असम और बिहार में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सभी FIR वापस, क्या बोली दिल्ली पुलिस?

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असम की हिमंता बिस्वा सरकार और बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ने छात्र प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी मामले वापस लेने का एलान किया है। हालांकि दिल्ली पुलिस ने साफ कर दिया कि जंतर-मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान दर्ज सभी एफआईआर वापस नहीं होंगी। ALSO READ: बुरा मत मानिए, आईना हमेशा सुंदर नहीं होता…

 

दिल्ली पुलिस का कहना है कि केवल उन ही मामले में एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, जो पुलिस या राज्य की ओर से दर्ज किए गए हैं। निजी शिकायतों के आधार पर दर्ज एफआईआर संबंधी मामलों में कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी।

 

क्या है बिहार सरकार का फैसला

बिहार सरकार ने कहा है कि 26 जुलाई की शाम छह बजे तक दर्ज सभी प्राथमिकी, परिवाद और कारण बताओ नोटिस वापस लिए जाएंगे। आंदोलन में नामित लोगों के खिलाफ भविष्य में भी कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्रवाई नहीं की जाएगी। ALSO READ: CJP के प्रोटेस्ट में घुसे थे हत्या, लूट और रेप के आरोपी, 989 क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले शातिर, 480 पाकिस्तानी सोशल मीडिया हैंडल जांच के घेरे में

 

असम में रिहा होंगे प्रदर्शनकारी

असम के राज्य के गृह विभाग ने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों में शामिल लोगों के खिलाफ कोई प्रतिकूल कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। कानून के अनुसार मामले वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। विभाग ने यह भी कहा कि गिरफ्तारियों की समीक्षा की जाएगी और हिरासत में लिए गए लोगों को जरूरी प्रक्रियाओं के बाद रिहा कर दिया जाएगा। 26 जुलाई को शाम 6 बजे तक पुलिस ने राज्य में 5 मामले दर्ज कर 13 लोगों को गिरफ्तार किया था।

 

सीजेपी की चेतावनी

गौरतलब है कि काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने दिल्ली में प्रेस कान्फ्रेंस कर प्रदर्शनकारियों और आयोजकों पर दर्ज आपराधिक मामलों को वापस नहीं लिए जाने पर नाराजगी जताई थी। साथ ही चेतावनी दी थी कि मंगलवार तक मांग पूरी न हुई तो फिर से सड़क पर उतरकर आंदोलन शुरू किया जाएगा। ALSO READ: CJP के आंदोलन की चेतावनी के बीच दिल्ली में कड़ी सुरक्षा, पार्टी का आरोप- राज्यों में जारी है गिरफ्तारियां, कानूनी सहायता के लिए बनाया फंड
 

सिब्बल ने जताई आशंका

राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस आंदोलनकारी छात्रों को अपना निशाना बना सकती है। जहां-जहां छात्रों के खिलाफ मामले दर्ज होंगे, वहां-वहां उन्हें कानूनी मदद उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए उन्होंने अपनी ओर से एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की, ताकि कानूनी लड़ाई प्रभावी ढंग से लड़ी जा सके।

LIVE: संसद में आज परीक्षा में सुधारों पर चर्चा, लोकसभा में 6 घंटे समय निर्धारित

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Latest News Today Live Updates in Hindi : लोकसभा में आज परीक्षा में सुधारों से जुड़े विधेयक पर चर्चा होगी। इसके लिए 6 घंटे का समय निर्धारित किया गया है। पल पल की जानकारी…

संसद में गतिरोध समाप्त होने के बाद लोकसभा में आज परीक्षा में सुधारों से जुड़े विधेयक पर चर्चा होगी। चर्चा के लिए 6 घंटे का समय निर्धारित किया गया है। स्पीकर ओम बिरला ने जरूरत पड़ने पर इससे अधिक समय देने की बात कही है।

विधेयक पर चर्चा के दौरान बांसुरी स्वराज, सायोनी घोष जैसे युवा चेहरे सरकार की ओर से पक्ष रखेंगे। वहीं, विपक्ष की ओर से नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सरकार पर हमले की जिम्मेदारी संभालेंगे। सपा की ओर से अखिलेश यादव, तृणमूल से महुआ मोइत्रा चर्चा में हिस्सा लेंगे। 

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। यह नोटिस 20 जुलाई, 2026 को संसद तक हुए मार्च के दौरान निहत्थे छात्र प्रदर्शनकारियों पर रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल पर चर्चा के लिए दिया गया है, जिसमें 80 से ज़्यादा लोग घायल हो गए थे।

Plastic currency notes : 10 और 20 रुपए के प्लास्टिक नोटों पर सरकार की मुहर, ट्रायल के लिए RBI के प्रस्ताव को मिली मंजूरी, क्या बंद हो जाएंगे पुराने नोट

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केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 10 रुपए और 20 रुपए मूल्यवर्ग के पॉलिमर (प्लास्टिक) बैंक नोटों के फील्ड ट्रायल के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा कागज के नोटों को पूरी तरह प्लास्टिक नोटों से बदलने की फिलहाल कोई योजना नहीं है।

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हाल ही में खबर आई थी कि RBI की नोट छापने वाली इकाई भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने सुरक्षा फीचर्स वाले पॉलिमर सब्सट्रेट शीट्स की आपूर्ति के लिए वैश्विक कंपनियों से रुचि पत्र (EOI) आमंत्रित किए हैं। हालांकि टेंडर में यह नहीं बताया गया है कि ये नोट किस मूल्यवर्ग में और कब से नियमित रूप से जारी किए जाएंगे।

लोकसभा में सोमवार को एक सवाल के लिखित जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि RBI के केंद्रीय निदेशक मंडल की सिफारिश पर 10 रुपए और 20 रुपए के एक-एक अरब (100 करोड़) पॉलिमर नोटों को फील्ड ट्रायल के लिए जारी करने का प्रस्ताव दिया गया था। ट्रायल सफल रहने के बाद इन्हें नियमित रूप से जारी करने की योजना है। इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है।

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मंत्री ने बताया कि RBI के अनुसार अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि पॉलिमर बैंक नोटों की उम्र कागज के नोटों की तुलना में काफी अधिक होती है। ये अधिक टिकाऊ होते हैं और लंबे समय तक उपयोग में रह सकते हैं। डिजिटल भुगतान पर संभावित असर को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में पंकज चौधरी ने कहा कि पॉलिमर नोटों की शुरुआत अभी शुरुआती चरण में है।

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इनके नियमित रूप से जारी होने के बाद ही डिजिटल लेनदेन पर इनके प्रभाव का सही आकलन किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि नकद और डिजिटल भुगतान दोनों आम जनता के लिए एक-दूसरे के पूरक माध्यम हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पॉलिमर नोट मौजूदा कागज आधारित नोटों के साथ ही चलेंगे। फिलहाल कागज के नोटों को पूरी तरह हटाकर केवल प्लास्टिक नोट जारी करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

 

जेई-एईएस को लेकर अलर्ट हुई योगी सरकार, प्रभावित हर गांव तक पहुंचेगा स्वच्छ पेयजल

  • तीन शिफ्ट में काम पूरा कर सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के निर्देश, जलजनित बीमारों पर लगेगी रोक
  • जल अर्पण व जल चौपाल से बढ़ेगी जनभागीदारी, गुणवत्ता और समयबद्धता पर सरकार सख्त
  • पाइपलाइन बिछाने के दौरान क्षतिग्रस्त हुई सड़कों की तत्काल मरम्मत की जाए: मंत्री स्वतंत्र देव सिंह

 

लखनऊ, 27 जुलाई। उत्तर प्रदेश में हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के संकल्प को और गति देते हुए योगी सरकार ने जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) प्रभावित गांवों में जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मिशन मोड में कार्य करने का खाका तैयार किया है। इसी क्रम में जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिन प्रभावित गांवों में अभी तक नल से जलापूर्ति शुरू नहीं हो पाई है, वहां 24 घंटे में तीन शिफ्टों में काम पूरा कर स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता है कि हर प्रभावित गांव तक सुरक्षित पेयजल पहुंचे, जिससे जलजनित बीमारियों की रोकथाम के साथ ग्रामीणों का जीवन स्तर बेहतर हो सके।

 

गुणवत्ता और समयबद्धता पर सरकार का फोकस

राज्य पेयजल एवं स्वच्छता मिशन कार्यालय में जल जीवन मिशन की समीक्षा बैठक के दौरान जलशक्ति मंत्री ने सभी परियोजनाओं को निर्धारित समय-सीमा के भीतर उच्च गुणवत्ता के साथ पूरा करने के निर्देश दिए। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाएगी। साथ ही जलापूर्ति से जुड़ी शिकायतों का त्वरित समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए।

 

क्षतिग्रस्त सड़कों की तुरंत मरम्मत कराने के निर्देश

जलशक्ति मंत्री ने अधिकारियों को नियमित रूप से गांवों का भ्रमण कर पेयजल योजनाओं की प्रगति की निगरानी करने को कहा। उन्होंने निर्देश दिए कि सिंगल विलेज योजनाओं के सभी लंबित कार्य तय समय में पूरे किए जाएं। पाइपलाइन बिछाने के दौरान क्षतिग्रस्त हुई सड़कों की तुरंत मरम्मत कराई जाए। उन्होंने चेतावनी दी, सड़क मरम्मत या अन्य कार्यों में लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

 

*जल जीवन मिशन के प्रभाव का होगा आकलन*

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि वे गांवों में जाकर जल जीवन मिशन के प्रभाव का आकलन करें। विशेष रूप से यह देखा जाए कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होने से जलजनित बीमारियों में कितनी कमी आई है और ग्रामीणों के जीवन में क्या सकारात्मक बदलाव हुए हैं। साथ ही लोगों को सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता के प्रति जागरूक करने पर भी जोर दिया गया।

 

'जल अर्पण' कार्यक्रमों को मिलेगा विस्तार

जलशक्ति मंत्री ने कहा कि जिन गांवों में नल से जलापूर्ति शुरू हो चुकी है, वहां ‘जल अर्पण’ कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को इस अभियान से जोड़ा जाए। उन्होंने प्रत्येक जिले में नियमित जल चौपाल आयोजित करने व जनप्रतिनिधियों को ‘जल सारथी’ ऐप और प्रगति पोर्टल के माध्यम से योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए, ताकि जनभागीदारी और पारदर्शिता दोनों को और मजबूत किया जा सके।

योगी सरकार में अब तक अनुसूचित जाति/जनजाति के 1.39 करोड़ से अधिक छात्र-छात्राओं को मिली आर्थिक सहायता

  • बीते नौ साल में पूर्वदशम एवं दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना से छात्र-छात्राओं को किया गया सशक्त 
  • योगी सरकार का लगातार प्रयास, आर्थिक अभाव किसी भी मेधावी विद्यार्थी की शिक्षा में न बने बाधा

 

लखनऊ, 27 जुलाई। शिक्षा को सामाजिक सशक्तीकरण का सबसे प्रभावी माध्यम मानते हुए योगी सरकार ने अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति व्यवस्था को लगातार मजबूत किया है। पूर्वदशम एवं दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से बीते नौ वर्षों में 1.39 करोड़ से अधिक छात्र-छात्राओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई है। योगी सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक अभाव किसी भी मेधावी विद्यार्थी की शिक्षा में बाधा न बने और वह विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा तक अपनी पढ़ाई निर्बाध रूप से जारी रख सके।

 

तकनीक से बढ़ी पारदर्शिता, समय पर मिली सहायता 

 

योगी सरकार ने छात्रवृत्ति वितरण को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में कई सुधार किए हैं। ओटीआर, बायोमेट्रिक सत्यापन, एस-कोड वैलिडेशन और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) जैसी व्यवस्थाओं से छात्रवृत्ति सीधे विद्यार्थियों के बैंक खातों में पहुंच रही है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और पात्र विद्यार्थियों तक समय पर सहायता पहुंचाना आसान हुआ है।

 

हर वर्ष बड़ी संख्या में विद्यार्थियों तक पहुंचा लाभ

 

पूर्वदशम छात्रवृत्ति योजना के तहत वर्ष 2017-18 में 4,16,860 अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को लाभ मिला। इसके बाद 2018-19 में 5,24,426, 2019-20 में 5,41,386, 2020-21 में 3,62,511, 2021-22 में 3,20,390, 2022-23 में 3,86,139, 2023-24 में 3,74,963, 2024-25 में 4,11,797 तथा 2025-26 में 4,39,647 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान की गई। वहीं दशमोत्तर स्तर पर 2017-18 में 12,80,515, 2018-19 में 11,43,804, 2019-20 में 13,60,376, 2020-21 में 8,02,648, 2021-22 में 12,29,471, 2022-23 में 9,42,939, 2023-24 में 10,35,766, 2024-25 में 11,76,281 तथा 2025-26 में 11,54,567 विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति का लाभ मिला है।

 

 

शिक्षा के जरिए सामाजिक बदलाव की पहल

 

योगी सरकार का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का सबसे मजबूत आधार है। छात्रवृत्ति योजना के माध्यम से अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है, जिससे वे उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के बेहतर अवसरों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। समाज कल्याण विभाग उप निदेशक आनंद कुमार सिंह ने बताया कि, बीते नौ वर्षों में छात्रवृत्ति व्यवस्था में हुए सुधारों ने विद्यार्थियों के बीच शिक्षा के प्रति विश्वास को मजबूत किया है। सरकार की कोशिश है कि पात्र विद्यार्थियों को समय पर आर्थिक सहायता मिले और वे बिना किसी आर्थिक बाधा के अपने सपनों को साकार कर सकें।

श्रावण की आस्था, शिवभक्तों का उत्साह… कांवड़ यात्रा-2026 के स्वागत को मेरठ पूरी तरह तैयार

Meerut News kanwar yatra 2026

Meerut Kanwar Yatra: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र काल माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले कालकूट विष का पान करने के बाद भगवान शिव के शरीर की तपन शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर पवित्र नदियों का जल अर्पित किया था। तभी से श्रावण मास में शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। इसी आस्था से परिपूर्ण होकर हर वर्ष करोड़ों शिवभक्त हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य पवित्र घाटों से गंगाजल भरकर कंधे पर कांवड़ रखकर पैदल अपने-अपने शिवालयों तक पहुंचते है।

 

2026 में 30 जुलाई से श्रावण मास शुरू हो रहा है, जिसके चलते एक बार फिर शिवभक्ति का यह विराट उत्सव पूरे उत्तर भारत में दिखाई देगा। विगत वर्ष हरिद्वार से 4.50 करोड़ से अधिक कांवड़ उठाई गई थीं। दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित कई राज्यों के शिवभक्त “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ेंगे। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मेरठ और मुजफ्फरनगर है, जहां लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन गुजरते हैं।

 

इसी विशाल धार्मिक आयोजन को सकुशल, शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए मेरठ प्रशासन ने व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। रविवार को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के बहुउद्देशीय हॉल में जिलाधिकारी मेरठ एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मेरठ ने अधिकारियों की संयुक्त ब्रीफिंग कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

 

बैठक में जनपद के पुलिस अधीक्षक, सभी क्षेत्राधिकारी, थाना प्रभारी, एसडीएम, एसीएम सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। अधिकारियों ने कांवड़ यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, श्रद्धालुओं की सुविधाएं, शिविरों की व्यवस्था, कांवड़ मार्गों की सुगमता, विभागीय समन्वय, कानून-व्यवस्था तथा आपातकालीन तैयारियों की विस्तार से समीक्षा की।

कलेक्टर और एसएसपी के निर्देश

जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने निर्देश दिए कि सभी विभाग शेष कार्य समयबद्ध ढंग से पूर्ण करें। वरिष्ठ अधिकारी स्वयं मौके पर रहकर व्यवस्थाओं की निगरानी करें तथा किसी भी समस्या की सूचना मिलते ही तत्काल प्रभाव से मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करें।

 

जिलाधिकारी डा. वी के सिंह ने खाद्य सुरक्षा विभाग को विशेष निर्देश दिए गए कि कांवड़ मार्ग पर स्थित ढाबों, रेस्टोरेंट, रेहड़ी-पटरी और खाद्य सामग्री विक्रेताओं के लाइसेंस अथवा अस्थायी लाइसेंस की जांच की जाए। सभी प्रतिष्ठानों पर लाइसेंस और रेट लिस्ट स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कराई जाए, ताकि श्रद्धालुओं और व्यापारियों के बीच किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो और कानून-व्यवस्था बनी रहे।

 

बरसात के मौसम को देखते हुए कांवड़ शिविरों में सांप एवं अन्य जहरीले जीवों से बचाव के लिए भी विशेष व्यवस्था की जा रही है। वन विभाग और कृषि विभाग संयुक्त रूप से एक मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) तैयार कर शिविर संचालकों को उपलब्ध कराएंगे, जिससे आवश्यक सावधानियां समय रहते अपनाई जा सकें।

श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता

बैठक के अंत में जिलाधिकारी वीके सिंह एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अविनाश पांडे ने सभी अधिकारियों को निर्देश दिए कि कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सभी अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों में पूरी सतर्कता से ड्यूटी करें, आपसी समन्वय बनाए रखें और यह सुनिश्चित करें कि शिवभक्तों की आस्था और उत्साह के इस महापर्व में उन्हें सुरक्षित, सुगम और व्यवस्थित यात्रा का अनुभव मिले।

 

श्रावण का यह पावन पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन, सेवा और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। ऐसे में प्रशासन की तैयारी और जनसहयोग मिलकर कांवड़ यात्रा-2026 को सफल और यादगार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

अयोध्या राम मंदिर में बड़ा बदलाव, ऑनलाइन दान करते ही तुरंत मिलेगी डिजिटल रसीद

ayodhya ram mandir trust meeting

Ram Mandir online donation: ​अयोध्या में श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के हालिया मामले के बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब राम भक्तों के लिए ऑनलाइन दान करने की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और हाई-टेक बना दिया गया है।

 

​ऑनलाइन दान करने वाले श्रद्धालुओं को अब दान की पुष्टि के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा। ट्रस्ट ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट के 'डोनेशन सेक्शन' को अपडेट कर यह नई सुविधा शुरू की है। ​दान प्रक्रिया पूरी होते ही रसीद तुरंत स्क्रीन पर आ जाएगी, जिसे डाउनलोड करके सुरक्षित रखा जा सकता है। रसीद पाने के लिए श्रद्धालु को नाम, दान का उद्देश्य, पैन (PAN) नंबर, तिथि, दान राशि, पूरा पता, ईमेल आईडी और मोबाइल नंबर दर्ज करना होगा। किसी भी सहायता या पूछताछ के लिए ट्रस्ट ने अपनी वेबसाइट पर हेल्पलाइन नंबर और ईमेल आईडी भी जारी कर दिए हैं। ALSO READ: अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट की बैठक में 5 बड़े फैसले, संतों को बड़ी जिम्मेदारी

ऑफलाइन दान के लिए भी सख्त नियम लागू

​चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद कई श्रद्धालुओं ने रसीद में देरी की शिकायत की थी। इसी को देखते हुए अब मंदिर परिसर में ऑफलाइन (नकद) दान करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को भी मौके पर ही अनिवार्य रूप से रसीद देने की व्यवस्था लागू कर दी गई है। नई डिजिटल व्यवस्था से श्रद्धालुओं का विश्वास और अधिक मजबूत होगा और भविष्य में दान के रिकॉर्ड का सत्यापन बेहद आसान रहेगा। ALSO READ: अयोध्या आहत है… रामलला के घर 'लूट' ने आस्था को घायल किया, सरयू किनारे गूंज रहा एक ही सवाल— 'अब न्याय कब?'

रोज आ रहा है 8 से 10 लाख रुपये का चढ़ावा

​चढ़ावा चोरी की घटना के बाद शुरुआत में दान की रफ्तार थोड़ी धीमी जरूर हुई थी, लेकिन राम भक्तों की अटूट आस्था को कोई रोक नहीं सका। श्रद्धालुओं का भरोसा एक बार फिर पूरी तरह लौट आया है। ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों को मिलाकर राम लला के चरणों में प्रतिदिन 8 से 10 लाख रुपए का चढ़ावा आ रहा है। मंदिर परिसर में रखे दान पात्रों में भक्त दिल खोलकर चढ़ावा अर्पित कर रहे हैं, वहीं ऑनलाइन दान में भी तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

योगी सरकार में जल संरक्षण बना जन आंदोलन, यूपी ने हासिल किया संयुक्त राष्ट्र का छठवां सतत विकास लक्ष्य

Yogi government water conservation: कभी जल संकट और गिरते भूजल स्तर की चुनौती से जूझने वाला उत्तर प्रदेश आज जल संरक्षण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी का व्यापक अभियान बनाया गया। इसी क्रम में यूपी, संयुक्त राष्ट्र के छठवें सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी-6) को हासिल कर चुका है। यूपी में जल दोहन की दर 2017 के 71.26 प्रतिशत से घटकर 70 प्रतिशत हो गई है, जो कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य का मानक है। यह उपलब्धि जल संरक्षण के लिए सम्मलित प्रयासों से मिली है।

 

भूजल गर्भ विभाग निदेशक डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने बताया कि भूजल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन, आधुनिक तकनीक के सम्मलित प्रयासों ने प्रदेश को जल सरंक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धियां दिलाई हैं। प्रदेश सरकार और विभाग के प्रयासों का सबसे बड़ा परिणाम भूजल पुनर्भरण में वृद्धि के रूप में सामने आया है। वर्ष 2017 में प्रदेश का वार्षिक भूजल रिचार्ज 69.91 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) था, जो वर्ष 2025 तक बढ़कर 73.39 बीसीएम हो गया। वहीं भूजल दोहन की दर 71.26 प्रतिशत से घटकर 70 प्रतिशत पर पहुंच गई, जिससे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी-6) को प्राप्त करने में उत्तर प्रदेश सफल रहा।

प्रदेश में अतिदोहित विकासखंड़ों की संख्या हुई कम

उन्होंने बताया कि प्रदेश में जल संरक्षण अभियानों का असर अतिदोहित क्षेत्रों में भी दिखाई पड़ा। वर्ष 2017 में प्रदेश में 82 अतिदोहित विकासखंड थे, जिनकी संख्या घटकर 44 रह गई। वहीं सुरक्षित श्रेणी के विकासखंडों की संख्या 540 से बढ़कर 563 हो गई। यह परिवर्तन वैज्ञानिक भूजल प्रबंधन व योजनाबद्ध कार्यों की वजह से संभव हो पाया।

अभियान बना भूजल रिचार्ज की ताकत

'कैच द रेन' अभियान के तहत वर्ष 2021 से 2025 के बीच 3.39 लाख वर्षा जल संचयन एवं जल संरक्षण संरचनाएं बनाई गईं, 1.34 लाख पारंपरिक जल निकायों का पुनर्जीवन किया गया, 14.38 लाख जलग्रहण क्षेत्र विकास कार्य हुए। साथ ही 1.33 लाख भूजल पुनर्भरण एवं पुनः उपयोग से जुड़ी संरचनाएं विकसित की गईं। इन प्रयासों ने वर्षा जल संचयन व भूजल रिचार्ज को नई गति दी।

2 मीटर तक बढ़ा भूजल स्तर

डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अटल भूजल योजना ने भी सकारात्मक बदलाव में अहम भूमिका निभाई। 26 विकासखंडों में ग्राम पंचायत आधारित वाटर सिक्योरिटी प्लान लागू किए गए, जिसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्र अतिदोहित या सेमी-क्रिटिकल श्रेणी से सुरक्षित श्रेणी की ओर बढ़े। एक स्वतंत्र अध्ययन में 550 ग्राम पंचायतों में से 303 पंचायतों में भूजल स्तर में 0.5 से 2 मीटर तक सुधार दर्ज किया गया।

 

रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग से लाभ

योगी सरकार ने रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग को सरकारी एवं अर्धसरकारी भवनों पर भी व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया। प्रदेश में 1,05,593 उपयुक्त भवनों की पहचान की गई, जिनमें से 35,206 भवनों पर वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित की जा चुकी है। भूगर्भ जल विभाग द्वारा 227 भवनों पर प्रणाली स्थापना से प्रतिवर्ष लगभग 4252.80 लाख लीटर संभावित भूजल पुनर्भरण क्षमता भी विकसित की गई है।

करोड़ों लीटर भूजल रिचार्ज क्षमता बढ़ी

योगी सरकार में लगभग सभी विभागों ने जल संरक्षण अभियान को प्राथमिकता में शामिल किया। इसके तहत पिछले कुछ वर्षों में लघु सिंचाई विभाग ने 6,627 चेकडैम का निर्माण किया, जिनकी भंडारण क्षमता 14 हजार करोड़ लीटर व भूजल रिचार्ज क्षमता 10 हजार करोड़ लीटर प्रतिवर्ष है। इसके साथ ही 1,417 तालाबों का जीर्णोद्धार किया, जिसकी भूजल रिचार्ज क्षमता 1,400 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष है। वहीं 6,800 से अधिक भवनों पर रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली स्थापित की।

 

ग्राम्य विकास विभाग ने लगभग 19,974 अमृत सरोवर विकसित किए। कृषि विभाग ने 37,273 खेत तालाबों का निर्माण कराया। इन प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता और कृषि उत्पादकता दोनों में सुधार हुआ। यह सभी प्रयास यूपी में भूजल रिचार्ज और जल संरक्षण के लिए काफी अहम साबित हो रहे हैं।

जंतर-मंतर का नया व्याकरण, क्‍या ‘Gen-Z’ की गालियों से हो रहा संस्‍कारों का पतन, सोशल मीडिया में छिड़ी बहस

Gen-Z protest

दिल्‍ली का जंतर-मंतर हमेशा से देश की धड़कन रहा है—यहां कभी इंकलाब के नारे गूंजते हैं, तो कभी व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश का सैलाब उमड़ता है। लेकिन हाल ही में, नीट (NEET) परीक्षा पेपर लीक के विरोध में जुटे 'Gen-Z' (नई पीढ़ी) के प्रदर्शन ने विरोध प्रदर्शनों के इतिहास में एक नया और तीखा अध्याय जोड़ दिया है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी चर्चा सिर्फ इसके मुद्दों को लेकर नहीं, बल्कि उस भाषा को लेकर है जो प्रदर्शनकारियों के मुंह से निकली। सरकार, प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को संबोधित करते हुए जिस खुलेपन और बेबाकी से फूहड़ और भद्दी गालियों का इस्तेमाल किया गया, उसने सोशल मीडिया से लेकर ड्राइंग रूम तक भूचाल ला दिया है।

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यह सिर्फ एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) पर छिड़ी एक अंतहीन बहस बन गया है। देश की साहित्यिक और लेखक बिरादरी इस मुद्दे पर दो स्पष्ट और विपरीत ध्रुवों पर बंट गई है।

साहित्यिक बिरादरी में छिड़ा घमासान: अभिव्यक्ति या पतन?
इस पूरी घटना के बाद वैचारिक गलियारों में एक तीखी खींचतान शुरू हो गई है। एक धड़ा ऐसा है जो इन गालियों को युवा पीढ़ी के घुटनभरे गुस्से और निराशा का स्वाभाविक विस्फोट मान रहा है। इनका तर्क है कि जब सिस्टम युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करता है, जब उनकी डिग्रियां और सपने पेपर लीक की भेंट चढ़ जाते हैं, तब शालीनता और व्याकरण के दायरे टूट जाते हैं। इस वर्ग का मानना है कि गालियां समाज का हिस्सा हैं और जब सत्ता बहरी हो जाती है, तो भाषा अपनी शालीनता छोड़कर आक्रामक हो जाती है। उनके अनुसार, यह Gen-Z का अपने गुस्से को बिना किसी फिल्टर के बयां करने का तरीका है।

दूसरी तरफ, पारंपरिक साहित्यकारों, विचारकों और वरिष्ठ नागरिकों का एक बड़ा वर्ग इसे संस्कारों का गंभीर हनन और सभ्यता के पतन की शुरुआत मान रहा है। उनका कहना है कि विरोध दर्ज कराने के लोकतांत्रिक और शालीन तरीके सदियों से मौजूद रहे हैं। सार्वजनिक मंचों पर इस स्तर की भद्दी भाषा का प्रयोग न केवल राजनीतिक बहस के स्तर को गिराता है, बल्कि यह दिखाता है कि नई पीढ़ी के भीतर संवाद की संस्कृति खत्म हो रही है।

ओटीटी, सोशल मीडिया और 'मूक स्क्रीन' की देन : इस वैचारिक मंथन में एक और दिलचस्प पहलू पर बात हो रही है—वह है Gen-Z की भाषा का ताना-बाना। आज की पीढ़ी किताबों की दुनिया से दूर, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की वेब सीरीज, सोशल मीडिया के मीम्स और रील्स की ऐसी दुनिया में जी रही है जहाँ गालियों को 'कूल' और 'रॉ' (Raw) मानकर सामान्यीकृत कर दिया गया है। फिल्मों और सीरीज में एंटी-हीरो के मुंह से निकलने वाली गालियां अब युवाओं के दैनिक बोलचाल का हिस्सा बन चुकी हैं।

जब यही पीढ़ी अपने वास्तविक जीवन में किसी बड़े संकट या अन्याय का सामना करती है, तो उनके पास विरोध की अपनी गढ़ी हुई कोई शास्त्रीय शब्दावली नहीं होती। वे अपनी उसी सिनेमैटिक और सोशल मीडिया वाली दुनिया की भाषा में प्रतिक्रिया देते हैं, जहां आक्रोश का मतलब ही तीखा और अमर्यादित होना है।

क्या यह लोकतंत्र की नई भाषा है?
सवाल यह है कि क्या जंतर-मंतर पर सुनाई दी यह भाषा लोकतंत्र के लिए खतरनाक है या यह एक चेतावनी है? एक तरफ, भाषा की पवित्रता और सार्वजनिक जीवन की गरिमा का सवाल अपनी जगह बिल्कुल सही है। लोकतंत्र में संवाद की एक मर्यादा होती है, और जब वह मर्यादा तार-तार होती है, तो समाज की मूल संरचना खतरे में पड़ जाती है। दूसरी तरफ, यह भी सच है कि यह गुस्सा रातों-रात पैदा नहीं हुआ। युवाओं के भीतर सिस्टम के प्रति जो अविश्वास और लाचारी का भाव है, उसने इस अमर्यादित भाषा को जन्म दिया है।

अंत में, जंतर-मंतर की यह घटना सिर्फ नीट पेपर लीक तक सीमित नहीं है। यह इस बात का आईना है कि हमारी आने वाली पीढ़ी व्यवस्था से कितनी त्रस्त है और उनके गुस्से को व्यक्त करने के साधन कितने बदल चुके हैं। अब यह बहस सिर्फ इस बात की नहीं है कि गालियां दी जानी चाहिए या नहीं, बल्कि इस बात की है कि क्या हम उस समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ युवाओं का गुस्सा केवल गालियों के शोर में ही दबकर रह जाए?

अगर गालियों से समाज का पतन होता है तो इसकी शुरुआत आपके बेडरूम से हो चुकी है

Gen-Z protest

गालियों से याद आया कि जब मध्‍यप्रदेश में मोहन यादव सीएम बने थे तो उनका एक वीडियो वायरल हुआ था— वीडियो में वे गालियां दे रहे हैं, जिसे फुरसत से देखा जाना चाहिए। इसके कुछ पहले जाएं तो मध्‍यप्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष जीतू पटवारी ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बहुत ही अपनत्‍व और प्‍यारे मालवी अंदाज में बुलाया था। राजनीति में गालियों की यह ‘अनफिल्‍टर्ड’ परंपरा हाल ही में बीजेपी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के ‘घंटा’ तक पहुंची थी। अतीत में अखबार के पन्‍ने और न्‍यूज चैनल के दृश्‍य टटोलेंगे तो कई जगह बीप… बीप… सुनाई दे जाएंगी।

इससे ज्‍यादा ही मनोरंजित होना है और समाज के सामने अच्‍छा नागरिक भी बने रहना है तो अपने कमरे में चुपचाप हेडफोन लगाकर ओटीटी पर कोई भी वेब-सीरीज लगा लीजिए और बाहर दफ्तर, समाज में सभ्‍य बनकर अच्‍छा नागरिक बने रहिये।

इन सब के बीच सवाल यह है कि अगर गुस्‍से में गालियां न दी जाएं तो गालियों की जगह क्‍या दिया जाना चाहिए?

ओटीटी, स्‍टैंडअप्‍स और पॉडकास्‍ट में गालियों को 'कूल' और 'रॉ' बताकर जिस तरह से आप और हम कूल बनते हैं तो यह भी बता दें कि इस जनरेशन को अपनी गालियों के साथ कौनसे श्‍लोक और मंत्र शामिल करने चाहिए थे, जिससे ये गालियां इतनी अश्‍लील और भद्दी न हो?

बात यह है कि गालियों का संबंध किसी पार्टी, संगठन या उम- वर्ग आदि से नहीं होता है। जिस आदमी को गुस्‍सा आता है— आक्रोश होता है वो जब वो चरम पर पहुंचता है तो उस आदमी के खिलाफ गालियां दी जाती हैं, जिसने उसे इसके लिए मजबूर किया है। हां, कुछ हद तक हमारे संस्‍कार काम आते हैं, लेकिन यह भी सिचुएशनल काम करते हैं। हम कितने ही आध्‍यात्‍मिक बन जाएं, किसी के मरने पर रो ही देंगे— किसी के बिछडने पर दुख होता ही है। हां, यह सही कि नई जनरेशन आपसे ज्‍यादा मुखर है— उसके लिए बहुत सी बातें नॉर्मल है, उनके बीच लिंग-भेद कम होता जा रहा है।

अगर प्रोटेस्‍ट में आक्रोश में एक करप्‍ट सिस्‍टम के खिलाफ निकली गालियों से समाज का पतन होता है तो यह पतन आपके बेडरूम में पहले ही हो चुका है। उन ओटीटी, स्‍टैंडअप कॉमेडी और पॉडकास्‍ट में हो चुका है, जिसे आप बड़े चाव से अपने कमरे की लाइट्स बंद कर के देखते हैं।

गालियां Gen-Z की भाषा नहीं है— न ही ये गालियां उन्‍होंने ईजाद की है— ये गालियां आपने उन्‍हें विरासत में ट्रांसफर की हैं। फर्क इतना है कि आप में सिर्फ अपने बेडरूम और प्राइवेट पार्टी में गालियां देने का साहस है— जबकि वे कहीं भी अनफिल्‍टर्ड नहीं हैं।