काशी पहुंचा 109 सदस्यीय जापानी प्रतिनिधिमंडल, निवेश से संस्कृति तक बढ़ेगा भारत-जापान सहयोग

काशी पहुंचा 109 सदस्यीय जापानी प्रतिनिधिमंडल, निवेश से संस्कृति तक बढ़ेगा भारत-जापान सहयोग

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जापान की ‘उगते सूरज की धरती’ और काशी की आध्यात्मिक सुबह अब भारत-जापान के सदियों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों को औद्योगिक सहयोग की नई ऊंचाई देने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। योगी सरकार  उत्तर प्रदेश में विदेशी निवेश, औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के साथ-साथ भारत की संस्कृति, धर्म और कला तथा काशी की समृद्ध विरासत को वैश्विक मंच पर पहुंचाने के प्रयास कर रही है।
 

आज (22 अगस्त) करीब 109 सदस्यीय उच्चस्तरीय जापानी प्रतिनिधिमंडल दो दिवसीय दौरे पर धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी पहुंचेगा। जापान के यामानाशी प्रिफेक्चर के माननीय गवर्नर के नेतृत्व में आ रहे इस प्रतिनिधिमंडल में जापान की प्रमुख कंपनियों के कई वरिष्ठ अधिकारी और सीईओ शामिल होंगे। प्रतिनिधिमंडल के वाराणसी दौरे से उत्तर प्रदेश में निवेश के नए अवसरों को बढ़ावा मिलने के साथ ही पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

 

जापानी प्रतिनिधिमंडल भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ का भ्रमण करेगा, विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती और काशी की कला-संस्कृति से रूबरू होगा। इस दौरान मेहमानों को काशी की सदियों पुरानी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और हस्तशिल्प परंपरा की झलक भी देखने को मिलेगी।

 

सारनाथ का भ्रमण और गंगा आरती देखेगा जापानी दल

22 अगस्त को दोपहर में वाराणसी पहुंचने के बाद जापानी प्रतिनिधिमंडल  हाल ही में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हुई तथागत की तपोस्थली सारनाथ का भ्रमण करेगा । इसके बाद दल नमो घाट पर गंगा आरती का अद्भुत दृश्य देखेगा। शाम को ताज होटल में डिनर के दौरान प्रतिनिधिमंडल के सदस्य भारतीय संस्कृति, कला और हस्तशिल्प से परिचित होंगे।23 अगस्त को  प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख सदस्यों में से कुछ लोग श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करेंगे, जबकि अन्य सदस्य एयरपोर्ट के लिए रवाना होंगे।

 

निवेश और औद्योगिक सहयोग पर रहेगा जोर

उत्तर प्रदेश मजबूत कानून-व्यवस्था, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, सरल औद्योगिक नीतियों, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और सिंगल विंडो सिस्टम के माध्यम से वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जापानी प्रतिनिधिमंडल के दौरे का उद्देश्य उत्तर प्रदेश में निवेश एवं औद्योगिक सहयोग को प्रोत्साहित करना तथा हाइड्रोजन और स्वच्छ ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, अवसंरचना, पर्यटन और मानव संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं को तलाशना है।

यह दौरा उत्तर प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के साथ ही भारत-जापान, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और यामानाशी प्रिफेक्चर के बीच औद्योगिक सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, कौशल विकास और मैत्रीपूर्ण संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

 

जीआई और ओडीओपी उत्पादों के लगेंगे स्टॉल, दिखेगी काशी की सांस्कृतिक विरासत

जापानी मेहमानों को काशी की सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा से परिचित कराने के लिए वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) और जीआई उत्पादों के स्टॉल लगाए जाएंगे। इनमें काशी की प्रसिद्ध गुलाबी मीनाकारी, सॉफ्ट स्टोन कार्विंग , वुडन लैकरवेयर एंड टॉयज (लकड़ी के खिलौने ) और बनारसी सिल्क साड़ी समेत अन्य स्थानीय हस्तशिल्प उत्पाद प्रदर्शित किए जाएंगे।

 

इसके साथ ही मेहमानों के लिए भारतीय संगीत और नृत्य की सांस्कृतिक प्रस्तुति भी होगी। कार्यक्रम में कथक, लोकनृत्य और वाद्य-वृंद के माध्यम से भारत और काशी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की झलक प्रस्तुत की जाएगी। इस तरह जापानी प्रतिनिधिमंडल का काशी दौरा सिर्फ निवेश और औद्योगिक सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गंगा की आध्यात्मिक धारा, सारनाथ की बौद्ध विरासत और काशी की कला-संस्कृति के माध्यम से भारत-जापान के रिश्तों को एक नया सांस्कृतिक आयाम भी देगा।

मुख्यमंत्री धामी का बड़ा ऐलान, देहरादून के 13 गांवों में खुलेगा मार्केटिंग सेंटर; लखपति दीदियों को मिलेगा बढ़ावा

मुख्यमंत्री धामी का बड़ा ऐलान, देहरादून के 13 गांवों में खुलेगा मार्केटिंग सेंटर; लखपति दीदियों को मिलेगा बढ़ावा

मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय स्थित मुख्य सेवक सदन में “मुख्यमंत्री उद्यमशाला योजना” के अंतर्गत  चौपाल – 2026 का शुभारंभ किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री उद्यमशाला योजना के माध्यम से अब तक प्रदेश में  13 हजार से अधिक उद्यमियों को सहयोग दिया जा चुका है। साथ ही 8 हजार से अधिक महिला उद्यमियों एवं स्वयं सहायता समूहों की सदस्यों को उद्यमिता और आजीविका के अवसरों से जोड़ा गया है।

उद्घाटन सत्र में उन्होंने देहरादून के आईटी पार्क स्थित 13 गांव में प्रदेश के समस्त जनपदों के स्वयं सहायता समूहों के उत्पाद विपणण के लिए राज्य स्तरीय विपणन केंद्र खोलने की घोषणा की है।

 

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, मुख्यमंत्री ने कहा कि आज हमारे गांव प्रदेश के विकास में सहभागी ही नहीं बन रहे हैं, बल्कि अपने सामर्थ्य और परिश्रम के बल पर आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने  कहा कि प्रदेश के उत्साही युवाओं, साहसी मातृशक्ति में कुछ कर गुजरने की इच्छा और हुनर है, इसी तरह प्रदेश के स्थानीय उत्पादों में देश-दुनिया के बाजार तक पहुंचने की पूरी क्षमता है। जरूरत केवल इस बात कि है कि हुनर को सही दिशा मिले। इसी सोच के साथ प्रदेश सरकार ने “मुख्यमंत्री उद्यमशाला योजना” को आगे बढ़ाने का काम किया है। योजना के जरिए सरकार का प्रयास है कि उत्तराखण्ड का युवा रोजगार मांगने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बने। साथ ही किसानों और महिलाओं की आर्थिक स्थित मजबूत हो। “मुख्यमंत्री उद्यमशाला योजना” इसी सोच को धरातल पर उतारने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

 

उन्होंने कहा कि इस योजना के माध्यम से ग्रामीण उद्यमियों को अपना व्यवसाय शुरू करने और आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण, आर्थिक सहयोग, तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार से जुड़ने में मदद दी जा रही है।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज जहां एक ओर प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से 5 लाख से अधिक ग्रामीण महिलाओं को 70 हजार से अधिक स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा जा चुका है। वहीं, 3 लाख से अधिक बहने लखपति दीदी बनने में सफल रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश की मातृशक्ति पहाड़ी मसालों से लेकर मंडुवा, झंगोरा, दालों, शहद, अचार, जैम, हस्तशिल्प, ऊनी उत्पादों और स्थानीय कला तक को व्यवसाय का रूप दे रही हैं।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि कहा कि सरकार गांव के उत्पादों को देश के बड़े शहरों तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है। इसी दिशा में काम करते हुए हाउस ऑफ हिमालयाज नामक अंब्रेला ब्रांड तैयार किया गया है।

 

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने हमें वोकल फॉर लोकल, लोकल टू ग्लोबल और आत्मनिर्भर भारत जैसे मंत्र दिए हैं। प्रदेश सरकार इसे धरातल पर उतारने के लिए प्रयासरत है। सरकार चाहती है कि जब कोई व्यक्ति उत्तराखण्ड का उत्पाद खरीदे, तो उसे उस उत्पाद में पहाड़ की मेहनत, संस्कृति, परंपरा और मिट्टी की खुशबू भी महसूस हो।

 

इसीलिए आज प्रदेश में ग्रामीण हाट, विपणन केंद्र, कलेक्शन सेंटर और एग्री सर्विस सेंटर जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जा रहा है, ताकि किसान और उद्यमी को अपने उत्पाद के लिए बेहतर बाजार और बेहतर मूल्य मिल सके।

 

उन्होंने कहा कि ग्रामीण उद्यमिता का एक बड़ा उद्देश्य पलायन को रोकना भी है। सरकार चाहती है कि युवा रोजगार की तलाश में अपने गांव को छोड़ने के लिए मजबूर न हों। क्योंकि गांव मजबूत होगा तो उत्तराखण्ड मजबूत होगा।

 

इस दिशा में कार्य करते हुए सरकार “ग्रामोत्थान परियोजना” (रीप) के माध्यम से भी गांव के अति-निर्धन परिवारों को आजीविका से जोड़कर गांवों में रोजगार के अवसरों को बढ़ाने का कार्य कर रही है।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के सभी 13 जनपदों में “मुख्यमंत्री उद्यमशाला चौपाल” आयोजित की जा रही हैं। इन चौपालों का उद्देश्य है कि सरकारी योजनाओं के बारे में अधिक से अधिक लोग जान सकें और उनका फायदा उठा सकें। इसी उद्देश्य से प्रचार वैन को भी गांव-गांव तक भेजा जा रहा है, ताकि मुख्यमंत्री उद्यमशाला योजना की जानकारी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके।

 

आयोजन के दौरान मुख्यमंत्री ने लखपति दीदी और महिला उद्यमियों को भी सम्मानित किया। साथ ही उत्तराखंड राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत तैयार की गई पुस्तक, वार्षिक रिपोर्ट का भी विमोचन किया। साथ ही एकीकृत कृषि कलस्टर आधारभूत प्रशिक्षण एवं मॉड्यूल और शिशु एवं लघु बाल आहार मॉड्यूल के साथ ही महिलाओं एचं बच्चों में एनीमिया की रोकथाम एवं प्रबंधन मॉडयूल का भी लोकार्पण किया। 

 

इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री श्री भरत चौधरी, श्री गणेश जोशी, श्री खजान दास, राज्यसभा सांसद श्री नरेश बंसल, विधायक श्री उमेश शर्मा काऊ, श्रीमती सविता कपूर,  सचिव ग्राम्य विकास श्री धीराज गर्ब्याल एवं   संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

MLA Salary: कार, बंगला और लाखों के भत्ते! जानिए किस राज्य के विधायक कमाते हैं सबसे ज्यादा पैसा

MLA Salary: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सभी 234 विधायकों को सरकारी गाड़ी और हर महीने अतिरिक्त भत्ता देने के फैसले के बाद अब विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली दूसरी सुविधाएं चर्चा में हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि विधायकों को वेतन के अलावा और क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं।

नई व्यवस्था के तहत तमिलनाडु के हर विधायक को एक सरकारी गाड़ी मिलेगी। इसके अलावा गाड़ी, पेट्रोल-डीजल और मेंटेनेंस के खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये और एक सहायक (असिस्टेंट) के लिए 25,000 रुपये दिए जाएंगे। यानी हर विधायक को वेतन के अलावा हर महीने कुल 1 लाख रुपये की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार ने विधायकों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी बढ़ा दिया है।

इस फैसले के बाद देशभर में विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अलग-अलग राज्यों में विधायकों की बेसिक सैलरी, भत्तों और दूसरी सुविधाओं में काफी अंतर देखने को मिलता है।

यह राज्यों का विषय है

सांसदों की सैलरी और भत्ते संसद तय करती है, लेकिन विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं राज्य सरकार के दायरे में आती हैं। हर राज्य की विधानसभा अपने विधायकों के वेतन और भत्तों से जुड़े नियम और कानून तय करती है।

विधायकों के लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय वेतन संरचना नहीं है। उनकी कमाई में सिर्फ बेसिक सैलरी ही शामिल नहीं होती। राज्य सरकारें विधायकों को विधानसभा क्षेत्र के खर्च, ऑफिस और स्टाफ, यात्रा, रहने, फोन और कम्युनिकेशन, इलाज और दूसरे आधिकारिक खर्चों के लिए अलग-अलग भत्ते भी देती हैं।

पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार, अधिकांश राज्यों में, विधायक कानून के माध्यम से अपने वेतन और भत्ते स्वयं निर्धारित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों में मूल वेतन और समग्र वेतन पैकेज दोनों में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है।

किस राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन मिलता है?

2025 में द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन 2.75 लाख रुपये दिया जाता था। के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली बीआरएस सरकार के दौरान सभी भत्तों सहित यह वेतन 1.25 लाख रुपये से बढ़कर 2.75 लाख रुपये हो गया था।

किस राज्य में विधायकों का वेतन सबसे कम है?

पीआरएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के विधायकों का मासिक वेतन 70,000 रुपये है, जो देश के सबसे कम वेतन पाने वाले विधायकों में से एक है। उनके मासिक वेतन में 2,000 रुपये का निश्चित भत्ता, 25,000 रुपये का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 20,000 रुपये का न्यूनतम मासिक यात्रा भत्ता, 11,000 रुपये का टेलीफोन भत्ता, 4,000 रुपये का सूचना भत्ता और 8,000 रुपये का उपभोग भत्ता शामिल है। उन्हें राज्य के भीतर यात्रा के लिए 1,000 रुपये और केरल के बाहर यात्रा के लिए 1,200 रुपये का दैनिक भत्ता भी मिलता है।

हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि कम वेतन वाले राज्य में विधायकों को कम सुविधाएं मिलती हैं। इन्हें आवास, सरकारी आवास, इलाज, यात्रा खर्च की भरपाई, स्टाफ सपोर्ट और दूसरी सुविधाएं अलग से दी जाती हैं।

विधायकों को वेतन के अलावा और क्या मिलता है?

विधायक का मासिक वेतन राज्य द्वारा विधायक पर किए जाने वाले कुल व्यय का केवल एक हिस्सा है।

सामान्य सुविधाओं और भत्तों में शामिल हैं:

  • निर्वाचन क्षेत्र के कार्यों से संबंधित खर्चों के लिए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता
  • कर्मचारियों और प्रशासनिक खर्चों के लिए सेक्रेटेरियल या ऑफिस भत्ता
  • सरकारी यात्राओं के लिए यात्रा और परिवहन भत्ता
  • विधानसभा सत्रों और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए दैनिक भत्ता
  • राज्य की राजधानी में आवास
  • विधायक और कुछ राज्यों में परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल सुविधाएं
  • टेलीफोन और संचार भत्ता
  • वाहन सुविधाएं या वाहन भत्ता
  • कार्यालय उपकरण और स्टेशनरी भत्ता
  • विधानसभा छोड़ने के बाद पेंशन और अन्य लाभ, जो राज्य के नियमों पर निर्भर करते हैं
  • हरियाणा में आवास और कार सुविधा
  • कुछ राज्य पारंपरिक वेतन-भत्ते मॉडल से परे भी लाभ प्रदान करते हैं।

हरियाणा में विधायकों को सिर्फ सैलरी और भत्ते ही नहीं, बल्कि घर और गाड़ी खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का लोन लेने की सुविधा भी मिलती है। यह लोन घर, मोटर कार या दोनों के लिए लिया जा सकता है।

इसके अलावा, विधायकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट की सुविधा भी दी जाती है। राज्य सरकार घर में बदलाव कराने और उसकी मरम्मत के लिए भी विधायकों को एडवांस राशि उपलब्ध कराती है।

ओडिशा का विधायक विकास कोष

एक और महत्वपूर्ण अंतर विधायक द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्राप्त लाभों और उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े कोषों के बीच है।

ओडिशा की विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत वित्त वर्ष 2025-26 से हर विधानसभा क्षेत्र को 5 करोड़ रुपये दिए जाते हैं। इस राशि को सामान्य विकास, शिक्षा और सड़क से जुड़े कामों के लिए बांटा जाता है।

हालांकि, इस राशि को विधायक का वेतन या व्यक्तिगत लाभ नहीं माना जाना चाहिए। यह सार्वजनिक धन है जो विधायक द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए निर्धारित किया गया है।

विधायकों के वेतन में इतना अंतर क्यों होता है?

इस अंतर के पीछे कई कारण हैं:

  • आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों के पास उच्च वेतन देने की वित्तीय क्षमता अधिक हो सकती है, हालांकि राजनीतिक प्राथमिकताएं भी मायने रखती हैं।
  • उच्च जीवन यापन और परिचालन लागत वाले राज्यों के विधायकों को अधिक भत्ते मिल सकते हैं।
  • अगर किसी विधायक का क्षेत्र बहुत बड़ा, दूर-दराज या कई इलाकों में फैला हुआ है, तो उसका यात्रा खर्च भी ज्यादा हो सकता है। ऐसे में उसे ज्यादा यात्रा भत्ता मिल सकता है
  • कई बार राज्य सरकारें और विधानमंडल विधायकों की मांगों के बाद समय-समय पर वेतन और भत्तों में संशोधन करते हैं।

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यूपी में कनिष्ठ सहायक भर्ती का रिजल्ट जारी, 50 अभ्यर्थियों का चयन; जानें किस वर्ग की कितनी रही कटऑफ

यूपी में कनिष्ठ सहायक भर्ती का रिजल्ट जारी, 50 अभ्यर्थियों का चयन; जानें किस वर्ग की कितनी रही कटऑफ

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उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूपीएसएसएससी) ने औद्योगिक विकास विभाग में कनिष्ठ सहायक के पदों पर भर्ती का चयन परिणाम जारी कर दिया है। शुक्रवार को कनिष्ठ सहायक मुख्य परीक्षा के आधार पर घोषित परिणाम में 50 अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित नियमों, मेरिट और आरक्षण प्रावधानों का पालन किया गया है। इससे प्रदेश में योगी सरकार की पारदर्शी और मेरिट आधारित भर्ती व्यवस्था को एक और मजबूती मिली है।

 

आयोग के अनुसार, प्रारंभ में कनिष्ठ सहायक के 62 पदों पर भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन मांगे गए थे। विभाग से प्राप्त संशोधित अधियाचन के बाद पदों की संख्या घटाकर 54 कर दी गई। संशोधित पदों के आधार पर आयोग ने चयन प्रक्रिया पूरी करते हुए 50 अभ्यर्थियों का अंतिम चयन किया है।

 

आरक्षण नियमों के अनुरूप हुआ चयन

 

अंतिम चयनित 50 अभ्यर्थियों में 34 अनारक्षित, 3 अनुसूचित जाति, 1 अनुसूचित जनजाति, 7 अन्य पिछड़ा वर्ग और 5 आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के अभ्यर्थी शामिल हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि क्षैतिज आरक्षण के तहत उपलब्ध अभ्यर्थियों को उनकी मूल श्रेणी में समायोजित किया गया है। महिला, दिव्यांगजन सहित अन्य क्षैतिज आरक्षण श्रेणियों में भी नियमानुसार प्रक्रिया अपनाई गई। कुछ श्रेणियों में निर्धारित पदों के सापेक्ष पात्र अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं होने पर नियमों के अनुसार पदों को आगे बढ़ाते हुए अन्य पात्र अभ्यर्थियों का चयन किया गया।

 

कटऑफ जारी, चयन का आधार स्पष्ट

 

आयोग ने अंतिम परिणाम के साथ श्रेणीवार कटऑफ भी जारी की है। अनारक्षित वर्ग में चयनित अभ्यर्थी की कटऑफ 65 अंक रही। अनुसूचित जाति की कटऑफ 26.75, अनुसूचित जनजाति की 50, ओबीसी की 62.50 और ईडब्ल्यूएस की कटऑफ 63.75 अंक रही। क्षैतिज आरक्षण में दिव्यांगजन की एएसडी/एचएच/डीई/ओएच श्रेणी की कटऑफ 54.75 और दिव्यांगजन की अन्य श्रेणी की कटऑफ 44.25 अंक रही। महिला अभ्यर्थियों की कटऑफ 42 अंक दर्ज की गई।

Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन के दिन 28 अगस्त को 3.18 घंटे रहेगा चंद्र ग्रहण, जानें राखी बांधने का मुहूर्त और सूतक का समय

Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का पर्व हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह पर्व इस साल 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। लेकिन इस साल रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण लगने से एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि रक्षा बंधन पर चंद्र ग्रहण से क्या राखी का त्योहार प्रभावित होगा? इससे राखी बांधने के मुहूर्त पर क्या असर होगा? और सूतक काल कब से कब तक रहेगा?

बता दें, इस साल का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में घटित होगा। इस दौरान चंद्रमा कुंभ राशि में संचार करेंगे, जहां पहले से ही छाया ग्रह राहु विराजमान हैं और केतु की भी दृष्टि बनी रहेगी। साथ ही सूर्य भी केतु से पीड़ित रहेंगे क्योंकि सिंह राशि में सूर्य और केतु की युति बन रही है। यह चंद्र ग्रहण 3 घंटे और 18 मिनट तक चलेगा। आइए जानें चंद्र ग्रहण के साये में कैसे मनेगा राखी का पर्व?

चंद्रग्रहण 2026 तारीख और समय

भारतीय समय के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन लगने वाले चंद्र ग्रहण की शुरुआत सुबह 8 बजकर 4 मिनट से होगी। चंद्र ग्रहण का मध्य काल 9 बजकर 43 मिनट पर होगा और समापन 11 बजकर 22 मिनट पर होगा। चंद्रग्रहण की कुल अवधि 3 घंटे 18 मिनट की रहने वाली है। चूंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई देने वाला नहीं है इसलिए सूतक काल मान्य नहीं होगा।

28 अगस्त को होगा चंद्र ग्रहण

28 अगस्त को लगने वाला चंद्र ग्रहण आंशिक होगा। इस दौरान चंद्रमा का बड़ा भाग पृथ्वी की छाया में ढक जाएगा, जिससे चंद्रमा गहरे लाल या तांबे के रंग जैसा नजर आने लगेगा, इसी वजह से इसे ब्लड मून भी कहा जाएगा। यह ग्रहण दक्षिणी-पश्चिमी एशिया (पाकिस्तान, अफगानिस्तान के दक्षिणी क्षेत्र समेत सऊदी अरब, शारजाह, ईराक, ईरान आदि), अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में पूरी तरह दिखाई देने वाला है।

भारत में नहीं दिखेगा चंद्र ग्रहण

28 अगस्त को रक्षा बंधन के दिन लगने वाला साल का अंतिम चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए इस ग्रहण का सूतक काल भी मान्य नहीं होगा और रक्षाबंधन के पर्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। ना ही राखी बांधने का मुहूर्त बदलेगा। आप बिना किसी बाधा के त्योहार मना सकते हैं।

भद्रा मुक्त रहेगा रक्षा बंधन का पर्व

इस बार रक्षाबंधन पर सबसे अच्छी बात यह है कि भद्राकाल नहीं है। भद्रा रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व यानी 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे से रात्रि 9:32 बजे तक रहेगी। इसलिए 28 अगस्त को सूर्योदय के बाद बिना किसी बाधा के पूरे दिन राखी बांधी जा सकती है।

Sawan Purnima 2026 Date: 27 या 28 अगस्त, कब किया जाएगा श्रावण पूर्णिमा का व्रत? जानें सही तारीख, मुहूर्त और पूजा विधि

‘हिंदू गौरव दिवस’ कार्यक्रम में शामिल हुए सीएम योगी, पूर्व सीएम कल्याण सिंह की 5वीं पुण्यतिथि पर दी श्रद्धांजलि

‘हिंदू गौरव दिवस’ कार्यक्रम में शामिल हुए सीएम योगी, पूर्व सीएम कल्याण सिंह की 5वीं पुण्यतिथि पर दी श्रद्धांजलि

Kalyan Singh death anniversary

Kalyan Singh death anniversary: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले पार्टी के लोग पीडीए को कैसे परिभाषित करते हैं, कभी इनका पी पिछड़ा था, फिर पंडित हो गया। देखना एक दिन ये लोग पी से पाकिस्तान कर देंगे। इनके बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। ये कब क्या बोलेंगे, कोई भरोसा नहीं। ये ऐसे गिद्ध हैं कि जिस पेड़ पर चढ़ेंगे, उसको ही सुखा डालेंगे। सबसे कष्टकारी बात यह थी कि सामान्य शिष्टाचार व संस्कार के तहत मायावती ने आकर बाबूजी को श्रद्धांजलि दी, लेकिन सपा मुखिया ने प्रत्यक्ष आकर श्रद्धांजलि देना तो दूर, शब्दों से भी कुछ व्यक्त नहीं किया। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण, कितना शर्मनाक है। यह हर उस हिंदू का अपमान था, जिसे लगता है कि बाबूजी का जीवन सनातन मूल्यों और हिंदू गौरव के लिए समर्पित था।

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम में पूर्व मुख्यमंत्री पद्म विभूषण कल्याण सिंह की पांचवीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित ‘हिंदू गौरव दिवस’ कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजस्थान-हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे पद्म विभूषण कल्याण सिंह ‘बाबूजी’ की पांचवीं पुण्यतिथि पर उनके चित्र पर पुष्पार्चन कर अपनी श्रद्धांजलि दी।

‘कल्याण सिंह टूट सकता है, लेकिन झुक नहीं सकता’

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि बाबूजी दबाव में आकर काम करने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह कहा करते थे, कल्याण सिंह टूट सकता है लेकिन झुक नहीं सकता। बाबूजी ने जीवनभर अपने इस वचन को निभाया। जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा था कि संघर्ष स्वीकार्य है, सत्ता दूर हो जाए यह भी स्वीकार है, लेकिन अपने प्रभु श्रीराम का अपमान स्वीकार्य नहीं।

आज जब हम लोग अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण और रामलला का विराजमान होना देखते हैं तो बाबूजी की स्मृति सहसा अंतःकरण में उठती है। संतों के संघर्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्गदर्शन और विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में चले राम जन्मभूमि आंदोलन का कल्याण सिंह जी ने खुलकर समर्थन किया। उन्होंने सत्ता गंवाई, लेकिन दो-टूक कहा कि रामभक्तों पर गोली नहीं चलेगी।

समाजवादी पार्टी पर महापुरुषों के नाम हटाने का आरोप

सीएम योगी ने कहा कि बाबूजी ने मूल्यों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, यही उनकी पहचान थी। सपा नेतृत्व ने सिर्फ बाबूजी के निधन के समय अपमान नहीं किया, महापुरुषों का अपमान उसकी आदत है। कन्नौज से समाजवादी पार्टी का रिश्ता रहा है, लेकिन वहां डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर बने सरकारी मेडिकल कॉलेज से सपा मुखिया ने बाबा साहेब का नाम हटा दिया। हमारी सरकार में इसे फिर से बाबा साहेब के नाम पर किया गया। मैनपुरी में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के नाम पर एक कॉलेज बना था, लेकिन सपा ने उनका नाम भी मिटा दिया। भाजपा सरकार ने औरैया में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के नाम पर नए मेडिकल कॉलेज का निर्माण किया।

भारत के सनातन मूल्य एवं आदर्श सर्वोपरि

सीएम योगी ने कहा कि श्रद्धेय कल्याण सिंह का जीवन हर उस भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत है, जिसके लिए देश प्रथम है। भारत के सनातन मूल्य एवं आदर्श सर्वोपरि हैं। आज का दिन हम सभी के लिए हिंदू गौरव दिवस के रूप में श्रद्धेय बाबूजी की स्मृतियों को प्रेरणा के रूप में आत्मसात करने का दिन है। बड़ा आदमी पद से बड़ा नहीं होता है, वह अपनी सोच से, अपने कर्मों से बड़ा होता है और महान होता है। अतरौली के सामान्य किसान परिवार में जन्म लेने वाले कल्याण सिंह जी अपनी कर्मठता, मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने की भावना तथा देश के प्रति समर्पण के कारण आगे बढ़े।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पाठशाला में तपे स्वयंसेवक के रूप में कल्याण सिंह जी ने किसान, शिक्षक, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद और राज्यपाल के रूप में सभी महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। बाबूजी का जीवन सादगी, तप, साधना और संघर्ष से भरा हुआ था। वह अन्याय के खिलाफ लड़ने और अत्याचार का मुकाबला करने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने सनातन मूल्यों की रक्षा करते हुए गांव के गरीबों, अन्नदाता किसानों, युवाओं और समाज के प्रत्येक तबके के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया।

पीएम मोदी जी कार्यक्रम छोड़कर श्रद्धांजलि अर्पित करने आए

मुख्यमंत्री ने श्रद्धेय कल्याण सिंह के निधन के बाद समाजवादी पार्टी के रवैये को लेकर सपा नेतृत्व पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि बाबूजी भाजपा के नेता थे और सभी के लिए प्रेरणास्रोत थे। उनके निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सारे कार्यक्रम छोड़कर दिल्ली से सीधे लखनऊ आए और श्रद्धांजलि अर्पित की। एसजीपीजीआई से लेकर घर तक, घर से अलीगढ़ और अलीगढ़ से नरौरा तक अंतिम संस्कार में वह और उनके कैबिनेट के सभी सदस्य शामिल हुए। लेकिन, सपा मुखिया ने इसमें शामिल होना तो दूर, मुंह से श्रृद्धांजलि के दो शब्द नहीं बोले।

बाबूजी ने यूपी को दी पहचान

मुख्यमंत्री ने कहा कि बाबूजी ने उत्तर प्रदेश को एक पहचान दी। उन्होंने युवाओं के सामने पहचान का संकट पैदा करने वाली राजनीति के खिलाफ बेहतर माहौल देने का काम किया। युवाओं के लिए नई सोच और नया मंत्र दिया। आज उत्तर प्रदेश के पहले कैंसर संस्थान में बाबूजी की दिव्य प्रतिमा और उनके नामकरण को देखा जा सकता है। बुलंदशहर में डबल इंजन की भाजपा सरकार द्वारा बनाए गए राजकीय मेडिकल कॉलेज का नामकरण भी बाबूजी के नाम पर किया गया है।

श्रद्धेय कल्याण सिंह ने सनातन मूल्यों की रक्षा करते हुए अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर गुलामी के ढांचे को पूरी तरह समाप्त करके श्रीराम मंदिर का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे बाबूजी के प्रति श्रद्धावान होना सनातन धर्मावलंबियों का दायित्व है। बाबूजी की स्मृतियों को जीवित रखने और इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए सभी को काम करना होगा। उन्होंने राजवीर सिंह ‘राजू भैया’ और संदीप सिंह का भी धन्यवाद दिया कि वे इस परंपरा को लगातार जीवित रखने और आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

 

इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक, वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना, सांसद साक्षी महाराज, राज्यसभा सांसद बृजलाल, कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, श्रद्धेय कल्याण सिंह के सुपौत्र व मंत्री संदीप सिंह, मंत्री राकेश सचान, मंत्री असीम अरुण, मंत्री जेपीएस राठौर, बाबूजी के पुत्र व पूर्व सांसद राजवीर सिंह 'राजू भैया', मंत्री रजनी तिवारी, मंत्री डॉ. संजय निषाद, मंत्री डॉ. अरुण सक्सेना, मंत्री दयाशंकर मिश्र दयालु, मंत्री धर्मवीर प्रजापति, भाजपा उपाध्यक्ष डॉ. नीरज सिंह, विधायक राजेश्वर सिंह, विधायक योगेश शुक्ला आदि मौजूद रहे।

28 अगस्त को लगने जा रहा चंद्र ग्रहण, इन 4 राशियों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर, जानें जानें ज्योतिषीय संकेत और उपाय

Chandra Grahan 2026: साल 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को लगने जा रहा है। हालांकि यह आंशिक चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इस वजह से देश में इसकी वजह से पारंपरिक तौर पर लगने वाला सूतक काल मान्य नहीं होगा। इसके बावजूद हिंदू ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण काल को आध्यात्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक इस चंद्र ग्रहण का असर अलग-अलग राशियों पर देखने को मिल सकता है, लेकिन 4 विशेष राशियों वृषभ, कर्क, सिंह और वृश्चिक को इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

चंद्र ग्रहण का समय और भारत में स्थिति

ग्रहण की तारीख : 28 अगस्त 2026

प्रारंभ समय : सुबह 8:04 बजे

चरम काल : सुबह 9:43 बजे

समापन समय : सुबह 11:22 बजे

इन 4 राशियों को रहना होगा बेहद सावधान

वृषभ राशि : वृषभ राशि के जातकों को इस चंद्र ग्रहण के दौरान अपनी बोली और वित्तीय मामलों पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है। वाद-विवाद से बचें, अपने गुस्से पर नियंत्रण रखें और किसी को भी पैसा उधार देने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार कर लें। जल्दबाजी में लिया गया कोई भी फैसला आपके रिश्तों में खटास ला सकता है या आर्थिक परेशानी खड़ी कर सकता है।

कर्क राशि : कर्क राशि का स्वामी स्वयं चंद्रमा है, इसलिए ज्योतिष शास्त्र में चंद्र ग्रहण का प्रभाव इस राशि पर अधिक माना जाता है। इस अवधि में कर्क राशि के लोगों को तनाव से बचने, अनावश्यक चिंताओं से दूर रहने, परिवार के सदस्यों के साथ धैर्यपूर्वक बातचीत करने और पर्याप्त आराम करने की सलाह दी जाती है।

सिंह राशि : सिंह राशि का स्वामी सूर्य है, जिसका चंद्रमा के साथ महत्वपूर्ण ज्योतिषीय संबंध होता है। ग्रहण काल के दौरान सिंह राशि के जातकों को अपने वर्कप्लेस पर व्यवहार ठीक बनाए रखना चाहिए। अपने सीनियर्स के साथ बेवजह की बहस से बचें और कोई भी महत्वपूर्ण बयान या निर्णय लेने से पहले गहराई से विचार करें।

वृश्चिक राशि : वैदिक ज्योतिष में वृश्चिक राशि को चंद्रमा की नीच राशि से जोड़ा जाता है। इसलिए ज्योतिषियों ने वृश्चिक राशि के जातकों को वित्त, पारिवारिक मामलों और भरोसे के संदर्भ में अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है। पैसों से जुड़े बड़े फैसले लेने से बचें और किसी भी व्यक्ति पर अंधाधुंध भरोसा न करें।

चंद्र ग्रहण के दौरान करें ये ज्योतिषीय उपाय

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कमजोर चंद्रमा को मजबूत करने और मानसिक शांति बनाए रखने के लिए कुछ ऐसे उपाय हैं जो फलदायी माने जाते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना करने से चंद्रमा के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। अपनी माता का आदर-सत्कार करें और उनका आशीर्वाद लें। दूध, चावल या अन्य सफेद चीजों का दान करना शुभ माना जाता है। मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए चंद्रमा से जुड़े मंत्रों का जाप और ध्यान करें।

आपको बता दें कि 28 अगस्त को होने वाला यह चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है जबकि इसके आध्यात्मिक और ज्योतिषीय प्रभाव पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन परंपराओं को मानने वाले लोगों के लिए इस दौरान शांत रहना, जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना और सकारात्मक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना लाभदायक माना जाता है।

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क्या एथेनॉल की वजह से महंगी हुई चीनी? सरकार ने गिनाई 5 वजहें और त्योहारों से पहले लिया यह बड़ा फैसला

Sugar Price Rise: देश में त्योहारों के सीजन से ठीक पहले चीनी की कीमतें रॉकेट हुई जा रही हैं। 20 जुलाई को चीनी का भाव 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम था जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। चीनी की कीमतों को लेकर पैनिक की स्थिति न आए, इसके लिए अब सरकार ने इसे लेकर डिटेल में जानकारी जारी की है। इसमें चीनी की बढ़ती कीमतों की असल वजहें और इसे कंट्रोल करने के उपायों के बारे में बताया गया है। आपको बता दें कि सरकार ने एक दशक के बाद पहली बार चीनी के आयात का भी फैसला लिया है, जिसे इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी रिलीज के मुताबिक सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और लोगों को उचिद दर पर चीनी उपलब्ध कराने के लिए तमाम कदम उठाए जा रहे हैं।

क्या एथेनॉल की वजह से बढ़ीं कीमतें? सरकार ने खारिज किया दावा

सरकार ने उन दावों को पूरी तरह से गलत बताया है जिनमें चीनी की कीमतों में आई हालिया तेजी के पीछे एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन को माना जा रहा था। सरकार का दावा है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 फीसदी रह गया है। देश में बनाए जा रहे एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाजों, खासकर मक्के से तैयार किया जा रहा है।

फिर चीनी महंगी होने की असली वजह क्या है?

सरकार के मुताबिक चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी किसी एक वजह से नहीं हो रही है। इसके पीछे कई वजहें एक साथ जिम्मेदार हैं। सरकार ने बताया है कि शुरुआती अनुमानों की तुलना में घरेलू उत्पादन कम रहा है। त्योहारों का सीजन नजदीक आने से बाजार में मांग बढ़ी है। इसके अलावा मौसम की मार की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचा है। चौथी वजह इंटरनेशनल बाजार में चीनी सप्लाई में कमी को बताया गया है। पांचवीं वजह में सरकार ने माना है कि कुछ तबकों द्वारा चीनी की जमाखोरी भी की गई है।

शुरुआती अनुमानों से कम रहा चीनी का उत्पादन

चालू पेराई सीजन के दौरान चीनी का उत्पादन लगभग 306 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों द्वारा शुरुआत में इसके 343 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान लगाया गया था। उत्पादन में इस गिरावट की मुख्य वजह गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों का लगना और भारी बारिश से हुए जलजमाव को बताया जा रहा है। हालांकि उत्पादन अनुमान से कम रहने के बावजूद अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।

दुनिया भर में बढ़ रहे हैं चीनी के दाम

चीनी की किल्लत सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है बल्कि फिलहाल यह एक वैश्विक समस्या है। वर्ष 2026-27 के लिए वैश्विक चीनी घाटा लगभग 33 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। मौसम की विपरीत परिस्थितियों ने इसे ग्लोबली प्रभावित किया है। इंटरनेशनल बाजार में चीनी की कीमतें 30 जून को $474 प्रति टन थीं, जो 20 अगस्त 2026 तक 16% से अधिक बढ़कर $552 प्रति टन पर पहुंच गईं।

एथेनॉल प्रोग्राम से किसानों और मिलों को हुआ फायदा

भारत में आमतौर पर सालाना 320-340 लाख मीट्रिक टम चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत 280-290 लाख मीट्रिक के आसपास रहती है। सरप्लस उत्पादन वाले वर्षों में अतिरिक्त स्टॉक के कारण चीनी मिलों के फंड फंस जाते थे जिससे किसानों के गन्ने के भुगतान में देरी होती थी। ऐसे में एक्स्ट्रा चीनी को एथेनॉल में बदलने की पॉलिसी फायदा मिला है। इससे मिलों की फाइनेंशियल स्थिति में भी सुधार आया है। 20 अगस्त तक, 2025-26 चीनी सीजन के गन्ने के 97% बकाए का भुगतान किसानों को किया जा चुका है।

इसकी वजह से मिलों की सरकारी मदद पर निर्भरता भी घटी है। 2014 से 2021 के बीच चीनी उद्योग को लगभग ₹14600 करोड़ की सब्सिडी दी गई थी जबकि 2021-22 के बाद से ऐसी किसी सब्सिडी की घोषणा नहीं की गई है। साथ ही, लंबी अवधि में उपभोक्ताओं के लिए कीमतें स्थिर रही हैं और अगस्त 2024 से जुलाई 2026 के बीच इनमें सालाना सिर्फ 3% की ही वृद्धि हुई है।

जमाखोरी पर नकेल और त्योहारों से पहले सरकार के 5 बड़े फैसले

बाजार में सट्टेबाजी और जमाखोरी पर रोक लगाने तथा आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने कई कड़े कदम उठाए हैं। देशभर में चीनी व्यापारियों/डीलेरों के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक 400 टन की स्टॉक सीमा लागू कर दी गई है। 1 सितंबर से बल्क कंज्यूमर्स को अपनी 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। जमाखोरी और आर्टिफिशियल किल्लत को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों की संयुक्त टीमें मिलों में चीनी के स्टॉक का फिजिकल वेरिफिकेशन कर रही हैं। एहतियाती तौर पर घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति देने का फैसला लिया है।

इसके अलावा राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है। इससे अक्टूबर में चीनी का उत्पादन सामान्य 3-4 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि इससे त्योहारों के दौरान बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहेगी।

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Online Instruments के आईपीओ को सेबी की मंजूरी, 750 करोड़ जुटाएगी कंपनी

ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स (इंडिया) के आईपीओ को सेबी की मंजूरी मिल गई है। कंपनी ने सेबी के पास इस साल मई में ड्राफ्ट पेपर्स फाइल किए थे। कंपनी का आईपीओ 750 करोड़ रुपये का हो सकता है। इसमें कंपनी इनवेस्टर्स को नए शेयर इश्यू करेगी। इसमें ऑफर फॉर सेल भी होगा।

ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स बेंगलुरु की कंपनी है, जो ऑडियो-विजुअल सिस्टम इंटिग्रेशन सॉल्यूशन ऑफर करती है। कंपनी के प्रमोटर्स अनीता महेश बेलाड और राजेश्वरी शिवानंद महेशेट ऑफर फॉर सेल (OFS) में 57.1 लाख तक शेयर बेचेंगी। कंपनी प्री-आईपीओ प्लेसमेंट से भी 150 करोड़ रुपये तक जुटा सकती है।

कंपनी आईपीओ से जुटाए पैसे का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के साथ ही कुछ दूसरी जरूरतों के लिए करेगी। इसमें सामान्य कारोबारी जरूरतों के साथ ही अधिग्रहण का प्लान भी शामिल है। इक्विरस कैपिटल और मोतीलाल ओसवाल इनवेस्टमेंट एडवाइजर्स इस आईपीओ के मर्चेंट बैंकर्स हैं। यह इश्यू ऐसे वक्त आ रहा है, जब आईपीओ बाजार में काफी हलचल है।

इस बीच, मुंबई की कंपनी सुनील गोल्ड इंडिया ने आईपीओ के पेपर्स वापस ले लिए हैं। यह कंपनी हैंड क्राफ्टेड ज्वेलरी की सप्लाई करती है। कंपनी ने 14 अगस्त को आईपीओ के लिए ड्राफ्ट पेपर्स फाइल किए थे। बाद में कंपनी ने पेपर्स वापस लेने का फैसला किया। कंपनी इनवेस्टर्स को नए 2 करोड़ शेयर्स जारी करने वाली थी। कंपनी का प्लान ऑफर फॉर सेल के जरिए भी शेयरों की बिक्री का था।

El Nino impact: भारत में अल नीनो और कमजोर मानसून का दोहरा वार! क्या बढ़ेंगे दाल, चावल और सब्जियों के दाम?

El Nino Impact on India: प्रशांत महासागर में मजबूत होता अल नीनो का प्रभाव भारत की फूड इकॉनमी के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। जलवायु की यह स्थिति खेती की पैदावार पर असर डाल सकती है जिससे फूड सप्लाई चेन पर भी असर पड़ेगा। ऐसा हुआ तो खाने-पीने के सामान पर महंगाई का असर भी देखने को मिल सकता है। हालांकि भारत सरकार ने इस वित्त वर्ष में खरीफ की फसल को कम नुकसान का अनुमान दिया है पर भारत के विकास आउटलुक में पहले से ही महंगाई के जोखिम ने अपनी जगह बना रखी है।

रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) पहले ही चेतावनी जारी कर चुका है कि वित्त वर्ष 2026-27 में फूड और फ्यूल इंफ्लेशन भारत के आथिर्क विकास पर असर डाल सकते हैं। एजेंसी ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 7.6 फीसदी से कम है। Ind-Ra के मुताबिक FY27 में रिटेल इंफ्लेशन औसतन 4.9 प्रतिशत रह सकता है। पिछले वित्त वर्ष में यह सिर्फ 2 फीसदी था। अल नीनो की वजह से फूड इंफ्लेशन बढ़ने के जोखिम को आर्थिक विकास में रुकावट डालने वाले प्रमुख कारकों में से एक माना गया है।

कृषि क्षेत्र की मौजूदा तस्वीर और खरीफ की स्थिति

वैसे अल नीनो के खतरे के बावजूद मौजूदा खेती की तस्वीर बहुत अधिक चिंताजनक नजर नहीं आ रहा है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को स्पष्ट किया था कि इस साल के खरीफ उत्पादन पर अल नीनो का कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। हालांकि कुछ जगहों पर स्थानीय स्तर पर नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ इलाकों को छोड़कर अल नीनो का बड़ा असर नहीं दिख रहा है और स्थिति कुल मिलाकर अच्छी बनी हुई है। अधिकांश हिस्सों में फसलों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त बारिश हुई है।

देश के कृषि क्षेत्र ने कुछ इलाकों में कम बारिश के बावजूद व्यापक नुकसान से बचाव किया है। 14 अगस्त तक 1016.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी थी, जो इस अवधि तक सामान्य रूप से कवर होने वाले औसत क्षेत्र का 92 प्रतिशत है। यह रकबा पिछले साल के स्तर से सिर्फ 2 फीसदी ही कम है। कृषि मंत्री के मुताबिक बुआई का अंतर काफी कम हुआ है और संवेदनशील माने जाने वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर लगभग 100 रह गई है।

हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति असमान बनी हुई है। कर्नाटक और तेलंगाना में जल संकट का सामना करना पड़ा है जबकि पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में बारिश की कमी अधिक देखी गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक 12 अगस्त तक कुल मानसूनी घाटा 12 प्रतिशत था। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में 26 प्रतिशत, दक्षिण प्रायद्वीप में 19 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 11 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। आपको बता दें कि अल नीनो का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। इसमें कुछ हिस्से सूखे रह जाते हैं जबकि अन्य हिस्सों में सामान्य या अधिक बारिश होती है।

खाद्य कीमतों और अर्थव्यवस्था पर अल नीनो का प्रभाव

अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के गर्म होने से होने वाला एक मौसमी बदलाव है। ये वैश्विक स्तर पर वायुमंडलीय परिसंचरण, बारिश और तापमान को बदल देता है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा असर मानसून और कृषि पर देखा जाता है। कमजोर या असमान मानसून उन फसलों की उपज को घटा सकता है जो सिंचाई के बिना पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। उत्पादन में गिरावट से आपूर्ति कम होती है, जिससे थोक और खुदरा कीमतें बढ़ने लगती हैं।

फसल की यह कमी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहती बल्कि पूरी फूड सप्लाई चेन (प्रॉक्यूरमेंट, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और रिटेल) पर भी असल डालती है। मुख्य फसलों की कम उपलब्धता से आयात की मांग बढ़ती है, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों का बोझ पड़ता है और देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ता है। Ind-Ra के मुख्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अल नीनो की वजह से पैदा हुई महंगाई कच्चे तेल की कम कीमतों से भारत को मिलने वाले फायदे को भी खत्म कर सकती है।

जब अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां या अन्य फसलें कम पैदा होती हैं, तो बाजार में उनकी उपलब्धता घट जाती है। मांग समान रहने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके सीधे असर से खरीद लागत बढ़ जाती है। आखिरकार यह बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं तक पहुंचती है जिससे घरेलू बजट बिगड़ता है। सरकार को भी कीमतें नियंत्रित करने के लिए अपने स्टॉक से अनाज छोड़ने, आयात बढ़ाने या निर्यात पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं। लगातार खाद्य मुद्रास्फीति बने रहने से भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश भी कम हो जाती है।

दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ अल नीनो का खतरा

मौजूदा अल नीनो एक बड़े वैश्विक जलवायु संकट का रूप ले रहा है। क्लाइमेट ब्रिंक डैशबोर्ड के मुताबिक प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान 30 साल के औसत से लगभग 2.6°C अधिक हो चुका है। पूर्वानुमानों के अनुसार नवंबर तक यह अंतर 3.9°C तक पहुंच सकता है। ऐसा हुआ तो ये 2015 के शक्तिशाली अल नीनो के करीब 3°C के रिकॉर्ड को भी पार कर जाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) का अनुमान है कि 69 प्रतिशत संभावना है कि यह 1950 के बाद का सबसे मजबूत अल नीनो बन जाएगा। इस वजह से दुनिया के कुछ हिस्से अत्यधिक गर्म और सूखे हो रहे हैं जबकि अन्य इलाकों में मूसलाधार बारिश और बाढ़ आ रही है। उदाहरण के लिए इंडोनेशिया में लंबे सूखे के कारण भीषण जंगलों की आग देखी गई है।

जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह अल नीनो वर्ष 2027 में वैश्विक तापमान में करीब 0.3°C और बढ़ा सकता है। इस वजह से ग्लोबल टेंप्रेचर औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 1.76°C ऊपर पहुंच सकता है, जिससे 2027 अब तक का सबसे गर्म साल बन सकता है।

मैन मेड ग्लोबल वार्मिंग भी अल नीनो के असर को और घातक बना रही है। गर्म हवा अधिक नमी सोखती है जिससे अति-बारिश की तीव्रता बढ़ती है, वहीं दूसरी तरफ उच्च तापमान मिट्टी की नमी सुखाकर सूखे को और भीषण बना देता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और कोरल डेटा बताते हैं कि पिछली एक सदी में अल नीनो की तीव्रता में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत के लिए तात्कालिक निष्कर्ष यही है कि भले ही कृषि क्षति अभी व्यापक न हुई हो, लेकिन मानसून के घाटे और अल नीनो के मजबूत होने से खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर जोखिम लगातार मंडरा रहा है।

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