सोना लगातार दूसरे दिन हुआ सस्ता, चांदी का दाम 7 हजार रुपए से अधिक घटा

सोने और चांदी की कीमतों में गुरुवार को लगातार दूसरे दिन गिरावट देखने को मिली। इससे सोने का दाम 1.48 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम और चांदी का दाम करीब 2.40 लाख रुपए प्रति किलो पर पहुंच गया।  

इंडिया बुलियन ज्वेलर्स एसोसिएशन (आईबीजेए) के मुताबिक, 24 कैरेट सोने का दाम 2,055 रुपए कम होकर 1,48,093 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है, जो कि पहले 1,50,148 रुपए प्रति 10 ग्राम था। 

22 कैरेट सोने की कीमत 1,37,536 रुपए प्रति 10 ग्राम से कम होकर 1,35,653 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गई है। 18 कैरेट सोने का दाम कम होकर 1,11,070 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया है, जो कि पहले 1,12,611 रुपए प्रति 10 ग्राम था। 

सोने के साथ चांदी की कीमतों में कमी देखने को मिली है। चांदी का दाम 7,497 रुपए कम होकर 2,40,191 रुपए प्रति किलो हो गया है, जो कि पहले 2,47,688 रुपए प्रति किलो था। 

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हाजिर के साथ वायदा बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिली। सोने का 5 अगस्त 2026 का कॉन्ट्रैक्ट 2.62 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 1,49,845 रुपए और चांदी का 3 जुलाई 2026 का कॉन्ट्रैक्ट 5.22 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 2,38,654 रुपए पर था। 

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोने और चांदी की कीमतों में कमी देखने को मिली है। खबर लिखे जाने तक कॉमेक्स पर सोना 2.75 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 4,260 डॉलर प्रति औंस और चांदी 5.99 प्रतिशत की गिरावट के साथ 66 डॉलर प्रति औंस पर था।

एसकेपी सिक्योरिटीज के जतिन त्रिवेदी ने कहा कि फेडरल रिजर्व की पॉलिसी घोषणा के बाद सोने की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई। इसकी वजह नए फेड चेयरमैन केविन वॉर्श की टिप्पणियों से संकेत मिला कि अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहती है, तो 2026 में ब्याज दरों में एक बार बढ़ोतरी हो सकती है।

उन्होंने आगे कहा कि हाल की भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद, फेड के आकलन में स्थिर आर्थिक विकास और मजबूत लेबर मार्केट की बात कही गई, जिससे डॉलर मजबूत हुआ और बुलियन की कीमतों पर दबाव पड़ा।

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El Nino Fear Impact: अल नीनो के डर से यहां किसानों ने पानी बचाने के लिए धान उगाने की टेक्नीक ही बदली! इससे हो रही बचत समझिए

El Nino Impact on Rice Farming: प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Niño) के पैर पसारने और कम बारिश की आशंका के बीच आंध्र प्रदेश के किसानों ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया है। सूखे और पानी की किल्लत के डर से यहां के किसानों ने पानी बचाने के लिए धान उगाने की अपनी पारंपरिक तकनीक से अलग हट कर काम करना शुरू किया है। किसान अब पारंपरिक रूप से धान के खेतों को पानी से लबालब भरने के बजाय आधुनिक और कम पानी लेने वाली तकनीकों को अपना रहे हैं, जिससे लाखों लीटर पानी की बचत हो रही है।

पीटीआई की रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जेआर पुरम गांव के एक ऐसे ही किसान की कहानी बताई गई है। 52 वर्षीय किसान मज्जी सत्यम के एक ऐसे ही के पास 5 एकड़ जमीन और दो बोरवेल हैं। वे जीवनभर अपने पिता के सिखाए पारंपरिक तरीके से ही धान उगाते रहे हैं। यानी पहले नर्सरी में पौधे तैयार करना फिर उन्हें पानी से लबालब भरे खेतों में ट्रांसप्लांट (रोपाई) करना और कटाई तक खेतों में पानी जमा रखना।

इस खरीफ सीजन में अल नीनो के कारण कम बारिश की आशंका को देखते हुए सत्यम ने अपनी तकनीक बदल दी है। सत्यम ने पीटीआई को बताया कि, ‘पिछले साल मई में ही बारिश आ गई थी। इस साल अभी तक नहीं आई है। मैंने सुना है कि अल नीनो के कारण इस बार बारिश कम होगी। इसलिए मैंने DSR आजमाने का फैसला किया है।’

क्या है DSR तकनीक?

DSR यानी डायरेक्ट सीडेड राइस (Direct Seeded Rice – धान की सीधी बुआई)। इस तकनीक में नर्सरी तैयार करने की बिल्कुल जरूरत नहीं होती। इसमें बीज सीधे मुख्य खेत में बोए जाते हैं। इसमें न तो रोपाई की जरूरत पड़ती है, न ही खेतों में पानी जमा रखने या कीचड़ बनाने की आवश्यकता होती है। कम मानसून की मार झेलने वाले किसानों के लिए यह तकनीक एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है।

एक एकड़ में बचता है 12 लाख लीटर पानी

पारंपरिक धान की खेती में अत्यधिक पानी की खपत होती है। इसके मुकाबले डीओएसआर (DSR) और एडब्ल्यूडी (AWD – अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग) तकनीकें पानी की जरूरतों को काफी कम कर देती हैं। AWD एक ऐसी तकनीक है जिसमें खेतों को लगातार पानी में डुबोकर रखने के बजाय चक्रों में पानी दिया और सुखाया जाता है।

डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन के निदेशक (ग्रामीण आजीविका और जलवायु कार्रवाई) सुमन सारस्वतीभटला ने बचत के आंकड़े बताते हुए कहा कि ड्राय डीएसआर पारंपरिक तरीकों की तुलना में प्रति एकड़ लगभग 11 से 12 लाख लीटर पानी बचाता है।

इसी तरह वेट डीएसआर प्रति एकड़ लगभग 4 से 5.5 लाख लीटर पानी की बचत करता है। AWD पारंपरिक खेती के मुकाबले लगभग 3 से 5 लाख लीटर पानी बचाता है। दोनों तकनीकों के सही ढंग से काम करने के लिए खेत के ऊपरी 30-40 सेंटीमीटर हिस्से में मिट्टी की नमी का लगातार बने रहना बेहद महत्वपूर्ण है, जो यह तय करता है कि किसानों को कब और कैसे बुआई करनी है।

3000 करोड़ लीटर पानी की हुई रिकॉर्ड बचत

सत्यम अकेले ऐसे किसान नहीं हैं। श्रीकाकुलम और विजयनगरम जिलों के 1500 से अधिक गांवों में करीब 10 लाख एकड़ धान के क्षेत्र में किसानों को एक्शन फॉर क्लाइमेट एंड एनवायरनमेंट (ACE) कार्यक्रम के तहत पानी की अधिक खपत वाली पारंपरिक खेती से दूर ले जाया जा रहा है। यह पहल फार्मा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज के सीएसआर (CSR) फंड के सहयोग से संचालित डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन द्वारा की जा रही है।

पिछले साल इन दोनों जिलों के किसानों ने 3667 एकड़ में DSR और 21963 एकड़ में AWD तकनीक को अपनाया था। इस वजह से 3000 करोड़ लीटर से अधिक पानी की बचत हुई और 50000 टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन में कमी आई। अल नीनो के दोबारा पूर्वानुमान को देखते हुए इस साल इन आंकड़ों में और बड़ी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।

इसी गांव के एक अन्य 50 वर्षीय किसान आर सन्यास राव पिछले साल से ही 5 एकड़ में वेट डीएसआर का सफल प्रयोग कर रहे हैं। इससे उनकी मजदूरी की लागत घट गई और नर्सरी व रोपाई का झंझट खत्म हो गया। इस साल वे दो एकड़ में ड्राय डीएसआर और तीन एकड़ में मक्के की खेती कर रहे हैं।

सरकारी कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र भी किसानों को धान का रकबा घटाने, कम समय वाली फसलों या दालों और अनाजों को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। सत्यम का कहना है कि अगर अल नीनो गंभीर हुआ, तो हम सिर्फ घर के खाने के लिए ही धान उगाएंगे।

बदल गया बुआई का कैलेंडर और बढ़ाई गई मिट्टी की सेहत

चक्रवात और बारिश पर निर्भर रहने वाले इस बेल्ट (श्रीकाकुलम) में बुआई का पारंपरिक समय पहले ही बदल चुका है। पहले जहां धान जून के अंत में बोया जाता था, वहीं पिछले 3-4 वर्षों में यह जुलाई में शिफ्ट हो गया है और मुख्य रोपाई अगस्त तक चली जाती है। इस खाली समय का उपयोग करने के लिए फाउंडेशन किसानों को खरीफ शुरू होने से पहले (मई-जून की अवधि में) कम समय वाली कवर फसलें जैसे उड़द, मूंग और तिल उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

इसके अलावा पटसन और नेपियर जैसी हरी खाद वाली फसलें मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद करती हैं। पिछले साल 2372 एकड़ में कवर फसलें और 1508 एकड़ में एग्रो-फॉरेस्ट्री (नारियल के बगीचों में इमारती लकड़ी और फलों के पौधे लगाना) की गई थी।

मिट्टी की जांच और डिजिटल सलाह

श्रीकाकुलम की मिट्टी के स्वास्थ्य में भी गिरावट देखी जा रही है। फाउंडेशन ने जनवरी 2025 में हैदराबाद में अपनी अत्याधुनिक सुविधा शुरू की है। इसके माध्यम से किसानों को त्वरित मिट्टी जांच रिपोर्ट और फसल संबंधी सलाह दी जा रही है। पिछले साल 5000 से अधिक सॉयल हेल्थ कार्ड जारी किए गए। इनमें पाया गया कि मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर बहुत कम है।

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सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है जबकि पोटाश की मात्रा अधिक है। इस साल अल नीनो के प्रभाव और उर्वरकों की कमी को देखते हुए विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है। पिछले पांच वर्षों से बल्क एसएमएस, पोस्टर और किसान बैठकों के माध्यम से किसानों को आदत या सुविधा के बजाय मिट्टी की जरूरत के हिसाब से सटीक खाद डालने के लिए जागरूक किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी “पीएम-किसान योजना” की 23वीं किस्त में किसानों के खातों में लगभग 18,880 करोड़ रुपये करेंगे ट्रांसफर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 जून को पीएम‑किसान योजना की 23वीं किस्त के रूप में देशभर के 9.44 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में लगभग 18,880 करोड़ रुपये ट्रांसफर करेंगे। यह जानकारी कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय की ओर से गुरुवार को दी गई।  

मंत्रालय की ओर से जारी किए गए बयान में कहा गया कि पीएम मोदी पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के तारकेश्वर से पीएम‑किसान योजना की 23वीं किस्त किसानों के खाते में ट्रांसफर करेंगे। इस दौरान वह ‘विकसित भारत, विकसित पश्चिम बंगाल’ के संकल्प को नई गति देने के उद्देश्य से कृषि, ग्रामीण विकास, मत्स्य पालन और रेलवे सहित विभिन्न क्षेत्रों की अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाओं का लोकार्पण, राष्ट्र को समर्पण एवं शिलान्यास भी करेंगे।

साथ ही, वह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एवं पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना, डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत एग्रीटेक, राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन तथा प्रधानमंत्री धन‑धान्य कृषि योजना जैसी महत्वपूर्ण पहलों की शुरुआत करेंगे, जिनसे किसानों की आय, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और समावेशी विकास को व्यापक बल मिलेगा और पश्चिम बंगाल का कृषि परिदृश्य भी बदल जाएगा।

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केंद्रीय कृषि मंत्री सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य आतिथ्य में पश्चिम बंगाल में होने वाला यह राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम किसानों, ग्रामीण समुदाय और युवाओं के लिए एक ऐतिहासिक अवसर साबित होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार का संकल्प है कि पूर्वी भारत को कृषि, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक विकास का मजबूत केंद्र बनाया जाए और 20 जून का कार्यक्रम इसी विजन को जमीन पर उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पीएम‑किसान योजना की 23वीं किस्त के तहत केवल पश्चिम बंगाल में ही 45.35 लाख से अधिक लाभार्थी किसानों को लगभग 907 करोड़ रुपये किस्त के रूप में प्राप्त होंगे। इसके साथ ही राज्य में पीएम‑किसान योजना के अंतर्गत अब तक वितरित कुल राशि 15,055 करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी जबकि 2019 में योजना की शुरुआत से लेकर पूरे देश में कुल वितरण 4.46 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच जाएगा।

इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (आरडब्ल्यूबीसीआईएस) का भी शुभारंभ करेंगे, जिनकी संयुक्त लागत लगभग 12,200 करोड़ रुपये है। वित्त वर्ष 2026‑27 के दौरान इन योजनाओं के माध्यम से लगभग 1.10 करोड़ किसानों को 30 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर फसल बीमा सुरक्षा प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है जिसके तहत लगभग 28,140 करोड़ रुपये मूल्य की फसलें बीमा संरक्षण के दायरे में आएंगी।

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विकास और विरासत: मोदी युग में नए भारत का नव-उदय

PM Narendra Modi

PM Narendra Modi

भारतीय राजनीति में 10 जून 2026 का दिन एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में दर्ज होगा। लगातार तीसरे कार्यकाल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए देश में सबसे लंबे समय तक चुने जाने वाले राष्ट्रप्रमुख बन जाएंगे। पीएम मोदी का यह कार्यकाल केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के उस अटूट विश्वास का प्रमाण है, जिसने भारत को प्रगति और वैश्विक नेतृत्व के शिखर पर पहुंचाया है। इस शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि नरेंद्र मोदी ने स्वयं को हमेशा 'प्रधान सेवक' के रूप में प्रस्तुत किया और स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (33% महिला आरक्षण) तथा 'मन की बात' जैसे अभियानों के माध्यम से शासन को सीधे जन-भागीदारी से जोड़ दिया।

 

तकनीक से सामाजिक न्याय और अंत्योदय

आर्थिक और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर, सरकार ने जनधन-आधार-मोबाइल यानी 'जैम ट्रिनिटी' की त्रिशक्ति से बिचौलियों और भ्रष्टाचार के पुराने तंत्र को समूल नष्ट कर दिया। डिजिटल तकनीक और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे जरूरतमंदों के खातों में पहुंच रहा है। इसके फलस्वरूप पिछले एक दशक में लगभग 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर आए हैं।

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वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर हर नागरिक को सम्मानित जीवन देने के लिए सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं ने धरातल पर करोड़ों जीवन बदले हैं। मुख्य योजनाओं की पहुंच को हम इन सीधे आंकड़ों से समझ सकते हैं: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (80 करोड़ मुफ्त राशन लाभार्थी), आयुष्मान भारत योजना (55 करोड़ लोगों को 5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य कवच), प्रधानमंत्री आवास योजना (4 करोड़ से अधिक पक्के मकान), पीएम-किसान निधि (11 करोड़ किसानों को सालाना 6,000 की सीधी मदद), जल जीवन मिशन (14 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल से जल), उज्ज्वला योजना (10 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन), पीएम सूर्य घर योजना (1 करोड़ घरों को मुफ्त सौर बिजली) और जनधन योजना (50 करोड़ से अधिक बैंक खाते) आदि हैं।

 

बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता

दूसरी ओर, बुनियादी ढांचे के निर्माण में वर्तमान भारत ने जो गति पकड़ी है, वह पूरी दुनिया के लिए शोध का विषय है। आज देश में प्रतिदिन लगभग 28 से 30 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हो रहा है; रेल नेटवर्क के आधुनिकीकरण के साथ 'वंदे भारत' जैसी स्वदेशी ट्रेनें दौड़ रही हैं और हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। यूपीआई (UPI) के माध्यम से आज भारत वैश्विक डिजिटल भुगतान में सबसे आगे है।

 

स्वास्थ्य क्षेत्र में पहले जहां केवल 7 एम्स (AIIMS) थे, वहीं अब 20 एम्स चालू हो चुके हैं। 'मेक इन इंडिया' की दूरदर्शी नीतियों के चलते भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है और देश अब सेमीकंडक्टर (चिप) निर्माण के क्षेत्र में उतरकर वैश्विक स्तर पर आत्मनिर्भर बन रहा है।

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विदेश नीति और वैश्विक नेतृत्व

वैश्विक मंच पर भारत की विदेश नीति 'राष्ट्र प्रथम' के महामंत्र पर आधारित है, जहां देश बिना किसी महाशक्ति के दबाव में आए स्वतंत्र निर्णय लेता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्षों और वैश्विक मंदी के बीच भी भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए कच्चे तेल का आयात जारी रखा और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक महाशक्ति बना रहा। जी-20 की सफल अध्यक्षता करके भारत 'ग्लोबल साउथ' की सशक्त आवाज और 'विश्वमित्र' के रूप में उभरा है। यही कारण है कि पीएम मोदी को अब तक 24 से अधिक देशों द्वारा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिए जा चुके हैं। हाल ही में, मई 2026 में उन्हें मिला नॉर्वे का सर्वोच्च सम्मान (ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट) उनके अंतरराष्ट्रीय सम्मानों की श्रृंखला में 32वां सम्मान है।

 

एक ऐतिहासिक नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में होती है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने रिकॉर्ड समय में दो प्रमुख टीकों- पूर्णतः स्वदेशी 'कोवैक्सीन' और भारत में निर्मित 'कोविशील्ड- का उत्पादन किया और 'वैक्सीन मैत्री' के तहत दुनिया के दर्जनों देशों को टीके भेजकर 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को चरितार्थ किया।

 

विकास भी, विरासत भी

यह नेतृत्व 'विकास भी, विरासत भी' के संतुलित मंत्र पर चलता है। एक तरफ इसरो (ISRO) ने चंद्रयान, सूर्ययान और गगनयान जैसे ऐतिहासिक अभियानों से अंतरिक्ष में अपना परचम लहराया, तो दूसरी तरफ अयोध्या में भव्य प्रभु श्री राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम व महाकाल लोक का पुनरुद्धार और योग-आयुर्वेद को वैश्विक मान्यता दिलाकर देश के सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया है।

 

इसी तरह, रक्षा क्षेत्र भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा है। 'मेक इन इंडिया' के तहत आईएनएस विक्रांत और तेजस जैसे हथियारों के निर्माण से जहां रक्षा आयात कम हुआ है, वहीं रक्षा निर्यात 21,000 करोड़ के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को पार कर चुका है। सीडीएस (CDS) पद का गठन, अटल व सेला टनल का निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति ने देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को अभेद्य बनाया है।

 

निष्कर्ष

अंततः, आज की यह ऐतिहासिक तिथि कोई ठहराव नहीं, बल्कि 'विकसित भारत @2047' के विराट संकल्प की ओर बढ़ने वाले एक अनंत रथ का नव-प्रस्थान है। आज का न्यू इंडिया एक हाथ में इसरो की आधुनिकतम तकनीक और दूसरे हाथ में अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का गौरव थामे हुए वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति के रूप में खड़ा है। आगामी पीढ़ियां मोदी युग को इतिहास के पन्नों में राष्ट्र के सांस्कृतिक अरुणोदय और वैश्विक महाशक्ति के रूप में उसके सिंहनाद के रूप में याद रखेंगी।

 

Chhatrapati Shivaji Maharaj: 6 जून: श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक दिवस पर विशेष

 Picture of Chhatrapati Shivaji Maharaj, a man of unparalleled talent in world history

इतिहास में कुछ तिथियां केवल कैलेंडर के पन्नों पर अंकित दिन नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में सदैव जीवित रहने वाली प्रेरणाएं बन जाती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, 6 जून 1674 का दिन भारतीय इतिहास की ऐसी ही एक अमर तिथि है, जब रायगढ़ की पवित्र धरती पर श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। यह घटना किसी राजा के सिंहासनारोहण का मात्र राजकीय आयोजन नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाधीन शासन की उद्घोषणा थी। उस दिन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक हुआ था।ALSO READ: जयंती विशेष: छत्रपति शिवाजी: धर्म, संस्कृति और राजनीति के अद्वितीय साम्राज्य निर्माता Chhatrapati Shivaji Maharaj

 

सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी प्रभुत्व और सामाजिक निराशा के दौर से गुजर रहा था। सत्ता का केंद्र जनता से दूर था और शासन का उद्देश्य लोककल्याण के बजाय साम्राज्य विस्तार बन चुका था। ऐसे समय में एक युवा ने यह स्वप्न देखने का साहस किया कि इस भूमि का शासन इसी भूमि के लोगों के हाथों में होना चाहिए। यह स्वप्न था-'हिन्दवी स्वराज्य' का और उस स्वप्न के महान शिल्पकार थे श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज। 

 

शिवाजी महाराज ने अपने जीवन की यात्रा किसी विशाल साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील राष्ट्रनायक के रूप में प्रारंभ की थी। सीमित संसाधन, विपरीत परिस्थितियां और शक्तिशाली शत्रुओं के बीच उन्होंने जिस धैर्य, साहस और दूरदर्शिता का परिचय दिया, वह विश्व इतिहास में अद्वितीय है। उनके लिए सत्ता व्यक्तिगत वैभव का साधन नहीं, बल्कि जनकल्याण और राष्ट्ररक्षा का माध्यम थी। 

 

यही कारण है कि उनके प्रत्येक अभियान के पीछे विस्तारवाद नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और सुरक्षा का उद्देश्य दिखाई देता है। लगभग तीन दशकों तक चले संघर्ष, संगठन और राष्ट्रनिर्माण के पश्चात जब स्वराज्य एक सुदृढ़ शक्ति के रूप में स्थापित हो गया, तब राज्याभिषेक की आवश्यकता अनुभव की गई। यह केवल धार्मिक या परंपरागत प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक घोषणा थी कि यह राज्य किसी साम्राज्य की जागीर नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और सार्वभौम सत्ता है। रायगढ़ का दुर्ग उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जब भारतीय आत्मविश्वास ने पुनः अपना मस्तक ऊंचा किया। राज्याभिषेक समारोह की भव्यता जितनी आकर्षक थी, उससे कहीं अधिक उसका वैचारिक महत्व था।

 

'सदियों बाद किसी भारतीय शासक ने पूर्ण वैदिक परंपरा के अनुसार स्वयं को स्वतंत्र सम्राट घोषित किया था। 'यह घटना उस मानसिक गुलामी के विरुद्ध भी थी, जिसने समाज को यह विश्वास दिला दिया था कि विदेशी शासन ही उसकी नियति है। श्री शिवाजी महाराज ने अपने राज्याभिषेक के माध्यम से यह संदेश दिया कि स्वराज्य केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की अवस्था है।

 

रायगढ़ में आयोजित यह समारोह भारतीय संस्कृति की जीवंतता और सामाजिक सहभागिता का अनुपम उदाहरण था। देश के विभिन्न क्षेत्रों से विद्वान, संत, धर्माचार्य, योद्धा और आम जनता के साथ जनप्रतिनिधि इसमें सम्मिलित हुए। यह आयोजन किसी एक क्षेत्र या समुदाय का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की आकांक्षाओं का उत्सव बन गया। राज्याभिषेक के उपरांत दान, दक्षिणा और लोकहित के कार्यों पर जो बल दिया गया, वह शिवाजी महाराज की जनोन्मुखी शासन दृष्टि को स्पष्ट करता है। 

 

आज जब हम श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक दिवस को स्मरण करते हैं, तो हमें केवल उसके ऐतिहासिक वैभव को नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसके मूल संदेश को समझना चाहिए। श्री शिवाजी महाराज का जीवन बताता है कि राष्ट्र का निर्माण केवल तलवार की शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संगठन, न्याय और जनविश्वास से होता है। उन्होंने अपने शासन में धर्म को आस्था का विषय बनाया, शासन का उपकरण नहीं। 

 

उन्होंने महिलाओं के सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, किसानों को संरक्षण दिया, प्रशासन को जवाबदेह बनाया और सुरक्षा को राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी माना। वर्तमान समय में जब नेतृत्व के मूल्य, प्रशासनिक नैतिकता और राष्ट्रीय दायित्व पर निरंतर चर्चा होती है, तब शिवाजी महाराज का व्यक्तित्व एक आदर्श उदाहरण बनकर सामने आता है। 

 

यह राज्याभिषेक हमें याद दिलाता है कि सत्ता का वास्तविक अर्थ सेवा है, अधिकार का वास्तविक उद्देश्य संरक्षण है और नेतृत्व का वास्तविक स्वरूप त्याग एवं उत्तरदायित्व है।'यह भी विचारणीय है कि राज्याभिषेक केवल अतीत की गौरव गाथा बनकर न रह जाए।' यदि हम वास्तव में इस दिवस का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें शिवाजी महाराज के आदर्शों को अपने जीवन और समाज में उतारना होगा। स्वराज्य का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और आत्मअनुशासन भी है। जिस राष्ट्र के नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होते हैं, वही राष्ट्र सशक्त और समृद्ध बनता है।

 

श्री छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसने पराधीनता के अंधकार में आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित किया। यह घटना हमें स्मरण कराती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि नेतृत्व में दूरदृष्टि, समाज में एकता और लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा हो, तो इतिहास की दिशा बदली जा सकती है।

 

आज, राज्याभिषेक दिवस पर हम केवल एक महान राजा को स्मरण नहीं करते, बल्कि उस विचार को नमन करते हैं जिसने भारत को स्वराज्य का मंत्र दिया। रायगढ़ की वह ऐतिहासिक गूंज आज भी हमें पुकारती है कि राष्ट्र निर्माण का कार्य कभी समाप्त नहीं होता। प्रत्येक पीढ़ी को अपने समय में स्वराज्य के मूल्यों की रक्षा करनी होती है।

 

वास्तव में, 6 जून 1674 का राज्याभिषेक केवल शिवाजी महाराज के मस्तक पर मुकुट धारण करने का क्षण नहीं था, वह भारत के स्वाभिमान, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का महोत्सव था। यही कारण है कि 'तीन शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह दिवस भारतीय जनमानस में प्रेरणा, गौरव और राष्ट्रभक्ति का अमिट प्रतीक बना हुआ है।'ALSO READ: छत्रपति शिवाजी महाराज की कितनी पत्नियां थीं?

 

May 2026: इन गुमनाम नायकों को आपने दी पहचान

  1. The Better India की कहानी का असर महिला के गोबर पेंट बिज़नेस को मिले विदेशों से भी ऑर्डर!

    ओडिशा की दुर्गा प्रियदर्शिनी ने साल 2022 में गोबर से पेंट बनाने की शुरुआत की थी। उनका मकसद सिर्फ़ एक बिजनेस खड़ा करना नहीं, बल्कि किसानों और गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाना भी था।जब The Better India ने उनकी कहानी प्रकाशित की, तो यह पहल देशभर के लोगों तक पहुंची। इसके बाद उन्हें न सिर्फ़ भारत के अलग-अलग राज्यों से कॉल और ऑर्डर मिलने लगे, बल्कि विदेशों से भी पूछताछ आने लगी।
    हमारी कहानी ने दुर्गा को सिर्फ़ पहचान ही नहीं दिलाई, बल्कि उनके काम को नई रफ्तार भी दी।यही तो है अच्छी कहानियों की ताकत—जो सिर्फ़ प्रेरित नहीं करतीं, बल्कि बदलाव को आगे बढ़ाने में भी मदद करती हैं।

 

2. आपके प्यार ने 80 वर्षीय नीरू बा की आइसक्रीम को नई पहचान दी

 

हमने अहमदाबाद की 80 वर्षीय नीरू बा की कहानी साझा की थी, जो अपने हाथों से नेचुरल आइसक्रीम बनाती हैं।

उनकी इस प्रेरणादायक कहानी को दर्शकों से ढेर सारा प्यार मिला ❤️
वीडियो के जरिए न सिर्फ उनके जज़्बे को सराहा गया, बल्कि उन्हें 50 से 80 नए ग्राहक भी मिले। रुत्विक देसाई के अनुसार, इस वीडियो के बाद उन्हें भारत के अलग-अलग शहरों से भी कॉल्स आने लगे।

https://www.instagram.com/reels/DYMzba6KRRr/

 नीरू बा का आभार संदेश भी आया है, जिसमें उन्होंने सभी दर्शकों का दिल से धन्यवाद किया है। 🙏यह सिर्फ एक वीडियो नहीं था, यह एक छोटे से प्रयास से किसी की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव लाने की कहानी बन गई। देखिए कैसे नीरू बा ने अपने सभी दर्शकों और सपोर्टर्स को धन्यवाद कहा है ❤️

 

The Better India की कहानी का असर- महिला के गोबर पेंट बिज़नेस को मिले विदेशों से भी ऑर्डर | Impact

ओडिशा की दुर्गा प्रियदर्शिनी ने साल 2022 में गोबर से पेंट बनाने की शुरुआत की थी। उनका मकसद सिर्फ़ एक बिजनेस खड़ा करना नहीं, बल्कि किसानों और गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाना भी था।
जब The Better India ने उनकी कहानी प्रकाशित की, तो यह पहल देशभर के लोगों तक पहुंची। इसके बाद उन्हें न सिर्फ़ भारत के अलग-अलग राज्यों से कॉल और ऑर्डर मिलने लगे, बल्कि विदेशों से भी पूछताछ आने लगी।
हमारी कहानी ने दुर्गा को सिर्फ़ पहचान ही नहीं दिलाई, बल्कि उनके काम को नई रफ्तार भी दी।
यही तो है अच्छी कहानियों की ताकत—जो सिर्फ़ प्रेरित नहीं करतीं, बल्कि बदलाव को आगे बढ़ाने में भी मदद करती हैं।#thebetterindia #goodnews #positivestories #indianews #thebetterindiahindi #hindi

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31 मई 1893 भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा

Pictured is Swami Vivekananda, a young sanyasi from India, in saffron attire

 

 


भारत के इतिहास में कुछ तिथियां केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में अमिट स्मृति बन जाती हैं। 31 मई 1893 ऐसी ही एक तिथि है। यह वह दिन था जब भारतभूमि का एक युवा संन्यासी, साधारण गेरुआ वेशभूषा में, सीमित संसाधनों के साथ, परंतु असीम आत्मविश्वास और अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए, भारतभूमि से विश्व मंच की ओर प्रस्थान कर रहा था। वह कोई राजा नहीं था, न किसी साम्राज्य का दूत और न ही किसी राजनीतिक शक्ति का प्रतिनिधि। वह भारत की आत्मा का वाहक था। वह थे 'स्वामी विवेकानंद।'

 

उस समय भारत अंग्रेज़ी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। चारों ओर निराशा, हीनभावना और सांस्कृतिक असुरक्षा का वातावरण था। पश्चिमी सभ्यता की चमक के सामने भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने लगा था। भारत की आध्यात्मिक धरोहर, उसके वेद, उपनिषद, दर्शन और सनातन संस्कृति को पिछड़ेपन का प्रतीक बताने का प्रयास किया जा रहा था। ऐसे कठिन समय में एक युवा संन्यासी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ यह घोषणा की कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि विश्व को दिशा देने वाली आध्यात्मिक चेतना है।

 

अमेरिका के शिकागों नगर में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण उनके लिए केवल एक अवसर नहीं था, बल्कि भारत की प्रतिष्ठा का प्रश्न था।'किंतु यह यात्रा किसी भी दृष्टि से सरल नहीं थी।' उनके पास पर्याप्त धन नहीं ओर न ही कोई बड़ा संगठन उनके साथ, यात्रा की व्यवस्थाएं अनिश्चित थीं। समुद्री यात्रा लंबी और कठिन थी। फिर भी उनके भीतर एक अदृश्य शक्ति कार्य कर रही थी, अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की प्रेरणा और भारतमाता की पुकार। 

 

'31 मई 1893' की वह सुबह भारतीय इतिहास की सबसे भावनात्मक सुबहों में से एक कही जा सकती है। जब स्वामी विवेकानंद ने भारत से प्रस्थान किया, तब उनके मन में केवल एक संकल्प था—विश्व को भारत की आत्मा से परिचित कराना। कहा जाता है कि उस समय उनकी आंखों में करुणा भी थी और तेज भी।

वे जानते थे कि वे किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए नहीं जा रहे, बल्कि करोड़ों भारतीयों की मौन आकांक्षाओं को अपने साथ लेकर चल रहे हैं। बंदरगाह पर खड़े लोग शायद यह सोच भी नहीं सकते थे कि यह साधारण-सा दिखने वाला संन्यासी आने वाले समय में भारत के गौरव को विश्व के शिखर तक पहुंचा देगा। 

 

उस क्षण भारत की सांस्कृतिक चेतना समुद्र के रास्ते विश्व की ओर यात्रा कर रही थी। यह केवल शरीर की यात्रा नहीं थी, यह भारतीय आत्मविश्वास की यात्रा थी। यह उस सभ्यता का प्रस्थान था जिसने हजारों वर्षों से विश्व को सहिष्णुता, मानवता और आध्यात्मिकता का संदेश दिया था। स्वामीजी के पास धन की कमी थी, पर विचारों की समृद्धि अपार थी। उनके पास भौतिक साधन सीमित थे, पर आत्मबल असीम था।

 

स्वामी विवेकानंद की विदेश यात्रा जाने की योजना में उनके शिष्यों तथा अनेक शुभचिंतकों ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। विशेष रूप से चेन्नई के भक्तों और राजस्थान के खेतड़ी राज्य के राजा अजीत सिंह जी जो कि स्वामी जी के परम भक्त और समर्थक थे, ने आर्थिक सहायता की।

स्वामी विवेकानंद ने मुंबई से अपनी ऐतिहासिक समुद्री यात्रा प्रारंभ की वे जापान, चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका पहुंचे किंतु विदेशी भूमि पर रहने और सम्मेलन तक पहुंचने के लिए वह एकत्रित किया गया धन पर्याप्त नहीं था। फिर भी उन्होंने कठिनाइयों को अपने मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। 

 

इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागों नगर में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेना था। वहां वे भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म और वेदांत दर्शन का प्रचार करना चाहते थे। यात्रा के दौरान वे पहले कनाडा के वेंकूवर पहुंचे। इसके बाद उन्होंने रेलमार्ग से यात्रा की और 30 जुलाई 1893 को शिकागों पहुंचे। बाद में विश्व धर्म सम्मेलन में दिए गए उनके प्रेरणादायक भाषण ने संपूर्ण विश्व को भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता से परिचित कराया।

 

उनके जीवन का यही सबसे बड़ा संदेश है कि जब उद्देश्य महान हो, तब अभाव भी व्यक्ति को रोक नहीं सकते। समुद्र के लंबे सफर के दौरान शायद अनेक बार उनके मन में भारत की छवि उभरती होगी, गरीब किसान, संघर्षरत युवा, दीन-हीन जनता और वह प्राचीन संस्कृति, जो अपनी असली पहचान के लिए व्याकुल थी।

वे जानते थे कि यदि विश्व भारत को सम्मान देगा, तो भारत स्वयं भी अपने प्रति सम्मान अनुभव करेगा। इसलिए उनकी यात्रा केवल शिकागो तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी, वह भारत को आत्मगौरव लौटाने की यात्रा थी।

 

शिकागो पहुंचने के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। सम्मेलन में भाग लेने के लिए आवश्यक औपचारिकताएं, परिचय-पत्रों का अभाव और आर्थिक संकट उनके सामने दीवार बनकर खड़े थे। कई दिनों तक उन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। (उन्हें कई दिनों तक भूखा भी रहना पड़ा) परंतु वे विचलित नहीं हुए। उनके भीतर यह अटूट विश्वास था कि वे सत्य व मानवता के संदेशवाहक हैं, और सत्य का मार्ग अंततः स्वयं बन जाता है।

 

वास्तव में, 31 मई 1893 को आरंभ हुई वह यात्रा केवल शिकागो तक नहीं अपितु वह करोड़ों भारतीयों के हृदय तक पहुंची। उसने गुलाम भारत में आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित किया, युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि भारत की संस्कृति विश्व को दिशा दे सकती है। यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के प्रेरणास्रोत बन गए।

आज जब भारत विश्व पटल पर अपनी नई पहचान बना रहा है,  तब 31 मई 1893 की वह यात्रा हमें पुनः स्मरण कराती है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मा में होती है। स्वामी विवेकानंदजी ने जिस भारत का स्वप्न देखा था, वह आत्मविश्वास, संस्कारित, सहिष्णु और मानवता के लिए समर्पित भारत था। इसलिए 31 मई केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के विश्व की ओर प्रस्थान का दिवस है। 

 

यह वह क्षण था जब एक युवा संन्यासी ने समुद्र पार करते हुए भारत के गौरव को विश्व के शिखर तक पहुंचाने का संकल्प लिया और उसे पूर्ण भी किया। आज भी जब हम स्वामी विवेकानंदजी को स्मरण करते हैं, तब उनके साथ वह ऐतिहासिक यात्रा भी हमारी स्मृतियों में जीवित हो उठती है, एक ऐसी यात्रा, जिसने भारत को स्वयं अपनी शक्ति का बोध कराया।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

10 things about Nautapa: नौतपा से जुड़ी 10 खास बातें

Picture giving information about the days of Nautapa

Summer Health Care: गर्मियों का सबसे तपता दौर यानी नौतपा भारतीय मौसम और लोकमान्यताओं में बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इन नौ दिनों में सूर्य की तपिश अपने चरम पर होती है, जिससे धरती खूब गर्म होती है और आगे चलकर मानसून मजबूत बनता है। ग्रामीण जीवन, खेती-किसानी और मौसम विज्ञान- तीनों में नौतपा का विशेष महत्व बताया गया है।ALSO READ: नौतपा की 'आग' उगलती गर्मी से कैसे बचें? ये 5 सावधानियां और 10 गोल्डन रूल्स बदल देंगे आपका समर गेम!

आइए जानते हैं नौतपा से जुड़ी 10 खास बातें, जो इसे सामान्य गर्मी से अलग बनाती हैं।

 

1. सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते ही नौतपा की शुरुआत मानी जाती है।

 

2. नौतपा के शुरुआती नौ दिन साल के सबसे गर्म दिनों में गिने जाते हैं।

 

3. इस दौरान सूरज की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं, जिससे गर्मी अधिक बढ़ जाती है।

 

4. खाली पेट धूप में निकलना नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए कुछ खाकर ही बाहर जाएं।

 

5. शरीर में ऊर्जा बनाए रखने के लिए समय-समय पर ग्लूकोज या इलेक्ट्रोलाइट्स लेते रहें।

 

6. मान्यता है कि नौतपा अच्छी तरह तपे तो मानसून में अच्छी बारिश होती है।

 

7. लू लगने के लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें या घरेलू उपाय अपनाएं।

 

8. एसी से सीधे तेज धूप में निकलने से बचें, इससे शरीर पर अचानक असर पड़ सकता है।

 

9. इन दिनों पेय पदार्थों और पानी की मात्रा सामान्य दिनों से ज्यादा रखें।

 

10. जिन लोगों को गर्मी अधिक परेशान करती है, वे हाथ-पैरों और सिर पर मेहंदी लगाकर शरीर को ठंडक दे सकते हैं।

 

नौतपा की तेज गर्मी में थोड़ी सी सावधानी आपको लू, डिहाइड्रेशन और थकावट जैसी समस्याओं से बचा सकती है। सही खानपान, पर्याप्त पानी और धूप से बचाव के उपाय अपनाकर आप इस मौसम में आसानी से सेहत संबंधी परेशानियों से बच सकते हैं।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Nautapa 2026: 25 मई से नौतपा: भीषण गर्मी के दिन, जानें महत्व, पर्यावरण और सेहत पर प्रभाव

 

मुकेश अंबानी का बड़ा ऐलान, डेटा की तरह सस्ती होगी AI, Jio जोड़ेगा भारत को ‘इंटेलिजेंस एरा’ से

Mukesh Ambani's big announcement regarding Jio AI

– 7 साल में करेंगे 10 लाख करोड़ रुपए निवेश, जामनगर में गीगावॉट-स्केल AI इंफ्रा

– अंबानी ने कहा- AI, प्रधानमंत्री के विकसित भारत के विज़न को नई गति देगा

– शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि के लिए AI प्लेटफॉर्म लॉन्च

Mukesh Ambani's big announcement : उद्योगपति मुकेश अंबानी ने इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में ऐलान किया कि जिस तरह जियो ने देश में डेटा सस्ता किया, उसी तरह अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भी आम भारतीय तक किफायती दरों पर पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि 'भारत इंटेलिजेंस किराए पर नहीं ले सकता' और जियो देश को इंटरनेट युग के बाद अब 'इंटेलिजेंस एरा' से जोड़ेगा।

 

इस दिशा में जियो और रिलायंस इंड्स्ट्रीज अगले सात वर्षों में 10 लाख करोड़ रुपए का निवेश करेंगे। अंबानी ने कहा कि यह निवेश भारत में मजबूत AI ढांचा खड़ा करने और आने वाले दशकों के लिए आर्थिक मजबूती सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया जाएगा।

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कंपनी जामनगर में चरणबद्ध तरीके से मल्टी-गीगावॉट AI-रेडी डेटा सेंटर पार्क विकसित कर रही है। 2026 के अंत तक 120 मेगावॉट क्षमता शुरू करने का लक्ष्य है, जिसे आगे गीगावॉट स्तर तक बढ़ाया जाएगा। यह पूरा ढांचा ग्रीन एनर्जी पर आधारित होगा। साथ ही जियो अपने नेटवर्क के जरिए देशभर में ऐसी कंप्यूट क्षमता उपलब्ध कराएगा, जिससे AI सेवाएं कम लागत और तेज़ गति से लोगों, दुकानों, स्कूलों, अस्पतालों और खेतों तक पहुंच सकें।

 

अंबानी ने जोर देकर कहा कि जियो AI भारतीय भाषाओं में काम करेगा, ताकि किसान, युवा, छात्र और छोटे व्यवसायी अपनी भाषा में इसका लाभ उठा सकें। इसी क्रम में शिक्षा के लिए जियो शिक्षा AI, स्वास्थ्य के लिए जियो आरोग्य AI, कृषि के लिए जियो कृषि और आम उपयोग के लिए जियो भारत IQ जैसे प्लेटफॉर्म पेश किए गए, जो स्थानीय भाषाओं में AI आधारित सहायता उपलब्ध कराएंगे।

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मुकेश अंबानी ने विश्वास जताया कि भारत 21वीं सदी में अग्रणी AI शक्ति बन सकता है, बशर्ते तकनीक सुलभ, किफायती और देश की जरूरतों के अनुरूप विकसित की जाए। जियो की इन घोषणाओं से संकेत मिलता है कि कनेक्टिविटी के बाद अब कंपनी AI को अगला राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

 

AI से पैदा होने वाली चिंताओं पर अंबानी ने कहा कि एआई वह मंत्र है जो हर यंत्र को तेज, बेहतर और स्मार्ट तरीके से काम करने की शक्ति देता है। मैं एआई को आधुनिक अक्षय पात्र के रूप में देखता हूं, जो अंतहीन पोषण प्रदान कर सकता है। AI नौकरियां नहीं छीनेगा, बल्कि यह उच्च-कौशल वाले कार्यों में नए अवसर पैदा करेगा।

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अपने संबोधन की शुरुआत में अंबानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न की सराहना करते हुए कहा कि AI आधारित विकास की यह पहल भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को नई गति देगी। उन्होंने कहा कि यह पहल न केवल भारत, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भी एक प्रेरक मॉडल बन सकती है।
Edited By : Chetan Gour