पेट्रोल डीजल के दामों में लगी आग तो सड़कों पर उतर गए पाकिस्तानी और IMF को लगे कोसने

पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। ईंधन के महंगे होने, नई पेट्रोलियम लेवी और बढ़ती महंगाई के विरोध में माल ढोने वाले ट्रांसपोर्टरों ने देशभर में अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। शनिवार से शुरू हुई इस हड़ताल का असर देश में सामान की आवाजाही पर पड़ सकता है। पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के साथ बातचीत में अपनी मांगें पूरी नहीं होने के बाद ट्रक चालक, ट्रेलर ऑपरेटर और तेल टैंकर कंपनियां भी हड़ताल में शामिल हो गई हैं।

ट्रांसपोर्टरों के इस कदम से बाजारों तक सामान पहुंचाने में परेशानी बढ़ सकती है। इसका असर जरूरी सामान की सप्लाई पर भी पड़ने की आशंका है। यह हड़ताल ऐसे समय में शुरू हुई है, जब जमात-ए-इस्लामी ने पेट्रोलियम लेवी और बढ़ती महंगाई के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन किया था। इसके बाद अब ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर आम लोगों और कारोबार पर पड़ने को लेकर पाकिस्तान सरकार पर दबाव और बढ़ गया है।

ट्रांसपोर्टरों ने क्यों शुरू की हड़ताल?

पाकिस्तान के ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि गाड़ियों को चलाने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में माल ढोने वाली गाड़ियां चलाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। ट्रांसपोर्टर सरकार से डीजल की कीमत कम करने, मोटरवे टोल घटाने और विदहोल्डिंग टैक्स में राहत देने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा, ट्रांसपोर्टर चाहते हैं कि पूरे पाकिस्तान में एक्सल-लोड के नियम एक जैसे लागू किए जाएं। उनकी मांग है कि 10 पहियों वाले ट्रकों को 35 टन तक सामान ले जाने की अनुमति दी जाए।

ट्रांसपोर्टरों की दूसरी मांगों में कस्टम के नियमों में बदलाव और हाईवे पर जुर्माना कम करना शामिल है। वे यह भी चाहते हैं कि पंजाब हाईवे पेट्रोल से कमर्शियल गाड़ियों के चालान काटने का अधिकार वापस लिया जाए। इसके अलावा, भारी माल ढोने वाली गाड़ियों के लिए ड्राइविंग लाइसेंस आसानी से जारी करने की भी मांग की गई है। ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि इन समस्याओं का समाधान नहीं होने तक कारोबार चलाना मुश्किल होता जा रहा है।

सरकार और ट्रांसपोर्टरों के बीच बातचीत बेनतीजा

शुक्रवार को ट्रांसपोर्टरों के प्रतिनिधियों और पाकिस्तान के संचार मंत्री अलीम खान के बीच बातचीत हुई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका। ‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑल पाकिस्तान गुड्स ट्रांसपोर्ट इत्तेहाद के प्रवक्ता मोहम्मद ओवैस चौधरी ने कहा कि ट्रांसपोर्टरों ने सरकार के सामने अपनी सभी समस्याएं और मांगें रख दी हैं। सरकार ने बातचीत के लिए सोमवार को एक और बैठक करने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर समाधान नहीं निकलता, तब तक उनका आंदोलन अनिश्चितकाल तक जारी रहेगा। इस हड़ताल से पाकिस्तान में माल की आवाजाही और सामान की सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है।

पाकिस्तान में ईंधन की कीमतें इतनी ज्यादा क्यों हैं?

पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की लागत में बढ़ोतरी बताई जा रही है। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव के कारण ईंधन की सप्लाई पर भी असर पड़ा है। मार्च से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इसका असर पाकिस्तान में भी पड़ा है और सरकार को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बार-बार बदलाव करना पड़ा है। अप्रैल में पेट्रोल की कीमत बढ़कर रिकॉर्ड 459 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थी। वहीं, डीजल की कीमत 520.35 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थी।

पाकिस्तान के लिए डीजल बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में सड़क के जरिए होने वाले माल परिवहन का बड़ा हिस्सा डीजल से चलता है। ऐसे में डीजल की कीमत बढ़ने का सीधा असर ट्रकों और दूसरी कमर्शियल गाड़ियों के संचालन खर्च पर पड़ता है। इससे सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की लागत भी बढ़ जाती है। इसके अलावा, सरकार ने पेट्रोलियम लेवी भी लागू की है। यह लेवी ईंधन की अंतिम कीमत में जुड़ती है और इसका बोझ सीधे ग्राहकों पर पड़ता है। यही वजह है कि पाकिस्तान में बढ़ती ईंधन कीमतों का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर सामान की कीमतों और आम लोगों के घरेलू बजट पर भी पड़ रहा है।

पेट्रोलियम लेवी क्या है?

पेट्रोलियम लेवी ईंधन पर सरकार की ओर से लगाया जाने वाला एक शुल्क है। इसे पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों पर वसूला जाता है। इससे सरकार को राजस्व मिलता है। पाकिस्तान में यह लेवी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है, क्योंकि इसे पहले से महंगे ईंधन के ऊपर लगाया गया है। जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख हाफिज नईम-उर-रहमान ने सरकार से पेट्रोलियम लेवी हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार की आर्थिक और वित्तीय नीतियों का बोझ सीधे आम लोगों पर डाला जा रहा है।

शुक्रवार को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हाफिज नईम-उर-रहमान ने कहा कि यह लेवी स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनकी सरकार से इसे खत्म करने की अपील की। उन्होंने सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया है कि पेट्रोलियम लेवी कम करने से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ पाकिस्तान की प्रतिबद्धताओं पर असर पड़ सकता है।

सड़कों पर उतरे आम पाकिस्तानी

ट्रांसपोर्टरों की लंबी हड़ताल का सीधा असर आम लोगों पर पड़ सकता है। अगर हड़ताल ज्यादा दिनों तक जारी रहती है, तो देशभर में सामान की ढुलाई महंगी हो सकती है। ट्रक और ट्रेलर शहरों के बीच खाने-पीने की चीजें, रोजमर्रा का सामान, कारखानों के लिए कच्चा माल और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाते हैं। वहीं, तेल टैंकर पेट्रोल और डीजल की सप्लाई का काम करते हैं।

अगर ट्रांसपोर्ट का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक बंद रहता है, तो कंपनियों को सामान पहुंचाने में देरी हो सकती है। साथ ही, उन्हें ढुलाई और सामान पहुंचाने पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। इसका असर आगे चलकर सामान की कीमतों पर पड़ सकता है और कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाली हड़ताल पाकिस्तान में महंगाई का दबाव और बढ़ा सकती है। यही महंगाई पहले से लोगों की परेशानी का कारण बनी हुई है और इसी के विरोध में प्रदर्शन भी हो रहे हैं।

तेल टैंकर ऑपरेटरों के हड़ताल में शामिल होने से चिंता और बढ़ गई है। अगर ईंधन की ढुलाई प्रभावित होती है, तो पेट्रोल पंपों और दूसरे ईंधन वितरण केंद्रों तक पेट्रोल-डीजल की सप्लाई पर असर पड़ सकता है। इससे आने वाले दिनों में ईंधन की उपलब्धता को लेकर भी परेशानी खड़ी हो सकती है।

मुस्लिम नाटो- पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये के बीच रक्षा समझौता साइन:एक पर हमला तीनों पर माना जाएगा; साझा ट्रेनिंग और सुरक्षा सहयोग बढ़ेगा

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में बढ़ा कदम उठाया है। तीनों देशों ने शुक्रवार को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के मुताबिक, अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो इसे तीनों देशों पर अटैक माना जाएगा। इस समझौते पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन ने संयुक्त रक्षा शिखर सम्मेलन के दौरान साइन किए। समझौते के तहत तीनों देश आपस में रक्षा सहयोग बढ़ाएंगे। इसके लिए संयुक्त सैन्य ट्रेनिंग, सुरक्षा से जुड़ी जानकारी साझा करने और सुरक्षा समन्वय बढ़ाने पर काम किया जाएगा। साथ ही तीनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग भी मजबूत किया जाएगा। समझौते के तहत सैन्य मदद कितनी तय है विश्लेषकों के मुताबिक, तीनों देशों ने क्षेत्रीय विरोधियों को नाराज करने से बचने की कोशिश की है। यह अभी साफ नहीं है कि समझौता अपने किसी सदस्य पर हमला होने पर बाकी सदस्यों को उसकी रक्षा के लिए कितना मजबूर करेगा। किलोवेन ग्रुप सलाहकार कंपनी के चेयरमैन हार्लन उलमैन ने अल जजीरा से कहा, “हमने अभी मक्का घोषणा नहीं देखी है। हमारा मानना है कि इसमें कहा गया है कि एक पर हमला सभी पर हमला माना जाना चाहिए। यहां ‘माना जाना चाहिए’ महत्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि इसका मतलब ‘जरूरी तौर पर’ नहीं है।” क्षेत्रीय खतरे इन देशों से दूर नहीं हैं। पाकिस्तान फरवरी से अफगानिस्तान के साथ सीमा संघर्ष में उलझा हुआ है। मई 2025 में उसका परमाणु शक्ति संपन्न भारत के साथ भी कई दिनों तक गोलीबारी का आदान-प्रदान हुआ था। सऊदी अरब पर फरवरी के अंत में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान और उसके सहयोगी बार-बार हमले कर चुके हैं। तुर्किये कई साल से देश के अंदर और बाहर कुर्द सशस्त्र समूहों से लड़ता रहा है। इजराइल के साथ उसका तनाव भी बढ़ा है। उलमैन जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह साफ नहीं है कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौता तीनों देशों को इनमें से किसी संघर्ष में कैसे खींच सकता है। उलमैन ने कहा, “मान लीजिए यमन में हूती सऊदी अरब पर हमला करते हैं, तो क्या इससे तुर्किये इसमें शामिल होगा? क्या पाकिस्तान शामिल होगा? यह अभी देखा जाना बाकी है।” मध्य पूर्व में बदलते समीकरण मध्य पूर्व में पिछले कुछ सालों में काफी उथल-पुथल हुई है। इसमें सबसे अहम घटनाएं 7 अक्टूबर 2023 को हमास का इजराइल पर हमला और उसके बाद गाजा में इजराइल का नरसंहार हैं। ईरान और इजराइल के बीच दशकों से चल रही धमकियां भी ऐसे क्षेत्रीय युद्ध में बदल गई हैं, जो अभी खत्म नहीं हुआ है। अब मध्य पूर्व और उसके बाहर के कई देश इस अव्यवस्था से निपटने और अगले दौर की तैयारी का तरीका तलाश रहे हैं। इनमें से कई देश पुराने मतभेद पीछे छोड़कर आपसी खतरों के सामने व्यावहारिक रास्ता अपनाने का फैसला करते दिख रहे हैं। तुर्किये और सऊदी अरब इसके उदाहरण हैं। 2018 में सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की अपने देश के इस्तांबुल वाणिज्य दूतावास में हत्या के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार आ गई थी। यह तनाव कई साल तक बना रहा। लेकिन 2022 तक रियाद और अंकारा ने पुराने मतभेद पीछे रखने शुरू कर दिए। सऊदी अरब पूरे क्षेत्र में तनाव कम करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा था, जबकि तुर्किये अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करना चाहता था। इसके बाद से इजराइल और ईरान ने मध्य पूर्व पर दबाव बनाया है और इस क्षेत्र के लिए अलग-अलग योजनाओं पर आगे बढ़े हैं। माना जाता है कि इसी दबाव ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये को एक-दूसरे के करीब आने में मदद की है। तीनों देशों की अलग-अलग ताकत मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का मकसद तीनों देशों के सामने आने वाले किसी भी खतरे को रोकना है। अल जजीरा के संवाददाता उसामा बिन जावेद ने कहा कि तीनों देश इस समझौते में अलग-अलग ताकत लेकर आए हैं। बिन जावेद ने कहा, “इनमें से हर देश अपनी खास क्षमता लेकर आया है। पाकिस्तान के पास युद्ध का अनुभव रखने वाली सेना, हथियार और परमाणु हथियार हैं। मुस्लिम बहुल देश में परमाणु हथियार रखने वाला यह इकलौता देश है।” उन्होंने कहा, “नाटो के महत्वपूर्ण सदस्य तुर्किये के पास दुनिया की बेहतरीन ड्रोन तकनीक और उन्नत रक्षा निर्माण क्षमता है। सऊदी अरब इन सबको आर्थिक ताकत देने का काम करेगा।” अमेरिका को लेकर उठ रहे सवालों के बीच नए सैन्य गठबंधनों और खतरों से बचाव के नए तरीकों की जरूरत और ज्यादा महसूस की जा रही है। सऊदी अरब और कुछ हद तक तुर्किये लंबे समय से अमेरिका को अपना प्रमुख सुरक्षा सहयोगी मानते रहे हैं। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति लगातार बदलती और अनिश्चित होती जा रही है। ऐसे में दुनिया के कई देश दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि मध्य पूर्व में इजराइल अमेरिका की विदेश नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता दिखाई देता है। इससे यह चिंता बढ़ी है कि अमेरिका अपने दूसरे सहयोगियों की रक्षा करने के लिए कितना तैयार होगा। उलमैन ने कहा, “ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि सहयोगियों को अपनी रक्षा खुद करनी होगी। मेरे लिए यह साफ है कि हमारे सहयोगी दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं।” इजराइल और ईरान को लेकर सावधानी इजराइल और ईरान ने खुद को क्षेत्रीय खतरे के रूप में दिखाया है। फिर भी मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल देशों ने यह बताने से सावधानी बरती है कि यह गठबंधन किसी बाहरी ताकत के खिलाफ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इजराइल और ईरान से पैदा होने वाले खतरे साफ हैं। बिन जावेद ने कहा, “तीनों देशों के लिए इजराइल क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता का सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।” उन्होंने कहा, “ईरान इस खतरे की सूची में उसके ठीक बाद आता है। खासकर ईरान की ओर से वॉशिंगटन के हितों पर हमलों के बाद सऊदी अरब के लिए यह खतरा और ज्यादा है।” क्षेत्र के कई लोगों का मानना है कि इजराइल ने 2023 के बाद यह दिखाया है कि वह मतभेदों को बातचीत से सुलझाने के बजाय सैन्य ताकत से सुलझाने में ज्यादा रुचि रखता है। इससे पहले इजराइल ने सऊदी अरब के साथ रिश्ते सामान्य करने की कोशिश की थी। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उभरते हुए “सुन्नी गठबंधन” के खतरों की बात भी शुरू की है। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया है कि उनका मतलब किस गठबंधन से है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेतन्याहू के बयान ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जिसमें सुन्नी बहुल ताकतें वास्तव में एक साथ आ जाएं। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये तीनों देशों में सुन्नी बहुसंख्यक हैं। ईरान पहले ही सऊदी अरब पर हमला कर चुका है। ईरान समर्थित दूसरे समूह भी सऊदी अरब पर हमले कर चुके हैं। इसके जवाब में सऊदी अरब ने इराक में ईरान समर्थित समूहों पर हमले किए हैं। क्या गठबंधन में नए देश जुड़ेंगे यह अभी साफ नहीं है कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में मिस्र, कतर, सीरिया और संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई जैसे दूसरे देश भी शामिल होंगे या नहीं। ऐसे गठबंधन के फायदे समझ में आते हैं। मध्य पूर्व के सुन्नी बहुल देश अक्सर अलग-अलग रहे हैं। कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसी वजह से वे इजराइल और ईरान से पैदा होने वाले खतरों से निपट नहीं पाए हैं। हालांकि, पुराने मतभेद और अलग-अलग हित इस गठबंधन के विस्तार को तय नहीं मानने की वजह देते हैं। सीरिया इस समय 13 साल चले भीषण संघर्ष के बाद युद्ध के बाद पुनर्निर्माण पर ध्यान दे रहा है। इजराइल की उत्तरी सीमा पर उसकी स्थिति ऐसी है कि वह ऐसे समझौते में शामिल होने से हिचक सकता है, जिसे इजराइल नकारात्मक नजर से देखे। मिस्र ने भी साफ संकेत दिए हैं कि उसका ध्यान अर्थव्यवस्था पर है और वह देश के अंदर किसी उथल-पुथल से बचना चाहता है। अतीत में वह क्षेत्र में जहाजों के रास्तों की सुरक्षा के लिए सऊदी अरब की अगुआई वाले समुद्री गठबंधन में शामिल होने से हिचक चुका है। मिस्र को डर था कि वह क्षेत्रीय संघर्ष में खिंच सकता है। यूएई भी सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के गठबंधन में संभावित सदस्य हो सकता है। लेकिन हाल के सालों में यूएई के रुख कई बार इन देशों से अलग रहे हैं। यमन और इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने जैसे मुद्दों पर यह अंतर सबसे ज्यादा दिखाई दिया है। अमेरिका के समर्थन से हुए अब्राहम समझौते इजराइल के साथ ज्यादा करीबी रखने वाले एक दूसरे क्षेत्रीय समूह को सामने लाते हैं। इसे मक्का गठबंधन में शामिल देशों के प्रतिद्वंद्वी समूह के रूप में देखा जा सकता है। गठबंधन की असली परीक्षा कब होगी मध्य पूर्व के रिश्तों की जटिलता शुक्रवार को हुए समझौते के बाद नए क्षेत्रीय समीकरण के उभरने वाली किसी भी धारणा की मुश्किलें दिखाती है। इस क्षेत्र में गठबंधन दशकों से बदलते रहे हैं। आगे भी इनमें बदलाव हो सकते हैं। इस गठबंधन का असली आकलन तब होगा, जब इसकी वास्तविक परीक्षा होगी। इजराइल और ईरान ने दिखाया है कि वे युद्ध करने और उसके नतीजे झेलने के लिए तैयार हैं। अब सवाल यह है कि क्या सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान एक-दूसरे के लिए ऐसा करने को तैयार हैं। आज के मध्य पूर्व में ऐसी स्थिति बन सकती है, जो उन्हें यह फैसला लेने के लिए मजबूर करे। आखिरकार, उनके फैसले ही साफ करेंगे कि क्या वास्तव में एक तीसरा क्षेत्रीय ध्रुव उभर रहा है।

इमरान खान के बेटों ने 7 महीने से नहीं देखा अपने पिता को, पाकिस्तान जेल में क्या हुआ पूर्व PM के साथ? अब मिला ये जवाब

पाकिस्तान के जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के बेटों ने एक बार फिर अपने पिता की सेहत को लेकर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने पिछले सात महीनों से परिवार के सदस्यों, वकीलों और डॉक्टरों को उनसे मिलने नहीं दिया है।

बता दें कि इमरान खान की गिरफ्तारी के तीन साल पूरे होने पर CNN से बात करते हुए कासिम खान और सुलेमान ईसा खान ने कहा कि उन्हें अपने पिता की हालत के बारे में कोई भरोसेमंद जानकारी नहीं मिली है, क्योंकि उनसे मिलने-जुलने पर बहुत ज्यादा पाबंदियां लगा दी गई हैं।

दोनों भाइयों ने कहा, “हमें कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है क्योंकि पिछले सात महीनों से उनके परिवार, डॉक्टरों और वकीलों को उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी गई है।”

इमरान खान के बेटों का यह बयान ऐसे समय आया है, जब खान की पार्टी ‘पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ’ (PTI) के हजारों समर्थकों ने पूरे पाकिस्तान में प्रदर्शन करके पूर्व प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी बुशरा बीबी की रिहाई की मांग की।

इमरान खान, जो 2018 से 2022 में संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए हटाए जाने तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे, 2023 से जेल में हैं। उन्हें भ्रष्टाचार और सरकारी राज जाहिर करने समेत कई मामलों में दोषी ठहराया गया है।

खान और उनके समर्थकों का हमेशा से यह कहना रहा है कि उन पर चल रहे मामले राजनीतिक मकसद से प्रेरित हैं और इनका मकसद उन्हें दोबारा सत्ता में आने से रोकना है।

वहीं, पद से हटाए जाने के बाद, खान ने देश भर में कई रैलियां कीं। उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार पर आरोप लगाया कि उसने उन्हें पद से हटाने के लिए पाकिस्तान की सेना और अमेरिका के साथ मिलकर काम किया है। हालांकि, पाकिस्तानी सेना और वॉशिंगटन, दोनों ने ही इन आरोपों से इनकार किया है।

बाद में, पाकिस्तानी सरकार ने PTI नेताओं और समर्थकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की और पार्टी को 2024 के आम चुनाव लड़ने से रोक दिया।

बेटों ने कहा- पाकिस्तान जाने की कोशिशें नाकाम रहीं

कासिम और सुलेमान, जो 2004 में इमरान खान और उनकी मां जेमिमा गोल्डस्मिथ के अलग होने के बाद से यूनाइटेड किंगडम में रह रहे हैं, ने कहा कि उन्होंने अपने पिता से मिलने के लिए पाकिस्तान जाने की कई बार कोशिश की।

CNN के मुताबिक, भाइयों का दावा है कि जब भी उन्होंने खान की जेल की सजा के बारे में सार्वजनिक रूप से बात की, तो पाकिस्तानी अधिकारियों ने वीजा में देरी करके और प्रशासनिक अड़चनें पैदा करके उनके लिए वहां जाना और मुश्किल बना दिया।

कासिम ने कहा, “हम कोशिश कर रहे हैं, हम जाना चाहते हैं, लेकिन कुछ हो नहीं पा रहा है।”

उन्होंने आगे कहा “ऐसा कोई कारण नहीं है कि हमें वीजा न मिले।”

वहीं दूसरी तरफ, पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने CNN को दिए एक बयान में उन आरोपों को खारिज कर दिया। मंत्रालय ने कहा कि दोनों भाइयों के पास ‘ओवरसीज पाकिस्तानियों’ के लिए नेशनल आइडेंटिटी कार्ड हैं, जिनकी वजह से उन्हें बिना वीजा के पाकिस्तान में एंट्री मिलनी चाहिए।

मंत्रालय ने उनके दावों को “गुमराह करने वाला” बताया और कहा कि ऐसा लगता है कि वे एक प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक फायदा उठाने के मुद्दे में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि, कासिम और सुलेमान ने CNN को बताया कि उनके आइडेंटिटी कार्ड की मियाद खत्म हो गई थी और उन्हें रिन्यू नहीं कराया गया था। मंत्रालय ने इस दावे पर सीधे तौर पर कोई बात नहीं की।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पहुंच की मांग की

इस मामले ने एमनेस्टी इंटरनेशनल का भी ध्यान खींचा है। इस हफ्ते जारी एक बयान में, मानवाधिकार संगठन ने पाकिस्तानी अधिकारियों से आग्रह किया कि वे “बिना किसी शर्त के इमरान खान और बुशरा बीबी खान को अपने परिवार और वकीलों से मिलने का अधिकार बहाल करें।“

एमनेस्टी ने आगे कहा कि दोनों को “बेहतर इलाज की सुविधा मिलनी चाहिए और उन्हें अकेले रखने (solitary confinement) की व्यवस्था, जो गैर-कानूनी है, तुरंत खत्म की जानी चाहिए।“

पाकिस्तान सरकार ने आरोपों को खारिज किया

वहीं, पाकिस्तान सरकार ने इमरान खान को अलग-थलग रखने या उन्हें चिकित्सा सुविधा नहीं देने के आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

CNN को दिए एक बयान में सरकार ने कहा कि वह “साफ तौर पर इस दावे को खारिज करती है कि मिस्टर इमरान खान नियाजी को सात महीने तक संचार-संपर्क से दूर रखा गया या उन्हें अपने परिवार, वकीलों और डॉक्टरों से मिलने नहीं दिया गया।” सरकार ने यह भी कहा कि “सबूत बताते हैं कि (कैदी को) बार-बार और पर्याप्त रूप से मिलने-जुलने की सुविधा दी गई है।”

सरकार ने कहा कि खान ने हाल ही में 21 मार्च, 2026 को अपने एक बेटे से बात की थी। इससे पता चलता है कि बातचीत बंद नहीं की गई थी, बल्कि इसे “पाकिस्तान जेल नियमों, लागू अदालती आदेशों, मंजूर शेड्यूल और हाई-प्रोफाइल कैदी के लिए सुरक्षा जरूरतों के तहत रेगुलेट” किया गया था।

अधिकारियों ने यह भी कहा कि खान की मेडिकल हालत “ठीक और स्थिर” बनी हुई है और इसमें “कोई गंभीर या अनियंत्रित गिरावट” नहीं आई है।

सरकार के बयान के मुताबिक, इमरान खान को डॉक्टरों की सलाह, जेल नियमों और अदालत के निर्देशों के अनुसार इलाज, दवाएं और नियमित मेडिकल जांच की सुविधा दी जा रही है।

पाकिस्तान की सरकार ने जेल की खराब स्थितियों के दावों को भी खारिज कर दिया। उसने कहा कि खान को “लगभग 30 से 35 कैदियों के लिए बनाए गए एक खास सात-सेल वाले कंपाउंड” में रखा गया है।

सरकार के बयान के अनुसार, इस परिसर में “57 x 14 फीट का एक गलियारा और 35 x 37 फीट का एक लॉन” शामिल है। इसके अलावा वहां इमरान खान के लिए बिस्तर, गद्दा, चार तकिए, कंबल, टेबल, कुर्सी, शौचालय की सुविधा और व्यायाम के उपकरण भी उपलब्ध हैं।

सरकार ने आगे कहा कि ये व्यवस्थाएं उस तस्वीर से बिल्कुल अलग हैं, जिसमें सार्वजनिक रूप से इमरान खान को अलग-थलग रखने, उपेक्षा करने या सजा के तौर पर सुविधाओं से वंचित करने की बात कही जा रही है।

बेटे खान की हालत को लेकर परेशान

सरकार द्वारा भरोसा दिलाने के बावजूद, कासिम ने कहा कि परिवार बहुत परेशान है क्योंकि उन्हें खान की सेहत के बारे में कोई स्वतंत्र जानकारी नहीं मिली है।

उन्होंने कहा, “वे हमें किसी भी तरह की हेल्थ रिपोर्ट दिखाने से इनकार कर रहे हैं। इसलिए हो सकता है कि तब से उनकी सेहत काफी खराब हो गई हो।”

भाइयों ने इस बात को भी खारिज कर दिया कि उनके पिता सरकार के साथ कोई राजनीतिक समझौता कर सकते हैं।

सुलेमान ने कहा कि खान “ऐसा कोई समझौता नहीं करेंगे जिससे दूसरे राजनीतिक कैदी वहीं रह जाएं… जब तक कि उनके लिए भी कोई समाधान न निकल आए।”

कासिम को भी ऐसी संभावना कम ही लगी, हालांकि उन्होंने कहा कि “कुछ कहना मुश्किल है।”

कासिम ने अंत में अपनी बात खत्म करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान में हो रही घटनाओं पर ध्यान देने की अपील की।

उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन यह सबसे निराशाजनक बातों में से एक है। सिर्फ बेटों के तौर पर नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए, उन 35 करोड़ लोगों के लिए जिन्होंने उन्हें वोट दिया है, जो उनका समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि वे देश का नेतृत्व करें। लेकिन इसके बजाय, उन्हें दरकिनार किया जा रहा है और जिस व्यक्ति को वे सत्ता में देखना चाहते हैं, वह बिना किसी ठोस वजह के जेल में है।”

यह भी पढ़ें: California Diwali Holiday: कैलिफोर्निया में दिवाली पर हुआ था सरकारी छुट्टी का ऐलान, कोर्ट ने क्यों रद्द कर दिया ये फैसला?

PoK का सच दिखाया तो भड़का पाकिस्तान! ‘अल जजीरा’ पर कसा शिकंजा, जानिए क्या है PoK की हकीकत

Al Jazeera ban in Pakistan

Al Jazeera ban in Pakistan: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में हालिया चुनावी घटनाक्रम और सरकार विरोधी प्रदर्शनों की निष्पक्ष कवरेज करने पर कतर के अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क 'अल जजीरा' पर पाकिस्तान सरकार की गाज गिरी है। पाकिस्तान में अल जजीरा की वेबसाइट को ब्लॉक किए जाने की खबरें हैं। जानिए इस पूरे विवाद का विवरण और क्या है PoK से जुड़ा ऐतिहासिक व राजनीतिक मामला।

 

मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया दावों के मुताबिक, शहबाज शरीफ सरकार ने कतर के इस प्रमुख समाचार नेटवर्क की अंग्रेजी वेबसाइट तक पहुंच को बाधित (ब्लॉक) कर दिया है। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने औपचारिक रूप से बैन का आदेश जारी नहीं किया है, लेकिन देश भर में यूजर्स अल जजीरा की वेबसाइट एक्सेस नहीं कर पा रहे हैं। ALSO READ: PoK के रावलकोट में पाकिस्तानी सेना की बर्बरता, मुनीर ने पाकिस्तानी क्रिकेटर को ही गोलियों से भून डाला

पाकिस्तान सरकार का आरोप

पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अल जजीरा की रिपोर्टिंग पर सख्त ऐतराज जताते हुए उस पर 'चुनिंदा रिपोर्टिंग' और 'पीत पत्रकारिता' करने का आरोप लगाया है। मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर जारी बयान में कहा कि अल जजीरा ने PoK की राजधानी मुजफ्फराबाद के कुछ चुनिंदा मतदान केंद्रों से एकतरफा रिपोर्टिंग की और चुनिंदा लोगों के बयानों को दिखाकर पूरी चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करने की कोशिश की। पाकिस्तान का दावा है कि इस तरह की कवरेज बाहरी ताकतों के उस एजेंडे को बढ़ावा देती है जिसका मकसद लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनादेश को कमजोर करना है। ALSO READ: PoK में विरोध प्रदर्शन पर MEA का बड़ा बयान, Hormuz और Pakistan को लेकर क्या है भारत का प्लान

CPJ की चिंता, पत्रकारों के गायब होने से बवाल

दूसरी ओर, प्रेस की स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था 'कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' (CPJ) ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में मीडिया पर बढ़ते प्रतिबंधों और सेंसरशिप पर गहरी चिंता व्यक्त की है। CPJ के अनुसार, 1 अगस्त को स्वतंत्र पत्रकार राजी ताहिर और उनके सहयोगी मुहम्मद सैफ को इस्लामाबाद स्थित उनके दफ्तर से पुलिस की वर्दी में आए लोग उठा ले गए, जिसके बाद से वे लापता हैं।

 

एक अन्य कश्मीरी पत्रकार राजा इकराम को भी 1 अगस्त को हिरासत में लिया गया था, हालांकि उन्हें बाद में छोड़ दिया गया। CPJ का कहना है कि 5 जून से ही PoK में आंशिक इंटरनेट बंदी, टेलीकॉम सेवाओं पर कड़े प्रतिबंध और अल जजीरा जैसी वैश्विक वेबसाइट्स को ब्लॉक करना यह साबित करता है कि पाकिस्तान मीडिया की आवाज दबाने के लिए हर संभव हथकंडा अपना रहा है। ALSO READ: पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoK/PoJK): कब बनेगा भारत का हिस्सा, जानिए इतिहास

क्या है PoK से जुड़ा पूरा मामला?

वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के बाद, पाकिस्तान ने कबायलियों के वेश में अपनी सेना भेजकर जम्मू-कश्मीर रियासत के एक बड़े भू-भाग पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया था। इसे भारत पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) कहता है। पाकिस्तान इस क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटकर देखता है— एक हिस्से को वह 'आजाद जम्मू-कश्मीर (AJK)' कहता है और दूसरे हिस्से को 'गिलगित-बाल्टिस्तान'।

भारत का आधिकारिक रुख

भारत का स्पष्ट और निरंतर रुख रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (जिसमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान शामिल हैं) भारत का अखंड और अभिन्न अंग है। 1994 में भारतीय संसद में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के तहत, पाकिस्तान को अपने अवैध कब्जे वाले भारतीय क्षेत्रों को खाली करना होगा।

PoK में जनता का आक्रोश

PoK में पाकिस्तान सरकार और सेना के खिलाफ स्थानीय जनता में भारी असंतोष है। महंगाई, भारी टैक्स, बुनियादी सुविधाओं की कमी, राजनीतिक अधिकारों के हनन और चुनावों में धांधली को लेकर मुजफ्फराबाद, रावलकोट, और कोटली जैसे इलाकों में अक्सर बड़े पैमाने पर उग्र प्रदर्शन होते रहे हैं। पाकिस्तान जब भी यहां दिखावे के लिए चुनाव कराता है, तो उस पर भारी धांधली और सेना के हस्तक्षेप के आरोप लगते हैं।

PoK में आज विधानसभा चुनाव का पहला चरण:45 में से 13 सीटों पर मतदान; विरोध प्रदर्शन की वजह से तीन चरणों में चुनाव होगा

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सोमवार को विधानसभा चुनाव का पहला चरण हैं। पाकिस्तानी चुनाव आयोग के मुताबिक, मौजूदा सुरक्षा हालात और विरोध प्रदर्शनों के देखते हुए यह चुनाव तीन चरणों में होंगे। पहला 27 जुलाई, दूसरा 2 अगस्त और तीसरा 10 अगस्त को मतदान कराया जाएगा। चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन की 13 सीटों पर मतदान होगा। दो अगस्त को मुजफ्फराबाद डिवीजन की 9 सीटों और पाकिस्तान में रहने वाले शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। अंतिम चरण में 10 अगस्त को पूंछ डिवीजन की 11 सीटों पर मतदान होगा। PoK में कई महीनों से चल रहा है विरोध प्रदर्शन PoK में पिछले कई महीनों से महंगाई, बिजली के बढ़े हुए बिल, सरकारी नीतियों और राजनीतिक दखल के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों की अगुआई जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) कर रही है। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में कई लोगों की मौत हुई है। महंगाई के विरोध से शुरू हुआ ये आंदोलन, अब पाकिस्तान सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल गया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने कई जगह बल प्रयोग किया, रास्ते बंद किए और संचार सेवाएं रोक दीं। उनका कहना है कि इससे खाने-पीने की चीजों और दवाइयों की भी कमी हो गई। कई प्रदर्शनकारी पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी हटाने और क्षेत्र की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था पर भी सवाल उठा रहे हैं। 12 शरणार्थी सीटों पर सबसे ज्यादा विवाद विरोध प्रदर्शनों की एक बड़ी वजह विधानसभा की 12 शरणार्थी सीटें भी हैं। ये सीटें पाकिस्तान में रहने वाले उन लोगों के लिए आरक्षित हैं जो दशकों पहले कश्मीर से वहां गए थे। JKJAAC और कई स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद की सरकार चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। इससे स्थानीय लोगों की राय कमजोर पड़ जाती है और केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को फायदा मिलता है। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, इस बार के चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब लोगों का बड़ा वर्ग पाकिस्तान सरकार की नीतियों से नाराज है। इसी वजह से चुनाव की निष्पक्षता और उसके नतीजों पर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं, PoK के चुनाव आयुक्त गुलाम मुस्तफा मुगल ने बताया कि मतदान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बल और सेना तैनात रहेगी। क्या चुनाव से खत्म होगी नाराजगी? एक्सपर्ट्स का मानना है कि मतदान तो हो जाएगा और वोटिंग भी हो सकती है, लेकिन इससे लोगों की मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा। महंगाई, बिजली, राजनीतिक अधिकार, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और पाकिस्तान की भूमिका जैसे मुद्दे अभी भी बने हुए हैं। ऐसे में चुनाव के बाद भी PoK में राजनीतिक तनाव जारी रहने की आशंका जताई जा रही है। भारत ने चुनाव पर विरोध दर्ज कराया भारत लगातार कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पूरे केंद्र शासित प्रदेश, जिनमें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल हैं, भारत के अभिन्न हिस्से हैं। भारत ने PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान में होने वाले चुनावों पर पहले भी कई बार पाकिस्तान के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया है और इन क्षेत्रों की तथाकथित विधानसभाओं को मान्यता नहीं दी है। मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल ने हालात पर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने भी हिंसा में हुई मौतों की निष्पक्ष जांच की मांग की है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से PoK में मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की अपील की है। नवाज शरीफ ने PoK का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जताई चुनावी माहौल के बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) प्रमुख नवाज शरीफ ने मुजफ्फराबाद की चुनावी रैली में कहा कि अगर उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो वह प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने के लिए कहेंगे ताकि वे खुद इलाके के विकास की निगरानी कर सकें। नवाज शरीफ ने कहा कि PoK उनके लिए पंजाब जितना ही प्रिय है और उनके पूर्वज कश्मीर से आए थे। उन्होंने कहा कि यह उनका दूसरा घर है। इस चुनाव में PML-N का मुकाबला पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) से है। खास बात यह है कि PPP इस समय केंद्र सरकार में PML-N की सहयोगी भी है। 2021 में इमरान खान की पार्टी ने बनाई थी सरकार PoK में विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का होता है। इससे पहले 2021 में PoK विधानसभा चुनाव में इमरान खान की पार्टी (PTI) ने 45 में से 25 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसके बाद सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी प्रधानमंत्री बने। हालांकि अप्रैल 2022 में इमरान खान की सरकार गिर गई। मई 2022 में सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद PTI ने ही सरदार तनवीर इलियास को नया प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन अप्रैल 2023 में PoK की उच्च अदालत ने उन्हें अदालत की अवमानना के मामले में अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद उनका पद चला गया और एक बार फिर नया प्रधानमंत्री चुनना पड़ा। इसके बाद PTI के ही चौधरी अनवरुल हक प्रधानमंत्री बने। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने इमरान खान और PTI से दूरी बना ली और खुद को स्वतंत्र नेता के रूप में स्थापित किया। चौधरी अनवरुल हक को भी नवंबर 2025 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए हटा दिया गया था, और अब वहां पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के फैसल मुमताज राठौर नए प्रधानमंत्री हैं।

अमेरिका ने ईरान के 5 शहरों पर बम बरसाए:लगातार 11वीं रात हमला; जंग में US 3 लाख करोड़ खर्च कर चुका

अमेरिका ने बुधवार तड़के ईरान के पांच शहरों में एक साथ एयर और मिसाइल स्ट्राइक की। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक चाबहार, कोनारक, तबरीज, बेहबहान और ओमीदियेह को निशाना बनाया गया। सीजफायर टूटने के बाद यह लगातार 11वीं रात है, जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ईरान के संदिग्ध परमाणु ठिकाने पिकएक्स माउंटेन पर ‘बहुत जल्द और बहुत भारी’ हमला कर सकता है। ट्रम्प की इस चेतावनी के जवाब में ईरान ने कहा कि यदि हमले जारी रहे तो वह क्षेत्र में युद्ध का दायरा और बढ़ा सकता है। इस बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बताया है कि अब तक इस युद्ध पर अमेरिका का खर्च 37.5 अरब डॉलर (करीब 3.2 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच गया है। अमेरिकी स्ट्राइक का वीडियो… पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… भारत-चीन के टैंकरों ने रास्ता बदला: सऊदी अरब से कच्चा तेल लेकर भारत और चीन जा रहे दो टैंकर हूती विद्रोहियों की धमकी के बाद रेड सी में यू-टर्न लेकर स्वेज नहर की ओर लौट गए। अमेरिका ने माना- ईरानी हमलों में 100 सैनिक घायल: पेंटागन ने स्वीकार किया कि 7 जुलाई के बाद ईरानी हमलों में करीब 100 अमेरिकी सैनिक घायल हुए। इनमें से 96% सैनिक इलाज के बाद ड्यूटी पर लौट चुके हैं। कतर ने ईरान से मुआवजा मांगा: कतर ने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद को पत्र भेजकर ईरान को हालिया हमलों और उनसे हुए सभी नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया और पूरा मुआवजा देने की मांग की। ट्रम्प ने माना- जॉर्डन में एक ईरानी हमला सफल रहा: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने माना कि जॉर्डन में ईरान का एक हमला सफल रहा। हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत भी हुई थी। ईरानी गृह मंत्री पाकिस्तान पहुंचे: ईरान के गृह मंत्री एस्कंदर मोमेनी पाकिस्तान पहुंचे और सेना प्रमुख आसिम मुनीर से मुलाकात की। बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से भी बातचीत की। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

Indus Waters Treaty: सिंधु जल समझौते में उलझा रहा पाकिस्तान उधर भारत ने चिनाब पर 4870 MW हाइड्रोपावर प्लान पर लगा दिया जोर!

Indus Waters Treaty: 1960 के सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के करीब 15 महीने बाद भारत ने साफ कर दिया है कि अब यह समझौता अपने पुराने रूप में वापस नहीं लौटेगा। सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि भारत सरकार पाकिस्तान के साथ इस संधि पर फिर से बातचीत करने के लिए तैयार है। लेकिन इसके मौजूदा स्वरूप को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है।

वहीं, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने पाकिस्तान को बड़ा रणनीतिक जवाब देते हुए चिनाब बेसिन में 4870 मेगावाट (MW) की कुल क्षमता वाली 5 बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पर काम बेहद तेज कर दिया है। सरकारी सूत्रों ने सोमवार को द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि मौजूदा स्वरूप में सिंधु जल समझौता दोबारा काम नहीं कर सकता। आइए जानते हैं भारत की इन 5 बड़े प्रोजेक्ट का पूरा विस्तृत ब्योरा और उनकी मौजूदा स्थिति।

चिनाब बेसिन पर भारत के 5 बड़े प्रोजेक्ट: जानिए किस प्रोजेक्ट में कितना हुआ काम

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार की मौजूदा प्राथमिकताओं में सावलकोट (1856 MW), पाकल दुल (1000 MW), रतले (850 MW), किरू (624 MW) और क्वार (540 MW) प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी NHPC की 18 मई 2026 की लेटेस्ट फाइनेंशियल और टेक्निकल अर्निंग कॉल्स के मुताबिक ये सभी परियोजनाएं इस समय अलग-अलग चरणों में हैं।

इनमें सबसे पहले पाकल दुल जलविद्युत परियोजना की बात करें तो 1000 मेगावाट क्षमता वाले इस प्रोजेक्ट का मार्च 2026 तक 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और NHPC ने इसे वित्त वर्ष 2027 की चौथी तिमाही यानी जनवरी से मार्च 2027 के बीच चालू करने का लक्ष्य रखा है। 624 मेगावाट क्षमता वाली किरू परियोजना का काम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसका 82 प्रतिशत निर्माण काम पूरा कर लिया गया है। इसे भी जनवरी से मार्च 2027 के बीच ही शुरू करने की समयसीमा तय की गई है।

तीसरी प्रमुख परियोजना 540 मेगावाट की क्वार हाइड्रोपावर परियोजना है, जिसका अब तक 33 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और इसे मार्च 2028 तक चालू करने का शेड्यूल निर्धारित किया गया है। चौथे प्रोजेक्ट के रूप में 850 मेगावाट की रतले जलविद्युत परियोजना पर काम चल रहा है। इसका मार्च 2026 तक 29 प्रतिशत निर्माण काम पूरा हो चुका है और इससे नवंबर 2028 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।

इस पूरी पाइपलाइन में सबसे बड़ी परियोजना 1856 मेगावाट क्षमता वाली सावलकोट परियोजना है। इसका अभी कंस्ट्रक्शन चालू नहीं हो पाया है। NHPC के अनुसार यह प्रोजेक्ट फिलहाल केंद्र सरकार की वित्तीय और पर्यावरणीय मंजूरियों के चरण में है। केंद्र सरकार से औपचारिक निवेश मंजूरी मिलने की तारीख से इसके निर्माण में लगभग 96 महीने यानी 8 साल का समय लगेगा। सावलकोट अकेली परियोजना इस 5-प्रोजेक्ट पाइपलाइन की कुल 4870 मेगावाट क्षमता का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा कवर करती है। बाकी 4 निर्माणाधीन परियोजनाएं मिलकर 3014 मेगावाट क्षमता की हैं।

NHPC मार्च 2026 तक पाकल दुल, किरू, क्वार और रतले परियोजनाओं पर कुल 16024 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है जबकि इन चारों की कुल अनुमानित संयुक्त लागत लगभग 27945 करोड़ रुपये है। जब ये पांचों प्रोजेक्ट पूरी तरह चालू हो जाएंगे तो इनसे सालाना लगभग 18.61 अरब यूनिट स्वच्छ बिजली का उत्पादन होगा।

भारत का रुख साफ, पहले आतंकवाद खत्म करे पाकिस्तान

सरकारी सूत्रों के मुताबिक भविष्य में पानी के बंटवारे के प्रावधानों को दोबारा एक्टिव करने के लिए एक संशोधित संधि की आवश्यकता होगी। हालांकि यह इस शर्त पर निर्भर करेगा कि इस्लामाबाद भारत के खिलाफ प्रायोजित आतंकवाद को हमेशा के लिए खत्म करे। सरकारी सूत्रों ने बताया कि ये परियोजनाएं भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन, ग्रिड स्थिरता और क्षेत्रीय विकास को सपोर्ट करेंगी। इसके साथ ही सिंधु बेसिन में भारत के अधिकारों का अधिक उपयोग सुनिश्चित करेंगी।

सिंधु जल संधि स्थगित करने से लेकर अब तक की पूरी टाइमलाइन

1960 की संधि के अनुच्छेद III और अनुलग्नक D के तहत भारत को चिनाब और अन्य पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत उत्पन्न करने की अनुमति संधि के दौरान भी प्राप्त थी। लेकिन पाकिस्तान द्वारा पैदा किए गए विवादों और आतंकवाद के कारण हालात बदलते गए-

पहला औपचारिक नोटिस- 25 जनवरी 2023

भारत ने किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर विवाद के बाद सिंधु जल समझौते में संशोधन की मांग करते हुए पाकिस्तान को पहला औपचारिक नोटिस भेजा।

व्यापक समीक्षा की मांग- 30 अगस्त 2024

भारत ने संधि के अनुच्छेद XII(3) के तहत व्यापक समीक्षा और संशोधन की मांग करते हुए दूसरा नोटिस जारी किया।

पहलगाम हमला और कठोर फैसला- 22-23 अप्रैल 2025

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए। इसके ठीक अगले दिन (23 अप्रैल) सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने फैसला लिया कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन विश्वसनीय रूप से बंद नहीं करता, तब तक संधि को स्थगित रखा जाएगा।

पाकिस्तान का रुख- 02 जुलाई 2026

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने प्रेस ब्रीफिंग में भारत के एकतरफा फैसले को खारिज किया और आतंकवाद के आरोपों को नकारते हुए संधि को बाध्यकारी बताया।

मध्यस्थता अदालत का फैसला खारिज- 15 मई 2026

स्थायी मध्यस्थता अदालत (PCA) द्वारा गठित ट्रिब्यूनल ने भारतीय रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाओं में अधिकतम पॉन्डेज की गणना पर एक फैसला जारी किया। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मध्यस्थता अदालत को अवैध बताते हुए फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया।

ये भी पढ़ें- Indus Waters Treaty: ‘आतंकवाद छोड़े बिना नहीं होगी बहाली…’; सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान को भारत का सख्त संदेश

सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत ने अतीत में युद्धों, सैन्य संकटों और लंबे समय की द्विपक्षीय शत्रुता के बावजूद भी 1960 की इस संधि का पालन किया था। हालांकि सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तान से मिल रहे लगातार समर्थन ने इस संधि को चलाए रखने के लिए जरूरी विश्वास को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। इसी का नतीजा है कि भारत अब अपने अधिकार क्षेत्र की नदियों के पानी का भरपूर और कुशल उपयोग अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

गिलगित-बाल्टिस्तान को 5वां राज्य बनाने की तैयारी में पाकिस्तान:विधानसभा में प्रस्ताव पास, संसद से संविधान संशोधन की मांग

पाकिस्तान ने अपने अवैध कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान को देश का पांचवां राज्य बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। गुरुवार को गिलगित-बाल्टिस्तान विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से संविधान में संशोधन करके इस क्षेत्र को राज्य का दर्जा देने की मांग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को पाकिस्तान के दूसरे राज्यों के नागरिकों की तरह समान संवैधानिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक अधिकार दिए जाएं। इसके तहत इस क्षेत्र को नेशनल असेंबली, सीनेट और अन्य संघीय संवैधानिक संस्थाओं में भी प्रतिनिधित्व देने की मांग की गई है। प्रस्ताव की कॉपी पर मुख्यमंत्री, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, नेता विपक्ष और दो निर्दलीय विधायकों के हस्ताक्षर हैं। इसे अब पाकिस्तानी संसद के पास भेजा जाएगा। अस्थायी राज्य बनाने का प्रस्ताव अभी तक पाकिस्तान में केवल चार राज्य पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान अब तक सीमित स्वशासन (लिमिटेड सेल्फ-गवर्नेंस) के तहत संचालित होता रहा है और उसे पाकिस्तान के अन्य राज्यों जैसा संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है। प्रस्ताव में कहा गया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान को अभी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी तौर पर पाकिस्तान का राज्य बनाया जाएगा। अगर भविष्य में जम्मू-कश्मीर विवाद का कोई समाधान निकलता है, तो उस फैसले के अनुसार इस क्षेत्र की स्थिति दोबारा तय की जा सकती है। यानी पाकिस्तान ने यह रास्ता खुला रखा है कि कश्मीर विवाद के अंतिम समाधान के बाद गिलगित-बाल्टिस्तान का दर्जा बदला जा सके। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि जब तक गिलगित-बाल्टिस्तान को राज्य का दर्जा नहीं मिलता, तब तक पाकिस्तान की केंद्र सरकार और चारों राज्य यह सुनिश्चित करें कि इस क्षेत्र को भी सरकारी फंड और राष्ट्रीय संसाधनों में उसका उचित हिस्सा मिले। यानी गिलगित-बाल्टिस्तान को भी दूसरे राज्यों की तरह विकास के लिए पैसा दिया जाए। गिलगित-बाल्टिस्तान को 2009 में पहली बार मिली विधानसभा 2009 से पहले गिलगित-बाल्टिस्तान का पूरा प्रशासन पाकिस्तान की केंद्र सरकार के नियंत्रण में था। यहां लोगों के पास सीमित अधिकार थे। 2009 में पहली बार यहां विधानसभा और मुख्यमंत्री की व्यवस्था लागू की गई, जबकि 2018 में विधानसभा को कुछ और अधिकार दिए गए। इसके बावजूद गिलगित-बाल्टिस्तान आज भी पाकिस्तान का संवैधानिक राज्य नहीं है और यहां के लोगों को नेशनल असेंबली व सीनेट में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। इसी स्थिति को बदलने के लिए अब इसे अस्थायी तौर पर पांचवां राज्य बनाने का प्रस्ताव लाया गया है। पिछले महीने गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव हुए थे गिलगित-बाल्टिस्तान में पिछले महीने 7 जून चुनाव हुआ था जिसमें बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) को सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं। एक पार्टी के पास पूर्ण बहुमत ना होने की वजह से PPP और शहबाज शरीफ की पार्टी PML-N के बीच पॉवर शेयरिंग एग्रीमेंट हुआ था जिसके तहत मुख्यमंत्री और स्पीकर PPP का हुआ। वहीं गवर्नर और डिप्टी स्पीकर PML-N मिला। गिलगिट-बाल्टिस्तान और भारत का क्या कनेक्शन है? गिलगिट-बाल्टिस्तान ट्रांस-हिमालयन क्षेत्र में कश्मीर घाटी के उत्तर-पश्चिम में है। यह जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा था। तब यह रियासत पांच क्षेत्रों में बंटी थी- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगिट वजाहत और गिलगिट एजेंसी। 1947 से भारत के जिस हिस्से पर पाकिस्तान का कब्जा है, उसमें सिर्फ 15% एरिया पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में है। 85% हिस्सा तो गिलगिट-बाल्टिस्तान या नॉर्दर्न एरियाज में है। यह चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का मुख्य इलाका है। सिंधु नदी पाकिस्तान में गिलगिट-बाल्टिस्तान से ही होकर प्रवेश करती है। गिलगिट-बाल्टिस्तान भारत से अलग कब हुआ? 1947 में। दरअसल, 1917 में USSR बनने के बाद ब्रिटिश इंडिया ने गिलगिट एजेंसी को 1935 में जम्मू-कश्मीर के महाराजा से 60 साल की लीज पर लिया था। पर जब भारत आजाद हुआ तो 15 दिन बाद गिलगित भी महाराजा हरिसिंह के अधीन आ गया था। 26 अक्टूबर 1947 को हरि सिंह ने अपनी रियासत को भारत में मर्ज करने का फैसला किया, तब ब्रिटिश कमांडर विलियम एलेक्जेंडर ब्राउन के नेतृत्व में गिलगिट स्काउट्स ने बगावत कर दी। उसने बाल्टिस्तान पर भी कब्जा कर लिया था, जो लद्दाख का हिस्सा था। स्कार्दू, करगिल और द्रास पर भी गिलगिट स्काउट्स का कब्जा था। युद्ध में भारतीय सेनाओं ने अगस्त 1948 में करगिल और द्रास पर फिर से कब्जा हासिल किया। पर गिलगिट पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा कायम रहा। 1 नवंबर 1947 को राजनीतिक दल रिवॉल्युशनरी काउंसिल ऑफ गिलगिट-बाल्टिस्तान ने गिलगिट-बाल्टिस्तान को स्वतंत्र देश घोषित किया था। 15 नवंबर को उसने पाकिस्तान में मर्जर की घोषणा की। पर इस मर्जर की भी शर्त ये थी कि पूरी तरह एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल के लिए यह होगा। पिछले साल पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने 1 नवंबर को गिलगिट-बाल्टिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया।

भारत-PAK के 117 प्रमुख लोगों ने मोदी-शहबाज को पत्र लिखा:बोले- दुश्मनी खत्म करें, बातचीत और रिश्ते फिर शुरू हों

भारत और पाकिस्तान के 117 नेताओं, पूर्व अधिकारियों और सामाजिक हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को खुली चिट्ठी लिखी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चिट्ठी में दोनों देशों के रिश्ते सुधारने की अपील की गई है। भारत की ओर से फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मिर्वाइज उमर फारूक और आरजेडी सांसद मनोज झा समेत 61 लोगों ने इस चिट्ठी पर हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान की ओर से पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी समेत 56 लोगों ने इसका समर्थन किया है। चिट्ठी में दोनों प्रधानमंत्रियों से कहा गया है कि टकराव नहीं, बातचीत का रास्ता चुनिए, ताकि दक्षिण एशिया में शांति और विकास का माहौल बन सके। लगातार तनाव से दोनों देशों के आम लोगों और खासकर युवाओं का भविष्य प्रभावित हो रहा है। खबर लगातार अपडेट की जा रही है…

‘हम उन हाथों को काट देंगे जो…’: सिंधु जल विवाद पर पाकिस्तान ने फिर दी गीदड़भभकी

पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने भारत के खिलाफ एक बार फिर भड़काऊ बयान दिया है। इस बार उन्होंने कहा कि जो भी पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर दावा करेगा, उसके “हाथ काट दिए जाएंगे।” बता दें कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है।

गौरतलब है कि साल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में 25 पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक की मौत के बाद भारत ने इस संधि को फिलहाल स्थगित रखने का फैसला किया था।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मलिक ने भारत पर पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने का आरोप लगाया और कहा कि पाकिस्तान अपने हिस्से के पानी में किसी भी तरह की रुकावट बर्दाश्त नहीं करेगा।

‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मलिक ने कहा, “एक पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री एक नल को कंट्रोल कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह पाकिस्तान में पानी की एक बूंद भी नहीं बहने देंगे।”

उन्होंने बताया कि पाकिस्तान की 40-50 प्रतिशत आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है। उन्होंने कहा, “कोई बाहरी ताकत देश की खाद्य सुरक्षा, 50% रोजगार और 25% अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने की कोशिश कर रहा है।”

मंत्री ने दावा किया कि पाकिस्तान ने “पहले ही साफ कर दिया है कि जो कोई भी उसे पानी से वंचित करने की कोशिश करेगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।”

उन्होंने ने कहा, ” लेकिन यह सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि न्याय का भी सवाल है। हम अपनी रक्षा करेंगे… ऐसा नहीं है कि हमने बस इसकी घोषणा की है, बल्कि हमने साबित किया है कि अगर कोई हमारे हिस्से के पानी पर हाथ भी डालेगा, तो हम वह हाथ काट देंगे।”

मलिक ने कहा कि दुनिया में दूसरी जगहों पर, बिना किसी संधि के भी पानी बहता रहता है, जो सिर्फ एक कन्वेंशन (समझौते) से नियंत्रित होता है।

उन्होंने आगे कहा, “क्या अब हर ‘अपर रिपेरियन’ (नदी के ऊपरी हिस्से वाले देश) को ‘लोअर रिपेरियन’ (नदी के निचले हिस्से वाले देश) की ओर पानी का बहाव रोकने का अधिकार है?… लेकिन हमारे पास तो संधि भी है। तो फिर यहां पानी कैसे रोका जा सकता है? यही बात हम कल रखेंगे।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि “संधि मौजूद है” और साथ ही यह भी कहा कि मंगलवार का सम्मेलन मुख्य रूप से न्याय और अधिकारों के बारे में था।

उन्होंने ने कहा, “यह तय किया जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय क्या है। यह तय किया जाएगा कि क्या दुनिया भर में नदी के निचले इलाकों में रहने वाले बच्चों को पानी का अधिकार है।”

पाकिस्तान ने जल संधि का बचाव किया

उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में, पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने भी जोर देकर कहा कि सिंधु जल संधि कानूनी रूप से बाध्यकारी है और इसे एकतरफा तौर पर निलंबित, रद्द या उसमें संशोधन नहीं किया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि “कानूनी रूप से लागू संधि” के तहत पाकिस्तान के लोगों का सिंधु जलमार्गों पर अधिकार है, जो अभी भी प्रभावी है।

‘डॉन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, “कानूनी तौर पर पाकिस्तान के रुख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिला है, क्योंकि IWT को एकतरफा तौर पर रद्द, समाप्त या उसमें संशोधन नहीं किया जा सकता है।”

मंत्री ने दावा किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और रक्षा बलों के प्रमुख तथा सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने कई बार कहा है कि “पानी हमारी जीवन रेखा के साथ-साथ हमारी ‘रेड लाइन’ (अति-महत्वपूर्ण सीमा) भी है”।

संधि

सीमापार से आए इन बयानों के कुछ हफ्तों बाद केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सी.आर. पाटिल ने मीडिया को दिए एक विशेष इंटरव्यू में कहा था कि भारत अगले डेढ़ से दो वर्षों के भीतर सिंधु जल में अपने हिस्से का पूरा उपयोग करने की योजना बना रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट कहा था कि भारत के हिस्से का एक भी बूंद पानी पाकिस्तान की ओर नहीं जाने दिया जाएगा।

भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित सीमा पार आतंकवाद के ढांचे को खत्म करने के लिए ठोस और सत्यापन योग्य कदम नहीं उठाता, तब तक यह संधि स्थगित ही रहेगी।

बता दें की यह संधि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी और तब से भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे और उपयोग को नियंत्रित करती आ रही है।

यह भी पढ़ें: Warren Buffett Stops Donation: वॉरेन बफेट ने गेट्स फाउंडेशन को अरबों डॉलर का दान रोका, एपस्टीन की वजह से बिल गेट्स संग रिश्तों में दरार?