सहयोगियों का भी दबाव है

कैबिनेट में फेरबदल को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊपर कई सहयोगी दलों का भी दबाव है। बिहार की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी जनता दल यू ने एक अतिरिक्त मंत्री पद के लिए दबाव बनाया है। उसके 12 लोकसभा और चार राज्यसभा सांसद हैं। 16 सांसद होने के बावजूद इसके डेढ़ मंत्री हैं। एक कैबिनेट मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह और दूसरे राज्यमंत्री रामनाथ ठाकुर। पहले राज्यसभा के उप सभापति का पद पार्टी के पास था, जो अब नहीं है। सो, पार्टी एक कैबिनेट मंत्री का पद मांग रही है। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा इस पद के दावेदार हैं।

जदयू के अलावा बिहार की तीनों सहयोगी पार्टियों ने भी दबाव बनाया है। खास कर चिराग पासवान ने। चिराग लगातार सरकार के खिलाफ बयान दे रहे हैं। वे कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में भी बोल चुके हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि वे खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय से खुश नहीं हैं और उनको कोई बड़ा मंत्रालय चाहिए। राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के पास कोई लोकसभा सीट नहीं है और उनके बेटे को राज्य सरकार में मंत्री बनाया गया है। लेकिन वे भी केंद्र में मंत्री पद चाहते हैं। झारखंड की सहयोगी पार्टी आजसू के इकलौते लोकसभा सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी भी केंद्र में मंत्री बनना चाहते हैं।

गोयल और ललन सिंह की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस

विपक्षी पार्टियों के प्रदर्शन और दूसरी खबरों के बीच एक बड़ा और दिलचस्प घटनाक्रम मीडिया की नजरों से ओझल हो गया। कहीं कहीं खबर तो आई लेकिन यह बड़ा घटनाक्रम था कि राहुल गांधी और विपक्षी पार्टियों के प्रदर्शन के बीच भाजपा मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें जनता दल यू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह शामिल हुए। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के साथ उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और राहुल गांधी व अन्य विपक्षी नेताओं पर हमला किया। सोचें, जब अमित शाह पहली बार राहुल गांधी के प्रोटेस्ट पर प्रेस के सामने आए और बहुत आक्रामक अंदाज में हमला किया तो उसी दिन दो अन्य केंद्रीय मंत्रियों के प्रेस कॉन्फ्रेंस की क्या जरुरत थी?

दूसरी खास बात यह है कि यह कोई ऐसा अभूतपूर्व मामला नहीं है कि जदयू के नेता भाजपा मुख्यालय में जाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करें। सवाल है कि इसे भाजपा ने क्या मैसेज दिया? ऐसा लग रहा है कि बिहार की अंदरूनी राजनीति में खींचतान को एड्रेस करने का प्रयास किया गया। गौरतलब है कि वहां जदयू के अंदर घमासान छिड़ा है तो एनडीए की पार्टियों में बहुत विवाद है। चिराग पासवान खुल कर सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा अपने एक अन्य सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को तोड़ने का प्रयास कर रही है। इस विवाद के बीच जदयू के शीर्ष नेताओं में से एक के भाजपा मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके एनडीए की एकजुटता का संदेश जाएगा।

बिहार नाव हादसा: लापता लोगों की तलाश जारी

वैशाली जिले में गंगा नदी में नाव पलटने से कम से कम 13 बच्चों की मौत की घटना के एक दिन बाद बुधवार को लापता लोगों की तलाश के लिए बचाव अभियान जारी रहा। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

वैशाली की जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने बताया कि हादसे में जिन बच्चों की मौत हुई उनकी उम्र 15 वर्ष से कम थी। नाव पर 20 से अधिक लोग सवार थे।

उन्होंने ने बताया कि मृतकों में नौ लड़कियां और चार लड़के शामिल हैं। बुधवार को अब तक कोई और शव बरामद नहीं हुआ है।

यह हादसा मंगलवार रात करीब साढ़े आठ बजे उस समय हुआ जब रामपुर श्यामचंद गांव के निवासी नदी के पार एक गांव में भोज में शामिल होने जा रहे थे।

सिंह ने  राहत और बचाव अभियान अब भी जारी है। छह लोगों को बचा लिया गया है।’’

जिलाधिकारी ने कहा, ‘‘मामले की जांच के आदेश दिए गए हैं और अधिकारियों को 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। नाव जिसके नाम पर पंजीकृत है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।”

उन्होंने कहा कि सूर्यास्त के बाद नावों के परिचालन पर रोक लगाने के जिला प्रशासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यह हादसा हुआ।

सिंह ने कहा, “नाव के मालिक, संचालक और ऐसी घटनाओं को रोकने एवं निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। हमें बताया गया है कि यह नाव पहले भी परिचालित होती रही थी। इस लापरवाही से सख्ती से निपटा जाएगा।”

नावों की कमी होने संबंधी दावों को खारिज करते हुए जिलाधिकारी ने कहा कि यदि नाव या संपर्क सड़क की मांग की जाती है, तो प्रशासन उचित कार्रवाई करेगा, क्योंकि यह एक अस्थायी जल क्षेत्र है।

उन्होंने बताया कि क्षेत्र में राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) की आठ नौकाएं काम कर रही हैं। प्रशासन इलाके में एसडीआरएफ के दो स्थानीय केंद्र स्थापित करने की भी योजना बना रहा है।

मृतकों की पहचान मीरा कुमारी, निशु कुमारी, अनीशा कुमारी, सुनीता कुमारी, आर्यन कुमार, मोहन कुमार, अमृता कुमारी, अंकिता कुमारी, पिंकी कुमारी, नमन कुमार, सिकी कुमारी, भोनू कुमारी और सोनम कुमारी के रूप में हुई है।

अधिकारियों ने बताया कि सूचना के अनुसार हादसे में एक ही परिवार के सात बच्चों की मौत हुई है।

इस हादसे के बाद पूरे गांव में मातम पसरा है। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो में जिलाधिकारी फूट-फूटकर रो रही एक महिला को गले लगाकर सांत्वना देती नजर आ रही हैं।

Also Read : CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका भेजे गए तिहाड़ जेल

राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) के उपनिरीक्षक जय दीप नारायण सिंह ने संवाददाताओं को बताया कि क्षतिग्रस्त नाव को नदी से निकाल लिया गया है और तलाश अभियान जारी है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने प्रत्येक मृतक के परिजन को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व विधायक सतीश कुमार यादव और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के विधान परिषद सदस्य अशरफ अंसारी समेत कई स्थानीय नेता घटनास्थल पर पहुंचे और शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री और क्षेत्र के लोकसभा सांसद चिराग पासवान ने भी एनएमसीएच पहुंचकर हादसे में बचाए गए लोगों से मुलाकात की।

पासवान ने संवाददाताओं से कहा, “मैं कल रात से ही जिला प्रशासन के संपर्क में हूं। मैं शोकसंतप्त परिवारों के साथ मजबूती से खड़ा हूं। इन लोगों ने मुझे वह सब कुछ बनाया है, जो मैं आज हूं। जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, मैं यहां रहूंगा।”

उन्होंने कहा कि हादसे के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता एवं राघोपुर के विधायक तेजस्वी यादव ने मंगलवार रात एक वीडियो संदेश में कहा था कि वह नयी दिल्ली से लौटने के बाद अपने विधानसभा क्षेत्र का दौरा करेंगे।

वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में विपक्ष के प्रदर्शन में भाग लेने के लिए दिल्ली गए थे।

हादसे के बाद गांव के लोगों ने प्रशास पर आरोप लगाते हुए प्रदर्शन किया और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की।

स्थानीय निवासी रवि कुमार ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘नाव की हालत जर्जर थी। हमने कई बार इसे बदलने की मांग की थी, लेकिन हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया। इसी लापरवाही के कारण यह हादसा हुआ। संबंधित अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए।’’

राज्य सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन ने हादसे में मारे गए प्रत्येक बच्चे के परिजन को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि उपलब्ध कराई है। इसके अतिरिक्त, कबीर अंत्येष्टि योजना के तहत प्रत्येक मृतक के परिवार को तीन-तीन हजार रुपये तथा मुख्यमंत्री पारिवारिक लाभ योजना के अंतर्गत मृतकों के अभिभावकों को 20-20 हजार रुपये दिए गए हैं।

Pic Credit : UNI

चिराग की दबाव बनाने की राजनीति

लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने गजब किया है। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के दिल्ली के प्रोटेस्ट का समर्थन किया और उनके प्रदर्शन के रोकने के लिए सरकार की ओर से की गई तैयारियों पर सवाल उठाए। प्रदर्शन से एक दिन पहले शुक्रवार, नौ अक्टूबर को चिराग पासवान ने कहा कि ये देश के युवा हैं इन्हें कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने सीधे सरकार को निशाना बनाते हुए कहा कि ट्रेन बंद कर देने से युवा नहीं रूकेंगे। हाल के दिनों में चिराग पासवान लगातार इस तरह के बयान दे रहे हैं, जिससे लग रहा है कि वे सरकार के खिलाफ हैं। उन्होंने बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर बहुत तीखा बयान दिया था।

चिराग पासवान ने यहां तक कहा था कि वे इस बात से शर्मिंदा है कि वे ऐसी सरकार का हिस्सा हैं। हालांकि शर्मिंदा होने के बावजूद उन्होंने सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया। तभी माना जा रहा है कि अपने को नरेंद्र मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान अपने मन से कोई काम नहीं करते हैं। उनको कुछ हद तक छूट मिली हुई है कि वे कुछ बयान दे सकते हैं। लेकिन एक दूसरी थ्योरी यह है कि उनको लग रहा है कि उनकी पार्टी खतरे में है। जिस तरह से उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के चार में से तीन विधायक बागी हो गए और भाजपा के साथ जाने का ऐलान कर दिया। उसी तरह से चिराग की पार्टी के 19 में से 14 या 15 विधायक भी कर सकते हैं। एक तीसरी थ्योरी यह है कि वे किसी न किसी बहाने अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार में फेरबदल करें तो चिराग को कोई बड़ा मंत्रालय मिल जाए।

राष्ट्रपति मुर्मू से मुलाकात के बाद राहुल गांधी बोले- उन्होंने ‘वोट चोरी’ के आरोपों को खारिज नहीं किया, सबूत मांगे

राष्ट्रपति मुर्मू से मुलाकात के बाद राहुल गांधी बोले- उन्होंने 'वोट चोरी' के आरोपों को खारिज नहीं किया, सबूत मांगे

rahul gandhi

INDIA गठबंधन के नेताओं ने शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर अपनी चिंताएं रखीं। मुलाकात के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दावा किया कि राष्ट्रपति ने विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोपों को खारिज नहीं किया, बल्कि उनसे सबूत देने को कहा। राहुल गांधी ने कहा कि वे सोमवार को सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। विपक्षी नेताओं ने चुनाव में कथित अनियमितताओं की जांच और चुनाव प्रक्रिया में बदलाव की मांग भी उठाई।

ALSO READ: Chirag Paswan : आखिर कितनी ट्रेनों को रोकेंगे?’ दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन से पहले चिराग पासवान का बयान

राहुल गांधी के मुताबिक, विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन सौंपा। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने की साजिश का आरोप लगाया गया। ये विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोप हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

 

राहुल गांधी बोले- पूरे देश को पता है कि ‘वोट चोरी’ हुई

 

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि यह बैठक उनके लिए काफी असाधारण रही। उन्होंने बताया कि विपक्ष ने ज्ञापन में चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताएं विस्तार से रखीं।

 

राहुल गांधी के अनुसार, राष्ट्रपति ने विपक्ष के आरोपों का सीधे तौर पर खंडन नहीं किया, लेकिन उनसे चुनाव में कथित गड़बड़ी के सबूत मांगे। राहुल गांधी ने कहा कि उनके अनुसार चुनाव में कथित ‘वोट चोरी’ के सबूत पूरे देश में चर्चा का विषय हैं और विपक्ष अलग-अलग राज्यों के चुनावों में अनियमितताओं का आरोप लगा रहा है।

 

उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर भी सवाल उठाए। हालांकि, चुनाव में धांधली के आरोपों पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए संबंधित सबूतों और आधिकारिक जांच के नतीजों को देखना जरूरी होगा।

ALSO READ: ‘फर्क सिर्फ वर्दी का है, इंसानियत का नहीं’—10 अक्टूबर के हाई-वोल्टेज प्रोटेस्ट से पहले दिल्ली पुलिस का इमोशनल मैसेज*

ममता बनर्जी बोलीं- राष्ट्रपति ने जांच का भरोसा दिया

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा और चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी चिंताओं को सामने रखा।

 

ममता बनर्जी के मुताबिक, राष्ट्रपति ने मामले की जांच करने और दिए गए विवरणों को देखने की बात कही। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ने सबूत उपलब्ध कराने को कहा है और विपक्ष की ओर से संबंधित सामग्री भेजने की बात कही गई है। ममता बनर्जी ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर उचित ध्यान देना जरूरी है।

 

खरगे ने की बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग

 

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि INDIA गठबंधन के नेताओं ने राष्ट्रपति को चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया।

 

खरगे के मुताबिक, विपक्ष ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग रखी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने कथित वोट चोरी के मामलों के सबूत मांगे हैं और विपक्षी दल फिलहाल संबंधित प्रमाण जुटा रहे हैं। खरगे ने कहा कि विपक्ष उपलब्ध सामग्री राष्ट्रपति को सौंपेगा।

 

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के कदमों से लोकतंत्र को नुकसान पहुंच रहा है। ये खरगे के राजनीतिक आरोप हैं। उनके मुताबिक, राष्ट्रपति ने उनकी बातें ध्यान से सुनीं और मामले की पड़ताल करने तथा संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श करने की बात कही।

 

प्रियंका गांधी ने मेट्रो बंद करने के कदम पर उठाया सवाल

 

दिल्ली में प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले मेट्रो सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “इसे ही डर कहते हैं।” विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अपनी मांगें दोहराईं। उनकी प्रमुख मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच का मुद्दा शामिल है।

 

अब सबूतों और आगे की कार्रवाई पर नजर

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद विपक्ष ने कहा है कि वह कथित चुनावी अनियमितताओं से जुड़े सबूत और अन्य विवरण सौंपेगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष कौन-से दस्तावेज या प्रमाण प्रस्तुत करता है और संबंधित संवैधानिक संस्थाएं इन आरोपों पर क्या कार्रवाई करती हैं।

चिराग पासवान क्यों इतने नाराज हैं

लोक जनशक्ति पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान इश तरह से बिहार की सरकार पर हमला कर रहे हैं, जैसे मुख्य विपक्षी पार्टी राजद के नेता तेजस्वी यादव भी नहीं कर रहे हैं। चिराग पासवान ने कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर यहां तक कहा कि उनको शर्म आ रही है कि वे ऐसी सरकार का हिस्सा हैं। इसके बाद उनकी पार्टी के मंत्री संजय सिंह के विभाग की समीक्षा बैठक हुई, जिसमें से मंत्री ही गायब थे। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अधिकारियों के साथ उनके विभाग के कामकाज की समीक्षा की। बिहार सरकार पर हमला बोलने के बाद चिराग पासवान ने ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में सभी सीटों पर लड़ने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि गठबंधन होगा तब भी और नहीं होगा तब भी वे उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ेंगे।

हालांकि यूपी के चुनाव लड़ने का मामला तो रणनीतिक लग रहा है। वे एक या दो सीट के लिए दबाव डाल रहे हैं। इसी तरह का दबाव डाल कर उन्होंने झारखंड और दिल्ली में भी भाजपा से एक एक सीट ले ली थी। लेकिन बिहार सरकार पर हमला बड़ी बात है। उनकी पार्टी के दो नेता राज्य सरकार में मंत्री हैं औऱ वे खुद केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री हैं। उनकी नाराजगी के बीच राजद और कांग्रेस इकोसिस्टम के लोग अंकगणित समझाने लगे हैं। उनको लग रहा है कि जदयू फिर पलटी मारेगी और इस बार जदयू, राजद और लोजपा मिल कर सरकार बनाएंगे। बिहार के तीनों क्षत्रपों के बेटों की सरकार बनने की बात कही जा रही है। नीतीश के बेटे निशांत को सीएम और लालू प्रसाद के बेटेट तेजस्वी व रामविलास पासवान के बेटे चिराग के डिप्टी सीएम बनने की बात कही जा रही है। हालांकि यह बहुत दूर की कौड़ी है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि सिर्फ चिराग पासवान नहीं, बल्कि उपेंद्र कुशवाहा भी बेचैन इसलिए हैं क्योंकि इनको अपनी पार्टी टूटने का खतरा दिख रहा है। कहा जा रहा है कि उनके विधायक सीधे भाजपा में शामिल हो सकते हैं। ध्यान रहे भाजपा के 88 विधायक हैं। अभी वह पूरी तरह से जदयू पर निर्भऱ है, जिसके 85 विधायक हैं। अगर भाजपा अपने विधायकों की संख्या एक सौ पार करा लेती है तो यह निर्भरता कम होगी और रोज रोज की खींचतान भी बंद होगी।

लोजपा के बाद जदयू ने बनाया दबाव

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी की बिहार की सहयोगी पार्टियां भाजपा पर दबाव बना रही हैं। पहले केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की पार्टी लोजपा ने उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो अब नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यू ने कहा है कि वह भी उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ेगी। जदयू ने तो यहां तक कहा है कि वह 60 सीटों पर लड़ने की तैयारी कर रही है। ध्यान रहे एक समय जब केसी त्यागी जदयू के राष्ट्रीय महासचिव थे और उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रहे आरसीपी सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तब इस बात की बहुत चर्चा होती थी कि जदयू को यूपी में चुनाव लड़ना चाहिए।

लेकिन अब न तो केसी त्यागी पार्टी में हैं और न आरसीपी सिंह। नीतीश कुमार की अपनी स्थिति ऐसी नहीं है कि वे राजनीति कर सकें। पिछले लोकसभा चुनाव में उनके उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर या किसी अन्य कुर्मी बहुल सीट से चुनाव लड़ने की भी चर्चा हुई थी। बहरहाल, पार्टी की ओर से 60 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की चर्चा इसलिए कराई जा रही है ताकि भाजपा से एक या दो सीटों पर बात हो सके। गौरतलब है कि भाजपा ने जदयू और लोजपा को झारखंड और दिल्ली में एक एक सीट दी थी। झारखंड में तो दोनों जीते लेकिन दिल्ली में नहीं जीत सके। अब दोनों चाहते हैं कि भाजपा उन्हें उत्तर प्रदेश में भी एकाध सीट देकर गठबंधन में एडजस्ट करे। हालांकि भाजपा इस मूड में दिख नहीं रही है।

भाजपा की दो सहयोगी पार्टियों ने उठाए सवाल

नई दिल्ली। देश की विपक्षी पार्टियां तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ऊपर हमला कर ही रही हैं अब दो सहयोगी पार्टियों ने भी सवाल उठाए हैं। बिहार की दो सहयोगी पार्टियों के नेताओं ने चुनाव आयोग से ज्यादा स्पष्टता से अपनी बात रखने को कहा है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने पहले यह बात कही और उसके बाद राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने भी यह मुद्दा उठाया।

चिराग पासवान ने कहा कि वे सरकार का हिस्सा हैं साथ ही उन्होंने कहा कि वे किसी संवैधानिक संस्था का बचाव नहीं करना चाहते। चिराग ने कहा कि अगर जनता का चुनावी व्यवस्था से भरोसा उठने लगा तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं होगा। उन्होंने आगे कहा, ‘चुनाव आयोग को अधिक मजबूती से अपना स्पष्टीकरण जनता के सामने रखना चाहिए। जनता के मन में जो शंकाएं पैदा हुई हैं उन्हें दूर किया जाना चाहिए’।

इसके बाद राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, ‘एसआईआर पर उत्पन्न विवाद से जनता में काफी उलझन की स्थिति पैदा हो गई है। इस विषय को एड्रेस करने की जरुरत है। कंफ्यूजन दूर करने हेतु चुनाव आयोग द्वारा अविलंब सही स्थिति पर स्पष्टीकरण आना चाहिए’।

भाजपा के सहयोगी दबाव बना रहे हैं

उत्तर प्रदेश का चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहा है भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टियां दबाव बढ़ाने लगी हैं। इस बार भाजपा के सामने गठबंधन साधने की बड़ी चुनौती है। एक तरफ लोकसभा चुनाव के बाद बने हालात है, जिनमें भाजपा को अपने सामाजिक समीकरण की चिंता सता रही है तो दूसरी ओर गठबंधन की सहयोगी पार्टियां बढ़ गई हें, जो मौजूदा हालात को समझते हुए भाजपा के ऊपर ज्यादा सीट के लिए दबाव बना रही हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब दिल्ली आए थे और प्रधानमंत्री से मुलाकात करके लौटे थे, तब दिल्ली में सहयोगी पार्टियों के साथ सीट बंटवारे पर ही विचार विमर्श हुआ था। भाजपा के प्रभारी विनोद तावड़े के लिए कहा जा रहा है कि उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी के साथ भाजपा का बराबरी का तालमेल कराया था और चिराग पासवान, जीतन राम मांझी व उपेंद्र कुशवाहा जैसे चार सहयोगियों को सिर्फ 41 सीट में एडजस्ट किया था। इसलिए माना जा रहा है कि वे उत्तर प्रदेश में भी सहयोगियों से सीटों का तालमेल बैठा लेंगे।

लेकिन उत्तर प्रदेश के सहयोगी थोड़े मुश्किल मिजाज वाले हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने प्रदेश के बंटवारे का राग छेड़ दिया है। उन्होंने कहा है कि नई सरकार बनने के बाद राज्य का चार हिस्सों में बंटवारा होगा और पूर्वांचल में राजभर का राज होगा। गौरतलब है कि पिछले कई बरसों से उत्तर प्रदेश के बंटवारे की बात हो रही है। लेकिन केंद्र सरकार सीमा के पुनर्निधारण के काम में नहीं उलझना चाहती है। इसमें बिहार की सीमा भी बदलेगी। तभी इसे टाला जा रहा है। लेकिन राजभर ने अपने मतदाताओं को मैसेज देने और भाजपा पर दबाव डालने के लिए यह राग छेड़ दिया। इससे पहले भाजपा के दूसरे सहयोगी संजय निषाद ने अचानक एक दिन विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और सपा के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात की। कहा गया कि यह शिष्टाचार मुलाकात है। लेकिन राजनीति में तो अब शिष्टाचार लगभग पूरी तरह से समाप्त हो गया है। इसलिए यह दबाव बनाने की राजनीति का ही हिस्सा दिखाई देता है।

असल में पिछली बार भारतीय जनता पार्टी के पास दो ही सहयोगी पार्टियां थी। संजय निषाद की निषाद पार्टी और अनुप्रिया पटेल के अपना दल। इस बार दो और सहयोगी जुड़ गए हैं। जयंत चौधरी की रालोद और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। ये दोनों पार्टियां पिछली बार समाजवादी पार्टी के गठबंधन में लड़ी थीं। पिछली बार भाजपा अकेले 376 सीटों पर लड़ी और दोनों गठबंधन की पार्टियों को 27 सीटों में एडजस्ट किया। अब रालोद और निषाद पार्टी को इससे ज्यादा सीटें चाहिए। जयंत चौधरी के साथ कम से कम 30 सीटों पर समझौता होना है और निषाद को भी 15 से ज्यादा सीटें चाहिएं। अगर इतनी सीटों पर समझौता होता है तो इसका अर्थ होगा कि भाजपा के लिए 330 के आसपास सीटें बचेंगी। भाजपा के जानकार सूत्रों का कहना है कि पार्टी को हर हाल में साढ़े तीन सौ सीटों पर लड़ना है। यानी चार सहयोगी पार्टियों को सिर्फ 53 सीटों में एडजस्ट करना है। यह मुश्किल लग रहा है। भाजपा को साढ़े तीन सौ सीटों से नीचे जाना होगा। भाजपा के सहयोगी भी समझ रहे हैं कि पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ी, राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और अखिलेश के पीडीए दांव की वजह से भाजपा को उनकी जरुरत है। गैर यादव पिछड़ा वोट इन पार्टियों के जरिए सुनिश्चित होगा। इसलिए यह तय है कि सीट बंटवारा भाजपा के लिए आसान नहीं रहने वाला है।

दलबदल में चुनाव आयोग की मनमानी!

ऐसा लग रहा है कि दलबदल के मामले में चुनाव आयोग को किसी नियम का पालन करने की जरुरत नहीं महसूस होती है। वह अपनी या सत्तारूढ़ दल की सुविधा के हिसाब से नियमों को लागू करती है। अगर ऐसा नहीं होता है तो लोक जनशक्ति पार्टी से लेकर शिव सेना और एनसीपी से होते हुए तृणमूल कांग्रेस तक के ऊपर अलग अलग नियम नहीं लागू किए जाते है। ताजा मामला तृणमूल कांग्रेस में हुई दलबदल का है। चार मई को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के थोड़े दिन के बाद ममता बनर्जी की पार्टी टूट गई। उनके करीब 60 विधायकों ने अलग गुट बना लिया, जिसे स्पीकर ने मान्यता भी दे दी। इसी तरह ममता के 20 सांसद भी टूट कर अलग हो गए। हैरानी की बात है कि विधायकों को दो तिहाई की संख्या के आधार पर मान्यता दे दी लेकिन उसी नियम के हिसाब से लोकसभा में स्पीकर ने अलग मान्यता नहीं दी। इसके उलट सांसदों ने त्रिपुरा की एक गुमनाम सी पार्टी ज्वाइन की और अब खबर है कि उन 20 में से 17 भाजपा में शामिल होने वाले हैं। सोचें, चुनाव आयोग की नाक के नीचे नियमों को तोड़मरोड़ कर एक पार्टी के सांसदों को वाया एनसीपीआई भाजपा में शामिल कराने की तैयारी है और चुनाव आयोग मूक दर्शक है।

विधायकों के मामले में भी आयोग ने कोई फैसला नहीं किया है। उसने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह और नाम दोनों फ्रीज कर दिया। अब उनकी पार्टी का नाम ममता टीएमसी होगा और अलग हुए गुट का नाम डेमोक्रेटिक टीएमसी होगा। दोनों के अलग अलग चुनाव चिन्ह होंगे। ममता का कहना है कि जब पार्टी के टूटने या किसी दूसरी पार्टी में विलय का मामला ही नहीं है तो फिर कैसे उनसे उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह छीना जा रहा है? यह सवाल बहुत सही है क्योंकि संविधान के 91वें संशोधन के बाद दलबदल कानून में से पार्टी टूटने के प्रावधान को हटा दिया गया है। अब किसी पार्टी का दूसरी पार्टी में विलय होगा और दो तिहाई बहुमत से उस विलय की मंजूरी कराई जाएगी। ममता बनर्जी की पार्टी के मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

चुनाव आयोग ने यह नियम कई साल पर बिहार की लोक जनशक्ति पार्टी के मामले में लागू किया था। उस समय चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस पार्टी के छह में से पांच सांसदों को लेकर अलग हो गए थे। उस समय पारस को नीतीश कुमार का समर्थन था और नीतीश कुमार तब भाजपा के साथ थे। सो, स्पीकर से लेकर चुनाव आयोग तक का रुख अलग था। बाद में चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह जब्त कर लिया और दोनों को अलग अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए। लेकिन इसके बाद महाराष्ट्र में दो पार्टियां टूटीं। शिव सेना और एनसीपी। उनके मामले में चुनाव आयोग ने लोजपा वाला रास्ता नहीं अख्तियार किया। वहां टूट कर अलग हुई पार्टी को असली पार्टी की मान्यता दे दी। वहां दलबदल करने वाले एकनाथ शिंदे की पार्टी असली शिव सेना है। ऐसे ही दलबदल करने वाले अजित पवार की पार्टी असली एनसीपी हुई, जिसको अजित पवार के निधन के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार संभाल रही हैं। हालांकि शिव सेना का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट मे चल रहा है। जाहिर है चुनाव आयोग दलबदल कानून के नियमों के हिसाब से काम नहीं करता है और न संसद व विधानसभा के पीठासीन अधिकारी उस हिसाब से काम करते हैं।