नोएडा की तर्ज पर यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे बसेगा न्यू आगरा, यहां 14 लाख में मिलेगा घर! प्रॉपर्टी को रॉकेट बना देगी YEIDA की ये तैयारी

ऐतिहासिक शहर आगरा में भीड़भाड़ को कम करने और इसके टूरिज्म के साथ इंडस्ट्रियल स्कोप को और मजबूत करने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू हो गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के किनारे दो बड़ी आवासीय परियोजनाएं न्यू आगरा और ग्रेटर आगरा विकसित की जा रही हैं। आधुनिक आवासीय कॉलोनियों और बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस इन शहरों को लाखों लोगों के रहने के लिए तैयार किया जा रहा है। यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे बसने वाले इस नए शहर को न्यू आगरा अर्बन सेंटरनाम दिया गया है। यह पूरी टाउनशिप ग्रेटर नोएडा और आगरा के बीच, आगरा जिले की सीमाओं के भीतर वहां विकसित की जाएगी जहां यमुना एक्सप्रेसवे समाप्त होता है।

नोएडा से आधा होगा आकार, 44 गांवों की जमीन चिन्हित

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए आगरा जिले के 44 गांवों में फैली लगभग 14480 हेक्टेयर भूमि की पहचान की गई है। इस लिहाज से यह आगामी नया शहर आकार में नोएडा का करीब आधा होगा। यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) को अपने मास्टर प्लान 2041 के एक मुख्य हिस्से के रूप में इस नए शहर को डिजाइन और विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के फॉर्मूले को अपनाते हुए न्यू आगरा को भी तीन अलग-अलग जोन में बांटा जाएगा।

14 लाख घर और पर्यावरण अनुकूल उद्योग

इस टाउनशिप में करीब 1.4 मिलियन (14 लाख) लोगों के रहने के लिए नागरिक बुनियादी ढांचा तैयार किया जाएगा। यहां करीब 14 लाख घर बनाने का प्रस्ताव है। इनमें से कुछ घरों की कीमत लगभग 14 लाख रुपये के आसपास होगी। यह पूरा क्षेत्र ताजमहल के पास ताज ट्रेपेजियम जोन में आता है इसलिए योजना प्रक्रिया में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का विशेष ध्यान रखा गया है। न्यू आगरा इंडस्ट्रियल एरिया में केवल गैर-प्रदूषणकारी और सॉफ्ट उद्योगों जैसे कि इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और टेक्सटाइल इंडस्ट्री चलाने की ही इजाजत मिलेगी।

पर्यटन हब और 10 लाख नौकरियों के अवसर

क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इस नए शहर में एक विशाल थीम पार्क, मनोरंजन क्षेत्र और बजट होटलों के साथ-साथ लग्जरी फाइव-स्टार और सेवन-स्टार प्रॉपर्टीज तैयार की जाएंगी। बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश, लॉजिस्टिक्स सुविधाओं और एक समर्पित टूरिज्म हब की बदौलत इस शहर में करीब 10 लाख नौकरियां पैदा होने की उम्मीद है।

कनेक्टिविटी का दमदार जाल: नमो भारत और मल्टीमॉडल कार्गो

कनेक्टिविटी को इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी ताकत के रूप में पेश किया गया है। न्यू आगरा शहर जेवर में बन रहे नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर होगा। जेवर एयरपोर्ट को आगरा से जोड़ने के लिए एक नमो भारत रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम कॉरिडोर का भी प्रस्ताव है। इससे यात्रियों के यात्रा समय में भारी कटौती होगी। माल ढुलाई को आसान बनाने के लिए टूंडला जंक्शन के पास स्थित फ्रेट कॉरिडोर टर्मिनल को रेल लिंक के जरिए न्यू आगरा से जोड़ा जाएगा। इसके अलावा यहां एक इंटीग्रेटेड रेल-रोड-एयर फ्रेट सुविधा विकसित की जाएगी। इसे मल्टीमॉडल कार्गो टर्मिनल कहा गया है।

ग्रेटर आगरा प्रोजेक्ट पर भी काम तेज, 29 जून से बुकिंग

न्यू आगरा के साथ-साथ आगरा विकास प्राधिकरण आगरा शहर के भीतर ही रायपुर और रहनकलां में 449 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रेटर आगरा नाम से एक अलग टाउनशिप क्लस्टर डेवलप कर रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत 10 छोटी टाउनशिप स्थापित की जा रही हैं। इनमें गंगापुरम और यमुनापुरम जैसी टाउनशिप शामिल हैं। इस परियोजना में करीब 30000 परिवारों को आवासीय प्लॉट मिलेंगे।

आगरा विकास प्राधिकरण के अनुसार ग्रेटर आगरा परियोजना के तहत गंगापुरम और नर्मदापुरम टाउनशिप में प्लॉट्स के लिए बुकिंग 29 जुलाई तक जारी रहेगी। इसके लिए जनहित पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। ग्रेटर आगरा को शहर के इनर रिंग रोड के साथ रहनकलां और रायपुर महुआ खेड़ा गांवों के पास बनाया जा रहा है। यमुना एक्सप्रेसवे और लखनऊ एक्सप्रेसवे दोनों के एंट्री पॉइंट्स के करीब होने के कारण यहां से दिल्ली, नोएडा और लखनऊ की यात्रा काफी आसान हो जाएगी।

देश की पहली अंडरग्राउंड केबलिंग और वर्ल्ड क्लास सुविधाएं

ग्रेटर आगरा को एक स्मार्ट सिटी डिजाइन के तहत 10 सेक्टरों में बांटा गया है। यह आगरा का पहला ऐसा क्षेत्र होगा जहां अंडरग्राउंड केबलिंग के साथ-साथ 24 घंटे पावर और वॉटर बैकअप मिलेगा। टाउनशिप के भीतर मुख्य सड़कें 45 से 60 मीटर चौड़ी होंगी। अंदर की सड़कें कम से कम 9 से 12 मीटर की होंगी। ग्रेटर आगरा में एक वर्ल्ड-क्लास स्पोर्ट्स एकेडमी, एक बड़ा क्रिकेट स्टेडियम, एक सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, इंटरनेशनल स्कूल और यूनिवर्सिटी कैंपस भी होंगे। शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, कॉर्पोरेट ऑफिस और फाइव-स्टार होटलों के लिए बड़े कमर्शियल प्लॉट रखे गए हैं। सस्टेनेबल प्लानिंग के तहत टाउनशिप के कुल क्षेत्र का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा पार्कों और ग्रीन बेल्ट के लिए आरक्षित किया गया है।

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बुलेट ट्रेन को लेकर भारत-जापान की बड़ी डील! 2027 की टाइमलाइन और 7000 किमी नेटवर्क पर काम अब दौड़ेगा

भारत में बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर एक बहुत बड़ा अपडेट सामने आया है। मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर कोलैबरेशन को बड़ा पुश देते हुए जापान ने मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) परियोजना के प्राथमिकता वाले सेक्शन पर साल 2027 तक कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने के भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए हर संभव सहयोग देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी पीएम साने ताकाइची के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के बाद विदेश मंत्रालय ने इसे लेकर जॉइंट स्टेटमेंट जारी किया है। इसके मुताबिक यह फ्लैगशिप बुलेट ट्रेन परियोजना दोनों नेताओं के बीच एक व्यापक संयुक्त समझौते का मुख्य आधार है। दोनों प्रधानमंत्रियों ने इस नेटवर्क में E10 ट्रेनों को शामिल करने के मील के पत्थर जैसे लक्ष्य को भी स्वीकार किया।

7000 किलोमीटर के नेशनल नेटवर्क के लिए पीएम मोदी का न्यौता

भारत में बुलेट ट्रेन नेटवर्क के भविष्य के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापानी कंपनियों को भारत के भावी हाई-स्पीड कॉरिडोर में भागीदारी के अवसर तलाशने के लिए स्पष्ट रूप से आमंत्रित किया है। इसका उद्देश्य 7000 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेल नेटवर्क के भारत के व्यापक विज़न को हकीकत में बदलना है। इस ट्रांजिट अलाइनमेंट को आगे बढ़ाने के लिए दोनों देशों के बीच नेक्स्ट-जेनरेशन मोबिलिटी पार्टनरशिप पर एक एमओयू साइन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य जापान की हाइटेक मोबिलिटी तकनीकों को भारत की बाजार क्षमता और मानव संसाधनों के साथ जोड़ना है।

शिंकेन्सन तकनीक से बदल जाएगी भारतीय रेलवे की तस्वीर

मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण के प्रयासों में एक बड़ा मील का पत्थर है। देश के पहले हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के रूप में यह इंटर सिटी मोबिलिटी को पूरी तरह से बदलने और घरेलू रेलवे क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में तेजी से पूरी की जा रही है। यह पूरा कॉरिडोर जापान की प्रसिद्ध शिंकेन्सन तकनीक और परिचालन मानकों का उपयोग करके डेवलप कियाजा रहा है। इसमें ट्रैक्शन, इलेक्ट्रिफिकेशन, ट्रैक इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑपरेशन्स के लिए हाइटेक टेक्नोलॉजी को शामिल किया गया है।

भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र का रणनीतिक विकास

रेलवे के बुनियादी ढांचे से आगे बढ़कर दोनों नेताओं ने ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत एक लचीले भारत-प्रशांत क्षेत्र के निर्माण के लिए भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के रणनीतिक महत्व पर विशेष जोर दिया है। जापान ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में सड़क नेटवर्क, पुलों और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए मजबूत समर्थन का संकल्प लिया। दोनों देशों ने इस क्षेत्र को बंगाल की खाड़ी और बिम्सटेक भागीदारों से जोड़ने वाली औद्योगिक मूल्य श्रृंखलाओं को विकसित करने की भी प्रतिबद्धता जताई।

इन 4 बड़े प्रोजेक्ट्स पर भी हो रही है तेज प्रगति

दोनों देशों के बीच सामाजिक-आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए जापानी विकास सहायता से जुड़े चार अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स पर भी लगातार प्रगति हो रही है:

  • मुंबई मेट्रो लाइन 11
  • बेंगलुरु मेट्रो फेज 3
  • महाराष्ट्र में स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा का बुनियादी ढांचा
  • पंजाब में सस्टेनेबल हॉर्टिकल्चर
  • पर्यटन, संस्कृति और जापानी भाषा को बढ़ावा

इन आर्थिक और ढांचागत समझौतों को मजबूती देने के लिए दोनों देश लोगों के बीच आपसी संपर्क और प्रतिभाओं के आदान-प्रदान को बढ़ा रहे हैं। दोनों प्रधानमंत्रियों ने इस बात का स्वागत किया कि साल 2025 में दोनों देशों के बीच आने-जाने वाले पर्यटकों की संख्या 540000 को पार कर गई है। उन्होंने द्विपक्षीय पर्यटन को बढ़ावा देने और कांसुलर मामलों पर बातचीत का विस्तार करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

भारत में निहंगो पार्टनर्स कार्यक्रम के माध्यम से जापानी भाषा की शिक्षा को बढ़ावा देने पर सहमति बनी। साथ ही युवाओं के बीच सांस्कृतिक संबंधों को गहरा करने में एनिमे, मंगा, गेमिंग और फिल्मों जैसे रचनात्मक उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया।

भारत के राज्यों और जापानी प्रांतों के बीच दोस्ती का नया नेटवर्क

इस रिश्ते को जमीनी स्तर पर और ठोस बनाने के लिए सब-नेशनल डिप्लोमेसी का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। दोनों प्रधानमंत्रियों ने स्थानीय आर्थिक नेटवर्क बनाने में भारतीय राज्यों और जापानी प्रान्तों और नगर पालिकाओं द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया। इसी कड़ी में दोनों देशों के बीच इंडिया-जापान गवर्नर्स नेटवर्क फॉर फ्रेंडशिप एंड एक्सचेंज की स्थापना का स्वागत किया गया। वर्तमान में इन क्षेत्रीय जोड़ियों के बीच उच्च स्तरीय सहयोग सक्रिय है-

  • उत्तर प्रदेश और यामानाशी प्रान्त
  • आंध्र प्रदेश और टोयामा प्रान्त
  • गुजरात और शिज़ुओका प्रान्त
  • अहमदाबाद और हमामात्सू शहर
  • महाराष्ट्र और वाकायामा प्रान्त
  • केरल और सैन’इन क्षेत्र
  • तमिलनाडु और एहिमे प्रान्त
  • दिल्ली और फुकुओका प्रान्त
  • तेलंगाना और किताक्युशु शहर

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जापानी कंपनियों को भारत के गांवों तक लेकर आएंगे श्रीधर वेम्बु! इसके लिए वो पहुंच रहे जापान और उनका ये है प्लान

Sridhar Vembu: जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक और सीईओ श्रीधर वेम्बु ने एक बड़ी योजना का ऐलान किया है। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वेम्बु जापान की यात्रा पर जा रहे हैं। उनका मकसद जापान की छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी तलाशना है। इस अनूठी पहल का उद्देश्य जापान की इन कंपनियों को भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों से जोड़ना है ताकि देश के गांवों में कारीगरी व शिल्प कौशल की संस्कृति को फिर से जीवित किया जा सके।

गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट शेयर करते हुए श्रीधर वेम्बु ने अपने इस पूरे एजेंडे की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह जापान के छोटे शहरों में स्थित व्यवसायों के साथ काम करना चाहते हैं और उनकी विशेषज्ञता को भारत के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचाना चाहते हैं। वेम्बु ने लिखा कि मैं कल जापान जा रहा हूं। एजेंडा जापान के छोटे शहरों की छोटी से मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी करना और उन्हें भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लाना है।

शिल्प कौशल और कारीगरी को पुनर्जीवित करने पर फोकस

श्रीधर वेम्बु की मुताबिक इस पहल की जड़ें पारंपरिक शिल्प कौशल को फिर से बहाल करने की इच्छा से जुड़ी हैं। इसे उन्होंने तमिल शब्द आसारी (Aasaari) और संस्कृत शब्द विश्वकर्मा (Vishwakarma) के जरिए भी अपने विजन को समझाने की कोशिश की है।

उन्होंने कहा कि जापान की कई छोटी कंपनियां आज भी इन मूल्यों को संजोए हुए हैं। इन कंपनियों ने प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और अन्य अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले क्षेत्रों में विश्व स्तरीय क्षमताएं विकसित की हैं। वेम्बु ने कहा कि जापानी लोग उन क्षेत्रों में वैश्विक लीडर हैं जिनमें जटिल और बारीक शिल्प कौशल की आवश्यकता होती है।

पुराने दोस्त ब्रिट्टो-सान से मिली इस मिशन की प्रेरणा

वेम्बु ने बताया कि इस पूरे मिशन में उन्हें उनके एक पुराने मित्र ब्रिट्टो से मार्गदर्शन मिल रहा है। मूल रूप से मदुरै के रहने वाले ब्रिट्टो ने जापान में कई दशक बिताए हैं और वहां की व्यावसायिक संस्कृति की उन्हें गहरी समझ है। ब्रिट्टो ने बाद में ताकुमी मोशन कंट्रोल्स की स्थापना की थी। जोहो के संस्थापक ने रेखांकित किया कि जापानी शब्द ताकुमी का अर्थ शिल्पकार होता है। ये जो जापानी विनिर्माण परंपराओं के प्रति उनके साझा सम्मान को दर्शाता है। वेम्बु ने लिखा कि जापानी शिल्प कौशल के प्रति हमारे आदर और प्रशंसा ने ब्रिट्टो-सान और मुझे एक साथ जोड़ा। अब यह हमारे लिए एक मिशन बन गया है।

वेम्बु के रूरल-फर्स्ट विजन से मेल खाती है यह पहल

यह घोषणा ग्रामीण विकास और विकेंद्रीकरण पर वेम्बु के लंबे समय से चले आ रहे फोकस के बिल्कुल अनुकूल है। वे पिछले कई वर्षों से लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि विश्व स्तरीय तकनीक और नवाचार का निर्माण बड़े महानगरों से बाहर भी किया जा सकता है। इसी सोच के तहत जोहो छोटे शहरों और गांवों में अपने परिचालन और प्रशिक्षण पहलों का विस्तार कर रही है।

यह जापान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब कुछ ही दिन पहले वेम्बु ने बताया था कि जोहो के रेवेन्यू का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा भारत के बाहर से आता है। भारतीय सरकार से उन्हें सिर्फ 2 प्रतिशत रेवेन्यू मिलता है। जोहो की वैश्विक स्तर पर बड़ी मौजूदगी है। इसके कार्यालय जापान, अमेरिका, नीदरलैंड, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में हैं।

ग्रामीण भारत के विकास के लिए पहले भी किए हैं बड़े प्रयास

जोहो प्रमुख का यह ताजा जापान मिशन उनके उस ग्रामीण-विकास दर्शन का हिस्सा है जिसकी वे एक दशक से अधिक समय से वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के गांवों और छोटे शहरों में अपार प्रतिभा छिपी है, और यदि उन्हें अवसर व इंफ्रास्ट्रक्चर मिले तो वे नवाचार, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग के बड़े केंद्र बन सकते हैं।

तेनकासी का सफल मॉडल

इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए जोहो ने 2011 में ग्रामीण तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक गांव मथलमपराई में एक टेक्नोलॉजी सेंटर शुरू किया था। उद्योग की इस धारणा को तोड़ते हुए कि हाई-एंड सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल बड़े शहरों में हो सकता है, यह सेंटर आज एक बड़े रूरल टेक इकोसिस्टम में बदल चुका है। यहां सैकड़ों स्थानीय पेशेवर काम करते हैं। चेन्नई जैसे बड़े शहरों में नौकरियों के अत्यधिक संकेंद्रण को रोकने के लिए वेम्बु ने जानबूझकर ग्रामीण क्षेत्रों का रुख किया। इसके तहत तिरुनेलवेली, मदुरै और कुंभकोणम क्षेत्रों सहित पूरे तमिलनाडु में अतिरिक्त ग्रामीण परिसर और सैटेलाइट कार्यालय स्थापित किए गए हैं।

स्थानीय स्टार्टअप्स में निवेश

महानगरों से बाहर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने ड्रोन स्टार्टअप याली एयरोस्पेस और पावर-टूल्स वेंचर करुवी जैसे स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी उपक्रमों में भी निवेश किया है।

गांवों की तरफ रिवर्स माइग्रेशन की अपील

श्रीधर वेम्बु ने हाल ही में गांवों की ओर रिवर्स माइग्रेशन का आह्वान किया है। उनका तर्क है कि दशकों से बड़े शहरों की ओर हो रहे पलायन ने ग्रामीण समुदायों से प्रतिभाओं को पूरी तरह निचोड़ लिया है। वेम्बु के मुताबिक, ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए लोगों के निवास स्थान के करीब ही रोजगार, उद्यमिता और दीर्घकालिक निवेश लाने की सख्त जरूरत है।

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Bullet Train: बुलेट ट्रेन चलाने में भारत का पूरा सहयोग करेगा जापान, प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने दिया भरोसा

Bullet Train: जापान ने एक बार फिर भारत के मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (बुलेट ट्रेन) प्रोजेक्ट को पूरा समर्थन देने का भरोसा दिया है। जापान ने कहा कि वह 2027 तक प्रोजेक्ट के प्राथमिक हिस्सों पर कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने के भारत के लक्ष्य को हासिल करने में पूरा सहयोग करेगा।

यह घोषणा भारत-जापान की 16वीं वार्षिक शिखर बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में की गई। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने दोनों देशों के बीच चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की समीक्षा की।

2027 के लक्ष्य को मिला जापान का समर्थन

संयुक्त बयान के मुताबिक, जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने कहा कि उनकी सरकार भारत के 2027 तक मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन के प्राथमिक हिस्से पर कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने के लक्ष्य को पूरी तरह समझती है। इसे पूरा करने के लिए जापान हर जरूरी सहयोग देता रहेगा।

E10 Shinkansen ट्रेन भी चलेगी

दोनों देशों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि इस कॉरिडोर पर अगली पीढ़ी की E10 Shinkansen बुलेट ट्रेनें शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे भारत-जापान के बीच लंबे समय से चल रही हाई-स्पीड रेल साझेदारी को और मजबूती मिलेगी।

7,000 किमी हाई-स्पीड रेल नेटवर्क

मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर के अलावा भारत और जापान ने भविष्य की दूसरी हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट पर भी साथ काम करने पर सहमति जताई।

भारत देशभर में करीब 7,000 किलोमीटर लंबा हाई-स्पीड रेल नेटवर्क डेवलप करना चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी ने जापानी कंपनियों को इन नए कॉरिडोर के विकास में भाग लेने का न्योता भी दिया। जापान ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया।

निजी निवेश और नई मोबिलिटी पर फोकस

दोनों देशों ने हाई-स्पीड रेल और अन्य आधुनिक परिवहन परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर भी सहमति जताई। मकसद जापान की एडवांस ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी को भारत के कुशल ह्यूमन रिसोर्स और बड़े बाजार के साथ जोड़ना है।

इसके अलावा नेक्स्ट-जेनरेशन मोबिलिटी पार्टनरशिप पर एक Memorandum of Cooperation (MoC) पर हस्ताक्षर का भी स्वागत किया गया। इसका मकसद भविष्य की मोबिलिटी टेक्नोलॉजी में सहयोग बढ़ाना है।

मेट्रो और दूसरे प्रोजेक्ट्स पर भी बढ़ेगा सहयोग

संयुक्त बयान में शिपबिल्डिंग सेक्टर में सहयोग और स्किल डेवलपमेंट पर भी जोर दिया गया। इसके अलावा दोनों प्रधानमंत्रियों ने जापान की मदद से चल रहे चार बड़े प्रोजेक्ट्स की प्रगति का भी स्वागत किया।

इनमें मुंबई मेट्रो लाइन-11, बेंगलुरु मेट्रो फेज-3, महाराष्ट्र में स्वास्थ्य और शिक्षा परियोजनाएं और पंजाब में टिकाऊ बागवानी परियोजना शामिल हैं। दोनों देशों ने कहा कि वे भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़े ऐसे प्रोजेक्ट्स में आगे भी सहयोग जारी रखेंगे।

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UP RERA ने 1278 करोड़ के 10 बड़े प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी, नोएडा, लखनऊ, गाजियाबाद और आगरा में नए घर, दुकानें खरीदनी हैं तो इनपर रखें नजर

New Housing projects in UP: उत्तर प्रदेश में अपना घर या दुकान खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए एक बड़ी और अच्छी खबर है। उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (UP RERA) ने राज्य के चार प्रमुख जिलों में 10 नए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दे दी है। एक आधिकारिक बयान के मुताबिक इन सभी प्रोजेक्ट्स में कुल मिलाकर लगभग 1278 करोड़ रुपये का अनुमानित इन्वेस्टमेंट होगा। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी रेरा के चेयरमैन संजय भूसरेड्डी की अध्यक्षता में हुई अथॉरिटी की बैठक में इन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है। इन नए प्रोजेक्ट्स के माध्यम से लखनऊ, नोएडा (गौतम बुद्ध नगर), आगरा और गाजियाबाद में करीब 4498 आवासीय और व्यावसायिक यूनिट्स का विकास किया जाएगा।

लखनऊ: सबसे ज्यादा प्रोजेक्ट्स और 2284 यूनिट्स को मिली मंजूरी

मंजूर किए गए प्रोजेक्ट्स और यूनिट्स की संख्या के मामले में राजधानी लखनऊ सबसे आगे है। लखनऊ में करीब 438.29 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश वाले 6 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है। इन 6 प्रोजेक्ट्स में 5 आवासीय और 1 मिक्स्ड-यूज प्रोजेक्ट शामिल है। इनके जरिए कुल 2284 यूनिट्स डेवलप की जाएंगी।

गौतम बुद्ध नगर (नोएडा): निवेश के मामले में अव्वल, बनेंगे शॉप्स और स्टूडियो स्पेस

निवेश के मामले में गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) सूची में सबसे ऊपर रहा है। यहां 496.27 करोड़ रुपये की लागत वाले 2 कमर्शियल प्रोजेक्ट्स को रेरा से मंजूरी मिली है। इन प्रोजेक्ट्स के तहत कुल 981 कमर्शियल यूनिट्स विकसित की जाएंगी। इनमें दुकानें और स्टूडियो स्पेस शामिल होंगे।

आगरा और गाजियाबाद में भी रियल एस्टेट को रफ्तार

आगरा और गाजियाबाद जिलों के लिए भी नए प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखाई गई है। आगरा में 223.04 करोड़ रुपये के एक आवासीय प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई है। इसके तहत शहर में 761 हाउसिंग यूनिट्स (आवास) का विकास किया जाएगा। गाजियाबाद में 120.88 करोड़ रुपये के निवेश वाले एक कमर्शियल प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली है। इसके तहत 472 कमर्शियल यूनिट्स बनाने की योजना है।

रोजगार के नए अवसर और समय पर पूरा करने की निगरानी

यूपी रेरा ने कहा कि ये प्रोजेक्ट्स आवासीय, व्यावसायिक और मिक्स्ड-यूज विकास से जुड़े हैं। इनसे राज्य में सुनियोजित शहरी विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इनकी मदद से घरों और आधुनिक कमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मांग को भी पूरा किया जा सकेगा। अथॉरिटी ने साफ किया है कि इन सभी प्रोजेक्ट्स की कड़ी निगरानी की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट यानी रेरा अधिनियम के प्रावधानों का पूरी तरह पालन करें और निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरे हों। इन निवेशों से निर्माण कार्य के दौरान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। साथ ही कंस्ट्रक्शन मैटेरियल, इंजीनियरिंग सर्विसेज, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर्स में भी मांग बढ़ेगी।

प्रोजेक्ट्स को दी गई इस मंजूरी पर यूपी रेरा के चेयरमैन संजय भूसरेड्डी ने कहा कि अथॉरिटी रियल एस्टेट सेक्टर के लिए एक पारदर्शी, प्रभावी और जवाबदेह रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को मजबूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट्स को समय पर मंजूरी मिलने और उनकी प्रभावी निगरानी से प्रमोटर्स और घर खरीदारों दोनों के लिए अधिक भरोसे का माहौल तैयार हो रहा है।

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चीन ने पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश में चली बड़ी चाल, बंगाल की खाड़ी को लेकर उसकी ये योजना कान खड़े कर देगी

भारत के पूर्वी सीमा के आसपास पकड़ बनाने के लिए चीन पूरे दक्षिण एशिया में अपनी कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। पहले चीन ने पाकिस्तान में चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) में बड़ा निवेश किया था। अब उसने एक नया प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत वह म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश तक एक नया आर्थिक कॉरिडोर बनाना चाहता है।

हालांकि, यह प्रस्ताव सिर्फ एक सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान नहीं लगता है, बल्कि इसके पीछे रणनीतिक सोच भी है। इसका मकसद चीन के लिए समुद्री रास्तों तक आसान पहुंच बनाना है, खासकर बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) तक। फिलहाल, भारत के लिए इस संदेश को नजरअंदाज करना मुश्किल है। लेकिन यह कॉरिडोर अभी हकीकत से बहुत दूर है, और यह हिंद महासागर के आस-पास अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की बीजिंग की लगातार कोशिशों को दिखाता है।

बीजिंग ने भारत को छोड़कर एक पुराने विचार को फिर से शुरू किया

यह प्रस्ताव बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया बीजिंग यात्रा के दौरान सामने आया। जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस विचार का समर्थन किया और इसे दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग का हिस्सा बताया।

तारिक रहमान के प्रवक्ता महदी अमीन के अनुसार, इस कॉरिडोर को आर्थिक विकास और लॉजिस्टिक्स (logistics) को बेहतर बनाने के एक साधन के रूप में पेश किया जा रहा है।

अमीन ने कहा, “बैठक के दौरान एक प्रस्ताव आया कि म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश से चीन तक एक आर्थिक कॉरिडोर कैसे बनाया जा सकता है।” प्रवक्ता ने आगे कहा कि इस प्रस्ताव का मकसद “बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का विस्तार करना, आर्थिक लेन-देन बढ़ाना और मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्टेशन को और बेहतर बनाना” है।

असल में, यह प्रोजेक्ट लंबे समय से चर्चा में रहे बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार  (BCIM) कॉरिडोर को फिर से शुरू करता है, लेकिन इसमें एक बड़ा बदलाव है: भारत अब इसका हिस्सा नहीं है।

बता दें कि शुरुआती BCIM कॉरिडोर में चारों देशों को जोड़ने वाली सड़क और रेल कनेक्टिविटी की योजना थी। हालांकि, भारत ने सावधानी बरती और चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ में कभी शामिल नहीं हुआ; इसकी कुछ वजहें संप्रभुता से जुड़ी चिंताएं और बीजिंग की बढ़ती भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं।

अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक

CPEC के नजरिए से देखने पर चीन की बड़ी रणनीति और साफ हो जाती है। दरअसल, बीजिंग ने पाकिस्तान के जरिए, ग्वादर पोर्ट के माध्यम से अरब सागर तक पहुंच हासिल की। हालांकि ​​इस प्रोजेक्ट की भारत लंबे समय से आलोचना करता रहा है क्योंकि यह गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है, जिसे भारत पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका मानता है।

वहीं, अब,बांग्लादेश-म्यांमार रूट से चीन को एक और रणनीतिक पहुंच मिल सकती है, जो इस बार भारत के पूर्वी समुद्री पड़ोस के ज्यादा करीब होगी। इससे बीजिंग को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है, जो दुनिया के सबसे अहम और संवेदनशील शिपिंग चोकपॉइंट्स में से एक है।

बांग्लादेश की नजर बंदरगाह, व्यापार और चीनी निवेश पर

ढाका ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से एक आर्थिक अवसर के तौर पर पेश किया है। खबरों के मुताबिक, बातचीत मुख्य रूप से चट्टोग्राम बंदरगाह और मोंगला बंदरगाह के आस-पास बुनियादी ढांचे पर केंद्रित रही।

बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के प्रवक्ता मेहदी अमीन ने कहा, “हम इस बात पर काम करना चाहते हैं कि इस बंदरगाह [मोंगला बंदरगाह] को एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में कैसे विकसित किया जाए, जो न केवल बांग्लादेश बल्कि अन्य देशों के लिए भी काम आए।”

बांग्लादेश ने हाल के समय में चीनी समर्थित इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग की ओर भी रुख किया है। मोंगला के आसपास की जमीन, जिसे पहले 2015 के एक द्विपक्षीय समझौते के तहत भारत समर्थित आर्थिक परियोजना के लिए रखा गया था, उसे 2025 में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने हटा दिया।

रहमान की यात्रा के दौरान, ढाका ने उस आर्थिक क्षेत्र को विकसित करने के लिए चीन की सरकारी कंपनी के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

‘द डेली स्टार’ के अनुसार, यह प्रस्तावित रूट चीन के कुनमिंग से शुरू होकर म्यांमार के मांडले तक जाएगा, फिर यह दो हिस्सों में बंटकर यांगून और क्याउकफ्यू पोर्ट तक पहुंचेगा, और आगे चलकर बांग्लादेश के चट्टोग्राम और कॉक्स बाजार से जुड़ेगा।

म्यांमार सबसे कमजोर कड़ी बना

इस प्रस्ताव को लेकर जितनी भी उम्मीदें हैं, उनमें सबसे बड़ी चुनौती म्यांमार है। यह प्रस्तावित कॉरिडोर ऐसे इलाकों से होकर गुजरेगा जो लंबे समय से गृहयुद्ध और अस्थिरता से प्रभावित हैं।

रखाइन राज्य (Rakhine State), जहां रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्याउकफ्यू (Kyaukphyu) डीप-सी पोर्ट स्थित है, वहां सेना और सशस्त्र समूहों के बीच भारी संघर्ष चल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, वहां की कई जगहों पर सेना का नियंत्रण भी कमजोर पड़ चुका है। इस वजह से किसी बड़े ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को पूरी तरह लागू करना बेहद मुश्किल माना जा रहा है।

The Daily Star की रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार में पहले से मौजूद चीनी निवेश भी गंभीर सुरक्षा जोखिमों का सामना कर रहा है, जिनमें इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में रुकावट और संपत्तियों को सुरक्षित जगहों पर ले जाने जैसी समस्याएं शामिल हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो, जब तक म्यांमार के रास्ते एक सुरक्षित और स्थिर मार्ग नहीं बनता, यह पूरा कॉरिडोर फिलहाल सिर्फ एक सैद्धांतिक योजना ही बना रहेगा।

भारत इस प्रस्ताव को क्यों नजरअंदाज नहीं कर सकता

भारत के नजरिए से देखें तो इस योजना से तुरंत कोई बड़ा खतरा न भी हो, लेकिन लंबे समय में इसके रणनीतिक असर काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

अगर चीन-म्यांमार-बांग्लादेश कॉरिडोर पूरी तरह काम करने लगता है, तो इससे चीन की मौजूदगी बंगाल की खाड़ी के आसपास और मजबूत हो जाएगी। वह बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और औद्योगिक ढांचे के जरिए इस पूरे क्षेत्र में अपनी पकड़ बढ़ा सकता है। इससे चीन का प्रभाव भारत के पड़ोसी क्षेत्र में और गहरा होगा और उसे हिंद महासागर (Indian Ocean) तक अधिक पहुंच मिल सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक ने Rediff में लिखा कि युन्नान स्थित थिंक टैंक से जुड़े चीनी विशेषज्ञों ने उन्हें बताया कि बीजिंग अपनी व्यापक समुद्री रणनीति के तहत चीन-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर को बांग्लादेश तक विस्तारित करना चाहता है।

उन्होंने कहा कि इस तरह के कदम पर “दिल्ली और वाशिंगटन की नजर रहेगी और वे इससे खुश नहीं होंगे”।

अभी के लिए यह प्रोजेक्ट से ज्यादा एक संकेत है

फिलहाल चीन-म्यांमार-बांग्लादेश कॉरिडोर सिर्फ एक प्रस्ताव है, कोई पूरी तरह मंजूर किया गया प्रोजेक्ट नहीं। लेकिन इस स्तर पर भी, यह एक साफ संकेत देता है।

भारत के बेल्ट एंड रोड पहल से बाहर रहने और BCIM कॉरिडोर के लगभग खत्म हो जाने के बावजूद, चीन लगातार ऐसे वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है, जिनसे वह दक्षिण एशिया में अपना आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ा सके।

चाहे यह कॉरिडोर आगे जाकर बने या न बने, बीजिंग की मंशा अब साफ होती जा रही है—हिंद महासागर तक पहुंच के लिए कई रास्ते तैयार करना और भारत के आसपास के क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना।

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जापान की PM ताकाइची राष्ट्रपति भवन पहुंची:गार्ड ऑफ ऑनर से स्वागत;  आज मोदी से निवेश और सुरक्षा सहयोग द्विपक्षीय चर्चा होगी

जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची का गुरुवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में औपचारिक स्वागत किया गया। इस दौरान उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी स्वागत समारोह में मौजूद रहे। ताकाइची आज प्रधानमंत्री मोदी के साथ भारत-जापान की 16वीं वार्षिक शिखर बैठक में हिस्सा लेंगी। दोनों नेताओं के बीच निवेश, व्यापार, सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, रक्षा, समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। यह प्रधानमंत्री बनने के बाद ताकाइची का पहला भारत दौरा है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को और मजबूत करने पर भी बातचीत होने की उम्मीद है। भारत-जापान में डॉलर के बिना व्यापार की तैयारी भारत और जापान व्यापार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका कम करने की तैयारी कर रहे हैं। निक्की एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देश ऐसी व्यवस्था बनाने पर काम कर रहे हैं, जिससे कारोबार का भुगतान सीधे भारतीय रुपए और जापानी येन में हो सके। इस प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची की नई दिल्ली में होने वाली बैठक के बाद ऐलान किया जा सकता है। साने ताकाइची आज 3 दिन के भारत दौरे पर आ रही हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला भारत दौरा होगा। दोनों नेताओं के बीच होने वाले 16वें भारत-जापान सलाना शिखर सम्मेलन में व्यापार, निवेश, रक्षा, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमोबाइल, सप्लाई चेन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। डॉलर पर निर्भरता घटेगी, स्पेशल अकाउंट के जरिए सीधे पेमेंट अगर भारत और जापान के बीच भुगतान से जुड़ा ये प्रस्ताव लागू होता है तो दोनों देशों के बीच पहली बार स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को लेकर औपचारिक व्यवस्था बनेगी। इस योजना के तहत जापानी कंपनियां भारत के बैंकों में विशेष खाते खोलकर सीधे रुपए और येन में लेनदेन कर सकेंगी। यानी लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर या किसी तीसरे देश के बैंक की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस व्यवस्था से विदेशी मुद्रा बदलने का खर्च कम होगा, पैसे भेजने की लागत घटेगी और भुगतान पहले के मुकाबले जल्दी हो सकेगा। दोनों देशों को उम्मीद है कि इससे व्यापार करना आसान होगा और कंपनियों का समय और पैसा दोनों बचेंगे। 2025 में बनी थी सहमति, अब लागू करने की तैयारी स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए जापान का वित्त मंत्रालय वित्त वर्ष 2026 के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के साथ एक सहयोग समझौता (MoC ) करने की तैयारी में है। यह प्रस्ताव पूरी तरह नया नहीं है। अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अगले 10 वर्षों के लिए साझा विजन दस्तावेज जारी किया था। उसमें भी पेमेंट सिस्टम और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात कही गई थी। अब उसी योजना को आगे बढ़ाया जा रहा है। भारत भी पिछले कुछ वर्षों से रुपए में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दे रहा है। जुलाई 2022 में RBI ने ‘स्पेशल रुपी वोस्त्रो अकाउंट’ शुरू किया था, ताकि दूसरे देशों के साथ रुपए में व्यापार हो सके। बाद में इस व्यवस्था का दायरा बढ़ाया गया और विदेशी बैंकों को इन खातों में जमा अतिरिक्त रकम भारतीय सरकारी बॉन्ड में निवेश करने की भी अनुमति दी गई। भारत पहले से बढ़ा रहा रुपए में कारोबार संसद में सरकार ने बताया था कि अब तक 30 देशों के 123 विदेशी बैंकों के लिए भारत के 26 बैंकों में 156 विशेष रुपया वोस्त्रो खाते खोले जा चुके हैं। RBI का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मजबूत विदेशी मुद्राओं पर निर्भरता कम होगी और रुपए का वैश्विक इस्तेमाल बढ़ेगा। जापान भी एशिया के दूसरे देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दे रहा है। दिसंबर 2025 में उसने इंडोनेशिया के साथ भी ऐसा ही समझौता किया था, जिससे दोनों देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में सभी तरह के लेनदेन को बढ़ावा दिया जा सके। भारत में बढ़ रहा जापानी निवेश भारत और जापान के आर्थिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच 27.5 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच जापान ने भारत में 3.2 अरब डॉलर का निवेश किया। वहीं जापान अगले 10 वर्षों में भारत में 61 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश करने का लक्ष्य भी तय कर चुका है। फिलहाल भारत में करीब 1,400 जापानी कंपनियां काम कर रही हैं, जिनमें लगभग आधी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से जुड़ी हैं। जापान मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना समेत कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भी निवेश कर रहा है। हाल ही में जापानी कंपनी ने यस बैंक में 20% हिस्सेदारी खरीदने के लिए 1.6 अरब डॉलर का निवेश भी किया है। दोनों नेता इस दौरे के दौरान उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात करेंगे। इसके अलावा क्वाड, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर भी चर्चा होने की संभावना है। भारत-जापान व्यापार की 5 खास बातें जापान भारत में निवेश करने वाला पांचवां सबसे बड़ा देश है। मार्च 2026 तक उसका कुल निवेश ₹4.58 लाख करोड़ पहुंच चुका था। भारत-जापान ने साल 2025 में अगले 10 साल के लिए 10 ट्रिलियन जापानी येन (₹5.84 लाख करोड़) के जापानी निजी निवेश का टारगेट तय किया। यह निवेश मुख्य रूप से सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी और हाई-टेक डिफेंस उद्योगों में होगा। एक सर्वे के मुताबिक, जापानी कंपनियों के लिए भारत दुनिया का सबसे पसंदीदा और भरोसेमंद निवेश देश है। भारत में व्यापार कर रही 75% से अधिक जापानी कंपनियां मुनाफे में हैं। चीन पर वैश्विक निर्भरता को कम करने के लिए भारत और जापान ने सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे लिथियम, कोबाल्ट की सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए 2025 में एक विशेष रणनीतिक डायलॉग शुरू किया है। मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट पूरी तरह जापानी शिनकानसेन तकनीक और जापानी लोन की मदद से आगे बढ़ रहा है, जो दोनों देशों के सहयोग का सबसे बड़ा प्रतीक है। ———————————— जापान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… जापान में पहली बार महिला प्रधानमंत्री बनी:मजबूत सेना और संविधान में संशोधन की समर्थक हैं, मोदी-ट्रम्प ने दी बधाई साने ताकाइची जापान की प्रधानमंत्री चुनी गई हैं। वह जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं। ताकाइची को संसद के निचले सदन में हुए चुनाव में 149 के मुकाबले 237 वोटों से जीत मिली। पूरी खबर यहां पढ़ें…

UP के मजदूरों को बड़ी राहत, अब हर दिन मिलेंगे कम से कम ₹300, 125 दिन रोजगार की भी गारंटी

उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश की ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में 1 जुलाई 2026 से बड़ा बदलाव लागू हो गया है। केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण (वीबी-जी राम जी) योजना को आधिकारिक तौर पर लागू कर दिया है। इस नई योजना के तहत अब प्रदेश के पात्र ग्रामीण परिवारों को साल में 125 दिनों की रोजगार गारंटी मिलेगी।

इस योजना के समुचित कार्यान्वयन के लिए योगी सरकार ने कमर कस ली है। करीब 20 वर्षों तक ग्रामीण रोजगार की रीढ़ रहे मनरेगा की जगह अब यह नया ढांचा ले रहा है। यह कानून ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा, रोजगार बढ़ाएगा और गांवों में स्थायी विकास कार्यों को गति देगा।

 

यूपी के ग्रामीण परिवारों को होगा फायदा

 

उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े ग्रामीण आबादी वाले राज्यों में शामिल है, जहां लाखों परिवार रोजगार के लिए मनरेगा पर निर्भर रहे हैं। नई योजना लागू होने के बाद यूपी के ग्रामीण मजदूरों को कई बड़े लाभ मिलने वाले हैं। अब प्रदेश के पात्र ग्रामीण परिवारों को सालाना 100 दिनों के बजाय 125 दिनों की रोजगार गारंटी मिलेगी। साथ ही नई व्यवस्था के तहत अब राज्य में मजदूरी 300 रुपये प्रतिदिन से कम नहीं होगी। इससे राज्य के लाखों ग्रामीण मजदूरों को सीधा फायदा मिलेगा। राष्ट्रीय औसत मजदूरी 298.8 रुपये प्रतिदिन से बढ़कर 327.4 रुपये प्रतिदिन हो गई है। योगी सरकार ने बढ़ी हुई मजदूरी देने के लिए सारे प्रबंध पहले से कर रखे हैं। 

 

वैज्ञानिक तरीके से विकास योजनाएं तैयार की जाएंगी 

 

मनरेगा की तुलना में सबसे बड़ा बदलाव जियोस्पेशियल प्लानिंग को लेकर देखा जा रहा है। पहले जहां स्थानीय मांग के आधार पर कार्यों को मंजूरी दी जाती थी, वहीं अब गांवों में सैटेलाइट डेटा, भूमि रिकॉर्ड और बुनियादी ढांचे की जरूरतों के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से विकास योजनाएं तैयार की जाएंगी। इन्हीं योजनाओं के अनुसार तय होगा कि सरकारी धन कहां और किस कार्य पर खर्च किया जाएगा। वहीं अब पहले की तरह केवल मांग के आधार पर रोजगार नहीं मिलेगा। प्रदेश के गांवों में पहले से तैयार विकास योजनाओं के आधार पर काम तय किए जाएंगे।

 

निगरानी जीआईएस मैपिंग, सैटेलाइट इमेजरी और डिजिटल प्लानिंग टूल्स के जरिए होगी 

 

अब यूपी के गांवों में विकास कार्यों की योजना और निगरानी जीआईएस मैपिंग, सैटेलाइट इमेजरी और डिजिटल प्लानिंग टूल्स के जरिए होगी। इससे काम की गुणवत्ता और पारदर्शिता बढ़ाने का दावा किया जा रहा है। वीबी-जी राम जी एक्ट के तहत उत्तर प्रदेश में ऐसे कार्यों को प्राथमिकता मिलेगी जो लंबे समय तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करें। इसमें सड़क निर्माण, सिंचाई व्यवस्था, जल संरक्षण परियोजनाएं और स्थायी सामुदायिक इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल है। अब विभिन्न ग्रामीण विकास योजनाओं को आपस में जोड़कर परियोजनाओं को लागू किया जा सकेगा। इससे कार्यों के दोहराव को रोका जा सकेगा, संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और विकास कार्यों की दक्षता में सुधार आएगा।

इन 5 iPhones पर मिल रहा शानदार ऑफर, कीमत बढ़ने से पहले चेक करें डील

अगर आप नया iPhone खरीदने की सोच रहे हैं, तो यह आपके लिए सबसे सही समय हो सकता है। जही हां, दरअसल कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, Apple जल्द ही iPhone की कीमतें बढ़ा सकता है, और इसकी सबसे बड़ी वजह AI-बेस्ड मेमोरी चिप की कमी है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ रही है। हालांकि, Cupertino की इस टेक कंपनी ने कीमतों में बदलाव की जानकारी तो नहीं दी है, लेकिन हालिया लीक्स से संकेत मिलता है कि आने वाली iPhone 17 लाइनअप काफी महंगी हो सकती है। अब चलिए कीमतों की बढ़ोतरी से पहले, iPhone की बेहतरीन डील्स के बारे में सब कुछ जानते हैं।

iPhone की कीमतें क्यों बढ़ सकती हैं

टिपस्टर संजू चौधरी की ओर से सामने आई हालिया जानकारी से पता चलता है कि Apple के अगले iPhone लाइनअप की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। इस जानकारी के अनुसार, iPhone 17 Pro Max की कीमत ₹1,49,900 से बढ़कर लगभग ₹1,99,900 हो सकती है, जबकि स्टैंडर्ड iPhone 17 की कीमत ₹82,990 से बढ़कर ₹94,900 हो सकती है। हाल ही में पेश किए गए iPhone 17e की कीमत भी ₹64,900 से बढ़कर ₹74,900 होने की उम्मीद है। हालांकि, Apple ने इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं की है, इसलिए फिलहाल इन्हें सिर्फ अटकलें ही माना जाना चाहिए। लेकिन, यह जानकारी ऐसे समय में सामने आई है जब DRAM और NAND मेमोरी की बढ़ती लागत के बीच iPhone बनाने वाली कंपनी ने कई बाजारों में MacBook, iPad और HomePod के कई मॉडल्स की कीमतें बढ़ाई हैं। इंडस्ट्री के जानकारों ने इन कीमतों में बढ़ोतरी को AI इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मांग से जोड़ा है, जिसकी वजह से सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में सप्लाई की दिक्कतें पैदा हुई हैं।

अभी देखने लायक पांच iPhone डील्स

अगर खबरों के मुताबिक कीमतें बढ़ती हैं, तो अभी मिल रहे इन ऑफर्स से ग्राहकों के काफी पैसे बच सकते हैं।

  1. iPhone 17 Pro Max

Flipkart ने कन्फर्म किया है कि 4 जुलाई से शुरू होने वाली Flipkart Goat Sale 2026 के दौरान, फ्लैगशिप iPhone 17 Pro Max 1,27,900 रुपये की प्रभावी कीमत पर उपलब्ध होगा। इस फोन को कंपनी ने 1,49,900 रुपये की कीमत पर लॉन्च किया था, यानी इस हैंडसेट पर सीधे 22,000 रुपये का डिस्काउंट मिल रहा है।

  1. iPhone 17 Pro और iPhone 17

iPhone 17 Pro असल में ₹1,12,900 में मिलेगा, जिस पर ₹22,000 की छूट भी मिल रही है। वहीं, स्टैंडर्ड iPhone 17 को ₹70,900 में खरीदा जा सकता है, जबकि लॉन्च के समय इसकी कीमत ₹82,900 थी।

  1. iPhone Air

Apple का सबसे पतला स्मार्टफोन, iPhone Air, अभी ₹95,900 में मिल रहा है, जो इसकी लॉन्च कीमत ₹1,19,900 से काफी कम है।

  1. iPhone 17e

जो लोग कम कीमत वाला ऑप्शन ढूंढ रहे हैं, वे iPhone 17e को ₹60,900 में खरीद सकते हैं, जो इसकी रिटेल कीमत से ₹4,000 कम है।

  1. iPhone 16

पिछले साल लॉन्च हुआ iPhone 16, जिसकी कीमत ₹79,990 थी, अभी Croma पर ₹66,490 में लिस्टेड है। यानी इस पर लगभग ₹13,500 की छूट मिल रही है।

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कानपुर से कबरई जाने में 3.5 की बजाय लगेंगे डेढ़ घंटे, यूपी में BOT मोड में NH-34 पर 4/6 लेन का एक्सेस सेक्शन पास, जानिए डिटेल

Kanpur–Kabrai section: केंद्र सरकार की कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश में सड़क संपर्क को मजबूत करने के लिए एक बड़े प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। कैबिनेट ने नेशनल हाईवे-34 (NH-34) के कानपुर–कबरई सेक्शन पर 117.7 किलोमीटर लंबे 4/6-लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे के निर्माण को मंजूरी दे दी है। करीब ₹7,145.14 करोड़ की लागत वाली यह परियोजना बीओटी (टोल) मॉडल पर विकसित की जाएगी। इससे बुंदेलखंड समेत मध्य प्रदेश के कई इलाकों की कनेक्टिविटी में बड़ा सुधार होगा।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अब कानपुर–कबरई सेक्शन पर आधुनिक एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे का निर्माण शुरू करने का रास्ता साफ हो गया है। 117.7 किलोमीटर लंबी यह सड़क परियोजना उत्तर प्रदेश के परिवहन नेटवर्क को नई मजबूती देगी और क्षेत्रीय विकास को गति प्रदान करेगी।

सरकार ने बताया कि नया कॉरिडोर 16 आर्थिक नोड्स (Economic Nodes) और 9 सामाजिक नोड्स (Social Nodes) को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा। इससे औद्योगिक निवेश, रोजगार के अवसर और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने की संभावना है। साथ ही एजुकेशन, हेल्थ और अन्य आवश्यक सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी आसान होगी।

प्रोजेक्ट की लागत

इस प्रोजेक्ट पर कुल ₹7,145.14 करोड़ की अनुमानित लागत आएगी। इसका निर्माण बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) (टोल) मॉडल के तहत किया जाएगा। इसमें निजी कंपनी सड़क का निर्माण और संचालन करेगी। वहीं, निर्धारित अवधि तक टोल वसूलेगी। इस हाईवे के निर्माण से कानपुर, कबरई, सागर, भोपाल और आसपास के क्षेत्रों के बीच तेज एवं सुरक्षित आवागमन संभव होगा।

समय की होगी बचत

इस हाईवे के बनने से कानपुर और कबरई के बीच यात्रा समय 3.5 घंटे से घटकर लगभग 1.5 घंटे रह जाएगा। इससे यात्रियों के समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। वहीं, तेज और सुरक्षित यात्रा का लाभ मिलेगा। इससे बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश की कनेक्टिविटी को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है।

यह परियोजना सागर, भोपाल और मध्य प्रदेश के अन्य क्षेत्रों तक बेहतर और निर्बाध सड़क संपर्क उपलब्ध कराएगी। साथ ही, कबरई के खनन क्षेत्र से खनिज, औद्योगिक सामान, निर्माण सामग्री और कृषि उत्पादों के परिवहन को भी गति मिलेगी। इससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होने की संभावना है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में विकास की रफ्तार

सरकार के अनुसार, यह कॉरिडोर 16 आर्थिक नोड्स और 9 सामाजिक नोड्स को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा। इससे उद्योग, व्यापार, रोजगार और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। यह परियोजना बुंदेलखंड क्षेत्र के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। कबरई क्षेत्र अपनी खनिज संपदा और स्टोन माइनिंग के लिए जाना जाता है।

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बेहतर सड़क संपर्क मिलने से खनिज, औद्योगिक सामान, निर्माण सामग्री और कृषि उत्पादों की ढुलाई तेज होगी। इससे परिवहन लागत कम होगी और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। कानपुर-कबरई एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे परियोजना उत्तर प्रदेश के सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर को नई दिशा देने वाली महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। बेहतर कनेक्टिविटी, कम यात्रा समय और तेज माल परिवहन के जरिए यह परियोजना न केवल बुंदेलखंड बल्कि पड़ोसी राज्यों की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक विकास को भी नई गति देने में अहम भूमिका निभा सकती है।

प्रोजेक्ट की बड़ी बातें

  • 117.7 किमी लंबा हाईटेक 4/6-लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे बनेगा।
  • इस परियोजना की लागत ₹7,145.14 करोड़ है।
  • अब कानपुर–कबरई यात्रा का समय 3.5 घंटे से घटकर 1.5 घंटे रह जाएगा।
  • मध्य प्रदेश के सागर, भोपाल सहित कई शहरों तक बेहतर सड़क संपर्क बढ़ेगा।
  • खनन, कृषि और औद्योगिक उत्पादों के तेज परिवहन से व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।
  • 16 आर्थिक और 9 सामाजिक नोड्स की कनेक्टिविटी मजबूत होगी।