अंग्रेजों ने भारत से लूटे 200 ट्रिलियन डॉलर! कभी दुनिया की 27% GDP था भारत, जानिए यहां से कितना लेकर गए

भारत और 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिली थी। लेकिन आजादी मिलने के बाद देश को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में थी। अंग्रेजों ने करीब 200 साल तक भारत के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल अपने लिए किया। वहीं करीब 200 साल के ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के संसाधनों और संपदा का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ब्रिटेन के हितों के लिए किया गया।

न्यूज 18 के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों के पुराने आकलनों के मुताबिक, 1765 से 1938 के बीच ब्रिटिश क्राउन और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से करीब 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति बाहर ले गई। लंबे समय तक चले इस आर्थिक शोषण का असर भारत की आर्थिक स्थिति पर पड़ा और आजादी के समय देश को कई बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

नेहरू के सामने बड़ी समस्या

1947 के बाद पीएम जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कमजोर अर्थव्यवस्था को संभालना, उद्योगों को बढ़ावा देना और देश में बुनियादी ढांचे का विकास करना था। लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के बाद भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार को लंबे समय तक बड़े स्तर पर काम करना पड़ा।

करीब 200 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति गई बाहर

पुराने अनुमानों को अगर आज की आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखा जाए और उनमें महंगाई, निवेश पर मिलने वाले रिटर्न और मौजूदा बाजार मूल्य को शामिल किया जाए, तो भारत से बाहर गई संपत्ति की अनुमानित कीमत 2026 में करीब 200 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ये आंकड़ा बताते हैं कि ब्रिटिश शासन में भारत की संपदा बाहर जाती रही, जिससे आजादी के समय देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई।

‘काउंसिल बिल्स’ बड़ा तरीका

भारत से पैसा बाहर ले जाने का एक बड़ा तरीका ‘काउंसिल बिल्स’ व्यवस्था थी। 1765 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कपड़ा, मसाले और शोरा खरीदने के लिए ब्रिटेन से लाया गया सोना-चांदी इस्तेमाल करती थी। लेकिन बंगाल में टैक्स वसूलने का अधिकार मिलने के बाद कंपनी ने तरीका बदल दिया। इसके बाद भारत से मिले टैक्स के पैसे से ही भारतीय सामान खरीदा जाने लगा और इस तरह भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन पहुंचने लगा।

  1. टैक्स वसूली: भारतीय किसानों और व्यापारियों से सीधे टैक्स लिया जाता था।
  2. टैक्स से खरीदारी: ब्रिटिश सरकार टैक्स से जुटाए गए राजस्व का करीब एक-तिहाई हिस्सा भारतीय सामान खरीदने में इस्तेमाल करती थी, जिसे बाद में ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
  3. बिना असली भुगतान: भारतीयों को उनके ही टैक्स के पैसे से भुगतान किया जाता था, जिससे ब्रिटेन को भारत का कीमती सामान लगभग मुफ्त में मिलता था।

GDP में आई गिरावट

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। 1700 के आसपास भारत का वैश्विक GDP में हिस्सा करीब 27% बताया जाता है, लेकिन 1947 तक यह घटकर 3% से भी कम रह गया। ब्रिटिश नीतियों का असर भारत के कपड़ा उद्योग पर भी पड़ा। भारतीय कपड़ों पर ब्रिटेन में भारी टैक्स लगाया गया, जबकि ब्रिटिश सामान भारत में आसानी से बिकने लगा। इससे ढाका, मुर्शिदाबाद और सूरत जैसे पुराने औद्योगिक केंद्रों को बड़ा नुकसान हुआ। काम कम होने के बाद कई कारीगर और बुनकर खेती पर निर्भर हो गए और भारत धीरे-धीरे तैयार सामान के बजाय कपास, अफीम और नील जैसी कच्ची उपज के निर्यातक देश के रूप में बदल गया।

दूसरे विश्व युद्ध में हुआ नुकसान

1858 के बाद भी भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश सरकार से जुड़े खर्चों पर ही लगाया जाता रहा। ‘होम चार्ज’ के तहत भारतीय करदाताओं के पैसों से ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, रेलवे निवेश पर ब्याज और विदेशों में ब्रिटिश सेना के अभियानों का खर्च उठाया जाता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह आर्थिक दबाव और बढ़ गया। युद्ध के खर्च और कर्ज का असर भारत में महंगाई और खाद्य संकट के रूप में दिखाई दिया। लंबे समय तक चले इस आर्थिक बोझ के कारण 1947 में आजादी मिलने तक भारत की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी थी।

आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत

आजादी के समय भारत की नई सरकार के सामने पैसों और संसाधनों की बड़ी कमी थी। देश में गरीबी और खाद्य संकट गंभीर था, उद्योग कमजोर हो चुके थे और विभाजन के बाद बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी सरकार पर थी। सीमित सरकारी खजाने के बावजूद सड़कों, बिजली, सिंचाई और दूसरी जरूरी सुविधाओं के विकास पर काम शुरू करना पड़ा। लेकिन, आजादी के बाद के दशकों में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रगति की और आज वह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश अब लंबे समय के विकास लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए अपनी आर्थिक ताकत को और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

स्वीडन में अचानक चली गई नौकरी, फिर ज्योति ने उठाया ऐसा कदम, आज हर महीने कमा रही हैं 1 लाख रुपये

विदेश में जाकर करियर और नई पहचान बनाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। नए माहौल में खुद को ढालने के साथ नौकरी, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक पहचान बनाने की चुनौती भी रहती है। मुंबई की ज्योति वाकचौरे के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब वह पति के साथ स्वीडन पहुंचीं। शुरुआत में उन्होंने वहां नौकरी की, लेकिन अचानक नौकरी चले जाने से उनके सामने मुश्किल खड़ी हो गई। इस झटके के बाद उन्होंने पीछे हटने के बजाय खुद के लिए एक नई राह तलाशने का फैसला किया। धीरे-धीरे उन्होंने कंटेंट क्रिएशन शुरू किया और फिर इसी अनुभव को अपने बिजनेस में बदल दिया।

आज उनकी कहानी सोशल मीडिया, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गई है। विदेश में शुरू हुआ यह सफर कैसे एक नई पहचान और कमाई के रास्ते में बदला, यही उनकी कहानी को खास बनाता है।

पति की नौकरी के चलते पहुंचीं स्वीडन

ज्योति 2016 में अपने पति के साथ स्वीडन के गोथेनबर्ग चली गई थीं। उनके पति को वहां नौकरी मिली थी और ज्योति डिपेंडेंट वीजा पर स्वीडन पहुंचीं। नए देश में शुरुआत करना उनके लिए आसान नहीं था, क्योंकि उन्हें वहां अपना करियर और पहचान दोनों नए सिरे से बनानी थी।

अचानक चली गई नौकरी

स्वीडन में रहते हुए ज्योति ने नौकरी शुरू की, लेकिन एक दिन उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के नौकरी से निकाल दिया गया। उनके लिए यह अनुभव काफी परेशान करने वाला था। उन्होंने इस घटना को अचानक, चौंकाने वाला और अनुचित बताया। हालांकि, उन्होंने इस झटके को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। धीरे-धीरे उन्होंने इसी मुश्किल को अपने लिए नई राह बनाने की प्रेरणा में बदल दिया।

YouTube से शुरू हुआ नया सफर

नौकरी के साथ ज्योति ने कंटेंट बनाना शुरू किया। उन्होंने 2018 में अपना YouTube चैनल लॉन्च किया। शुरुआत भले ही साइड हसल के तौर पर हुई, लेकिन धीरे-धीरे उनकी ऑनलाइन पहचान बढ़ने लगी। कंटेंट के जरिए उन्हें स्वीडन में नए लोगों से जुड़ने और अपना नेटवर्क बनाने का मौका मिला। यही नेटवर्क आगे चलकर उनके बिजनेस के लिए भी काफी काम आया।

महामारी में शुरू की अपनी कंपनी

साल 2020 में जब कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर में कारोबार प्रभावित हो रहे थे, उसी दौरान ज्योति ने अपनी सोशल मीडिया मार्केटिंग कंपनी शुरू कर दी। शुरुआत में उन्होंने छोटे स्थानीय कारोबारों के साथ काम किया। समय के साथ उनका नेटवर्क बढ़ा और उन्हें स्वीडन के स्थानीय ग्राहकों से भी काम मिलने लगा।

अब हर महीने करीब ₹1 लाख की कमाई

कंटेंट क्रिएशन और सोशल मीडिया मार्केटिंग के सफर ने ज्योति को आर्थिक रूप से भी मजबूत बनाया। मौजूदा समय में उनके बिजनेस से औसतन करीब 1 लाख रुपये प्रति महीने की कमाई होने की बात सामने आई है। उनकी कहानी खास इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने किसी बड़े ऑफिस या भारी निवेश के बिना अपना काम खड़ा किया।

कम खर्च में चल रहा है बिजनेस

ज्योति ने अपने बिजनेस के खर्चों को काफी सीमित रखा है। उनके मुताबिक, हर महीने करीब 15 हजार रुपये मुख्य रूप से ऐप्स और वीडियो एडिटिंग जैसे सॉफ्टवेयर पर खर्च होते हैं। वह ज्यादातर काम घर से करती हैं, इसलिए ऑफिस का किराया और उससे जुड़े दूसरे खर्च नहीं हैं। कम ऑपरेशनल कॉस्ट उनके बिजनेस को चलाने में मदद करती है।

भारत में निवेश, अब स्वीडन में भी कदम

ज्योति ने बताया कि उनके ज्यादातर निवेश अभी भारत में हैं और खासतौर पर प्रॉपर्टी में निवेश किया गया है। हालांकि, अब उन्होंने स्वीडन में भी निवेश करना शुरू कर दिया है। यानी विदेश में रहते हुए भी उन्होंने भारत से अपना आर्थिक जुड़ाव बनाए रखा है और धीरे-धीरे स्वीडन में भी अपनी वित्तीय मौजूदगी बढ़ा रही हैं।

स्वीडन ने बदली उनकी सोच और जिंदगी

ज्योति के मुताबिक, स्वीडन में रहने का असर सिर्फ उनके करियर पर नहीं पड़ा, बल्कि उनके व्यक्तित्व में भी बदलाव आया। वह खुद को अब पहले से ज्यादा शांत, दयालु, समय की पाबंद और आत्मनिर्भर मानती हैं। लंबे समय तक स्वीडन में रहने के बाद वह वहां के जीवन और संस्कृति के साथ काफी सहज हो चुकी हैं।

बेटी का जन्म बनी सबसे खूबसूरत याद

स्वीडन में बिताए समय की उनकी सबसे खास यादों में बेटी का जन्म शामिल है। उन्होंने इसे अपनी जिंदगी के बेहद खूबसूरत और यादगार पलों में से एक बताया। यह व्यक्तिगत अनुभव उनके लिए स्वीडन को सिर्फ एक रहने की जगह से कहीं ज्यादा खास बनाता है।

नौकरी छूटने से मिली नई पहचान

ज्योति की कहानी इस बात की मिसाल है कि जिंदगी में आया कोई बड़ा झटका हमेशा अंत नहीं होता। नौकरी जाने के बाद उन्होंने हार मानने के बजाय कंटेंट क्रिएशन और उद्यमिता की राह चुनी। पति की नौकरी के लिए विदेश पहुंची ज्योति ने धीरे-धीरे वहां अपनी खुद की पहचान बनाई। आज उनका सफर नौकरी छूटने से लेकर अपना बिजनेस खड़ा करने और आत्मनिर्भर बनने तक पहुंच चुका है।

न बड़ा रेस्टोरेंट, न महंगा खाना… ₹100 की थाली से लाखों की बिक्री, जानें कैसे चल रहा ये कारोबार?

गांव के पास मुख्य सड़क पर मौजूद एक छोटी-सी खाने की दुकान इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है। आमतौर पर लोग बड़ी दुकानों और शहरों के कारोबार को ही ज्यादा कमाई वाला मानते हैं, लेकिन इस दुकान की कहानी कुछ अलग तस्वीर दिखाती है। यहां कम कीमत में मिलने वाला खाना और लगातार आने वाले ग्राहक लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। दुकान के मालिक से हुई बातचीत में रोजाना ग्राहकों और टिफिन ऑर्डर को लेकर कुछ ऐसे आंकड़े सामने आए, जिन्हें देखकर सोशल मीडिया यूजर्स भी चर्चा करने लगे।

खास बात यह है कि दुकान किसी बड़े शहर या महंगे बाजार में नहीं, बल्कि गांव के पास स्थित है। इसके बावजूद कारोबार को लेकर सामने आई जानकारी ने छोटे और स्थानीय बिजनेस की क्षमता पर नई बहस छेड़ दी है। आखिर इस छोटी दुकान की कमाई का पूरा गणित क्या है और लोग इसे लेकर इतनी चर्चा क्यों कर रहे हैं? आगे जानिए।

₹100 में मिलती है पूरी थाली

सोशल मीडिया यूजर नलिनी उनागर ने इस दुकान की जानकारी X पर साझा की। पोस्ट के मुताबिक, दुकान पर सिर्फ 100 रुपये में पूरी थाली मिलती है। इसमें दो सब्जियां, रोटी, दाल, चावल, पापड़ और सलाद शामिल हैं। यानी ग्राहक को कम कीमत में काफी कुछ खाने को मिल जाता है। दुकान की यही खासियत इसे आसपास के लोगों के लिए पसंदीदा विकल्प बनाती है।

रोज 25 से ज्यादा लोग खाते हैं खाना

नलिनी उनागर ने दुकान के मालिक से बातचीत में पूछा कि रोज कितने लोग यहां खाना खाते हैं। मालिक के अनुसार, हर दिन 25 से ज्यादा ग्राहक दुकान पर बैठकर खाना खाते हैं। दुकान मुख्य सड़क पर होने के कारण वहां आने-जाने वाले लोगों को भी आसानी से खाना मिल जाता है। यही लोकेशन कारोबार के लिए बड़ा फायदा साबित होती दिखाई दे रही है।

40 से ज्यादा टिफिन ऑर्डर भी

दुकान की कमाई सिर्फ सामने बैठकर खाना खाने वाले ग्राहकों से नहीं होती। मालिक के अनुसार, रोजाना 40 से ज्यादा पक्के टिफिन ऑर्डर भी मिलते हैं। जब दोनों आंकड़ों को जोड़ा जाए तो रोजाना 65 से ज्यादा थाली बिकने का दावा सामने आता है।

गांव में कौन मंगाता है टिफिन?

यह सवाल भी दिलचस्प है कि गांव में टिफिन की जरूरत किसे पड़ती है। मालिक ने बताया कि उनके ग्राहकों में खेतों में काम करने वाले लोग और अकेले रहने वाले बुजुर्ग शामिल हैं। ऐसे लोगों के लिए रोज खाना बनाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए सस्ती और तैयार थाली उनके लिए सुविधाजनक विकल्प बन जाती है।

₹100 की थाली से कितनी कमाई?

अगर रोजाना 65 थाली 100 रुपये के हिसाब से बिकती हैं, तो गणित कुछ ऐसा बनता है:

एक दिन की बिक्री: ₹6,500

30 दिन की बिक्री: ₹1.95 लाख

एक साल की बिक्री: ₹23.4 लाख

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह कुल बिक्री का अनुमान है, मुनाफा नहीं।

दुकान में कर्मचारी भी नहीं रखने पड़ते

पोस्ट के अनुसार, दुकान का खाना मालिक और उनकी पत्नी खुद तैयार करते हैं। इससे कर्मचारियों की सैलरी का अतिरिक्त खर्च बचता है। इतना ही नहीं, मालिक की अपनी खेती भी है और वह वहां सब्जियां उगाते हैं। इससे दुकान के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ सब्जियों की लागत कम हो जाती है।

हर महीने ₹1 लाख से ज्यादा मुनाफे का दावा

सोशल मीडिया पोस्ट में दुकान के 60 फीसदी तक मुनाफे का दावा किया गया। इस हिसाब से हर महीने 1 लाख रुपये से ज्यादा का मुनाफा होने की बात कही गई। लेकिन यही दावा ऑनलाइन बहस का कारण भी बन गया।

मुनाफे के हिसाब पर क्यों उठे सवाल?

कुछ यूजर्स ने कहा कि 1.95 लाख रुपये की मासिक बिक्री का हिसाब तो आसानी से लगाया जा सकता है, लेकिन 1 लाख रुपये से ज्यादा का शुद्ध मुनाफा तय करने के लिए सभी खर्चों को देखना जरूरी है।इन खर्चों में सब्जी और राशन, LPG, बिजली, पैकिंग, खाना खराब होने का नुकसान, डिलीवरी और किराया शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा मालिक और उनकी पत्नी की मेहनत को भी लागत में जोड़ना होगा। इसलिए 60 फीसदी का मुनाफा एक दावा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि इस जानकारी से नहीं होती।

सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

इस पोस्ट पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोगों ने कहा कि छोटे कारोबार को कम नहीं आंकना चाहिए। उनके मुताबिक, कम कीमत, लगातार ग्राहक और कम खर्च मिलकर छोटे बिजनेस को भी बड़ा बना सकते हैं। कुछ यूजर्स ने यह भी कहा कि भारत में बड़ी संख्या में लोग छोटे और मध्यम स्तर के कारोबार पर निर्भर हैं, इसलिए ऐसी दुकान का सफल होना कोई हैरानी की बात नहीं है।

₹100 में इतनी चीजें, लोगों को लगा शानदार सौदा

कई लोगों ने दुकान की कीमत और खाने की मात्रा की तारीफ भी की। उनका कहना था कि 100 रुपये में इतनी चीजें मिलना ग्राहकों के लिए काफी अच्छा सौदा है। हालांकि, कुछ यूजर्स ने यह भी याद दिलाया कि खाने के कारोबार में कम कीमत के साथ साफ-सफाई और गुणवत्ता का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। लंबे समय तक ग्राहक बनाए रखने के लिए स्वाद के साथ हाइजीन भी जरूरी है।

 

कमाई अच्छी फिर भी सेविंग नहीं! इन मूलांक वालों की ये आदत पड़ती है भारी

पैसा कमाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसे संभालकर रखना भी है। कई बार अच्छी कमाई होने के बावजूद महीने के आखिर में सेविंग नहीं हो पाती और पता ही नहीं चलता कि पैसा कहां खर्च हो गया। अंक ज्योतिष के अनुसार, जन्म तारीख से निकलने वाला मूलांक व्यक्ति के स्वभाव और पैसों से जुड़ी आदतों के बारे में भी कुछ संकेत दे सकता है। कुछ मूलांक वाले लोग कमाई अच्छी होने के बाद भी ज्यादा खर्च करने, शौक पूरे करने या बिना सोचे पैसे लगाने की वजह से आर्थिक परेशानी में पड़ सकते हैं।

 

मूलांक 3

जिन लोगों का जन्म किसी भी महीने की 3, 12 या 21 तारीख को हुआ है, उनका मूलांक 3 माना जाता है। अंक ज्योतिष में इसके स्वामी ग्रह गुरु माने जाते हैं।

ये लोग लोग आमतौर पर आगे बढ़ने और पैसा कमाने की सोच रखते हैं। इन्हें नई चीजें सीखना और खुद को बेहतर बनाना पसंद होता है। इसी वजह से कई बार ये अपनी पढ़ाई, ग्रूमिंग, शौक और पसंद की चीजों पर जरूरत से ज्यादा खर्च कर देते हैं। कभी-कभी भावनाओं में आकर भी पैसा खर्च करने की आदत बन सकती है, जिससे अच्छी कमाई के बावजूद बचत कम रह जाती है।

 

मूलांक 5

5, 14 या 23 तारीख को जन्म लेने वाले लोगों का मूलांक 5 माना जाता है। अंक ज्योतिष में इस मूलांक का स्वामी बुध ग्रह माना जाता है।

ये लोग लोग तेज दिमाग और नई चीजें आजमाने वाले माने जाते हैं। इन्हें एक ही तरह की जिंदगी या काम ज्यादा समय तक पसंद नहीं आता। इसी वजह से ये कई बार नौकरी, काम या अपनी पसंद की चीजें जल्दी-जल्दी बदल लेते हैं। नई चीजों और अनुभवों पर खर्च करने की आदत भी इनके लिए परेशानी बन सकती है। कमाई अच्छी होने के बावजूद अगर खर्च पर ध्यान न दिया जाए, तो भविष्य के लिए पैसा बचाना मुश्किल हो सकता है।

मूलांक 6

जिन लोगों का जन्म किसी भी महीने की 6, 15 या 24 तारीख को हुआ है, उनका मूलांक 6 माना जाता है। अंक ज्योतिष में इस मूलांक का स्वामी शुक्र ग्रह माना जाता है।

इन लोगों को आराम, खूबसूरत चीजें और अच्छी लाइफस्टाइल पसंद मानी जाती है। ये अपने कपड़े, लुक, ग्रूमिंग और घर की सजावट पर दिल खोलकर खर्च कर सकते हैं। कई बार दूसरों को प्रभावित करने के लिए भी ज्यादा खर्च हो जाता है। यही आदत अगर कंट्रोल में न रहे, तो अच्छी आमदनी के बाद भी सेविंग कम हो सकती है और आर्थिक परेशानी बढ़ सकती है।

 

बचत जरूरी

इन मूलांकों से जुड़ी बातें अंक ज्योतिष की मान्यताओं पर आधारित हैं। ऐसा जरूरी नहीं है कि इन तारीखों को जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को आर्थिक परेशानी हो। असल जिंदगी में पैसे की स्थिति कमाई, खर्च करने की आदत, बचत और सही वित्तीय योजना पर भी निर्भर करती है। इसलिए कमाई अच्छी हो तो खर्च के साथ भविष्य के लिए बचत पर भी ध्यान देना जरूरी है।