Video: 9 साल तक गुल्लक में पैसे जमा करती रही महिला, 29 की उम्र में बन गई अपने प्लॉट की मालकिन

उत्तर प्रदेश की 29 साल की दीक्षा जायसवाल ने यह साबित कर दिया कि बड़े सपनों को पूरा करने के लिए हमेशा बड़ी कमाई जरूरी नहीं होती। अगर इरादा मजबूत हो और बचत की आदत पक्की हो, तो छोटी-छोटी रकम भी समय के साथ बड़ी पूंजी बन सकती है। दीक्षा ने करीब नौ साल तक अपनी कमाई का हिस्सा बचाया और आखिरकार जुलाई 2026 में अपने नाम जमीन का एक टुकड़ा खरीद लिया।

बहन की जिंदगी देखकर आया खुद की जमीन का ख्याल

दीक्षा के मन में खुद की प्रॉपर्टी खरीदने का सपना 2017 में आया। शादी के बाद अपनी बड़ी बहन को कुछ असुरक्षाओं से गुजरते देख उन्हें महसूस हुआ कि एक महिला के नाम उसकी अपनी संपत्ति होना कितना जरूरी है। उन्होंने तय किया कि वह ऐसी जमीन खरीदेंगी, जिस पर सिर्फ उनका अधिकार हो। यही सोच आगे चलकर उनके लिए एक लक्ष्य बन गई।

पिता के हादसे के बाद पढ़ाई के साथ शुरू किया काम

दीक्षा का आत्मनिर्भर बनने का सफर भी आसान नहीं था। साल 2012 में उनके पिता का एक्सीडेंट हुआ, जिसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए गांव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। कम उम्र में कमाई शुरू करने के इस अनुभव ने उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास दिया। आगे चलकर उन्होंने अपनी B.Com, M.Com और B.P.Ed की पढ़ाई का खर्च खुद उठाया। साथ ही हॉकी खेलीं और कराटे भी सिखाया।

शेयर बाजार नहीं आता था, बस बचत करना जानती थीं

दीक्षा ने बताया कि उन्हें जटिल निवेश या शेयर बाजार की ज्यादा जानकारी नहीं थी। उनका फॉर्मूला बेहद साधारण था जो भी कमाई हो, उसमें से कुछ हिस्सा हर हाल में बचाना।

स्पोर्ट्स टीचर के तौर पर मिलने वाली कमाई में से वह पैसे अलग रखती थीं। कभी मिट्टी की गुल्लक में सिक्के जमा किए, तो कभी पुराने कपड़े के थैलों में नकदी रखी। इसके अलावा उन्होंने धीरे-धीरे सोना भी जमा किया।

जिंदगी में कई मौके आए, लेकिन बचत को नहीं छुआ

नौ साल तक बचत करना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। रोजमर्रा की जरूरतों और जिंदगी के छोटे-बड़े खर्चों के बीच उन्होंने अपनी जमा पूंजी को हाथ नहीं लगाया। समय के साथ सिक्के, नकदी और सोने की छोटी-छोटी बचत एक बड़ी रकम में बदलती गई। दीक्षा का कहना है कि उन्होंने लंबे समय तक इस बचत को सिर्फ इसलिए नहीं छुआ, क्योंकि उनका लक्ष्य पहले से तय था।

जुलाई 2026 में पूरा हुआ सालों पुराना सपना

आखिरकार जुलाई 2026 में वो दिन आया, जिसका दीक्षा को सालों से इंतजार था। 29 साल की उम्र में उन्होंने अपनी बचत निकाली और अपने नाम जमीन का एक प्लॉट खरीद लिया। उनके लिए यह सिर्फ जमीन खरीदना नहीं था, बल्कि नौ साल की मेहनत, त्याग और आत्मनिर्भरता का नतीजा था। सिक्कों से भरी गुल्लक, हाथ से बांधे गए नकदी के बंडल और सोने की बचत को देखकर उन्हें महसूस हुआ कि उनका सालों पुराना सपना सच हो चुका है।

सोशल मीडिया पर लोगों के रिएक्शन

दीक्षा की कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों ने उनकी जमकर तारीफ की। कई यूजर्स ने उनकी मेहनत और आर्थिक आत्मनिर्भरता को प्रेरणादायक बताया। एक यूजर ने लिखा कि जमीन कितनी भी बड़ी या छोटी हो, उसे खुद की कमाई से खरीदना अपने आप में बेहद खास उपलब्धि है। वहीं एक अन्य यूजर ने कहा कि हर लड़की को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने और अपने नाम संपत्ति बनाने की अहमियत समझनी चाहिए।

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बाबा नीम करौली के जीवन पर बनी ‘हनुमान अंश’ देखकर भावुक हुए सीएम धामी, कलाकारों की जमकर की तारीफ

बाबा नीम करौली के जीवन पर बनी 'हनुमान अंश' देखकर भावुक हुए सीएम धामी, कलाकारों की जमकर की तारीफ

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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्‍कर सिंह धामी ने बाबा नीम करौली के जीवन आधारित आध्यात्मिक फिल्म ‘हनुमान अंश’ देखी। उन्होंने फिल्म की सराहना करते हुए बाबा के भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक संदेश को समाज के लिए प्रेरणादायी बताया।

 

सीएम धामी एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि देहरादून में परम श्रद्धेय बाबा नीब करौरी महाराज जी के जीवन, साधना और हनुमान भक्ति पर आधारित फिल्म “हनुमान अंश” का अवलोकन किया। फिल्म के माध्यम से बाबा नीब करौरी महाराज जी के तप, त्याग, सेवा और हनुमान जी के प्रति उनकी अटूट आस्था को जानने और समझने का अवसर मिला। उनका संपूर्ण जीवन मानवता की सेवा, आध्यात्मिक साधना और लोककल्याण के लिए समर्पित रहा।

 

उन्होंने कहा कि बाबा नीब करौरी महाराज जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि भक्ति केवल साधना नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और मानव कल्याण का मार्ग भी है। ऐसी प्रेरणादायी फिल्में हमारी आध्यात्मिक विरासत और महान संतों के जीवन-दर्शन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

मुख्यमंत्री ने इस प्रेरणादायी एवं आध्यात्मिक फिल्म के निर्माण से जुड़े निर्देशक, निर्माता, सभी कलाकारों एवं पूरी टीम को हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी।

 

गौरतलब है कि विशाल चतुर्वेदी के निर्देशन में बनी हनुमान अंश में शोभिनव सतैया सहित अन्य कलाकारों ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं। फिल्म को 7 अगस्त 2026 को हिंदी में देशभर में रिलीज किया गया है। उत्तराखंड सरकार ने फिल्म को टैक्स फ्री घोषित किया है।

90 लाख की नौकरी छोड़ी, माइक्रोग्रीन्स की खेती शुरू की, आज खड़ा कर दिया 1.44 करोड़ का बिजनेस

हर महीने लाखों रुपये की सैलरी, शानदार कॉर्पोरेट करियर और सुरक्षित नौकरी छोड़कर खेती की राह चुनना आसान नहीं होता। लेकिन चंडीगढ़ के मोहित निजहावन ने इसी चुनौती को स्वीकार किया। करीब 90 लाख रुपये सालाना की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने माइक्रोग्रीन्स की खेती को अपना नया करियर बनाया। खास बात यह है कि उन्होंने इस बिजनेस की शुरुआत किसी बड़े निवेश या बड़ी जमीन से नहीं की थी। महज 30,000 रुपये और करीब 100 वर्ग फुट की जगह से शुरू हुआ उनका प्रयोग धीरे-धीरे एक कारोबार में बदल गया। मोहित ने इंडोर फार्मिंग के जरिए माइक्रोग्रीन्स उगाए और समय के साथ ग्राहकों, उत्पादन और बिक्री को समझते हुए अपने काम को आगे बढ़ाया।

आज सार्वजनिक रूप से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, उनके कारोबार का सालाना रेवेन्यू करीब 1.44 करोड़ रुपये बताया जाता है। उनकी यह कहानी नौकरी से बिजनेस तक के अनोखे सफर और जोखिम उठाने की मिसाल बन गई है।

B.Tech के बाद शुरू हुआ कॉर्पोरेट सफर

मोहित निजहावन कंप्यूटर साइंस में B.Tech ग्रेजुएट हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में शानदार करियर बनाया और अच्छी खासी सैलरी वाली नौकरी हासिल की।

हालांकि, दिसंबर 2020 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना, जो उनकी पुरानी कॉर्पोरेट जिंदगी से बिल्कुल अलग था।

सिर्फ 30 हजार रुपये से शुरू किया काम

माइक्रोग्रीन्स की खेती का आइडिया मोहित के लिए शुरुआत में एक प्रयोग जैसा था। उन्होंने बड़े निवेश के बजाय सिर्फ 30,000 रुपये से अपना काम दोबारा शुरू किया।

इसके लिए चंडीगढ़ में करीब 100 वर्ग फुट की छोटी-सी जगह ली गई। इसी सीमित जगह में उन्होंने इंडोर माइक्रोग्रीन्स उगाना शुरू किया और धीरे-धीरे खेती के साथ-साथ मार्केटिंग और ग्राहकों की जरूरतों को समझना शुरू किया।

छोटे कमरे से बना Greenu Microgreens

शुरुआती प्रयोग धीरे-धीरे एक बिजनेस मॉडल में बदल गया। मोहित ने उत्पादन बढ़ाने, ग्राहकों तक पहुंच बनाने और माइक्रोग्रीन्स की बिक्री को बेहतर तरीके से मैनेज करने पर काम किया।

इसी सफर से Greenu Microgreens का कारोबार खड़ा हुआ। छोटी जगह और कम पूंजी से शुरू हुआ यह वेंचर आज काफी बड़ा बिजनेस बन चुका है।

हर महीने 12 लाख रुपये का रेवेन्यू!

सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के मुताबिक, Greenu Microgreens का कारोबार अब करीब 12 लाख रुपये प्रति महीने का रेवेन्यू जेनरेट करता है। यानी सालाना कारोबार लगभग 1.44 करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट्स में कंपनी का सालाना मुनाफा करीब 60 लाख रुपये बताया गया है। हालांकि, बिजनेस का रेवेन्यू और किसी व्यक्ति की नौकरी की सैलरी अलग-अलग चीजें हैं, इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना सही नहीं होगा।

सिर्फ अपना बिजनेस नहीं, दूसरों को भी दे रहे ट्रेनिंग

मोहित की कहानी सिर्फ अपना फार्म चलाने तक सीमित नहीं है। Greenu Microgreens के जरिए वह किसानों और उन लोगों को भी माइक्रोग्रीन्स फार्मिंग की ट्रेनिंग देते हैं, जो इसे बिजनेस के तौर पर शुरू करना चाहते हैं। इस तरह उनका लक्ष्य केवल माइक्रोग्रीन्स उगाना ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों को भी इस क्षेत्र में अवसर तलाशने में मदद करना है।

90 लाख की नौकरी से 30 हजार की खेती तक का सफर

मोहित की कहानी इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने करीब 90 लाख रुपये सालाना की नौकरी छोड़कर सिर्फ 30,000 रुपये से अपना नया सफर शुरू किया। एक तरफ कॉर्पोरेट नौकरी की बड़ी सैलरी थी, तो दूसरी तरफ छोटी जगह में खेती का अनिश्चित रास्ता। इसके बावजूद उन्होंने अपने नए आइडिया पर भरोसा किया और धीरे-धीरे इसे बिजनेस में बदल दिया।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

मोहित की कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों के बीच अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे नौकरी से अलग रास्ता चुनने और अपने दम पर बिजनेस खड़ा करने की प्रेरणादायक कहानी बताया। वहीं, कुछ यूजर्स ने 90 लाख रुपये की सैलरी और 1.44 करोड़ रुपये के बिजनेस रेवेन्यू की तुलना पर सवाल उठाए। एक यूजर ने इसे भ्रामक तुलना बताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की सालाना सैलरी और बिजनेस का टर्नओवर एक जैसी चीजें नहीं हैं।

दूसरी ओर, कुछ लोगों ने मोहित के फैसले को जिंदगी और सफलता को अलग नजरिए से देखने वाली कहानी बताया। एक यूजर ने इसे “वास्तव में प्रेरणादायक सफर” कहा, जबकि दूसरे ने उनकी यात्रा की तारीफ की।

क्या सीख देती है मोहित की कहानी?

मोहित की कहानी दिखाती है कि सफलता का रास्ता हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। बड़ी नौकरी और अच्छी सैलरी के बावजूद कोई व्यक्ति अपना अलग रास्ता चुन सकता है। हालांकि, किसी भी बिजनेस की सफलता को समझने के लिए सिर्फ रेवेन्यू नहीं, बल्कि निवेश, खर्च, मुनाफा और कारोबार की स्थिरता जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

12 साल की कॉरपोरेट नौकरी और फिर बड़ा फैसला, गुरजोत ने बताया क्यों छोड़ दी लाखों की सैलरी वाली जॉब

शिक्षक दिवस पर सीएम धामी ने दी श्रद्धांजलि: जानिए क्यों देश भर में 5 सितंबर को ही मनाया जाता है यह खास दिन

शिक्षक दिवस पर सीएम धामी ने दी श्रद्धांजलि: जानिए क्यों देश भर में 5 सितंबर को ही मनाया जाता है यह खास दिन

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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शिक्षक दिवस के अवसर पर अपने शासकीय आवास पर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान सीएम धामी ने भारतीय शिक्षा और संस्कृति को दिशा देने में उनके योगदान को याद किया और उनके जीवन मूल्यों को सभी के लिए प्रेरणास्रोत बताया। ALSO READ: उत्तराखंड: सीएम धामी ने 9.91 लाख से अधिक पेंशनर्स के खातों में ट्रांसफर किए 147 करोड़, 5,605 नए लाभार्थी भी जुड़े

 

सीएम धामी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा कि शिक्षक दिवस के अवसर पर शासकीय आवास पर महान शिक्षाविद्, पूर्व राष्ट्रपति, ‘भारत रत्न’ डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

 

उन्होंने कहा कि डॉ. राधाकृष्णन जी ने अपने ज्ञान, विचारों और जीवन मूल्यों से भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति को नई दिशा प्रदान की। उनका समर्पित जीवन और शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण आज भी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। ALSO READ: द्वाराहाट का मां दूनागिरी मंदिर: 8,000 फीट की ऊंचाई पर विराजमान शक्तिपीठ

5 सितंबर को क्यों मनाया जाता है शिक्षक दिवस?

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जो भारत के दूसरे राष्ट्रपति (1962-1967) और एक महान दार्शनिक, शिक्षक और विचारक भी थे। जब डॉ. राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने, तो उनके छात्रों और दोस्तों ने उनका जन्मदिन, 5 सितंबर, एक विशेष दिन के रूप में मनाने का अनुरोध किया।

 

डॉ. राधाकृष्णन ने इसका उत्तर देते हुए कहा, 'मेरे जन्मदिन को अलग से मनाने के बजाय, अगर इसी दिन को शिक्षक के रूप में मेरे योगदान को याद करते हुए 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाए, तो यह मेरे लिए गर्व की बात होगी।' 

 

अर्थात् डॉ. राधाकृष्णन का यह विचार दर्शाता है कि वे शिक्षा और शिक्षकों को कितना महत्व देते थे। वे मानते थे कि एक समाज की नींव उसके शिक्षक होते हैं, और अगर देश को प्रगति करनी है, तो शिक्षकों को सम्मान देना जरूरी है। उनकी इसी भावना के चलते 5 सितंबर को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाने लगा, ताकि समाज में शिक्षकों के योगदान को सम्मानित किया जा सके। तब से हर साल यह दिन पूरे भारत में शिक्षकों के सम्मान में मनाया जाता है।

सुंदर पिचाई का फ्यूचर मंत्र! तकनीक बदलेगी, लेकिन इंसान पर भरोसा करना न छोड़े

टेक्नोलॉजी की दुनिया में हर दिन कुछ नया आता रहता है। कभी नया फोन लॉन्च होता है, तो कभी किसी ऐप या सॉफ्टवेयर में नया फीचर जुड़ जाता है। ऐसे बदलाव हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाते हैं। लेकिन इनके पीछे सिर्फ मशीनों का कमाल नहीं होता, बल्कि इन्हें बनाने और इस्तेमाल करने वाले लोगों की सोच भी बहुत मायने रखती है। सुंदर पिचाई टेक्नोलॉजी के फ्यूचर को लेकर काफी पॉजिटिव सोच रखते हैं। उनका मानना है कि टेक्निक हमारी जिंदगी को बेहतर बना सकती है, लेकिन इसके लिए लोगों की सोच और सही फैसले भी जरूरी हैं। यानी उनका भरोसा सिर्फ टेक्नोलॉजी पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर भी है जो इसे बनाते हैं और सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं।

 

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सुंदर पिचाई का आज का विचार-

मैं आशावादी हूं, इसलिए नहीं कि मुझे टेक्नोलॉजी पर भरोसा है, बल्कि इसलिए कि मुझे लोगों पर भरोसा है।

 

लोगों पर भरोसा करें

सुंदर पिचाई के इस विचार का मतलब है कि फ्यूचर को लेकर उनका भरोसा सिर्फ टेक्नोलॉजी पर नहीं है। मशीनें काम को तेज कर सकती हैं, सॉफ्टवेयर कई चीजों को अपने आप कर सकता है और AI कुछ ही सेकंड में जवाब दे सकता है। लेकिन सही फैसला लेना अभी भी इंसान के हाथ में है। कौन-सी परेशानी हल करनी है, किसी जवाब पर भरोसा करना है या नहीं और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किस तरह करना है, यह इंसान ही तय करता है।

 

अपने फैसले खुद लें

नई टेक्नोलॉजी आने के बाद हर कोई उसे एक ही तरीके से इस्तेमाल नहीं करता। कंपनियां तय करती हैं कि उन्हें कौन-सा सिस्टम अपनाना है, एम्पलॉई देखते हैं कि वह उनके काम को कैसे आसान बना सकता है और कस्टमर तय करते हैं कि कौन-सा प्रोडक्ट लंबे समय तक चलेगा। वहीं गवर्नमेंट और दूसरी ऑर्गेनाइजेशन यह तय करती हैं कि किसी टेक्निक के इस्तेमाल के लिए कौन से नियम होने चाहिए।

टेक्नोलॉजी कई ऐसे काम कर सकती है, जिनमें पहले काफी समय और मेहनत लगती थी। इससे काम करने का तरीका जरूर बदल रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इंसानों की जरूरत खत्म हो जाएगी। किसी को यह तय करना होगा कि काम कैसे किया जाए, नतीजा सही है या नहीं और गलती होने पर क्या कदम उठाना है। बातचीत करना, परेशानी को समझना, सही फैसला लेना और दूसरों के साथ मिलकर काम करना जैसी खूबियां आज भी जरूरी हैं।

 

 

 

नई चीजें सीखते रहे

टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है, इसलिए एक ही सिस्टम या टूल को हमेशा के लिए सीख लेना काफी नहीं है। आज जो सॉफ्टवेयर काम का है, हो सकता है कुछ समय बाद उसकी जगह कोई नया टूल ले ले। ऐसे में नई चीजों को सीखने और जरूरत के हिसाब से खुद को बदलने की आदत काफी काम आती है। शुरुआत में किसी नई टेक्नोलॉजी को समझने में परेशानी हो सकती है, लेकिन गलतियों से सीखकर धीरे-धीरे बेहतर हुआ जा सकता है।

 

 

 

AI इनफार्मेशन सोच-समझकर अपनाएं

पिचाई की बात का मतलब यह नहीं है कि टेक्नोलॉजी से जुड़ी हर चीज अच्छी ही होगी। AI गलत जानकारी दे सकता है, ऑटोमेशन से कुछ नौकरियों पर असर पड़ सकता है और डिजिटल टेक्नोलॉजी से प्राइवेसी जैसे सवाल भी खड़े हो सकते हैं। इसलिए नई टेक्निक को अपनाते समय सिर्फ उसके फायदे देखना सही नहीं है। यह भी समझना जरूरी है कि इसे किसने बनाया, इसका इस्तेमाल कौन कर रहा है, इससे किसे फायदा हो रहा है और इसकी वजह से किन लोगों को परेशानी हो सकती है।

 

 

टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है, इसलिए जरूरी है कि हम भी नई चीजों के साथ खुद को बदलते रहें। हर नई टेक्निक को बिना सोचे अपनाने के बजाय यह समझना बेहतर है कि वह हमारे लिए कितनी काम की है। खुली सोच और सीखने की आदत के साथ हम आने वाले बदलावों को आसानी से अपना सकते हैं।