Hartalika Teej Puja 2026: हरतालिका तीज पर राशि के अनुसार पूजा करने से मिलेगा अखंड सौभाग्य और दांपत्य सुख, जानें आपकी राशि के लिए क्या है सही

Hartalika Teej Puja 2026: हर साल हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। इस साल यह व्रत 14 सितंबर, सोमवार को किया जाएगा। यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए प्रेम, समर्पण और दांपत्य सुख से जुड़ा प्रमुख पर्व है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं और पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं। इस दिन पूजा के साथ ही दान का भी विशेष महत्व है। ज्योतिष मान्ताओं के अनुसार, हरतालिका तीज पर राशि अनुसार पूजा और दान करने से व्रत का पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है।

राशि के अनुसार ऐसे करें शिव-पार्वती की पूजा

मेष राशि : मेष राशि के जातक भगवान शिव को पंचामृत से स्नान कराने के बाद रेशमी वस्त्र अर्पित करें। शिव-पार्वती की आराधना करते हुए सुखी दांपत्य जीवन की कामना करना शुभ माना गया है।

वृष राशि : वृष राशि वाले शिव-पार्वती की पूजा में गुलाब का पुष्प और इत्र अर्पित करें। इसके बाद धूप दिखाकर भगवान से परिवार में प्रेम, सौहार्द और सुख-शांति की प्रार्थना करें।

मिथुन राशि : मिथुन राशि के जातक हरे रंग के वस्त्र धारण कर पूजा कर सकते हैं। माता पार्वती को हल्दी और भगवान शिव को सफेद चंदन अर्पित करने की धार्मिक परंपरा बताई गई है।

कर्क राशि : कर्क राशि वालों के लिए पूजा के बाद भगवान शिव का श्रृंगार करना और ॐ नमः शिवाय का जाप करना शुभ माना गया है। श्रद्धा के साथ शिव-पार्वती की आराधना कर दांपत्य सुख की कामना करें।

सिंह राशि : सिंह राशि के जातक शिव-पार्वती को पीले पुष्पों की माला अर्पित करें। इसके बाद रुद्राष्टकम का पाठ करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह पूजा मनोकामना और पारिवारिक सुख के लिए शुभ मानी जाती है।

कन्या राशि : कन्या राशि वाले भगवान शिव को बेलपत्र और दूर्वा अर्पित करें। तीज के अवसर पर मेहंदी लगाना भी सुहाग और सौभाग्य से जुड़ी परंपरा मानी जाती है।

तुला राशि : तुला राशि के जातक भगवान महादेव का पंचामृत से अभिषेक करें। इसके साथ सुहाग की सामग्री का दान करने की परंपरा है। इससे अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन में सुख की कामना की जाती है।

वृश्चिक राशि : वृश्चिक राशि वाले पीले वस्त्र धारण कर शिव-पार्वती की पूजा करें। भगवान शिव को दूर्वा अर्पित करना भी शुभ माना गया है। पूजा के दौरान परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।

धनु राशि : धनु राशि के जातक लाल वस्त्र धारण कर शिव-पार्वती की आराधना करें। पूजा में सुगंधित पुष्प अर्पित करना शुभ माना जाता है। श्रद्धा के साथ पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करें।

मकर राशि : मकर राशि वाले भगवान शिव को सफेद चंदन अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं। शिव-पार्वती की पूजा कर घर में सुख-शांति और दांपत्य जीवन में स्थिरता की प्रार्थना करें।

कुंभ राशि : कुंभ राशि के जातक गुलाबी वस्त्र धारण कर पूजा कर सकते हैं। महादेव को श्वेत पुष्प अर्पित कर शिव-पार्वती का ध्यान करें और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करें।

मीन राशि : मीन राशि वालों के लिए हरे वस्त्र धारण कर पूजा करने की परंपरा बताई गई है। माता पार्वती को हल्दी और भगवान शिव को सफेद चंदन अर्पित करें। इसके बाद परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु की कामना करें।

बिना बीज के खिलते हैं रहस्यमयी फूल, जानिए हनोल के महासू देवता मंदिर की खास बातें

बिना बीज के खिलते हैं रहस्यमयी फूल, जानिए हनोल के महासू देवता मंदिर की खास बातें

mahasu devta temple

उत्तराखंड के हनोल में स्थित महासू देवता मंदिर में दर्शनों के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां बिना बीज के रहस्यमयी फूल खिलते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से मंदिर में कामना करता है, उसे महासू महाराज पूरी करते हैं। मुख्‍यमंत्री पुष्कर धामी ने भी देहरादून आने वाले श्रद्धालुओं से मंदिर के दर्शन करने की अपील की। ALSO READ: उत्तराखंड की गोद में बसा अद्भुत श्री सिद्ध नरसिंह मंदिर: जानिए क्यों है खास?

 

सीएम धामी ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, जनपद देहरादून के जनजातीय अंचल जौनसार-बावर के हनोल में स्थित महासू देवता मंदिर देवभूमि की समृद्ध लोकसंस्कृति, प्राचीन परंपराओं और गहरी आस्था का अद्भुत प्रतीक है। श्रद्धालुओं की अटूट आस्था से जुड़ा यह पावन धाम जनजातीय क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को अपने में समेटे हुए है। देहरादून जनपद आगमन पर आप भी इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।

नगरास फूलों की फुलवारी

हनोल महासू देवता मंदिर परिसर में स्थित फुलवारी में नगरास के फूल खिलते हैं। इनका पूजा में बड़ा महत्व है। इस फुलवारी की एक बार खुदाई की जाती है। इसके बाद न कोई बीज बोए जाते हैं ना ही पौधे रोपे जाते हैं। इसके बावजूद नगरास उग आते हैं। कुछ समय बाद नगरास के पौधों में खूबसूरत और सुगंधित फूल खिल आते हैं। इन फूलों का देव पूजा में इस्तेमाल किया जाता है।

 

महासू देवता एक नहीं चार देवताओं का है सामूहिक नाम

महासू एक देवता नहीं, बल्कि 4 देवताओं का सामूहिक नाम है। यह चार भाई हैं। स्थानीय भाषा में महासू शब्द का अर्थ भगवान शिव से है। चारों महासू भाइयों में बाशिक महासू (मैंद्रथ), पवासी महासू (ठडियार), बूठिया महासू (हनोल) और चालदा महासू हैं। चालदा महासू चलायमान देवता हैं। ये सभी भगवान शिव के ही रूप माने जाते हैं।

 

धन के देवता कुबेर भी क्यों हार गए? गणपति बप्पा की वह कहानी जिसने सिखाया मनी मैनेजमेंट का पहला नियम!

दौलत इंसान की जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं, लेकिन जब इन्हीं चीजों का घमंड होने लगे तो परेशानी खड़ी हो सकती है। हिंदू धर्म की कई कथाओं में देवी-देवताओं के जरिए जीवन से जुड़ी ऐसी सीख बताई गई है, जो आज के समय में भी काम आ सकती है।

कहा जाता है कि कुबेर को अपनी दौलत पर बहुत घमंड हो गया था। अपनी संपत्ति दिखाने के लिए उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती को भोजन पर बुलाया, लेकिन भगवान गणेश उनके घर पहुंचे। गणपति बप्पा ने इतना भोजन किया कि कुबेर के भंडार का खाना भी कम पड़ने लगा। यह देखकर कुबेर को अपनी गलती का एहसास हुआ और उनका घमंड टूट गया। उन्होंने समझा कि धन कितना भी हो, उसका घमंड करना सही नहीं है और विनम्र रहना ही सबसे जरूरी है।

इस कहानी से मिलती है मनी मैनेजमेंट की सीख

1. दिखावे पर ज्यादा खर्च न करें

कुबेर ने अपनी दौलत दिखाने के लिए भगवान गणेश को भोज पर बुलाया था, लेकिन उनका यह तरीका ही उनके लिए सबक बन गया। आज भी कई लोग अपनी कमाई से ज्यादा दूसरों को दिखाने पर खर्च कर देते हैं। महंगे सामान, बड़ी पार्टियां या सिर्फ लोगों को प्रभावित करने के लिए किया गया खर्च हमेशा समझदारी नहीं होता। पैसा वहीं खर्च करना बेहतर है, जहां उसकी सच में जरूरत हो।

2. छोटी बचत ही बड़ी ताकत है

पैसा कमाना अच्छी बात है, लेकिन हर चीज सिर्फ ज्यादा से ज्यादा जमा करने के लिए नहीं होनी चाहिए। हमें अपनी जरूरत और चाहत के बीच का फर्क समझना चाहिए। बिना सोचे खर्च करना या सिर्फ दिखावे के लिए पैसा लगाना आगे चलकर परेशानी बढ़ा सकता है।

3. पैसे का घमंड न करें

कुबेर के पास अपार धन-संपत्ति थी, लेकिन इसी वजह से उनके मन में घमंड आ गया था। यह कथा समझाती है कि पैसा होने पर खुद को दूसरों से बड़ा समझना सही नहीं है। धन आज है तो कल कम भी हो सकता है, इसलिए उसे लेकर हमेशा विनम्र रहना चाहिए। असली बड़प्पन इस बात में है कि इंसान कैसा व्यवहार करता है।

4. पैसों का सही इस्तेमाल करें

धन का मतलब सिर्फ उसे अपने पास जमा करके रखना नहीं है। सही समय पर परिवार की जरूरत पूरी करना, मुश्किल वक्त के लिए बचत करना और जरूरतमंद की मदद करना भी पैसे का अच्छा इस्तेमाल माना जा सकता है। जब पैसा सही जगह लगाया जाता है, तो वह जीवन को आसान बनाने में मदद करता है।

5. विनम्र रहना सीखें

इस कथा की सबसे बड़ी सीख यही है कि धन और सफलता मिलने के बाद भी इंसान को अपने व्यवहार में सादगी रखनी चाहिए। पैसा किसी को बड़ा या छोटा नहीं बनाता, बल्कि उसका व्यवहार उसकी असली पहचान बताता है। सफलता मिलने पर दूसरों को कम समझने के बजाय विनम्र बने रहना जरूरी है।

यह प्लान आपको सुखमय जीवन जीने में मदद कर सकता है। इसलिए अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से खर्च करना बेहतर है। भगवान गणेश और धन के देवता कुबेर से जुड़ी एक कथा भी हमें यही समझाती है कि पैसा कितना भी हो, उसका घमंड करना सही नहीं है, बल्कि रोज की जिंदगी से सबक सीखना चाहिए।

Bhadrapada Amavasya Kab Hai 2026: 10 या 11 सितंबर, कब होगी भाद्रपद अमावस्या, जानें इस दिन कुशा को जमा करने का क्या है महत्व

Bhadrapada Amavasya Kab Hai 2026: हिंदू धर्म में भाद्रपद माह की अमावस्या तिथि को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या या पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है। पूरे साल में आने वाली 12 अमावस्या तिथियों में भाद्रपद अमावस्या का विशेष स्थान है। शास्त्रानुसार, इस दिन पूरे वर्ष भर के धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ, पिंडदान और तर्पण के लिए इस दिन पवित्र ‘कुश’ (एक विशेष प्रकार की घास) को जड़ सहित तोड़कर जमा किया जाता है। इस दिन तोड़ी गई कुश पूरे एक वर्ष तक पवित्र और उपयोग योग्य मानी जाती है।

हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह तिथि पितरों को समर्पित है और इस दिन गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान के बाद पितृ तर्पण और श्राद्ध किया जाता है। भाद्रपद अमावस्या के दिन तोड़ी जाने वाली कुशा घास का विशेष धार्मिक महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुश घास की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग नोक में भगवान शिव का वास माना गया है। यह अमावस्या पितरों की शांति, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इसके ठीक बाद पितृ पक्ष (श्राद्ध) का आगमन होता है।

भाद्रपद अमावस्या 2026 सही तारीख

पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे से शुरू हो रही है और यह 11 सितंबर को सुबह 8:56 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर देखा जाए तो 11 सितंबर को भाद्रपद की अमावस्या तिथि में सूर्योदय सुबह में 06:04 ए एम पर होगा, इसलिए भाद्रपद अमावस्या 11 सितंबर को होगी। लेकिन उस दिन पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि नहीं होगा क्योंकि अमावस्या तिथि सुबह 8:56 बजे ही खत्म हो जा रही है।

ऐसे में भाद्रपद की दर्श अमावस्या 10 सितंबर को है। दर्श अमावस्या के दिन पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि किया जाएगा। इस दिन कुशा ग्रहण करने की परंपरा को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। 11 सितंबर को भाद्रपद अमावस्या का स्नान और दान होगा।

पितरों के तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान का समय

10 सितंबर को दर्श अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि कार्य सुबह में 11:30 बजे से करें और दोपहर 02:30 बजे तक उसे पूर्ण कर लें। इस दिन ही पितरों के लिए पंचबलि कर्म, ब्राह्मण भोज आदि किया जा सकता है।

भाद्रपद अमावस्या 2026 स्नान मुहूर्त

11 सितंबर को भाद्रपद अमावस्या को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान सबसे उत्तम समय होता है। भाद्रपद अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त 04:32 ए एम से 05:18 ए एम तक है। इसके बाद अपनी क्षमता के अुनसार दान करें।

अमावस्या के दिन अपने सामर्थ्य अनुसार करें दान

अमावस्या के दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़ आदि का दान करने की परंपरा है। शाम के समय घर की साफ-सफाई कर दीपक जलाने और मां लक्ष्मी का स्मरण करने की भी मान्यता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार साफ-सुथरा और सात्त्विक वातावरण घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

कुश उखाड़ने के नियम

इस बार कुशाग्रहणी अमावस्या पर कुशा ग्रहण करने की विधि और उससे जुड़े नियमों का ध्यान रखना बेहद जरूरी माना गया है।

  • सूर्योदय के समय स्नान करके हाथ जोड़कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके कुश उखाड़ना चाहिए।
  • कुश को कभी भी लोहे या धातु के औजार (हंसिया/चाकू) से नहीं काटना चाहिए, केवल दाहिने हाथ से उखाड़ा जाता है।
  • कुश का अग्रभाग (नोक) टूटा हुआ या खंडित नहीं होना चाहिए।
  • कुश उखाड़ते समय पृथ्वी माता से अनुमति मांगने और “ॐ हूं फट् स्वाहा” अथवा “कुशाग्रवसते रुद्र…” मंत्र का जाप करने की परंपरा है।

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Hartalika Teej 2026: कई दुर्लभ संयोगों में इस साल मनेगा हरतालिका तीज व्रत, जानें इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त

Hartalika Teej 2026: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का व्रत विशेष स्थान रखता है। यह व्रत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस साल 14 सितंबर 2026 को यह व्रत किया जाएगा। इस साल हरतालिका तीज के व्रत में कई दुर्लभ संयोग बन रहे हैं, जैसे इसी दिन गणेश चतुर्थी भी मनाई जाएगी। साथ ही इस दिन सोमवार का दिन है, जो भगवान शिव को समर्पित है। हरतालिका तीज का व्रत अखंड सौभग्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं और कुंवारी कन्याएं दोनों ही निर्जला उपवास करती हैं। इस साल हरतालिका तीज व्रत के दिन रवि योग के साथ 3 शुभ योगों का भी निर्माण होगा। इससे यह दिन और भी शुभ फलदायी माना जा रहा है। आइए जानते हैं हरतालिका तीज पर बनने वाले शुभ संयोग और पूजा मुहूर्त के बारे में।

3 शुभ योग में हरतालिका तीज व्रत

हरतालिका तीज के दिन ब्रह्म योग, रवि योग और इंद्र योग बन रहे हैं। उस दिन ब्रह्म योग प्रात:काल से लेकर दोपहर 12:47 पी एम तक है, उसके बाद से इंद्र योग बनेगा। तीज और चतुर्थी पर रवि योग दोपहर में 01:55 पी एम से बनेगा और 15 सितंबर को सुबह 06:06 ए एम तक रहेगा।

हरतालिका तीज पर 4 अद्भुत संयोग

हरतालिका तीज की भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि 14 सितंबर को सुबह 07 बजकर 06 मिनट तक है। उसके बाद से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तिथि प्रारंभ हो जाएगी, जो 15 सितंबर को सुबह 7 बजकर 44 मिनट तक रहेगी। इस तरह 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी का उत्सव और हरतालिका तीज दोनों एक साथ मनाए जाएंगे। इस दिन सोमवार भी है, जो भगवान शिव की कृपा प्राप्ति का सुंदर अवसर है। इस दिन दक्षिण भारत का प्रमुख स्वर्ण गौरी व्रत भी है, जिसे गौरी हब्बा कहते हैं। यह व्रत कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में रखा जाता है, जिसमें देवी पार्वती की पूजा करते हैं।

हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी मुहूर्त

हरतालिका तीज की पूजा जहां प्रदोष काल में होगी। वहीं गणेश चतुर्थी की मूर्ति स्थापना और पूजा उससे पहले ही दिन में हो जाएगी।

हरतालिका तीज पूजा का समय : इस दिन सुबह भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा 06:05 बजे से 07:38 बजे के बीच होगी। जिनके यहां शाम की पूजा होती है, वे प्रदोष काल में 06:28 पी एम से पूजा करेंगे।

गणेश चतुर्थी पूजा का समय : गणेश चतुर्थी पूजा मुहूर्त 11:02 एम से लेकर दोपहर 1:31 पीएम तक है। इस समय में आप विधिपूर्वक गणेश जी की पूजा कर लें।

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Hartalika Teej Puja Vastu: 14 सितंबर को किया जाएगा हरतालिका तीज का व्रत, अखंड सौभाग्य और मनचाहा वर पाने के लिए सही दिशा में करें पूजा

Hartalika Teej Puja Vastu: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। सुहागिन महिलाएं ये अखंड सौभाग्य और सुख समृद्धि के लिए ये व्रत करती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने की कामना से इस व्रत को करती हैं। माना जाता है कि माना जाता है कि इस व्रत को करने से कन्याओं के विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और उन्हें सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।

यह व्रत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। इस साल यह व्रत 14 सितंबर 2026 को किया जाएगा। इस व्रत की हिंदू धर्म में बहुत महत्व है, इसलिए इसे करने के कुछ बेहद जरूरी नियम भी हैं। माना जाता है कि हरतालिका व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब पूजा के लिए अन्य बातों के अलावा वास्तु नियमों का भी पालन किया जाए। वास्तु शास्त्र के अनुसार, शुभ दिशा में बैठकर पूजा करने से शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

हरतालिका तीज 2026 तारीख

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत- 13 सितंबर को सुबह 07 बजकर 08 मिनट पर

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का समापन- 14 सितंबर को सुबह 07 बजकर 06 मिनट पर

उदया तिथि के अनुसार, हरतालिका तीज व्रत 14 सितंबर को किया जाएगा।

पूजा के लिए शुभ मानी जाती है ये दिशा

वास्तु शास्त्र के अनुसार, हरतालिका तीज की पूजा के दौरान महिलाओं का मुख उत्तर-पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि इस दिशा से घर में सकारात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। इस दिशा में पूजा करने से सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं को पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

इस दिशा का रखें ध्यान

पूजा के दौरान दक्षिण दिशा की तरफ मुख नहीं होना चाहिए। इस दिशा में पूजा करने से घर की शांति भंग हो सकती है और नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है, जिसका प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ सकता है। हरतालिका तीज के दिन इस दिशा में मुख करके पूजा करना मानसिक अशांति और आर्थिक उन्नति पर भारी पड़ सकता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, इस दिशा में पितरों का वास माना जाता है।

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Bhaum pradosh vrat 2026: भौम प्रदोष व्रत आज, मंगल दोष से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव को अर्पित करें ये खास चीजें

Bhaum pradosh vrat 2026: प्रदोष हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। यह तिथि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय मानी जाती है। इस दिन सच्ची श्रद्धा से उपवास करने वाले भक्तों को भगवान शिव और माता पार्वती का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन प्रदोष काल में पूजा का विधान है, इसलिए इसे प्रदोष व्रत कहा जाता है। वहीं, त्रयोदशी तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। ‘भौम’ का अर्थ मंगल ग्रह (या मंगलवार) से है। यह व्रत भगवान शिव, माता पार्वती और हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने तथा कर्ज एवं मंगल दोष से मुक्ति पाने के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव को कुछ खास चीजें अर्पित करने से मंगल दोष का प्रभाव कम होता है।

सितंबर 2026 भौम प्रदोष व्रत एवं मुहूर्त

तिथि : मंगलवार, 8 सितंबर 2026

त्रयोदशी तिथि प्रारंभ : 8 सितंबर 2026, दोपहर 02:42 बजे

त्रयोदशी तिथि समाप्त : 9 सितंबर 2026, दोपहर 12:30 बजे

प्रदोष पूजा मुहूर्त : शाम 06:43 बजे से रात 09:01 बजे तक

मंगल दोष मुक्ति के लिए भौम प्रदोष पर करें ये उपाय

शिवलिंग पर लाल चीजें अर्पित करें: प्रदोष काल में शिवलिंग पर शुद्ध जल व दूध अर्पित करने के बाद लाल चंदन, लाल कनेर के फूल या गुलाल चढ़ाएं। भगवान शिव को 11 या 21 बेलपत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘श्री राम’ लिखकर अर्पित करें।

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ : पूजन के दौरान ‘ऋणमोचक मंगल स्तोत्र’ या ‘मंगलाष्टक’ का पाठ करें। इससे मंगल के अशुभ प्रभाव समाप्त होते हैं।

हनुमान जी की उपासना : भौम प्रदोष पर हनुमान जी को चमेली का तेल और सिंदूर (चोला) चढ़ाएं। उन्हें गुड़, भुने चने या बूंदी का भोग लगाएं और हनुमान चालीसा अथवा सुंदरकांड का पाठ करें।

मंगल ग्रह के मंत्रों का जाप : मंगल दोष शांति के लिए कम से कम 108 बार `ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः` या `ॐ अं अंगारकाय नमः` मंत्र का जाप करें।

दान कार्य : पूजा के बाद किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को लाल रंग की वस्तुएं दान करें, जैसे— मसूर की दाल, गुड़, तांबे का बर्तन, लाल वस्त्र या अनार।

भौम प्रदोष व्रत पूजा विधि

  • सुबह स्नान करके लाल या स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  • सूर्यास्त के समय पुन: स्नान या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • शिवलिंग का जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और चंदन से अभिषेक करें।
  • हनुमान जी को गुड़-चने का भोग लगाएं और ‘ऋणमोचक मंगल स्तोत्र’ या सुंदरकांड का पाठ करें।
  • अंत में धूप-दीप जलाकर शिव जी और हनुमान जी की आरती करें।

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Hartalika Teej 2026: हरतालिका तीज हिंदू धर्म का एक प्रमुख और बेहद पवित्र त्यौहार है, जिसे शादीशुदा महिलाएं और अविवाहित कन्याएं पूरी आस्था और विधि-विधान से करती हैं। यह व्रत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं अच्छा घर और वर पाने की लालसा में यह व्रत करती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्यागकर कठोर तपस्या की थी। उन्होंने बालू (मिट्टी) का शिवलिंग बनाकर पूजा की थी। माता पार्वती के इस अनन्य समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इसी दिन उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, हरत और आलिका। इसमें हरत का अर्थ है हरण करना या छिपाना और आलिका अर्थात सहेली/सखी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती की सहेलियां उनका अपहरण करके उन्हें एक घने जंगल में ले गई थीं, ताकि उनके पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न कर दें। जंगल में रहकर ही उन्होंने यह तपस्या की थी, इसलिए इसे ‘हरतालिका तीज’ कहा जाता है।

कब किया जाएगा हरतालिका तीज व्रत 2026

साल 2026 में हरतालिका तीज व्रत सोमवार, 14 सितंबर 2026 को किया जाएगा। तृतीया तिथि के समय और पूजा के शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी निम्नलिखित है:

तिथि और मुहूर्त

तृतीया तिथि प्रारंभ : 13 सितंबर 2026, सुबह 07:08 बजे

तृतीया तिथि समाप्त : 14 सितंबर 2026, सुबह 07:06 बजे

प्रातःकाल पूजा का शुभ मुहूर्त : 14 सितंबर 2026, सुबह 06:12 बजे से 07:06 बजे तक

प्रदोष काल (संध्या) पूजा : 13 सितंबर 2026, शाम 06:00 बजे से रात 08:30 बजे तक

हरतालिका व्रत के प्रमुख नियम और परंपराएं

निर्जला व्रत : यह अत्यंत कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, जिसमें महिलाएं 24 घंटे से भी अधिक समय तक बिना पानी और भोजन के रहती हैं।

पार्थिव शिवलिंग पूजन : इस दिन शाम को या प्रदोष काल में मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमाएं बनाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है।

सोलह श्रृंगार : महिलाएं नए कपड़े पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करके पूजा में बैठती हैं।

रात भर जागरण : पूजा के बाद पूरी रात भजन-कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है और अगले दिन सुबह पारण करके व्रत पूरा होता है।

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: हिंदू धर्म का कैलेंडर चंद्रमाह पर आधारित होता है और यह अंग्रेजी कैलेंडर से अलग होता है। इस समय हिंदू कैलेंडर का छठा माह भाद्रपद चल रहा है। प्रत्येक हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। “भौम” मंगल देव का ही एक नाम है, और यह व्रत भगवान शिव और हनुमान जी दोनों की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

इस बार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर, 2026, मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष व्रत होगा। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस व्रत में सूर्योदय के बाद प्रदोष काल में पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा रहते हैं।

कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने के त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 08 सितंबर को सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 09 सितंबर को रात 3 बजे होगा। ऐसे में प्रदोष काल को देखते हुए प्रदोष व्रत 8 सितंबर, दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल पूजा का शुभ समय शाम 06:35 बजे से रात 08:52 बजे तक रहेगा।

भौम प्रदोष व्रत का महत्व

कर्ज से मुक्ति : इसे ‘ऋण मोचन प्रदोष’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से पुराने कर्ज और आर्थिक समस्याओं से जल्द राहत मिलती है।

भूमि और संपत्ति का लाभ: ज्योतिष में मंगल देव को भूमि का कारक माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत करने से नया घर खरीदने, जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद सुलझाने और अचल संपत्ति के लाभ का योग बनता है।

मंगल दोष का निवारण : जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मंगल से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत लाभदायक माना जाता है।

शिव और हनुमान जी की कृपा : मंगलवार होने के कारण भगवान शिव के साथ-साथ भगवान हनुमान जी की भी विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

शत्रु और भय से रक्षा : भगवान शिव और हनुमान जी की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और मन से अज्ञात भय, चिंता या मानसिक तनाव समाप्त होता है।

पूजा विधि

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और भगवान शिव व हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • दिन में फलाहार लें और सात्विक रहें।
  • सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद का समय (प्रदोष काल) शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • शाम को स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें, शिव चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • पूजा के अंत में आरती करें और अपनी क्षमता अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद को भोजन या दान दें।

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Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: हिंदू धर्म का कैलेंडर चंद्रमाह पर आधारित होता है और यह अंग्रेजी कैलेंडर से अलग होता है। इस समय हिंदू कैलेंडर का छठा माह भाद्रपद चल रहा है। प्रत्येक हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। “भौम” मंगल देव का ही एक नाम है, और यह व्रत भगवान शिव और हनुमान जी दोनों की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

इस बार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर, 2026, मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष व्रत होगा। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस व्रत में सूर्योदय के बाद प्रदोष काल में पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा रहते हैं।

कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने के त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 08 सितंबर को सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 09 सितंबर को रात 3 बजे होगा। ऐसे में प्रदोष काल को देखते हुए प्रदोष व्रत 8 सितंबर, दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल पूजा का शुभ समय शाम 06:35 बजे से रात 08:52 बजे तक रहेगा।

भौम प्रदोष व्रत का महत्व

कर्ज से मुक्ति : इसे ‘ऋण मोचन प्रदोष’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से पुराने कर्ज और आर्थिक समस्याओं से जल्द राहत मिलती है।

भूमि और संपत्ति का लाभ: ज्योतिष में मंगल देव को भूमि का कारक माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत करने से नया घर खरीदने, जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद सुलझाने और अचल संपत्ति के लाभ का योग बनता है।

मंगल दोष का निवारण : जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मंगल से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत लाभदायक माना जाता है।

शिव और हनुमान जी की कृपा : मंगलवार होने के कारण भगवान शिव के साथ-साथ भगवान हनुमान जी की भी विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

शत्रु और भय से रक्षा : भगवान शिव और हनुमान जी की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और मन से अज्ञात भय, चिंता या मानसिक तनाव समाप्त होता है।

पूजा विधि

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और भगवान शिव व हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • दिन में फलाहार लें और सात्विक रहें।
  • सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद का समय (प्रदोष काल) शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • शाम को स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें, शिव चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • पूजा के अंत में आरती करें और अपनी क्षमता अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद को भोजन या दान दें।

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