UP-Japan Meet : जापानी प्रतिनिधिमंडल ने देखी वीमेन पावर लाइन 1090 की कार्यप्रणाली, समझा महिला सुरक्षा मॉडल

UP-Japan Meet : जापानी प्रतिनिधिमंडल ने देखी वीमेन पावर लाइन 1090 की कार्यप्रणाली, समझा महिला सुरक्षा मॉडल

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यूपी–जापान इन्वेस्टमेंट मीट 2026 के तहत जापानी प्रतिनिधिमंडल ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश की महिला सुरक्षा के लिए संचालित वीमेन पावर लाइन 1090 का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने यहां महिलाओं की सुरक्षा, शिकायतों पर त्वरित सहायता, काउंसलिंग और जागरूकता से जुड़ी व्यवस्थाओं को समझा। इस दौरान उत्तर प्रदेश के अधिकारियों और जापानी प्रतिनिधिमंडल के बीच महिला सुरक्षा, स्कूली स्तर पर जागरूकता, बच्चों को सुरक्षा संबंधी जानकारी देने और महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ाने के तरीकों पर विस्तार से अनुभव साझा किए गए।

 

दौरे के दौरान जापानी प्रतिनिधिमंडल को बताया गया कि वीमेन पावर लाइन 1090 महिलाओं को कठिन, भय या उत्पीड़न की स्थिति में सहायता उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था के रूप में कार्य करती है। प्रतिनिधिमंडल ने यह समझने में रुचि दिखाई कि किसी महिला की ओर से सहायता के लिए संपर्क किए जाने के बाद उसकी समस्या को किस तरह समझा जाता है और कैसे उस तक उचित सहायता पहुंचाई जाती है।

 

शिकायत से काउंसलिंग तक की प्रक्रिया समझी

जापानी प्रतिनिधिमंडल ने 1090 की कार्यप्रणाली को करीब से समझते हुए कॉल रिसीव करने से लेकर महिला की समस्या को समझने, आवश्यक काउंसलिंग उपलब्ध कराने और जरूरत के अनुसार संबंधित सहायता तंत्र से जोड़ने की प्रक्रिया की जानकारी ली। अधिकारियों ने बताया कि ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं की बात ध्यानपूर्वक सुनना और उन्हें सहज एवं सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेष रूप से काउंसलिंग और भावनात्मक सहयोग को लेकर चर्चा हुई। प्रतिनिधिमंडल को बताया गया कि कई बार महिलाएं डर, तनाव या झिझक के कारण अपनी बात खुलकर नहीं रख पातीं। ऐसे मामलों में प्रशिक्षित कर्मी संवेदनशीलता के साथ उनकी बात सुनते हैं, उनकी चिंताओं को समझते हैं और उन्हें उपयुक्त सहायता एवं मार्गदर्शन उपलब्ध कराने की दिशा में काम करते हैं।

 

स्कूलों में बचपन से सुरक्षा जागरूकता पर जोर

बैठक के दौरान महिला सुरक्षा को केवल शिकायत निवारण तक सीमित न रखते हुए प्रीवेंटिव अवेयरनेस पर भी चर्चा हुई। जापानी प्रतिनिधिमंडल और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने स्कूलों में विद्यार्थियों को कम उम्र से ही सुरक्षा, अधिकारों और जरूरत पड़ने पर सहायता लेने के तरीकों के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता पर विचार साझा किए। बच्चों में पांच वर्ष की आयु के बाद सुरक्षा संबंधी जागरूकता विकसित करने के तरीकों पर भी चर्चा हुई। इसमें बच्चों को अपनी सुरक्षा, संवाद करने और किसी कठिन परिस्थिति में भरोसेमंद व्यक्ति से मदद मांगने के बारे में सहज तरीके से जानकारी देने के दृष्टिकोण पर विचार किया गया।

 

जापान और यूपी के अनुभवों पर हुआ संवाद

जापानी प्रतिनिधिमंडल ने जापान में महिलाओं की सुरक्षा और जागरूकता से जुड़े कार्यक्रमों के बारे में अपने अनुभव साझा किए। वहीं उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने प्रदेश में संचालित महिला सुरक्षा और सहायता तंत्र की जानकारी दी। दोनों पक्षों ने माना कि जापान और उत्तर प्रदेश की सामाजिक एवं संस्थागत परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए किसी भी मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समझना और लागू करना आवश्यक है। इसके बावजूद महिला सुरक्षा, बच्चों में जागरूकता, प्रभावी संवाद, काउंसलिंग और महिलाओं को सहायता उपलब्ध कराने जैसे क्षेत्रों में अनुभवों का आदान-प्रदान दोनों पक्षों के लिए उपयोगी हो सकता है।

 

सुरक्षा से आत्मविश्वास और सशक्तीकरण तक

चर्चा में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि महिला सुरक्षा का उद्देश्य केवल किसी घटना के बाद सहायता उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना विकसित करना भी है। जब महिलाएं यह महसूस करती हैं कि कठिन परिस्थिति में उन्हें समय पर सहायता मिल सकती है, तो वे अपनी समस्याओं को सामने रखने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में अधिक सहज महसूस करती हैं। प्रतिनिधिमंडल ने माना कि महिला सुरक्षा, जागरूकता, काउंसलिंग और सहायता सेवाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इन व्यवस्थाओं को मजबूत करने से महिलाओं की सामाजिक भागीदारी और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलता है।

 

अनुभवों के आदान-प्रदान से सहयोग की नई संभावनाएं

यूपी–जापान इन्वेस्टमेंट मीट 2026 के तहत हुआ यह दौरा भारत-जापान संबंधों के सामाजिक आयाम को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण जैसे विषयों पर दोनों पक्षों के बीच अनुभव साझा होने से भविष्य में जागरूकता, काउंसलिंग, बच्चों की सुरक्षा शिक्षा और महिला सहायता सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग की नई संभावनाएं बन सकती हैं। जापानी प्रतिनिधिमंडल ने वीमेन पावर लाइन 1090 की व्यवस्था को समझते हुए उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा और सहायता के लिए विकसित किए गए संस्थागत तंत्र की जानकारी हासिल की। वहीं इस संवाद से उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को जापान में अपनाई जा रही महिला सुरक्षा और जागरूकता की विभिन्न कार्यप्रणालियों को समझने का अवसर मिला।

बाढ़ में घायल 53 साल की हथिनी ‘जॉयमोती’ का एयरलिफ्ट, इलाज के लिए वनतारा पहुंची, भारत में पहली बार हुआ ऐसा रेस्क्यू

बाढ़ में घायल 53 साल की हथिनी ‘जॉयमोती’ का एयरलिफ्ट, इलाज के लिए वनतारा पहुंची, भारत में पहली बार हुआ ऐसा रेस्क्यू

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जुलाई की भीषण बाढ़ में बहकर गंभीर रूप से घायल हुई 53 वर्षीय हथिनी जॉयमोती को विशेष इलाज के लिए एयरलिफ्ट कर जामनगर स्थित वनतारा पहुंचाया गया है। नागालैंड में बाढ़ के तेज पानी में बहने के बाद स्थानीय लोगों और सरकारी एजेंसियों की मदद से उसे बचाया गया था। जॉयमोती के शरीर पर कई गंभीर घाव हैं, उसकी दाहिनी आंख बुरी तरह क्षतिग्रस्त है और पुरानी चोट के कारण पिछले पैर में भी लंगड़ापन है।

 

स्थानीय स्तर पर प्राथमिक उपचार के बावजूद उसकी उम्र, गंभीर चोटों और चलने-फिरने में परेशानी को देखते हुए विशेष अस्पताल में इलाज की जरूरत थी। वनतारा में अब उसकी विस्तृत चिकित्सा जांच के साथ आंख और अन्य चोटों का विशेष उपचार किया जा रहा है। पोषण और दूसरी जरूरी देखभाल भी दी जाएगी।

 

गंभीर रूप से घायल हाथी को अस्पताल में इलाज के लिए विमान से पहुंचाना भारत में अपनी तरह का पहला प्रयास बताया गया है। जॉयमोती को सड़क के लंबे और थकाऊ सफर से बचाने के लिए एयरलिफ्ट किया गया। यात्रा के दौरान उसकी सेहत, आराम और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया।

 

वनतारा ने स्पष्ट किया है कि जॉयमोती को जामनगर लाना स्थायी स्थानांतरण नहीं है। उसे केवल विशेष और जरूरी इलाज के लिए यहां लाया गया है। वनतारा ने असम में हाथियों के लिए एक समर्पित केंद्र समेत तीन वन्यजीव पशु चिकित्सा केंद्र बनाने का प्रस्ताव भी दिया है, ताकि भविष्य में घायल वन्यजीवों को उनके क्षेत्र के करीब ही बेहतर इलाज मिल सके।

सांप के डसने से कोमा में जा रहा था एंबुलेंस ड्राइवर, दोस्तों ने 2 घंटे में मारीं 400 थपकियां; 30 इंजेक्शन भी बेअसर

सांप के डसने से कोमा में जा रहा था एंबुलेंस ड्राइवर, दोस्तों ने 2 घंटे में मारीं 400 थपकियां; 30 इंजेक्शन भी बेअसर

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उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से एक बेहद अजीब और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक एंबुलेंस ड्राइवर को जहरीले सांप ने डस लिया। जहर का असर इतना तेज था कि 30 एंटी-वेनम इंजेक्शन भी बेअसर साबित हुए। ड्राइवर को बेहोशी में जाने से बचाने के लिए उसके साथियों ने दो घंटे तक उसे लगातार करीब 400 थपकियां मारीं।

 

मृतक ओवेंद्र (35 वर्ष), मूल रूप से फर्रुखाबाद जिले के बीरपुर का रहने वाला हैं। वह हरदोई के हरपालपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में एंबुलेंस ड्राइवर है। घटना के समय वह अपने सरकारी क्वार्टर में सा रहा था।

 

कैसे हुआ हादसा?

रात के समय सोते वक्त एक जहरीले सांप ने ओवेंद्र के बाएं हाथ की उंगली पर डस लिया। सांप के काटने का अहसास होते ही उन्होंने तुरंत अपने सहकर्मी प्रदीप को जगाया। प्रदीप उन्हें फौरन सीएचसी लेकर गए, जहाँ प्राथमिक उपचार के बाद वे वापस अपने कमरे पर लौट आए।

 

30 एंटी-वेनम इंजेक्शन भी रहे बेअसर

कमरे पर लौटने के कुछ ही देर बाद ओवेंद्र की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी। उन्हें चक्कर आने लगे, उल्टियां हुईं और सांस लेने में भारी तकलीफ महसूस होने लगी। हालत गंभीर देख साथी उन्हें तुरंत हरदोई मेडिकल कॉलेज ले गए। इमरजेंसी में तैनात डॉक्टरों ने जहर का असर कम करने के लिए उन्हें 30 एंटी-वेनम इंजेक्शन लगाए, लेकिन इसके बावजूद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ।

 

होश में रखने के लिए मारी गईं 400 थपकियां

जहर के असर से ओवेंद्र की आंखें बंद हो रही थीं और वे बेहोशी की तरफ जा रहे थे। डॉक्टरों ने चेतावनी दी थी कि अगर वे सो गए, तो उनकी जान को बड़ा खतरा हो सकता है।

मध्यप्रदेश से कुपोषण का कलंक हटाने के लिए मोहन सरकार का बड़ा कदम, टेक होम राशन व्यवस्था में हुआ बदलाव

मध्यप्रदेश से कुपोषण का कलंक हटाने के लिए मोहन सरकार का बड़ा कदम, टेक होम राशन व्यवस्था में हुआ बदलाव

भोपाल। मध्यप्रदेश के माथे से कुपोषण का कलंक हटाने और टेक होम राशन व्यवस्था में हो रही कथित अनियमितता को देखते हुए मोहन सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार ने प्रदेश में बच्चों, गर्भवती-धात्री माताओं को पूरक पोषण आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था को अधिक प्रभावी और स्थानीय स्तर पर सुदृढ़ किया है। महिला एवं बाल विकास विभाग ने प्रदेश में नई टेक होम राशन (टीएचआर) व्यवस्था लागू की है। इसके तहत स्थानीय स्व-सहायता समूहों के माध्यम से हितग्राहियों को स्थानीय स्तर पर तैयार टीएचआर उपलब्ध कराया जा रहा है।

 

गौरतलब है कि, पूरक पोषण कार्यक्रम के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार पात्र हितग्राहियों को वर्ष में न्यूनतम 300 दिवस पूरक पोषण सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। 3 से 6 वर्ष तक के बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों पर प्रतिदिन नाश्ता एवं गर्म पका भोजन दिया जा रहा है। वहीं 6 माह से 3 वर्ष तक के बच्चों तथा गर्भवती एवं धात्री माताओं के लिए मंगलवार को गर्म पका भोजन तथा शेष दिवसों में टीएचआर उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। नई व्यवस्था का उद्देश्य पोषण आहार की उपलब्धता को स्थानीय स्तर पर और अधिक मजबूत करना है। प्रदेश के सभी आंगनवाड़ी केंद्रों में अगस्त के प्रथम सप्ताह से स्थानीय स्व-सहायता समूहों के माध्यम से तैयार टीएचआर का वितरण प्रारंभ किया जा चुका है। इससे स्थानीय स्तर पर पोषण आहार की उपलब्धता के साथ स्व-सहायता समूहों की भागीदारी भी बढ़ रही है।

 

आंगनवाड़ी केंद्रों पर प्रतिदिन गर्म भोजन की व्यवस्था-3 से 6 वर्ष के बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों पर प्रतिदिन नाश्ता एवं गर्म पका भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही 6 माह से 3 वर्ष तक के बच्चों तथा गर्भवती एवं धात्री माताओं के लिए स्थानीय स्तर पर तैयार टीएचआर उपलब्ध कराया जा रहा है। 6 से 60 माह के अति गंभीर कुपोषित (एसएएम) तथा 6 से 72 माह के अति कम वजन (एसयूडब्ल्यू) बच्चों के लिए अतिरिक्त पोषण आहार के रूप में भी स्थानीय स्तर पर तैयार टीएचआर दिया जा रहा है।

बच्चों की पोषण स्थिति की नियमित निगरानी के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों का वजन एवं लंबाई-ऊंचाई मापकर पोषण ट्रैकर पर दर्ज किया जा रहा है। चिन्हित बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण, पोषण परामर्श और आवश्यक देखभाल के साथ जरूरत के अनुसार स्वास्थ्य विभाग एवं पोषण पुनर्वास केंद्रों से समन्वय कर रेफरल की कार्रवाई की जाती है। हर महीने आयोजित 10 दिवसीय शारीरिक माप दिवसों में जन्म से 6 वर्ष तक के बच्चों की सघन स्क्रीनिंग एवं स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है। चिन्हित एसएएम, एमएएम एवं एसयूडब्ल्यू बच्चों का मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संवर्धन कार्यक्रम में पंजीयन कर आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। मैदानी अमले द्वारा गृहभेंट के माध्यम से बच्चों का नियमित फॉलोअप और परिवारों को पोषण संबंधी परामर्श भी दिया जाता है।

 

विशेष जनजातीय क्षेत्रों में पोषण सेवाओं पर विशेष ध्यान-मध्यप्रदेश के विशेष जनजातीय क्षेत्रों में बच्चों एवं माताओं तक पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री जनजातीय न्याय महाअभियान के अंतर्गत जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से 681 नवीन आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन प्रारंभ किया गया है। सहरिया, बैगा एवं भारिया जैसे विशेष जनजातीय समूहों के क्षेत्रों में आंगनवाड़ी सेवाओं, पूरक पोषण आहार तथा बच्चों की वृद्धि एवं पोषण स्थिति की निगरानी को प्राथमिकता दी जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय कर नियमित स्क्रीनिंग, स्वास्थ्य जांच, रेफरल और फॉलोअप की व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा पोषण सेवाओं को अधिक प्रभावी, स्थानीय और सतत बनाने के लिए नई टीएचआर व्यवस्था लागू की गई है। स्थानीय स्व-सहायता समूहों की भागीदारी से अगस्त के प्रथम सप्ताह से शुरू हुई यह व्यवस्था प्रदेश में बच्चों और माताओं तक पूरक पोषण आहार की पहुंच को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

वंदे मातरम् पर फिर घमासान: 150 साल पुराने गीत में आज का भारत क्या खोज रहा है?

वंदे मातरम् पर फिर घमासान: 150 साल पुराने गीत में आज का भारत क्या खोज रहा है?


बंकिमचंद्र की कविता से स्वतंत्रता संग्राम के उद्घोष तक और 2026 की सियासी बहस तक—‘वंदे मातरम्’ की पूरी कहानी, जिसमें इतिहास भी है, विवाद भी और भारत को समझने का एक बड़ा सवाल भी।

वंदे मातरम्। दो शब्द। डेढ़ सौ साल का इतिहास। और आज फिर एक राजनीतिक विवाद। सवाल सिर्फ गीत का नहीं है। सवाल उस भारत का है, जिसे हम इन दो शब्दों में देखते हैं।

गुलामी का दर्द, आजादी का सपना, स्वदेशी आंदोलन, क्रांतिकारियों का साहस, संविधान सभा की गरिमा और आज की राजनीति की गर्मी—सब कुछ ‘वंदे मातरम्’ के साथ चलता आया है।

150 साल बाद भी अगर ये दो शब्द बहस के केंद्र में हैं, तो यह उनकी कमजोरी नहीं, उनकी ताकत का प्रमाण है। लेकिन कहानी 1875 से थोड़ी पहले शुरू होती है।

जब धरती सिर्फ जमीन नहीं, मां थी

अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त की एक पंक्ति है—
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।

इसे आधुनिक राष्ट्रवाद का प्राचीन प्रमाण मान लेना इतिहास के साथ ज्यादती होगी। उस समय आधुनिक अर्थों वाला राष्ट्र-राज्य था ही नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि भारतीय सभ्यता में धरती को केवल जमीन नहीं, जीवन और मातृत्व से जोड़कर देखने का भाव बहुत पुराना है।

19वीं सदी में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसी सांस्कृतिक भावभूमि को औपनिवेशिक भारत की बेचैनी से जोड़ा और मातृभूमि को ‘मां’ की आवाज दी।

यहीं से ‘वंदे मातरम्’ की आधुनिक यात्रा शुरू होती है।

1875: कविता से राष्ट्रभावना तक

सरकारी अभिलेखों के अनुसार बंकिमचंद्र ने 7 नवंबर 1875 को ‘वंदे मातरम्’ की रचना की। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ’ में शामिल किया गया।

‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है—मां को नमन।

पहले दो अंतरों में यह मां कोई युद्धरत देवी नहीं, बल्कि जल, हरियाली, फसल और शीतल हवा से भरी मातृभूमि है। लेकिन गुलाम भारत में अपनी मातृभूमि को नमन करना सिर्फ कविता कैसे रह सकता था? उसमें राजनीति अपने आप आ गई।

1896 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। इसके बाद यह साहित्य के पन्नों से निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन के मंच पर पहुंच गया।

फिर आया 1905।

1905: जब गीत नारा बन गया

बंगाल विभाजन के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी का समर्थन, जुलूस, सभाएं और विरोध प्रदर्शन।
और हर जगह— वंदे मातरम्।
अब यह कविता नहीं थी।
यह सत्ता को चुनौती थी।

ब्रिटिश सरकार ने इसकी ताकत पहचानी और सार्वजनिक उपयोग को रोकने के प्रयास किए।
1906 में इसी नाम से Bande Mataram नाम का राष्ट्रवादी अंग्रेजी अखबार भी निकला, जिससे श्री अरविंद और बिपिन चंद्र पाल जैसे राष्ट्रवादी जुड़े।
एक गीत का नाम आंदोलन की पहचान बन चुका था।

लेकिन यहीं कहानी में एक जरूरी पेच आता है

‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे मातृभूमि और प्रकृति का वर्णन करते हैं। लेकिन आगे के अंतरों में मातृभूमि को दुर्गा और अन्य हिंदू धार्मिक प्रतीकों से जोड़ा गया है।

यहीं सवाल उठा— क्या एक बहुधार्मिक देश का साझा राष्ट्रीय गीत धार्मिक प्रतीकों से जुड़ा हो सकता है?
यह आज की राजनीति का पैदा किया हुआ सवाल नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही इस पर बहस हुई थी।
1937 में कांग्रेस के भीतर विचार के बाद राष्ट्रीय अवसरों के लिए पहले दो अंतरों को अपनाने की परंपरा बनी। कारण था—इनमें मातृभूमि और प्रकृति का वर्णन था, जबकि बाद के धार्मिक बिंबों को लेकर कुछ समुदायों की आपत्तियां थीं।

इसलिए आज इसे केवल गीत काट दिया गया” कहना इतिहास को बहुत सरल बना देना है।

लेकिन इसके उलट यह कहना भी सही नहीं कि मूल गीत में धार्मिक प्रतीक थे ही नहीं।

थे। बिल्कुल थे।

और शायद ‘वंदे मातरम्’ की सबसे बड़ी ऐतिहासिक सच्चाई यही जटिलता है।

आजादी की रात भी ‘वंदे मातरम्’ था

14 अगस्त 1947। देश आजादी की दहलीज पर था।
संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठक शुरू हुई और सुचेता कृपलानी ने ‘वंदे मातरम्’ गाया।
जिस गीत ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी, वही आजाद भारत के जन्म का साक्षी बना।
15 अगस्त की सुबह पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की आवाज में इसके प्रसारण ने इसे स्वतंत्र भारत की शुरुआती सांस्कृतिक स्मृतियों में दर्ज कर दिया।
इतिहास में इससे खूबसूरत दृश्य कम होंगे—
जिस गीत पर कभी रोक लगाई गई, वही आजाद भारत की पहली सुबह में गूंज रहा था।

1950: राष्ट्रीय गीत, लेकिन राष्ट्रीय गान नहीं

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन’ के समान सम्मान और दर्जा दिया जाएगा।
इसलिए तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है—

जन गण मन — राष्ट्रीय गान।
वंदे मातरम् — राष्ट्रीय गीत।

दोनों प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं और एक दूसरे का विकल्प भी नहीं हैं। दोनों की ऐतिहासिक यात्राएं अलग हैं।
एक स्वतंत्र भारत की संवैधानिक पहचान का गान बना; दूसरा स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक समर्पण की आवाज रहा।

फिर 150 साल बाद विवाद क्यों?

2025-26 में देश ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। इसी दौरान केंद्र ने सरकारी कार्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय गीत के छह अंतरों वाले पूर्ण आधिकारिक संस्करण और उसके प्रस्तुतीकरण को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया।

इसके बाद बहस तेज हुई—

पूरा गीत या पहले दो अंतरे?

भाजपा का तर्क है कि मूल रचना का पूरा सम्मान होना चाहिए।
कांग्रेस ने 1937 की परंपरा का हवाला देते हुए अपने कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे जारी रखने का फैसला किया।
अब बहस सिर्फ गीत की नहीं रही।

राष्ट्रवाद, धर्म, तुष्टीकरण, इतिहास, कांग्रेस, भाजपा—सब एक साथ मैदान में हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले पर तीखा हमला किया और इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कांग्रेस पर इसी तरह के आरोप लगाए।

कांग्रेस का जवाब है—वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वीकार की गई ऐतिहासिक परंपरा का पालन कर रही है।
लेकिन इस पूरी बहस में एक दिलचस्प विडंबना भी सामने आई।

20 अगस्त को भाजपा-शासित नागपुर नगर निगम की बैठक में भी केवल दो अंतरे गाए गए।
अब सवाल और दिलचस्प हो गया—

क्या यह विवाद इतिहास का है, प्रोटोकॉल का है या राजनीति का?

असल विवाद दो अंतरों का नहीं है

मेरी नजर में ‘वंदे मातरम्’ पर मौजूदा विवाद का असली सवाल यह नहीं है कि दो अंतरे गाए जाएं या छह।
बड़ा सवाल यह है—

राष्ट्रवाद की परिभाषा कौन तय करेगा?

एक पक्ष कहता है—मूल रचना का पूरा सम्मान होना चाहिए।
दूसरा कहता है—राष्ट्रीय प्रतीक ऐसा होना चाहिए जिसमें हर भारतीय अपने लिए जगह महसूस करे।
और इतिहास?

इतिहास दोनों से थोड़ा बड़ा है।
क्योंकि सच यह है—
वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का महान राष्ट्रवादी उद्घोष था।
उसके मूल पाठ में धार्मिक प्रतीक भी हैं।
1937 में पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय उपयोग के लिए चुनने का ऐतिहासिक निर्णय भी हुआ था।
1950 में उसे राष्ट्रीय गीत का सम्मान भी मिला।
इनमें से किसी एक तथ्य को मिटाकर हम इतिहास नहीं लिख सकते।

भारत की खूबसूरती शायद इसी जटिलता में है

भारत ने 1950 में जन गण मन और वंदे मातरम्—दोनों को जगह दी।
क्योंकि राष्ट्र केवल भावनाओं से नहीं चलता।
और सिर्फ संविधान से भी नहीं।
राष्ट्र चलता है—
भावना और विवेक के बीच संतुलन से।
‘वंदे मातरम्’ हमें मातृभूमि से प्रेम करना सिखाता है। लेकिन लोकतांत्रिक भारत हमें यह भी सिखाता है कि मातृभूमि में सिर्फ हम नहीं रहते।
हमसे अलग सोचने वाला भी।
हमसे अलग पूजा करने वाला भी।
हमसे असहमत नागरिक भी।
वह भी उतना ही भारत है जितने हम हैं।

150 साल बाद ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ क्या है?

1875 में यह मातृभूमि की कविता थी।
1905 में प्रतिरोध का नारा बनी।
1947 में आजादी की आवाज।
1950 में राष्ट्रीय गीत।
और 2026 में?
शायद यह हमसे एक और कठिन सवाल पूछ रही है।
क्या राष्ट्रप्रेम सिर्फ नारा है?
या जिम्मेदारी भी?
क्या मातृभूमि को प्रणाम करना केवल मंच पर ‘वंदे मातरम्’ कहना है?
या उसकी नदियों, जंगलों, हवा, लोकतंत्र और संस्थाओं की रक्षा करना भी?
क्या देशभक्ति का अर्थ केवल अपने जैसे लोगों से प्रेम करना है?
या अपने से अलग नागरिक के अधिकार और सम्मान की रक्षा करना भी?
यहीं ‘वंदे मातरम्’ एक पुराने गीत से निकलकर आज के भारत का सवाल बन जाता है।

मां को नमन करना आसान है

डेढ़ सौ साल पहले ‘वंदे मातरम्’ गुलाम भारत के लिए स्वाधीनता का सपना था।
आज स्वतंत्र भारत में वही दो शब्द शायद हमें स्वतंत्रता की जिम्मेदारी याद दिला सकते हैं।
क्योंकि मातृभूमि को नमन केवल उसके नाम का उद्घोष करना नहीं है।
मातृभूमि को नमन उसके लोकतंत्र, उसकी विविधता, उसकी गरिमा और उसके हर नागरिक के सम्मान की रक्षा करना भी है।

आखिर—
मां को नमन करना आसान है।

मां के हर बच्चे को अपना मानना—शायद कहीं अधिक कठिन।

और अगर ‘वंदे मातरम्’ हमें यह कठिन काम सिखा दे, तो 150 साल बाद भी इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
क्योंकि 150 साल बाद भी ‘वंदे मातरम्’ हमसे यही पूछता है—जिस भारत को हम मां कहते हैं, उसके लिए हम कर क्या रहे हैं?
वंदे मातरम्।

कटनी CSP नेहा पच्चीसिया पर गिरी गाज, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिए तत्काल निलंबन के निर्देश

कटनी CSP नेहा पच्चीसिया पर गिरी गाज, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिए तत्काल निलंबन के निर्देश

भोपाल। जमीन खरीद विवाद में फंसी कटनी की सीएसपी नेहा पच्चीसिया के खिलाफ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बड़ा एक्शन लिया है। मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को संबंधित सीएसपी के विरुद्ध तत्काल निलंबन की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने की बात कही है।

 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के माध्यम से कहा कि कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही, दबाव अथवा पद के दुरुपयोग को कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि शासन कानून व्यवस्था के मामले में पूरी गंभीरता और पारदर्शिता के साथ कार्रवाई करेगा।

 

दरअसल, कटनी की सीएसपी नेहा पच्चीसिया का नाम एक जमीन से जुड़े विवाद में सामने आया है। आरोप है कि एक करोड़ रुपये से अधिक कीमत की जमीन को दबाव बनाकर करीब 18 लाख रुपये में खरीदा गया। मामले को लेकर शिकायत के बाद पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की है।

प्रकरण सामने आने के बाद पुलिस अधिकारी की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद संबंधित अधिकारी के खिलाफ निलंबन की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। सरकार की ओर से यह संदेश भी दिया गया है कि कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों में किसी भी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा पद का प्रभाव इस्तेमाल करने अथवा नियमों की अनदेखी करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी, ताकि वास्तविक तथ्यों का पता लगाया जा सके। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। सरकार के इस रुख के बाद कटनी जमीन विवाद का मामला प्रदेश स्तर पर चर्चा में आ गया है। अब जांच की रिपोर्ट और आगे होने वाली कार्रवाई पर सभी की नजरें रहेंगी।

 

वंदे मातरम पर राष्ट्रवाद की सियासत!, किसका फायदा, किसका नुकसान?

वंदे मातरम पर राष्ट्रवाद की सियासत!, किसका फायदा, किसका नुकसान?

भारतीय जनता पार्टी के वंदे मातरम पर देश में सियासी घमासान मचा हुआ है। कांग्रेस के वंदे मातरम के केवल एक अंतरे (दो पद) को पार्टी के कार्यक्रमों के गाने के फैसले को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के तीखे हमले के बाद इस पर सियासी बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले  रही है। कांग्रेस ने वंदे मातरम को लेकर यह फ़ैसला ऐसे समय किया जब स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में भाजपा ने सोनिया गांधी पर वंदे मातरम का अपमान करने का आरोप लगाया था। 
 
कांग्रेस वर्किंग कमेटी में वंदे मातरम के गाने के फैसले पर गृहमंत्री अमित शाह की आपत्ति पर  कांग्रेस ने भाजपा पर पलटवार करते हुए दिखावटी राष्ट्रवाद का आरोप लगाया। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए वंदे मातरम के मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहे है।
 
वंदे मातरम पर विवाद की शुरुआत कैसे?- वंदे मातरम पर नए विवाद पर स्वतंत्रता दिवस पर नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम मे वंदे मातरम के गायन के दौरान सोनिया गांधी के व्यवहार को लेकर हुई। भाजपा ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने वंदे मातरम को बीच में रोकने की कोशिश की। इसके बाद बुधवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के नेताओं ने वंदे मातरम के गायन का मुद्दा उठाया था।
 
बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के दो पद गाने की बात कही। इसके लिए खरगे ने  28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से पारित प्रस्ताव का हवाला दिया।
 
दरअसल 1937 में कोलकाता मे हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में वंदेमातम को लेकर चर्चा हुई और एक प्रस्ताव तैयार किया गया। इस प्रस्ताव को तैयार करने में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद, गोविंद बल्लभ पंत और आचार्य नरेंद्र देव जैसे नेताओं की भूमिका थी। यह प्रस्ताव गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर तैयार किया गया था।
 
25 जनवरी 1950 को संविधान सभा की आखिरी बैठक में संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि ‘जन गण मन’ देश का राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत होगा। उन्होंने कहा कि ‘जन गण मन’ में भी पांच में से केवल एक अंतरे को राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया गया है।
 
अमित शाह ने कांग्रेस की तुष्टिकरण की सियासत से जोड़ा- कांग्रेस कार्यसमिति में वंदेमातरम पर हुए इस फैसले को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस की तुष्टिकरण की सियासत से जोड़ दिया। मीडिया एजेंसी से चर्चा करते हुए अमित शाह ने कहा कि “कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति ने एक आश्चर्यजनक और देशविरोधी फैसला लिया है। उन्होंने अपनी पार्टी के 1937 के रिजोल्यूशन को फॉलो करते हुए महान वंदे मातरम् गीत के दो ही छंद गाने का फैसला लिया है”।
 
अमित शाह ने आगे कहा कि “मैं पूरे देश को याद दिलाना चाहता हूं, 1937 में कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए वंदे मातरम् के दो टुकड़े कर देश के विभाजन की नींव डाली थी और वहीं से द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को ताकत मिली थी। अंततोगत्वा देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। आज जब उस ऐतिहासिक गलती को वंदे मातरम् गीत के प्राकट्य के 150वें साल में सुधार कर बंकिम बाबू की इस अमर कृति को पूरा गीत गाकर राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने का प्रयास किया गया है, और सभी सरकारी कार्यक्रमों में इसे पूर्ण रूप से गाने का निर्णय किया गया है और इस निर्णय को कानूनी जामा भी पहनाया गया है। इसी की अवहेलना करने का निर्णय कांग्रेस ने कल किया है”।

अमित शाह ने आगे कहा कि “कांग्रेस का यह निर्णय केवल और केवल इनकी घोर तुष्टिकरण की नीति की पुष्टि करता है। वोट बैंक के लिए इन्होंने न सिर्फ बंकिम बाबू की इस अमर कृति का अपमान किया, बल्कि उन लाखों शहीदों का भी अपमान किया, जो वंदे मातरम् का नारा लगाते हुए देश की आजादी के लिए फांसी पर चढ़ गए।  आज कांग्रेस पार्टी 1937 के अपनी पार्टी के रिजोल्यूशन को मान रही है और पार्लियामेंट के एक्ट को नकार रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी फिर एक बार तुष्टिकरण की राजनीति को पुरजोर तरीके से आगे बढ़ा रही है”।
 
वहीं केंद्रीय शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के खिलाफ तीखा राजनीतिक प्रहार करते हुए कहा कि वंदे मातरम को अधूरा गाने का फैसला देश की भावना और राष्ट्रगीत का अपमान है। उन्होंने कहा  कि यह किसी पार्टी का नहीं बल्कि भारत माता के सम्मान का प्रश्न है। शिवराज सिंह ने कहा कि जो गीत स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा रहा, उसे पूरा गाना हर भारतीय का कर्तव्य है। उन्होंने कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि कुछ दल देश की एकता और संस्कृति से जुड़े प्रतीकों को भी राजनीतिक लाभ के लिए तोड़-मरोड़ देते हैं।
 
कांग्रेस का भाजपा पर पलटवार-भाजपा के वंदे मातरम के मुद्दें को राजनीतिक तूल देने पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्रनाथ टैगोर को लेकर एक अलग राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यह मुद्दे का राजनीतिकरण है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके जरिए जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों और सरकार की कथित नाकामियों से ध्यान भटकाने की कोशिश हो रही है, जिसमें छात्रों से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं।
 
कांग्रेस के कानूनी प्रकोष्ठ के प्रमुख और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पूरे विवाद में कानूनी पहलू सामने रखा है। कानून को उसकी मौजूदा स्थिति के हिसाब से देखा जाना चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक और निजी कार्यक्रमों के बीच अंतर बताया। सिंघवी के मुताबिक मौजूदा कानून सरकारी आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के गायन से जुड़ी बात करता है। पार्टी के आंतरिक कार्यक्रमों के बारे में उसमें वैसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। यही तर्क कांग्रेस के उस फैसले को समझने की कोशिश में अहम हो जाता है, जिस पर अब पार्टी के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आ रही है।

भूपेंद्र पटेल की वर्ल्ड बैंक संग बड़ी बैठक, GIFT City से AI तक पर चर्चा; वॉलमार्ट के साथ MSME को वैश्विक बाजार से जोड़ने पर मंथन

भूपेंद्र पटेल की वर्ल्ड बैंक संग बड़ी बैठक, GIFT City से AI तक पर चर्चा; वॉलमार्ट के साथ MSME को वैश्विक बाजार से जोड़ने पर मंथन

bhupendra patel in washington DC

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने वाशिंगटन डी.सी. में वर्ल्ड बैंक के प्रतिनिधियों के साथ राउंड टेबल बैठक की। बैठक में गुजरात के वित्तीय प्रबंधन, आर्थिक विकास, GIFT City और सरकारी सेवाओं में AI व आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर चर्चा हुई। वहीं वॉलमार्ट के साथ MSME सेक्टर और स्थानीय उत्पादों को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने पर भी मंथन हुआ।

 

विकसित गुजरात के विज़न की प्रस्तुति

इस राउंड टेबल बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने वैश्विक मंच पर गुजरात का समग्र विज़न सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। उन्होंने राज्य में बनाए रखे गए वित्तीय अनुशासन, टिकाऊ आर्थिक विकास और भविष्य के मॉडल स्टेट के रूप में गुजरात की योजना के बारे में विस्तृत जानकारी दी। वर्ल्ड बैंक के प्रतिनिधियों ने भी गुजरात के आर्थिक मॉडल और टेक्नोलॉजी आधारित सुशासन के प्रयासों की सराहना की।

 

वॉलमार्ट के साथ MSME सेक्टर के विकास पर मंथन

अपनी यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने वॉलमार्ट के ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी एंड गवर्नमेंट अफेयर्स के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट डैन ब्रायंट के साथ एक फलदायी वन-टू-वन बैठक की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य गुजरात के विशाल MSME सेक्टर, स्थानीय उत्पादकों और छोटे कारीगरों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई चेन से जोड़ना था। इस उच्च स्तरीय चर्चा मंउ उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और वैश्विक बाजार में स्थानीय कारीगरों को नए अवसर प्रदान करने पर जोर दिया गया।

जयपुर में CJP के स्कूल दौरे पर बवाल, ग्रामीणों ने कार्यकर्ताओं को गांव से निकाला; क्या बोले आशुतोष रांका?

जयपुर में CJP के स्कूल दौरे पर बवाल, ग्रामीणों ने कार्यकर्ताओं को गांव से निकाला; क्या बोले आशुतोष रांका?

protest of cjp workers in jaipur

राजस्थान में जयपुर के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में कॉकरोच जनता पार्टी के स्कूल दौरे का ग्रामीणों ने विरोध किया और कार्यकर्ताओं को बाहर निकाल दिया। CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका ने इसे भाजपा प्रायोजित विरोध बताते हुए मारपीट का आरोप लगाते हुए स्कूल की बदहाली पर सवाल उठाए।

 

दरअसल, CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका इसी स्कूल में पहुंचने वाले थे, लेकिन इससे पहले ग्रामीणों ने सीजेपी के कार्यकर्ताओं को धक्का देकर गांव से बाहर निकाल दिया। इसके बाद ग्रामीण सीजेपी के विरोध में स्कूल के बाहर धरना पर बैठ गए हैं।

बच्चों को भैंसों में तबेले में चल रहा है स्कूल

आशुतोष रांका ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, 'यह वहां के गांव वाले नहीं भाजपा के बुलाये हुए गुंडे है। इनका सरगना कमल प्रधान वहां गरीब लोगों की जमीन पर कब्जे का काम करता है। बच्चों को भैंसों में तबेले में पढ़ाया जा रहा है, और यह रोकने पर भाजपा अपने गुंडे भेज रही है क्या शर्मनाक स्थिति है।'

 

उन्होंने दावा किया कि रामपुरा, कंवरपुरा स्थित सरकारी स्कूल पिछले कई सालों से भैंसों के तबेले में चल रहा है। मैं अभी वही पहुंच रहा हूं। लेकिन हमारी टीम के कुछ साथी जो वहां पहुचे हुए थे, उनकी टीम के साथियों के साथ भाजपा के गुंडों ने मारपीट की। भाजपा को हमारे बच्चे भैंसों के तबेले में पढ़ते रहे, यह मंजूर है, लेकिन इन स्कूलों को अगर हम ठीक करवाने की कोशिश करें यह मंजूर नहीं है।

कुर्ला में अचानक घरों पर गिरी भारी क्रेन, 4-5 मकान क्षतिग्रस्त; 10 से ज्यादा लोग घायल

कुर्ला में अचानक घरों पर गिरी भारी क्रेन, 4-5 मकान क्षतिग्रस्त; 10 से ज्यादा लोग घायल

kurla crane collapse

Kurla Crane Collapse: मुंबई के कुर्ला में शुक्रवार सुबह तोड़-फोड़ के काम के दौरान एक भारी-भरकम क्रेन पास के घरों और रेलवे के ओवरहेड तारों पर गिर गई। इससे 4-5 घरों को नुकसान पहुंचा और कई लोग घायल हो गए। हादसे के बाद इलाके में हड़कंप मच गया। फिलहाल राहत और बचाव कार्य जारी है। ALSO READ: केन-बेतवा लिंक परियोजना: अफवाहों का गुबार बनाम जमीनी हकीकत, जानिए दावों के पीछे का सच

 

कुर्ला में शुक्रवार की सुबह कुरैशी नगर के पास यह हादसा तब हुआ जब ऑपरेशन के लिए पोकलेन मशीन का इस्तेमाल करके क्रेन लगाई जा रही थी। घरों पर क्रेन गिरने से हड़कंप मच गया।

क्रेन गिरने की आवाज सुनकर स्थानीय लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और आसपास के क्षेत्रों को खाली कराया। इस हादसे में 10 से ज्यादा लोग घायल हो गए। बताया जा रहा है कि घायलों की हालत स्थिर है।

ट्रेन की आवाजाही पर कोई असर नहीं

मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MMRDA) की एक क्रेन पास की वर्क साइट से कुर्ला और ट्रॉम्बे के बीच ओवरहेड इक्विपमेंट (OHE) पर गिर गई। इस हादसे के कारण ट्रेन की आवाजाही पर कोई असर नहीं पड़ा है।