गाली पर इतना बवाल क्यों? भाषा बिगड़ रही है, या समाज का असली चेहरा सामने आ रहा है?

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इन दिनों गालियां फिर राष्ट्रीय बहस का विषय हैं। कभी किसी स्टैंड-अप कॉमेडियन के कारण, कभी किसी ओटीटी सीरीज़ के कारण, कभी किसी यूट्यूबर की भाषा को लेकर, तो कभी किसी छात्र आंदोलन में इस्तेमाल हुए जार्गन पर।

ऐसा लगता है मानो देश के सामने सबसे बड़ा संकट बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य या अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि शब्दों का हो। लेकिन असली सवाल यह है—क्या गालियां अचानक पैदा हुई हैं, या पहली बार माइक्रोफोन पर सुनाई देने लगी हैं?

गाली का इतिहास, इंटरनेट से कहीं पुराना है
यदि कोई यह मानता है कि गालियां इंटरनेट, ओटीटी, जेन-जी या सोशल मीडिया की देन हैं, तो उसे एक बार बनारस के अस्सी घाट की शामें, उत्तर भारत के गांवों की चौपालें, पुलिस थानों की भाषा, ट्रक चालकों की बातचीत और शादी-ब्याह में गाए जाने वाले पारंपरिक 'गारी गीत' याद कर लेने चाहिए।

भारतीय लोकसंस्कृति में गालियों का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है, जितना लोकगीतों का। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वे चौपालों, घाटों और आंगनों में गूंजती थीं, आज एल्गोरिदम उन्हें ट्रेंड करा देता है।

काशीनाथ सिंह ने अपने चर्चित उपन्यास 'काशी का अस्सी' में बनारस की उस भाषा को दर्ज किया है, जिसमें गाली हमेशा अपमान नहीं होती। वह आत्मीयता भी है, ठहाका भी, अपनापन भी और सत्ता से बेखौफ होकर बात करने का अंदाज़ भी। बनारस में कई बार गाली रिश्ते की दूरी नहीं, बल्कि निकटता का प्रमाण होती है।

उत्तर भारत के अनेक विवाहों में आज भी 'गारी' एक रस्म है। दूल्हे और उसके परिवार को गाकर सुनाई जाने वाली ये गालियां अपमान के लिए नहीं, बल्कि सदियों पुराने सामाजिक संकोच को तोड़ने, रिश्तों में सहजता लाने और औपचारिकता की दीवार गिराने के लिए होती हैं।

यानी भारतीय समाज ने गाली को केवल आक्रोश की भाषा नहीं बनाया; कई बार उसे हास्य, अपनत्व और लोकसंस्कृति का भी हिस्सा बनाया है।
दिलचस्प यह है कि यही समाज कबीर का भी है—

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥”

यानी हमारी संस्कृति में मधुर वाणी भी है और ठेठ गाली भी। दोनों सदियों से साथ-साथ चली हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गालियां मोहल्ले तक सीमित थीं, अब राष्ट्रीय बहस का विषय हैं।

असली समस्या गाली नहीं, हमारा पाखंड है
हिंदी भाषी समाज शायद दुनिया के सबसे दिलचस्प भाषाई विरोधाभासों में से एक है।
औपचारिक मंच पर हम शालीनता की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं। “आदरणीय”, “माननीय”, “श्रद्धेय” जैसे शब्दों से वाक्य शुरू करते हैं। लेकिन सड़क पर, ट्रैफिक में, क्रिकेट मैच के दौरान, दोस्तों की महफिल में, पुलिस थानों में और कभी-कभी घरों के भीतर भी वही समाज ऐसी भाषा बोलता है, जिसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने में संकोच करता है।

यानी हमारी भाषा दो हिस्सों में बंट चुकी है—एक कैमरे के लिए, दूसरी कैमरे के पीछे।
रहीम ने बहुत पहले चेताया था—

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पाताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥”

लेकिन लगता है कि हमने इस दोहे को दीवार पर टांग दिया, व्यवहार में नहीं।
ओटीटी ने भाषा नहीं बिगाड़ी, उसने मेकअप उतार दिया
हर नई वेब सीरीज़ के बाद कहा जाता है कि ओटीटी समाज को बिगाड़ रहा है।
क्या सचमुच?
या उसने सिर्फ वही भाषा रिकॉर्ड कर ली, जिसे समाज वर्षों से ऑफ रिकॉर्ड बोलता आया है?
जिस समाज में पुलिस की डांट अक्सर गाली से शुरू होती हो, जहां चुनावी मंचों से लेकर विधानसभाओं और संसद तक कई बार असंसदीय शब्द रिकॉर्ड से हटाने पड़ते हों, वहां ओटीटी पर नैतिकता का पूरा बोझ डाल देना आसान रास्ता है।
आईना हमेशा दोषी नहीं होता। कई बार चेहरा भी देख लेना चाहिए।

गाली आखिर करती क्या है?

  • गाली केवल अश्लीलता नहीं है।
  • वह गुस्से का शॉर्टकट है।
  • हताशा का विस्फोट है।
  • व्यंग्य का हथियार है।
  • और कई बार प्रतिरोध की भाषा भी।

दार्शनिक लुडविग विट्गेंस्टाइन ने लिखा था— मेरी भाषा की सीमाएँ ही मेरी दुनिया की सीमाएँ हैं।”
यदि समाज की भाषा अधिक आक्रामक हो रही है, तो संभव है कि समाज के भीतर बेचैनी भी उतनी ही बढ़ रही हो।

कई बार बहुत सारे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पारिवारिक दबावों से बोझिल व्यक्ति के लिए अपनी असहायता, गुस्सा और झुंझलाहट निकालने का सबसे आसान माध्यम एक गाली ही बन जाती है। बिना हिंसा किए, अपमान, निरादर, क्षोभ और प्रतिरोध की जितनी तीखी अभिव्यक्ति कुछ हिंदी गालियां कर देती हैं, उतनी कई बार लंबे भाषण भी नहीं कर पाते।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर गाली जायज़ है। लेकिन हर गाली को केवल खराब संस्कार कह देना भी उतना ही अधूरा विश्लेषण है।

गाली और बराबरी का नया विमर्श
एक दिलचस्प बदलाव और आया है। सदियों तक अधिकांश गालियां स्त्रियों के शरीर और रिश्तों के माध्यम से पुरुष का अपमान करती रहीं। यानी भाषा भी पितृसत्ता का औज़ार बनी रही।
लेकिन आज वही गालियां महिलाएं भी बोल रही हैं।

  • क्या यह भाषा का पतन है?
  • या भाषाई बराबरी का दावा?

उत्तर आसान नहीं है।
महादेवी वर्मा ने लिखा था कि श्रृंखलाएँ केवल लोहे की नहीं होतीं, भाषा की भी होती हैं।” (भावार्थ) संभव है कि नई पीढ़ी उन्हीं भाषाई श्रृंखलाओं को तोड़ने की कोशिश कर रही हो। कुछ इसे पतन कहेंगे, कुछ इसे समानता का दावा। दोनों दृष्टियाँ विचारणीय हैं।

लेकिन सावधान…
यह लेख गालियों का समर्थन नहीं है। क्योंकि जिस दिन तर्क की जगह गाली ले लेगी, उस दिन लोकतंत्र कमजोर होगा। असहमति आवश्यक है। अपमान नहीं।
व्यंग्य लोकतंत्र को जीवित रखता है। लेकिन गाली यदि विचार का विकल्प बन जाए, तो वह संवाद नहीं, शोर पैदा करती है। यहीं सबसे बड़ी सावधानी की जरूरत है।
आज की भाषा में मीम हैं, रील हैं, तंज हैं, वायरल वीडियो हैं और गालियां भी। इनसे असहमत होना आपका अधिकार है।
लेकिन इनके अस्तित्व से इनकार करना शायद वास्तविकता से इनकार करना है। आखिरकार, सवाल यह नहीं कि समाज गालियां क्यों दे रहा है।

सवाल यह है कि समाज इतना गुस्से में क्यों है?
क्योंकि शब्द अपने आप पैदा नहीं होते, वे समय की कोख से जन्म लेते हैं। गालियाँ भाषा का सौंदर्य नहीं हैं,

लेकिन वे समाज की मनःस्थिति का एक्स-रे अवश्य हैं।
इसलिए हर गाली की आलोचना कीजिए, लेकिन उसे जन्म देने वाली सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की भी पड़ताल कीजिए। क्योंकि भाषा कभी निर्वात में पैदा नहीं होती।
वह हमेशा समाज का आईना होती है। और आईना, चाहे कितना भी असुविधाजनक क्यों न लगे, झूठ नहीं बोलता।

PM मोदी के खिलाफ मॉर्फ्ड पोस्ट पर बड़ा एक्शन! Meta India प्रमुख समेत कई सोशल मीडिया अकाउंट्स पर FIR

FIR on Meta chief on morfed video against PM Modi

छात्र प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित मॉर्फ्ड (छेड़छाड़ किए गए) कंटेंट और आपत्तिजनक पोस्ट साझा किए जाने के मामले में पुलिस ने बड़ा कदम उठाया है। साइबर क्राइम पुलिस ने मामले में Meta India के प्रमुख, कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स और अन्य संबंधित पक्षों के खिलाफ FIR दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। ALSO READ: पुजारी बनकर संसद पहुंचे पप्पू यादव, राहुल गांधी ने दानपात्र में डाले पैसे; 'चढ़ावा चोरी' पर विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का AI से मॉर्फ्ड वीडियो बनाने के मामले में हैदराबाद पुलिस ने मेटा इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास और कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ एक केस दर्ज किया है। पीएम मोदी ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान वीडियो शेयर किया था, जिसको बाद में कुछ लोगों ने AI की मदद से एडिट किया है और गलत जानकारी सर्कुलेट की।

 

पुलिस का कहना है कि जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कथित मॉर्फ्ड सामग्री किसने तैयार की, किसने उसे प्रसारित किया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उसके प्रसार को रोकने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं। ALSO READ: 'अमित शाह संसद से गायब क्यों?' प्रियंका गांधी समेत विपक्ष का संसद परिसर में प्रदर्शन, छात्रों पर कार्रवाई को लेकर इस्तीफे की मांग

 

क्या है पूरा मामला?

जांच एजेंसियों के अनुसार, NEET प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी कथित रूप से मॉर्फ्ड तस्वीरें, वीडियो और अन्य डिजिटल सामग्री तेजी से वायरल हुई थी। शिकायत मिलने के बाद साइबर क्राइम पुलिस ने मामले की प्रारंभिक जांच की, जिसके आधार पर संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की गई। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि विवादित कंटेंट के प्रसार में किन-किन सोशल मीडिया अकाउंट्स की भूमिका रही और क्या किसी प्लेटफॉर्म ने कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई करने में लापरवाही बरती।

 

किन पहलुओं की होगी जांच?

 

साइबर क्राइम अधिकारियों के अनुसार जांच में कई बिंदुओं पर फोकस किया जाएगा, जिनमें शामिल हैं—

  • कथित मॉर्फ्ड कंटेंट का मूल स्रोत कौन था।
  • कंटेंट किस नेटवर्क के माध्यम से वायरल हुआ।
  • संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट्स की भूमिका क्या रही।
  • लागू कानूनों और आईटी नियमों का पालन हुआ या नहीं।
  • डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई।

 

पुलिस का क्या कहना है?

साइबर क्राइम विभाग का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फर्जी, भ्रामक या मॉर्फ्ड सामग्री का प्रसार कानून के दायरे में आता है और ऐसे मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच की जाएगी। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अपुष्ट या संदिग्ध सामग्री को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच अवश्य करें।

 

मॉर्फ्ड वीडियो क्या होते हैं? 

मॉर्फ्ड वीडियो, असल में ऐसे वीडियो होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज या हाव-भाव डिजिटल तकनीक, AI या वीडियो या एडिटिंग सॉफ्टवेयर के जरिए बदले जाते हैं। इन वीडियो का मकसद होता है कि लोगों को ऐसा लगे कि वह व्यक्ति कुछ ऐसा कह या कर रहा है, जो असल में उसने कहा ही नहीं था।

Meta इंडिया हेड के खिलाफ केस दर्ज, PM मोदी का AI से मॉर्फ्ड वीडियो बनाने से जुड़ा है मामला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने वाले कथित मॉर्फ्ड और आपत्तिजनक वीडियो को लेकर हैदराबाद पुलिस ने मेटा इंडिया के प्रमुख और कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ मामला दर्ज किया है। ये वीडियो दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान और उसके बाद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा कार्यकर्ताओं की शिकायत के बाद हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने इस मामले में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की हैं।

पुलिस ने संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट चलाने वाले लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है।

मेटा इंडिया के प्रमुख भी आरोपी, पुलिस ने भेजा नोटिस

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों मामलों में मेटा इंडिया के प्रमुख को भी सह-आरोपी बनाया गया है। हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस के एक जांच अधिकारी ने बताया कि दर्ज मामलों और शिकायतकर्ताओं द्वारा साझा किए गए कथित आपत्तिजनक लिंक के संबंध में मेटा को नोटिस भेजा गया है। पुलिस का कहना है कि मामले में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। इसके लिए सोशल मीडिया खातों से जुड़ी जानकारी जुटाई जा रही है, ताकि आरोपियों का पता लगाकर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सके।

जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान किया गया था आपत्तिजनक कमेंट

एक अन्य मामले में, नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करने के आरोप में नोएडा में एक महिला के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज की गई है। यह एफआईआर नोएडा के एक्सप्रेसवे थाना में गाजियाबाद निवासी स्मृति सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई। शिकायत में नोएडा के सेक्टर-168 की रहने वाली रुचिका सिंह पर प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। जीरो एफआईआर होने के कारण अब इस मामले को संबंधित पुलिस थाने को भेजकर आगे की जांच की जाएगी।

बीएनएस की कई धाराओं में दर्ज हुआ मामला

एफआईआर के अनुसार, शिकायतकर्ता का आरोप है कि 23 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान आरोपी महिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। शिकायत में कहा गया है कि इससे प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंची और सार्वजनिक शांति भंग होने तथा लोगों के बीच तनाव फैलने की आशंका पैदा हुई। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, धारा 353(1) और धारा 356(1) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इन धाराओं में जानबूझकर अपमान करना, सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान देना और मानहानि जैसे आरोप शामिल हैं। मामले की आगे की जांच जारी है।

जंतर-मंतर प्रोटेस्ट में PM मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक कमेंट, नोएडा की महिला पर दर्ज हुई FIR

दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक के विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने के मामले में नोएडा पुलिस ने 25 वर्षीय एक महिला के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज की है। पुलिस का कहना है कि रुचिका सिंह नाम की महिला ने 23 जुलाई को प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इस मामले में बुधवार को शिकायत मिलने के बाद नोएडा के एक्सप्रेसवे थाना पुलिस ने जीरो एफआईआर दर्ज की।

महिला के खिलाफ दर्ज हुई FIR

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि महिला की टिप्पणी से प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंची है। साथ ही यह भी कहा गया है कि इस तरह के बयान से लोगों के बीच तनाव फैल सकता है और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।

पुलिस ने इस मामले में जीरो एफआईआर दर्ज की थी। जीरो एफआईआर का मतलब है कि किसी भी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज की जा सकती है, चाहे घटना किसी दूसरे इलाके में हुई हो। अब यह मामला आगे की जांच के लिए दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाना पुलिस को भेज दिया गया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, 353(1) और 356(1) के तहत मामला दर्ज किया है। इन धाराओं में शांति भंग करने के लिए उकसाना, ऐसा बयान देना जिससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती हो और मानहानि जैसे आरोप शामिल हैं। अधिकारियों के अनुसार, अब पार्लियामेंट स्ट्रीट थाना पुलिस पूरे मामले की जांच करेगी और जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

CJP ने FIR पर उठाए सवाल

एफआईआर दर्ज होने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने इस पर प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि अगर महिला ने आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया भी है, तब भी उसके खिलाफ आपराधिक कानून का इस्तेमाल करना सही नहीं है। पीटीआई के अनुसार, सौरव दास ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी मानहानि हुई है, तो वह कानून के तहत सिविल या आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज करा सकता है। लेकिन केवल किसी प्रदर्शनकारी के कथित आपत्तिजनक बयान के आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ आपराधिक कानून का इस्तेमाल करना निंदनीय है और केवल आपत्तिजनक भाषा के कारण किसी व्यक्ति को सजा नहीं दी जानी चाहिए।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि वह आपत्तिजनक भाषा का समर्थन नहीं करते, लेकिन केवल ऐसे बयान के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक कानून का इस्तेमाल करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी की भाषा गलत हो सकती है या उससे लोगों की भावनाएं आहत हो सकती हैं, लेकिन यह किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने का पर्याप्त कारण नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, इससे लोगों में डर का माहौल पैदा होता है और खासकर युवाओं पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है।

सौरव दास ने युवाओं से भी अपील की कि वे प्रदर्शन के दौरान अपने शब्दों का सोच-समझकर इस्तेमाल करें और किसी के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने से बचें। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस को संयम के साथ काम करना चाहिए और अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं करना चाहिए। उनके मुताबिक, केवल कथित आपत्तिजनक भाषा के आधार पर आपराधिक कार्रवाई करना स्वीकार्य नहीं है।

PM Modi के खिलाफ अभद्र टिप्पणी मामले में नोएडा में मुकदमा दर्ज, युवती और परिजन फरार, केस दिल्ली ट्रांसफर

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में नोएडा के एक्सप्रेसवे थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया है। शिकायतकर्ता के अनुसार, यह टिप्पणी 23 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन के दौरान की गई थी। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज करने के बाद केस को दिल्ली ट्रांसफर कर दिया है। अब मामले की जांच दिल्ली पुलिस करेगी।

 

शिकायतकर्ता स्मृति सिंह ने पुलिस को बताया कि वह गाजियाबाद के वसुंधरा की रहने वाली हैं और सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं। उनके मुताबिक, 23 जुलाई को उनके संज्ञान में आया कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन के दौरान एक युवती ने देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कथित तौर पर अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया।

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शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि युवती की टिप्पणी से संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंची और जानबूझकर लोक शांति भंग करने का प्रयास किया गया।

 

नोएडा की सोसाइटी में रहती है युवती

शिकायतकर्ता के मुताबिक, कथित टिप्पणी करने वाली युवती की पहचान नोएडा के सेक्टर-168 स्थित लोट्स जिंग सोसाइटी निवासी रुचिका सिंह के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, वह मूल रूप से फरीदाबाद के ऊंचागांव की रहने वाली बताई गई है। जानकारी के मुताबिक, युवती ब्यूटी पार्लर संचालित करती है और इसी साल जनवरी में उसने नोएडा में फ्लैट खरीदा था।

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घटना के बाद से युवती और परिजन घर पर नहीं मिले

पुलिस के अनुसार, घटना के बाद से युवती और उसके परिजन कथित तौर पर अपने आवास पर नहीं मिले हैं। पुलिस उनकी तलाश कर रही है और मामले से जुड़े तथ्यों की जांच की जा रही है।

BNS की इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला

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पुलिस ने बताया कि शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352, 353(1) और 356(1) के तहत शून्य अपराध संख्या (Zero FIR) दर्ज की गई है। इसके बाद केस को दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया है, क्योंकि कथित घटना दिल्ली के जंतर-मंतर से संबंधित है। अब मामले की आगे की विवेचना दिल्ली पुलिस द्वारा की जाएगी। फिलहाल पुलिस युवती की तलाश के साथ-साथ वायरल वीडियो और शिकायत में लगाए गए आरोपों से जुड़े तथ्यों की भी जांच कर रही है। मामले में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों के आधार पर की जाएगी।

Mela: ‘ट्विंकल खन्ना काबिल नहीं थीं…’ ‘मेला’ के राइटर फिल्म में करिश्मा कपूर को करना चाहते थे कास्ट

Mela: हो सकता है कि फैन्स आमिर खान और ट्विंकल खन्ना की फिल्म ‘मेला’ को भूल गए हों, लेकिन राइटर सुनील दर्शन के मन में 2000 में आई इस फिल्म को लेकर अब भी कुछ फीलिंग्स हैं। रिलीज के कई साल बाद, सुनील ने कास्टिंग के बारे में बात की और कहा कि उन्हें नहीं लगता था कि ट्विंकल, धर्मेश दर्शन के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म के लिए सही पसंद थीं।

उनका मानना ​​है कि करिश्मा कपूर इस फिल्म को और भी ज्यादा सफल बना सकती थीं। फिल्ममेकर ने यह भी याद किया कि मीडिया में ट्विंकल की ओर से फिल्म और उनके बारे में की गई कुछ टिप्पणियों से उन्हें दुख हुआ था।

‘हिंदी रश’ के साथ बातचीत में सुनील दर्शन ने कहा, “कहानी मेरी थी। ओरिजिनल कहानी मैंने ही लिखी थी, लेकिन उसमें कुछ बदलाव किए गए थे। जब मैंने रिलीज से कुछ दिन पहले फिल्म देखी, तो मुझे लगा कि अगर वे बदलाव न किए गए होते, तो फिल्म सुपर हिट होती क्योंकि ओरिजिनल कहानी बहुत मजबूत थी।”

उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगा कि ट्विंकल उस रोल के लिए उतनी काबिल नहीं थीं। अगर करिश्मा कपूर फिल्म में होतीं, तो यह सुपर हिट हो जाती। ट्विंकल सही पसंद नहीं थीं। लेकिन वह डायरेक्टर का फैसला था, और मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं था।”

सुनील दर्शन ने आगे कहा, “बाद में, जब ट्विंकल ने मीडिया में कुछ बातें कहीं तो मुझे बहुत बुरा लगा। दूसरों के बारे में बात करते समय थोड़ी मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। अगर कोई खुलकर बात करने लगे, तो दूसरा व्यक्ति भी कई बातें उजागर कर सकता है। लेकिन हमें दूसरों का सम्मान करना चाहिए और उनकी गरिमा का भी ध्यान रखना चाहिए। इसलिए, उन बातों को अतीत में ही छोड़ देना और उन्हें भूल जाना बेहतर है।”

साल 2000 में रिलीज हुई फिल्म ‘मेला’ को ज्यादातर नकारात्मक समीक्षाएं मिलीं। आमिर खान, ट्विंकल खन्ना और फ़ैसल खान जैसे कलाकारों के होने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर इसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा। हो सकता है कि यह फिल्म सिनेमाघरों में सफल न रही हो, लेकिन बाद में इसे ‘कल्ट फॉलोइंग’ मिली। फिल्म के कई सीन और डायलॉग मीम्स बन गए, जिससे रिलीज के कई सालों बाद भी यह फिल्म चर्चा में बनी रही।

यूजरनेम में छूटा सिर्फ एक अंडरस्कोर, निर्दोष शख्स ने जेल में काट दिए 18 महीने; वजह कर देगी हैरान

कई बार छोटी-सी गलती किसी इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है। कनाडा के एक व्यक्ति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां एक मामूली डिजिटल अंतर ने उसे गंभीर कानूनी मुसीबत में डाल दिया। पुलिस ने एक ऑनलाइन यूजरनेम की गलत पहचान के आधार पर उसे आरोपी मान लिया और उसे लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। मामला तब सामने आया जब अपील की प्रक्रिया के दौरान जांच में पता चला कि जिस अकाउंट को पुलिस आरोपी से जोड़ रही थी, वह वास्तव में किसी और का था।

एक अतिरिक्त अंडरस्कोर की वजह से हुई यह गलती इतनी बड़ी बन गई कि एक निर्दोष व्यक्ति को सजा भुगतनी पड़ी। बाद में अदालत ने पूरे मामले की समीक्षा करते हुए उसे बेगुनाह माना। यह घटना डिजिटल जांच में छोटी-सी चूक के गंभीर परिणामों को दिखाती है।

एक छोटे से अंतर ने बना दिया आरोपी

कनाडा के हैलिफैक्स निवासी ब्रैंडन क्लेम को साल 2020 में गिरफ्तार किया गया था। मामला 2018 में अमेरिका के विस्कॉन्सिन से शुरू हुई एक जांच से जुड़ा था। पुलिस ने ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर जिस व्यक्ति की पहचान की थी, उसका यूजरनेम “fus__ro_dah” था। वहीं, क्लेम का यूजरनेम “fus_ro_dah” था। दोनों में अंतर सिर्फ इतना था कि असली आरोपी के नाम में एक अतिरिक्त अंडरस्कोर (_) था। लेकिन यही छोटी-सी गलती क्लेम के लिए बड़ी परेशानी बन गई।

गलत पहचान के आधार पर हुई सजा

पुलिस ने इसी यूजरनेम को आधार बनाकर क्लेम को आरोपी मान लिया। साल 2023 में डार्टमाउथ प्रांतीय अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और 18 महीने की जेल की सजा सुनाई। उन पर नाबालिग को बहलाने, आपत्तिजनक सामग्री साझा करने और चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े आरोप लगाए गए थे।

अपील के दौरान सामने आई बड़ी गलती

क्लेम की कानूनी टीम जब अपील की तैयारी कर रही थी, तब उन्हें इस गलती का पता चला। वकीलों ने पाया कि पुलिस की ओर से भेजे गए सबपोना में गलत यूजरनेम दर्ज था। वकील जेब ब्राउन ने बताया कि अपील की दलील तैयार करते समय यह सवाल उठा कि डिजिटल सबूत क्लेम से कैसे जुड़े, जबकि वह लगातार अपनी बेगुनाही की बात कह रहे थे।

कोर्ट ने माना- व्यक्ति था पूरी तरह निर्दोष

अपील कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस ने गलत यूजरनेम के आधार पर क्लेम को आरोपी बनाया था। कोर्ट ने साफ कहा कि उन्हें कभी आरोपी बनाया ही नहीं जाना चाहिए था। फैसले में यह भी कहा गया कि क्लेम के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं था जो उन्हें उस लड़की से जोड़ता हो।

18 महीने जेल में बिताने पड़े बेगुनाह शख्स को

क्लेम ने बताया कि पुलिस के एक छोटे से टाइपिंग अंतर ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। उन्होंने कहा कि सबपोना में असली यूजरनेम “fus__ro_dah” की जगह “fus_ro_dah” लिखा गया था, जिससे जांच गलत दिशा में चली गई। यह गलती ट्रायल के दौरान भी सामने नहीं आ सकी।

अब मुआवजे का फैसला बाकी

कोर्ट ने क्लेम को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया और उनके खिलाफ लगाए गए अतिरिक्त कानूनी आदेश भी रद्द कर दिए। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि वह जेल में बिताए गए 18 महीनों के लिए मुआवजे की मांग करेंगे या नहीं।

 ‘इन-हैंड सैलरी कितनी मिलेगी?’ बस इतना पूछा और कंपनी ने कर दिया रिजेक्ट, सोशल मीडिया पर छिड़ गई बहस

नीली नहीं अब विश्व कप में भगवा जर्सी पहनेंगी भारतीय हॉकी टीमें

भारतीय पुरूष और महिला हॉकी टीमें अगले महीने नीदरलैंड और बेल्जियम में होने वाले एफआईएच विश्व कप में पारंपरिक नीली जर्सी नहीं बल्कि भगवा रंग की जर्सी पहनेगी।

इस फैसले पर हालांकि पूर्व कप्तान वीरेन रासकिन्हा ने सवाल उठाया है। हॉकी इंडिया ने अपने सोशल मीडिया पेज पर नयी जर्सी का अनावरण करते हुए कहा कि जर्सी का डिजाइन और रंग एक कहानी बताने और भारत का गौरव दिखाने के लिये है।

हॉकी इंडिया ने कहा कि भगवा रंग साहस, बलिदान और जीत का प्रतीक है। इसने कहा ,‘‘भारत के राष्ट्रध्वज और उगते हुए सूरज से प्रेरित यह जर्सी नयी शुरूआत की प्रतीक है।’

विश्व कप 15 से 30 अगस्त के बीच खेला जायेगा। जर्सी पर ‘मंडाला’ कला से प्रेरित पैटर्न हैं जो भारत की सांस्कृतिक विरासत दर्शाते हैं। हॉकी इंडिया ने कहा कि इस पर गहरा नेवी ब्लू रंक अशोक चक्र से प्रेरित है जो प्रगति, शांति और फोकस का प्रतीक है।

हॉकी इंडिया ने कहा कि छाती पर बना ग्राफिक सुदर्शन चक्र का एक आधुनिक रूप है, जो “ताकत, एकता और गति” का प्रतीक है।

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कंधों और बाजुओं पर तिरंगे की पाइपिंग है जो राष्ट्रीय गौरव की द्योतक है। जर्सी के आगे के हिस्से पर देवनागरी लिपि में ‘इंडिया’ लिखा है जो भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।

हॉकी इंडिया ने कहा नयी जर्सी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना की परिचायक है। भारतीय टीम के पास भगवा के साथ इसी तरह की सफेद जर्सी भी होगी। पूर्व कप्तान रासकिन्हा ने हालांकि जर्सी का रंग बदलने के फैसले पर सवाल किया है।

उन्होंने एक्स पर लिखा हॉकी इंडिया ने खेल के लिये बहुत कुछ किया है लेकिन यह निराशाजनक है। भारतीय टीम की विरासत और पहचान नीला रंग रही है। मैने कई साल तक गर्व से नीली जर्सी पहनी है। प्रशंसक हमारी टीम को नीले रंग में देखना चाहते हैं।यह भगवा का क्या तुक है। ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट के सीईओ ने कहा मेरा सरल और सीधा प्रश्न अपने गर्व, पहचान और विरासत से जुड़ा है।

हॉकी इंडिया ने हालांकि इस फैसले का बचाव किया और एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा ,‘‘इसमें कुछ भी राजनीतिक नहीं है। भगवा जर्सी होने में क्या खराबी है। यह हमारे तिरंगे का एक रंग है और परिवर्तन तो होते रहना चाहिये। उन्होंने कहा कि नीली टर्फ पर नीली जर्सी पहनने से प्रशंसकों और प्रसारकों को देखने में समस्या आती है।

Pic Credit : ANI

दतिया विधानसभा सीट पर क्या टूटेगा 2023 की वोटिंग का रिकार्ड, बंपर वोटिंग में कौन मारेगा बाजी?

मध्यप्रदेश की सबसे हाईप्रोफाइल विधानसभा सीट दतिया में आज मतदान हो रहा है। दोपहर 3 बजे तक 61 फीसदी से करीब मतदान हो चुका है। आज मतदान के दिन भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी और कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह दोनों ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया है। वहीं दतिया उपचुनाव में सबसे अधिक चर्चा में रहने वाले पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भी अपने मताधिकार का उपयोग किया। वोट डाले के बाद नरोत्तम मिश्रा ने भाजपा की जीत का दावा किया।  

 

वोटिंग ट्रैंड से भाजपा-कांग्रेस में कांटे के मुकाबले के संकेत-दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा के उम्मीदवार आशुतोष तिवारी और कांग्रेस प्रत्याशी धनश्याम सिंह के बीच कांटे का मुकाबला देखा जा रहा है। दतिया के शहरों इलाकों के साथ ग्रामीण इलाकों में सभी 291 पोलिंग बूथों पर जिस तरह से मतदान का ट्रैंड देखने को मिल रहा है, उससे यह साफ है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर चल रही है, वहीं एसी वर्ग का एक बड़ा वोट बैंक दमोदर यादव के साथ भी जा सकता है। जैसे-जैसे वोटिंग का समय बीतता जा रहा है वैसे-वैसे ग्रामीण इलाकों में मतदान केंद्रों पर वोटर्स की लंबी-लंबी कतारें नजर आ रही है। 

दतिया विधानसभा सीट पर अब तक हुआ मतदान इस बात की ओर साफ इशारा है कि शाम 6 बजे तक मददान प्रतिशत 2023 के विधानसभा चुनाव की तरह 80 फीसदी के उपर जा सकता है। गौरतलब है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया विधानसभा सीट पर 80.20 फीसदी मतदान हुआ था और भाजपा प्रत्याशी नरोत्तम मिश्रा को करीब 8 हजार वोटों से कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार का सामना करना पड़ा था।   

 

दमोदर यादव साबित होंगे किंगमेकर?- दतिया विधानसभा में आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दमोदर यादव गेमचेंजर साबित हो सकते है। दतिया विधानसभा में एससी वोटर्स की संख्या 60 हजार के करीब है और दतिया के ग्रामीण इलाकों में एससी वोटर्स का झुकाव दामोदर यादव की ओर हो सकता है। इसके साथ ओबीसी समाज का एक वोट बैंक भी दमोदर यादव के साथ जा सकता है।  

 

सोशल मीडिया से वायरल कंटेट से किसका नफा-किसका नुकसान?-दतिया में पोलिंग के दिन सोशल मीडिया पर जिस तरह कंटेट वायरल हुए उसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ सकता है। सुबह 7 बजे मतदान शुरु होते ही सोशल मीडिया पर भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाह को उनके पद से निष्कासित करने का भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का एक फर्जी पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस फर्जी पत्र के लिए भाजपा ने किश रावत नाम के शख्स के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की है। चुनाव आयोग से शिकायत भाजपा ने आरोप लगाया है कि किश रावत ने फेसबुक पर भ्रामक और आपत्तिजनक पत्र अपलोड किया, जिसके कारण दतिया के लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है और इसके कारण कानून और व्यवस्था की स्थिति उत्तपन्न हो सकती है। भाजपा ने किश रावत के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

दतिया विधानसभा सीट पर कुशवाह वोटर्स की संख्या 40 हजार से उपर है और चुनाव में कुशवाह वोटर्स निर्णायक भूमिका निभा सकते है, इसलिए पोलिंग के ठीक पहले बुधवार शाम वार्ड एक से पार्षद रहे कल्लू कुशवाह हत्याकांड मामले में उनकी पत्नी संतोष कुशवाह का भाजपा का विरोध करने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल वीडियो में कल्लू कुशवाह की पत्नी ने अपने पति के हत्याकांड के आरोपी साहब सिंह यादव के भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के साथ चुनाव प्रचार करने का आरोप लगाया। इसके साथ उन्होंने कुशवाह समाज के वोटर्स से भाजपा को हराने की अपील की। इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर दतिया के भाजपा के कुशवाह समाज के नेताओं और पार्षदों के वीडियो आए जिसमें  कुशवाह समाज से भाजपा के पक्ष में मतदान करने की अपील की गई।  

हॉकी जर्सी का भगवाकरण, पूर्व कप्तान को नहीं भाया रंग तो बढ़ा विवाद

भारतीय पुरूष और महिला हॉकी टीमें अगले महीने नीदरलैंड और बेल्जियम में होने वाले FIH विश्व कप में पारंपरिक नीली जर्सी नहीं बल्कि भगवा रंग की जर्सी पहनेगी।इस फैसले पर हालांकि पूर्व कप्तान वीरेन रासकिन्हा ने सवाल उठाया है।

हॉकी इंडिया ने अपने सोशल मीडिया पेज पर नयी जर्सी का अनावरण करते हुए कहा कि जर्सी का डिजाइन और रंग एक कहानी बताने और भारत का गौरव दिखाने के लिये है।हॉकी इंडिया ने कहा कि भगवा रंग साहस, बलिदान और जीत का प्रतीक है। ‘‘भारत के राष्ट्रध्वज और उगते हुए सूरज से प्रेरित यह जर्सी नयी शुरूआत की प्रतीक है।’

विश्व कप 15 से 30 अगस्त के बीच खेला जायेगा।जर्सी पर ‘मंडाला’ कला से प्रेरित पैटर्न हैं जो भारत की सांस्कृतिक विरासत दर्शाते हैं। हॉकी इंडिया ने कहा कि इस पर गहरा नेवी ब्लू रंक अशोक चक्र से प्रेरित है जो प्रगति, शांति और फोकस का प्रतीक है।हॉकी इंडिया ने कहा कि छाती पर बना ग्राफिक सुदर्शन चक्र का एक आधुनिक रूप है, जो ‘ताकत, एकता और गति’ का प्रतीक है।

कंधों और बाजुओं पर तिरंगे की पाइपिंग है जो राष्ट्रीय गौरव की द्योतक है।जर्सी के आगे के हिस्से पर देवनागरी लिपि में ‘इंडिया’ लिखा है जो भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।हॉकी इंडिया ने कहा ,‘‘ नयी जर्सी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना की परिचायक है।’’

भारतीय टीम के पास भगवा के साथ इसी तरह की सफेद जर्सी भी होगी।पूर्व कप्तान रासकिन्हा ने हालांकि जर्सी का रंग बदलने के फैसले पर सवाल किया है।

उन्होंने एक्स पर लिखा ,‘‘ हॉकी इंडिया ने खेल के लिये बहुत कुछ किया है लेकिन यह निराशाजनक है। भारतीय टीम की विरासत और पहचान नीला रंग रही है। मैने कई साल तक गर्व से नीली जर्सी पहनी है। प्रशंसक हमारी टीम को नीले रंग में देखना चाहते हैं।यह भगवा का क्या तुक है।’’

ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट के C.EO ने कहा ,‘‘ मेरा सरल और सीधा प्रश्न अपने गर्व, पहचान और विरासत से जुड़ा है।’’हॉकी इंडिया ने हालांकि इस फैसले का बचाव किया और एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा ,‘‘इसमें कुछ भी राजनीतिक नहीं है। भगवा जर्सी होने में क्या खराबी है। यह हमारे तिरंगे का एक रंग है और परिवर्तन तो होते रहना चाहिये।’’उन्होंने कहा कि नीली टर्फ पर नीली जर्सी पहनने से प्रशंसकों और प्रसारकों को देखने में समस्या आती है।