रावण का यहां भगवान जैसा सम्मान! भारत के इन मंदिरों में होती है पूजा…अलग है यहां की कहानी

नितेश तिवारी के निर्देशक में बनी फिल्म ‘रामायण: पार्ट 1’ का पहला ट्रेलर रिलीज हो गया है। फैंस को फिल्म का ट्रेलर काफी पसंद आ रहा है। ये फिल्म दो पॉर्ट में रिलीज होने वाली है। पहला पॉर्ट दिवाली 2026 और दूसरा पॉर्ट दिवाली 2027 पर सिनेमाघरों में आएगा। राम और सीता की कहानी में रावण का नाम हमेशा विलेन के तौर पर रहा है। वहीं आपको ये जानकर हैरानी होगी की भारत में कई हिस्सों में ऐसे मंदिर मौजूद हैं, जहां रावण की पूजा होती है।

मान्यता है कि रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी और वह वीणा वादन में भी निपुण थे। इसी वजह से देश के कुछ हिस्सों में रावण के मंदिर बने हुए हैं, जहां लोग उनकी श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं। आइए जानते हैं उन मंदिरों के बारे में

बिसरख, उत्तर प्रदेश: बिसरख (उत्तर प्रदेश) को कई लोग रावण का जन्मस्थान मानते हैं। इसी वजह से यहां दशहरे पर रावण के पुतले नहीं जलाए जाते। नवरात्रि के दौरान गांव के लोग विशेष पूजा-पाठ और यज्ञ कर रावण की आत्मा की शांति की कामना करते हैं। यहां स्थित प्राचीन विश्रवेश्वर महादेव मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस मंदिर में मौजूद दुर्लभ अष्टकोणीय शिवलिंग की स्थापना रावण के पिता महर्षि विश्रवा ने की थी, इसलिए यह स्थान रावण से जुड़ी आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

मंदसौर, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश का मंदसौर रावण से जुड़ी मान्यताओं के कारण खास महत्व रखता है। ऐसा कहा जाता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका इसी क्षेत्र से था, इसलिए यहां रावण को दामाद के रूप में सम्मान दिया जाता है। स्थानीय लोग रावण को भगवान शिव का परम भक्त और महान विद्वान मानते हैं। शहर में रावण की करीब 35 फुट ऊंची प्रतिमा भी स्थापित है। दशहरे के दिन यहां कई लोग रावण के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उसकी स्मृति में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

बैजनाथ मंदिर, हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ मंदिर का संबंध भी रावण से जुड़ी प्राचीन मान्यताओं से जोड़ा जाता है। लोककथाओं के अनुसार, रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां कठोर तपस्या की थी और अपनी भक्ति का अद्भुत प्रमाण दिया था। इसी कारण बैजनाथ में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। एक अन्य मान्यता के मुताबिक, भगवान शिव ने रावण को शिवलिंग लंका ले जाने की अनुमति दी थी, लेकिन शर्त थी कि उसे रास्ते में कहीं जमीन पर नहीं रखना होगा। बैजनाथ पहुंचने पर परिस्थितिवश शिवलिंग जमीन पर रख दिया गया और वह वहीं स्थापित हो गया। तभी से यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है।

गढ़चिरौली, महाराष्ट्र: महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में रहने वाले कुछ गोंड आदिवासी समुदाय रावण और उसके पुत्र मेघनाद को पूजनीय मानते हैं। फाल्गुन महीने में मनाए जाने वाले अपने पारंपरिक त्योहार के दौरान वे दोनों की विशेष पूजा करते हैं। समुदाय की अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण को महान शासक और सम्मानित व्यक्तित्व माना जाता है। इसी वजह से यहां उसकी याद में धार्मिक आयोजन किए जाते हैं और उसे श्रद्धा के साथ सम्मान दिया जाता है।

काकीनाडा, आंध्र प्रदेश: आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जो रावण की भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा से जुड़ा माना जाता है। यहां विशाल शिवलिंग के पास बना ये मंदिर स्थानीय मान्यताओं के कारण खास महत्व रखता है। कहा जाता है कि रावण ने स्वयं इस स्थान को भगवान शिव की आराधना के लिए चुना था। यही वजह है कि आंध्र प्रदेश में यह स्थान उन चुनिंदा जगहों में शामिल है, जहां रावण को श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया जाता है।

डिस्केलमर- यहां पर दी गई जानकारी पौराणिक कथाओं और मान्याताओं पर निर्धारित है।

Nag Panchami 2026 Date: सावन में इस दिन मनाई जाएगी नाग पंचमी, कालसर्प दोष की शांति के लिए शुभ मुहूर्त में करें ये 4 उपाय

Nag Panchami 2026 Date: नाग पंचमी का पर्व सावन के महीने में हर साल मनाया जाता है। नाग पंचमी पर नागों की पूजा करते हैं। सावन भगवान शिव का प्रिय माह है और सांप भी उनके प्रिय हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन में नागों की पूजा करने से शिव कृपा प्राप्त होती है। नागों के राजा वासुकी भगवान शिव के गले का हार हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नागों की पूजा करने से सांपों के डर से मुक्ति मिलती है और कालसर्प दोष का प्रभाव भी कम होता है। कुछ अन्य लोक मान्यताएं हैं कि नाग पंचमी पर सर्प पूजा करने से नजर दोष नहीं लगता है।

यह पर्व हर साल सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन नाग देवता की पूजा के साथ ही कालसर्प दोष शांति के लिए भी उत्तम माना जाता है। जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष है, वे नाग पंचमी पर कुछ ज्योतिष उपाय कर सकते हैं। नाग पंचमी के दिन रवि योग और शुभ योग बनने वाले हैं। आइए जानते हैं कि नाग पंचमी कब है?

नाग पंचमी 2026: तारीख और शुभ मुहूर्त

पंचमी तिथि प्रारंभ : 16 अगस्त 2026, शाम 04:52 बजे

पंचमी तिथि समाप्त : 17 अगस्त 2026, शाम 05:00 बजे

पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त : प्रातः 05:52 बजे से सुबह 08:29 बजे तक

उदयातिथि के अनुसार, साल 2026 में नाग पंचमी का पर्व 17 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा। खास बात यह है कि इस दिन सावन का सोमवार भी है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

काल सर्प दोष निवारण समय

नाग पंचमी को कालसर्प दोष निवारण के लिए विशेष पूजा कर सकते हैं। इस दिन राहुकाल में भगवान शिव की पूजा करने से भी काल सर्प दोष से शांति मिल सकती है। नाग पंचमी पर राहुकाल सुबह 07 बजकर 30 मिनट से सुबह 09 बजकर 08 मिनट तक रहेगा।

कालसर्प दोष की शांति के लिए खास उपाय

ज्योतिष शास्त्र में नाग पंचमी का दिन राहू-केतु और कालसर्प दोष के निवारण के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस शुभ मुहूर्त में निम्न उपाय कर सकते हैं :

नाग-नागिन के जोड़े का दान या प्रवाह : चांदी या तांबे से बने नाग-नागिन का जोड़ा बनवाकर मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित करें या बहते जल में प्रवाहित करें।

शिवलिंग का रुद्राभिषेक : शुभ मुहूर्त में शिवलिंग पर दूध, गंगाजल, कच्चा दूध और जल से अभिषेक करें। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग, नीले/सफेद फूल और भस्म अर्पित करें।

मंत्रों का जाप

महामृत्युंजय मंत्र या “ॐ नमः शिवाय” का यथासंभव जाप करें।

राहू-केतु शांति के लिए

`ॐ रां राहवे नमः`

`ॐ कें केतवे नमः`

`ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात्॥` (सर्प गायत्री मंत्र)

दान-पुण्य : काले तिल, उड़द की दाल, काला कपड़ा, लोहे के बर्तन या सात प्रकार के अनाज (सप्तधान्य) का गरीब या जरूरतमंद को दान करें।

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जब बरसे बदरा तो महकेगा आंगन, बारिश में लगाएं ये 6 पौधे और पाएं फूलों की वादियां!

मानसून आते ही प्रकृति हरियाली से भर जाती है और यही समय घर के बगीचे को सजाने के लिए भी सबसे अच्छा होता है। बारिश की नमी पौधों को तेजी से बढ़ने में मदद करती है। ऐसे में कुछ खास पौधे लगाकर आप अपने घर को खूबसूरत और हरा-भरा बना सकते हैं:

 

मोगरा – खुशबू से भर देगा आंगन

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अगर आप चाहते हैं कि बारिश के मौसम में आपका घर मीठी और मनमोहक खुशबू से महकता रहे, तो मोगरे का पौधा जरूर लगाएं। मानसून में इसे अच्छी नमी मिलती है, जिससे इसकी ग्रोथ बेहतर होती है और इसमें सफेद रंग के खूबसूरत फूल खूब खिलते हैं। सही धूप, पानी और देखभाल मिलने पर मोगरा आपके बगीचे की सुंदरता बढ़ा सकता है।

 

गेंदा – कम देखभाल में खिलने वाला पौधा

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गेंदा ऐसा फूलों वाला पौधा है, जिसे ज्यादा मेहनत और देखभाल की जरूरत नहीं होती। इसके पीले और नारंगी रंग के चमकीले फूल बगीचे को अट्रैक्टिव बना देते हैं। यह पौधा मानसून में तेजी से बढ़ता है और माना जाता है कि इसकी खुशबू कुछ कीड़ों को दूर रखने में भी मदद कर सकती है।

 

गुड़हल – बड़े और रंग-बिरंगे फूलों की खूबसूरती

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बारिश का मौसम गुड़हल के पौधे के ग्रोथ के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। इस समय पौधा तेजी से बढ़ता है और इसमें बड़े साइज के लाल, गुलाबी, पीले या अन्य रंगों के फूल खिलते हैं। गुड़हल को अच्छी धूप और नियमित पानी की जरूरत होती है, इसलिए मानसून में इसकी देखभाल करना आसान हो जाता है।

 

स्नेक प्लांट – कम देखभाल में बढ़ने वाला पौधा

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अगर आप ऐसा पौधा चाहते हैं जिसकी ज्यादा देखभाल न करनी पड़े, तो स्नेक प्लांट एक बेहतरीन ऑप्शन है। इसे घर के अंदर या बाहर दोनों जगह लगाया जा सकता है। हालांकि, इसमें जरूरत से ज्यादा पानी देने से बचना चाहिए, क्योंकि गमले में पानी जमा रहने से इसकी जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।

 

तुलसी – खूबसूरती के साथ औषधीय गुण

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तुलसी का पौधा भारतीय घरों में धार्मिक महत्व के साथ-साथ अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। मानसून में यह तेजी से बढ़ता है, लेकिन ध्यान रखें कि इसके गमले में पानी जमा न हो। तुलसी को रोजाना कुछ घंटे हल्की धूप मिलना जरूरी होता है, जिससे यह स्वस्थ बनी रहती है।

 

फर्न – हरियाली बढ़ाने के लिए बेहतरीन ऑप्शन

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फर्न की घनी और हरी पत्तियां बगीचे को नेचुरल और ताजा लुक देती हैं। यह पौधा नमी वाले वातावरण में अच्छी तरह ग्रोथ होता है, इसलिए बारिश का मौसम इसके लिए अनुकूल होता है। फर्न को सीधी तेज धूप पसंद नहीं होती, इसलिए इसे ऐसी जगह लगाना बेहतर होता है जहां हल्की छाया मिलती रहे।

बारिश में लगाएं ये पौधे और सजाएं अपना बगीचा

This may contain: many different colored flowers in the grass

अगर आप अपने घर के गार्डन, बालकनी या छत को हरियाली और फूलों से सजाना चाहते हैं, तो मानसून सबसे सही समय है। यहां दिए गए पौधे आसानी से लगाए जा सकते हैं और ये आपके घर को खूबसूरत, ताजा और नेचुरल फील देते हैं।

Shravan Essay: आस्था, प्रकृति और पवित्रता का उत्सव श्रावण मास, पढ़ें रोचक निबंध

Images and photographs related to the sacred festival of the Shravan month, featuring Lord Shiva, devotees performing worship, and the Kanwar Yatra, a procession that unites religion, nature, and human life

Shravan Festival Essay: श्रावण मास के दौरान देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, भांग और पुष्प अर्पित करते हैं। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है। इस महीने के प्रत्येक सोमवार को पड़ने वाले सावन सोमवार व्रत को अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की उपासना करने से मनोकामनाओं की पूर्ति और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

यहां श्रावण मास पर एक रोचक, सरल और ज्ञानवर्धक हिन्दी निबंध प्रस्तुत है।
 

प्रस्तावना

हिंदू कैलेंडर में 'श्रावण मास' यानी सावन को सभी महीनों में सबसे पवित्र और आनंददायक माना गया है। यह केवल एक महीना नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मा का उत्सव है। ग्रीष्म ऋतु की तपती गर्मी के बाद जब सावन की फुहारें धरती पर गिरती हैं, तो न केवल प्रकृति का श्रृंगार होता है, बल्कि इंसानी मन भी भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो सावन में वर्षा ऋतु के कारण हमारी पाचन शक्ति यानी जठराग्नि मंद हो जाती है। इसलिए आयुर्वेद और शास्त्रों में इस महीने के दौरान हल्का, सुपाच्य और सात्विक भोजन करने की सलाह दी गई है।

 

सावन का धार्मिक महत्व और शिव भक्ति

श्रावण मास पूरी तरह से देवाधिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी महीने में समुद्र मंथन हुआ था। मंथन से निकले हलाहल विष को ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने कंठ में समाहित कर लिया था, जिससे उनका नाम 'नीलकंठ' पड़ा। विष की तीव्र जलन को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने शिव जी पर शीतल जल वर्षण किया था। यही कारण है कि सावन में शिव जी का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने की अनूठी परंपरा है।

 

प्रकृति का अनुपम श्रृंगार

सावन का महीना अध्यात्म के साथ-साथ पर्यावरण के उत्सव का भी समय है। रिमझिम बारिश के कारण सूखी धरती पर मखमली हरी घास उग आती है, पेड़ों पर नए पत्ते आ जाते हैं और नदियां-झरने कल-कल कर बहने लगते हैं।

 

कांवड़ यात्रा

सावन के दौरान देश भर में भक्ति का एक अद्भुत रंग देखने को मिलता है। लाखों 'कांवड़िए' केसरिया वस्त्र धारण कर, नंगे पैर पवित्र नदियों से जल भरकर लाते हैं और मीलों पैदल चलकर अपने स्थानीय शिवलिंगों का अभिषेक करते हैं। 'बम-बम भोले' के जयकारों से पूरा माहौल शिवमय हो जाता है।

 

सावन के सोमवार

इस महीने में आने वाले सोमवार के व्रत का विशेष महत्व है। कुमारी कन्याएं अच्छे वर के लिए और विवाहित महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं। इस महीने में हरे रंग का विशेष महत्व है। प्रकृति की इस हरियाली से तालमेल बिठाते हुए महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियां पहनती हैं। यह रंग समृद्धि, खुशहाली और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

 

सावन के लोक-रंग और परंपराएं

सावन का महीना भारतीय लोक संस्कृति को जीवंत कर देता है। गांवों से लेकर शहरों तक, बागों में पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते हैं। मल्हार और कजरी जैसे पारंपरिक लोकगीत हवाओं में गूंजने लगते हैं।

 

रसोई के लिहाज से भी यह महीना बेहद स्वादिष्ट होता है। बारिश की फुहारों के बीच घरों में गरमा-गरम घेवर, मालपुआ, खीर और पकोड़े बनाए जाते हैं। इस महीने में सात्विक जीवनशैली का पालन किया जाता है, जिससे तन और मन दोनों शुद्ध रहते हैं।

 

सावन के प्रमुख त्योहार में हरियाली तीज, नाग पंचमी और रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है।

 

क्या है खास?

हरियाली तीज- महिलाएं सुहाग की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और पारंपरिक झूले झूलती हैं।

नाग पंचमी- नाग देवताओं की पूजा की जाती है, जो जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

रक्षाबंधन- श्रावण पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के पवित्र प्रेम का यह त्योहार मनाया जाता है।

 

उपसंहार

श्रावण मास हमें सिखाता है कि कैसे ईश्वर की भक्ति, प्रकृति के सौंदर्य और मानवीय रिश्तों को एक सूत्र में पिरोया जाता है। यह महीना हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और जीवन को नए उत्साह से जीने की प्रेरणा देता है। सावन की हर बूंद धरती को जीवन देती है और इसकी भक्ति इंसानी जीवन को धन्य बनाती है। यह महीना केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति की हरियाली, वर्षा की फुहारों और आध्यात्मिक चेतना का भी संदेश देता है। 

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Ashadha Amavasya 2026: आषाढ़ अमावस्या पर बन रहा ये दुर्लभ संयोग, हनुमान जी की कृपा पाने और शनि दोष निवारण के लिए है शुभ

Ashadha Amavasya 2026: आषाढ़ माह हिंदी कैलेंडर का चौथा महीना है। हर माह की तरह इस माह के कृष्ण पक्ष का समापन अमावस्या तिथि से होता है। इसे ही आषाढ़ अमावस्या के रूप में जाना जाता है। इस साल आषाढ़ अमावस्या पर एक ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे यह दिन संकटमोचन हनुमान की कृपा पाने और शनि दोष निवारण के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है। यह अमावस्या तिथि मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए इसका महत्व और बढ़ गया है।

हर हिंदू माह में अमावस्या तिथि आती है, जो पितृ तर्पण और स्नान-दान के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके पितरों की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। माना जाता है कि इस दिन पितरों की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनकी कृपा से जीवन सुखमय होता है। यह दिन जीवन से नकारात्मकता को दूर करने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

आषाढ़ अमावस्या 2026 तारीख

पंचांग के अनुसार, इस साल आषाढ़ अमावस्या मंगलवार, 14 जुलाई, 2026 को मनाई जाएगी। अमावस्या तिथि की शुरुआत 13 जुलाई 2026 को शाम 06:50 बजे से होगी और इसका समापन 14 जुलाई 2026 को दोपहर 03:14 बजे होगा। उदयातिथि के नियमों के कारण स्नान-दान और व्रत की अमावस्या 14 जुलाई को ही रहेगी। इस दिन मंगलवार होने के कारण इसे भौमवती अमावस्या का विशेष संयोग भी मिल रहा है।

आषाढ़ अमावस्या का महत्व

हिंदू धर्म में आषाढ़ अमावस्या का बहुत गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह तिथि पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंड दान और श्राद्ध कर्म करने के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

भौमवती अमावस्या का विशेष संयोग

इस साल आषाढ़ अमावस्या मंगलवार के दिन पड़ रही है। हिंदू धर्म में ‘भौम’ शब्द मंगल ग्रह के लिए प्रयोग किया जाता है, इसलिए मंगलवार और अमावस्या के इस विशेष संयोग का बहुत अधिक धार्मिक महत्व है। मंगवार के दिन अमावस्या पड़ने से मंगल जनित दोषों और कर्ज से मुक्ति के लिए इस दिन की गई पूजा विशेष फल देती है। साथ ही, यह दिन हनुमान जी की कृपा पाने और शनि दोष निवारण के लिए बहुत शुभ है।

आषाढ़ अमावस्या पूजा विधि

इस दिन पितरों की प्रसन्नता और भगवान विष्णु व शिव जी की कृपा पाने के लिए नीचे दी गई सरल विधि से पूजा करें :

  • अमावस्या के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी, जलाशय या घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • स्नान के बाद साफ वस्त्र धारण करें और तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
  • इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करें और जल में काले तिल और कुशा मिलाकर अपने पितरों के निमित्त तर्पण करें। पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।
  • घर के मंदिर में दीपक जलाएं। भगवान विष्णु और भोलेनाथ की विधि-विधान से पूजा करें। चूंकि इस दिन भौमवती अमावस्या है, इसलिए हनुमान जी की पूजा करना और हनुमान चालीसा का पाठ करना भी बेहद शुभ रहेगा।
  • पूजा और तर्पण के बाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अनाज, तिल, वस्त्र, छाता या सामर्थ्य के अनुसार धन का दान अवश्य करें।
  • शाम के समय पीपल के पेड़ के पास जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाएं और परिक्रमा करें, इससे भी पितर और देव प्रसन्न होते हैं।

Sawan 2026: इस साल सावन में सोमवार और मंगला गौरी व्रत कितने होंगे? सही तारीखों के साथ देखें पूरा कैलेंडर

Raksha Bandhan 2026 Date: इस साल कब मनाया जाएगा भाई-बहन के प्रेम का पर्व राखी? जानें सही तारीख, मुहूर्त और भद्रा रहेगी या नहीं

Raksha Bandhan 2026 Date: रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक पर्व है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष स्थान है। यह त्योहार हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, उन्हें तिलक लगा कर मिठाई खिलाती हैं और उनकी सुरक्षा की कामना करती हैं। ‘रक्षाबंधन’ का अर्थ है “रक्षा का बंधन” या “सुरक्षा का धागा”, जिसे राखी के रूप में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर बांधती हैं। माना जाता है कि यह सुरक्षा का धागा भाइयों की हर विपत्ति से रक्षा करता है और उनके जीवन पर आने वाले संकट को दूर करता है।

राखी बंधवाने के बाद भाई अपनी बहनों को हर संकट से बचाने का वचन देते हैं। इस पर्व पर भाई अपनी बहनों को प्रेम स्वरूप कुछ उपहार या शगुन देते हैं और उनका मुंह मीठा कराया जाता है। इस वर्ष का रक्षाबंधन बेहद खास और शुभ है क्योंकि राखी बांधने के समय पर भद्रा का कोई साया नहीं रहेगा। इस साल रक्षाबंधन को बहुत खास माना जा रहा है, क्योंकि पंचांग के अनुसार इस पर्व पर भद्रा का साया नहीं है। भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। लेकिन इस साल बहनों के लिए पूरा दिन अच्छा और पवित्र है। आइए जानें इस साल यह पर्व किस दिन मनाया जाएगा और राखी बांधने के शुभ मुहूर्त क्या रहेंगे?

कब है रक्षाबंधन का पर्व?

पंचांग के अनुसार, इस साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 27 अगस्त 2026 को सुबह 09:08 बजे से होगी। इस तिथि का समापन 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:48 बजे होगा। उदया तिथि को देखते हुए इस साल रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा।

राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

इस साल पूर्णिमा तिथि सुबह 09:48 बजे समाप्त हो रही है, इसलिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना गया है:

सुबह का मुहूर्त : सुबह 05:57 बजे से सुबह 09:48 बजे तक

कुल अवधि : लगभग 3 घंटे 51 मिनट

राहुकाल : सुबह 10:46 से दोपहर 12:22 तक

अगर इस समय राखी न बांध पाएं तो?

किसी कारणवश अगर आप सुबह राखी नहीं बांध पाती हैं, तो दोपहर 01:30 बजे से शाम 04:00 बजे के बीच भी राखी बांध सकती हैं।

रखाबंधन पर नहीं रहेगा भद्र का साया

शास्त्रों के अनुसार भद्रा काल में राखी बांधना पूरी तरह वर्जित होता है। लेकिन इस साल आपको भद्रा को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। 2026 में भद्रा काल रक्षाबंधन के दिन सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगा। इसलिए 28 अगस्त की सुबह जब आप सोकर उठेंगे, तब तक भद्रा पूरी तरह समाप्त हो चुकी होगी और पूरा दिन धार्मिक अनुष्ठानों के लिए एकदम शुभ रहेगा।

Bhadli Navami 2026: 22 या 23 जुलाई, कब है भड़ली नवमी? जानें सही तारीख, धार्मिक महत्व और इस दिन के अबूझ मुहूर्त

Bhadli Navami 2026: 22 या 23 जुलाई, कब है भड़ली नवमी? जानें सही तारीख, धार्मिक महत्व और इस दिन के अबूझ मुहूर्त

Bhadli Navami 2026: हिंदू धर्म में भड़ली नवमी तिथि को अत्यंत शुभ माना गया है। यह दिन पूरे साल में आने वाले उन खास अवसरों में से एक है, जब कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य करने के लिए दिन, समय या मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं होती है। इस दिन पूरे समय सिद्ध मुहूर्त होता है। यदि आप इस वर्ष कोई बड़ा मांगलिक कार्य या खरीदारी करने की योजना बना रहे हैं, तो चातुर्मास शुरू होने से पहले भड़ली नवमी का दिन आपके लिए सर्वश्रेष्ठ साबित हो सकता है।

हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भड़ली नवमी मनाई जाती है। इसे भड़रिया नवमी, कंदर्प नवमी आदि नामों से भी जाना जाता है। इस तिथि की महत्ता और प्रभाव अक्षय तृतीया और देवउठनी एकादशी के समान ही माना गया है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। लोग विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं। हिंदू धर्म में इस तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है और इसे एक बेहद पवित्र ‘अबूझ मुहूर्त’ माना जाता है। आइए जानें इस साल भड़ली नवमी की पावन तिथि कब है और इसका धार्मिक महत्व क्या है ?

भड़ली नवमी 2026 तारीख और शुभ समय

पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भड़ली नवमी (या भड्डली नवमी) कहा जाता है।

नवमी तिथि का आरंभ : 22 जुलाई 2026 को सुबह 05:16 बजे से

नवमी तिथि का समापन : 23 जुलाई 2026 को सुबह 07:03 बजे तक

मुख्य तिथि : उदयातिथि के अनुसार भड़ली नवमी का पर्व 22 जुलाई 2026 को ही मनाया जाएगा।

अबूझ मुहूर्त का क्या मतलब है?

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, भड़ली नवमी को ‘अबूझ मुहूर्त’ माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि इस दिन समय या नक्षत्र देखने की आवश्यकता नहीं होती। पूरा दिन अपने आप में सिद्ध और शुभ होता है। यदि किसी व्यक्ति के विवाह, गृह प्रवेश या मुंडन आदि के लिए सामान्य दिनों में कोई शुभ मुहूर्त नहीं निकल पा रहा हो, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के इस दिन अपने मांगलिक कार्य संपन्न कर सकते हैं। इस दिन किए गए कार्यों में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आता और सफलता प्राप्त होती है।

भड़ली नवमी का धार्मिक महत्व

चातुर्मास से पहले अंतिम शुभ मुहूर्त : भड़ली नवमी के ठीक तीन दिन बाद देवशयनी एकादशी होती है। इस दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है। चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह रोक लग जाती है। इसलिए, भड़ली नवमी को चातुर्मास से पहले शुभ कार्यों के लिए साल का आखिरी और सबसे सुरक्षित मौका माना जाता है।

अक्षय तृतीया के समान फलदायी : इस तिथि की महत्ता अक्षय तृतीया और देवउठनी एकादशी के समान ही मानी गई है। मान्यता है कि इस दिन नया व्यवसाय शुरू करने, सोना या वाहन खरीदने, भूमि पूजन या नया काम शुरू करने से घर में सुख-समृद्धि और बरकत आती है।

भगवान विष्णु की कृपा : यह दिन मुख्य रूप से जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन मंदिरों और घरों में भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया जाता है और भजन-कीर्तन आयोजित होते हैं।

गुप्त नवरात्रि का समापन : इसी तिथि के साथ आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि का समापन भी होता है, जिससे इस दिन की आध्यात्मिक और धार्मिक शक्ति और अधिक बढ़ जाती है।

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Jyeshtha Purnima 2026: पूर्णिमा तिथि का हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और प्रमुख स्थान है। इस दिन माता लक्ष्मी के साथ ही भगवान सत्यनारायण और चंद्र देव की पूजा का विधान है। बहुत से लोग पूर्णिमा तिथि के शुभ अवसर पर सत्यनारायण की कथा कहते या सुनते हैं। पूरे साल में 12 पूर्णिमा तिथियां आती हैं, जिनमें से ज्येष्ठ पूर्णिमा भी एक है। इस साल ज्येष्ठ पूर्णिमा 29 जून, सोमवार को मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की लंबी उम्र के लिए वट सावित्री पूर्णिमा (वट पूर्णिमा) का व्रत भी रखती हैं।

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 तिथि

हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि की शुरुआत और समाप्ति का समय इस प्रकार है :

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ : 29 जून 2026 को प्रातः 03:06 बजे से

पूर्णिमा तिथि समाप्त : 30 जून 2026 को प्रातः 05:26 बजे तक

उदयातिथि के अनुसार : पूर्णिमा का व्रत, पूजा और स्नान-दान 29 जून 2026 (सोमवार) को ही किया जाएगा।

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 04:06 बजे से 04:46 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11:57 बजे से दोपहर 12:52 बजे तक

चंद्रोदय का समय : शाम 07:11 से 07:16 बजे

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 पर भद्र का साया

ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन 29 जून को प्रात:काल 03:06 बजे से लेकर दोपहर 04:16 बजे तक भद्रा का साया रहेगा। हालांकि, शास्त्रों के अनुसार भद्रा पाताल लोक में होने के कारण पृथ्वी पर इसका प्रभाव नहीं होगा, इसलिए जप, तप, स्नान और पूजा-पाठ बिना किसी बाधा के किए जा सकते हैं। फिर भी शुभ कार्यों की शुरुआत या गृह प्रवेश जैसे काम भद्रा के बाद करना बेहतर माना जाता है।

स्नान-दान का सही समय

ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 04:06 बजे) से लेकर पूरे दिन स्नान और दान किया जा सकता है। सूर्योदय के समय का स्नान सबसे उत्तम माना जाता है।

स्नान विधि : इस दिन पवित्र नदियों (जैसे गंगा, यमुना) में स्नान करने का महत्व है। यदि नदी पर जाना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

दान का महत्व : ज्येष्ठ का महीना अत्यधिक गर्मी का होता है, इसलिए इस दिन जल (जल दान), मिट्टी के घड़े, छाता, हाथ का पंखा, खरबूजा या आम जैसी ठंडी चीजों का दान सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है। इसके अलावा सफेद वस्तुएं जैसे चावल, चीनी, दूध, दही और सफेद कपड़ों का दान करने से कुंडली में चंद्रमा मजबूत होता है।

ज्येष्ठ पूर्णिमा पूजा विधि

  • सुबह स्नान करने के बाद साफ या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • घर के मंदिर में दीपक जलाएं। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। उन्हें पीले फूल, चंदन, अक्षत, तुलसी दल (विष्णु जी को) और भोग अर्पित करें। इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा पढ़ना या सुनना अत्यंत फलदायी होता है।
  • सुहागिन महिलाएं इस दिन बरगद (वट) के पेड़ की पूजा करती हैं, सूत लपेटती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं।
  • पूर्णिमा की रात को चंद्रदेव अपने पूर्ण स्वरूप में होते हैं। चंद्रोदय (शाम लगभग 07:16 बजे) के बाद एक लोटे में जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इससे मानसिक तनाव दूर होता है और सुख-शांति आती है।
  • रात के समय माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिश्री वाली सफेद खीर का भोग लगाएं और उसे प्रसाद के रूप में परिवार में बांटें। इससे घर की दरिद्रता दूर होती है।

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निर्जला एकादशी पर शर्बत क्यों बांटा जाता है, जानिए इसके फायदे

An image depicting scenes related to offering water to people and providing water for animals and birds on Nirjala Ekadashi

Water Donation on Nirjala Ekadashi: निर्जला एकादशी हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण और कठिन एकादशियों में से एक मानी जाती है। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली इस एकादशी में बिना पानी पिए यानी निर्जल व्रत रखने का विधान है। माना जाता है कि प्यासे लोगों को जल और शर्बत पिलाना महान पुण्य का कार्य है, जिससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इस भीषण गर्मी के मौसम में शर्बत बांटना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे वैज्ञानिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हैं।ALSO READ: निर्जला एकादशी: साल की सबसे बड़ी एकादशी कब है? सिर्फ एक व्रत से पाएं सभी 24 एकादशियों का पुण्य फल

 

आइए जानते हैं कि निर्जला एकादशी पर शर्बत क्यों बांटा जाता है और इसके क्या फायदे हैं:

 

शर्बत बांटने का धार्मिक और सामाजिक कारण
 

1. 'प्यासे को पानी पिलाना' सबसे बड़ा पुण्य

सनातन धर्म में दान का बहुत महत्व है, और गर्मी के महीने में किसी प्यासे को शीतल जल या शर्बत पिलाना सबसे बड़ा पुण्य है, जो कि महादान माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शर्बत और पानी का दान करने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। 

 

2. सेवा की भावना

निर्जला एकादशी का व्रत रखने वाले लोग खुद तो पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करते, लेकिन वे दूसरों की सेवा के लिए सड़कों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर स्टॉल या प्याऊ लगाकर राहगीरों को ठंडा शर्बत पिलाते हैं। यह त्याग और निःस्वार्थ सेवा की भावना को दर्शाता है।

 

शर्बत बांटने और पीने के फायदे

इस दिन बांटे जाने वाले शर्बत- जैसे बेल का शर्बत, चंदन का शर्बत, गुलाब या सौंफ का शर्बत के कई शारीरिक और मानसिक फायदे होते हैं:

 

शर्बत बांटने का धार्मिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों में जलदान को सबसे श्रेष्ठ दानों में से एक माना गया है। प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना पुण्यदायक कर्म माना जाता है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए शीतल पेय का दान किया जाता है। यह सेवा दया, करुणा और परोपकार की भावना को बढ़ाती है।

 

1. भीषण गर्मी से राहत

यह व्रत मई-जून के महीने में आता है जब उत्तर और मध्य भारत में पारा 40∘C से ऊपर होता है। ऐसे में राहगीरों और मजदूरों को ठंडा शर्बत पिलाने से उनके शरीर में पानी की कमी नहीं होती और वे हीट स्ट्रोक/ लू लगने से बच जाते हैं।

 

2. शरीर को तुरंत ऊर्जा

शर्बत में मौजूद ग्लूकोज और प्राकृतिक तत्व धूप में थके-हारे लोगों को तुरंत एनर्जी देते हैं। इससे शरीर की थकान मिटती है और चक्कर आने जैसी समस्याएं दूर होती हैं।ALSO READ: निर्जला एकादशी के दिन करें प्रमुख रूप से ये 5 उपाय तो मिलेगा सफलता और धन समृद्धि का आशीर्वाद

 

3. पेट को मिलती है शीतलता

अक्सर गर्मियों में पेट में जलन या एसिडिटी की समस्या बढ़ जाती है। एकादशी पर बांटे जाने वाले पारंपरिक शर्बत- जैसे नींबू-पुदीना या सौंफ का पानी पेट को ठंडक पहुंचाते हैं और पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हैं।

 

4. सामाजिक समरसता और भाईचारा

जब सड़कों पर बिना किसी भेदभाव के हर जाति, वर्ग और धर्म के व्यक्ति को शर्बत पिलाया जाता है, तो इससे समाज में आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारा बढ़ता है।

 

एक छोटा सा सुझाव: यदि आप भी इस निर्जला एकादशी पर शर्बत बांटने की सोच रहे हैं, तो कोशिश करें कि शर्बत में बहुत ज्यादा कृत्रिम रंग या अत्यधिक चीनी न हो। इसकी जगह नींबू-पानी, गुड़ का पना, सौंफ का शर्बत या बेल का रस बांटना सेहत के लिए और भी ज्यादा फायदेमंद होगा।

 

धार्मिक मान्यता के अनुसार निर्जला एकादशी के दिन जलदान का विशेष महत्व है। इस दिन शर्बत, ठंडा पानी और मीठे पेय पदार्थों का वितरण करने से प्यासे लोगों को राहत मिलती है और दान करने वाले को पुण्य फल प्राप्त होता है। गर्मी के मौसम में यह सेवा मानवता और परोपकार का प्रतीक भी मानी जाती है। निर्जला एकादशी पर शर्बत बांटना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानव सेवा और जनकल्याण का सुंदर संदेश भी है।

 

निर्जला एकादशी (FAQS) 

 

Q. सामाजिक सेवा का माध्यम

A. निर्जला एकादशी पर शर्बत वितरण से समाज में सहयोग और सेवा की भावना मजबूत होती है तथा जरूरतमंद लोगों को राहत मिलती है।

 

Q. निर्जला एकादशी पर कौन-कौन से शर्बत बांटे जाते हैं?

A. नींबू, बेल, गुलाब या सौंफ का शर्बत शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में सहायक होता है। अत: इस दिन निम्न शर्बत बांटे जाते हैं।

* बेल का शर्बत

* नींबू शर्बत

* गुलाब शर्बत

* सौंफ का शर्बत

* आम पना

* ठंडा मीठा जल

 

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Nirjala Ekadashi 2026: निर्जला एकादशी पर एक साथ बनेंगे 3 शुभ योग, जानें सही तारीख, पूजा का मुहूर्त और विधि

Nirjala Ekadashi 2026: ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग पूरे साल एकादशी का व्रत नहीं कर पाते हैं, वे अगर इस एक एकादशी का व्रत कर लें तो उन्हें सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल मिल जाता है। इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पांडु पुत्र भीम ने भी इस एकादशी का व्रत किया था।

निर्जला एकादशी का व्रत करने वाले भक्त अन्न के साथ-साथ जल का त्याग भी करते हैं। जैसा कि इस एकादशी का नाम है, यह व्रत निर्जला किया जाता है और इसकी शुरुआत एकादशी तिथि पर सुबह व्रत का संकल्प के साथ होती है। इसके बाद पूरे दिन व्रत करते हैं, रात्रि जागरण करने के बाद अगले दिन हरि वासर के बाद व्रत का पारण करते हैं और उसके बाद अन्न-जल ग्रहण करते हैं। जून के महीने में जब भीषण गर्मी पड़ती है, तब यह व्रत किया जाता है। इसलिए इसे सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। इस साल यह व्रत 25 जून को किया जाएगा। इस दिन गुरुवार है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है, साथ ही 3 अन्य शुभ योगों का भी निर्माण हो रहा है।

निर्जला एकादशी व्रत की तारीख

एकादशी तिथि 24 जून की शाम 6:14 बजे से शुरू होकर 25 जून की रात 8:10 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर व्रत और पूजा 25 जून को की जाएगी। संयोग से यह व्रत बृहस्पतिवार के दिन पड़ रहा है, जो भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।

एकादशी व्रत पारण

व्रत रखने वाले श्रद्धालु अगले दिन यानी 26 जून 2026 को अपने व्रत का पारण करेंगे। पारण करने के लिए शुभ समय 5 बजकर 25 मिनट से लेकर 8 बजकर 13 मिनट तक है। धार्मिक परंपराओं के मुताबिक, निर्धारित पारणा अवधि के अंदर ही उपवास तोड़ना शुभ मान जाता है।

निर्जला एकादशी पर बन रहे ये तीन शुभ योग

रवि योग : 25 जून सुबह 5:25 से शाम 4:29 बजे तक।

शिव योग : 24 जून सुबह 10:24 से 25 जून सुबह 10:54 बजे तक।

सिद्ध योग : 25 जून सुबह 10:55 से 26 जून सुबह 11:39 बजे तक।

निर्जला एकादशी व्रत पूजा विधि

  • इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है।
  • एकादशी के दिन सुबह स्नान के बाद सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करें।
  • इसके बाद भगवान का ध्यान करते हुए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
  • इस दिन भक्ति भाव से कथा सुनना और भगवान का कीर्तन करना चाहिए।
  • इस दिन व्रती को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।
  • इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है।

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