Ramayana Trailer: ‘रामायणम्’ का ट्रेलर हुआ रिलीज, राम-सीता को देख इमोशनल हुए लोग, रावण ने जीता फैंस का दिल

Ramayana Trailer: महाकाव्य पर आधारित नितेश तिवारी की फिल्म ‘रामायणम्’ का ऑफिशियल ट्रेलर आज ब्रह्म मुहूर्त के मौके पर जारी किया गया। ट्रेलर में इस महाकाव्य की दुनिया की झलक दिखाई गई है, जिसमें रणबीर कपूर भगवान राम के रूप में स्क्रीन पर छाए हुए हैं। इसमें पहली बार साई पल्लवी के सीता वाले किरदार को भी दिखाया गया है। ट्रेलर में रणबीर के भगवान राम और यश के रावण के बीच होने वाली टक्कर पर भी फोकस किया गया है।

ट्रेलर में भगवान हनुमान का कोई जिक्र या सीन नहीं है, शायद उन्हें दूसरे भाग के लिए बचाकर रखा गया है। इस फिल्म के म्यूजिक के लिए ऑस्कर विजेता ए.आर. रहमान और हैंस जिमर पहली बार साथ आए हैं, जबकि विज़ुअल इफ़ेक्ट्स का काम DNEG संभाल रही है। एक और बड़ी उपलब्धि के तौर पर, T-सीरीज़ ने प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ​​के प्राइम फ़ोकस स्टूडियोज़ के साथ ₹75 करोड़ की रिकॉर्ड-तोड़ डील करके फ़िल्म के दोनों हिस्सों के म्यूज़िक राइट्स खरीद लिए हैं।

‘रामायणम्’ वाल्मीकि के महाकाव्य का नया रूपांतरण है, जो दुनिया के सबसे पुराने साहित्य में से एक है। यह भगवान विष्णु के अवतार भगवान राम (रणबीर कपूर) और असुर राजा रावण (यश) के बीच हुई लड़ाई की कहानी है, जो राम की पत्नी सीता (साई पल्लवी) का अपहरण कर लेता है। यह महाकाव्य भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे जानी-मानी कहानियों में से एक है और हिंदू इसे एक पवित्र ग्रंथ मानते हैं।

फिल्म की पहली झलक, जिसे ‘राम झलक’ कहा गया, अप्रैल में दुनिया भर में दिखाई गई थी। जहां कई लोगों ने इसके विज़ुअल इफेक्ट्स और बड़े पैमाने की तारीफ़ की, वहीं कुछ लोगों ने किरदारों के डिज़ाइन, खासकर असुरों के डिज़ाइन की आलोचना की, क्योंकि वे बहुत ज़्यादा पश्चिमी शैली से प्रेरित लग रहे थे। ‘रामायण’ का ट्रेलर 18 जुलाई को नई दिल्ली में ‘प्रथम संकल्प’ इवेंट में दिखाया गया था, जिसके बाद इसकी कुछ क्लिप्स ऑनलाइन लीक हो गईं। इस बीच, प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ​​ने इंस्टाग्राम पर घोषणा की: “आज हमारी ‘रामायण’ के लिए एक बहुत ही खास पल है। सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट के साथ हमारी साझेदारी से रामायण को दुनिया तक पहुँचाने का मेरा सपना अब सच हो रहा है। इसे ध्यान में रखते हुए, हम अब अपना ट्रेलर बाद की किसी तारीख़ पर दुनिया भर में लॉन्च करेंगे।”

उनके नोट में आगे कहा गया-“भारतीय सिनेमा के 100 से ज़्यादा सालों के इतिहास में यह गर्व का पल होगा, जब रामायण को दुनिया भर में किसी बड़ी हॉलीवुड फ़िल्म की तरह दिखाया जाएगा। यह इसलिए भी खास है क्योंकि इससे दुनिया भर के लोगों के लिए हमारी संस्कृति और हमारी कहानियों की समृद्धि को नए गर्व और उत्साह के साथ जानने का मौका मिलेगा। मैं उन सभी फ़ैन्स और रामायण में विश्वास रखने वालों का शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने इसे मुमकिन बनाया। हमारे देश के युवा ही हमारा भविष्य हैं, आइए हम सब मिलकर अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें,”

‘रामायणम् पार्ट वन’ दुनिया भर में 8 नवंबर को दिवाली के मौके पर रिलीज़ होगी। इसका दूसरा भाग 2027 में आएगा। इन फ़िल्मों में सनी देओल भगवान हनुमान की भूमिका में और रवि दुबे लक्ष्मण की भूमिका में नज़र आएंगे।

Guru Purnima Satya Narayan Vrat Katha: आज गुरु पूर्णिमा के मौके पर पढ़ें सत्यनारायण भगवान की ये कथा, जीवन से मिट जाएगी दुख-दरिद्रता

Guru Purnima Satya Narayan Vrat Katha: हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष स्थान है। पूरे हिंदू कैलेंडर में हर माह एक पूर्णिमा तिथि आती है। इस तरह पूरे साल में 12 पूर्णिमाएं आती हैं। इनमें से ही एक है आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि। आषाढ़ पूर्णिमा की तिथि गुरु को समर्पित है और इस दिन लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं और उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं। पूर्णिमा तिथि पर गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान, दान, और सत्यनारायण भगवान का व्रत और कथा भी की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से सत्यनारायण व्रत कथा सुनने से जीवन के सभी दुख-दरिद्रता दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है। माना जाता है कि चतुर्मास के दौरान सत्यनारायण कथा करवाने से विशेष फल मिलता है और श्रीहरि की कृपा बनी रहती है। आइए जानें सत्यनारायण व्रत कथा के बारे में

सत्यनारायण की कथा

कथा के अनुसार, एक बार नारद जी पृथ्वी लोक पर घूमते हुए लोगों की स्थिति देखकर दुखी हो गए। उन्होंने देखा कि मनुष्य अपने कर्मों के कारण तरह-तरह के कष्ट झेल रहे हैं। यह देखकर उनका मन करुणा से भर गया और वे भगवान विष्णु के पास क्षीरसागर पहुंच गए। वहां उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि कोई ऐसा सरल उपाय बताएं, जिससे लोगों के दुख दूर हो सकें। भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा कि उन्होंने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है।

इसके बाद उन्होंने श्री सत्यनारायण व्रत के बारे में बताया, जो बहुत पुण्य देने वाला और मोक्ष दिलाने वाला माना जाता है। भगवान ने कहा कि इस व्रत को श्रद्धा और विधि से करने पर मनुष्य के जीवन के दुख दूर होते हैं और उसे सुख-समृद्धि मिलती है। इसके बाद यह व्रत एक ब्राह्मण, लकड़हारे, राजा और व्यापारी जैसे कई लोगों ने किया और उन्हें इसका लाभ मिला। इससे यह संदेश मिलता है कि यह व्रत कोई भी व्यक्ति कर सकता है, चाहे वह अमीर हो या गरीब, पुरुष हो या महिला।

कथा में एक व्यापारी का भी उल्लेख मिलता है, जिसने पहले इस व्रत को गंभीरता से नहीं लिया। उसने संतान होने के बाद व्रत करने का वादा किया, लेकिन बाद में भी टालता रहा। परिणामस्वरूप उसे कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। बाद में जब उसकी पत्नी और बेटी ने श्रद्धा से व्रत किया, तो भगवान की कृपा से उसके सभी कष्ट दूर हो गए।

इसी तरह एक राजा ने भी भगवान का अनादर किया और प्रसाद तक नहीं लिया, जिसके कारण उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। बाद में जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सच्चे मन से पूजा की, तो उसकी सारी परेशानियां खत्म हो गईं। मुख्य संदेश यह है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है। सत्य को अपनाना और भक्ति के मार्ग पर चलना ही इस व्रत का असली महत्व है।

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Guru Purnima 2026: आज गुरु पूर्णिमा के साथ मनाया जाएगा व्यास जयंति और शिव शयनोत्सव का पर्व, जानें आज मनाए जा रहे त्योहारों का महासंगम

Guru Purnima 2026: आज आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि है। धार्मिक मान्यतओं के अनुसार, आज के दिन गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है, जो जीवन में मार्ग दर्शन करने वाले सभी गुरुओं को समर्पित है। साथ ही, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाभारत के रचयिता महर्षि वेद वयास का जन्म भी आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए आज व्यास जयंति भी मनाते हैं। इसके अलावा, आज के दिन भागवान शिव का शयनोत्सव भी मनाया जाता है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन आषाढ़ी पूर्णिमा, सत्यनारायण व्रत और बुधवार व्रत का पावन संयोग भी बन रहा है। ज्योतिष और धर्मशास्त्र के अनुसार एक ही दिन इन सभी पर्वों का संगम साधना, ज्ञान, भक्ति और पुण्य प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धालुओं को इस दिन गुरु पूजन, भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना के साथ व्रत एवं दान-पुण्य करने का अवसर मिल रहा है। आइए जानें आज कौन-कौन से पर्व मनाए जाएंगे

गुरु पूर्णिमा : गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस दिन अपने गुरु का पूजन, आशीर्वाद प्राप्त करना तथा शिक्षा और आध्यात्मिक उन्नति का संकल्प लेना विशेष फलदायी माना जाता है।

आषाढ़ी पूर्णिमा : आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को आषाढ़ी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। यह दिन स्नान, जप, तप, दान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। साथ ही पितरों के नाम का भोजन और दान करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।

व्यास पूजा : गुरु पूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। उन्होंने वेदों का विभाजन, महाभारत और अनेक पुराणों की रचना कर सनातन ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया। इसलिए इस दिन व्यास पूजा कर उन्हें आदिगुरु के रूप में स्मरण किया जाता है।

सत्यनारायण व्रत : पूर्णिमा तिथि भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। इस दिन सत्यनारायण व्रत और कथा का सुनने के बाद श्रद्धालु पंचामृत, फल और प्रसाद अर्पित करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से श्रीहरि और माता लक्ष्मी की कृपा रहती है।

शिव शयनोत्सव : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा पर भगवान शिव का शयनोत्सव भी मनाया जाता है। जैसे देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु योग निद्रा में जाते हैं, उसी तरह भगवान शिव भी शयन के लिए चले जाते हैं और सृष्टि का कार्यभार रूद्र संभालते हैं। इस दिन शिव मंदिरों में विशेष श्रृंगार, रुद्राभिषेक और शयन आरती की जाती है।

बुधवार व्रत : इस बार पूर्णिमा तिथि बुधवार के दिन पड़ रही है। बुधवार का दिन प्रथम पूज्य भगवान गणेश और ग्रहों के राजकुमार बुधदेव को समर्पित है। मान्यत है कि इस दिन गणपति की पूजा करने से बुद्धि, विवेक, व्यापार, शिक्षा और वाणी से जुड़े कार्यों में सफलता प्राप्त होती है और कुंडली में बुध ग्रह की स्थिति मजबूत होती है।

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Guru Purnima 2026 Date: 28 या 29, कब है गुरु पूर्णिमा? जानें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और सही तारीख

Guru Purnima 2026 Date: गुरु पूर्णिमा, जिसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं, हिंदू धर्म के अत्यंत प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है। यह पर्व अपने शिक्षक या गुरु के प्रति आभार और सम्मान प्रकट करने का अवसर प्रदान करता है। हिंदू धर्म में गुरु का स्थान माता-पिता और भगवान से भी ऊपर माना जाता है। “गुरु” शब्द संस्कृत से आया है, जहां ‘गु’ का मतलब है ‘अंधेरा’ या ‘अज्ञान’ और ‘रु’ का मतलब है ‘अंधेरे को दूर करने वाला’। गुरु पूर्णिमा न सिर्फ हिंदू धर्म में मनाई जाती है, बल्कि जैन और बौद्ध धर्म में भी इसका बहुत महत्व है।

हिंदू धर्म में, गुरु पूर्णिमा महर्षि वेद व्यास के सम्मान में मनाई जाती है। वहीं, बौद्ध धर्म में, यह सारनाथ में भगवान बुद्ध के पहले उपदेश का प्रतीक है। जबकि, जैन धर्म में, यह भगवान महावीर के पहले शिष्य, गौतम स्वामी के सम्मान में मनाई जाती है। कुल मिलाकर, यह त्योहार आभार, सीखने और आध्यात्मिक विकास का प्रतीक है। गुरु पूर्णिमा के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है, इस दिन व्यक्ति का अन्न दान भी किया जाता है, मान्यता है कि अन्न दान करने से लोगों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं, मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्यक्ति को स्नान-ध्यान करने के बाद गुरु के पास जाकर उनकी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।

गुरु पूर्णिमा 2026: तारीख, समय और तिथि

द्रिक पंचांग के अनुसार, गुरु पूर्णिमा 2026 बुधवार, 29 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी। यह त्योहार हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार आषाढ़ महीने की पूर्णिमा (पूर्णिमा) को पड़ता है।

गुरु पूर्णिमा समय

पूर्णिमा तिथि शुरू : 28 जुलाई, 2026 को शाम 06:18 बजे

पूर्णिमा तिथि खत्म : 29 जुलाई, 2026 को रात 08:05 बजे

गुरु पूर्णिमा 2026 : मतलब और महत्व

सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा का पर्व अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन गुरुओं को समर्पित होता है, जिन्होंने हमें ज्ञान, संस्कार और सही दिशा दिखाई है। इसी पावन तिथि पर महर्षि वेद व्यास जी का जन्म भी हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गुरुजनों का पूजन कर उनका आशीर्वाद लेने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।

गुरु पूर्णिमा स्नान दान मुहूर्त

गुरु पूर्णिमा के दिन स्नान और दान ब्रह्म मुहूर्त में करना चाहिए। इसका मुहूर्त सुबह 4 बजकर 17 मिनट से लेकर सुबह 4 बजकर 59 मिनट तक रहेगा।

क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा?

धार्मिक पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही महाभारत, 18 पुराणों और ब्रह्मसूत्रों के रचयिता महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था। महर्षि व्यास को ही सनातन परंपरा में प्रथम गुरु का दर्जा प्राप्त है, क्योंकि उन्होंने ही चारों वेदों का वर्गीकरण किया था। इसी कारण गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन शिष्य अपने गुरुओं की पूजा करते हैं, उन्हें उपहार भेंट करते हैं और उनके बताए सन्मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

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Chaturmaas 2026 Upay: चतुर्मास में तुलसी के ये 5 उपाय बढ़ाएंगे जीवन में धन-धान्य, जानें कब और कैसे करें पूजा

Chaturmaas 2026 Upay: देवशयनी एकादशी के दिन सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु चार माह के शयन के लिए पाताल लोक प्रस्थान करते हैं। इसलिए आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। ये चार माह जब भगवान विष्णु शयन करते हैं, उसे ही चतुर्मास कहते हैं। यह अवधि सावन, भादों, आश्विन और कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक रहती है। इन चार महीनों के दौरान हिंदू धर्म में मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। चतुर्मास के दौरान तुलसी के कुछ उपाय करना भी लाभकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी को मां लक्ष्मी का रूप माना जाता है और उन्हें विष्णुप्रिया कहा जाता है। इसलिए माना जाता है कि आज के दिन तुलसी के 5 उपाय करने से मां लक्ष्मी की कृपा सदा घर-परिवार पर बनी रहती है और सुख-समृद्धि आती है।

तुलसी नामाष्टक का पाठ करें : चतुर्मास में तुलसी के पौधे के सामने तुलसी नामाष्टक का 108 बार जाप करने से आर्थिक तंगी और कर्जों से मुक्ति मिलती है। तुलसी माता के 8 नाम वृंदा, वृंदानी, श्वपावनी, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, नंदिनी, कृष्णजीवनी और तुलसी का जाप करना बहुत शुभ माना जाता है।

तुलसी माता का करें श्रृंगार : चतुर्मास के दौरान तुलसी माता को 16 श्रृंगार का सामान अर्पित करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। तुलसी माता की कृपा से जीवन में आर्थिक संपन्नता आती है।

तुलसी पर जलाएं दीपक : तुलसी के पास दीपक जलाने से करियर और व्यापारिक बाधाएं दूर होती हैं और सफलता के साथ मां लक्ष्मी की कृपा से आर्थिक उन्नति के मार्ग खुलते हैं। मान्यता है कि इस दिन 11, 21 या 51 दीपक जलाने चाहिए। भक्ति भाव के साथ तुलसी चालीसा का पाठ करना चाहिए।

भगवान विष्णु को अर्पित करें तुलसी दल : भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु को भोग लगाते समय तुलसी दल जरूर शामिल करें। लेकिन एकादशी के दिन तुलसी नहीं तोड़नी चाहिए, पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले तोड़ लें।

तुलसी की करें परिक्रमा : तुलसी पूजन के बाद परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से भाग्य का साथ मिलता है। भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है।

Devshayani Ekadashi 2026: आज देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ जरूर करें तुलसी की पूजा, जानें विधि और महत्व

Devshayani Ekadashi 2026: आज योग निद्रा में जाएंगे भगवान विष्णु, भद्रा से बचकर इस समय पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से करें श्रीहरि की पूजा

Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखता है। यह व्रत हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के साथ भगवान विष्णु का शयन काल प्रारंभ होता है और चतुर्मास लग जाता है। चतुर्मास यानी सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक के चार महीनों की अवधि। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु पाताल लोक में योग निद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवउठनी एकादशी के दिन जागते हैं।

इन चार महीनों के दौरान हिंदू धर्म में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। सृष्टि के संचालन का काम भगवान शिव संभालते हैं। इस साल देवशयनी एकादशी का व्रत आज, 25 जुलाई 2026 को किया जा रहा है। माना जाता है कि आज के दिन भगवान विष्णु की पूरे विधि-विधान से पूजा और उपवास करने से श्री हरि प्रसन्न होते हैं। आज देवशयनी एकादशी के दिन भद्रा लग रही है। इसलिए आइए जानें, आज पूजा के लिए भद्रा रहित मुहूर्त क्या होगा और अन्य शुभ मुहूर्त क्या हैं ?

देवशयनी एकादशी पर भद्रा

इस साल पंचांग के अनुसार, देवशयनी एकादशी पर भद्रा सुबह 05:27 बजे से सुबह 11:34 बजे तक रहेगी। इस दिन चंद्रमा वृश्चिक राशि में रहेंगे। ऐसे में देवशयनी एकादशी पर पृथ्वी पर भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा।

देवशयनी एकादशी कब से कब तक?

एकादशी तिथि प्रारम्भ – जुलाई 24, 2026 को सुबह 09:12 बजे

एकादशी तिथि समाप्त – जुलाई 25, 2026 को सुबह 11:34 बजे

देवशयनी एकादशी पर पूजा कब करना चाहिए?

ब्रह्म मुहूर्त : सुबह में 04:03 बजे से 04:45 बजे तक

अभिजित मुहूर्त : सुबह में 11:46 बजे से दोपहर 12:40 बजे

विजय मुहूर्त : दोपहर 02:28 बजे से दोपहर 03:22 बजे

गोधूलि मुहूर्त : शाम 06:58 पी एम से शाम 07:19 बजे

अमृत काल : रात 09:41 बजे से रात 11:29 बजे

निशिता मुहूर्त : रात 11:52 बजे से रात 12:34 बजे, जुलाई 26

देवशयनी एकादशी व्रत का पारण कब होगा?

पारण समय : 26 जुलाई को सुबह 05:28 बजे से 08:10 बजे

देवशयनी एकादशी पर क्या करें?

  • इस दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और पीले या हल्के रंग के कपड़े पहनें।
  • पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें।
  • पूजा में चंदन, पीले पुष्प, धूप, दीप और तुलसी दल अवश्य अर्पित करें, क्योंकि तुलसी के बिना श्रीहरि की पूजा अधूरी मानी जाती है।
  • पूजा के दौरान ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • यथाशक्ति उपवास रखें और सात्विक विचारों का पालन करें।
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, जल या दक्षिणा का दान करें।
  • शाम के समय भगवान विष्णु की आरती कर खीर, माखन-मिश्री, फल या अन्य सात्विक प्रसाद का भोग लगाएं।
  • एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है।

देवशयनी एकादशी पर क्या ना करें?

  • देवशयनी एकादशी के दिन तामसिक भोजन, मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज और नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • व्रत ना भी रखने वालों को इस दिन चावल का सेवन करने से बचना चाहिए।
  • क्रोध, झूठ, कटु वचन, विवाद और किसी का अपमान करने से बचें।
  • पेड़-पौधों को अनावश्यक नुकसान न पहुंचाएं और किसी भी जीव को कष्ट ना दें।
  • एकादशी के दिन तुलसी को स्पर्श और उसके पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए।

Hariyali Teej 2026 Date: सावन में कब मनाई जाएगी हरियाली तीज? जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

Hariyali Teej 2026 Date: सावन में कब मनाई जाएगी हरियाली तीज? जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त

Hariyali Teej 2026 Date: सावन का महीना हरियाली और भगवान शिव की आराधना के लिए जाना जाता है। लेकिन इस माह की एक विशेषता भी है। ये महीना माता पार्वती के तप, त्याग और समर्पण की याद दिलाता है, जब महिलाएं और अविवाहित कन्याएं अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य के लिए हरियाली तीज का पर्व मनाती हैं। हरियाली तीज का पूरे साल में आने वाले प्रमुख तीज पर्व में अहम स्थान है। यह व्रत हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन माता पार्वती ने वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। माना जाता है कि माता पार्वती के इस समर्पण और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में अपनाया था। यही कारण है कि इस दिन सुहागिन महिलाएं माता गौरी की पूजा कर उनसे अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना के लिए इस व्रत का पालन करती हैं।

हरियाली तीज 2026: सही तारीख

सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारंभ 14 अगस्त को शाम 06:48 बजे से होकर 15 अगस्त को शाम 05:30 बजे तक रहेगा। उदयातिथि के अनुसार यह व्रत 15 अगस्त को ही मनाया जाएगा।

पूजा और व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य विशेष नियम

हरियाली तीज का व्रत पति की लंबी उम्र, सुखी शादीशुदा जिंदगी और मनचाहा वर पाने के लिए रखा जाता है। इस दिन पूजा-अर्चना करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें :

हरा रंग और सोलह श्रृंगार : पूजा के समय हरे रंग के वस्त्र (जैसे साड़ी/सूट) पहनें, हाथों में हरी चूड़ियां पहनें और मेहंदी लगाएं। हरा रंग प्रकृति, सावन और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

सिंधारा की परंपरा : इस दिन मायके से आए सिंधारे का प्रयोग करें और सास या किसी वरिष्ठ महिला का आशीर्वाद लें। सिंधारे में वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, घेवर व मिठाइयां होती हैं।

व्रत संकल्प व व्रत कथा : सुबह स्नान के बाद सच्चे मन से व्रत का संकल्प लें और शाम को भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा करते समय हरियाली तीज की व्रत कथा अवश्य सुनें।

माता पार्वती को सुहाग सामग्री देना : पूजा के दौरान देवी पार्वती को लाल चुनरी और श्रृंगार का सामान (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां आदि) अर्पित करें।

हरियाली तीज में ये वर्जित है

  • पूजा या व्रत के दौरान काले या सफेद रंग के कपड़े पहनने से बचें। लाल, हरा या अन्य शुभ रंग पहनना उत्तम होता है।
  • इस दिन किसी से झगड़ा या कटु वचन न बोलें और मन में किसी के प्रति नकारात्मक विचार न लाएं।
  • घर में सात्विक माहौल रखें और लहसुन-प्याज या तामसिक चीजों का सेवन बिल्कुल न करें।
  • परंपरा अनुसार यदि आपने निर्जला व्रत का संकल्प लिया है, तो पूजा और कथा पूर्ण होने से पहले व्रत न खोलें।

Devshayani Ekadashi 2026 Katha: कल किया जाएगा देवशयनी एकादशी का व्रत, भगवान विष्णु की पूजा में जरूर सुनें मोक्ष प्रदान करने वाली ये कथा

Devshayani Ekadashi 2026 Katha: कल किया जाएगा देवशयनी एकादशी का व्रत, भगवान विष्णु की पूजा में जरूर सुनें मोक्ष प्रदान करने वाली ये कथा

Devshayani Ekadashi 2026 Katha: हिंदू वर्ष में देवशयनी एकादशी तिथि का विशेष स्थान है। हरिशयनी एकादशी हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु इस दिन से चार माह के पाताल लोक में विश्राम करने चले जाते हैं। इस दौरान वह योग निद्रा में रहते हैं और चतुर्मास शुरू होता है। चतुर्मास के दौरान, मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। भक्त इस दिन भगवान विष्णु की पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं और कथा सुनते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सतयुग की व्रत कथा सुनने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस साल देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई 2026, शनिवार को मनाया जाएगा। यह व्रत ब्रह्म योग और ज्येष्ठा नक्षत्र में रखा जाएगा। इस व्रत का पारण 26 जुलाई को सुबह 05:39 बजे से 08:22 बजे के बीच कभी भी कर सकते हैं।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप हमें आषाढ़ शुक्ल एकादशी व्रत की विधि और महिमा के बारे में बताएं। इसमें किस देवता की पूजा होती है? इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को इस व्रत की महिमा का बखान किया था, वही मैं तुमको बताता हूं।

सतयुग का समय था, उस समय चक्रवर्ती सम्राट मांधाता का शासन था। उनकी प्रजा सुखी और संपन्न थी। लेकिन एक बार ऐसा समय आया कि उनके राज्य में 3 साल तक अकाल पड़ गया। वर्षा न होने से चारों ओर हाहाकार मच गया। इसकी वजह से धार्मिक कार्य जैसे हवन, यज्ञ, कथा, व्रत, पूजा, पिंडदान आदि में कमी होने लगी। जनता ने सम्राट मांधाता को अपनी पीड़ा बयान की। उनकी बातें सुनकर वह भी दुखी हो गए।

वह राज्य में अकाल की स्थिति से पहले भी काफी दुखी थे। वे सोचने लगे कि उनको किस पाप की वजह से ऐसा दंड मिला है। इससे मुक्ति के लिए वे एक दिन सेना के साथ जंगल की ओर चले गए। वहां उनको अंगिरा ऋषि का आश्रम दिखाई दिया, तो वे अंदर गए और अंगिरा ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। ऋषि ने राजा से आगमन का कारण पूछा।

तब राजा ने कहा कि वे अपने धर्म का पालन करते हैं और प्रजा की सेवा में कोई कमी नहीं रखते, फिर भी ऐसा दिन देखना पड़ रहा है। आप मुझे इस स्थिति से बाहर निकलने का उपाय बताएं। इस पर अंगिरा ऋषि ने कहा कि सतयुग में छोटे भी पाप का बड़ा दंड भुगतना पड़ता है। इस भीषण अकाल से बचने का एक उपाय है। आप आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करें। रात्रि में जागरण करके अगले दिन दान आदि के बाद पारण करें। श्रीहरि की कृपा से अकाल मिटेगा, बारिश होगी और फिर आपका राज्य उन्नति करेगा।

राजा मांधाता आश्रम से विदा लेकर अपने राजमहल लौट आए। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन उन्होंने विधिपूर्वक व्रत रखकर पूजा की। अंगिरा ऋषि के सुझाव के अनुसार, उन्होंने दान और पारण किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उनके राज्य में बहुत अच्छी वर्षा हुई और अकाल खत्म हो गया। बारिश होने से उनके राज्य में फिर से सुख और समृद्धि आ गई। उनका राज्य धन और धान्य से भर गया।

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Devshayani ekadashi 2026: 25 जुलाई को किया जाएगा देवशयनी एकादशी का व्रत, जानें इस दिन के लिए पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट

Devshayani ekadashi 2026: हिंदू धर्म देवशयनी एकादशी का बहुत महत्व है। यह व्रत हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। इसी दिन से भगवान श्री हरि विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास की शुरुआत होती है। इसके बाद से सभी मांगलिक कार्य रुक जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से सृष्टि के पानलहार भगवान विष्णु की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

इस साल यह व्रत 25 जुलाई को किया जाएगा। बहुत से श्रद्धालु इस दिन पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत करते हैं। इस दिन की जाने वाली पूजा के लिए सभी जरूरी सामग्री की पूरी लिस्ट हम यहां आपके लिए उपलब्ध करा रहे हैं। व्रत से पहले आप लिस्ट की मदद से अपनी पूजा की तैयारियों को अंतिम रूप दे सकते हैं। आइए जानें इस साल हरिशयनी एकादशी का व्रत की पूजा सामग्री क्या है और इस दिन पूजा विधि क्या है?

देवशयनी एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त

देवशयनी एकादशी तिथि : 25 जुलाई 2026 (शनिवार)

एकादशी तिथि प्रारंभ : 24 जुलाई 2026 को सुबह 09:12 बजे

एकादशी तिथि समाप्त : 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 बजे

ब्रह्म मुहूर्त (पूजा का श्रेष्ठ समय): सुबह 04:15 बजे से 04:58 बजे तक

व्रत पारण का समय, 26 जुलाई 2026: सुबह 05:39 बजे से 08:22 बजे के बीच

देवशयनी एकादशी 2026 पूजा सामग्री लिस्ट

  • भगवान विष्णु (श्री हरि) एवं माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र
  • पूजा की चौकी और उस पर बिछाने के लिए पीला कपड़ा, साथ ही भगवान के लिए पीले वस्त्र
  • पीले गेंदे/कमल के फूल और माला
  • तुलसी दल, रोली, अक्षत, पीला चंदन, हल्दी और केसर, धूप, देसी घी का दीपक और बाती, गंगाजल, पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, पान का पत्ता, सुपारी, लौंग, इलायची, जल का कलश और आचमनी

भोग सामग्री

5 प्रकार के मौसमी फल, पीले मिष्ठान (जैसे बेसन के लड्डू या पेड़ा), और पंजीरी/पंचमेवा

पूजा विधि

  • एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा स्थान की सफाई करके चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।
  • भगवान विष्णु को पंचामृत व गंगाजल से स्नान/अभिषेक कराएं और पीले चंदन का तिलक लगाएं।
  • देसी घी का दीपक और धूप जलाएं। पीले फूल, माला, और तुलसी पत्र अर्पित करें।
  • भगवान को पीले फल, मिठाई व पंचामृत का भोग लगाएं (ध्यान रखें कि भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल हो)।
  • मंत्र जाप : `”ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”` का 108 बार जाप करें।
  • देवशयनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • अंत में श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी जी की आरती करें। इसके बाद पूजा में हुई अनजाने की भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
  • चूंकि इस दिन से भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में जाते हैं, अतः पूजा के बाद उनके चित्र या छोटे विग्रह को प्रतीकात्मक रूप से विश्राम/शयन कराएं।

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Devshayani Ekadashi Vrat Ke Niyam: 25 जुलाई को योगनिद्रा में चले जाएंगे भगवान विष्णु, जानें हरिशयनी व्रत के ये अहम नियम

Devshayani Ekadashi Vrat Ke Niyam: हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी का व्रत किया जाता है। इस साल यह व्रत 25 जुलाई को किया जाएगा। इस दिन से भगवान विष्णु चार माह के लिए पाताल लोक में निवास करते हैं और योगनिद्रा में चले जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन से चतुर्मास लग जाते हैं और इस अवधि में शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। शास्त्रों और पद्मपुराण के अनुसार, इस दिन व्रत में कुछ नियमों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए अन्यथा व्रत का फल अधूरा रह सकता है।

देवशयनी एकादशी व्रत के नियम

देवशयनी एकादशी व्रत में क्या करना चाहिए?

  • देवशयनी एकादशी के दिन व्रती को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए। शास्त्रों में ब्रह्ममुहूर्त में स्नान का खास महत्व बताया गया है। इसके पश्चात मन में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु को एकादशी के दिन पीले, पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत और नैवेद्य अवश्य अर्पित करना चाहिए। साथ ही, भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें। ज्योतिष एक्सपर्ट पिनाकी मिश्रा बताते हैं कि तुलसी दल के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
  • व्रती को श्रीहरि की पूजा के दौरान ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ द्वादशाक्षरी मंत्र का जप भी अवश्य करना चाहिए। वैष्णव परंपरा में इसे भगवान विष्णु के प्रमुख उपासना मंत्रों में से एक माना गया है।
  • ज्योतिष एक्सपर्ट बताते हैं कि यदि निर्जला या निराहार व्रत करना संभव न हो, तो ऐसी स्थिति में क्षमता और स्वास्थ्य अनुसार फलाहार करना चाहिए। क्योंकि, व्रत का उद्देश्य केवल भोजन त्याग नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों का संयम भी है।
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या अपनी क्षमता अनुसार अनुसार दान करें। साथ ही, इस व्रत में सेवा और दया का भी विशेष महत्व बताया गया है।

देवशयनी एकादशी व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?

  • भूलकर भी देवशयनी एकादशी के दिन तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से प्रतिकूल प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में एकादशी तिथि पर मांस, मदिरा और अन्य तामसिक चीजों से दूरी बनाए रखें।
  • एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि को करने का विधान होता है। इस दिन नियमानुसार पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
  • एकादशी व्रत में चावल सहित धान्य का सेवन करना वर्जित माना गया है। इस नियम का परिवार के सदस्यों को भी ख्याल रखना चाहिए।
  • भूलकर भी किसी असहाय या अन्य व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिए। साथ ही, एकादशी के दिन अहिंसा जैसे कार्यों से भी बचना चाहिए।
  • कभी भी एकादशी के दिन कटु वचन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्रोध और असत्य से भी बचना चाहिए क्योंकि, यह व्रत केवल आहार का नहीं, बल्कि विचार और व्यवहार की शुद्धि का भी पर्व है।

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