RBI Policy : RBI ने वित्त वर्ष 2027 के GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% किया, दूसरी और तीसरी तिमाही के अनुमान भी बढ़े

RBI Policy : RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने 7 अक्टूबर को घोषणा की कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने वित्त वर्ष 2027 के लिए अपनी वास्तविक GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, दूसरी और तीसरी तिमाही के ग्रोथ अनुमान भी बढ़ाए गए हैं। सेंट्रल बैंक ने Q2FY27 के ग्रोथ का अनुमान 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत और Q3FY27 के ग्रोथ अनुमान 6.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया है। उसने Q4FY27 के ग्रोथ अनुमान को 6.8 प्रतिशत पर ही बनाए रखा गया है। हालांकि, Q1FY28 के लिए RBI ने ग्रोथ का अनुमान 7.3 प्रतिशत से घटाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है।

मार्च 2027 में खत्म होने वाले फाइनेंशियल ईयर के लिए पूरे साल का नया अनुमान, पहले के अनुमान से 0.4 प्रतिशत ज़्यादा है। संजय मल्होत्रा ​​ने कहा कि घरेलू आर्थिक ग्रोथ मजबूत स्तर पर है और मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी को उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी रहेगी। गवर्नर ने कहा कि पहली तिमाही में ग्रोथ की वजह प्राइवेट खपत रही। लोगों की खर्च करने की इच्छा (डिस्क्रीशनरी स्पेंडिंग) से लगातार मिल रहे सपोर्ट के कारण खपत का स्तर काफी हद तक मजबूत बना रहा।

उन्होंने आगे कहा कि हाई-फ़्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स से पता चलता है कि दूसरी तिमाही में भी आर्थिक गतिविधि की रफ़्तार बनी रही, हालांकि पहली तिमाही की तुलना में इसमें थोड़ी कमी आई। उन्होंने कहा कि लागत के दबाव के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां बनी रहीं।

भारत की विकास दर के अनुमान में ऐसे समय में बढ़ोतरी हुई है जब ग्लोबल इकोनॉमी कमजोर है। मल्होत्रा ​​ने कहा कि पिछले साल की तुलना में इस साल वैश्विक विकास दर धीमी रहने का अनुमान है।

उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के फिर से बढ़ने से ग्लोबल इकोनॉमिक सेंटीमेंट खराब हो गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में अस्थिरता बढ़ा दी है। ट्रेड को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण ग्लोबल सेंटीमेंट में घबराहट बनी हुई है और युद्ध तथा सख्त नीतियों से ग्लोबल इकोनॉमी के लिए जोखिम पैदा हो रहे हैं।

बता दें कि आज MPC ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत से 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया और अपने पॉलिसी रुख को ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया। चार सदस्यों ने इस बदलाव का समर्थन किया, जबकि दो ने इसका विरोध किया।

इस पर संजय मल्होत्रा ​​ने कहा कि महंगाई का आउटलुक पिछले साल के मुकाबले कम अनुकूल है। इसी लिए कमिटी ने पॉलिसी रेट में बदलाव करना ज़रूरी समझा। RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए कोर महंगाई दर 4.4 प्रतिशत और वित्त वर्ष की बाकी तीन तिमाहियों में कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (खुदरा महंगाई दर) औसतन 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।

 

 

RBI MPC Meeting Live: RBI ने 0.25% बढ़ाया रेपो रेट: महंगे होंगे लोन और बढ़ेगी EMI, लेकिन मजबूत FDI और FD ब्याज दरों से मिलेगी राहत

RBI MPC Meeting: फरवरी 2023 के बाद पहली बार बढ़ सकता है रेपो रेट, महंगाई बनी बड़ी वजह

RBI MPC Meeting: RBI की 21 लगातार MPC बैठकों में ब्याज दर नहीं बढ़ी है। अब 7 अक्टूबर की बैठक में तस्वीर बदल सकती है। माना जा रहा है कि RBI रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर सकता है। ऐसा हुआ तो रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हो जाएगा।

फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार होगा, जब RBI रेपो रेट बढ़ाएगा। हालांकि, बाजार में इसकी उम्मीद पहले से बनी हुई है। इसलिए असली नजर इस बात पर होगी कि RBI आगे कितनी बढ़ोतरी के संकेत देता है।

आगे कितनी बढ़ सकती हैं दरें?

Moneycontrol के 19 एक्सपर्ट्स के पोल में 15 ने 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया है। वहीं, चार एक्सपर्ट्स को दरों में कोई बदलाव की उम्मीद है।

IDFC First Bank की चीफ इकोनॉमिस्ट गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, फरवरी तक रेपो रेट में कुल करीब 75 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में पहली बढ़ोतरी के बाद RBI का अगला इशारा बाजार के लिए ज्यादा अहम होगा।

महंगाई बढ़ने की चिंता

महंगाई RBI के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है। पिछली समीक्षा में केंद्रीय बैंक ने FY27 के लिए CPI महंगाई का अनुमान 5% रखा था।

अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% हो गई। जुलाई में यह 4.45% थी। अब कच्चे तेल और दूसरी कमोडिटी की बढ़ती कीमतों से महंगाई पर और दबाव आ सकता है।

GDP ग्रोथ मजबूत, लेकिन आगे चुनौती

भारतीय अर्थव्यवस्था ने पहली तिमाही में 7.8% की मजबूत ग्रोथ दर्ज की है। इससे RBI को महंगाई पर फोकस करने की थोड़ी गुंजाइश मिलती है।

अधिकांश एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि RBI FY27 के लिए 6.7% GDP ग्रोथ का अनुमान बरकरार रखेगा। हालांकि, महंगा कच्चा तेल और दुनिया में बढ़ती ब्याज दरें दूसरी छमाही में परेशानी बढ़ा सकती हैं।

बैंकिंग सिस्टम में ज्यादा पैसा

बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त पैसा भी RBI के लिए बड़ा मुद्दा है। सितंबर में लिक्विडिटी सरप्लस करीब 12 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।

अब यह घटकर करीब 4-6 लाख करोड़ रुपये रह गया है। 6 अक्टूबर को बैंकिंग सिस्टम में करीब 5.03 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त लिक्विडिटी थी। RBI इसे कम करने के लिए OMO बिक्री और VRRR जैसे कदम उठा रहा है।

कच्चा तेल और रुपया भी चिंता

RBI के सामने बाहरी मोर्चे पर भी मुश्किलें बढ़ी हैं। ब्रेंट क्रूड हाल में करीब 107 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। अमेरिकी 10 साल की बॉन्ड यील्ड भी 5.2% तक चली गई। रुपया 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया है। वहीं, भारत की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड 7.2% के ऊपर पहुंच गई है।

यानी इस बार बाजार सिर्फ 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी नहीं देखेगा। असली सवाल यह होगा कि RBI आगे कितनी दरें बढ़ा सकता है और महंगाई, ग्रोथ और रुपये के बीच संतुलन कैसे बनाएगा।

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RBI MPC Meeting Live: आज होगा रेपो रेट पर बड़ा ऐलान! जानिए होम लोन EMI, FD और आपकी जेब पर क्या पड़ेगा असर

RBI Monetary Policy Committee Live Updates: देश के करोड़ों आम लोगों, होम लोन ग्राहकों और निवेशकों की निगाहें आज, 7 अक्टूबर सुबह 10 बजे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर के ऐलान पर टिकी हुई है। महंगाई के बढ़ते दबाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपये के बीच आज केंद्रीय बैंक अपनी नई मौद्रिक नीति का ऐलान करने जा रहा है।

वैसे बाजार के अधिकांश विशेषज्ञों और रॉयटर्स के पोल में शामिल 60% से अधिक इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि आज रिजर्व बैंक रेपो रेट में 0.25% (25 बेसिस पॉइंट) की बढ़ोतरी कर सकता है। अगर ऐसा होता है, तो रेपो रेट वर्तमान 5.25% से बढ़कर 5.50% हो जाएगी।

होम लोन EMI पर कितना पड़ेगा असर?

अगर आज आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है, तो फ्लोटिंग रेट पर होम लोन लेने वाले ग्राहकों की जेब पर असर पड़ना तय है:

बढ़ेगी EMI या लोन की अवधि: रेपो रेट बढ़ते ही बैंकों की फंडिंग कॉस्ट बढ़ेगी, जिसे बैंक सीधे ग्राहकों पर डालेंगे। यदि आपका ₹50 लाख का होम लोन लंबे समय के लिए चल रहा है, तो 0.25% की बढ़ोतरी से बैंक या तो आपकी मासिक EMI बढ़ा देंगे या लोन की समयावधि को लंबा कर देंगे।

क्या करें उधारकर्ता?:  तुरंत पूरा लोन चुकाने की हड़बड़ी न करें। पहले अपने लोन की मौजूदा ब्याज दर, शेष अवधि, बैंक के स्प्रेड की जांच करें और जरूरत पड़ने पर दूसरे बैंक में बैलेंस ट्रांसफर के विकल्प पर विचार करें।

पर्सनल और कार लोन भी हो सकते हैं महंगे

होम लोन ही नहीं, बल्कि नए पर्सनल लोन, व्हीकल लोन और अन्य क्रेडिट प्रोडक्ट्स की दरें भी धीरे-धीरे बढ़ सकती हैं। चूंकि पर्सनल लोन की दरें पहले से ही ऊंची होती हैं, इसलिए इस समय नया असुरक्षित कर्ज सोच-समझकर ही लें।

फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के निवेशकों के लिए खुशखबरी

दरों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा फायदा बचत करने वालों को मिलेगा। कर्ज की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बैंक नए डिपॉजिट आकर्षित करने के लिए FD पर मिलने वाले ब्याज में बढ़ोतरी करेंगे। वैसे आपकी पहले से चल रही फिक्स्ड डिपॉजिट पर पुरानी दर ही लागू रहेगी। फायदा केवल नई FD कराने या पुरानी FD को रिन्यू करने पर ही मिलेगा।

सेविंग्स अकाउंट की ब्याज दरें

सेविंग्स अकाउंट की ब्याज दरों में तुरंत कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना कम है, क्योंकि ये दरें प्रत्येक बैंक की लिक्विडिटी और प्रतिस्पर्धात्मक नीतियों पर निर्भर करती हैं।

आरबीआई क्यों ले सकता है दरें बढ़ाने का फैसला?

महंगाई: अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% पर पहुंच गई, जो आरबीआई के 4% के लक्ष्य से लगातार तीसरे महीने ऊपर है।

कच्चा तेल और रुपया: पश्चिम एशिया में तनाव से कच्चे तेल के दाम ऊंचे हैं और रुपया कमजोर हो रहा है, जिससे आयात महंगा हो रहा है।

मजबूत GDP ग्रोथ: चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 7.8% रही है, जो आर्थिक मजबूती को दर्शाती है और आरबीआई को महंगाई पर ध्यान केंद्रित करने का मौका देती है।

RBI की नई पॉलिसी के पल पल के अपडेट के लिए जुगए रहें मनीकंट्रोल के आरबीआई मॉनेटरी पॉलिसी के नए ऐलानों के लिए बने इस स्पेशल लाइव ब्लॉग से।

Gold Price Correction: सोने की कीमत इस साल 26% गिरी, अब खरीदारी का मौका? Tata MF ने बताई पूरी रणनीति

Gold Price Correction: भारत में त्योहारी और शादी का सीजन शुरू हो चुका है। ऐसे में सोने की कीमतों पर निवेशकों की नजर है। 2026 के शिखर से सोने के भाव में करीब 26% की गिरावट आ चुकी है। Tata Asset Management का मानना है कि लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह गिरावट खरीदारी का बेहतर मौका दे सकती है।

हालांकि, Tata MF ने जल्दबाजी में निवेश करने से बचने को कहा है। फंड हाउस का मानना है कि सोने में आगे भी तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसलिए छोटी अवधि की तेजी या गिरावट देखकर फैसला लेना ठीक नहीं होगा।

2026 के शिखर से करीब 26% नीचे आया सोना

Tata MF के अक्टूबर 2026 के मार्केट आउटलुक के मुताबिक, सोना जनवरी के करीब 5,595 डॉलर प्रति औंस के शिखर से गिरकर लगभग 4,138 डॉलर पर आ गया है। यानी इसमें करीब 26% की गिरावट आई है।

फंड हाउस के मुताबिक, इस गिरावट की बड़ी वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी और मजबूत अमेरिकी डॉलर है। Tata MF का कहना है कि सोने की बुनियादी कहानी में कोई बड़ी कमजोरी नहीं आई है।

सेंट्रल बैंकों की खरीद बनी बड़ी ताकत

लंबी अवधि में सोने के पक्ष में सबसे बड़ा फैक्टर सेंट्रल बैंकों की खरीद है। Tata MF के मुताबिक, 2026 की दूसरी तिमाही में सेंट्रल बैंकों ने 289 टन सोना खरीदा।

पूरे 2026 में यह खरीद 700 से 900 टन के बीच रह सकती है। 2022 से पहले इसका सालाना औसत करीब 400-500 टन था। यानी सेंट्रल बैंकों की सोने में दिलचस्पी पहले के मुकाबले काफी बढ़ी है।

Tata MF के मुताबिक, खासकर उभरते बाजारों के सेंट्रल बैंक अपने रिजर्व में अमेरिकी डॉलर वाली संपत्तियों की हिस्सेदारी घटा रहे हैं। इसके लिए वे सोने को एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।

चीन से भी सोने को मिल रहा सहारा

चीन भी सोने की मांग का बड़ा जरिया बना हुआ है। Tata MF के मुताबिक, 2026 में चीन का गोल्ड इंपोर्ट 1,000 टन के पार पहुंच चुका है। यह 2025 में पूरे साल हुए आयात से भी ज्यादा है।

रिटेल मांग, गोल्ड ETF में निवेश और सेंट्रल बैंक की खरीद से चीन के फिजिकल गोल्ड मार्केट को सहारा मिल रहा है। मिडिल ईस्ट में तनाव और अमेरिका-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी सोने की मांग बढ़ा सकती है।

US का बढ़ता कर्ज भी सोने के पक्ष में

Tata MF ने बढ़ते अमेरिकी कर्ज और फिस्कल डेफिसिट को भी सोने के लिए लंबी अवधि का पॉजिटिव फैक्टर बताया है। US सरकार का कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है।

वहीं, फिस्कल डेफिसिट GDP के करीब 6-7% पर है। फंड हाउस के मुताबिक, कर्ज की स्थिरता और डॉलर की खरीद क्षमता को लेकर चिंता बढ़ती है तो सोना निवेशकों के लिए वैल्यू स्टोर के तौर पर और आकर्षक हो सकता है।

एक साथ पैसा लगाने के बजाय धीरे-धीरे खरीदारी

लंबी अवधि में सोने पर Tata MF का रुख सकारात्मक है। लेकिन हाल की तेजी और गिरावट को देखते हुए फंड हाउस ने सावधानी बरतने को कहा है। सोने में आगे भी तेज कंसोलिडेशन देखने को मिल सकता है।

इसलिए Tata MF एक साथ पूरी रकम लगाने के बजाय चरणबद्ध निवेश को बेहतर मानता है। यानी बाजार का निचला स्तर पकड़ने की कोशिश करने के बजाय अलग-अलग समय पर थोड़ा-थोड़ा निवेश किया जाए।

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Stock Market: ‘जीडीपी मजबूत, फिर भी क्यों टूट रहा शेयर बाजार?’ हर्ष गोयनका ने बताईं ये 7 बड़ी वजहें!

Indian Stock Market Crash Reasons: भारतीय अर्थव्यवस्था जहां एक तरफ मजबूत जीडीपी ग्रोथ और बेहतरीन फंडामेंटल्स के साथ दुनिया में चमक रही है, वहीं दूसरी ओर घरेलू शेयर बाजार में लगातार बिकवाली और गिरावट का दौर जारी है। निवेशक इस बात से हैरान हैं कि जब देश की इकोनॉमी मजबूत है, तो शेयर बाजार लाल निशान में क्यों कारोबार कर रहा है?

इस बड़े विरोधाभास पर मशहूर उद्योगपति और आरपीजी एंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भले ही हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि ग्लोबल लिक्विडिटी भारत से निकलकर दूसरे बाजारों की ओर बह रही है। गोयनका ने भारतीय शेयर बाजार में आ रही इस गिरावट के पीछे ये 7 प्रमुख कारण गिनाए हैं।

1. विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की ताबड़तोड़ बिकवाली

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशक लगातार अपना पैसा बाहर निकाल रहे हैं। एशियाई और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अन्य उभरते बाजारों में बेहतर अवसरों के कारण FIIs भारतीय इक्विटी से लगातार बिकवाली कर रहे हैं, जिससे बाजार पर भारी दबाव बन रहा है।

2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी

अमेरिका में 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड में लगातार इजाफा हो रहा है। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ता है, तो विदेशी निवेशकों के लिए बिना जोखिम के अमेरिका में ही बेहतर रिटर्न मिलने लगता है। इसी वजह से वे भारत जैसे उभरते जोखिम भरे बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करने लगते हैं।

3. क्रूड ऑयल की कीमतें $100 के पार

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुकी हैं। भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है। महंगे तेल से भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ता है और कॉर्पोरेट मार्जिन पर सीधा असर पड़ता है।

4. भारतीय रुपये में रिकॉर्ड कमजोरी

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों की फंड निकासी के कारण अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। रुपये में गिरावट के कारण विदेशी निवेशकों को अपने निवेश पर करेंसी लॉस का डर रहता है, जिससे वे बिकवाली तेज कर देते हैं।

5. इंफ्लेशन और रेट-हाइक का डर

महंगे क्रूड ऑयल और सप्लाई चेन में रुकावटों की वजह से वैश्विक और घरेलू स्तर पर महंगाई दोबारा बढ़ने की आशंका गहरा गई है। इससे केंद्रीय बैंकों (जैसे- अमेरिकी फेडरल रिजर्व और RBI) द्वारा ब्याज दरों में कटौती टलने या दोबारा दरें बढ़ाने का डर बाजार में बैठ गया है।

6. भारतीय शेयरों का वैल्यूएशन अभी भी ऊंचा

दुनिया के अन्य बाजारों की तुलना में भारतीय शेयर बाजार का वैल्यूएशन (P/E रेशियो) अब भी काफी प्रीमियम या महंगा बना हुआ है। जब बाजारों में अनिश्चितता होती है, तो निवेशक महंगे वैल्यूएशन वाले शेयरों से मुनाफा वसूलकर सस्ते बाजारों (जैसे- चीन या ब्राजील) की ओर रुख करते हैं।

7. वैश्विक स्तर पर रिस्क-ऑफ सेंटीमेंट

वैश्विक स्तर पर युद्ध के हालात, भू-राजनीतिक तनाव और बड़े आर्थिक संकटों के चलते ग्लोबल इन्वेस्टर्स जोखिम भरे संपत्तियों से दूर भाग रहे हैं। वे इक्विटी के बजाय सोना, कैश और अमेरिकी बॉन्ड जैसी सुरक्षित जगह पर अपनी पूंजी ट्रांसफर कर रहे हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Daily Voice: बाजार में अभी डिफेंसिव नजरिया बनाए रखने की जरूरत, लंबी अवधि में इंश्योरेंस सेक्टर दिखाएगा कमाल

Daily Voice : कोर महंगाई की चाल को देखते हुए 2027 की शुरुआत में फेड फंड्स रेट में एक और बढ़ोतरी संभव है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। भारत की आर्थिक विकास दर 6.5% से 7% के बीच स्थिर रहेगी। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। इंश्योरेंस सेक्टर में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना दिख रही है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन से इस सेक्टर को सपोर्ट मिलेगा। ये बातें वॉटरफ़ील्ड एडवाइज़र्स के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर और इक्विटीज़ हेड विपुल भोवर ने मनीकंट्रोल के साथ हुई एक बातचीत में कही हैं।

क्या आप US ट्रेज़री मार्केट को ग्लोबल मार्केट के लिए एक बड़ा जोखिम मानते हैं?

इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यूएस का बॉन्ड मार्केट,ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम की नींव है। इस मार्केट में होने वाले स्ट्रक्चरल बदलाव आज ग्लोबल मार्केट पर असर डालने वाले सबसे अहम मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर हैं। जब “रिस्क-फ्री” US सॉवरेन डेट से अच्छा रिटर्न मिलता है तो यह ग्लोबल एसेट एलोकेशन की रणनीतियों को पूरी तरह से बदल देता है।

ट्रेजरी यील्ड के बढ़ने से ग्लोबल इक्विटी मल्टीपल्स पर दबाव पड़ता है और दुनिया भर की कंपनियों के लिए कर्ज लेने की लागत बढ़ जाती है। इसके कारण प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकते हैं,कैपिटल एक्सपेंडिचर में रुकावट आ सकती है और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

क्या अमेरिका की वित्तीय स्थिति टिकाऊ नहीं लगती?

इस पर उन्होंने आगे कहा कि जरूरी खर्च और ब्याज पर होने वाले भारी खर्च(जो इस साल 1 ​​लाख करोड़ डॉलर से अधिक हो गए हैं) में लगातार बढ़ोतरी से एक ढांचागत असंतुलन पैदा हो रहा है। अगर बड़े नीतिगत सुधार नहीं किए गए तो कर्ज का यह बढ़ता बोझ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को घटा सकता है और भविष्य में आर्थिक मजबूती में बाधा डाल सकता है।

कांग्रेसनल बजट ऑफिस का अनुमान है कि 2026 में फ़ेडरल घाटा लगभग 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा,जो अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 6 प्रतिशत है। इसके चलते अमेरिकी जनता पर मौजूद कर्ज GDP के 100 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा।

क्या आपको उम्मीद है कि इस साल के आखिर तक US फ़ेडरल रिज़र्व दो और बार ब्याज दरें बढ़ाएगा और उसके बाद अगले साल की पहली तिमाही में एक और बढ़ोतरी करेगा?

सितंबर 2026 में चेयरमैन केविन वॉर्श की अगुवाई में फ़ेडरल रिज़र्व ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की,जिससे ये दरें 3.75 प्रतिशत से 4.00 प्रतिशत की रेंज में आ गईं। ‘डॉट प्लॉट’ से पता चला कि FOMC के 18 में से 16 सदस्यों को उम्मीद है कि इस साल कम से कम एक बार और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी होगी,हालांकि सिर्फ़ चार सदस्यों को दो और बार बढ़ोतरी की उम्मीद है।

एनर्जी की बढ़ती लागत की वजह से आई महंगाई इस सख्ती को सही ठहराती है। कोर महंगाई के ट्रेंड को देखते हुए 2027 की शुरुआत में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी हो सकती है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए,हालांकि इस साल एक और बढ़ोतरी की संभावना है,लेकिन दो और बार बढ़ोतरी होने की संभावना कम है।

क्या आपको लगता है कि भारत की विकास दर 6.5 से 7 प्रतिशत के आसपास स्टेबल हो जाएगी?

भारत की आर्थिक विकास दर के 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच स्टेबल होने की उम्मीद है। IMF ने वित्त वर्ष 2026 और 2027 के लिए 6.5 प्रतिशत GDP विकास दर का अनुमान लगाया है। महामारी के बाद के असर, सरकारी खर्च और रुकी हुई मांग की वजह से भारत में विकास दर 7.8 प्रतिशत के करीब रही है, लेकिन बेस इफ़ेक्ट के कम होने और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव व ऊंची ब्याज दरों जैसी ग्लोबल चुनौतियों के कारण इतनी ऊंची दरें शायद लंबे समय तक बनी न रह पाएं। हालांकि, 6.5 से 7 प्रतिशत की विकास दर के साथ भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

अमेरिकी डॉलर में बढ़ोतरी के अहम कारण क्या हैं?

अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज पर ज़्यादा यील्ड (रिटर्न) मुख्य रूप से महंगाई के दबाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित होती है, जो ग्लोबल इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करती हैं। इसके अलावा, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता बढ़ने से जोखिम से बचने वाले निवेशक अमेरिकी डॉलर से मिलने वाली सुरक्षा और लिक्विडिटी की ओर आकर्षित होते हैं। इसके अलावा,अमेरिकी टेक्नोलॉजी शेयरों में भारी विदेशी निवेश और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर होने वाला खर्च डॉलर की मांग को और बढ़ा रहा है। दूसरे G10 देशों की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मज़बूती, डॉलर की स्थिति को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी के तौर पर और मजबूत कर रही है।

क्या आप इक्विटी को लेकर इसलिए सतर्क हैं कि तेल की कीमतें ज़्यादा हैं और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड बढ़ रही हैं या आपकी इस सोच के पीछे कोई और भी वजह है?

तेल की ऊंची कीमतें और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बाजार के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। इसके साथ ही मिडिल ईस्ट में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव और महंगाई की चिंताएं भी हैं। ऐसे में,मौजूदा महंगे वैल्यूएशन को बनाए रखने के लिए बाजार में अभी तुरंत पॉजिटिव असर डालने वाली कोई वजह नहीं दिख रही है। ऐसे में जब तक अर्निंग्स की साफ तस्वीर नहीं दिखती या वैल्यूएशन में जरूरी टाइम करेक्शन नहीं होता,तब तक डिफेंसिव रुख अपनाना ही बेहतर है।

क्या आपको भारत में भी ब्याज दरें बढ़ाने का दौर शुरू होता दिख रहा है?

उम्मीद है कि भारत में ब्याज दरें बढ़ाने का दौर अक्टूबर 2026 में मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक से शुरू होगा। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने फरवरी 2023 से रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है, लेकिन घरेलू और ग्लोबल स्तर पर बढ़ते दबावों के कारण इसमें बदलाव की जरूरत है।

कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जाने और रुपये की कीमत घटने की वजह से खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। ग्लोबल फाइनेंशियल हालात के खराब होने के साथ,अर्थशास्त्रियों को दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे दर बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगी और सख्ती का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।

क्या आपको लगता है कि मौजूदा स्तरों पर इंश्योरेंस सेक्टर में खरीदारी का मौका है?

भारत में इंश्योरेंस मार्केट की पहुंच अभी भी काफी कम है और 2026 से 2030 के बीच सालाना प्रीमियम ग्रोथ के 6.9 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन की वजह से यह सेक्टर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना रखता है।

 

Market Next Week : मिड और स्मॉल कैप्स में लगातार चौथे हफ्ते दिखी गिरावट, जानिए अगले हफ्ते कैसी रह सकती है बाजार की चाल

 

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Nifty Outlook: सितंबर में 1600 अंक से ज्यादा टूटा निफ्टी, क्या अब 22600 का अहम लेवल बचेगा?

Nifty Outlook: सितंबर एक्सपायरी के दिन शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव रहा। Nifty50 मंगलवार को 64 अंक गिरकर 22,716 पर बंद हुआ। पूरे सितंबर में इंडेक्स 1,600 अंक से ज्यादा यानी करीब 6.5% टूट चुका है।

मंगलवार को Nifty की शुरुआत गैप-डाउन हुई। शुरुआती कारोबार में बिकवाली तेज रही और इंडेक्स काफी नीचे चला गया। हालांकि, दिन के निचले स्तर से रिकवरी आई और Nifty ने शुरुआती नुकसान का बड़ा हिस्सा कम कर लिया।

एक्सपायरी के चलते बाजार में उतार-चढ़ाव ज्यादा रहा। आखिर में Nifty 0.28% की गिरावट के साथ 22,716 पर बंद हुआ। सेक्टरों की बात करें तो IT, Realty और FMCG में गिरावट जारी रही। हालांकि, मेटल और फार्मा शेयरों में खरीदारी देखने को मिली।

200-वीक मूविंग एवरेज तक पहुंचा निफ्टी

गिरावट के साथ Nifty अपने 200-वीक मूविंग एवरेज के करीब पहुंच गया है। यह लेवल अभी करीब 22,600 है। कोविड के समय बाजार में आई बड़ी गिरावट के बाद पहली बार Nifty इस लंबे समय के टेक्निकल सपोर्ट तक पहुंचा है।

यही वजह है कि अब 30 सितंबर को 22,600 का स्तर बाजार के लिए काफी अहम माना जा रहा है। इसके आसपास इंडेक्स का अगला रुख तय हो सकता है।

मिडकैप और स्मॉलकैप में भी दबाव

बड़े शेयरों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर भी दबाव में रहे। Nifty Midcap 100 इंडेक्स 0.99% गिरा। वहीं Nifty Smallcap 100 में 0.81% की गिरावट आई।

बाजार में कमजोरी का असर अब सिर्फ बड़े शेयरों तक सीमित नहीं है। व्यापक बाजार में भी बिकवाली का दबाव दिख रहा है।

लगातार आठवें हफ्ते बाजार गिरा

हाल की गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया है। Nifty में करीब 6.8% की गिरावट दर्ज हुई है। इसके साथ ही इंडेक्स लगातार आठवें हफ्ते गिरा है।

2020 के बाद यह Nifty की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है। हालांकि, घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़े कुछ आंकड़े अभी राहत दे रहे हैं।

इकोनॉमी से मिले कुछ अच्छे संकेत

अगस्त में भारत की इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन ग्रोथ 8% रही। यह दो महीने में सबसे तेज बढ़त है। कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की मांग में भी सुधार के संकेत मिले हैं। इससे शहरी इलाकों में लोगों के खर्च में सुधार की उम्मीद बढ़ी है। GDP ग्रोथ भी बाजार के लिए एक सपोर्टिव फैक्टर बनी हुई है।

कच्चे तेल की कीमत, रुपये की चाल और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड भी महत्वपूर्ण रहेंगी। होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े घटनाक्रम पर अमेरिका की प्रतिक्रिया भी बाजार के लिए अहम होगी।

22,550 के नीचे गिरावट पर दबाव

HDFC Securities के नागराज शेट्टी के मुताबिक निफ्टी का ट्रेंड अभी कमजोर है। उनका कहना है कि 22,900 से 23,000 के बीच आने वाली तेजी ज्यादा टिक नहीं सकती। इस स्तर पर बिकवाली देखने को मिल सकती है।

उनके मुताबिक, अगर निफ्टी 22,550 के नीचे जाता है तो 22,200 तक गिरावट बढ़ सकती है।

22,570-22,550 का जोन अहम

SBI Securities के सुदीप शाह के मुताबिक 22,570 से 22,550 का जोन Nifty के लिए तत्काल सपोर्ट है। इसके नीचे गिरावट आने पर 22,400 तक दबाव बढ़ सकता है।

ऊपर की तरफ 22,900 से 22,930 का स्तर अहम रेजिस्टेंस रहेगा। अगर Nifty इस रेंज के ऊपर टिकता है तो रिकवरी 23,050 तक जा सकती है।

22,600 के ऊपर टिकना जरूरी

LKP Securities के रूपक डे के मुताबिक 22,600 के नीचे निर्णायक गिरावट आने पर बिकवाली तेज हो सकती है। वहीं, अगर Nifty इस स्तर के ऊपर बना रहता है तो रिकवरी की गुंजाइश रहेगी।

उनके मुताबिक 22,600 फिलहाल अहम सपोर्ट है। वहीं 22,800 तत्काल रेजिस्टेंस का काम कर सकता है।

Stocks to Watch: 30 सितंबर को फोकस में ये 12 स्टॉक्स, टाटा स्टील से KPI ग्रीन एनर्जी तक शामिल

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Trading Ideas: कल की भारी गिरावट के बाद आज फिर बिकवाली का तूफान, जानिए कमजोर बाजार में भी कहां हो सकती है कमाई

Stock Market Crash : कमजोर ग्लोबल संकेतों के बीच,भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स गिरावट के साथ कारोबार कर रहे हैं। सभी सेक्टर में बिकवाली के कारण निफ्टी 22600 के करीब आ गया है। फिलहाल सेंसेक्स 506 अंक या 0.70 प्रतिशत गिरकर 72,265 के आसपास और निफ्टी 146 अंक यानी 0.64 प्रतिशत गिरकर 22,634 के आसपास कारोबार कर रहा है। निफ्टी 5 महीने के निचले लेवल पर पहुंच गया है। बैंक निफ्टी ने 54000 का लेवल तोड़ दिया है। मिडकैप-स्मॉलकैप में भी प्रेशर है। महाराष्ट्र में सूखे के बाद दरें बढ़ने की आशंका के साथ-साथ US ट्रेजरी यील्ड और कच्चे तेल में उछाल ने सेंटिमेंट खराब किए हैं। इंडिया VIX 200 DEMA के ऊपर है।

अमेरिका में टैरिफ राहत से फार्मा में जोश है। डॉ रेड्डीज करीब 2 परसेंट मजबूत हुआ है। वहीं सिप्ला भी चढ़ा है। दोनों निफ्टी के टॉप गेनर्स में शामिल हैं। भारत समेत 20 देशों के लिए स्पेसियलिटी ट्रग्स, इंग्रीडिएंट्स और ड्रग कंपोनेंट पर अब जीरो टैरिफ लगेगा। फार्मा और हेल्थ केयर को छोड़कर सभी सेक्टर लाल निशान में हैं। बैंक और फाइनेंस शेयरों में भारी गिरावट आई है। IT,एनर्जी और FMCG में भी बिकवाली है।

दिग्गज रिलायंस 52 हफ्तों के निचले लेवल पर पहुंच गया है। HDFC बैंक भी 52 वीक LOW के करीब है। इसके अलावा HUL, TATA कंज्यूमर, जियो फाइनेंस, टाटा मोटर्स PV में भी कमजोरी गहराई है।

ऐसे में जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजिस्ट वी के विजयकुमार का कहना है कि ब्रेंट क्रूड के भाव $106 से ऊपर और US 10-साल के बॉन्ड यील्ड के 5.23% पर होने के कारण ग्लोबल मैक्रो हालात इक्विटी मार्केट के लिए अभी भी अच्छे नहीं हैं। US में उभरते मैक्रो हालात तेज ग्रोथ और बढ़ती महंगाई की ओर इशारा कर रहे हैं। AI पर भारी खर्च से ग्रोथ बढ़ रही है और उम्मीद से बेहतर ग्रोथ के कारण महंगाई भी ऊंची बनी रहेगी,जिससे फेड को एक और बार ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। इसके चलते US बॉन्ड यील्ड भी बढ़ रहे हैं।

चूंकि क्रूड की बढ़ी हुई कीमतें ग्राहकों पर नहीं डाली गई हैं,इसलिए FY27 में भारत पर फिस्कल दबाव बढ़ेगा। इसलिए,अगर क्रूड की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं,तो फिस्कल दबाव का असर FY27 में भारत की GDP ग्रोथ और कॉर्पोरेट अर्निंग्स ग्रोथ पर पड़ सकता है। यह चिंता भी मार्केट पर असर डाल रही है।

लार्ज-कैप ग्रोथ स्टॉक्स के आकर्षक वैल्यूएशन लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर्स के लिए खरीदारी के मौके दे रहे हैं

चॉइस ब्रोकिंग के टेक्निकल रिसर्च एनालिस्ट हितेश टेलर का कहना है कि ग्लोबल बाजार में सावधानी का माहौल है। वॉल स्ट्रीट में कमज़ोर कारोबार के बाद एशियाई बाज़ार भी ज़्यादातर सुस्त हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और US बॉन्ड यील्ड बाजार के मूड पर दबाव बना रहे हैं। निवेशक इस हफ्ते आने वाले आर्थिक डेटा और कॉर्पोरेट गतिविधियों पर नजर रखे हुए है।

आज के लिए इंडेक्स में ट्रेडिंग रणनीति

निफ्टी पर रणनीति

सीएनबीसी-आवाज़ के वीरेंद्र कुमार का कहना है कि निफ्टी के लिए पहला रेजिस्टेंस 22941-23022 पर और बड़ा रेजिस्टेंस 23117-23178-23267 पर है। इसके लिए पहला बेस 22698-22731 पर और बड़ा बेस 22610-22666 पर है। ग्लोबल हैंडओवर कमजोर है,कच्चा तेल और बॉन्ड यील्ड अभी ऊंचे स्तरों पर हैं। FIIs की कैश में जोरदार बिकवाली जारी है, नेट शॉर्ट 3.2 लाख पर हैं। आज एक्सपायरी के दिन FII का नेट शॉर्ट सबसे ऊंचे स्तर पर है। रेजिस्टेंस-1 के नीचे उछाल पर बिकवाली की रणनीति की सलाह होगी। रेजिस्टेंस-1 पार कर टिकने पर रेजिस्टेंस-2 तक तेजी की गुंजाइश है। एक्सपायरी को देखते उछाल पर बिकवाली में शुरुआती लक्ष्य बेस-1 होगा बेस-1 पर शॉर्ट को चेक करें,अगर पुट राइटर्स दिखें तो मुनाफा बांधे। अगर बेस-1 टिका तो एक्सपायरी 22750-22850 के बीच रह सकती है।

बैंक निफ्टी पर रणनीति

वीरेंद्र कुमार का कहना है कि बैंक निफ्टी के लिए पहला रेजिस्टेंस 54789-55040 पर और बड़ा रेजिस्टेंस 55289-55517 पर है। इसके लिए पहला बेस 54010-54188 पर और बड़ा बेस 53710-53881 पर है। कल बैंक निफ्टी में जोरदार गिरावट रही। अब 54000 पर पुट राइटर्स हावी हैं। 54800-55000 जोन में कॉल सेलर एक्टिव हैं। रेजिस्टेंस-1 के नीचे बिकवाली और उछाल में बिकवाली की रणनीति होगी। बेस-1 अहम है,अगर टिका तो पिछले क्लोज की ओर हल्का पुलबैक संभव है। सिर्फ 55040 के ऊपर ही शॉर्ट कवरिंग की उम्मीद है।

चकाचक चार्ट वाले शेयर

चकाचक चार्ट वाले शेयर बताने के लिए हमारे साथ जुड़े हैं Finberg Management की मधु बंसल। इनकी SPLPETRO में 865 रुपए के आसपास, 852 रुपए के स्टॉप लॉस के साथ 957 रुपए के टारगेट के लिए खरीदारी की सलाह है। वहीं,Supriya Lifescience में इनकी 984 रुपए के आसपास, 959 रुपए के स्टॉप लॉस के साथ 1078 रुपए के टारगेट के लिए खरीदारी की सलाह है।

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Commodity Market : 7 हफ्तों के निचले स्तरों पर पहुंचे सोने-चांदी के दाम, क्रूड में फिर बड़ा उछाल

Commodity Market : कारोबारी हफ्ते की शुरुआत सोने-चांदी के लिए भारी गिरावट के साथ हुई। सोने-चांदी की कीमतें 7 हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंच गईं और 3% से ज्यादा की गिरावट दर्ज हुई। MCX पर सोना 1.48 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के नीचे चला गया है। वहीं, MCX पर चांदी 2.27 लाख रुपए प्रति किलो के नीचे आ गई है। वहीं इंटरनेशनल मार्केट में सोना $4200 के नीचे है। जबकि इंटरनेशनल मार्केट में चांदी $62 के नीचे दिख रही है। इस बीच ब्रेंट क्रूड का भाव $107 के पार निकल गया है। महंगे क्रूड से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। डॉलर इंडेक्स भी 101 के ऊपर कायम है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में भी तेजी जारी। महंगाई बढ़ने पर फेड दरें बढ़ा सकता है।

वेंचुरा में कमोडिटी और CRM के हेड, एन एस रामास्वामी का कहना है कि हाल की तेजी के बाद सोने की कीमतों में भारी गिरावट आई है। इसकी वजह अमेरिका में ट्रेजरी यील्ड में तेजी और फेडरल रिजर्व द्वारा और सख्ती बरतने की बढ़ती उम्मीदें हैं। अमेरिका की 10-साल की ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.2% के ऊपर पहुंच गई है,जो जून 2007 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। जबकि 30-साल की यील्ड बढ़कर लगभग 5.52% हो गई है, जो 2004 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव महंगाई की चिंताओं को बढ़ा रहे हैं, जिससे डॉलर इंडेक्स मज़बूत हो रहा है और बॉन्ड यील्ड बढ़ रही है। इसका असर सोने की कीमतों पर पड़ रहा है। इस बीच अमेरिका के उम्मीद से बेहतर आर्थिक आंकड़ों ने ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की उम्मीदों को मज़बूत किया है। सितंबर में कंपोजिट PMI बढ़कर 58.4 हो गई है,जो पांच साल से ज़्यादा समय में सबसे तेज़ रफ़्तार है।

इस हफ़्ते बाजार की नजर कोर PCE महंगाई के आंकड़ों (जो फ़ेड का पसंदीदा महंगाई पैमाना है) और GDP के फाइनल आंकड़ों पर रहेगी। ये दोनों बुधवार को आने वाले हैं। वहीं,नॉन-फार्म पेरोल के आंकड़े शुक्रवार को आएंगे। इस हफ्ते अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत पर भी सबकी नजर रहेगी।

आगे सोने की चाल महंगाई की चिंता और ग्लोबल सेंट्रल बैंकों के संभावित एक्शन पर निर्भर करेंगी। फिलहाल इसका ट्रेंड थोड़ा कमजोर बना हुआ है। MCX गोल्ड दिसंबर 149,427 के आसपास ट्रेड कर रहा है। इसके लिए तत्काल रेजिस्टेंस 151,000, 153,500 और 155,500 पर है, जबकि सपोर्ट 148,000, 145,000 और 140,000 पर दिख रहा है। COMEX गोल्ड दिसंबर 4,194 डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा है। इसके लिए सबसे नजदीकी रेजिस्टेंस 4,260 डॉलर और 4,350 डॉलर पर है,जबकि सपोर्ट 4,130, 4,050 और 4,000 डॉलर पर दिख रहा है।

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क्रूड की चाल पर एक नजर

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच क्रूड में फिर बड़ा उछाल देखने को मिला है। आज कच्चे तेल के दाम करीब 3% चढ़े हैं। ब्रेंट $108 के पार चला गया तो WTI $94 के ऊपर पहुंच गया है। ईरान से बातचीत की उम्मीद के बावजूद तनाव कम नहीं हुआ है। ट्रंप ने ईरान का स्ट्रेट खोलने का प्रस्ताव ठुकरा दिया है और ईरान पर ज्यादा मांग रखने का आरोप लगाया है। उधर, ईरान ने US के साथ भीषण जंग के लिए तैयार रहने की बात कही है। बाजार को सप्लाई संकट गहराने की आशंका है।

इक्विटी मार्केट पर क्या होगा असर?

मास्टर कैपिटल सर्विसेज़ में चीफ़ रिसर्च ऑफ़िसर रवि सिंह का कहना है कि बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों,जियोपॉलिटिकल तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर बनी चिंताओं की वजह से भारी गिरावट आई है। साथ ही FPI की बिकवाली और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का बढ़ना भी बाजार पर भारी पड़ रहा है।

FPI की तरफ से लगातार हो रही निकासी भारतीय इक्विटी पर बिकवाली का दबाव बढ़ा सकती है। डॉलर की मांग के कारण रुपये की कमजोरी बढ़ सकती है, आयातित महंगाई का जोखिम बढ़ा सकता है और बाजार में कुल लिक्विडिटी और निवेशकों का भरोसा घट सकता है।

बैंक,तेल मार्केटिंग कंपनियां,पेंट,टायर,एयरलाइंस और कच्चे तेल से जुड़े अन्य सेक्टर पर असर पड़ सकता है। डिफेंसिव,फार्मास्यूटिकल्स,हेल्थकेयर और FMCG सेक्टर तुलनात्मक रूप मजबूती दिखा सकते हैं।

निवेशकों को कच्चे तेल की कीमतों,ईरान-अमेरिका के बीच बन रही स्थिति,होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी खबरों,अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड,FPI फ्लो,रुपये की चाल,ग्लोबल मार्केट,घरेलू महंगाई और आने वाली कॉर्पोरेट अर्निंग्स पर नजर रखनी चाहिए।

 

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

बैंकॉक में 2 दिन में 1 महीने की बारिश:8 लोगों की मौत, ड्रेनेज सिस्टम फेल; पानी निकलने में 1 सप्ताह लग सकता है

थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में पिछले 2 दिनों में करीब 320 मिलीमीटर बारिश हुई है। आमतौर पर इतनी बारिश पूरे सितंबर महीने में होती है। इतनी बारिश के चलते शहर का ड्रेनेज सिस्टम फेल हो गया है।

बाढ़ से थाईलैंड में अब तक 8 लोगों की मौत हो चुकी है। प्रशासन के मुताबिक, कुछ इलाकों से पानी पूरी तरह निकलने में एक हफ्ते तक लग सकता है। करीब 80 हजार लोग अब भी बाढ़ में फंसे हुए हैं। थाईलैंड में आई बाढ़ से जुड़ी 4 तस्वीरें बैंकॉक समुद्र तल से सिर्फ 1.5 मीटर ऊपर बैंकॉक समुद्र तल से करीब 1.5 मीटर ऊपर है। शहर नरम मिट्टी वाले नदी डेल्टा क्षेत्र में बसा है और हर साल कुछ मिलीमीटर नीचे धंस रहा है। शहर की आबादी 84 लाख से ज्यादा है। यहां बारिश का मौसम करीब छह महीने चलता है और इस दौरान बाढ़ का खतरा बना रहता है। इस बार बाढ़ सिर्फ बैंकॉक तक सीमित नहीं है। थाईलैंड के 41 प्रांतों में 16 सितंबर से बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। मंत्रालय के मुताबिक, अब तक कम से कम 8 लोगों की मौत हुई है और 5.8 लाख से ज्यादा घर प्रभावित हुए हैं। रेयोंग में लोगों को घर खाली करने का आदेश बैंकॉक के अलावा पूर्वी तटीय प्रांत रेयोंग में भी बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। वहां दो जलाशयों में पानी उनकी क्षमता से ज्यादा भर गया। इसके बाद प्रशासन ने आसपास रहने वाले लोगों को घर खाली करने का आदेश दिया है। बाढ़ से 327 मिलियन डॉलर तक नुकसान का अनुमान इस बाढ़ से थाईलैंड को कम से कम 11 अरब बाहत यानी करीब 327 मिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। हालात नहीं सुधरे तो नुकसान और बढ़ सकता है। उनके अनुमान के मुताबिक, बाढ़ से इस साल थाईलैंड की आर्थिक विकास दर में करीब 0.3 प्रतिशत की कमी आ सकती है। GDP ग्रोथ 2.1% तक रह सकती है। बैंकॉक और पूर्वी थाईलैंड में दुकानों और कारोबार पर ज्यादा असर पड़ सकता है। दूसरे इलाकों में फैक्ट्रियों और खेती को नुकसान हो सकता है। पिछले साल भी आई थी बड़ी बाढ़ पिछले साल दक्षिणी थाईलैंड में सिर्फ तीन दिनों में 630 मिमी बारिश हुई थी। इसमें कम से कम 145 लोगों की मौत हुई थी। बाढ़ से 33 हजार से ज्यादा घर डूब गए थे। स्कूल, अस्पताल और हाईवे जैसी जरूरी जगहों को भी नुकसान पहुंचा था। ———————- ये खबर भी पढ़ें… नेपाल के हिमालय में हिमस्खलन, 4 की मौत, 12 लापता नेपाल के मनांग जिले में 7,126 मीटर ऊंचे हिमलुंग हिमाल पर रविवार को हिमस्खलन हो गया। पूरी खबर यहां पढ़ें…