Who is Yash Vir Singh: बांस के भाले से शुरू की थी प्रैक्टिस…आज CWG 2026 जीता ब्रॉन्ज मेडल, जानें कौन है यश वीर सिंह

Who is Yash Vir Singh: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पुरुषों की जैवलिन थ्रो इवेंट के फाइनल में भारत ने शानदार प्रदर्शन किया। जैवलिन थ्रो के फाइनल में भारत के नीरज चोपड़ा ने सिल्वर मेडल जीता तो वहीं यश वीर सिंह ने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। शुक्रवार को यश वीर सिंह ने 85.41 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ (पर्सनल बेस्ट) थ्रो करते हुए ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। वहीं, स्टार एथलीट नीरज चोपड़ा ने सीजन का अपना सर्वश्रेष्ठ 85.83 मीटर थ्रो किया और सिल्वर मेडल जीता। इस तरह भारत ने इस स्पर्धा में सिल्वर और ब्रॉन्ज दोनों पदक जीता है। श्रीलंका के रुमेश थरंगा (89.75 मीटर) ने गोल्ड मेडल जीता है। यश वीर सिंह के यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा है। आइए जानते हैं कौन है यश वीर सिंह

पहली बार लिया हिस्सा

कॉमनवेल्थ गेम्स में पहली बार हिस्सा लेने वाले 24 वर्षीय यश वीर सिंह ने अपने आखिरी और छठे प्रयास में पर्सनल बेस्ट 85.41 मीटर का शानदार थ्रो कर ब्रॉन्ज मेडल जीता। इससे पहले उनका सबसे अच्छा प्रदर्शन 83.72 मीटर था। इस जीत के साथ यश वीर उन चुनिंदा भारतीय खिलाड़ियों में शामिल हो गए हैं जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स की पुरुष जैवलिन थ्रो में पदक जीता है। उनसे पहले नीरज चोपड़ा ने 2018 में गोल्ड और 2026 में सिल्वर मेडल जीता था, जबकि काशीनाथ नाइक ने 2010 में कांस्य पदक अपने नाम किया था।

कौन है यश वीर सिंह

राजस्थान के जयपुर के रहने वाले यश वीर सिंह ने अपने खेल करियर की शुरुआत बास्केटबॉल से की थी। लेकिन बाद में उन्होंने भाला फेंक को अपना करियर बना लिया। शुरुआती दिनों में उन्होंने बांस से बने भाले से प्रैक्टिस किया और धीरे-धीरे प्रोफेशनल इक्विपमेंट के साथ ट्रेनिंग शुरू की। यश वीर सिंह के पिता राय सिंह से जैवलिन थ्रो से बारीकियां सिखी। यश के पिता खुद राष्ट्रीय स्तर के जैवलिन थ्रो खिलाड़ी रह चुके हैं। मेहनत और लगातार प्रैक्टिस का नतीजा यह रहा कि 2022 में यश ने इंडियन अंडर-20 फेडरेशन कप में 80 मीटर से ज्यादा भाला फेंककर नीरज चोपड़ा का मीट रिकॉर्ड भी तोड़ दिया।

यश वीर ने किया शानदार प्रदर्शन

यश वीर सिंह ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर सीनियर स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाई। साल 2025 में उन्होंने दक्षिण कोरिया के गुमी में आयोजित एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहां 82.57 मीटर का अपना सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए पांचवें स्थान पर रहे। इसी बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत उन्हें विश्व रैंकिंग के आधार पर 2025 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप के लिए भी चुना गया, जहां उन्होंने जापान की राजधानी टोक्यो में भारत की ओर से हिस्सा लिया। वहीं कॉमनवेल्थ गेम्स में पहली बार हिस्सा ले रहे यश ने ब्रॉन्ज मेडल जीता।

पाकिस्तानी नहीं श्रीलंकाई नीरज के हाथों से ले उड़ा गोल्ड पर विजयवीर जीते कांस्य

पेरिस ओलंपिक में पाकिस्तानी अरशद नदीम से गोल्ड मेडल हारने के बाद अब कॉमनवेल्थ गेम्स में नीरज चोपड़ा श्रीलंकाई खिलाड़ी से गोल्ड मेडल हार गए। हालांकि अपने बुरे दिन पर भी उन्होंने सुनिश्चित किया कि सिल्वर मेडल कहीं नहीं जाए। इसके अलावा भारत के लिए एक और खुशखबरी यह रही कि यशवीर को कांस्य पदक मिला।

तोक्यो ओलंपिक चैम्पियन 28 वर्ष के नीरज ने दूसरे प्रयास में इस सत्र का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 85 . 83 मीटर थ्रो फेंका जो दूसरे स्थान पर रहने के लिये काफी था।वह 19 जून को दोहा डायमंड लीग में 85.69 मीटर के थ्रो के साथ चौथे स्थान पर रहे थे।राष्ट्रमंडल खेलों में पहली बार उतरे 24 बरस के यशवीर ने छठे और आखिरी प्रयास में 85.41 मीटर थ्रो फेंककर सभी को चौंका दिया।

इससे पहले उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 83 . 72 मीटर था। वह पांचवें दौर के बाद 81.33 मीटर के सर्वश्रेष्ठ प्रयास से सातवें स्थान पर थे लेकिन उनका आखिरी प्रयास जबर्दस्त रहा।

श्रीलंका के स्टार रूमेश थरंगा पथिरागे ने अपेक्षा के अनुरूप 89.75 मीटर फेंककर स्वर्ण पदक जीता।बेहद सर्दी और तेज हवाओं के प्रदर्शन उनका यह प्रदर्शन शानदार रहा । उन्होंने जून में रोम डायमंड लीग में 92.62 मीटर का थ्रो फेंका था।

चोपड़ा पिछले साल सितंबर से पीठ के निचले हिस्से में लगी चोट से उबरकर लौटे थे। इस चोट के कारण उनकी वापसी दोहा में आयोजित डायमंड लीग तक टल गई थी। वह दूसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों में भाग ले रहे थे। इससे पहले उन्होंने 2018 में गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।उन्होंने संकेत दिया कि वह अभी भी पूरी तरह से फिट नहीं हैं, लेकिन धीरे-धीरे उस ओर बढ़ रहे हैं।

प्रतियोगिता में भाग लेने वाले तीसरे भारतीय खिलाड़ी रोहित यादव 81.56 मीटर के सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ सातवें स्थान पर रहे। दिलचस्प बात यह है कि भाला फेंक में पुरुषों के सभी पदक भारतीय उपमहाद्वीप के एथलीटों ने जीते।पाकिस्तान के गत चैम्पियन और मौजूदा ओलंपिक विजेता अरशद नदीम 77.41 के सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ तीन दौर के बाद बाहर हो गए । त्रिनिदाद और टोबैगो के मौजूदा विश्व चैम्पियन केशोर्न वालकॉट छठे स्थान पर रहे।

मेरे पापा मुझे बहुत सपोर्ट करते थे… गोल्ड जीतकर फूट-फूटकर रोईं अस्मिता डे और ऐसी इमोशनल बात कही कि आंखें हो जाएंगी नम

जुडोका अस्मिता डे कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने की खबर सबसे पहले उसी इंसान को बताना चाहती थीं, जिसे वे अब कभी नहीं बता सकती थीं। उनके पिता, जो साइकिल ठीक करके महीने में मुश्किल से 300 रुपये कमाते थे और त्रिपुरा के एक छोटे से गाँव में मिट्टी के घर में परिवार का गुजारा करते थे, सात महीने पहले ब्रेन स्ट्रोक से गुजर गए थे।

शुक्रवार को, जब 23 साल की अस्मिता महिलाओं के 48kg कैटेगरी में कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय जुडोका बनीं, तो उन्हें लगा कि यह मेडल जितना उनका है, उतना ही उनके पिता का भी है। अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद आंसू रोकते हुए अस्मिता ने कहा, “जब मेरे पिता गुजर गए, तो मुझे लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है क्योंकि वही मेरा साथ देते थे।”

कुछ पल के लिए, जश्न के बीच उन पिता की यादें ताजा हो गईं जिन्होंने उनके सपने को तब से संजोया था जब वह भारत का सपना भी नहीं बना था। उन्होंने कहा, “मैं त्रिपुरा के एक बहुत छोटे से गांव से हूं। वहां लोग इतने बड़े सपने नहीं देखते। लेकिन पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया।”

पैसे की हमेशा तंगी रहती थी। उनके पिता गुजारे के लिए साइकिल ठीक करते थे और दिन में लगभग 300 रुपये कमाते थे, जिससे बस घर का खर्च चल पाता था। परिवार एक साधारण से मिट्टी के घर में रहता था, लेकिन उन्होंने कभी भी आर्थिक तंगी को अपनी बेटी के पसंदीदा खेल में रुकावट नहीं बनने दिया।

जब घुटने की चोट से उनका करियर खतरे में पड़ गया, तो पिता उन्हें इलाज के लिए दिल्ली ले गए, दवाइयां खरीदीं और अपनी क्षमता के अनुसार हर संभव कोशिश की ताकि वे दोबारा मैट पर लौट सकें। उन्होंने याद करते हुए कहा- वह मुझे इलाज के लिए दिल्ली लाए और दवाइयां खरीदीं।

पिछले साल दिसंबर में उनकी अचानक मौत से अस्मिता बुरी तरह टूट गई थीं। जो इंसान उनका सबसे बड़ा सपोर्टर और हमेशा हिम्मत बंधाने वाला था, वह अब नहीं रहा था और उन्हें लगा कि उनके साथ ही सबसे बड़े मंच पर मुकाबला करने का उनका सपना भी खत्म हो गया।

लेकिन जब अस्मिता इस दुख से उबरने की कोशिश कर रही थीं, तब उनकी मां ने चुपचाप अपने पति की जगह ले ली। अंतिम संस्कार के सिर्फ 10 दिन बाद ही उन्होंने अपनी बेटी से ट्रेनिंग पर लौटने के लिए कहा। उन्होंने अस्मिता से कहा, “अगर मैं तुम्हें आज रोकती हूं, तो तुम्हारे पिता को लगेगा कि मैं तुम्हारे सपने तोड़ रही हूं।”

अस्मिता ने अपना सामान बांधा और भोपाल में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया सेंटर लौट गईं। कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले वह बहुत घबराई हुई थीं और कई रातें सो नहीं पाई थीं। उन्होंने बताया कि मैंने इसके लिए बहुत मेहनत की है। इस मेडल से पहले, मैं भारत में सो नहीं पाती थी। मैं मुकाबलों के बारे में सोचकर जागती रहती थी। भले ही मेरा शरीर थका होता था, फिर भी मुझे नींद नहीं आती थी। मैं बेचैन महसूस करती थी और फिर सुबह 5:30 बजे ट्रेनिंग के लिए उठ जाती थी।” ग्लासगो पहुंचने के बाद भी घबराहट बनी रही।

“जब मैं यहां पहुंची, तो मुझे बहुत घबराहट हो रही थी कि क्या होगा। मैं बस यही सोचती रहती थी कि मुझे सबको हराना है और जीतना है।” यह पक्का इरादा ट्रेनिंग हॉल से आगे भी बना रहा। छोटी-छोटी खुशियां भी उस लक्ष्य की याद दिलाती थीं जिसे वह हासिल करना चाहती थीं।

उनके भाई की लाई हुई उनकी पसंदीदा मिठाई, ‘लौंग लत्ता’, घर पर फ्रिज में वैसी ही रखी रही। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं उसे फ्रिज में देखती थी और कई बार तो उसे खाने ही वाली थी, लेकिन फिर खुद को रोक लेती थी।” शुक्रवार को, हर त्याग का फल मिल गया। गोल्ड मेडल ने भारतीय जूडो के रिकॉर्ड बुक में नया इतिहास रच दिया।

मलेशिया को मात देकर भारत की पुरुष और महिला टीम ने जीता गोल्ड मेडल

भारत की पुरुष और महिला टेबल टेनिस टीम ने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जारी राष्ट्रमंडल खेल 2026 में मलेशिया की टीम को हराकर स्वर्ण पदक हासिल कर लिया है। भारत की महिली टीम ने मलेशिया को 3-0 से हराया वहीं भारत की पुरुष टीम ने मलेशिया को 3-2 से हराया। यह जीत एक ही दिन और एक ही प्रतिद्वंदी के खिलाफ आई इस कारण से यह जीत टीम के लिए खास है।

भारत की पुरुष टीम ने पिछली बार भी स्वर्ण पदक जीता था जबकि महिला टीम ने 12 साल बाद स्वर्ण पदक जीता है। भारतीय पुरुष टीम में मानव ठक्कर, मानुष शाह, साथियन गणानाशेकरन, हरमीत देसाई और पायस जैन शामिल थे।

भारत ने इससे पहले ग्रुप स्टेज में भी जिमबाब्वे और मलेशिया को 3-0 से हराया था। इसके बाद टीम ने श्रीलंका, वेल्स, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर और इंग्लैंड पर विजय हासिल की।

खिताबी मुकाबले में मानव ठक्कर, मानुष शाह विजेता रहे जबकि साथियन गणानाशेकरन को हार मिली।

वहीं दूसरी वरीयता प्राप्त महिला टीम ने दबदबा बनाकर छठी वरीयता प्राप्त मलेशिया को  3-0 से हराकर खिताब पाया। भारत की महिला टीम में सिंड्रेला दास, श्रीजा अकुला, यशस्वी घोरपड़े, सुतीर्था मुखर्जी और स्वस्तिका घोष शामिल थीं।

पुरषों की भांति इस टूर्नामेंट में महिला टीम भी बिना कोई मैच हारे खिताब जीती। महिला टीम ने मालदीव, दक्षिण अफ्रीका, उत्तरी आयरलैंड, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के खिलाफ बिना कोई सेट गंवाए 3-0 से जीत दर्ज की। वहीं सेमीफाइनल में इंग्लैंड को 3-1 से हराया।

Sawan Bhadon: सांवली सलोनी रेखा के संग काम करने को तैयार नहीं थे नवीन निश्चल, फिर शूटिंग के समय अफेयर के उड़े रूमर्स

Sawan Bhadon: फिल्म इंडस्ट्री में रेखा की शुरुआत मुश्किलों से भरी रही है। साउथ सिनेमा में बतौर बाल कलाकार काम शुरू करने के बाद वे 70 के दशक में हिंदी सिनेमा की तरफ आईं। आईकॉनिक रेखा ने बॉलीवुड डेब्यू ‘सावन भादों’ से किया। 2 सितंबर 1970 को रिलीज हुई इस फिल्म के लिए साउथ इंडियन रेखा ने हिंदी भाषा सीखी थी। मूवी के लीड हीरो नवीन निश्चल भी इस फिल्म से फिल्मी दुनिया में कदम रख रहे थे। इसके अलावा अभिनेता रंजीत ने भी इसी फिल्म से अभिनय की दुनिया में कदम रखा था।

रेखा के साथ काम नहीं करना चाहते थे नवीन

फिल्म ‘सावन भादों’ ने दर्शकों का दिल जीत लिया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नवीन निश्चल फिल्म ‘सावन भादों’ में रेखा के साथ काम करना नहीं चाहते थे। उनके मुताबिक एक्ट्रेस ‘काली’ और ‘मोटी’ थीं। हालांकि, बाद में इस फिल्म की शूटिंग करते हुए दोनों के अफेयर के खूब चर्चे हुआ करते थे। पुलिस ऑफिसर के रोल में ज्यादातर नजर आने वाले अभिनेता इफ्तेखार नेगेटिव रोल में दिखाई दिए थे।

मोहन सहगल ने नवीन को किया था लॉन्च

फिल्म ‘सावन भादों’ का डायरेक्शन मोहन सहगल ने किया था। इस मूवी में नवीन निश्चल की कास्टिंग बेहद अनोखे तरीके से हुई थी। अपने कॉलेज के दिनों में नवीन निश्चल का परफॉमेंस काफी बुरा चल रहा होता था। नवीन के पिता के साथ मोहन सहगल उनके कॉलेज पहुंचे थे। उस दौरान एक्टर के पिता ने मोहन सहगल से अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर की थी और मदद करने को कहा था। मोहन सहगल ने नवीन को पूना फिल्म इंस्टीट्यूट भेजा और उनकी फीस भरी। नवीन निश्चल पूना फिल्म इंस्टीट्यूट के गोल्ड मेडलिस्ट बने। नवीन जब लौटे तो ‘सावन भादो’ से उन्हें बॉलीवुड में लॉन्च किया गया।

फिल्म के लिए रेखा ने हिंदी पर बनाई पकड़

रेखा की शुरुआत हिंदी फिल्मों में साल 1969 में ‘अंजाना सफर’ से होने वाली थी, लेकिन यह फिल्म कुछ सीन्स की वजह से सेंसर बोर्ड में फंसी रही। पूरे एक दशक बाद ‘दो शिकारी’ टाइटल से इसे 1979 में रिलीज किया गया था। ‘सावन भादों’ में रेखा ने गांव की एक लड़की चंदा का रोल किया था। नवीन निश्चल के किरदार विक्रम का दिल चंदा पर फिदा हो जाता है। इस फिल्म के बाद रेखा ने हिंदी सिनेमा में अलग मुकाम हालिस किया और एक से बढ़कर एक हिट फिल्में दीं।

गोल्ड मेडल जीतकर शर्मिला धनकड़ ने रचा इतिहास, इस खिलाड़ी को मिला ब्रोंज (Video)

ग्लास्गो में चल रहे Commonwealth games 2026 में भारत की शर्मिला धनकड़ ने इतिहास रचते हुए लंबे समय से चला आ रहा भारत का पदक का सूखा खत्म करते हुए पैरा शूटपूट में स्वर्ण पदक जीत लिया।40 वर्षीय शर्मिला ने 9.81 मीटर का सत्र का सर्वश्रेष्ठ थ्रो लगाकर स्वर्ण पदक जीता और राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के पैरा एथलेटिक्स पदक के 20 साल के इंतजार को खत्म किया।

इस स्पर्धा में एक और भारतीय खिलाड़ी शिल्पा शायला को विवाद के बाद कांस्य पदक प्रदान किया गया। शिल्पा ने 7.26 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया था।शुरुआत में नाइजीरिया की यूचेरिया इयियाजी कांस्य पदक की स्थिति में थीं, लेकिन भारतीय दल की आपत्ति और आधिकारिक समीक्षा के बाद उनके एकमात्र वैध प्रयास को फाउल करार दिया गया। इसके बाद चौथे स्थान पर रहीं शिल्पा शायला को कांस्य पदक मिल गया।

नाइजीरिया की ओर से हालांकि इस फैसले के खिलाफ आपत्ति दर्ज किए जाने की संभावना है।पदक में बदलाव की घोषणा के बाद भावुक शिल्पा ने शर्मिला के साथ जश्न मनाया। इस तरह भारत ने इस स्पर्धा में दो पदक हासिल किए।एफ57 वर्ग उन खिलाड़ियों के लिए होता है जिनके निचले अंगों में अक्षमता, अंगों की कमी या मांसपेशियों की ताकत में कमी होती है।

Sharmila Dhankhar: पोलियो, गरीबी और दहेज प्रताड़ना से लड़ी…अब देश के लिए जीता ऐतिहासिक गोल्ड, जानिए शर्मिला धनखड़ की प्रेरक कहानी

CWG 2026: शर्मिला धनखड़ ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिलाओं के शॉट पुट F57 इवेंट में सोमवार (27 जुलाई) को भारत को पैरा एथलेटिक्स का पहला गोल्ड मेडल दिलाया। 40 साल की शर्मिला ने 9.81 मीटर के अपने सीजन के बेस्ट थ्रो के साथ गोल्ड मेडल जीता। इसी के साथ उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा-एथलेटिक्स मेडल के लिए भारत के 20 साल के इंतजार को खत्म किया। इसी इवेंट में एक विवाद के बाद एक और भारतीय एथलीट शिल्पा शायला को ब्रॉन्ज मेडल दिया गया। शिल्पा ने 7.26 मीटर का अपना पर्सनल बेस्ट थ्रो किया था।

शुरुआत में नाइजीरिया की यूचेरिया इयियाजी ब्रॉन्ज मेडल की स्थिति में थीं। लेकिन भारतीय दल की आपत्ति और आधिकारिक समीक्षा के बाद उनके एकमात्र वैध प्रयास को फाउल करार दिया गया। नतीजतन, चौथे स्थान पर रहीं शिल्पा शैला को ब्रॉन्ज मेडल दिया गया। हालांकि, नाइजीरिया के इस फैसले के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराने की संभावना है।

मेडल स्टैंडिंग में बदलाव की घोषणा के बाद भावुक शिल्पा ने शर्मिला के साथ जश्न मनाया। इस तरह, भारत ने इस इवेंट में दो मेडल जीते। F57 कैटेगरी उन एथलीटों के लिए है जिनके निचले अंगों में अक्षमता, अंगों की कमी या मांसपेशियों की ताकत कम होती है। यह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में भारत का पहला पैरा एथलेटिक्स गोल्ड मेडल है।

2 साल की उम्र में पोलियो ने बदल दी जिंदगी

शर्मिला धनखड़ का जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता छोटे किसान थे। जबकि उनकी मां नेत्रहीन थीं। आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने किसी तरह जीवनयापन किया। महज दो साल की उम्र में शर्मिला पोलियो की शिकार हो गईं। गांव में समय पर इलाज न मिलने के कारण उनका बायां पैर हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

कम उम्र में शादी, दहेज प्रताड़ना और टूटा परिवार

शर्मिला की जिंदगी की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। कम उम्र में उनकी शादी कर दी गई। लेकिन ससुराल में उन्हें दहेज की मांग को लेकर कथित तौर पर सालों तक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। आखिरकार, करीब 25 साल की उम्र में उन्हें अपनी दो बेटियों के साथ ससुराल छोड़कर मायके लौटना पड़ा। बाद में उनकी शादी अजीत सिंह से हुई। परिवार के सहयोग और पति के समर्थन ने उनकी जिंदगी को नई दिशा दी। इसी दौरान उन्होंने खेलों में करियर बनाने का फैसला किया।

34 साल की उम्र में शुरू किया खेल करियर

जहां अधिकांश खिलाड़ी बचपन से ट्रेनिंग शुरू कर देते हैं। वहीं शर्मिला ने 34 वर्ष की उम्र में पैरा एथलेटिक्स में कदम रखा। उन्होंने F57 वर्ग में शॉट पुट और डिस्कस थ्रो में प्रतिस्पर्धा शुरू की और बहुत कम समय में देश की शीर्ष पैरा एथलीटों में अपनी अलग पहचान बना ली। साल 2021 की पैरा नेशनल चैंपियनशिप में उन्होंने अपने पहले ही टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक जीतते हुए 7.40 मीटर के थ्रो के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।

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अब तक के प्रदर्शन पर एक नजर

  • 2025 इंडियन ओपन पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (बेंगलुरु) में 9.77 मीटर के थ्रो के साथ गोल्ड मेडल जीता।
  • 2026 फज्जा इंटरनेशनल पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (दुबई) में शॉट पुट में गोल्ड और डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया।
  • 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स (बर्मिंघम) में वह पदक से मामूली अंतर से चूक गईं। लेकिन 8.43 मीटर के थ्रो के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया।
  • 2023 एशियन पैरा गेम्स (हांगझोउ) में चौथे स्थान पर रहीं।

मां करती थीं खेतों में मजदूरी और पिता ट्रक ड्राइवर, खुद भी की दिहाड़ी और फिर राष्ट्रमंडल में जीत गए सिल्वर! ऋषिकांत की गजब कहानी

मणिपुर के इंफाल पश्चिम जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रमंडल खेलों के मंच तक का सफर तय करने वाले वेटलिफ्टर चनांबम ऋषिकांत सिंह की कहानी अदम्य साहस, कड़ी मेहनत और पारिवारिक त्याग की मिसाल है। राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीतने वाले 28 वर्षीय ऋषिकांत ने एक समय तक जेब खर्च के लिए खेतों और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर दिहाड़ी मजदूर के रूप में भी काम किया था। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक ऋषिकांत के बड़े भाई अमरजीत ने उनके इस प्रेरणादायक सफर और कठिनाइयों की पूरी कहानी साझा की है।

गरीबी में बीता बचपन, 200 रुपये दिहाड़ी पर काम करती थीं मां

फाल से लगभग 15-20 किलोमीटर दूर स्थित नगैरांगबाम गांव के रहने वाले ऋषिकांत के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। नकी मां चंद्रजिनी देवी पास के खेतों में मजदूरी करती थीं। खेती के सीजन में उन्हें रोजाना 200 से 300 रुपये मिलते थे और बाकी समय में वह दूसरे छोटे-मोटे काम करती थीं। उनके पिता चनामबम इराभोट सिंह बस और ट्रक ड्राइवर थे। परिवार के पास खेती के लिए अपनी एक टुकड़ा जमीन भी नहीं थी और छह लोगों के परिवार का गुजारा रोजमर्रा की कमाई पर ही टिका था।

जेब खर्च के लिए खुद भी की मजदूरी

भाई के मुताबिक ऋषिकांत को करीब 2008 या 2009 में कक्षा 6 में खूमन लंपक स्थित नेशनल स्पोर्ट्स एकेडमी में प्रवेश मिल गया। यह एक आवासीय अकादमी थी, जहां पढ़ाई और खेल प्रशिक्षण मुफ्त था। इसके बावजूद ऋषिकांत को जेब खर्च की जरूरत तो थी ही। पर इसके लिए भी ऋषिकांत ने अपनी मां पर कभी कोई बोझ नहीं डाला। जब भी वे गर्मी या सर्दी की छुट्टियों में घर आते थे, तो अपनी मां के साथ खेतों में मजदूरी करते थे और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर भी काम करते थे। इन मुश्किलों ने उन्हें मानसिक रूप से और अधिक मजबूत बनाया।

बॉक्सर बनने का था सपना, लेकिन किस्मत में लिखा था वेटलिफ्टिंग

ऋषिकांत की पहली पसंद मुक्केबाजी थी। वे डिंको सिंह, मैरी कॉम और सरिता देवी जैसे मणिपुर के खेल दिग्गजों से प्रभावित थे। जब नेशनल स्पोर्ट्स एकेडमी में दाखिले का ट्रायल हुआ तो उनका चयन वेटलिफ्टिंग के लिए हो गया। शुरुआत में उन्होंने बॉक्सिंग चुनने की काफी जिद की और उनके बड़े भाई ने अधिकारियों से गुहार भी लगाई। लेकिन नियम के मुताबिक खेल बदलना संभव नहीं था। इसके बाद उन्होंने वेटलिफ्टिंग को अपनाया और धीरे-धीरे उन्हें इस खेल से प्यार हो गया। लगभग पांच साल पहले उन्होंने अपने भाई से वादा किया था कि वे राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले मणिपुर के पहले पुरुष वेटलिफ्टर बनेंगे।

राष्ट्रमंडल खेलों में रचा इतिहास

रविवार को ऋषिकांत ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में 264 किलो (स्नैच में 121 किलो और क्लीन एंड जर्क में 143 किलो) वजन उठाकर सिल्वर मेडल जीत लिया। घुटने की चोट की वजह से वो गोल्ड मेडल जीतने से चूक गए लेकिन इसके बावजूद वे राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले मणिपुर के पहले पुरुष वेटलिफ्टर बन गए। मणिपुर ने देश को मीराबाई चानू और कुंजारानी देवी जैसी महिला वेटलिफ्टर दी हैं लेकिन पुरुषों के वर्ग में यह उपलब्धि हासिल कर ऋषिकांत ने इतिहास रच दिया।

टीवी पर पहली बार माता-पिता ने देखा लाइव प्रदर्शन

अभी भारतीय नौसेना में काम कर रहे और गुजरात में तैनात ऋषिकांत चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर हैं। उनके बड़े भाई अमरजीत भारतीय वायुसेना में बाड़मेर (राजस्थान) में एयरमैन के पद पर तैनात हैं, जबकि उनकी दो बहनें शादीशुदा हैं। ऋषिकांत के माता-पिता फिलहाल राजस्थान में अमरजीत के साथ हैं, जहां उनके पिता का इलाज चल रहा है। उनके माता-पिता ने पहली बार टीवी पर ऋषिकांत को लाइव खेलते और राष्ट्रमंडल खेलों में मेडल जीतते देखा। अमरजीत के मुताबिक गांव वाले घर में ऋषिकांत का कमरा जूनियर और सीनियर स्तर पर जीती गई मेडल से भरा पड़ा है। ये सब उनकी मां के त्याग का परिणाम है।

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लगातार दूसरे Commonwealth मेडल की तलाश में श्रीशंकर पहुंचे ऊंची कूद के फाइनल में

नीरज चोपड़ा 31 जुलाई को राष्ट्रमंडल खेलों में शिरकत करेंगे लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि ट्रैक एंड फील्ड यानि कि एथलेटिक्स में भारत को पहले ही अपना पहला पदक मिल जाए। ऊंची कूद में श्रीशंकर ने अपने पहले ही प्रयास में 8.01 मीटर का क्वालिफिकेशन मार्क को पार कर लिया है।  इस स्पर्धा का फाइनल 29 जुलाई देर रात 11.54 बजे खेला जाएगा।

गौरतलब है कि श्रीशंकर ही वह एथलीट है जिन्होंने पिछले संस्करण में 44 साल बाद इस स्पर्धा में भारत को मेडल दिलाया था। उनसे पहले 1978 में सुरेश बाबू ने कांस्य पदक जीता था।वह बाबू, अंजू बॉबी जॉर्ज (2002 में मैनचेस्टर खेलों में कांस्य), और एमए प्रजुषा (2010 में नयी दिल्ली खेलों में रजत) के बाद इन खेलों में लंबी कूद में पदक जीतने वाले चौथे भारतीय खिलाड़ी हैं।

पिछली बार वह मामूली अंतर से गोल्ड मेडल चूक गए थे और उनको सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा था। लंबे कद के इस एथलीट के लिए पदक जीतना आसान नहीं रहा था क्योंकि तीसरे प्रयास में बाद 7.84 मीटर कूद लगाकर छठे स्थान पर खिसक गए थे। इसके बाद उन्होंने अच्छी वापसी की और चौथे प्रयास में 8.08 मीटर कूद लगाई जिससे वह ऐतिहासिक रजत पदक हासिल करने में सफल रहे थे।

श्रीशंकर ने कहा, ‘‘हर एथलीट इस दौर से गुज़रा है। (वर्तमान ओलंपिक चैंपियन) मिल्टियाडिस टेंटोग्लू ने यूनान में मुझसे कहा कि वह भी कई बार छठे और सातवें स्थान पर आए हैं और फिर उन्होंने तोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता। यह कदम दर कदम आगे बढ़ने की प्रक्रिया है।’’

ISSF World Cup में मनु भाकर से भी बेहतर निकली भारतीय निशानेबाज, जीता गोल्ड मेडल

ISSF World Cup (राइफल/पिस्तौल/शॉटगन) में महिलाओं की 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा में मनु भाकर स्वर्ण पदक जीतने से महरूम रह गई और उन्हें ओलंपिक की तरह ही कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। हालांकि भारत के लिए अच्छी बात यह रही कि इस ही प्रतियोगिता में भारतीय निशानेबाज ईशा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता।

21 वर्षीय ईशा ने फाइनल में शानदार प्रदर्शन करते हुए 40 अंक बनाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया, जबकि पेरिस 2024 ओलंपिक में दो कांस्य पदक जीतने वाली मनु ने शूट-ऑफ जीतकर कांस्य पदक हासिल किया। उन्होंने कुल 28 अंक बनाए।

भारतीय खिलाड़ियों ने क्वालीफाइंग दौर से ही अच्छी शुरुआत की। मनु ने 586 अंक बनाकर क्वालीफाइंग में पहला स्थान हासिल किया जबकि ईशा 585 अंक लेकर दूसरे स्थान पर रही। इस तरह से इन दोनों ने आठ निशानेबाजों के फाइनल में आसानी से जगह बनाई।

एशियाई खेलों की पूर्व स्वर्ण पदक विजेता राही सरनोबत ने 582 का स्कोर बनाया, जबकि सिमरनप्रीत कौर बराड़ (576) और अभिदन्या अशोक पाटिल (573) ने केवल रैंकिंग अंकों के लिए (RPO) खेलते हुए अच्छा प्रदर्शन किया।

ईशा ने इस सत्र के शुरू में म्यूनिख विश्व कप के फाइनल में 43 अंक बनाकर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था। इस तरह से उन्होंने अपनी निरंतरता बनाए रखी है जो आगामी प्रतियोगिताओं की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

जीत को बाद ईशा और मनु ने यह कहा

इस सत्र के शुरू में म्यूनिख विश्व कप में स्वर्ण पदक जीतने वाली ईशा ने कहा, ‘‘पिछली जीत के कारण मुझ पर काफी दबाव था। जब आप अपनी स्पर्धा में अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो आपसे काफी उम्मीद की जाती है। मुझे खुशी है कि आज मैं इस दबाव को झेलने में सफल रही।’’

दूसरी तरफ मनु ने कहा कि इस पदक से उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा।उन्होंने कहा, ‘‘मेरे लिए यह पदक बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस तरह की सफलता सीढ़ी का काम करती है। इससे मुझे यह पता चलता है कि मैं किस दिशा में आगे बढ़ रही हूं। इस पदक से निश्चित रूप से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है और इसका मुझे विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में फायदा मिलेगा।’’