पटरियों पर किसी के लिए धड़कती जिंदगी को लेकर दौड़ी ट्रेन! पहली बार वंदे भारत ट्रेन से पहुंचाया गया लाइव डोनर हार्ट

भारतीय रेलवे ने स्वास्थ्य सेवा और मानव जीवन को बचाने के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान बना दिया है। भारत में पहली बार ट्रेन के जरिए एक लाइव डोनर हार्ट एक शहर से दूसरे शहर पहुंचाया गया है। इस लाइफसेविंग मिशन को मुंबई सेंट्रल-गांधीनगर कैपिटल वंदे भारत एक्सप्रेस के जरिए अंजाम दिया गया। दिल को सूरत से अहमदाबाद लाया गया। यूएन मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर अहमदाबाद में ट्रांप्लांट के लिए इसके सफलतापूर्वक डिलिवर किया गया है।

तालमेल और ग्रीन कॉरिडोर से पूरा हुआ ये मिशन

आपको बता दें कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक टाइम बाउंड वाली सेंसटिव प्रक्रिया है। इसमें एक-एक मिनट की कीमत होती है। इस ऑपरेशन के लिए भारतीय रेलवे, रेलवे सुरक्षा बल (RPF), गुजरात राज्य पुलिस और चिकित्सा टीमों के बीच सटीक योजना और बिना किसी ब्रेक के कोऑर्डिनेशन की जरूरत थी। ट्रांसप्लांट प्रक्रिया बिना किसी देरी के शुरू हो सके, इसके लिए रेलवे सुरक्षा बल और गुजरात पुलिस द्वारा अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 से यूएन मेहता अस्पताल तक एक ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर अहमदाबाद के मंडल रेल प्रबंधक (DRM) वेद प्रकाश ने कहा कि यह भारतीय रेलवे के लिए बेहद गर्व और संतोष का क्षण है। वंदे भारत एक्सप्रेस के माध्यम से सूरत से अहमदाबाद तक लाइव डोनर हार्ट का सफल परिवहन पारंपरिक यात्री और माल ढुलाई से आगे बढ़कर समाज की सेवा करने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे जीवनरक्षक मिशनों में हर मिनट बेहद महत्वपूर्ण होता है। भारतीय रेलवे, आरपीएफ, गुजरात राज्य पुलिस और मेडिकल टीमों के बीच उत्कृष्ट समन्वय ने इस मिशन की सफलता सुनिश्चित की। मानव जीवन को बचाने में योगदान देना न सिर्फ हमारी जिम्मेदारी है बल्कि सेवा और मानवता के प्रति हमारा सर्वोच्च कर्तव्य भी है।

इस सफलता ने वंदे भारत एक्सप्रेस की गति, समय की पाबंदी और विश्वसनीयता को एक बार फिर साबित कर दिया है। यह मिशन दिखाता है कि कैसे देश का आधुनिक रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के आपातकालीन स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारतीय रेलवे ने इस चुनौतीपूर्ण मिशन को सफल बनाने के लिए रेलवे सुरक्षा बल, गुजरात पुलिस, डॉक्टरों, अंग प्रत्यारोपण समन्वयकों और रेलवे अधिकारियों सभी के प्रयासों की तारीफ की है।

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स्पेन में समुद्र के रास्ते घुसे हजारों मुस्लिम शरणार्थी : पुलिस और कोस्ट गार्ड हुए बेहाल, अब सेना ने संभाला मोर्चा!

Spain migrant crisis

Spain migrant crisis: भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) और अटलांटिक महासागर के रास्ते यूरोप में अवैध प्रवासन (Illegal Migration) संकट एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। उत्तर अफ्रीकी देशों और उप-सहारा (Sub-Saharan) क्षेत्र से लकड़ी और रबर की नावों में सवार होकर आए हजारों शरणार्थियों ने स्पेन के तटीय इलाकों में अप्रत्याशित रूप से प्रवेश किया है।

 

अचानक हुए इस भारी जनसांख्यिकीय दबाव के कारण स्थानीय पुलिस और स्पेनिश कोस्ट गार्ड (Salvamento Marítimo) की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और तटीय क्षेत्रों में व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्पैनिश सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और सशस्त्र बलों (Spanish Armed Forces) को मोर्चे पर तैनात कर दिया है।

कैसे पैदा हुए हालात? 

स्पेन के स्वायत्त शहरों— सेउटा (Ceuta) और मेलिला (Melilla)—के साथ-साथ केनरी द्वीप समूह (Canary Islands) और अंदालुसिया (Andalusia) के तटों पर बीते कुछ दिनों से नावों के आने का सिलसिला जारी है।

  • मानव तस्करी का नया रूट : तस्करों के नेटवर्क ने मोरक्को, अल्जीरिया और पश्चिमी अफ्रीका के तटों से समुद्र के रास्ते छोटे-छोटे जहाजों और रबर बोटों के जरिए हजारों प्रवासियों को समुद्र में उतारा।
  • कोस्ट गार्ड की सीमाएं : समुद्र में क्षमता से अधिक भरे जहाजों से कई बार हादसों का खतरा बना रहता है। स्पैनिश कोस्ट गार्ड लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन्स चला रहे हैं, लेकिन एक साथ सैकड़ों नावों के पहुंचने के कारण उनके संसाधन कम पड़ गए हैं।
  • स्थानीय बुनियादी ढांचे पर दबाव : तटीय क्षेत्रों में बने प्रोसेसिंग सेंटर (CIE – Centres for Internment of Foreigners) पूरी तरह भर चुके हैं। अस्पतालों और राहत शिविरों पर अत्यधिक दबाव देखा जा रहा है।

सेना की तैनाती और सरकार का रुख

स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए स्पेनिश गृह और रक्षा मंत्रालय ने समन्वय बनाकर प्रभावित तटीय सीमाओं और सेउटा/मेलिला की जमीनी सीमा पर सेना की विशेष टुकड़ियों को तैनात किया है।

  • सीमा सुरक्षा मजबूत करना : सेना और गार्डिया सिविल (Civil Guard) मिलकर सीमाओं पर बाड़ (Fencing) की निगरानी बढ़ा रहे हैं ताकि अवैध रूप से प्रवेश करने वालों को रोका जा सके।
  • मानवीय सहायता और रसद : सशस्त्र बल प्रवासियों को प्राथमिक चिकित्सा, भोजन, अस्थायी टेंट और आपातकालीन राहत सामग्री पहुंचाने में भी नागरिक प्रशासन की मदद कर रहे हैं।
  • यूरोपीय संघ (EU) से मदद की गुहार : स्पेन ने यूरोपीय संघ (European Union) की सीमा एजेंसी Frontex से अतिरिक्त सुरक्षा बल और आपातकालीन वित्तीय सहायता की मांग की है।

भू-राजनीतिक और सामाजिक कारण 

यूरोप में शरणार्थियों का यह संकट कोई नई घटना नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसके पीछे कई बड़े कारण उभरकर सामने आए हैं:

  • अफ्रीका में राजनीतिक अस्थिरता व गरीबी : पश्चिम और उत्तर अफ्रीका के कई देशों में राजनीतिक उथल-पुथल, आर्थिक संकट और सुरक्षा संबंधी खतरों के कारण लोग बेहतर भविष्य की तलाश में यूरोप का रुख कर रहे हैं।
  • यूरोपीय संघ की प्रवासन नीति (EU Migration Pact) : यूरोपीय संघ के देशों के बीच शरणार्थियों के पुनर्वास और सीमा नियंत्रण को लेकर खींचतान जारी है। इटली, ग्रीस और स्पेन जैसे अग्रिम सीमा वाले देश इस संकट का सबसे ज्यादा असर झेल रहे हैं।

आगे क्या होगा?

स्पेन सरकार एक ओर जहां कानूनी प्रक्रिया के तहत प्रवासियों के कागजात की जांच कर रही है, वहीं दूसरी ओर मोरक्को और अन्य पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक बातचीत जारी है ताकि अवैध प्रवासन के नेटवर्क को शुरुआती बिंदु पर ही रोका जा सके। कानून और व्यवस्था बनाए रखना और इसके साथ ही मानवीय संवेदनाओं का संतुलन साधना वर्तमान में स्पेनिश प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

 

Spain Migrant Crisis : सीमा तोड़कर स्पेन में घुसे हजारों प्रवासी, नौ की मौत…बुलाई गई सेना मचा हड़कं

मोरक्को और स्पेन के बॉर्डर पर एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। गुरुवार को हजारों प्रवासी बॉर्डर पार करके स्पेन के उत्तरी अफ्रीकी इलाके ‘स्यूटा’ में दाखिल हुए। वहीं मोरक्को से हजारों प्रवासियों के स्पेन के उत्तरी अफ्रीकी शहर स्यूटा में पहुंचने के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। स्थिति को देखते हुए स्पेन सरकार ने वहां सेना तैनात करने का फैसला किया है। अधिकारियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कई वर्षों में यह सबसे बड़ा सीमा संकट है। बड़ी संख्या में लोगों के सीमा पार करने के दौरान कम से कम नौ लोगों की मौत हो गई। सरकार ने कहा है कि सशस्त्र बल स्यूटा में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सिविल गार्ड की मदद करेंगे।

हालात का जायजा लेने के लिए स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ और गृह मंत्री फर्नांडो ग्रांडे-मार्लास्का शुक्रवार को स्यूटा पहुंचे। यह नया सीमा संकट गुरुवार को शुरू हुआ, जब हजारों प्रवासी तैरकर, हवा भरे फ्लोट या अन्य तैरने वाले साधनों की मदद से और सीमा पर लगी बाड़ पार करके स्यूटा में दाखिल हो गए।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो

स्यूटा में बड़ी संख्या में लोगों के घुसने के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो में कई प्रवासी स्पेनिश इलाके में पहुंचने के बाद जश्न मनाते दिखाई दे रहे हैं। इससे साफ है कि बहुत कम समय में बड़ी संख्या में लोग सीमा पार कर गए। अधिकारियों का कहना है कि अचानक इतनी बड़ी भीड़ आने से सुरक्षा बलों पर भारी दबाव पड़ गया। एपी की रिपोर्ट के अनुसार, स्यूटा में सिविल गार्ड अधिकारियों के संगठन के प्रमुख रचिद स्बिही ने कहा कि हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गए हैं और सीमा सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हुई है।

स्पेन सरकार ने अभी तक सीमा पार करने वाले लोगों की आधिकारिक संख्या जारी नहीं की है। हालांकि, सरकारी प्रसारक TVE के अनुमान के मुताबिक, कुछ ही घंटों में करीब 2,000 से 3,000 प्रवासी स्यूटा में दाखिल हो गए। स्यूटा के प्रमुख जुआन जीसस विवास ने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों से समुद्र के रास्ते हर दिन करीब 300 प्रवासी शहर पहुंच रहे थे। इसकी वजह से शरण केंद्र पहले से ही अपनी क्षमता से अधिक लोगों का भार झेल रहे थे और गुरुवार की घटना ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।

स्यूटा ने मांगी सेना की मदद

स्यूटा के प्रमुख जुआन जीसस विवास ने स्पेन सरकार से राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने और सेना तैनात करने की मांग की। उनका कहना है कि यह स्वायत्त शहर अपने दम पर इतने बड़े सीमा संकट से नहीं निपट सकता। बाद में स्पेन सरकार ने बताया कि मोरक्को के साथ एक समझौता हुआ है, जिसके तहत अवैध रूप से स्यूटा में दाखिल हुए प्रवासियों को वापस भेजा जाएगा। हालांकि, उन्हें कब तक वापस भेजा जाएगा, इसकी कोई समय-सीमा नहीं बताई गई है।

स्पेन के गृह मंत्रालय के अनुसार, मोरक्को के अधिकारी सीमा पार करने की कोशिश कर रहे लोगों को रोकने और हालात पर काबू पाने में सहयोग कर रहे हैं। वहीं, मैड्रिड स्थित मोरक्को के दूतावास ने इस घटना के लिए मानव तस्करी और प्रवासियों की तस्करी करने वाले आपराधिक गिरोहों को जिम्मेदार ठहराया है। दूतावास ने साफ कहा कि मोरक्को की सरकार या उसके अधिकारियों ने इन गतिविधियों को किसी भी तरह का समर्थन या बढ़ावा नहीं दिया है।

भीषण गर्मी और जंगल की आग से झुलसता यूरोप, 40 डिग्री के पार हो सकता है तापमान

Europe Fire Calamity


यूरोप के कई देश इस समय अपने यहाँ भीषण गर्मी के कारण जंगलों में लगी आग (दावानल) की रोकथाम करने और आसपास के शहरों एवं बस्तियों को उनसे बचाने में लगे हैं।

दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस के अटलांटिक तट पर के जंगलों में लगभग एक सप्ताह से आग धधक रही है। अधिकारी हालांकि स्थिति को कुछ हद तक स्थिर बता रहे हैं, लेकिन यह चिंता भी बनी हुई है कि आग एक बार फिर बेकाबू हो सकती है।

 

फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने, वहाँ के बोर्दो (Bordeaux) शहर की ओर बढ़ रही आग की भयावह घटनाओं को “दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सबसे भीषण जंगल की आग” (दावानल) बताया। बोर्दो की उनकी यात्रा के समय आग, शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर रह गई थी।

टूरिस्ट इलाकों को खाली कराया गया

सरकारी अधिकारी बोर्दो के उत्तर-पश्चिम में स्थित कैंपिंग की जगहों, हॉलिडे रिसॉर्ट और मनोरंजन पार्क खाली करवा रहे हैं। इस आदेश से आस-पास के इलाके में लगभग 4,000 लोग प्रभावित हुए हैं, हालांकि प्रसिद्ध समुद्र तटीय रिसॉर्ट इसमें शामिल नहीं है। मौसम में संभावित परिवर्तन को देखते हुए सावधानी के तौर पर लोगों को हटाया जा रहा है।

 

22 जुलाई के बाद से, आग ने बोर्दो के पास के प्रभावित इलाके में लगभग 42,000 हेक्टेयर (42,000 वर्ग मीटर) ज़मीन को तबाह कर दिया है— अब तक 2,20,000 से ज़्यादा स्थानीय लोगों और टूरिस्टों को वहाँ से हटा कर सुरक्षित जगहों पर पहुँचाया गया है।

तापमान फिर से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचने की आशंका

राष्ट्रपति माक्रों को भरोसा है कि “हम लोगों की सुरक्षा की यह लड़ाई जीतेंगे।” बोर्दो के पास के इलाके में लगभग 2,500 अग्निशमन कर्मी (फायरफाइटर्स) तैनात हैं, उनकी मदद के लिए करीब 1,500 सैनिक भी वहाँ भेजे गए हैं। जर्मनी ने फ्रांस के इस संकटग्रस्त इलाके में सामान आदि पहुँचाने के लिए दो परिवहन हेलीकॉप्टर और एक परिवहन विमान भेजा है।

 

कई अन्य यूरोपीय देश भी संकट की इस घड़ी में फ्रांस की सहायता कर रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता तपती लू की भावी लहर को लेकर है। मौसम विभाग 'मेटियो-फ़्रांस' के अनुसार, देश के बड़े हिस्सों में तापमान पुन: 40 डिग्री सेल्सियस या अधिक तक पहुँच सकता है। आपातकालीन टीमों ने बोर्दो के पास के जंगल में 100 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी 'फ़ायरब्रेकर' (आग को फैलने से रोकने वाली खाली जगह) बनाई है; इस उपाय का उद्देश्य आग की लपटों को दूसरे इलाकों में फैलने से रोकना है।

आग अभी तक काबू में नहीं

अग्निशमन कर्मी 29 जुलाई तक आग के फैलाव को रोकने में किसी हद तक सफल रहे हैं। इस बीच, पास के बिस्कारोस इलाके में रहने वाले लगभग 15,000 लोग अपने घरों को लौट पाए हैं, हालाँकि आग अभी तक पूरी तरह से काबू में नहीं आई है। एक अधिकारी ने बताया कि इस भीषण आग को पूरी तरह बुझाने में “कई हफ़्ते या महीने भी” लग सकते हैं।

 

आमतौर पर गर्मियों के महीनों और छुट्टियों के मौसम में गिरोंद (Gironde) नाम के इलाके में सबसे ज़्यादा पर्यटक आते हैं, लेकिन यह इलाका भी जंगल की आग से प्रभावित हुआ है। क्षेत्रीय प्रशासन ने छुट्टियां मनाने आए लोगों और यात्रियों से इस इलाके में न जाने की अपील की है और हॉलिडे कैंप, स्काउट कैंप और दिव्यांगों के लिए खास कैंपों का संचालन रोक दिया है। पूरे इलाके में खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भी कुछ समय के लिए रोक लगा दी गई है।

स्पेन में ख़तरा फिर से बढ़ने की आशंका

बढ़ते तापमान से स्पेन के अविला (Ávila) प्रांत में—जो राजधानी मैड्रिड के पश्चिम में है—और मैड्रिड व तोलेदो के आस-पास के इलाकों में हालत फिर से बिगड़ने की आशंका है। इन इलाकों में जंगल की आग से अब तक 80,000 हेक्टेयर (वर्ग मीटर) से ज़्यादा जंगलों और झाड़ियों वाला इलाका जलकर खाक हो चुका है। सावधानी के तौर पर लगभग 90,000 लोगों को सुरक्षित जगहों पर ले जाना पड़ा है।

 

मैड्रिड में संकट प्रबंधन समिति की एक बैठक के बाद प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ ने कहा, “हमें आशा की किरण दिखाई दे रही है।” उन्होंने कहा कि सरकार तब तक सभी उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करेगी “जब तक आग की आखिरी लपट बुझ न जाए।” 

सांचेज़ सावधानी बरतने की अपील कर रहे हैं

27 जुलाई के बाद से स्पेन में आग को और अधिक फैलने से रोक दिया गया है। आपातकालीन टीमें पूर्वी स्पेन के कास्तेयों प्रांत में जंगल की आग बुझाने में अभी भी जुटी हुई हैं; वहां लगभग 16,000 लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं।

 

स्पेन में भी तापमान पुन: 40 डिग्री सेल्सियस तक या उससे भी अधिक पहुंचने की आशंका है। स्पेन की मौसम एजेंसी ने चेतावनी दी है कि इससे पूरे देश में आग लगने का ख़तरा बहुत ज़्यादा या चरम स्तर तक बढ़ जाएगा। इस अनुमान को देखते हुए, प्रधानमंत्री सांचेज़ ने देश भर के सभी नागरिकों से “बहुत ज़्यादा सावधानी बरतने और हर संभव एहतियात अपनाने” की अपील की है।

 

पड़ोसी देश पुर्तगाल में भी, 27 जुलाई से 1,000 से ज़्यादा अग्निशमन कर्मी तैनात किए गए हैं। देश के मध्य और उत्तरी हिस्सों के जंगलों में भी आग लग गई है। उत्तर में ब्रागा और ब्रागांका के आस-पास के इलाके तथा मध्य पुर्तगाल में संतारम के पास के इलाके सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं। ज़्यादा तापमान के कारण, लगभग पूरे देश में आग लगने का ख़तरा अधिकतम या बहुत ही ऊँचे स्तर पर है। मौसम एजेंसी के अनुसार, तटीय इलाकों में यह खतरा थोड़ा कम है।

फ्रांस में पहली बार देखी गई एक दुर्लभ प्रघटना

धुएं और राख के कई किलोमीटर ऊंचे बादल, बिजली का कड़कना और अनिश्चित हवाएं: दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस में लगी आग एक ऐसी प्राकृतिक प्रघटना को जन्म दे रही है जो आग बुझाने वालों के साहस की परीक्षा ले रही है।

 

जंगल की आग से पैदा हुआ एक ऐसा तूफ़ान जो खुद ही मौसम तंत्र (वेदर सिस्टम) वाला बेहद गर्म बादल बनाता है— पायरोक्यूम्यलोनिम्बस (pyrocumulonimbus)—उसे फ्रांस के दक्षिण-पश्चिमी जंगलों में लगी विनाशकारी आग के दौरान पहली बार देखा गया है। यह बादल, जिसे क्यूम्यलोनिम्बस फ्लेमजेनिटस (cumulonimbus flammagenitus) भी कहा जाता है, तब बनता है जब ज़मीन के पास की हवा इतनी ज़्यादा गर्म हो जाती है कि

 

वह बहुत तेज़ी से ऊपर उठने लगती है—अपने साथ धुआं, जलवाष्प और राख ले जाती है—और अक्सर कई किलोमीटर ऊपर के समताप मंडल (स्ट्रैटोस्फियर) तक पहुँच जाती है। वहाँ, यह मिश्रण ठंडी हवाओं के संपर्क में आता है और अपना खुद का ऐसा मौसम तंत्र बनाता है, जिसमें आग को और अधिक भड़काने वाली तेज़ हवाएँ चलती हैं। इस बादल से ज़मीन पर अक्सर बिजली भी गिरती है और साथ में गड़गड़ाहट की आवाज़ भी होती है।

NASA उसे “आग उगलने वाले ड्रैगन्स” कहता है

“आग उगलने वाले ड्रैगन्स” को—जैसा कि NASA इन्हें कहता है— पहले मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में ज्वालामुखी पर्वत फटने और बड़े पैमाने पर लगी आग के दौरान देखा गया है। उन इलाकों में यह घटना बार-बार होती है, लेकिन फ्रांस में यह “अभूतपूर्व” है।

 

आमतौर पर इस तरह की 'आग के तूफ़ान' (firestorm) को बुझाना या काबू में करना संभव नहीं होता, क्योंकि आग उगलती हवाएं लगातार अपनी दिशा बदलती रहती हैं।

 

नतीजा यह होता है कि आग हर दिशा में फैलती है और कई जगहों पर आग की लपटें एक साथ उठने लगती हैं, जिससे स्थिति का अंदाज़ा लगाना पूरी तरह से मुश्किल हो जाता है। 

निपटने के दो ही संभावित तरीके

इससे निपटने के केवल दो ही संभावित तरीके ज्ञात हैं। या तो बरसात शुरू हो जाए—हालांकि इसके लिए तीन दिनों तक भारी वर्षा होनी चाहिए—या फिर आग को ऐसी जगह की ओर मोड़ने का कोई तरीका मिले कि वह खुद ही बुझ जाए, जैसा कि बड़वानल वाली आग के समय समुद्रों में होता है।

 

दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस में लगी भीषण आग के प्रसंग में कहा जाता है कि कि दमकलकर्मियों के पास पीछे हटने के अलावा कोई चारा नहीं था। “हमें यह मानना होगा कि प्रकृति की यह ताकत हमारे नियंत्रण से बाहर है। यह युद्ध जैसी स्थिति है, जहां हम लगातार आग की चपेट में हैं और हर किसी को सुरक्षित स्थान पर पहुंचना है।” 

 

ऐसी स्थिति में केवल “धैर्य और संयम” ही काम आता है। आग बुझाने की सीधी कोशिशों के अलावा दमकलकर्मी यही कर सकते हैं कि वे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जगहों की सुरक्षा करें और जानवरों को आग की लपटों से दूर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचायें। इस बीच स्पेन से लेकर इटली, ग्रीस और तु्र्की तक के कई देश अपने जंगलों में लगी आग से जूझ रहे हैं। नदियां सूख रही हैं और 30 जुलाई के दिन, पश्चिमी यूरोप में आँधी और तूफ़ान आने की भविष्यवाणी आग में घी पड़ने का काम कर सकती है।

फ्रांस में पहली बार दिखा आग का बादल आखिर है क्या?

fire cloud

अभूतपूर्व जंगल की आग से जूझते फ्रांस में पहली बार फायर क्लाउड यानी आग के बादल बनते देखा गया है। आखिर आग के बादल होते क्या हैं और इनका क्या असर होता है। फ्रांस में इसे देखने के बाद क्यों चिंता बढ़ रही है। ALSO READ: अमेरिका-चीन के बीच तनाव, अमेरिका ने लगाया चीनी रोबोट पर प्रतिबंध

 

फ्रांस जंगल की अभूतपूर्व आग से जूझ रहा है। लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है और सैर सपाटे के मौसम में अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो रहा है। जंगल की आग ना सिर्फ अपने विस्तार में भयानक है बल्कि यह जिस रूप में नजर आ रही है वह इससे पहले फ्रांस में कभी नहीं देखी गई। यहां फायर क्लाउड यानी आग के बादल बनने की भी खबरें आ रही हैं जो फ्रांस के लिए दुर्लभ रहा है।

 

फायर क्लाउड क्या है?

पाइरक्यूम्यूलोनिंबस एक तरह का बादल है जो जंगल की बड़ी आग के ऊपर बनता है। तेज गर्मी जब धुएं, राख और भाप को वातावरण में धकेलती है तो पाइरोक्यूम्यूलोनिंबस बनता है जिसे फायर क्लाउड यानी आग के बादल भी कहा जाता है।

 

तस्मानिया यूनिवर्सिटी में पायरोजियोग्राफी के प्रोफेसर डेविड बोमान ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, “आप किसी चिमनी के रूप में इसकी कल्पना कर सकते हैं, जिसमें नीचे आग होती है, धुआं चिमनी के रास्ते से होता हुआ वायुमंडल में जाता है।”

 

मौसमविज्ञानी उन परिस्थितियों की पहचान कर सकते हैं जो फायर क्लाउड बनाने के लिए आदर्श होते हैं, हालांकि वे बारीकी से यह नहीं बता सकते कि वे कब बनेंगे। ऐसे में वे चेतावनी तो दे सकते हैं लेकिन इसकी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते। ALSO READ: नेपाल: बालेन शाह के खिलाफ जेन-जी में क्यों है उबाल

 

जंगल की आग पर बुरा असर

फायर क्लाउड जंगल की आग को ज्यादा खतरनाक और अप्रत्याशित बना सकते हैं। तेज हवाएं पैदा करके वे आग की दिशा बदल सकते हैं और बिजली पैदा करके वह आग की नई लपटों को जन्म दे सकते हैं।

 

उनके अंदर की ऊर्जा खत्म होने के बाद भी “प्लूम कोलैप्स” की स्थिति पैदा कर के नुकसान पहुंचा सकते हैं। प्लूम जब बादलों के अंदर पर्याप्त ऊर्जा नहीं बचती तो वे ढह जाते हैं, इसके साथ राख और कचरा जमीन पर गिर कर नुकसान पहुंचाता है। इसे ही प्लूम कोलैप्स कहते हैं। बोमन का कहना है, “प्लूम कोलैप्स होता है तो वहां जलते कचरे की बारिश होती है।” ALSO READ: जंगल की आग के सामने लाचार होते फ्रांस और स्पेन

 

यूरोप पर क्या असर होगा?

फ्रेंच अधिकारियों ने शनिवार को बताया कि बोर्दो के पास पाइरोक्यूमूलोनिंबस देखा गया है जो फ्रांस में पहली बार है। फ्रांस में बोर्दो के पास बीते कई दिनों से जंगल की आग धधक रही है।आग के बादल बनने की खबर आने के बाद आपातकालीन सेवाओं की चुनौती बढ़ गई है। आग की अप्रत्याशित प्रवृत्ति की वजह से अधिकारी इलाकों को खाली कराने का दायरा बढ़ा सकते हैं।

 

बोमन का कहना है कि पूर्वी यूरोप में आग के बादल पैदा होने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। अब तक इन्हें ज्यादातर कनाडा या ऑस्ट्रेलिया में ही देखा जाता रहा है। बोमन के मुताबिक, “यह बहुत गंभीर स्थिति है। यह हैरान करने वाला है लेकिन यह विनाशकारी और भयानक है, हम ऐसी चीजें और नहीं चाहते।”

US-Iran War Update: अमेरिका ने ईरान में फिर शुरू किए घातक हमले! कई ठिकानों पर की एयरस्ट्राइक, सऊदी अरब ने भी बरपाया कहर

US-Iran War Update: जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे पर ईरानी मिसाइल हमले के एक दिन बाद अमेरिका ने गुरुवार (30 जुलाई) तड़के ईरान के कई ठिकानों पर एयरस्ट्राइक शुरू कर दिए। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह कार्रवाई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बाद की गई। उन्होंने कहा था कि ईरान को बहुत कड़ा जवाब दिया जाएगा। अमेरिका की न्यूज वेबसाइट Axios ने एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया कि अमेरिकी सेना ने गुरुवार सुबह ईरान में कई ठिकानों पर हवाई हमले किए।

इसके कुछ ही देर बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इन हमलों की पुष्टि की। CENTCOM ने अपने बयान में कहा कि यह कार्रवाई मंगलवार को जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए ईरानी मिसाइल हमलों के जवाब में की गई है। अमेरिकी सेना ने इसे मध्य-पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों पर हुए हमलों के खिलाफ सशक्त और निर्णायक प्रतिक्रिया बताया।

ट्रंप ने ईरान को दी घमकी

इससे पहले बुधवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘व्हाइट हाउस’ के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था कि अब जवाब देने की बारी अमेरिका की है। ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने मिसाइल लॉन्च को गलती बताया है। अमेरिका से जवाबी कार्रवाई नहीं करने का अनुरोध किया है।

ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, “अब हमारी बारी है। हम उन पर बहुत जोरदार हमला करेंगे। उन्हें पता है कि यह आने वाला है।” पिछले शुक्रवार से अमेरिका ने ईरान पर हमलों में पांच दिन का विराम लिया था। इससे पहले लगातार 13 रातों तक ईरानी ठिकानों पर अमेरिकी हमले किए गए थे।

ईरान में कई जगह धमाकों की खबर

अमेरिकी हमलों के तुरंत बाद ईरानी सरकारी मीडिया ने देश के कई हिस्सों में विस्फोट होने की जानकारी दी। ईरान के सरकारी प्रसारक IRIB के अनुसार, बुशेहर प्रांत में धमाकों की आवाजें सुनी गईं। यह वही इलाका है जहां ईरान का एकमात्र परमाणु प्लांट स्थित है। इसके अलावा दक्षिणी क्षेत्रों से भी विस्फोटों की खबरें सामने आईं। ईरान के सरकारी चैनल प्रेस टीवी ने भी अमेरिकी हमलों के बाद देश के कई हिस्सों में विस्फोट होने की जानकारी दी।

बाद में IRIB ने बताया कि खुजेस्तान प्रांत के अबादान क्षेत्र में भी अमेरिकी बलों ने हमला किया। इसके अलावा होर्मोज़गान प्रांत के बंदर अब्बास और अबू मूसा, किश तथा क़ेश्म द्वीपों पर भी विस्फोटों की सूचना मिली। वहीं, ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि सीरिक शहर पर किसी हमले की पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल दोनों देशों की ओर से हालात पर करीबी नजर रखी जा रही है।

इराक में अमेरिका एवं सऊदी के हमले में 20 लोगों की मौत, 32 घायल

इस बीच, इराक में अमेरिका और सऊदी अरब के जॉइंट हवाई हमलों में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई और 32 अन्य घायल हो गए। इन हमलों में ईरान से जुड़े लॉजिस्टिक्स और हथियारों के ठिकानों को निशाना बनाया गया। इस घटना के बाद बगदाद में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई गई है। दूसरी ओर, तेहरान ने जॉर्डन में मौजूद अमरीकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी मिसाइल हमले करने का दावा किया है।

इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेस (PMF) ने टेलीग्राम पर एक बयान जारी कर पुष्टि की कि अमेरिका और सऊदी अरब के हमलों में कम से कम 20 जवान शहीद हुए हैं और 32 घायल हैं। समूह के अनुसार, ये हमले बगदाद, वासित, निनवे, बसरा, किरकुक, कर्बला और दियाला समेत सात प्रांतों में स्थित उनके सैन्य ठिकानों पर हुए। इससे उनके मुख्यालयों, वाहनों और हथियारों को भारी नुकसान पहुंचा है।

पीएमएफ का कहना है कि राहत कार्य जारी होने के कारण मृतकों का आंकड़ा और बढ़ सकता है। इससे पहले पीएमएफ की 30वीं ब्रिगेड ने बताया कि स्थानीय समयानुसार तड़के करीब 3:20 बजे उत्तरी इराक के निनवे प्रांत में सात हमले किए गए, जिनमें 10 लोगों की मौत हुई और छह अन्य घायल हो गए।

इराक में हड़कंप

इराक के प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, हमलों की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री अली फलीह अल-जैदी ने बुधवार को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी मंत्रिस्तरीय परिषद की आपातकालीन बैठक बुलाई। अमेरिकी और सऊदी सेना का कहना है कि यह कार्रवाई ईरान समर्थित लड़ाकों द्वारा अमेरिकी सैनिकों और सऊदी ऑयल प्लांटों पर किए गए लगातार हमलों के जवाब में की गई है।

एक बयान में यह भी बताया गया कि इस साल फरवरी से अप्रैल के बीच ईरान समर्थित गुटों ने अमरीकी ठिकानों पर 600 से अधिक बार हमला करने की कोशिश की थी। बयान में आगाह किया गया कि आगे की सैन्य कार्रवाई से बचने के लिए आईआरजीसी और उसके सहयोगी समूह तुरंत हमले रोक दें। पीएमएफ के कई बड़े गुटों के रिश्ते ईरान की आईआरजीसी के साथ बेहद मजबूत हैं और वे उसके क्षेत्रीय नेटवर्क का हिस्सा हैं।

ये समूह मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना और उसके सहयोगियों पर लगातार हमले करते रहे हैं। इन हवाई हमलों के कुछ ही घंटे बाद ईरान की तरफ से भी जवाबी कार्रवाई की घोषणा कर दी गई। आईआरजीसी की एयरोस्पेस फ़ोर्स ने दावा किया है कि उसने जॉर्डन में स्थित अमेरिकी एयर बेस और सेंटकॉम मुख्यालय पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया है।

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बुधवार तड़के जारी बयान में आईआरजीसी ने कहा कि यह कार्रवाई अमेरिकी सेना के आक्रामक रुख का करारा जवाब है। आईआरजीसी ने कहा कि उसके जांबाज सैनिकों ने जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों को मिसाइलों से निशाना बनाया है। जब तक ईरान के खिलाफ अमेरिका की धमकियां और गैर-कानूनी गतिविधियां बंद नहीं होंगी, तब तक उनका यह प्रतिरोध जारी रहेगा।

असम बाढ़ : 10 हजार परिवारों तक राहत पहुंचाएगा रिलायंस फाउंडेशन, 4 हजार मवेशियों की भी होगी देखभाल

Reliance Foundation has launched relief operation to assist flood-affected people in Assam

– वनतारा, रिलायंस रिटेल और जियो भी इस अभियान में सहयोग कर रहे

– शिवसागर और चराइदेव जिलों में 5 लाख से अधिक लोग प्रभावित

– पशुधन की सहायता के लिए वनतारा की 39 सदस्यीय टीम तैनात

ऊपरी असम में भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ से प्रभावित लोगों की सहायता के लिए रिलायंस फाउंडेशन ने राहत अभियान शुरू किया है। अभियान के तहत शिवसागर और चराइदेव जिलों के कम से कम 10 हजार परिवारों तक भोजन, सुरक्षित पेयजल, राशन, स्वास्थ्य और अस्थाई आश्रय से जुड़ी सहायता पहुंचाई जाएगी। दोनों जिलों में पांच लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। 

 

रिलायंस फाउंडेशन की आपदा प्रबंधन टीम ने जिला प्रशासन और स्थानीय संगठनों के साथ प्रभावित इलाकों का आकलन करने के बाद राहत कार्य शुरू किए हैं। वनतारा, रिलायंस रिटेल और जियो भी इस अभियान में सहयोग कर रहे हैं। 

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जिन परिवारों के पास भोजन या राशन की व्यवस्था नहीं है, उनके लिए सामुदायिक रसोई चलाई जा रही हैं। इसके साथ ही सूखे राशन के पैकेट भी बांटे जाएंगे। विस्थापित परिवारों के लिए तिरपाल, ग्राउंडशीट, मच्छरदानी, रस्सी और बिस्तर वाले आपातकालीन आश्रय किट की व्यवस्था की जा रही है। 

 

बाढ़ के कारण स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं। स्वास्थ्य सेवाएं जल्द बहाल करने के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की सफाई और मरम्मत शुरू की गई है। प्रभावित परिवारों को स्वच्छ पेयजल तथा साफ-सफाई से जुड़ी जरूरी किट्स भी उपलब्ध कराई जा रही है।

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पालतू पशुओं को हुए नुकसान को देखते हुए वनतारा की 39 सदस्यीय टीम भी मौके पर तैनात की गई है। टीम पशुओं के इलाज और देखभाल के साथ स्थानीय समुदाय के दूसरे जानवरों की भी सहायता करेगी। रिलायंस फाउंडेशन ने करीब 4 हजार प्रभावित मवेशियों के लिए चारा उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। 

 

राहत सामग्री जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचे, इसके लिए फाउंडेशन की टीमें जिला प्रशासन, सरकारी विभागों, स्थानीय संस्थाओं और सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

महबूबा मुफ्ती के पेलेट गन वाले बयान पर बवाल, फिर छिड़ी कश्मीर की पुरानी बहस, जानिए पूरा विवाद

 Debate over pellet guns reignites in Kashmir following Mehbooba Mufti's remarks

Mehbooba Mufti : जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की उन टिप्पणियों ने, जिनमें उन्होंने कथित तौर पर कुछ परिस्थितियों में कश्मीर में पेलेट-फायरिंग शाटगन के इस्तेमाल का बचाव किया है, पिछले 15 वर्षों में इस क्षेत्र में इस्तेमाल किए गए सबसे विवादास्पद भीड़ नियंत्रण उपायों में से एक पर लंबे समय से चल रही बहस को फिर से हवा दे दी है।

दरअसल पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्‍यक्षा महबूबा मुफ्ती उस समय आलोचनाओं के घेरे में आ गईं, जब उन्होंने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विरोध प्रदर्शन के दौरान कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन का कोई स्थान नहीं है, लेकिन कश्मीर में यह समझ में आता है क्योंकि वहां सुरक्षाबलों को आतंकवाद का सामना करना पड़ता है।

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इन टिप्पणियों पर सत्ताधारी नेशनल कॉन्‍फ्रेंस (नेकां) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और माफी की मांग करते हुए कहा कि ये टिप्पणियां उस हथियार को उचित ठहराती प्रतीत होती हैं जिसके कारण हजारों लोग घायल हुए और सैकड़ों लोगों की आंखों में जीवनभर के लिए गंभीर चोटें आईं।

इस विवाद ने एक बार फिर इस बात पर ध्यान केंद्रित किया है कि पेलेट गन क्यों पेश की गईं, कश्मीर में भीड़ नियंत्रण के लिए वे किस प्रकार एक महत्वपूर्ण साधन बन गईं और वे आज भी लोगों की राय को क्यों विभाजित करती हैं? 

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वर्ष 2009-10 की अवधि के दौरान केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने पत्थरबाजी की घटनाओं में सैकड़ों कर्मियों के घायल होने की सूचना दी और इस घटना को आतंकवाद और सीमा पार से आने वाले धन से जुड़ी एक उभरती हुई सुरक्षा चुनौती के रूप में वर्णित किया, इन आरोपों को पाकिस्तान ने नकार दिया है।
 

फिर 2016 के हिंसक प्रदर्शनों के दौरान पेलेट गन अभूतपूर्व जांच के दायरे में आ गईं, जब महबूबा मुफ्ती पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार की प्रमुख थीं। तब हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की 8 जुलाई 2016 को हुई मौत ने घाटी में महीनों तक चले विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया। प्रदर्शनकारियों और पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों के बीच झड़पों के दौरान सुरक्षा बलों ने बार-बार पेलेट गन का इस्तेमाल किया।

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संसद और पूर्व जम्मू कश्मीर विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों से पता चला कि 2016 के प्रदर्शनों के दौरान 1200 से अधिक लोग आंखों में चोट लगने से घायल हुए, जबकि कई हजार लोगों के शरीर के अन्य हिस्सों में छर्रे लगने से चोटें आईं।
 

डॉक्टरों ने मरीजों की इस भारी संख्या को आंखों में चोट लगने की अब तक की सबसे बड़ी सामूहिक घटना बताया, जिसके चलते उन्होंने कई महीनों में सैकड़ों आपातकालीन सर्जरी कीं। मानवाधिकार संगठनों ने एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वाच ने पेलेट गन के इस्तेमाल की आलोचना करते हुए कहा कि इस हथियार के व्यापक प्रसार के कारण यह स्वाभाविक रूप से अंधाधुंध हमला करने वाला बन जाता है।
 

कश्मीर पर अपनी 2018 की रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने भारत से गंभीर चोटों के कारण छर्रे दागने वाली शाटगनों के उपयोग की समीक्षा करने का आग्रह किया था।

श्रावण की आस्था, शिवभक्तों का उत्साह… कांवड़ यात्रा-2026 के स्वागत को मेरठ पूरी तरह तैयार

Meerut News kanwar yatra 2026

Meerut Kanwar Yatra: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र काल माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले कालकूट विष का पान करने के बाद भगवान शिव के शरीर की तपन शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर पवित्र नदियों का जल अर्पित किया था। तभी से श्रावण मास में शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। इसी आस्था से परिपूर्ण होकर हर वर्ष करोड़ों शिवभक्त हरिद्वार, गंगोत्री और अन्य पवित्र घाटों से गंगाजल भरकर कंधे पर कांवड़ रखकर पैदल अपने-अपने शिवालयों तक पहुंचते है।

 

2026 में 30 जुलाई से श्रावण मास शुरू हो रहा है, जिसके चलते एक बार फिर शिवभक्ति का यह विराट उत्सव पूरे उत्तर भारत में दिखाई देगा। विगत वर्ष हरिद्वार से 4.50 करोड़ से अधिक कांवड़ उठाई गई थीं। दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित कई राज्यों के शिवभक्त “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ेंगे। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मेरठ और मुजफ्फरनगर है, जहां लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन गुजरते हैं।

 

इसी विशाल धार्मिक आयोजन को सकुशल, शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए मेरठ प्रशासन ने व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। रविवार को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के बहुउद्देशीय हॉल में जिलाधिकारी मेरठ एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मेरठ ने अधिकारियों की संयुक्त ब्रीफिंग कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

 

बैठक में जनपद के पुलिस अधीक्षक, सभी क्षेत्राधिकारी, थाना प्रभारी, एसडीएम, एसीएम सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। अधिकारियों ने कांवड़ यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, श्रद्धालुओं की सुविधाएं, शिविरों की व्यवस्था, कांवड़ मार्गों की सुगमता, विभागीय समन्वय, कानून-व्यवस्था तथा आपातकालीन तैयारियों की विस्तार से समीक्षा की।

कलेक्टर और एसएसपी के निर्देश

जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने निर्देश दिए कि सभी विभाग शेष कार्य समयबद्ध ढंग से पूर्ण करें। वरिष्ठ अधिकारी स्वयं मौके पर रहकर व्यवस्थाओं की निगरानी करें तथा किसी भी समस्या की सूचना मिलते ही तत्काल प्रभाव से मौके पर पहुंचकर कार्रवाई करें।

 

जिलाधिकारी डा. वी के सिंह ने खाद्य सुरक्षा विभाग को विशेष निर्देश दिए गए कि कांवड़ मार्ग पर स्थित ढाबों, रेस्टोरेंट, रेहड़ी-पटरी और खाद्य सामग्री विक्रेताओं के लाइसेंस अथवा अस्थायी लाइसेंस की जांच की जाए। सभी प्रतिष्ठानों पर लाइसेंस और रेट लिस्ट स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कराई जाए, ताकि श्रद्धालुओं और व्यापारियों के बीच किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो और कानून-व्यवस्था बनी रहे।

 

बरसात के मौसम को देखते हुए कांवड़ शिविरों में सांप एवं अन्य जहरीले जीवों से बचाव के लिए भी विशेष व्यवस्था की जा रही है। वन विभाग और कृषि विभाग संयुक्त रूप से एक मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) तैयार कर शिविर संचालकों को उपलब्ध कराएंगे, जिससे आवश्यक सावधानियां समय रहते अपनाई जा सकें।

श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता

बैठक के अंत में जिलाधिकारी वीके सिंह एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अविनाश पांडे ने सभी अधिकारियों को निर्देश दिए कि कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सभी अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों में पूरी सतर्कता से ड्यूटी करें, आपसी समन्वय बनाए रखें और यह सुनिश्चित करें कि शिवभक्तों की आस्था और उत्साह के इस महापर्व में उन्हें सुरक्षित, सुगम और व्यवस्थित यात्रा का अनुभव मिले।

 

श्रावण का यह पावन पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन, सेवा और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। ऐसे में प्रशासन की तैयारी और जनसहयोग मिलकर कांवड़ यात्रा-2026 को सफल और यादगार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

लखनऊ में बुलडोजर एक्शन : जिस बिल्डिंग में 15 मौतें हुईं, उसे ढहाया जा रहा, अग्निकांड वाली बिल्डिंग पर LDA का एक्शन

लखनऊ की उस तीन मंजिला इमारत में लगी भीषण आग को 32 दिन बीत चुके हैं, लेकिन हादसे की दर्दनाक यादें आज भी ताजा हैं। शनिवार को बुलडोजरों की गड़गड़ाहट के साथ उस इमारत को गिराने का काम शुरू हुआ, जहां आग लगने से 15 लोगों की जान चली गई थी। इमारत गिराने के दौरान पूरे इलाके को सील कर दिया गया और सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया। जिस इमारत को नियमों के उल्लंघन और प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक माना जा रहा था, उसे एक-एक मंजिल और एक-एक दीवार तोड़कर ढहा दिया गया। हालांकि, इमारत गिरने के साथ एक बड़ा सवाल अब भी कायम है। जिस भवन के खिलाफ कथित अवैध निर्माण को लेकर पहले ही कार्रवाई हो चुकी थी, वह आखिर कैसे चलता रहा और प्रशासन ने समय रहते सख्त कदम क्यों नहीं उठाए, जिससे 15 लोगों की जान बचाई जा सकती थी?

अग्निकांड वाली बिल्डिंग पर LDA का एक्शन

22 जून को हुए भीषण अग्निकांड के 32 दिन बाद प्रशासन ने आखिरकार उस इमारत को गिराने का काम शुरू कर दिया। इस हादसे में 15 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद इमारत की मंजूरी, रिहायशी भवनों के व्यावसायिक इस्तेमाल और अग्नि सुरक्षा नियमों के पालन को लेकर कई गंभीर सवाल उठे थे। इमारत गिराने की कार्रवाई कड़ी सुरक्षा के बीच की गई। पूरे इलाके को सील कर दिया गया और किसी भी तरह की भीड़ या अव्यवस्था से बचने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। प्रशासन ने भारी मशीनों की मदद से उस इमारत को ढहा दिया, जिसमें कोचिंग सेंटर और कई अन्य व्यावसायिक संस्थान चल रहे थे।

बिल्डिंग में 15 मौतें हुईं

22 जून को लगी भीषण आग ने देखते ही देखते पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया। आग इतनी तेजी से फैली कि कई लोग अंदर ही फंस गए। इस दर्दनाक हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए। घटना के बाद लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिली और इमारत में कथित नियमों के उल्लंघन की जांच शुरू कर दी गई। जांच में यह सवाल उठे कि क्या इमारत का निर्माण, नक्शा और इस्तेमाल अधिकारियों से मिली मंजूरी के अनुसार था। अधिकारियों का कहना है कि इमारत को रिहायशी उपयोग की मंजूरी मिली थी, लेकिन उसमें कोचिंग सेंटर और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलाई जा रही थीं। इसी वजह से यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या वहां आग से बचाव के पर्याप्त इंतजाम और आपातकालीन निकासी की सुविधाएं मौजूद थीं।

पहले नहीं हुई कार्रवाई

इस इमारत का पुराना रिकॉर्ड भी जांच का अहम हिस्सा बन गया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, साल 2016 में कथित अवैध निर्माण को लेकर प्रशासन ने इस इमारत के खिलाफ कार्रवाई की थी। हालांकि, बाद में इसे गिराने का आदेश वापस ले लिया गया, जिसके बाद इमारत का इस्तेमाल जारी रहा। कई साल बाद यही इमारत लखनऊ के सबसे बड़े अग्निकांडों में से एक का केंद्र बन गई। आग लगने की घटना के बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने इमारत के मालिकों को नोटिस जारी किया और भवन को गिराने का आदेश दिया। तय समय सीमा पूरी होने के बाद प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर इमारत को ढहा दिया। इस पूरी कार्रवाई के बाद एक बार फिर अवैध निर्माण, रिहायशी इमारतों के व्यावसायिक इस्तेमाल और भवन सुरक्षा नियमों के पालन को लेकर प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

इस दर्दनाक हादसे के बाद अब अधिकारियों की भूमिका और नियमों का पालन कराने में हुई कथित लापरवाही की भी जांच की जा रही है। जांच सिर्फ आग लगने के कारणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि पहले कार्रवाई होने और कथित नियमों के उल्लंघन के बावजूद इमारत का इस्तेमाल आखिर कैसे जारी रहा। आग की घटना के मामले में इमारत के मालिकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। जांच एजेंसियां यह पता लगा रही हैं कि कहीं लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की वजह से 15 लोगों की मौत तो नहीं हुई। इमारत को ऐसे समय गिराया गया है, जब प्रशासन मंजूर नक्शे के विपरीत इस्तेमाल की जा रही इमारतों के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चला रहा है। इस हादसे के बाद कई संस्थानों की जांच भी तेज कर दी गई है और नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जा रही है। हालांकि, जिन 15 लोगों ने इस हादसे में अपने परिजनों को खोया है, उनके लिए सिर्फ इमारत गिरा देना काफी नहीं है। उन्हें अब भी इस सवाल का जवाब चाहिए कि आखिर यह हादसा होने से पहले इसे क्यों नहीं रोका गया।