El Nino update: 40% कम बारिश और अल नीनो का डबल अटैक! 11 साल पुराना रिकॉर्ड टूटेगा क्या? समझिए खेती पर असर कितना

भारत इस साल मौसम की बड़ी चुनौती का सामना करने जा रहा है। प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है और यह साल के अंत तक बनी रह सकती है। इस बार अलनीनो के प्रभाव के चलते सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। ऐसे में इस बार ज्यादा पानी चाहने वाली फसलों पर प्रभाव पड़ सकता है. पानी की कमी से उत्पादन पर भी काफी असर पड़ सकता है। ऐसे में देश में सूखे जैसे हालात भी बन सकते हैं। वहीं मंगलवार को कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने कहा कि भारत ने मानसून में देरी या संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयारी कर ली है। इसके तहत जिला स्तर पर विशेष आपातकालीन योजनाएं बनाई गई हैं और देश में पर्याप्त मात्रा में अनाज का भंडार भी मौजूद है।

फलसों पर क्या पड़ेगा असर?

फसलों पर मानसून के असर को लेकर पी.के. सिंह ने बताया कि मौसम विभाग से मिले आंकड़ों और पूर्वानुमानों के आधार पर हर जिले के लिए अलग-अलग आकस्मिक योजनाएं तैयार की गई हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य कम बारिश या सूखे जैसी परिस्थितियों में किसानों और खेती को नुकसान से बचाना है। उन्होंने कहा कि जहां और जब बारिश की स्थिति के अनुसार जरूरत महसूस होगी, वहां इन योजनाओं को तुरंत लागू किया जाएगा। सरकार लगातार मौसम की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर समय रहते जरूरी कदम उठाएगी।

कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने बताया कि मौजूदा मौसम की स्थिति काफी हद तक वर्ष 2015 के अल नीनो जैसी दिखाई दे रही है। हालांकि, उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में देश के सिंचाई ढांचे में काफी सुधार हुआ है, जिससे अब हालात पहले की तुलना में बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त तैयारी कर रखी है। देश में अनाज का भंडार सुरक्षित और मजबूत स्थिति में है। खासकर चावल और गेहूं का स्टॉक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, जिससे खाद्य सुरक्षा को लेकर किसी तरह की चिंता नहीं है।

पी.के. सिंह ने भरोसा दिलाया कि यदि किसी कारण से किसी खाद्यान्न की कमी होती है, तो सरकार उसे पूरा करने के लिए जरूरी कदम उठाएगी। जरूरत पड़ने पर विदेशों से आयात भी किया जाएगा, ताकि आम लोगों पर किसी तरह का असर न पड़े। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है और किसानों के हितों के साथ-साथ देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

40% कम बारिश और अल नीनो का डबल अटैक!

कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने कहा कि जब मानसून में देरी होती है या सूखे जैसी स्थिति बनती है, तो किसान आमतौर पर दालों की खेती की ओर रुख करते हैं। इसकी वजह यह है कि दालों की फसलों को कम पानी की जरूरत होती है और ये कम समय में तैयार हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे हालात में किसान उन फसलों को प्राथमिकता देते हैं, जिनकी खेती कम लागत और कम पानी में हो सकती है। इससे मौसम की अनिश्चितता का असर खेती पर कुछ हद तक कम हो जाता है। पी.के. सिंह ने कहा कि मौजूदा समय में बारिश सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। इसके बावजूद किसानों का दालों जैसी कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ता रुझान एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार लगातार मौसम की स्थिति पर नजर रख रही है और जरूरत पड़ने पर किसानों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि फसल उत्पादन पर ज्यादा असर न पड़े।

मुंबई पहुंचा दक्षिण-पश्चिम मानसून

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने बताया कि 23 जून को दक्षिण-पश्चिम मानसून ने और रफ्तार पकड़ी और कई नए इलाकों तक पहुंच गया। इसके तहत मध्य अरब सागर के बाकी हिस्से, महाराष्ट्र के कुछ और क्षेत्र, जिनमें मुंबई भी शामिल है, तेलंगाना और ओडिशा के शेष भाग तथा छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के कुछ इलाकों में मानसून पहुंच गया है। मौसम विभाग के अनुसार, अगले 2 से 3 दिनों के दौरान मानसून के उत्तर अरब सागर और गुजरात के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हुई हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ और क्षेत्रों में भी मानसून के आगे बढ़ने की संभावना है। आईएमडी ने यह भी कहा है कि अगले 3 से 4 दिनों में झारखंड और बिहार के बाकी हिस्सों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में भी मानसून पहुंच सकता है।

Monsoon : 315 जिलों में कम बारिश की आशंका ने खरीफ की फसलों को लेकर बढ़ाई चिंता! कमजोर मानसून की ये तैयारियां शुरू

देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सुस्त रफ्तार ने कृषि क्षेत्र के सामने चिंता खड़ी कर दी है। देश के 315 जिलों में कम बारिश होने की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ सकता है। हालांकि कमजोर मानसून के इस अनुमान को देखते हुए सरकार ने पहले से ही अपनी एडवांस तैयारियां शुरू कर दी हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और कृषि आयुक्त पीके सिंह ने इसे लेकर विस्तार से जानकारी साझा की है।

40 से 43 फीसदी तक कम हुई बारिश, 111 जिले सबसे ज्यादा संवेदनशील

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि मानसून में देरी हुई है और अब तक 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के मुताबिक 2 जुलाई को समाप्त होने वाले सप्ताह तक मानसून के कमजोर रहने की संभावना है। सरकार ने 111 जिलों को सबसे ज्यादा संवेदनशील के रूप में चिह्नित किया है, क्योंकि इन जिलों में सिंचाई की सुविधा 25 प्रतिशत से भी कम है। चिंता की बात यह है कि इन 111 सबसे संवेदनशील जिलों में से अकेले 20 जिले महाराष्ट्र में हैं।

जिला स्तर पर मानसून आकस्मिक योजनाएं तैयार

वहीं कृषि आयुक्त पीके सिंह ने बताया कि IMD से मिले इनपुट्स के आधार पर जिला स्तर पर मानसून आकस्मिक योजनाएं तैयार कर ली गई हैं। इन योजनाओं को वहां और तब लागू किया जाएगा जहां भी और जब भी बारिश की स्थिति के कारण इनकी आवश्यकता होगी। कृषि आयुक्त ने यह भी स्पष्ट किया कि देश में मौजूदा स्थितियां साल 2015 के सुपर अल नीनो जैसी ही दिख रही हैं। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि साल 2015 की तुलना में आज देश की स्थिति बहुत बेहतर और कम संवेदनशील है क्योंकि तब से लेकर अब तक देश में सिंचाई के बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का काफी विस्तार हुआ है।

गेहूं और चावल के भंडार मजबूत

खाद्य सुरक्षा और अनाज के संकट पर कृषि आयुक्त ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि भारत के पास अनाज का बफर स्टॉक बिल्कुल सुरक्षित और आरामदायक स्थिति में है। देश में चावल और गेहूं का भंडार बहुत मजबूत स्थिति में है। इस बार चने की फसल भी बहुत अच्छी हुई है और इसका भंडार भी बेहतरीन है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अगर कहीं कोई कमी आती है तो उसे देखा जाएगा। अगर जरूरत पड़ी तो अनाज या दालों का आयात भी किया जाएगा। अरहर का आयात पहले भी किया गया है और जरूरत पड़ने पर इस बार भी किया जाएगा।

कम पानी वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे किसान, मूंग का रकबा बढ़ा

मानसून में देरी या सूखे जैसी स्थिति का एक सकारात्मक पहलू यह देखा जा रहा है कि देश के किसान अब कम पानी की खपत वाली फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं। किसान अब उन दालों और तिलहन की बुवाई की ओर बढ़ रहे हैं जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है और जो कम समय में तैयार हो जाती हैं। पिछले साल की तुलना में इस साल दालों और तिलहन का रकबा बढ़ा है। विशेषकर मूंग का रकबा इस बार काफी ज्यादा बढ़ गया है।

अब तक कुल खरीफ क्षेत्र के 10 प्रतिशत हिस्से को कवर किया जा चुका है। 22 जून 2026 तक सभी खरीफ फसलों का कुल रकबा 11.79 मिलियन हेक्टेयर रहा है, जो पिछले साल की इसी अवधि के 11.3 मिलियन हेक्टेयर से अधिक है। पश्चिम एशिया संकट के बीच उर्वरकों की उपलब्धता पर कृषि आयुक्त ने कहा कि सरकार का ध्यान एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और उर्वरकों के अत्यधिक डायवर्जन को रोकने पर है। सॉइल हेल्थ कार्ड के जरिए किसानों को मिट्टी की जांच के आधार पर ही उर्वरकों का सीमित और सही इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है।

फसलों के विविधीकरण से उर्वरकों की मांग अपने आप कम हो जाती है। जैसे अगर मक्के में 125 किलोग्राम नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है तो वहीं सोयाबीन में केवल 12.5 या 25 किलोग्राम की ही जरूरत होती है। सरकार दालों, तिलहन और कपास के विशेष मिशनों के जरिए किसानों को कम लागत और कम इनपुट वाली फसलों की ओर प्रोत्साहित कर रही है। अत्यधिक पानी और पोषक तत्वों की मांग करने वाले चावल (धान) के क्षेत्रों की समीक्षा की जा रही है ताकि वहां फसलों को डायवर्ट किया जा सके।

Monsoon 2026: मौसम विभाग ने बताया किन 5 बड़े कारण से थमी मानसून की रफ्तार, क्या किसानों के लिए है ये चिंता की बात?

Monsoon 2026: इस साल मानसून की शुरुआत तो अच्छी रही, लेकिन अब इसकी रफ्तार धीमी पड़ गई है। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, 22 जून तक देश में सामान्य से करीब 43% कम बारिश हुई है। मानसून फिलहाल दक्षिण महाराष्ट्र के आसपास अटका हुआ है। इसका असर मध्य भारत, पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत और उत्तर-पश्चिम भारत के कई इलाकों में दिख रहा है, जहां बारिश उम्मीद से काफी कम हुई है।

यह स्थिति किसानों के लिए चिंता बढ़ाने वाली है, क्योंकि खरीफ फसलों की बुआई का यही सबसे अहम समय होता है। अगर बारिश में ज्यादा देरी होती है, तो खेती और पानी की उपलब्धता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

कितनी कम हुई है बारिश?

IMD के मुताबिक, 20 जून तक देश में सिर्फ 45.6 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। इस समय तक सामान्य तौर पर 84.4 मिमी बारिश होनी चाहिए थी। यानी बारिश करीब 46% कम रही। 22 जून तक यह कमी थोड़ी घटकर 43% पर पहुंची।

यह तुलना लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) से की जाती है। आसान भाषा में कहें तो यह कई दशकों की औसत बारिश का आंकड़ा होता है।

आखिर मानसून आगे क्यों नहीं बढ़ रहा?

मौसम विभाग का कहना है कि फिलहाल मानसून के लिए जरूरी सही हालात नहीं बन रहे हैं। इसी वजह से मानसून की चाल धीमी पड़ गई है। IMD ने इसके पीछे पांच बड़ी वजहें बताई हैं।

1. अरब सागर से नमी कम आ रही है

मानसून को आगे बढ़ाने में अरब सागर की बड़ी भूमिका होती है। यहां से आने वाली नम हवाएं देश के अलग-अलग हिस्सों तक पानी पहुंचाती हैं और बारिश कराती हैं।

लेकिन इस समय अरब सागर से वैसी मजबूत नम हवाएं नहीं आ रही हैं। नतीजा यह है कि बादल कम बन रहे हैं और बारिश की गतिविधियां कमजोर पड़ गई हैं।

2. मानसूनी हवाएं कमजोर हो गई हैं

मौसम विभाग के मुताबिक, अरब सागर के ऊपर चलने वाली दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं की ताकत कम हो गई है।

इसी वजह से महाराष्ट्र और उसके आसपास के अंदरूनी इलाकों तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच रही। जब नमी कम पहुंचेगी तो बादल भी कम बनेंगे और बारिश भी कम होगी।

3. हिंद महासागर से भी कम मिल रही मदद

मानसून को नमी पहुंचाने में हिंद महासागर की भी अहम भूमिका होती है। भूमध्य रेखा पार करके आने वाली हवाएं काफी मात्रा में नमी लेकर आती हैं।

लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में ये हवाएं भी कमजोर पड़ गई हैं। इसका असर पूरे देश की मानसूनी गतिविधियों पर दिखाई दे रहा है।

4. बारिश कराने वाले बड़े सिस्टम नहीं बन रहे

आमतौर पर कम दबाव का क्षेत्र, चक्रवाती परिसंचरण और दूसरे मौसमीय सिस्टम बनते हैं, जो मानसून को आगे बढ़ाने और अच्छी बारिश कराने में मदद करते हैं।

लेकिन फिलहाल अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में ऐसा कोई मजबूत सिस्टम नहीं बना है। यही वजह है कि मानसून की चाल थम सी गई है।

5. MJO भी कमजोर पड़ गया है

मेडन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) नाम का एक मौसमीय सिस्टम भी बारिश को प्रभावित करता है। जब यह सक्रिय रहता है तो दक्षिण भारत के ऊपर ज्यादा बादल बनते हैं और बाद में ये बादल मानसूनी हवाओं के साथ उत्तर भारत की तरफ बढ़ते हैं।

लेकिन फिलहाल MJO कमजोर स्थिति में है। इसका असर भी बारिश पर पड़ रहा है।

क्या अल नीनो भी बारिश कम कर रहा है?

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका असर भी दिख रहा है। IMD ने कहा है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनी हुई है और मानसून के दौरान इसके और मजबूत होने की संभावना है।

अल नीनो के दौरान समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इतिहास बताता है कि ऐसे समय भारत में मानसून अक्सर कमजोर पड़ जाता है। इसी वजह से बारिश कम होने की आशंका बढ़ जाती है।

IOD से भी नहीं मिल रही मदद

भारतीय महासागर द्विध्रुव यानी IOD फिलहाल तटस्थ स्थिति में है। इसका मतलब है कि यह न तो मानसून को मजबूत कर रहा है और न ही उसे कमजोर कर रहा है।

कई बार सकारात्मक IOD, अल नीनो के असर को कुछ हद तक कम कर देता है। लेकिन इस बार फिलहाल ऐसी कोई मदद नहीं मिल रही है।

किसानों की क्यों बढ़ रही परेशानी?

मानसून का रुकना ऐसे समय हुआ है, जब किसान धान, सोयाबीन, कपास, मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुआई कर रहे हैं। इन फसलों को शुरुआती दौर में अच्छी बारिश की जरूरत होती है।

अगर आने वाले दिनों में बारिश नहीं बढ़ती, तो बुआई प्रभावित हो सकती है। जलाशयों में पानी कम जमा होगा और आगे चलकर सिंचाई पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि किसान, मौसम वैज्ञानिक और सरकार सभी आने वाले हफ्तों की बारिश पर नजर बनाए हुए हैं।

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Monsoon Breaking: डाल्टेनगंज, मोतिहारी से गुजर रहा मानसून, अब IMD ने बताई यूपी में इसकी एंट्री की तारीख

Monsoon Entry in UP Forecast: उत्तर प्रदेश समेत देश के किसानों और आम जनता के लिए राहत की बड़ी खबर है। दो हफ्तों तक पश्चिमी भारत में सुस्त पड़े रहने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून ने एक बार फिर जबरदस्त रफ्तार पकड़ ली है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा बुलेटिन के मुताबिक मानसून अब झारखंड के डाल्टेनगंज और बिहार के मोतिहारी से गुजर रहा है।

इसके साथ ही मौसम विभाग ने उत्तर प्रदेश में मानसून की एंट्री की तारीख भी साफ कर दी है। केंद्रीय और पश्चिमी क्षेत्रों में मानसून के आगे बढ़ने से खरीफ फसलों की बुवाई को बड़ा बूस्ट मिलने की उम्मीद है। साथ ही लोगों को भीषण लू से भी बड़ी राहत मिलेगी।

डाल्टेनगंज और मोतिहारी पहुंची मानसून की सीमा

IMD के मुताबिक 23 जून को मानसून की उत्तरी सीमा अब देश के कई महत्वपूर्ण हिस्सों को पार कर चुकी है। आज की तारीख में मानसून की यह रेखा दहानू, वर्धा, रायपुर, डाल्टेनगंज और मोतिहारी से होकर गुजर रही है। मानसून ने मध्य अरब सागर के बचे हुए हिस्सों, मुंबई सहित महाराष्ट्र के कुछ और इलाकों, तेलंगाना, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के कई नए क्षेत्रों को पूरी तरह कवर कर लिया है।

उत्तर प्रदेश में इस दिन होगी मानसून की एंट्री

IMD ने अपने लेटेस्ट वेदर बुलेटिन में देश के विभिन्न राज्यों में मानसून के आगे बढ़ने का एक अनुमानित टाइमफ्रेम जारी किया है। अगले 2-3 दिनों में उत्तर अरब सागर के कुछ हिस्सों, गुजरात, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के कुछ और इलाकों के साथ-साथ मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में मानसून दस्तक दे देगा।

मध्य प्रदेश में एंट्री के बाद मानसून अगले 3-5 दिनों में आगे बढ़ेगा और झारखंड व बिहार के बचे हुए हिस्सों को कवर करते हुए उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रवेश कर जाएगा। यानी अगले एक हफ्ते के भीतर यूपी में मानसूनी बारिश का दौर शुरू होने की पूरी संभावना है।

दो हफ्ते तक क्यों अटका रहा मानसून?

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मानसून ने 8 जून को ही दक्षिणी महाराष्ट्र में दस्तक दे दी थी लेकिन इसके बाद करीब दो हफ्तों तक इसकी रफ्तार थम गई थी। मौसम अधिकारियों के मुताबिक भूमध्य सागर से उठने वाले पश्चिमी विक्षोभ के कारण मानसून की प्रगति रुक गई थी। पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी लाते हैं लेकिन कभी-कभी ये मानसूनी हवाओं के मार्ग में रुकावट भी पैदा कर देते हैं। अब यह बाधा दूर हो चुकी है और मानसून दोबारा मोमेंटम पकड़ रहा है।

भारतीय अर्थव्यवस्था और खेती के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?

भारत की लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसूनी बारिश बेहद महत्वपूर्ण है। देश की करीब आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। भारत की लगभग आधी कृषि भूमि सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर है। यह चार महीने का मानसून देश की सालाना बारिश का लगभग 70% हिस्सा देता है। इससे जल स्रोतों की रीफिलिंग भी होती है।

जून में अब तक सामान्य से कम रही है बारिश

मौसम विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि अल नीनो के प्रभाव के चलते इस साल जून के पहले 21 दिनों में भारत में औसत से 42.2% कम बारिश दर्ज की गई है। इस पूरे हफ्ते भी बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है। इससे पहले मौसम विभाग ने अपने पूर्वानुमान में कहा था कि चार महीने के इस मानसूनी सीजन में देश में दीर्घावधि औसत (LPA) की 90% बारिश होने की संभावना है जबकि अकेले जून महीने में एल नीनो के कारण एलपीए (LPA) की 92% बारिश होने का अनुमान जताया गया था।

Monsoon Rain crisis: 18 जून तक इस इलाके में हुई सिर्फ 2% बुवाई, बारिश का ये आंकड़ा तो डरा रहा है!

Monsoon Rain Update: दक्षिण-पश्चिम मानसून की सुस्ती और बारिश में हो रही देरी ने महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में खेती का पूरा गणित बिगाड़ दिया है। पानी की कमी और रूठे मानसून की वजह से इस क्षेत्र के आठ जिलों में खरीफ की बुवाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। न्यूज एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक 18 जून तक मराठवाड़ा में बुवाई का आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले महज 2 प्रतिशत रह गया है। सूखे की मार झेलने वाले इस इलाके के किसानों और प्रशासन के लिए बारिश और बुवाई का यह आंकड़ा बेहद डराने वाला है।

बुवाई के आंकड़े: 10 लाख हेक्टेयर के मुकाबले सिर्फ 1 लाख हेक्टेयर

मराठवाड़ा मध्य महाराष्ट्र का एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र है। यहां की खेती पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। पीटीआई ने एक रिपोर्ट को कोट करते हुए बताया है कि यहां बारिश में देरी से बुवाई के आंकड़ों में ऐतिहासिक गिरावट आई है। इस साल 18 जून तक पूरे क्षेत्र में अब तक केवल 1.07 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर ही बुवाई हो पाई है। पिछले साल इसी दिन तक यह आंकड़ा 10.77 लाख हेक्टेयर था। पिछले पांच वर्षों में इस पूरे क्षेत्र में औसतन लगभग 49.72 लाख हेक्टेयर भूमि पर फसलें बोई जाती रही हैं। आंकड़ों से साफ है कि पिछले साल 18 जून तक जितनी बुवाई हुई थी, उसकी तुलना में इस साल अब तक केवल 2 प्रतिशत ही बुवाई हो सकी है।

जिलावार बुवाई का हाल (बीड सबसे आगे, लातूर सबसे पीछे)

मराठवाड़ा के कुल आठ जिले (छत्रपति संभाजीनगर, जालना, बीड, लातूर, धाराशिव, परभणी, हिंगोली और नांदेड़) बारिश की इस देरी का सीधा खामियाजा भुगत रहे हैं। इन 1.07 लाख हेक्टेयर में से आधी से ज्यादा बुवाई (68,572 हेक्टेयर) अकेले बीड जिले में हुई है। दूसरे जिले अपने ऐतिहासिक स्तर से मीलों पीछे हैं। उदाहरण के तौर पर छत्रपति संभाजीनगर में पिछले साल इसी अवधि में 1.64 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी जबकि इस साल यहां सिर्फ 3072 हेक्टेयर में ही फसल बोई जा सकी है।

बारिश और जलाशयों का गहराता संकट

बुवाई में इस भयंकर गिरावट का सीधा कारण बारिश का न होना और जलाशयों में पानी की कमी है। एक अधिकारी के मुताबिक, जून महीने में मराठवाड़ा में औसतन 98.3 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए, लेकिन 18 जून तक इस क्षेत्र में अपने सामान्य कोटे की मात्र 42.7% बारिश (यानी सिर्फ 42.7 मिमी) ही दर्ज की गई है। मराठवाड़ा में मौजूद 11 प्रमुख मेगा प्रोजेक्ट्स (बांधों) में जल स्तर लगातार गिर रहा है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक 18 जून तक इन बांधों में सिर्फ 60.84 टीएमसी (Thousand Million Cubic Feet – tmc) पानी बचा था, जबकि पिछले साल इसी दिन यह 67.35 टीएमसी था।

EPFO: लगातार 10 साल तक सर्विस की है तो आपको मिलेंगी पेंशन, ऐसे कर सकते हैं मंथली पेंशन का कैलकुलेशन

ईपीएफओ अपने सब्सक्राइबर्स के लिए ईपीएफ के साथ ही एक रेगुलर पेंशन स्कीम भी चलाता है। इसका नाम एंप्लॉयीज पेंशन स्कीम (ईपीएस) है। इस स्कीम के तहत सब्सक्राइबर्स को रिटायरमेंट के बाद हर महीने पेंशन मिलती है। इसकी शुरुआत 16 नवंबर, 1995 को हुई थी। इस स्कीम ने फैमिली पेंशन स्कीम, 1971 की जगह ली थी। इसका मकसद सब्सक्राइबर्स को सोशल सिक्योरिटी देना है।

हर महीने ईपीएस में भी होता है कंट्रिब्यूशन

ईपीएफ के सब्सक्राइबर्स अपनी बेसिक मंथली सैलरी का 12 फीसदी ईपीएफ में कंट्रिब्यूट करते हैं। इतना ही कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयर भी एंप्लॉयी के ईपीएफ अकाउंट में कंट्रिब्यूट करता है। लेकिन उसका कंट्रिब्यूशन दो हिस्सों में बंटा होता है। 8.33 फीसदी कंट्रिब्यूशन ईपीएफ में जाता है और बाकी 3.67 फीसदी ईपीएस अकाउंट में जाता है।

ईपीएस में हर महीने पेशन का प्रावधान

फैमिली पेंशन स्कीम, 1971 के तहत सब्सक्राइबर की मौत के बाद परिवार को बेनेफिट्स मिलते थे। लेकिन, ईपीएस में सब्सक्राइबर्स को पेंशन की सुविधा भी देने की शुरुआत हुई। इतना ही नहीं, सब्सक्राइबर के परिवार को भी पेंशन का प्रावधान इस स्कीम में है। इससे रिटायरमेंट के बाद सब्सक्राइबर और उसके परिवार को आर्थिक सुरक्षा हासिल होती है।

ईपीएस के बेनेफिट्स के लिए ये हैं शर्तें

ईपीएस का हिस्सा बनने के लिए सब्सक्राइबर्स के लिए कुछ शर्तें तय हैं। पहला, सब्सक्राइबर की नौकरी कम से कम 10 साल पूरी होनी चाहिए। इस दौरान पेंशन स्कीम में उसकी तरफ से रेगुलर कंट्रिब्यूशन किया गया होना चाहिए। सब्सक्राइबर 58 साल की उम्र में रिटायर करने के बाद ईपीएफए की तरफ से मंथली पेंशन का हकदार होगा।

न्यूनतम पेंशन हर महीने 1000 रुपये

केंद्र सरकार के 2014 के नियम के मुताबिक, ईपीएस के तहत न्यूनतम पेंशन 1000 रुपये है। हालांकि, इसे बढ़ाकर हर महीने 7,500 रुपये करने की मांग लंबे समय से की जा रही है। किसी सब्सक्राइबर को रिटायरमेंट पर हर महीने कितनी पेंशन मिलेगी, इसका कैलकुलेशन उसकी पेंशनएबल सर्विस और रिटायरमेंट से पहले के 60 महीनों की एवरेज सैलरी के आधार पर होता है।

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ऐसे कर सकते हैं पेंशन का कैलकुलेशन 

इसके लिए पहले से एक फॉर्मूला है। इसमें पेंशनएबल सैलरी को पेंशनएबल सर्विस से गुणा किया जाता है। फिर जो संख्या आती है, उसमें 70 से भाग दिया जाता है। पेंशनएबल सैलरी का मतलब अंतिम 60 महीनों की एवरेज सैलरी से है। अगर किसी एंप्लॉयी की पेंशनएबल सैलरी 15,000 रुपये है और उसने 10 साल की सर्विस पूरी की है तो उसकी हर महीने की पेंशन करीब 2,143 रुपये बनेगी।

DA Hike: महंगाई भत्ते में 20% का तगड़ा इजाफा, बंगाल सरकार का अपने कर्मचारियों और पेंशनर्स को बड़ा तोहफा

DA Hike: पश्चिम बंगाल की नव-निर्वाचित बीजेपी सरकार ने सोमवार को अपना पहला बजट पेश किया। इसमें राज्य के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स को बड़ी राहत दी। सरकार ने महंगाई भत्ता (DA) और महंगाई राहत (DR) में 20% की बढ़ोतरी का ऐलान किया है।

इस बढ़ोतरी के बाद राज्य कर्मचारियों और पेंशनर्स को मिलने वाला DA/DR उनकी बेसिक सैलरी का 38% हो जाएगा। नई दरें 1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगी।

यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से पश्चिम बंगाल के कर्मचारी केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर DA की मांग कर रहे थे। नए ऐलान के बाद राज्य और केंद्र के कर्मचारियों के DA के बीच का अंतर 42 प्रतिशत अंक से घटकर 22 प्रतिशत अंक रह गया है।

क्या होता है DA?

महंगाई भत्ता (Dearness Allowance) कर्मचारियों और पेंशनर्स को बढ़ती महंगाई के असर से राहत देने के लिए दिया जाता है। यह बेसिक सैलरी का एक हिस्सा होता है और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर समय-समय पर संशोधित किया जाता है। DA पूरी तरह टैक्सेबल होता है।

क्यों उठ रही थी DA बढ़ाने की मांग?

केंद्र सरकार के कर्मचारी फिलहाल 7वें वेतन आयोग के तहत वेतन और भत्ते पा रहे हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल के कई कर्मचारी अभी भी 5वें और 6वें वेतन आयोग की व्यवस्था के दायरे में हैं। इससे दोनों के वेतन और भत्तों में बड़ा अंतर बना हुआ है। 8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया शुरू होने के बाद यह अंतर और बढ़ने की आशंका जताई जा रही थी।

7वें वेतन आयोग का भी वादा

कर्मचारी संगठनों के मुताबिक मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने जनवरी 2027 से 7वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने का भी आश्वासन दिया है। इसके अलावा सरकार ने बजट में 1 लाख सरकारी नौकरियां भरने, महिलाओं के लिए अन्नपूर्णा योजना पर ₹36,000 करोड़ खर्च करने और फ्री बस सेवा के लिए ₹550 करोड़ आवंटित करने की घोषणा की है।

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मानसून पर ‘विलेन’ अल नीनो का ग्रहण : 5 राज्यों में सूखे का खतरा, IMD की चिंताजनक चेतावनी

Indian Monsoon Update 2026

प्रशांत महासागर में बन रही एक वैश्विक मौसमी घटना भारत के मानसून के लिए बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआती प्रगति के बाद कई क्षेत्रों में इसकी रफ्तार धीमी पड़ गई है, जिसके चलते देश के अनेक हिस्सों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है।
 

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अल नीनो का प्रभाव अगले कुछ महीनों तक बना रहता है, तो न केवल मानसून कमजोर पड़ सकता है, बल्कि कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और खाद्य कीमतों पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। ALSO READ: Monsoon : मौसम के महादानव अल-नीनो को परास्त करेगा Indian Ocean Dipole, जानिए कैसे होगी झमाझम बारिश

क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ जाती है चिंता?

'अल नीनो' (El Niño) प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि की एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसके कारण वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है और भारत में मानसून कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार अल नीनो का प्रभाव जून से ही दिखाई देने लगा है। यदि इसकी तीव्रता बढ़ती है, तो मानसून सीजन के मध्य और अंतिम चरण में वर्षा की कमी और अधिक गंभीर हो सकती है।

किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा?

मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि अल नीनो लंबे समय तक सक्रिय रहा, तो देश के पांच प्रमुख कृषि राज्यों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है:

  • महाराष्ट्र
  • मध्य प्रदेश
  • उत्तर प्रदेश
  • बिहार
  • उत्तरी कर्नाटक

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इन राज्यों में खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ने की आशंका है।

 

शहरों में भी बढ़ रहा जल संकट

सूखे का खतरा केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। देश के कई बड़े शहर पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं।
 

विशेषज्ञों का कहना है कि जल संचयन और वर्षा जल संरक्षण की दिशा में पर्याप्त प्रगति न होने के कारण कई महानगर मानसून पर अत्यधिक निर्भर हैं। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो मुंबई, पुणे समेत कई शहरों में जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है।
 

जल विशेषज्ञों का मानना है कि अब जल संरक्षण, रीसाइक्लिंग और वर्षा जल संग्रहण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना समय की मांग है। ALSO READ: 5 चक्रव्यूह में फंसा मानसून, बारिश को तरसते 7 राज्यों में पारा 40°C के पार, जानें आपके शहर का हाल

 

क्या 2026-27 की गर्मियां रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं?

मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अल नीनो के प्रभाव के चलते आगामी वर्षों में वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है।
 

कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत के कई हिस्सों में गर्मी की तीव्रता बढ़ सकती है और हीटवेव की घटनाएं अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं। ऐसे हालात में कई क्षेत्रों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचने की आशंका भी जताई जा रही है।

किसानों पर दोहरी मार

कम बारिश का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ता है।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार, यदि वर्षा में उल्लेखनीय कमी बनी रहती है, तो खरीफ सीजन की प्रमुख फसलें प्रभावित हो सकती हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • धान
  • तुअर और मूंग जैसी दालें
  • सोयाबीन और मूंगफली जैसे तिलहन
  • कपास
  • बाजरा
  • फल और सब्जियां

विशेषज्ञों का कहना है कि किसान अचानक फसल पैटर्न नहीं बदल सकते, क्योंकि खेती केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था से भी जुड़ी होती है।

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महंगाई पर भी पड़ सकता है असर

कृषि उत्पादन घटने का सीधा असर बाजार पर पड़ता है।

यदि उत्पादन कम हुआ और त्योहारी सीजन में मांग बढ़ी, तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है। दाल, तेल, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, जिससे आम उपभोक्ता की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है।

राहत की खबर भी है

हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत के पास वर्तमान में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है, जो किसी भी संभावित आपूर्ति संकट से निपटने में मदद कर सकता है। इसके अलावा :

  • देश का सिंचित क्षेत्र पिछले दशक में बढ़ा है।
  • मौसम पूर्वानुमान तकनीक पहले से अधिक सटीक हुई है।
  • AI आधारित कृषि सलाह किसानों को समय रहते निर्णय लेने में मदद कर रही है।
  • केंद्र और राज्य सरकारें लगातार निगरानी कर रही हैं।

विशेषज्ञों की सलाह: किसान क्या करें?

विशेषज्ञों ने किसानों को निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:

✔ एक ही फसल पर पूरी निर्भरता से बचें।

✔ मिश्रित खेती अपनाएं।

✔ कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दें।

✔ मौसम पूर्वानुमान के आधार पर बुआई की योजना बनाएं।

✔ सूखा प्रभावित क्षेत्रों में दोबारा बुआई का जोखिम सोच-समझकर लें।

उम्मीद की किरण: IOD बन सकता है गेमचेंजर

मौसम वैज्ञानिकों की नजर अब 'पॉजिटिव इंडियन ओशन डिपोल' (IOD) पर है। यदि मानसून के उत्तरार्ध में पॉजिटिव IOD सक्रिय होता है, तो यह अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है और देश के कई हिस्सों में अतिरिक्त वर्षा का कारण बन सकता है।
 

फिलहाल देश की निगाहें आसमान पर टिकी हैं। आने वाले कुछ सप्ताह तय करेंगे कि अल नीनो भारत के लिए केवल एक मौसमी चुनौती साबित होगा या फिर यह खेती, पानी और महंगाई से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय संकट बन जाएगा।

 

कल का मौसम 22 June: IMD ने इन 19 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट दिया, दिल्ली हरियाणा राजस्थान तक आंधी तूफान, चेक करिए Weather

देशभर में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। एक तरफ दक्षिण-पश्चिम मानसून लगातार आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर कई राज्यों में भारी बारिश, आंधी-तूफान और लू की स्थिति बनी हुई है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने 22 जून के लिए कई राज्यों में भारी बारिश और तेज हवाओं को लेकर चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के अनुसार पूर्वोत्तर भारत, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में जोरदार बारिश देखने को मिल सकती है, जबकि मध्य भारत और कुछ उत्तरी राज्यों में लू का असर बना रहेगा।

इन राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

मौसम विभाग के मुताबिक, असम और मेघालय में कुछ स्थानों पर भारी से बहुत भारी बारिश होने की संभावना है। इन राज्यों के कुछ इलाकों में अत्यधिक भारी बारिश भी हो सकती है, जिससे निचले क्षेत्रों में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। वहीं अरुणाचल प्रदेश, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में भी भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है।

पूर्वी भारत के राज्यों बिहार, झारखंड और ओडिशा में मौसम काफी सक्रिय रहने वाला है। यहां कई जगहों पर बारिश के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। मौसम विभाग ने इन राज्यों में 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलने और गरज-चमक के साथ आंधी-तूफान की चेतावनी दी है। बिहार में कुछ स्थानों पर भारी बारिश भी हो सकती है, जिससे लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।

दक्षिण भारत में भी मानसून का असर साफ दिखाई दे रहा है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल में कई स्थानों पर भारी बारिश होने की संभावना है। कोंकण और गोवा तथा लक्षद्वीप में भी बारिश का दौर जारी रह सकता है। इन इलाकों में बिजली चमकने और तेज हवाएं चलने की चेतावनी भी जारी की गई है।

दिल्ली हरियाणा राजस्थान तक आंधी तूफान

उत्तर भारत में भी मौसम करवट ले रहा है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के कई हिस्सों में गरज-चमक के साथ बारिश हो सकती है। इन क्षेत्रों में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभावना है। इससे तापमान में कुछ गिरावट आ सकती है और लोगों को गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद है।

राजस्थान के लिए मौसम विभाग ने विशेष चेतावनी जारी की है। पश्चिमी और पूर्वी राजस्थान के कुछ हिस्सों में 60 से 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज आंधी चल सकती है, जबकि झोंकों की गति 80 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। पश्चिमी राजस्थान में धूल भरी आंधी आने की भी संभावना जताई गई है। ऐसे में लोगों को सावधानी बरतने और अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी गई है।

गर्मी का प्रकोप भी रहेगा जारी 

हालांकि देश के कुछ हिस्सों में गर्मी का प्रकोप अभी भी जारी है। छत्तीसगढ़, पूर्वी मध्य प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में लू चलने की संभावना है। वहीं विदर्भ क्षेत्र में लू से लेकर भीषण लू तक की स्थिति बनी रह सकती है। मौसम विभाग ने लोगों को दोपहर के समय घर से बाहर निकलने से बचने, अधिक पानी पीने और शरीर को ठंडा रखने की सलाह दी है। विदर्भ में गर्म रातों की स्थिति भी बनी रह सकती है, जिससे लोगों को रात में भी राहत मिलने की संभावना कम है।

इस बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून लगातार आगे बढ़ रहा है। वर्तमान में मानसून की उत्तरी सीमा महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ हिस्सों तक पहुंच चुकी है। मौसम विभाग का कहना है कि 23 जून के आसपास मानसून इन राज्यों के और अधिक क्षेत्रों तथा छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ सकता है। इससे किसानों को राहत मिलने के साथ-साथ खेती के कार्यों में भी तेजी आने की उम्मीद है।

समुद्री क्षेत्रों के लिए भी चेतावनी जारी की गई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के कई हिस्सों में 45 से 55 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं, जिनकी गति झोंकों के साथ 65 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। मछुआरों को समुद्र में जाने से बचने की सलाह दी गई है।

कुल मिलाकर आने वाले दिनों में देश के अधिकांश हिस्सों में मौसम सक्रिय बना रहेगा। कहीं भारी बारिश लोगों की मुश्किलें बढ़ा सकती है तो कहीं लू का असर जारी रहेगा। ऐसे में मौसम विभाग की चेतावनियों पर नजर रखना और आवश्यक सावधानियां बरतना बेहद जरूरी है।

IMD Heavy Rain Alert: मानसून ने पकड़ी रफ्तार, 23 जून तक इन राज्यों में पहुंचेगी बारिश….IMD ने जारी किया भारी बारिश का अलर्ट

देशभर में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। एक तरफ दक्षिण-पश्चिम मानसून धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ कई राज्यों में भारी बारिश, आंधी-तूफान और बिजली गिरने की चेतावनी जारी की गई है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के ताजा बुलेटिन के अनुसार, आने वाले दिनों में पूर्वोत्तर भारत, पूर्वी भारत और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में जोरदार बारिश देखने को मिल सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अभी भी लू का असर बना रहेगा।

दो दिन में आगे बढ़ेगा मानसून

मौसम विभाग के अनुसार, मानसून की उत्तरी सीमा फिलहाल महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड और बिहार के कुछ हिस्सों तक पहुंच चुकी है। मौसम की परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं और 23 जून के आसपास मानसून के इन राज्यों के और अधिक क्षेत्रों में आगे बढ़ने की संभावना है। इससे किसानों और आम लोगों को गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद है।

इन राज्यों में होगी भारी बारिश 

पूर्वोत्तर भारत में अगले कई दिनों तक भारी बारिश हो सकती है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में लगातार बारिश होने की संभावना जताई गई है। मेघालय और असम के कुछ इलाकों में अत्यधिक भारी बारिश भी हो सकती है। इसके चलते निचले इलाकों में जलभराव, भूस्खलन और बाढ़ जैसी स्थिति बनने का खतरा बना हुआ है।

पूर्वी भारत की बात करें तो बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में बारिश की गतिविधियां बढ़ने वाली हैं। बिहार और ओडिशा में कुछ स्थानों पर भारी बारिश के साथ तेज हवाएं चल सकती हैं। वहीं उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में भी भारी से बहुत भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है।

उत्तर भारत में ऐसा रहेगा मौसम

उत्तर भारत में भी मौसम का असर दिखाई देगा। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में गरज-चमक के साथ बारिश की संभावना है। कुछ इलाकों में 40 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं। राजस्थान में आंधी और धूल भरी हवाओं का असर देखने को मिल सकता है। मौसम विभाग ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है।

दक्षिण भारत में भी मानसून सक्रिय बना हुआ है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कई स्थानों पर बारिश होने की संभावना है। तेलंगाना और तटीय आंध्र प्रदेश में कुछ जगहों पर भारी बारिश हो सकती है। वहीं कर्नाटक और केरल में लगातार बारिश के कारण जलभराव की स्थिति बन सकती है।

पश्चिमी भारत में कोंकण, गोवा, गुजरात और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में बारिश की गतिविधियां बढ़ेंगी। कोंकण और गोवा में 22 जून के बाद भारी बारिश की संभावना जताई गई है। वहीं मध्य महाराष्ट्र और मराठवाड़ा के कुछ इलाकों में गरज-चमक के साथ बारिश हो सकती है।

यहां दिखेगा  गर्मी का प्रकोप

हालांकि देश के कुछ हिस्सों में गर्मी का प्रकोप अभी भी जारी है। विदर्भ, पूर्वी मध्य प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के कुछ इलाकों में लू चलने की चेतावनी जारी की गई है। विदर्भ में कई स्थानों पर गंभीर लू की स्थिति बनी रह सकती है। मौसम विभाग ने लोगों को दोपहर के समय घर से बाहर निकलने से बचने, पर्याप्त पानी पीने और शरीर को ठंडा रखने की सलाह दी है।

मौसम विभाग ने भारी बारिश वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। जलभराव वाले क्षेत्रों में जाने से बचने, यातायात संबंधी सलाह का पालन करने और खराब मौसम के दौरान सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की गई है। वहीं बिजली गिरने और तेज आंधी की आशंका वाले क्षेत्रों में लोगों को पेड़ों के नीचे खड़े न होने और खुले स्थानों से दूर रहने की सलाह दी गई है।

कुल मिलाकर आने वाला सप्ताह देश के अधिकांश हिस्सों में मौसम के लिहाज से काफी सक्रिय रहने वाला है। जहां कई राज्यों में मानसून राहत की बारिश लेकर आएगा, वहीं कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और लू दोनों की चुनौती बनी रहेगी। ऐसे में लोगों को मौसम विभाग की चेतावनियों पर नजर रखने और आवश्यक सावधानी बरतने की जरूरत है।