिकार थे। जब सब कुछ बिखर रहा था, तब नेतृत्व संभालना और नए विचार यानी समाजवाद को जोड़कर संगठन को आगे बढ़ाना उनकी बौद्धिक क्षमता और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

 

3. साधु के वेश में ओरछा प्रवास

काकोरी के बाद जब अंग्रेजों की सीआईडी आजाद के पीछे पड़ी थी, तब वे मध्य प्रदेश में ओरछा के जंगलों यानी सातार नदी के किनारे 'हरिशंकर ब्रह्मचारी' के नाम से छिपकर रहे। वहां वे स्थानीय बच्चों को पढ़ाते थे, कुश्ती सिखाते थे और साथ ही अपने साथियों को निशानेबाज़ी का प्रशिक्षण देते थे।

 

* इस दौर से उनके कठोर आत्म-नियंत्रण और परिस्थितियों के अनुकूल खुद को ढालने की क्षमता का पता चलता है। एक क्रांतिकारी का जीवन केवल उत्तेजना का नहीं, बल्कि लंबे धैर्य और अनुशासन का नाम है- यह सबक आज के उस युवा के लिए जरूरी है जो तुरंत परिणाम की अपेक्षा रखता है।

 

4. अलफ्रेड पार्क में अंतिम संघर्ष

प्रयागराज/ इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में जब मुखबिरी के कारण पुलिस ने उन्हें घेर लिया, तब आजाद के पास पिस्टल में केवल कुछ गोलियां बची थीं। उन्होंने अपने साथी सुखदेव राज को सुरक्षित बाहर निकाला और अकेले पूरी पुलिस टुकड़ी का सामना किया। जब अंतिम गोली बची, तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को याद किया- 'दुश्मन की गोली का सामना हम करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।' उन्होंने वह अंतिम गोली स्वयं को मार ली और जीवित रहते कभी अंग्रेजों के हाथ न आने का अपना वादा पूरा किया।

 

* आजाद का अंतिम क्षण किसी पराजय का नहीं, बल्कि अंतिम विजय का प्रतीक था। उन्होंने मृत्यु का वरण अपनी शर्तों पर किया। यह घटना सिखाती है कि व्यक्ति का जीवन कितना लंबा है, यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि वह अपने जीवन के मूल्यों और प्रतिज्ञाओं के प्रति कितना निष्ठावान रहता है।

 

आज के युवाओं के लिए संदेश

चन्द्रशेखर आजाद का जीवन आज के दौर में इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वे किसी बाहरी शक्ति से ज्यादा अपने विचारों और आत्म-सम्मान के प्रति जवाबदेह थे।

 

स्पष्ट उद्देश्य: आजाद के जीवन में कोई भ्रम यानी कंफ्यूजन नहीं था। उनका लक्ष्य भारत की स्वाधीनता था, और उनका हर कदम उसी ओर उठा।

 

नेतृत्व क्षमता: एक सच्चे नेता की तरह उन्होंने खुद को कभी आगे नहीं रखा, बल्कि अपने साथियों- भगत सिंह आदि को वैचारिक रूप से आगे बढ़ने का पूरा अवसर दिया।

 

स्वाभिमान: उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके।

 

चन्द्रशेखर आजाद का इतिहास पढ़ना केवल बीते हुए समय को याद करना नहीं है, बल्कि अपने अंदर उस 'अजेय भावना' को जगाना है जो किसी भी कठिनाई के आगे झुकने से इंकार कर देती है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: लोकमान्य तिलक जयंती 2026: जीवन परिचय, इतिहास, महत्व और अनसुने तथ्य

अपनी Pocket Money से बेजुबानों का पेट भरता है ये 10वीं का छात्र | Young Boy feeding birds

राजस्थान के भीलवाड़ा के हिमांशु अपनी पॉकेट मनी से हर दिन पक्षियों के लिए दाना, फल और पानी की व्यवस्था करते हैं। 30 दिनों के एक छोटे से चैलेंज से शुरू हुई उनकी पहल आज 100 दिनों के सफ़र में बदल चुकी है। शुरुआत में लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन आज उनकी कहानी कई लोगों को बेजुबान पक्षियों की मदद करने के लिए प्रेरित कर रही है।
अगर आपको भी यह कहानी पसंद आए, तो अपने घर की छत या बालकनी में पक्षियों के लिए थोड़ा-सा दाना और एक कटोरी पानी ज़रूर रखें।

@himanshu_sahu_7773

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Guru Purnima 2026 Date: कब है गुरु पूर्णिमा? कुंडली से गुरु दोष दूर करने के लिए इस दिन कर सकते हैं 5 उपाय

Guru Purnima 2026 Date: हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह में आने वाली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह पूर्णिमा सभी पूर्णिमा में महत्वपूर्ण मानी गई है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस तिथि पर किए गए दान-पुण्य द्वारा व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है। गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु का आदर-सत्कार करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। गुरु पूर्णिमा यानि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन महाभारत और वेदों के रचयिता महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। इस वजह से इस दिन वेद व्यास जयंती मनाते हैं। यह दिन कुंडली के गुरु दोष को दूर करने का भी एक अच्छा अवसर है। इस साल आषाढ़ पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई को शाम 6:18 बजे से शुरू होगी और यह 29 जुलाई को रात 8:05 बजे तक मान्य होगी। उदयातिथि के अनुसार, गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई बुधवार को मनाया जाएगा।

गुरु पूर्णिमा 2026 मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त : प्रात: 04:17 बजे से लेकर प्रात: 04:59 बजे तक

लाभ-उन्नति मुहूर्त : सुबह 05:41 बजे से सुबह 07:22 बजे तक

अमृत-सर्वोत्तम : मुहूर्त सुबह 07:22 बजे से सुबह 09:04 बजे तक

शुभ-उत्तम मुहूर्त : सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक

चर-सामान्य मुहूर्त : दोपहर 03:51 बजे से शाम 05:32 बजे तक

लाभ-उन्नति मुहूर्त : शाम 05:32 बजे से शाम 07:14 बजे तक

प्रीति योग और उत्तराषाढा नक्षत्र में गुरु पूर्णिमा

इस साल की गुरु पूर्णिमा प्रीति योग और उत्तराषाढा नक्षत्र में है। प्रीति योग प्रात:काल से लेकर रात के 11 बजकर 58 मिनट तक है, उसके बाद से आयुष्मान योग बनेगा। प्रीति योग के स्वामी ग्रह बुध और देवता भगवान विष्णु हैं। यह योग नए रिश्तों की शुरुआत और विवादों के निपटारे के लिए उत्तम माना जाता है। इस दिन उत्तराषाढा नक्षत्र सुबह से लेकर दोपहर 03:37 पी एम तक है, उसके बाद से श्रवण नक्षत्र है।

कुंडली से गुरु दोष दूर करने के अचूक उपाय

कुंडली में गुरु कमजोर या पीड़ित हो, तो व्यक्ति के विवाह, करियर, शिक्षा और मान-सम्मान में बाधाएं आने लगती हैं। गुरु पूर्णिमा का दिन गुरु दोष के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। इस दिन आप निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं:

  • गुरु पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की संयुक्त पूजा करें। पूजा में पीले फूल, पीले फल, चंदन, पंचामृत और बेसन के लड्डू अर्पित करें। इस दिन घर पर सत्यनारायण भगवान की कथा सुनना या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है।
  • पूजा के समय पीले हकीक या तुलसी की माला से `ॐ बृं बृहस्पतये नमः` और `ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः` मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें।
  • गुरु पूर्णिमा पर किसी मंदिर या जरूरतमंद को पीले रंग की वस्तुएं दान करें। जैसे— चने की दाल, हल्दी, पीला अनाज, केसर, पीली मिठाइयां या पीले वस्त्र। इससे गुरु ग्रह मजबूत होते हैं।
  • यदि कुंडली में गुरु अत्यधिक कमजोर है, तो इस दिन (और उसके बाद हर गुरुवार को) नहाने के पानी में एक चुटकी हल्दी मिलाकर स्नान करें। स्नान के पश्चात पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
  • गुरु पूर्णिमा के दिन शिवलिंग पर चने की दाल के 108 साबुत दाने “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए एक-एक करके अर्पित करें। इससे भगवान शिव के साथ-साथ विष्णु जी की भी असीम कृपा मिलती है।

Devshayani Ekadashi 2026: हरिशयनी एकादशी से चार माह के लिए लग जाएगी मांगलिक कार्यों पर रोक, इस विधि से कराएं भगवान विष्णु को शयन

Devshayani Ekadashi 2026: हरिशयनी एकादशी से चार माह के लिए लग जाएगी मांगलिक कार्यों पर रोक, इस विधि से कराएं भगवान विष्णु को शयन

Devshayani Ekadashi 2026: हिंदू धर्म एकादशी तिथि को अत्यंत महत्वपर्णू माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है और माना जाता है कि यह व्रत करने वाले भक्तों पर सदैव श्री हरि की कृपा बनी रहती है। हिंदी महीनों के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत किया जाता है। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी के बाद अब शुक्ल पक्ष का देवशयनी या हरिशयनी एकादशी व्रत आने वाला है। इस तिथि को हिंदू धर्म में बहुत खास माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु इस दिन से चार माह की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद से चतुर्मास शुरू हो जाता है और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। इसे हम आषाढ़ी एकादशी, देवशयनी एकादशी, हरिशयनी या पद्मनाभा एकादशी के नाम से जानते हैं।

हरिशयनी एकादशी 2026: तिथि, मुहूर्त और पारण का समय

एकादशी तिथि का आरंभ: 24 जुलाई 2026 को सुबह 09:12 बजे से

एकादशी तिथि का समापन: 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 बजे तक।

अभिजीत मुहूर्त (पूजा का श्रेष्ठ समय): दोपहर 12:19 बजे से दोपहर 01:11 बजे तक।

गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:17 बजे से शाम 07:39 बजे तक।

व्रत पारण का समय: 26 जुलाई 2026 को सुबह 06:13 बजे से सुबह 08:50 बजे के बीच।

देवशयनी एकादशी पर इस विधि से कराएं श्री हरि को शयन

चूंकि इस दिन के बाद भगवान चार महीनों के लिए विश्राम करने जाते हैं, इसलिए उनका शयन प्रारंभ होने से ठीक पहले पूरे विधि-विधान से विदाई-पूजन करने का बड़ा महत्व है।

  • देवशयनी एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • इसके बाद अपने घर के मंदिर की साफ-सफाई करें।
  • एक पवित्र चौकी पर भगवान विष्णु की सुंदर प्रतिमा या तस्वीर को आसन देकर विराजमान करें।
  • भगवान नारायण को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें।
  • उन्हें पीला चंदन लगाएं, पीले फूल चढ़ाएं और तुलसी दल (जो एक दिन पहले तोड़ा गया हो) अर्पित करें।
  • भगवान के हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित करें।
  • इसके बाद प्रभु को पान और सुपारी भेंट करें।
  • धूप-दीप जलाकर श्रद्धा भाव से भगवान विष्णु की आरती उतारें।
  • सामर्थ अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएं या दान-दक्षिणा दें।
  • इसके बाद ही स्वयं फलाहार या व्रत का सात्विक भोजन ग्रहण करें।
  • देवशयनी एकादशी की रात को भगवान के भजनों और स्तुति का कीर्तन करना चाहिए।
  • अंत में, स्वयं के सोने से पहले प्रभु को प्रतीकात्मक रूप से विश्राम (शयन) कराएं।

पूजा में करें इस मंत्र का जाप

पूजा में भगवान को शयन कराने के लिए इस विशेष मंत्र का जाप करें।

‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्।

विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।’

मंत्र का अर्थ: हे संपूर्ण जगत के स्वामी! आपके सो जाने पर यह पूरा संसार सो जाता है और आपके जाग जाने पर ही यह संपूर्ण सृष्टि तथा समस्त चराचर जीव जाग उठते हैं।

Sawan Putrada Ekadashi Vrat 2026: सावन में आएगी श्रावण पुत्रदा एकादशी, संतान प्राप्ति के लिए इस विधि से करें पूजा और जानें जरूरी नियम

Sawan Putrada Ekadashi Vrat 2026: सावन में आएगी श्रावण पुत्रदा एकादशी, संतान प्राप्ति के लिए इस विधि से करें पूजा और जानें जरूरी नियम

Sawan Putrada Ekadashi Vrat 2026: सावन का महीना शुरू होने में अब कुछ ही दिन रह गए हैं। भगवान शिव के इस महीने में कई प्रमुख व्रत और पर्व मनाए जाते हैं। इनमें से एक है श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत। यह व्रत हर साल श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। इस साल यह व्रत 23 अगस्त के दिन किया जाएगा। यह तिथि और यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है।

पद्म पुराण के अनुसार, इस व्रत को करने से वाजपेय यज्ञ के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है और सभी परेशानियों व दोषों से मुक्ति मिलती है। जीवन में संतान सुख की कामना रखने वाले दंपतियों के लिए यह व्रत विशेष अहमियत रखता है। कई विवाहित जोड़े सावन पुत्रदा एकादशी व्रत को बड़ी श्रद्धा और विध-विधान के साथ रखते हैं। वे भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी से संतान सुख के लिए आशीर्वाद, स्वास्थ्य और परिवार की खुशी की प्रार्थना करते हैं।

सावन पुत्रदा एकादशी व्रत 2026 शुभ मुहूर्त और पारण का समय

एकादशी तिथि प्रारंभ : 23 अगस्त 2026 को दोपहर 03:30 बजे से

एकादशी तिथि समाप्त : 24 अगस्त 2026 को शाम 05:48 बजे तक

व्रत पारण का समय (अगले दिन): 24 अगस्त के व्रत का पारण 25 अगस्त को किया जाएगा

संतान प्राप्ति के लिए पूजा विधि

  • सावन पुत्रदा एकादशी के दिन पूजा स्थल पर भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति रखें।
  • तुलसी के पत्ते, फल, धूप, दीया और पानी चढ़ाएं।
  • पूजा में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करते रहें।
  • दंपत्ति इस मंत्र का 108 बार जाप कर सकते हैं और सावन पुत्रदा एकादशी व्रत कथा भी सुन सकते हैं।
  • इस दिन चावल, अनाज, दाल, प्याज, लहसुन, मांसाहारी भोजन या शराब से पूरी तरह दूर रहें।

सावन पुत्रदा एकादशी के नियम

  • प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विधि-विधान से पूजन करें।
  • व्रत का संकल्प लेकर दिनभर सात्विकता और संयम का पालन करें।
  • भगवान विष्णु को तुलसी दल, पीले पुष्प, पंचामृत और फल अर्पित करें।
  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें।
  • विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता या एकादशी व्रत कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है।
  • जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दें।
  • दंपति एक साथ भगवान विष्णु से स्वस्थ, संस्कारी और सुखी संतान की कामना करें।

सावन पुत्रदा एकादशी पर क्या ना करें?

  • इस दिन तामसिक भोजन, लहसुन, प्याज, मांस और मदिरा का सेवन ना करें।
  • क्रोध, कटु वचन, झूठ और किसी का अपमान करने से बचें।
  • व्रत के दौरान नकारात्मक विचारों और विवाद से दूर रहें।
  • बिना कारण किसी जीव को कष्ट ना पहुंचाएं।
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से भी परहेज करना चाहिए।

Gauri Vrat 2026 Date: आषाढ़ माह में कब किया जाएगा गौरी व्रत, जानें तारीख, मुहूर्त और समापन की तिथि

कविता: लाल किला तुझे सलाम

A scene depicting the importance of our national flag, the tricolor, flying at the Red Fort in the country's capital, Delhi

देश की राजधानी दिल्ली में,

यमुना के तट पर

अडिग अविचल चुपचाप

खड़ा है लाल किला। 

 

इस्लामी फ़ारसी तैमूरी

और हिन्दू शैलियों की

मिली जुली वास्तुकला का

बेजोड़ नमूना यह किला

बलुआ लाल पत्थरों की चादर

से खुद को ढांपे

अपने जख्मों को छुपाए 

हंसता हुआ मिलता है

अपने दर्शनार्थियों-सैलानियों से। 

 

अपने निर्माता शहंशाह शाहजहां से

लेकर अंतिम मुगल बादशाह

जर्जर बहादुर शाह जफर तक की

जीवित मृत कहानियों का

प्रत्यक्ष गवाह यह किला

आज भारत की आन है बान है शान है

और अनमोल धरोहर भी है। 

 

आजादी ए जश्न का आधिकारिक 

आंखों देखा हाल सर्व प्रथम

इसी ने सुनाकर

हमें किया था अभिभूत। 

 

इसके गौरव और पतन की कथा

अतीत की गलियों से निकलकर

वर्तमान के चौराहों पर आकर हमें

करने लगती है उद्वेलित। 

 

इसकी लाल आंखों ने

न जाने कितने

शौर्य के सिपाहियों

क्रांति दूतों, बलिदानियों के लहू से

कालिंदी को

लाल होते हुए देखा है। 

 

आजादी के मोल का

स्मरण कराते इस किले पर

फहराता हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा

अहर्निश हमें करता रहता है

रोमांचित-उल्लासित। 

लाल किला तुझे सलाम। 

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है…)

 

लॉटरी टिकट और लियोनेल मेसी के साथ एक फोटोशूट ने कैसे बदल दी लामिन यमाल की तकदीर?

“जिस बच्चे को कभी खुद लियोनेल मेसी ने अपने हाथों से नहलाया था, आज वही बच्चा मैदान पर मेसी के साम्राज्य को चुनौती देने के लिए तैयार है। यह कहानी सिर्फ फुटबॉल की नहीं है,यह कहानी है गरीबी की मार, माता-पिता के आंसुओं, वफादारी के एक अनोखे वादे और उस किस्मत की… जिसने 5 महीने के एक नवजात को दुनिया का अगला सुपरस्टार चुन लिया था।”

फुटबॉल की दुनिया में जब कोई खिलाड़ी मैदान पर उतरता है, तो वह सिर्फ अपनी टीम के लिए नहीं, बल्कि अपने अतीत, अपने संघर्षों और अपने माता-पिता के आंसुओं के बदले के लिए दौड़ रहा होता है। स्पेन के 19 वर्षीय सनसनी लामिन यमाल (Lamine Yamal) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज दुनिया उनके पैरों का जादू देख रही है, लेकिन इस जादू के पीछे छुपा है एक बेहद भावुक कर देने वाला अतीत।

माता-पिता का संघर्ष और नाम के पीछे का 'रहस्य'

यमाल का जन्म एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता मुनीर नसराउई मोरक्को के रहने वाले हैं और मां शीला एबाना इक्वेटोरियल गिनी की हैं। दोनों बचपन में ही गरीबी के कारण स्पेन के कैटालोनिया में आकर बस गए थे।

यमाल का पूरा नाम ‘लामिन यमाल नसराउई एबाना’ है। दिलचस्प बात यह है कि खेल की दुनिया में वह जिस 'यमाल' नाम का उपयोग करते हैं, वह उनका सरनेम (उपनाम) नहीं, बल्कि उनके नाम का ही हिस्सा है।

नाम के पीछे की भावुक कहानी: स्पैनिश मीडिया के अनुसार, जब यमाल के पिता पाई-पाई के लिए मोहताज थे, तब उनके दो दोस्तों ने उनकी आर्थिक मदद की थी। पिता ने उस तंगी के दिनों में आभार व्यक्त करने के लिए वादा किया था कि वे अपने बेटे का नाम उन दोस्तों के नाम पर रखेंगे।

  • अरबी भाषा में ‘लामिन’ का अर्थ होता है- ‘ईमानदार या भरोसेमंद’।
  • ‘यमाल’ (जमाल) का अर्थ होता है- ‘सुंदरता या लालित्य’।

अपनी जड़ों को नहीं भूले: क्या है '3-0-4' का राज?

यमाल का बचपन बार्सिलोना के एक ऐसे इलाके में बीता जिसे प्रवासियों का गढ़ और 'वर्किंग क्लास' (कामकाजी वर्ग) का इलाका माना जाता है—रोकाफोंडा। यहाँ कदम-कदम पर अभाव थे, लेकिन सपने बड़े थे।

“आज जब यमाल मैदान पर गोल करते हैं, तो अपनी उंगलियों से ‘3-0-4’ का इशारा करते हैं। यह कोई स्टाइलिश पोज़ नहीं है, बल्कि रोकाफोंडा इलाके का पोस्टकोड (08304) है। यमाल दुनिया को बताना चाहते हैं कि वे चाहे जितने बड़े स्टार बन जाएं, अपनी झुग्गी-झोपड़ी और अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलेंगे।”

यमाल अपने माता-पिता के बलिदानों को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं, “बेहद कम संसाधनों के बावजूद मेरे माता-पिता ने जिस तरह मुझे फुटबॉल खेलने में मदद की, उसका कर्ज मैं जीवन में कभी नहीं चुका पाऊंगा।”

जब 5 महीने के यमाल से टकराई किस्मत: मेसी के साथ वो जादुई मुलाकात

फुटबॉल इतिहास में कुछ संयोग ऐसे होते हैं जिन पर यकीन करना मुश्किल होता है। एक तरफ सर्वकालिक महानतम फुटबॉलर लियोनेल मेसी हैं और दूसरी तरफ बार्सिलोना के राइट विंग पर उनके उत्तराधिकारी के रूप में उभर रहे लामिन यमाल। आगामी बड़े मुकाबले में जब दोनों टीमें आमने-सामने होंगी, तो इतिहास रचेगा। लेकिन इनका रिश्ता आज का नहीं, बल्कि दो दशक पुराना है।

साल 2007 में, जब मेसी महज 20 साल के थे और बार्सिलोना की टीम में अपनी जगह बना रहे थे, तब लामिन यमाल सिर्फ 5 महीने के एक मासूम बच्चे थे।

  • कैसे हुई मुलाकात? यमाल के माता-पिता ने कैटलन अखबार ‘स्पोर्ट’ और अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘यूनिसेफ’ द्वारा आयोजित एक लॉटरी (रैफल) जीती थी। इनाम यह था कि विजेता के बच्चे का फोटोशूट बार्सिलोना के किसी सीनियर खिलाड़ी के साथ होगा।
  • किस्मत का खेल: भाग्यवश, उस दिन लामिन यमाल के परिवार की जोड़ी लियोनेल मेसी के साथ बनी। यह फोटोशूट कैंप नोउ स्टेडियम के ड्रेसिंग रूम में हुआ।

फोटोग्राफर का खुलासा: शर्मीले मेसी और खुशमिजाज यमाल

उस ऐतिहासिक तस्वीर को खींचने वाले फोटोग्राफर जोन मोनफोर्ट बताते हैं कि मेसी स्वभाव से बेहद शर्मीले और अंतर्मुखी थे। जब उनके सामने अचानक एक छोटा बच्चा लाया गया, तो वह काफी असहज हो गए थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि बच्चे को कैसे संभालें। लेकिन यमाल एक खुशमिजाज बच्चा था और जल्द ही मेसी ने भी उसे गोद में ले लिया।

खुद फोटोग्राफर को भी 2024 तक यह नहीं पता था कि वह बच्चा लामिन यमाल था! इस राज से पर्दा तब उठा जब यमाल के पिता ने इंस्टाग्राम पर उस तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा—

“दो दिग्गजों की शुरुआत” (The beginning of two legends).

आज लामिन यमाल का इतनी कम उम्र में विश्व स्तर पर चमकना और मेसी का इस उम्र में भी शीर्ष पर बने रहना, फुटबॉल के दो अलग-अलग युगों का मिलन है। यमाल की यह कहानी साबित करती है कि अगर आपके पास प्रतिभा है और माता-पिता का आशीर्वाद, तो किस्मत भी आपके सामने घुटने टेक देती है। रोकाफोंडा की गलियों से निकलकर ग्लोबल आइकॉन बनने का यमाल का यह सफर आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

Bhadli Navami 2026 Date: कब है भड़ली नवमी और क्यों मनाई जाती है? इस दिन बिना अच्छा मुहूर्त देखे कर सकते हैं कोई भी शुभ कार्य

Bhadli Navami 2026 Date: भड़ली नवमी को भड़रिया नवमी या कंदर्प नवमी भी कहते हैं। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। हिंदू धर्म में इस दिन का बहुत बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इस दिन को अक्षय तृतीया और देवउठनी एकादशी के समान ही ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है। इसका मतलब यह है कि इस पूरे दिन ग्रह और नक्षत्र की स्थिति इतनी अनुकूल होती है कि किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए पंचांग या ज्योतिषी से अलग से मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं होती।

कब मनाई जाएगी भड़ली नवमी 2026?

वैदिक पंचांग के अनुसार तिथियों का समय कुछ इस प्रकार रहेगा:

नवमी तिथि प्रारंभ : 22 जुलाई 2026 को सुबह 05:16 बजे से

नवमी तिथि समाप्त : 23 जुलाई 2026 को सुबह 07:03 बजे तक

उदयातिथि के नियमों के अनुसार नवमी तिथि का सूर्योदय 22 जुलाई को हो रहा है, इसलिए मुख्य रूप से भड़ली नवमी का त्योहार और पूजा इसी दिन संपन्न की जाएगी।

भड़ली नवमी 2026 धार्मिक महत्तव

भड़ली नवमी के ठीक दो दिन बाद ‘देवशयनी एकादशी’ आती है, जिससे चातुर्मास की शुरुआत होती है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस अवधि में विवाह, मुंडन, जनेऊ या गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते क्योंकि इस दौरान उनका प्रत्यक्ष आशीर्वाद नहीं मिल पाता। इसलिए, भड़ली नवमी को विवाह और अन्य शुभ कार्यों के लिए सीजन का आखिरी दिन मानकर धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा, इसके बाद भगवान विष्णु अगले चार महीनों के लिए विश्राम अवस्था में चले जाते हैं, इसलिए श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। लोग व्रत रखते हैं, मंदिरों में जाते हैं और आने वाले चार महीनों के लिए भगवान का संरक्षण व आशीर्वाद मांगते हैं। यह दिन आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का अंतिम दिन भी होता है। इस वजह से तांत्रिक और आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों के लिए मां दुर्गा (शक्ति) की पूजा करने और हवन अनुष्ठान संपन्न करने के लिहाज से यह बेहद पवित्र तिथि मानी जाती है।

इस दिन से करना माना जाता है शुभ

  • गुप्त नवरात्रि का अंतिम दिन होने के कारण इस दिन कन्या पूजन करना और गरीबों को दान देना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • यदि किसी के विवाह में रुकावटें आ रही हों, तो भड़ली नवमी के अबूझ मुहूर्त का लाभ उठाकर विवाह संपन्न कराया जाता है।
  • नया वाहन खरीदना, सोने-चांदी की खरीदारी करना या नए घर में प्रवेश करने के लिए भी लोग इस दिन को चुनते हैं।

Devshayani Ekadashi 2026: 3 बड़े योगों में किया जाएगा देवशयनी एकादशी का व्रत, जानें सही तारीख, मुहूर्त और पारण का समय

Budh Mangal Dashank Yog 2026: बुध और मंगल ने बनाया दशांक योग, जानें किन राशियों के पैसों और करियर में लाएगा धांसु बदलाव

Budh Mangal Dashank Yog 2026: ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की एक-दूसरे के साथ युति के साथ ही दूरी भी काफी मायने रखती है। ग्रहों की एक-दूसरे से खास दूरी पर भी कुछ दुर्लभ और पावरफुल योगों का निर्माण होता है। ऐसा ही एक योग इस समय बुध और मंगल ग्रह की स्थिति ने बनाया है। इस योग का नाम दशांक योग है। इसे ज्योतिष के सबसे पावरफुल योगों में से एक माना जाता है। इस समय ग्रहों के राजकुमार बुध और सेनापति मंगल एक-दूसरे से 36 डिग्री के कोण पर स्थित होकर दशांक योग का निर्माण कर रहे हैं।

वैदिक ज्योतिष में बुध को बुद्धिमत्ता, वाणी, व्यापार, संचार, गणित और लेखन का कारक माना जाता है। वहीं, मंगल ऊर्जा, साहस, पराक्रम, नेतृत्व क्षमता, भूमि से जुड़े कार्यों और त्वरित निर्णय लेने की शक्ति का प्रतीक है। जब ये दोनों ग्रह किसी खास कोणीय स्थिति में आते हैं, तो व्यक्ति की सोच, निर्णय क्षमता और कार्य करने की शैली में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिलता है। इस योग के प्रभाव से 6 राशियों के पैसों की स्थिति और करियर में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।

दशांक योग क्या है?

जब दो ग्रह लगभग 36 डिग्री की दूरी पर होते हैं, तब दशांक योग बनता है। यह योग 16 जुलाई 2026 की रात 8:27 बजे बुध और मंगल के बीच 36 डिग्री का कोण बनने पर निर्मित हुआ है। यह संबंध रचनात्मकता, तेज दिमाग, नवाचार और अचानक मिलने वाले अवसरों का संकेत देता है। इस योग का प्रभाव लगभग तीन दिनों तक, यानी 19 जुलाई 2026 तक प्रमुख रूप से बना रहेगा। इस दौरान बुध अपनी ही राशि मिथुन में वक्री अवस्था में रहेंगे, जबकि मंगल वृषभ राशि में गोचर कर रहे होंगे।

6 राशियों के जातक पाएंगे बड़े अवसर

वृषभ राशि : मंगल आपकी राशि में होने से आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी। बुध धन से जुड़े मामलों को मजबूत करेंगे, जिससे व्यापार में लाभ, नए क्लाइंट और आर्थिक अवसर मिल सकते हैं। रुके हुए कामों में भी प्रगति के संकेत हैं। हनुमान चालीसा का पाठ करें और गुड़ का दान करें।

मिथुन राशि : बुध के अपनी ही राशि में होने से यह योग आपके लिए विशेष रूप से लाभकारी रहेगा। आत्मविश्वास बढ़ेगा और रुके हुए कार्य पूरे होंगे। मीडिया, लेखन, आईटी, बैंकिंग और संचार से जुड़े लोगों को नए मौके मिल सकते हैं। भगवान गणेश की पूजा करें और ‘ॐ बुं बुधाय नमः’ मंत्र का जाप करें।

सिंह राशि : यह योग आय और लाभ के अवसर बढ़ाएगा। पुराने अटके हुए पैसे मिल सकते हैं और प्रभावशाली लोगों से संपर्क मजबूत होगा। व्यापार में नए प्रोजेक्ट मिलने की संभावना है। सूर्य को जल अर्पित करें और तांबे का दान करें।

कन्या राशि : कन्या राशि वालों के लिए करियर में उन्नति के संकेत हैं। नौकरी में नई जिम्मेदारी, प्रमोशन या बेहतर अवसर मिल सकते हैं। आपकी योजनाओं की सराहना होगी। हरी मूंग का दान करें और गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करें।

मकर राशि : यह योग प्रतियोगी परीक्षाओं, इंटरव्यू और कानूनी मामलों में सफलता दिला सकता है। शत्रुओं पर विजय और कार्यक्षेत्र में प्रशंसा मिलने के योग हैं। हनुमान जी की पूजा करें और मसूर दाल का दान करें।

कुंभ राशि : पंचम भाव सक्रिय होने से विद्यार्थियों और रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े लोगों को लाभ होगा। एकाग्रता बढ़ेगी और प्रेम संबंधों में भी सुधार आएगा। भगवान विष्णु की पूजा करें और जरूरतमंद छात्रों को पुस्तकें दान करें।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई सामग्री जानकारी मात्र है। हम इसकी सटीकता, पूर्णता या विश्वसनीयता का दावा नहीं करते। कृपया किसी भी कार्रवाई से पहले विशेषज्ञ से संपर्क करें

Labh Drishti Yog: शनि-मंगल इस दिन बनाने जा रहे हैं लाभ-दृष्टि योग, 4 राशियों के जातकों को कराएंगे बंपर कमाई