Trump Crypto Income: डोनाल्ड ट्रंप ने क्रिप्टो से कितनी कमाई की? फाइलिंग के बाद सामने आया एक साल का ये आंकड़ा होश उड़ा देगा

Donald Trump Income news: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सालाना वित्तीय जानकारी सामने आई है। आंकड़े ऐसे हैं जो आपको चौंकने पर मजबूर कर सकते हैं। बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही साल में ट्रंप ने क्रिप्टो और मीमकॉइन से जुड़े बिजनेस के जरिए कम से कम $1.4 बिलियन (1.4 अरब डॉलर) की बंपर कमाई की है। ‘ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स’ के अनुसार, क्रिप्टो से हुई यह कमाई राष्ट्रपति ट्रंप की आय का अब तक का सबसे बड़ा जरिया बनकर उभरी है। इसके बाद उनकी कुल नेटवर्थ बढ़कर $7.6 बिलियन (7.6 अरब डॉलर) पर पहुंच गई है।

927 पन्नों के दस्तावेज में क्रिप्टो से बंपर कमाई का खुलासा

हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘सीएनबीसी टीवी 18’ की एक रिपोर्ट में एजेंसियों के इनपुट के हवाले से बताया गया है कि ट्रंप की वित्तीय जानकारी के 927 पन्नों के आधिकारिक दस्तावेज सामने आए हैं। इससे पता चलता है कि डॉनल्ड ट्रंप की इस अरबों डॉलर की कमाई के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े क्रिप्टो सोर्स रहे हैं।

1- वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल: इस क्रिप्टो फर्म की सेल्स से ट्रंप ने $594 मिलियन (59.4 करोड़ डॉलर) से अधिक की कमाई की है। इस फर्म के को-फाउंडर्स में ट्रंप के बेटे और उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ शामिल हैं। विटकॉफ के बेटे जैक इस फर्म के सीईओ हैं।

2- मीमकॉइन बिजनेस और रॉयल्टी: ट्रंप के मीमकॉइन बिजनेस सीआईसी डिजिटल एलएलसी (CIC Digital LLC) ने $636 मिलियन (63.6 करोड़ डॉलर) की भारी इनकम की है। यह पूरी कमाई सेलिब्रेशन कॉइन्स के साथ हुए एक लाइसेंस समझौते से मिली रॉयल्टी के जरिए हुई है। सीआईसी ने डिजिटल वॉलेट में कम से कम $60 मिलियन (6 करोड़ डॉलर) मूल्य की विभिन्न क्रिप्टोकरेंसी रखने का भी खुलासा किया है।

3- स्टेबलकॉइन होल्डको: इस कंपनी की हिस्सेदारी बेचने से अमेरिकी राष्ट्रपति को $197 मिलियन (19.7 करोड़ डॉलर) की मोटी रकम हासिल हुई है।

गोल्फ क्लब और मार-ए-लागो रिसॉर्ट से भी करोड़ों की आय

क्रिप्टो के अलावा डोनाल्ड ट्रंप के पारंपरिक बिजनेस और संपत्तियों से भी अच्छी खासी कमाई हुई है। ट्रंप के प्रसिद्ध ‘मार-ए-लागो’ रिसॉर्ट से उन्हें $77 मिलियन (7.7 करोड़ डॉलर) की आय हुई है। उनके नॉर्दर्न वर्जीनिया गोल्फ क्लब से $25 मिलियन (2.5 करोड़ डॉलर) की कमाई दर्ज की गई है।

एक साल में दोगुने हुए व्यक्तिगत निवेश, आलोचकों ने उठाए सवाल

वित्तीय फाइलिंग के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 के अंत तक ट्रंप द्वारा किए गए व्यक्तिगत निवेशों की संख्या बढ़कर 6181 हो गई है। साल 2024 के अंत में यह संख्या 3314 थी। यानी निवेश की संख्या करीब दोगुनी हो चुकी है। निवेशों में आए इस भारी उछाल के बाद आलोचकों और विरोधियों ने एक बार फिर चिंता जताना शुरू कर दिया है। आलोचकों का आरोप है कि ट्रंप राष्ट्रपति पद का फायदा उठाकर मुनाफा कमा रहे हैं और अपने राष्ट्रपति पद के दायित्वों तथा वित्तीय हितों को आपस में मिला रहे हैं।

ट्रंप ऑर्गेनाइजेशन की सफाई: थर्ड-पार्टी संभाल रही है सारा काम

आलोचनाओं के बीच ट्रंप ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से इस पर सफाई दी गई है। कंपनी का कहना है कि ट्रंप की होल्डिंग्स और निवेश का प्रबंधन अब पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से थर्ड-पार्टी वित्तीय संस्थानों द्वारा किया जा रहा है। सभी निवेश संबंधी फैसले उन्हीं संस्थानों के पास सुरक्षित हैं। ट्रेडिंग पूरी तरह से एक ऑटोमेटेड प्रक्रिया के तहत की जा रही है। ट्रंप ऑर्गेनाइजेशन ने दावा किया है कि इन लेन-देन में न तो खुद डॉनल्ड ट्रंप न उनके परिवार का कोई सदस्य और न ही उनकी कंपनी की कोई भूमिका है।

ट्रंप पर करोड़ों डॉलर का कर्ज और अदालती हर्जाना भी बकाया

इस बंपर कमाई और अरबों की नेटवर्थ के बीच ट्रंप की फाइलिंग में कई बड़े बकाए कर्ज भी सूचीबद्ध किए गए हैं। इसमें लेखिका ई जीन कैरोल द्वारा उनके खिलाफ जीते गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े दो अदालती फैसले शामिल हैं। इनका भुगतान होना बाकी है।

ट्रंप पर रियल एस्टेट से जुड़े तीन बड़े लोन भी बकाया हैं। इनमें ट्रंप टॉवर और ट्रंप नेशनल डोरल पर $50 मिलियन (5 करोड़ डॉलर) से अधिक की रकम के मॉर्टगेज शामिल हैं। ट्रंप ने साल 2025 में ऐसे तीन मॉर्टगेज लोन पूरी तरह चुका दिए हैं, जिनकी वैल्यू कभी $50 मिलियन (5 करोड़ डॉलर) से अधिक हुआ करती थी।

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El Nino Impact in July: IMD के मंथली आउटलुक में जुलाई में भी मानसून वाली बारिश का हाल ठीक नहीं, अल नीनो का खतरा यहां तक पहुंचा

देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगे बढ़ने के बीच भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने जुलाई 2026 के लिए अपना मासिक आउटलुक जारी कर दिया है। मौसम विभाग का यह पूर्वानुमान चिंता बढ़ाने वाला है। आईएमडी के मुताबिक जुलाई के महीने में देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून की बारिश का हाल ठीक नहीं रहने वाला है और इसके सामान्य से कम होने की पूरी संभावना है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो को माना जा रहा है। इसका खतरा अब और बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।

जुलाई में सामान्य से कम रहेगी बारिश: IMD का पूर्वानुमान

IMD द्वारा मल्टी-मॉडल एनसेंबल फोरकास्टिंग सिस्टम के आधार पर अपने पूर्वानुमान जारी किए गए हैं। इसके मुताबिक जुलाई के दौरान पूरे देश में मासिक औसत वर्षा सामान्य से कम (<94% of Long Period Average – LPA) रहने की सबसे अधिक संभावना है।

क्या है बारिश का सामान्य आंकड़ा (LPA)?

साल 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर जुलाई महीने के लिए पूरे देश की दीर्घकालिक औसत वर्षा लगभग 280.4 मिमी है। IMD का पूर्वानुमान है कि देश के अधिकांश हिस्सों में जुलाई में कम बारिश होगी। उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व भारत के कुछ हिस्सों, पूर्व-मध्य भारत और पूर्वी प्रायद्वीपीय क्षेत्र में बारिश सामान्य से ऊपर या सामान्य रहने की संभावना है।

मजबूत हो रहा है अल नीनो, न्यूट्रल रहेगा आईओडी

मौसम विभाग ने मानसून की बारिश पर असर डालने वाले वजहों के बारे में भी बताया है। IMD के मुताबिक अभी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के ऊपर कमजोर अल नीनो की स्थिति बनी हुई है। लेकिन मानसून मिशन क्लाइमेट फोरकास्ट सिस्टम (MMCFS) और अन्य वैश्विक जलवायु मॉडलों के ताजा संकेत बताते हैं कि दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान यह अल नीनो स्थितियां और अधिक मजबूत हो सकती हैं।

इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की स्थिति कैसी है?

इस समय हिंद महासागर में न्यूट्रल आईओडी की स्थिति देखी जा रही है। मॉडल के पूर्वानुमानों के अनुसार, पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान यह न्यूट्रल आईओडी स्थिति ही बनी रहने की संभावना है। इंडियन ओशन डाइपोल हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री सतह के तापमान में अंतर को दर्शाने वाली जलवायु सिस्टम है। सामान्य तौर पर यदि IOD सकारात्मक रहता है तो यह भारतीय मानसून को मजबूत करने में मदद करता है। साथ ही अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम कर देता है। लेकिन इस बार IOD के तटस्थ रहने की संभावना है। इसका मतलब है कि यह मानसून को अतिरिक्त मजबूती नहीं दे पाएगा और अल नीनो का प्रभाव अधिक हावी रहेगा।

जुलाई में सताएगी गर्मी, तापमान रहेगा सामान्य से अधिक

कम बारिश के अनुमान के बीच जुलाई के महीने में देशवासियों को सामान्य से अधिक गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। जुलाई के दौरान, देश के अधिकांश हिस्सों में मासिक अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की उम्मीद है। हालांकि, पश्चिम-मध्य भारत के कुछ छिटपुट इलाकों में अधिकतम तापमान सामान्य या सामान्य से कम रह सकता है। रात के समय या न्यूनतम तापमान की बात करें तो देश के अधिकांश क्षेत्रों में यह भी सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है। सिर्फ मध्य और उत्तर-पूर्व भारत के कुछ अलग-अलग हिस्सों में न्यूनतम तापमान सामान्य रह सकता है।

कम बारिश से बढ़ेंगी चुनौतियां, तैयारी करने की सलाह

आईएमडी ने आगाह किया है कि जुलाई में सामान्य से कम बारिश होने के कारण कई मोर्चों पर गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। बारिश की कमी के कारण कृषि, जल संसाधन, जलविद्युत उत्पादन, पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और पीने के पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।

मौसम विभाग ने बताया कि वह नुकसान को कम करने के लिए विस्तारित अवधि के पूर्वानुमान, जिला-स्तरीय मौसम पूर्वानुमान, कृषि-मौसम विज्ञान सलाहकार सेवाएं और प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान जारी करता रहता है। ये किसान, आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों और बिजली क्षेत्र के योजनाकारों के लिए मददगार हैं।

अगला पूर्वानुमान कब?

आईएमडी द्वारा मानसून सीजन के दूसरे भाग (अगस्त + सितंबर 2026) के लिए और विशेष रूप से अगस्त महीने की बारिश का पूर्वानुमान जुलाई 2026 के अंत में जारी किया जाएगा

El Nino Impact: मानसून की एंट्री पर बड़ा अपडेट! बारिश तो होगी पर अल नीनो की इस चाल ने उड़ाई सबकी नींद

El Nino Updates: देश में मानसून की चाल को लेकर एक तरफ जहां राहत भरी खबर आई है, वहीं दूसरी तरफ अल नीनो (El Nino) के असर ने चिंता बढ़ा दी है। मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा अपडेट के मुताबिक, मानसून एक बार फिर रफ्तार पकड़ने जा रहा है। लेकिन अल नीनो के कारण सामान्य से कम मानसूनी गतिविधियों ने देश के कई हिस्सों में जल भंडारण के स्तर को प्रभावित किया है।

बंगाल की खाड़ी में बनेगा नया सिस्टम, मानसून पकड़ेगा रफ्तार

हमारी सहयोगी सीएनबीसी टीवी 18 की रिपोर्ट में स्काईमेट के हवाले से बताया गया है कि बंगाल की खाड़ी के ऊपर मानसूनी सिस्टम विकसित होने की संभावना है। यह नया सिस्टम मानसून को फिर से पुनर्जीवित करने में मदद कर सकता है। इसकी मदद से मानसूनी बारिश मध्य और उत्तरी भारत के आंतरिक हिस्सों तक पहुंचेगी।

एक संक्षिप्त ठहराव के बाद मानसून की गतिविधियां फिर से गति पकड़ने की उम्मीद है। IMD का कहना है कि अगले दो से तीन दिनों के भीतर मानसून के उत्तरी अरब सागर, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, बिहार और उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के कुछ और हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल हैं।

अल नीनो की चाल ने बढ़ाई चिंता, खाली हो रहे जलाशय

बारिश के इस सकारात्मक रुख के बीच अल नीनो की स्थिति को लेकर चिंताएं लगातार बनी हुई हैं। सामान्य से कम मानसूनी गतिविधियों के चलते देश के कई हिस्सों में जलाशयों का वाटर लेवल काफी प्रभावित हुआ है। 25 जून तक के आंकड़ों के मुताबिक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर घटकर 26.37% पर आ गया है। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 36.02% था। हालांकि, यह मौजूदा स्तर सामान्य भंडारण स्तर (24.95%) से थोड़ा अधिक है।

महाराष्ट्र में 28 जून तक जलाशयों का जलस्तर गिरकर 23.38% रह गया है, जो पिछले साल इसी तारीख को 43.75% था। मुंबई के जलाशयों में पानी का स्तर 7.08% दर्ज किया गया है, जो पिछले साल इसी तारीख के 5.35% के मुकाबले थोड़ा बेहतर है।

दिल्ली-यूपी और पंजाब समेत उत्तर भारत में भारी बारिश का अनुमान

आईएमडी के मुताबिक, उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में अगले एक या दो दिनों के दौरान छिटपुट बारिश होने की संभावना है। इसके बाद बारिश की गतिविधियों में तेजी आएगी। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में 1 जुलाई से 3 जुलाई के बीच काफी व्यापक से लेकर देशव्यापी बारिश होने का अनुमान है। पूर्वोत्तर भारत के हिस्सों और महाराष्ट्र के कोंकण व गोवा क्षेत्र में 4 जुलाई तक व्यापक से बेहद व्यापक बारिश होने की संभावना जताई गई है।

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El Nino Effect on Monsoon Rain: किसानों पर अल नीनो का प्रहार! इन इलाकों में 50% से ज्यादा बारिश की कमी, कई राज्यों में सूखे जैसे हालात का खतरा

El-Nino Effect on Monsoon Rain: देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी प्रगति के कारण बारिश का संकट गहराता जा रहा है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, शनिवार तक देश में सामान्य से 43 से 50 फीसदी तक कम बारिश दर्ज की गई है। हालांकि अगले महीने तक मानसून के पूरे देश में फैलने के बाद यह कमी कुछ हद तक कम हो सकती है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पूरे मानसून सीजन के अंत तक 10 फीसदी से अधिक बारिश की कमी रहने की आशंका जताई जा रही है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार अल नीनो (El Nino) का प्रभाव मानसून पर साफ दिखाई दे रहा है। आमतौर पर इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की सकारात्मक स्थिति अल नीनो के असर को कुछ हद तक कम कर देती है। लेकिन इस साल ऐसी स्थिति बनने की संभावना कम है। ऐसे में मानसून के कमजोर रहने का खतरा बढ़ गया है।

अल नीनो बढ़ा रहा किसानों की चिंता

विशेषज्ञों के मुताबिक, सकारात्मक IOD अच्छी बारिश की गारंटी नहीं देता। लेकिन यह अल नीनो से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करता है। अतीत में कई अल नीनो वाले वर्षों में सकारात्मक IOD की वजह से सामान्य के करीब बारिश दर्ज की गई थी। हालांकि, इस बार ऐसी राहत मिलने की संभावना कम मानी जा रही है। यदि बारिश में कमी बनी रहती है तो इसका असर खरीफ फसलों, जलाशयों के जलस्तर और पेयजल उपलब्धता पर पड़ सकता है। इसके अलावा कई राज्यों में गर्मी और उमस का दौर भी लंबा खिंच सकता है।

दिल्ली में गर्मी का रिकॉर्ड, ‘फील्स लाइक’ तापमान 51.3 डिग्री

बारिश की कमी का असर राजधानी दिल्ली में भी देखने को मिल रहा है। शनिवार को दिल्ली में अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण ‘फील्स लाइक’ (हीट इंडेक्स) तापमान 51.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो इस सीजन का सबसे अधिक है।

मौसम विभाग के अनुसार, शनिवार को दिल्ली का अधिकतम तापमान 41.3 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से करीब 4 डिग्री अधिक था। वहीं, दोपहर 2:30 बजे सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) 45 फीसदी दर्ज की गई। अधिक नमी के कारण लोगों को वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस हुई।

मानसून की रफ्तार पर टिकी उम्मीदें

मौसम विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिनों में मानसून के आगे बढ़ने के साथ बारिश की गतिविधियों में तेजी आ सकती है। यदि जुलाई में अच्छी बारिश होती है तो मौजूदा बारिश की कमी कुछ हद तक कम हो सकती है। हालांकि, फिलहाल मौसम के संकेत बताते हैं कि पूरे सीजन में सामान्य से कम बारिश रहने की संभावना बनी हुई है।

मौसम विभाग के अनुसार, 1 से 27 जून के बीच देशभर में सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। हालांकि जुलाई में मानसून पूरे देश में सक्रिय होने के बाद यह कमी कुछ कम हो सकती है। लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि पूरे मानसून सीजन (जून-सितंबर) के अंत तक 10 प्रतिशत से अधिक वर्षा घाटा रह सकता है।

क्या है इंडियन ओशन डाइपोल (IOD)?

इंडियन ओशन डाइपोल हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री सतह के तापमान में अंतर को दर्शाने वाली जलवायु सिस्टम है। सामान्य तौर पर यदि IOD सकारात्मक रहता है तो यह भारतीय मानसून को मजबूत करने में मदद करता है। साथ ही अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम कर देता है। लेकिन इस बार IOD के तटस्थ (Neutral) रहने की संभावना है। इसका मतलब है कि यह मानसून को अतिरिक्त मजबूती नहीं दे पाएगा और अल नीनो का प्रभाव अधिक हावी रहेगा।

अल नीनो क्यों बढ़ा रहा चिंता?

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ता है। पिछले कई सालों में जब भी अल नीनो सक्रिय रहा और IOD सकारात्मक नहीं रहा, तब देश में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। IMD ने भी कहा है कि इस बार अल नीनो के कारण मानसून के कमजोर रहने की आशंका अधिक है।

कई राज्यों में 50% से ज्यादा बारिश की कमी

बारिश के आंकड़ों के अनुसार कई राज्यों में हालात चिंताजनक हैं।

  • बिहार में करीब 82% बारिश की कमी दर्ज की गई।
  • गुजरात में लगभग 68% वर्षा घाटा रहा।
  • छत्तीसगढ़ में 68% कम बारिश हुई।
  • झारखंड में 66% कम बारिश हुई।
  • उत्तर प्रदेश में 65% कम बारिश हुई है।
  • ओडिशा में 63% और मध्य प्रदेश में भी सामान्य से काफी कम वर्षा रिकॉर्ड की गई है।
  • इसके अलावा महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु के कई हिस्सों में भी 30 प्रतिशत से अधिक बारिश की कमी दर्ज हुई है।

कृषि और जल संकट बढ़ने की आशंका

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश नहीं हुई तो खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हो सकती है। जलाशयों का जलस्तर घटने, पेयजल संकट बढ़ने और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्यान्न उत्पादन पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।

आगे क्या कहता है मौसम विभाग?

IMD का कहना है कि जुलाई में मानसून के पूरे देश में सक्रिय होने के बाद बारिश की स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है। हालांकि फिलहाल मौसम के वैश्विक संकेत बताते हैं कि इस बार अल नीनो का असर पूरे मानसून सीजन पर बना रह सकता है। ऐसे में सामान्य से कम बारिश की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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Monsoon & El Nino Impact: El Nino पर IMD ने जारी किया बिग अपडेट, क्या कमजोर पड़ेगा मानसून या जुलाई में तेज होगी बारिश?

El Nino Impact on Southwest Monsoon 2026: देश में अब आगे बढ़ रहे दक्षिण-पश्चिम मानसून के बीच भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अल नीनो (El Niño) और आने वाले दो हफ्तों की बारिश को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा अपडेट जारी किया है। जून के महीने में अब तक देश में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। इसके बाद हर किसी के मन में यही सवाल है कि क्या जुलाई में मानसून रफ्तार पकड़ेगा या अल नीनो का साया इसे कमजोर कर देगा?

आईएमडी की 25 जून को जारी लेटेस्ट प्रेस रिलीज के मुताबिक देश में मौसम का मिजाज अगले दो हफ्तों में पूरी तरह बदलने वाला है। आइए जानते हैं अल नीनो पर मौसम विभाग का क्या कहना है और जुलाई के पहले हफ्ते में आपके इलाके में कैसी बारिश होगी।

El Nino पर IMD का बड़ा अलर्ट: क्या बढ़ेगा खतरा?

मौसम विभाग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि वर्तमान में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थितियां बनी हुई हैं और इसके दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान और अधिक मजबूत होने की आशंका है। मानसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम के मॉडल भी संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में अल नीनो की स्थिति और गहरा सकती है।

राहत की बात: हालांकि अल नीनो मजबूत हो रहा है लेकिन हिंद महासागर में फिलहाल न्यूट्रल इंडियन ओशन डिपोल की स्थिति बनी हुई है, जो पूरे मानसून सीजन में ऐसे ही रहने की उम्मीद है। इसके अलावा मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) फेज-5 में है, जो जुलाई के शुरुआती दिनों में बंगाल की खाड़ी के उत्तरी हिस्सों में मानसूनी गतिविधियों को बढ़ाने में मदद करेगा।

जून में बारिश का क्या रहा हाल?

आईएमडी के आंकड़ों के मुताबिक इस साल जून के महीने में मानसून की रफ्तार थोड़ी धीमी रही है। 1 जून से 24 जून 2026 तक पूरे भारत में कुल संचयी बारिश सामान्य से 42% कम दर्ज की गई है। बीते सप्ताह (18-24 जून) के दौरान भी देश भर में सामान्य से 47% कम बारिश हुई।

अगले दो हफ्तों का फोरकास्ट: क्या जुलाई में तेज होगी बारिश?

मौसम विभाग ने 25 जून से 8 जुलाई 2026 तक के लिए दो चरणों में अपना विस्तृत अनुमान जारी किया है।

पहला हफ्ता (25 जून से 01 जुलाई 2026): धीमी शुरुआत, गर्मी से थोड़ी राहत

मानसून की उत्तरी सीमा (NLM) फिलहाल सूरत, इंदौर, मांडला, डालटनगंज और मोतिहारी से होकर गुजर रही हैं। अगले कुछ दिनों में इसके गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार के बचे हुए हिस्सों और उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं। इस हफ्ते में मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम के मैदानी इलाकों और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में हल्की से मध्यम बारिश होगी। बिहार, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों में कुछ स्थानों पर भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में 25-28 जून के बीच लू से गंभीर लू की स्थिति रह सकती है। बिहार और झारखंड में भी 25-26 जून को हीटवेव का असर दिखेगा, जिसके बाद तापमान में गिरावट आएगी। ओवरऑल बात करें तो पहले हफ्ते में पूर्वोत्तर भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप को छोड़कर देश के अधिकांश हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है।

दूसरा हफ्ता (02 जुलाई से 08 जुलाई 2026): मानसून पकड़ेगा तूफानी रफ्तार!

जुलाई का पहला हफ्ता बीतते-बीतते देश में मानसून पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा और अल नीनो के प्रभाव को पछाड़ते हुए भारी बारिश लेकर आएगा। इस हफ्ते में मानसून मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश के शेष हिस्सों सहित दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के बचे हुए भागों में दस्तक दे देगा। कम ऊंचाई वाली सोमाली जेट हवाएं और मजबूत होंगी। इससे अरब सागर से भारी नमी आएगी। इसके प्रभाव से गुजरात के तटीय इलाकों, कोंकण व गोवा, तटीय कर्नाटक और केरल में कई दिनों तक भारी से बहुत भारी बारिश होने का अनुमान है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय और पश्चिम बंगाल में भी भीषण बारिश जारी रहेगी। आईएमडी के मुताबिक दूसरे हफ्ते (2-8 जुलाई) के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में बारिश सामान्य या सामान्य से अधिक रहने की उम्मीद है। इस दौरान देश के किसी भी हिस्से में हीटवेव की कोई संभावना नहीं है।

IMD की जरूरी सलाह: किसान और आम जनता रखें ध्यान

शहरी इलाकों के लिए चेतावनी: भारी बारिश के कारण मुंबई, कोंकण और तटीय शहरों में जलभराव, ट्रैफिक जाम और निचले इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है।

किसानों के लिए एग्रो-एडवाइजरी: पूर्वोत्तर राज्यों, असम, केरल और कर्नाटक के तटीय इलाकों के किसानों को सलाह दी गई है कि वे धान की नर्सरी, मक्का और सब्जियों के खेतों में जलभराव रोकने के लिए जल निकासी का पुख्ता इंतजाम करें। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के किसान गर्मी को देखते हुए फसलों में हल्की सिंचाई करें और नमी बचाने के लिए मल्चिंग का उपयोग करें।

आंधी-तूफान से बचाव: वज्रपात और 50-60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली तेज हवाओं के दौरान कंक्रीट की दीवारों का सहारा न लें, पेड़ों के नीचे न छिपें और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अनप्लग कर दें।

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भारत इस साल मौसम की बड़ी चुनौती का सामना करने जा रहा है। प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है और यह साल के अंत तक बनी रह सकती है। इस बार अलनीनो के प्रभाव के चलते सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। ऐसे में इस बार ज्यादा पानी चाहने वाली फसलों पर प्रभाव पड़ सकता है. पानी की कमी से उत्पादन पर भी काफी असर पड़ सकता है। ऐसे में देश में सूखे जैसे हालात भी बन सकते हैं। वहीं मंगलवार को कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने कहा कि भारत ने मानसून में देरी या संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयारी कर ली है। इसके तहत जिला स्तर पर विशेष आपातकालीन योजनाएं बनाई गई हैं और देश में पर्याप्त मात्रा में अनाज का भंडार भी मौजूद है।

फलसों पर क्या पड़ेगा असर?

फसलों पर मानसून के असर को लेकर पी.के. सिंह ने बताया कि मौसम विभाग से मिले आंकड़ों और पूर्वानुमानों के आधार पर हर जिले के लिए अलग-अलग आकस्मिक योजनाएं तैयार की गई हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य कम बारिश या सूखे जैसी परिस्थितियों में किसानों और खेती को नुकसान से बचाना है। उन्होंने कहा कि जहां और जब बारिश की स्थिति के अनुसार जरूरत महसूस होगी, वहां इन योजनाओं को तुरंत लागू किया जाएगा। सरकार लगातार मौसम की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर समय रहते जरूरी कदम उठाएगी।

कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने बताया कि मौजूदा मौसम की स्थिति काफी हद तक वर्ष 2015 के अल नीनो जैसी दिखाई दे रही है। हालांकि, उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में देश के सिंचाई ढांचे में काफी सुधार हुआ है, जिससे अब हालात पहले की तुलना में बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त तैयारी कर रखी है। देश में अनाज का भंडार सुरक्षित और मजबूत स्थिति में है। खासकर चावल और गेहूं का स्टॉक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, जिससे खाद्य सुरक्षा को लेकर किसी तरह की चिंता नहीं है।

पी.के. सिंह ने भरोसा दिलाया कि यदि किसी कारण से किसी खाद्यान्न की कमी होती है, तो सरकार उसे पूरा करने के लिए जरूरी कदम उठाएगी। जरूरत पड़ने पर विदेशों से आयात भी किया जाएगा, ताकि आम लोगों पर किसी तरह का असर न पड़े। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है और किसानों के हितों के साथ-साथ देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

40% कम बारिश और अल नीनो का डबल अटैक!

कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने कहा कि जब मानसून में देरी होती है या सूखे जैसी स्थिति बनती है, तो किसान आमतौर पर दालों की खेती की ओर रुख करते हैं। इसकी वजह यह है कि दालों की फसलों को कम पानी की जरूरत होती है और ये कम समय में तैयार हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे हालात में किसान उन फसलों को प्राथमिकता देते हैं, जिनकी खेती कम लागत और कम पानी में हो सकती है। इससे मौसम की अनिश्चितता का असर खेती पर कुछ हद तक कम हो जाता है। पी.के. सिंह ने कहा कि मौजूदा समय में बारिश सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। इसके बावजूद किसानों का दालों जैसी कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ता रुझान एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार लगातार मौसम की स्थिति पर नजर रख रही है और जरूरत पड़ने पर किसानों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि फसल उत्पादन पर ज्यादा असर न पड़े।

मुंबई पहुंचा दक्षिण-पश्चिम मानसून

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने बताया कि 23 जून को दक्षिण-पश्चिम मानसून ने और रफ्तार पकड़ी और कई नए इलाकों तक पहुंच गया। इसके तहत मध्य अरब सागर के बाकी हिस्से, महाराष्ट्र के कुछ और क्षेत्र, जिनमें मुंबई भी शामिल है, तेलंगाना और ओडिशा के शेष भाग तथा छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के कुछ इलाकों में मानसून पहुंच गया है। मौसम विभाग के अनुसार, अगले 2 से 3 दिनों के दौरान मानसून के उत्तर अरब सागर और गुजरात के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हुई हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ और क्षेत्रों में भी मानसून के आगे बढ़ने की संभावना है। आईएमडी ने यह भी कहा है कि अगले 3 से 4 दिनों में झारखंड और बिहार के बाकी हिस्सों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में भी मानसून पहुंच सकता है।

Monsoon: इन 5 कारणों से महाराष्ट्र में फंसा मानसून, खरीफ फसलों पर पड़ सकता है असर

Monsoon: दक्षिण-पश्चिम मानसून के दक्षिण महाराष्ट्र में रुके रहने के कारण देश में 4 जून से 18 जून के बीच बारिश में 41 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। भारत मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, इस दौरान देश में सामान्य 72.2mm बारिश के मुकाबले केवल 42.6mm बारिश हुई है। IMD के क्षेत्रवार आंकड़ों के मुताबिक, मध्य भारत में 67%, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 42%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 22%  और उत्तर-पश्चिम भारत में 6% बारिश की कमी दर्ज की गई है।

मौसम विभाग ने गुरुवार को बताया कि “बड़े पैमाने पर अनुकूल मौसमी परिस्थितियों की कमी” ही मुख्य वजह है, जिसके कारण पिछले कुछ दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों में आगे नहीं बढ़ पाया है।

मानसून के उत्तर की ओर बढ़ने में देरी के पीछे कुल 5 प्रमुख कारण हैं:

पहला कारण यह है कि वर्तमान मानसून प्रवाह को अरब सागर से मजबूत “सर्ज” यानी तेज और स्थिर हवाओं का सपोर्ट नहीं मिल रहा है। मौसम विभाग के अनुसार, “आम तौर पर ऐसी तेज हवाएं ही नमी को बढ़ाने और बड़े पैमाने पर बारिश कराने के लिए जिम्मेदार होती हैं, जिससे मानसून आगे बढ़ता है।”

दूसरा कारण यह है कि अरब सागर में मानसून से जुड़ी निचले स्तर की दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमजोर पड़ गई हैं। इसके चलते महाराष्ट्र के तटीय और अंदरूनी इलाकों तक नमी (moisture) का प्रवाह कम हो गया है।

तीसरा कारण पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर में क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो का कमजोर होना है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए मुख्य नमी स्रोत माना जाता है। आईएमडी के अनुसार, इस प्रवाह के कमजोर होने से मानसून की गतिविधि भी प्रभावित हुई है।

चौथा कारण यह है कि अभी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में कोई मजबूत मौसमीय सिस्टम नहीं है, जैसे निम्न दबाव क्षेत्र (Low Pressure Area), चक्रवाती परिसंचरण या पश्चिमी तट के साथ सक्रिय ऑफशोर ट्रफ। ये सिस्टम सामान्यतः मानसून को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन फिलहाल इनकी कमी है।

आखिरी वजह मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) का कमजोर दौर है। यह हवा, बादलों और दबाव का एक चलता-फिरता सिस्टम है जो भूमध्य रेखा के चारों ओर घूमते हुए बारिश लाता है। जब यह सक्रिय होता है, तो दक्षिण भारत में अधिक बादल बनते हैं, जो मानसून हवाओं के साथ उत्तर की ओर बढ़कर ज्यादा बारिश कराते हैं। लेकिन अभी यह कमजोर स्थिति में है।

IMD के अनुसार, इसी वजह से अगले 4-5 दिनों तक महाराष्ट्र के अधिकतर हिस्सों में बारिश सीमित और केवल छिटपुट रहने की संभावना है।

अल नीनो से खरीफ फसलों पर पड़ेगा असर

दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तर दिशा में धीमी गति और हाल ही में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में उत्पन्न हुई अल नीनो की स्थिति, जिसके कारण भारत में कम बारिश हुई है, खरीफ फसलों के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है, क्योंकि इन फसलों के फलने-फूलने के लिए समय पर बारिश जरूरी है।

शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को दिया निर्देश

इसी को देखते हुए मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने निर्देश दिया कि ऐसे जिलों की पहचान की जाए जहां कम या असमान बारिश की संभावना है। साथ ही राज्यों के साथ मिलकर फसल-वार आपातकालीन (contingency) योजनाएं तैयार करने को कहा गया है, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।

मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि जल संरक्षण, नमी प्रबंधन, अंतर-फसल खेती और वैकल्पिक फसल पैटर्न पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

चौहान ने निर्देश दिया कि हर जोखिम वाले जिले के लिए एक अलग और व्यावहारिक रणनीति बनाई जानी चाहिए ताकि खरीफ के मौसम में किसानों को कोई परेशानी न हो।

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कल का मौसम 19 June: IMD ने बिहार समेत इन 12 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट दिया, 23 राज्यों में आएगा आंधी-तूफान, देखें Weather Alert

Kal ka Mausam 19 जून: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 19 जून के लिए देश का विशेष डेली वेदर बुलेटिन और चेतावनी जारी कर दी है। कल देश के कई राज्यों में मौसम के दो बेहद अलग रूप देखने को मिलेंगे। एक तरफ जहां मौसम विभाग ने बिहार और असम समेत देश के 12 राज्यों/क्षेत्रों में भारी से बहुत भारी बारिश का कड़ा अलर्ट दिया है। वहीं 23 राज्यों में गरज-चमक के साथ आंधी-तूफान और ओलावृष्टि का संकट मंडरा रहा है। उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्यों में लू का कहर भी जारी रहेगा।

मानसून की स्थिति: इन राज्यों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल

दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तरी सीमा (NLM) फिलहाल हरनाई, सोलापुर, हैदराबाद, भद्राचलम, कोरापुट, फूलबनी, रांची, जमुई और मुजफ्फरपुर से होकर गुजर रही है। मौसम विभाग के अनुसार अगले 4-5 दिनों के दौरान मानसून के तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार के कुछ और हिस्सों तथा छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल हैं।

बिहार और असम समेत इन 12 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

19 जून को देश के कई हिस्सों में मूसलाधार बारिश होने की प्रबल संभावना है। असम व मेघालय और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल व सिक्किम के अलग-अलग हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट है। बिहार, अरुणाचल प्रदेश, दक्षिण भारत के तमिलनाडु, पुडुचेरी व कराइकल और पूर्वोत्तर के नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम व त्रिपुरा के अलग-अलग पॉकेट्स में भारी बारिश होने की संभावना है।

बिहार और राजस्थान में 80 Kmph का भीषण महातूफान

19 जून को कुछ राज्यों में हवाओं की रफ्तार बेहद विनाशकारी हो सकती है। बिहार और पूर्वी राजस्थान दोनों ही इलाकों में 60-70 किमी/घंटे की रफ्तार से तीव्र झंझावाती तूफान चलने की आशंका है, जिसकी अधिकतम स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटे (Gusting to 80 kmph) तक जा सकती है। झारखंड, ओडिशा, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी राजस्थान इन चार क्षेत्रों में कल 50-60 किमी/घंटे की रफ्तार वाले थंडरस्क्वाल का अलर्ट जारी किया गया है। इसके साथ ही कल पश्चिमी राजस्थान में अलग-अलग स्थानों पर धूलभरी आंधी चलने की भी संभावना है।

दिल्ली-यूपी समेत देश के 23 राज्यों में आंधी-तूफान और बिजली का अलर्ट

19 जून को देश के कुल 23 राज्यों/क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर गरज-चमक, आकाशीय बिजली और तेज हवाओं का तांडव देखने को मिलेगा। दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर-लद्दाख, केरल व माहे, कोंकण व गोवा, मध्य महाराष्ट्र, मराठवाड़ा, विदर्भ, पूर्वी मध्य प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, तटीय आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक और पश्चिम बंगाल व सिक्किम।

इन सभी क्षेत्रों में 40-50 किमी/घंटे की रफ्तार से धूलभरी हवाएं और आंधी चलने का अनुमान है। तटीय कर्नाटक, रायलसीमा और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में कल हल्की से मध्यम आंधी के साथ बिजली कड़कने की संभावना है। अरुणाचल प्रदेश, असम व मेघालय, छत्तीसगढ़ और नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम व त्रिपुरा में कल आकाशीय बिजली गिरने और गरज-चमक का अलर्ट है।

हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में ओले गिरने की चेतावनी

पहाड़ी राज्यों में कल आंधी-तूफान के साथ ओलावृष्टि की दोहरी मार पड़ने वाली है। मौसम विभाग के ताजा बुलेटिन के अनुसार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के अलग-अलग इलाकों में गरज-चमक के साथ ओले गिरने की गंभीर आशंका जताई गई है।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी चलेगी भीषण हीट वेव

एक तरफ जहां देश का एक बड़ा हिस्सा आंधी और बारिश की चपेट में रहेगा, वहीं कुछ राज्यों में सूरज की तपिश और लू का कहर जारी रहेगा। उत्तर प्रदेश (पूर्वी और पश्चिमी), महाराष्ट्र (मध्य महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ) और तेलंगाना के अलग-अलग हिस्सों में भीषण लू चलने की संभावना है। उत्तर प्रदेश में यह स्थिति 24 जून तक लगातार बनी रह सकती है। आंध्र प्रदेश, गंगीय पश्चिम बंगाल, कोंकण व गोवा और ओडिशा में अत्यधिक उमस भरी गर्मी लोगों को बेहाल करेगी।

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El Nino Impact on Rice Farming: प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Niño) के पैर पसारने और कम बारिश की आशंका के बीच आंध्र प्रदेश के किसानों ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया है। सूखे और पानी की किल्लत के डर से यहां के किसानों ने पानी बचाने के लिए धान उगाने की अपनी पारंपरिक तकनीक से अलग हट कर काम करना शुरू किया है। किसान अब पारंपरिक रूप से धान के खेतों को पानी से लबालब भरने के बजाय आधुनिक और कम पानी लेने वाली तकनीकों को अपना रहे हैं, जिससे लाखों लीटर पानी की बचत हो रही है।

पीटीआई की रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जेआर पुरम गांव के एक ऐसे ही किसान की कहानी बताई गई है। 52 वर्षीय किसान मज्जी सत्यम के एक ऐसे ही के पास 5 एकड़ जमीन और दो बोरवेल हैं। वे जीवनभर अपने पिता के सिखाए पारंपरिक तरीके से ही धान उगाते रहे हैं। यानी पहले नर्सरी में पौधे तैयार करना फिर उन्हें पानी से लबालब भरे खेतों में ट्रांसप्लांट (रोपाई) करना और कटाई तक खेतों में पानी जमा रखना।

इस खरीफ सीजन में अल नीनो के कारण कम बारिश की आशंका को देखते हुए सत्यम ने अपनी तकनीक बदल दी है। सत्यम ने पीटीआई को बताया कि, ‘पिछले साल मई में ही बारिश आ गई थी। इस साल अभी तक नहीं आई है। मैंने सुना है कि अल नीनो के कारण इस बार बारिश कम होगी। इसलिए मैंने DSR आजमाने का फैसला किया है।’

क्या है DSR तकनीक?

DSR यानी डायरेक्ट सीडेड राइस (Direct Seeded Rice – धान की सीधी बुआई)। इस तकनीक में नर्सरी तैयार करने की बिल्कुल जरूरत नहीं होती। इसमें बीज सीधे मुख्य खेत में बोए जाते हैं। इसमें न तो रोपाई की जरूरत पड़ती है, न ही खेतों में पानी जमा रखने या कीचड़ बनाने की आवश्यकता होती है। कम मानसून की मार झेलने वाले किसानों के लिए यह तकनीक एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है।

एक एकड़ में बचता है 12 लाख लीटर पानी

पारंपरिक धान की खेती में अत्यधिक पानी की खपत होती है। इसके मुकाबले डीओएसआर (DSR) और एडब्ल्यूडी (AWD – अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग) तकनीकें पानी की जरूरतों को काफी कम कर देती हैं। AWD एक ऐसी तकनीक है जिसमें खेतों को लगातार पानी में डुबोकर रखने के बजाय चक्रों में पानी दिया और सुखाया जाता है।

डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन के निदेशक (ग्रामीण आजीविका और जलवायु कार्रवाई) सुमन सारस्वतीभटला ने बचत के आंकड़े बताते हुए कहा कि ड्राय डीएसआर पारंपरिक तरीकों की तुलना में प्रति एकड़ लगभग 11 से 12 लाख लीटर पानी बचाता है।

इसी तरह वेट डीएसआर प्रति एकड़ लगभग 4 से 5.5 लाख लीटर पानी की बचत करता है। AWD पारंपरिक खेती के मुकाबले लगभग 3 से 5 लाख लीटर पानी बचाता है। दोनों तकनीकों के सही ढंग से काम करने के लिए खेत के ऊपरी 30-40 सेंटीमीटर हिस्से में मिट्टी की नमी का लगातार बने रहना बेहद महत्वपूर्ण है, जो यह तय करता है कि किसानों को कब और कैसे बुआई करनी है।

3000 करोड़ लीटर पानी की हुई रिकॉर्ड बचत

सत्यम अकेले ऐसे किसान नहीं हैं। श्रीकाकुलम और विजयनगरम जिलों के 1500 से अधिक गांवों में करीब 10 लाख एकड़ धान के क्षेत्र में किसानों को एक्शन फॉर क्लाइमेट एंड एनवायरनमेंट (ACE) कार्यक्रम के तहत पानी की अधिक खपत वाली पारंपरिक खेती से दूर ले जाया जा रहा है। यह पहल फार्मा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज के सीएसआर (CSR) फंड के सहयोग से संचालित डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन द्वारा की जा रही है।

पिछले साल इन दोनों जिलों के किसानों ने 3667 एकड़ में DSR और 21963 एकड़ में AWD तकनीक को अपनाया था। इस वजह से 3000 करोड़ लीटर से अधिक पानी की बचत हुई और 50000 टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन में कमी आई। अल नीनो के दोबारा पूर्वानुमान को देखते हुए इस साल इन आंकड़ों में और बड़ी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।

इसी गांव के एक अन्य 50 वर्षीय किसान आर सन्यास राव पिछले साल से ही 5 एकड़ में वेट डीएसआर का सफल प्रयोग कर रहे हैं। इससे उनकी मजदूरी की लागत घट गई और नर्सरी व रोपाई का झंझट खत्म हो गया। इस साल वे दो एकड़ में ड्राय डीएसआर और तीन एकड़ में मक्के की खेती कर रहे हैं।

सरकारी कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र भी किसानों को धान का रकबा घटाने, कम समय वाली फसलों या दालों और अनाजों को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। सत्यम का कहना है कि अगर अल नीनो गंभीर हुआ, तो हम सिर्फ घर के खाने के लिए ही धान उगाएंगे।

बदल गया बुआई का कैलेंडर और बढ़ाई गई मिट्टी की सेहत

चक्रवात और बारिश पर निर्भर रहने वाले इस बेल्ट (श्रीकाकुलम) में बुआई का पारंपरिक समय पहले ही बदल चुका है। पहले जहां धान जून के अंत में बोया जाता था, वहीं पिछले 3-4 वर्षों में यह जुलाई में शिफ्ट हो गया है और मुख्य रोपाई अगस्त तक चली जाती है। इस खाली समय का उपयोग करने के लिए फाउंडेशन किसानों को खरीफ शुरू होने से पहले (मई-जून की अवधि में) कम समय वाली कवर फसलें जैसे उड़द, मूंग और तिल उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

इसके अलावा पटसन और नेपियर जैसी हरी खाद वाली फसलें मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद करती हैं। पिछले साल 2372 एकड़ में कवर फसलें और 1508 एकड़ में एग्रो-फॉरेस्ट्री (नारियल के बगीचों में इमारती लकड़ी और फलों के पौधे लगाना) की गई थी।

मिट्टी की जांच और डिजिटल सलाह

श्रीकाकुलम की मिट्टी के स्वास्थ्य में भी गिरावट देखी जा रही है। फाउंडेशन ने जनवरी 2025 में हैदराबाद में अपनी अत्याधुनिक सुविधा शुरू की है। इसके माध्यम से किसानों को त्वरित मिट्टी जांच रिपोर्ट और फसल संबंधी सलाह दी जा रही है। पिछले साल 5000 से अधिक सॉयल हेल्थ कार्ड जारी किए गए। इनमें पाया गया कि मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर बहुत कम है।

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सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है जबकि पोटाश की मात्रा अधिक है। इस साल अल नीनो के प्रभाव और उर्वरकों की कमी को देखते हुए विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है। पिछले पांच वर्षों से बल्क एसएमएस, पोस्टर और किसान बैठकों के माध्यम से किसानों को आदत या सुविधा के बजाय मिट्टी की जरूरत के हिसाब से सटीक खाद डालने के लिए जागरूक किया जा रहा है।

El Nino Impact: क्या भारत के मछली मार्केट पर भी कहर बनकर टूटने वाला है अल नीनो? फिशिंग इंडस्ट्री पर इसके असर को समझिए

El Nino Impact on Indian Fisheries: इस वक्त भारतीय मानसूनस और इसपर डिपेंड खेती किसानी के बीच सबसे अधिक चर्चा अल-नीनो को लेकर हो रही है। ऐसी आशंकाएं उठ रही हैं कि क्या अल नीनो भारत में तांडव मचाएगा? भारत सरकार ने भी इसे लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे 12 राज्य चिन्हित किए गए हैं जिनपर अल नीनो का सर्वाधिक असर देखने को मिल सकता है। ऐसे में हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर में बताया गया है कि अल नीनो का खतरा सिर्फ मानसूनी बारिश या खेती पर ही नहीं है बल्कि इसका एक बड़ा और खतरनाक असर मछली बाजार और पूरी फिशिंग इंडस्ट्री पर भी पड़ सकता है। आइए इस खतरे को समझते हैं।

आपको बता दें कि हाल ही में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने प्रशांत महासागर में अल नीनो के विकसित होने और दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान इसके और मजबूत होने की घोषणा की है। इससे ठीक एक दिन पहले अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने भी अल नीनो के उभरने की पुष्टि करते हुए अनुमान जताया था कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसके बेहद मजबूत होने की 63 प्रतिशत संभावना है। अब तक अल नीनो के आते ही सिर्फ सूखे, कम बारिश और फसलों के नुकसान पर चर्चा होती रही है लेकिन इसका एक बड़ा असर भारत के समुद्री जीवन और मछुआरों की आजीविका पर पड़ने जा रहा है।

समंदर के भीतर कैसे उथल-पुथल मचाता है अल नीनो?

रिपोर्ट के मुताबिक अल नीनो तब विकसित होता है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। वैसे तो यह घटना भारत से हजारों किलोमीटर दूर होती है लेकिन यह पूरे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर् को बदल देती है। इसके चलते मानसून की बारिश, समुद्र का तापमान और समुद्री उत्पादकता सीधे तौर पर प्रभावित होती है। मछलियां इन पर्यावरणीय बदलावों के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। आईआईटी दिल्ली के स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी की असिस्टेंट प्रोफेसर मोनिका मकवाना बताती हैं कि अल नीनो उन ट्रेड विंड्स को कमजोर कर देता है जो समुद्री परिसंचरण और अपवेलिंग (Upwelling – समुद्र की गहराई से पोषक तत्वों का ऊपर आना) को संचालित करती हैं। अरब सागर में समुद्री उत्पादकता पूरी तरह मानसून आधारित अपवेलिंग पर निर्भर है। हवाएं कमजोर होने से सतह के पानी तक पोषक तत्वों की सप्लाई घट जाती है। इससे मछलियों के फूड नेट कमजोर हो जाता है।

वहीं बंगाल की खाड़ी अपनी अर्ध-बंद भौगोलिक स्थिति और नदियों से आने वाले मीठे पानी के बड़े प्रवाह के कारण अलग तरह से प्रतिक्रिया करती है। अल नीनो के दौरान वहां भी समुद्र की सतह का तापमान बढ़ सकता है और समुद्री हीटवेव की घटनाएं अधिक बार देखने को मिल सकती हैं।

इंडियन ऑयल सारडीन और मैकेरल मछलियों पर सीधा असर

वैज्ञानिकों ने भारतीय समुद्रों में अल नीनो के इन प्रभावों को दर्ज किया है। केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के अध्ययनों से पता चला है कि जलवायु में आने वाला यह बदलाव व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों जैसे कि ऑयल सारडीन (Oil Sardine) और इंडियन मैकेरल (Indian Mackerel) के डिस्ट्रिब्यूशन, उनकी संख्या और मौसमी व्यवहार को प्रभावित करता है। दक्षिण-पूर्वी अरब सागर के शोध बताते हैं कि मैकेरल मछली की पकड़ सीधे तौर पर बारिश, समुद्र की उत्पादकता और अल नीनो व ला नीना से जुड़े व्यापक जलवायु पैटर्न से जुड़ी हुई है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज के शोधकर्ता इमरान समद का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में सारडीन और मैकेरल की पकड़ में जो उतार-चढ़ाव आ रहे हैं, उसके पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारक है।

सारडीन मछली की कहानी

जलवायु और मत्स्य पालन के संबंध को समझने के लिए भारतीय ऑयल सारडीन सबसे सटीक उदाहरण है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि सारडीन की संख्या में उतार-चढ़ाव का सीधा संबंध समुद्र के तापमान, मानसून पैटर्न और भोजन की उपलब्धता से है। मानसून के दौरान अरब सागर में होने वाली अपवेलिंग गहराई से पोषक तत्वों को ऊपर लाती है। इससे प्लवक (plankton – सूक्ष्म जीव) की वृद्धि होती है। यही सारडीन का मुख्य भोजन हैं। प्रोफेसर मोनिका मकवाना बताती हैं कि समुद्र का पानी गर्म और अधिक स्तरीकृत होने से फाइटोप्लांकटन की वृद्धि रुक जाती है, जो समुद्री खाद्य जाल की नींव है। बढ़ता तापमान मछलियों की शारीरिक और मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है। इससे उनका आकार छोटा हो जाता है। सारडीन का परिपक्व होना मानसून-पूर्व के महीनों में अपवेलिंग द्वारा लाए जाने वाले ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर पानी पर निर्भर करता है। गर्म पानी के कारण उनके अंडे देने की प्रक्रिया में देरी हो जाती है या यह पूरी तरह विफल हो सकती है।

जगह बदल रही हैं मछलियां

समंदर के गर्म होने से मछलियों के पाए जाने वाले पारंपरिक ठिकाने भी बदल रहे हैं। कई महत्वपूर्ण व्यावसायिक मछलियों ने समुद्र की बदलती स्थितियों के कारण अपनी सीमाओं का विस्तार किया है। उदाहरण के लिए ऑयल सारडीन जो पारंपरिक रूप से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट (जैसे केरल) पर केंद्रित थी, अब भारत के उत्तरी और पूर्वी तटों के उन हिस्सों में भी फैल गई है, जहां पहले इसकी संख्या बहुत कम थी। मछलियों के इस तरह जगह बदलने से मछुआरों के सामने अनिश्चितता का संकट खड़ा हो गया है। उनके पारंपरिक मछली पकड़ने के क्षेत्र कम उत्पादक होते जा रहे हैं, जबकि मछलियां अब अपरिचित इलाकों में दिखाई दे रही हैं।

फिशिंग इंडस्ट्री और छोटे मछुआरों पर तिहरी मार

समुद्र के गर्म होने से केवल मछलियों की आबादी प्रभावित नहीं हो रही है बल्कि इससे तटीय इलाकों में चक्रवात का खतरा और समुद्री हीटवेव की तीव्रता भी बढ़ जाती है। मछुआरा समुदायों के लिए यह स्थिति तिहरी मार जैसी साबित होती है। ऐसे में मछली की पकड़ कम हो जाती है। खराब मौसम के कारण समंदर में जाने वाले दिनों की संख्या घट जाती है। चक्रवात और तूफानों में नावें और मछली पकड़ने के गियर (जाल आदि) खराब हो जाते हैं, जिससे बाजार ठप हो जाते हैं और मछुआरे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।

प्रोफेसर मकवाना के मुताबिक इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जिनकी नुकसान बर्दाश्त करने की क्षमता सबसे कम है। छोटे पैमाने के पारंपरिक मछुआरों के पास न तो गहरे समंदर में जाने के लिए मशीनीकृत नावें होती हैं, न ही उनके पास कोई बड़ी बचत या जोखिम-प्रबंधन प्रणाली (बीमा आदि) होती है।

भविष्य का एक ट्रेलर है अल नीनो

सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो का यह प्रभाव अब किसी स्थिर जलवायु पर नहीं बल्कि पहले से गर्म हो रहे पर्यावरण पर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के समुद्र पहले से ही गर्म हो रहे हैं। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में अल नीनो के कारण होने वाले नुकसान और अधिक गंभीर और स्पष्ट रूप से सामने आएंगे। मोनिका मकवाना कहती हैं कि अल नीनो की घटनाओं को पृथ्वी के भविष्य के एक ट्रेलर के रूप में देखा जा सकता है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग अंततः स्थायी बना देगी।