किराए के मकान के साथ चल रहा है होम लोन? ITR दाखिल करते समय ऐसे उठाएं डबल टैक्स छूट का फायदा, बचेंगे लाखों

HRA and Home Loan Tax Benefit: नया घर खरीदने के बाद भी किराए के मकान में रहने वाले या नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर में रहने वाले नौकरीपेशा टैक्सपेयर्स के मन में अक्सर एक सवाल उठता है। ‘क्या मैं एक साथ हाउस रेंट अलाउंस (HRA) और होम लोन दोनों पर टैक्स छूट का दावा कर सकता हूं?’

एक व्यक्ति ने एक्सपर्ट से सवाल किया कि, ‘मैंने एक अंडर-कंस्ट्रक्शन फ्लैट के लिए होम लोन लिया था, जिसका पजेशन मुझे अगस्त 2025 में मिला। मैंने तुरंत इस फ्लैट को किराए पर दे दिया और खुद एक दूसरे किराए के फ्लैट में रह रहा हूं। क्या मैं फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए आईटीआर फाइल करते समय पूरे साल के लिए HRA और होम लोन दोनों पर टैक्स लाभ का दावा कर सकता हूं?’

आइए टॉप फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के हवाले से समझते हैं कि इनकम टैक्स एक्ट इस बारे में क्या कहता है और इसका पूरा नियम क्या है।

1. क्या एक साथ मिल सकती है HRA और होम लोन पर छूट?

जी हां, बिल्कुल! इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के तहत एक ही समय में HRA और होम लोन दोनों पर टैक्स बेनिफिट क्लेम करने पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं है। बशर्ते आप इन दोनों क्लेम से जुड़ी बुनियादी शर्तों को पूरा करते हों:

HRA के लिए शर्त: इनकम टैक्स की धारा 10(13A) के तहत आपको अपनी कंपनी से HRA मिलता हो, आप वास्तव में उस घर का किराया चुका रहे हों जिसमें आप रह रहे हैं, और वह घर आपके खुद के नाम पर नहीं होना चाहिए।

होम लोन के लिए शर्त: जिस वित्तीय वर्ष में आपको प्रॉपर्टी का पजेशन मिलता है, आप उस पूरे साल के लिए होम लोन के टैक्स बेनिफिट का दावा करने के हकदार हो जाते हैं।

2. पुरानी टैक्स व्यवस्था में मिलेगा अधिकतम फायदा

ध्यान रखें कि HRA और होम लोन के मूलधन पर मिलने वाली टैक्स छूट पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि आपने कौन सा टैक्स व्यवस्था चुना है। धारा 10(13A) के तहत HRA पर छूट और धारा 80C के तहत होम लोन के मूलधन पुनर्भुगतान पर ₹1.50 लाख तक की छूट केवल पुरानी टैक्स व्यवस्था में ही मिलती है। अगर आप नई टैक्स व्यवस्था चुनते हैं, तो ये दोनों छूट खत्म हो जाएंगी।

3. होम लोन के ब्याज पर टैक्स छूट का नियम

लोन के ब्याज पर मिलने वाली टैक्स छूट का गणित इस बात पर निर्भर करता है कि घर से आपको क्या कमाई हो रही है और आपने कौन सा टैक्स रिजीम चुना है। टैक्स व्यवस्था होम लोन के ब्याज (Section 24b) पर मिलने वाली छूट के नियम:

पुरानी टैक्स व्यवस्था- आप साल भर में चुकाए गए पूरे ब्याज को मकान से मिले किराए के एवज में क्लेम कर सकते हैं। इसके अलावा, हाउस प्रॉपर्टी हेड के तहत होने वाले ₹2 लाख तक के नुकसान को अपनी अन्य आय के साथ एडजस्ट कर सकते हैं। अगर नुकसान ₹2 लाख से ज्यादा है, तो उसे अगले 8 सालों तक आगे ले जाया जा सकता है।

नई टैक्स व्यवस्था- नई टैक्स व्यवस्था में होम लोन के ब्याज पर मिलने वाली कटौती केवल आपके द्वारा कमाए गए टैक्स योग्य किराए की रकम तक ही सीमित रहेगी। इसमें हाउस प्रॉपर्टी के नुकसान को किसी अन्य आय के साथ सेट-ऑफ करने या भविष्य के लिए कैरी फॉरवर्ड करने की अनुमति नहीं है।

4. प्री-कंस्ट्रक्शन इंटरेस्ट का अतिरिक्त लाभ

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पजेशन मिलने वाले साल में टैक्सपेयर्स के लिए एक और बड़ा फायदा होता है। आप पजेशन वाले पूरे साल के होम लोन ब्याज का दावा तो कर ही सकते हैं। इसके साथ ही, घर का पजेशन मिलने से पहले की अवधि के दौरान आपने जो भी कुल ब्याज चुकाया था, उसका 1/5 हिस्सा भी हर साल क्लेम कर सकते हैं।

कुल मिलाकर आपकी प्रॉपर्टी किराए पर उठाई गई है और आप खुद किसी अन्य मकान में किराया देकर रह रहे हैं, तो आप नियमों का पालन करते हुए एक ही साल में HRA और होम लोन (ब्याज + मूलधन) दोनों पर डबल टैक्स ब्रेक का फायदा उठा सकते हैं। बेहतर लाभ के लिए अपनी वित्तीय स्थिति के अनुसार सही टैक्स रिजीम का चुनाव करें।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Income Tax Return: अगर ITR फाइल करने में की ये गलती तो 200% तक पेनाल्टी के साथ जेल भी हो सकती है!

ITR Update: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का सीजन आते ही कई टैक्स पेयर्स अपनी टैक्स देनदारी को कम करने के जुगाड़ में लग जाते हैं। कई बार लोग बिना उचित डॉक्युमेंट्स के या फिर फर्जी बिल और रसीदें लगाकर टैक्स छूट का दावा कर देते हैं। शॉर्ट टर्म में यह तरीका भले ही टैक्स बचाने का आसान रास्ता लगे लेकिन इनकम टैक्स एक्ट के तहत इसके बेहद गंभीर और कानूनी परिणाम हो सकते हैं।

मनी कंट्रोल पर्सनल फाइनेंस सेगमेंट में आषुष मिश्रा की रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि टैक्स चोरी या गलत वेरिफिकेशन के मामलों में करदाताओं पर भारी-भरकम जुर्माने से लेकर आपराधिक मुकदमा और जेल की सजा तक हो सकती है। आइए जानते हैं कि आईटीआर दाखिल करते समय की गई कौन सी गलतियां आपको बड़ी मुसीबत में डाल सकती हैं।

क्या है धारा 270A और कब लगती है भारी पेनाल्टी?

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 270A असेसिंग ऑफिसर (AO), कमिश्नर (अपील), प्रिंसिपल कमिश्नर या कमिश्नर को यह अधिकार देती है कि अगर कोई टैक्स पेयर अपनी इनकम को कम दिखाता है या गलत जानकारी देता है तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है। डिफॉल्ट की गंभीरता के आधार पर यह पेनाल्टी कम दिखाई गई आय पर देय टैक्स के 50 प्रतिशत से लेकर 200 प्रतिशत तक हो सकती है।

इनकम को कम दिखाना क्या है?

1- धारा 270A के तहत नीचे दी गई परिस्थितियों में यह माना जाता है कि टैक्स पेयर ने अपनी इनकम कम दिखाई है:

  • जब आय का कोई हिस्सा बही-खातों या इनकम टैक्स रिटर्न में घोषित न किया गया हो।
  • आयकर विभाग द्वारा आकलित की गई आय फाइल किए गए ITR में दिखाई गई आय से अधिक हो।
  • कोई टैक्स रिटर्न दाखिल ही न किया गया हो, विभाग द्वारा निर्धारित की गई आय मूल छूट सीमा से अधिक हो।
  • सामान्य प्रावधानों के तहत आकलित की गई आय, धारा 115JB या 115JC के विशेष प्रावधानों के तहत गणना की गई आय से अधिक हो।

2- इनकम को गलत तरीके से पेश करना क्या है?

यह बेहद गंभीर मामला है जिसमें जानबूझकर गलत या भ्रामक जानकारी दी जाती है। धारा 270A के तहत इसे मिसरिपोर्टिंग माना जाता है:

  • तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना या उन्हें छिपाना।
  • बही-खातों में निवेश को दर्ज न करना।
  • बिना किसी पुख्ता सबूत या सहायक दस्तावेजों के खर्चों का दावा करना।
  • बही-खातों में झूठी या फर्जी एंट्रियां दर्ज करना।
  • खातों में प्राप्तियों को दर्ज करने में विफल रहना।
  • किसी अंतरराष्ट्रीय लेनदेन या ऐसे ही किसी माने गए लेनदेन को रिपोर्ट न करना।

फर्जी दस्तावेज दिखाए तो हो सकती है जेल

टैक्स विशेषज्ञों के मुताबिक अगर टैक्स बचाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया जाता है तो यह सिर्फ टैक्स विवाद नहीं रह जाता बल्कि इनकम टैक्स एक्ट के तहत एक आपराधिक अपराध बन जाता है। इसके लिए नीचे दी गई धाराएं लगाई जाती हैं-

धारा 276C (जानबूझकर टैक्स चोरी का प्रयास): अगर टैक्स चोरी की रकम 25 लाख रुपये से अधिक है तो दोषी पाए जाने पर 6 महीने से लेकर 7 साल तक की सश्रम जेल और जुर्माना हो सकता है। अगर यह राशि 25 लाख रुपये से कम है तो जेल की अवधि 3 महीने से 2 साल तक और साथ में जुर्माना हो सकता है।

धारा 277 (सत्यापन में झूठे बयान): यह धारा तब लागू होती है जब कोई करदाता जानबूझकर झूठे दस्तावेजों को सत्यापित करता है या जमा करता है। टैक्स चोरी के प्रयास की राशि के आधार पर इसमें 3 महीने से लेकर 7 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

धारा 278 (उकसाना या बढ़ावा देना): इसके तहत केवल टैक्स भरने वाला ही नहीं बल्कि अपराध को बढ़ावा देने या सुविधाजनक बनाने वाला कोई भी व्यक्ति (जैसे कन्सल्टेंट, एजेंट, या फर्जी डोनेशन/किराया रसीद जारी करने वाली संस्था) भी कानूनी कार्रवाई और सजा का भागीदार बनेगा।

अन्य कानूनी शिकंजे और री-असेसमेंट का खतरा

अगर जालसाजी के लिए नकली स्टांप, फर्जी सील या जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया है तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराएं भी लागू हो सकती हैं। इसके अलावा अगर बड़े पैमाने पर संगठित रूप से धारा 80G के तहत फर्जी डोनेशन रसीदें जारी करने या बड़े कैश ट्रेल का मामला सामने आता है तो प्रवर्तन एजेंसियां प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत भी कार्रवाई कर सकती हैं। अगर किसी एक वित्त वर्ष में आपके दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं तो आयकर विभाग पिछले वर्षों के मामलों को भी दोबारा खोल सकता है ताकि यह जांचा जा सके कि क्या अतीत में भी ऐसे फर्जी दावे किए गए थे।

एक्सपर्ट की राय: विभाग के पास है आपका पूरा डेटा

एचजे अग्रवाल एंड कंपनी (चार्टर्ड अकाउंटेंट्स) के पार्टनर हर्षित अग्रवाल के मुताबिक, वर्तमान में आयकर विभाग के पास एक दशक पहले की तुलना में वित्तीय जानकारी के कहीं अधिक व्यापक स्रोत हैं। वह कहते हैं कि विभाग एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) जैसे सिस्टम के जरिए आपकी सैलरी, बैंकिंग, इंश्योरेंस, म्यूचुअल फंड और अन्य वित्तीय डेटा को आसानी से क्रॉस-वेरिफाई कर सकता है। ऐसे में गलत या फर्जी डिडक्शन के दावों को पकड़ना अब बेहद आसान हो चुका है।

हर्षित अग्रवाल ने सलाह दी कि वित्तीय जुर्माने से कहीं अधिक दर्दनाक और लंबी चलने वाली आपराधिक प्रक्रियाएं होती हैं जो सालों ले सकती हैं और अत्यधिक मानसिक तनाव व कानूनी खर्च का कारण बनती हैं। ऐसे में अगक किसी करदाता को यह अहसास होता है कि उसने कोई गलत दावा कर दिया है तो विभाग द्वारा पकड़े जाने का इंतजार करने के बजाय खुद से आगे आकर रिवाइज्ड (संशोधित) या अपडेटेड रिटर्न दाखिल कर उसे सुधार लेना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

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ITR 2026: सैलरी स्लैब के हिसाब से न्यू टैक्स रिजीम में सीधे बचा सकते हैं करीब 1.5 लाख रुपये का टैक्स! ये रहा पूरा कैलकुलेशन

Income Tax Return 2026: हर साल जब इनकम टैक्स रिटर्न यानी ITR फाइल करने का सीजन शुरू होता है तो टैक्स पेयर्स के सामने सबसे पहला और बड़ा सवाल यही होता है कि ओल्ड टैक्स रिजीम को चुनें या न्यू टैक्स रिजीम के साथ जाएं। हर कोई अपने हिसाब से टैक्स की देनदारी को कैलकुलेट कर रहा हैं। लेकिन कुछ थंब रूल ऐसे सामने आए हैं जो टैक्स की देनदारी का मामला काफी हद तक साफ कर दे रहे हैं। पर इंडिविजुअल टैक्स पेयर्स को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सैलरी पर्सन टू पर्सन वैरी करती है और कोई एक रूल आपकी टैक्स देनदारी का पूरा असल खाका नहीं खींच सकता।

इसके लिए आपको एक्सपर्ट अडवाइस की हमेशा जरूरत पड़ती है। एक बात और ध्यान देने वाली है कि अब न्यू टैक्स रिजीम डिफॉल्ट विकल्प है। यानी अगर आप आईटीआर फाइल करते समय कोई विकल्प नहीं चुनते हैं तो आपका रिटर्न अपने आप न्यू टैक्स रिजीम के तहत प्रोसेस किया जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक्टिव रूप से ओल्ड टैक्स रिजीम को चुनना अब भी फायदेमंद है? इसके पीछे के गणित को समझने की कोशिश करते हैं।

क्या कहता है टैक्स का गणित?

ग्रांट थॉर्नटन भारत (Grant Thornton Bharat) द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए की गई एक तुलनात्मक गणना के मुताबिक न्यू टैक्स रिजीम कई सैलरी स्लैब में भारी बचत दे रही है। इस कैलकुलेशन में 60 वर्ष से कम उम्र के एक ऐसे सैलरडी पर्सन को आधार बनाया गया है जो ओल्ड रिजीम के तहत कुल 4.25 लाख रुपये के डिडक्शन (छूट) का दावा करता है। इसमें नीचे दिए गए डिडक्शन शामिल हैं:-

धारा 80C के तहत: 150000 रुपये (1961 के अधिनियम की धारा 80C / 2025 के अधिनियम की धारा 123)

धारा 80D के तहत: 25000 रुपये (1961 के अधिनियम की धारा 80D / 2025 के अधिनियम की धारा 126)

HRA (हाउस रेंट अलाउंस): 200000 रुपये

स्टैंडर्ड डिडक्शन (Standard Deduction): 50000 रुपये

इसके मुकाबले न्यू टैक्स रिजीम में केवल 75000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन शामिल किया गया है। इस गणना में लागू सरचार्ज और 4% हेल्थ एंड एजुकेशन सेस को भी जोड़ा गया है।

विभिन्न सैलरी लेवल पर टैक्स लायबिलिटी

25 लाख रुपये की सैलरी पर: ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत 452400 रुपये का टैक्स बनता है जबकि न्यू टैक्स रिजीम में यह बिल सिर्फ 319800 रुपये आता है। यानी न्यू टैक्स रिजीम चुनने पर सीधे 132600 रुपये की बचत होती है।

50 लाख रुपये की सैलरी पर: यहां भी दोनों रिजीम के टैक्स का अंतर 132600 रुपये ही रहता है और न्यू टैक्स रिजीम जीतती है।

75 लाख और 1 करोड़ रुपये की सैलरी पर: इस लेवल पर 10 फीसदी का सरचार्ज भी लागू हो जाता है। इसके बावजूद न्यू टैक्स रिजीम में टैक्सपेयर्स को करीब 1.46 लाख रुपये की सीधी बचत मिलती है।

तो क्या ओल्ड टैक्स रिजीम पूरी तरह खत्म हो चुकी है?

ऐसा सभी टैक्स पेयर्स के केस में नहीं कहा जा सकता। ओल्ड टैक्स रिजीम न्यू टैक्स रिजीम को केवल तभी टक्कर दे पाती है जब आपके डिडक्शंस (कटौतियां) इस सामान्य बास्केट से काफी ज्यादा हों। अगर आपके पास बड़े डिडक्शंस हैं जैसे:-

  • धारा 24(b) के तहत होम लोन के ब्याज पर 2 लाख रुपये तक की छूट।
  • मेट्रो शहरों में रहने के कारण मिलने वाला ज्यादा HRA
  • धारा 80CCD(1B) के तहत NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) में योगदान।
  • सीनियर सिटीजन माता-पिता के लिए चुकाया गया बड़ा 80D हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम।

अदर आप इन सभी को मिला देते हैं और आपका कुल डिडक्शन ब्रेक-ईवन थ्रेशोल्ड को पार कर जाता है तो ओल्ड रिजीम बेहतर हो सकती है। मौजूदा स्लैब के तहत अधिकांश इनकम लेवल के लिए यह ब्रेक-ईवन पॉइंट करीब 8 लाख रुपये के कुल डिडक्शन पर बैठता है। यानी भारी होम लोन और फुल HRA क्लेम करने वाला व्यक्ति इस लिमिट तक पहुंच सकता है लेकिन जो व्यक्ति सिर्फ 80C और एक सामान्य हेल्थ पॉलिसी के भरोसे है वह न्यू रिजीम का मुकाबला नहीं कर पाएगा।

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ग्रांट थॉर्नटन भारत की टैक्स पार्टनर ऋचा साहनी का कहना है कि पुराने और नए टैक्स रिजीम के बीच चयन कोई ऐसा फैसला नहीं है जो हर किसी पर फिट बैठे। हालांकि न्यू रिजीम कम टैक्स रेट्स और अधिक सरलता की पेशकश करती है लेकिन ओल्ड रिजीम उन खास कैटेगरी के टैक्सपेयर्स के लिए बेहतर परिणाम दे सकती है जो बड़े पैमाने पर डिडक्शंस और एग्जेंप्शन (छूट) का लाभ उठाते हैं। इसलिए टैक्सपेयर्स को केवल हेडलाइन टैक्स रेट्स पर भरोसा करने के बजाय अपना फैसला लेने से पहले एक पर्सनलाइज्ड टैक्स कैलकुलेशन जरूर करनी चाहिए।

सालाना रिजीम बदलने की फ्लेक्सिबिलिटी

सैलरीड करदाताओं के लिए एक अच्छी बात यह है कि वे किसी एक रिजीम में लॉक नहीं होते हैं। ऋचा साहनी के मुताबिक, सैलरीड टैक्सपेयर्स के पास हर साल दोनों रिजीम के बीच चयन करने की फ्लेक्सिबिलिटी होती है। वे अपनी इनकम प्रोफाइल, डिडक्शंस और एग्जेंप्शंस के आधार पर सालाना अपनी स्थिति का मूल्यांकन कर सकते हैं और जो अधिक फायदेमंद हो, उसे चुन सकते हैं।

इस सालाना बदलाव का व्यावहारिक महत्व भी है। आपके एम्प्लॉयर (कंपनी) ने TDS काटने के लिए किस रिजीम का इस्तेमाल किया था उससे आपका आईटीआर बाउंड नहीं होता है। अगर कंपनी ने न्यू टैक्स रिजीम के हिसाब से टीडीएस काटा है लेकिन कैलकुलेशन के बाद आपके लिए ओल्ड रिजीम ज्यादा फायदेमंद निकलती है तो आप आईटीआर फाइल करते समय ओल्ड रिजीम चुन सकते हैं और बची हुई रकम को रिफंड के रूप में क्लेम कर सकते हैं।

बिजनेस या प्रोफेशनल इनकम वाले टैक्सपेयर्स को ओल्ड रिजीम में वापस जाने का केवल एक ही मौका (Form 10-IEA के जरिए) मिलता है, इसलिए उन्हें अपना विकल्प चुनते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

फाइल करने से पहले क्या करें?

रिटर्न दाखिल करने से पहले इनकम टैक्स पोर्टल पर मौजूद कैलकुलेटर का इस्तेमाल करें, जिसमें मुश्किल से 10 मिनट का समय लगता है। थंब रूल यह है कि अगर आपके डिडक्शंस कम हैं तो बिना किसी उलझन के न्यू टैक्स रिजीम चुनें और यदि डिडक्शंस ज्यादा हैं तो दोनों रिजीम में टैक्स कैलकुलेट करके तुलना कर लें। चूंकि ये दोनों रिजीम आने वाले भविष्य में एक साथ रहेंगी, इसलिए यह कोई वन-टाइम फैसला नहीं है बल्कि इसे अपनी सालाना आदत बना लें।

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ITR Filing 2026: 1.7 करोड़ लोगों ने भरा इनकम टैक्स रिटर्न, 31 जुलाई की डेडलाइन चूके तो क्या होगा?

ITR Filing 2026: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने की रफ्तार तेज हो गई है। आयकर विभाग के मुताबिक, असेसमेंट ईयर 2026-27 (वित्त वर्ष 2025-26 की आय) के लिए अब तक 1.7 करोड़ से ज्यादा टैक्सपेयर्स अपना ITR दाखिल कर चुके हैं। सिर्फ शुक्रवार को ही 10 लाख से ज्यादा रिटर्न फाइल किए गए।

विभाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लोगों से समय रहते रिटर्न भरने की अपील भी की है, ताकि आखिरी समय की परेशानी से बचा जा सके।

ITR डेडलाइन 31 जुलाई है

वित्त वर्ष 2025-26 की आय के लिए ITR-1 (सहज) और ITR-2 दाखिल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई 2026 है। अगर आपका अकाउंट ऑडिट के दायरे में नहीं आता है, तो आपको इसी तारीख तक रिटर्न फाइल करना होगा।

ITR-1 कौन भर सकता है?

ITR-1 यानी सहज फॉर्म ज्यादातर इंडिविजुअल के लिए होता है। इनमें ये लोग शामिल हैं…

  • सालाना कमाई ₹50 लाख तक हो।
  • कमाई आय का जरिया सैलरी हो।
  • एक मकान से आय हो।
  • कृषि आय ₹5,000 तक हो।

ITR-2 कौन भरता है?

ITR-2 उन इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स और हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के लिए है, जिनकी बिजनेस या प्रोफेशन से आय नहीं है, लेकिन उन्हें कैपिटल गेन जैसी आय होती है।

31 जुलाई की डेडलाइन चूकने पर क्या होगा?

अगर आप तय समय तक ITR दाखिल नहीं करते हैं, तो आपको कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

1. लेट फीस : आयकर कानून की धारा 234F के तहत देरी से ITR भरने पर ₹5,000 तक की लेट फीस लग सकती है। अगर आपकी कुल आय ₹5 लाख तक है, तो यह फीस ₹1,000 तक सीमित रहती है।

2. ब्याज भी : अगर आपके ऊपर टैक्स बकाया है, तो धारा 234A के तहत हर महीने या उसके हिस्से के लिए 1% ब्याज देना पड़ सकता है।

3. रिफंड में देरी : अगर आपको इनकम टैक्स रिफंड मिलना है, तो देर से ITR भरने पर उसका प्रोसेस भी देर से होगा। यानी आपका पैसा मिलने में ज्यादा समय लग सकता है।

4. टैक्स बेनिफिट नहीं : देर से रिटर्न दाखिल करने पर कुछ मामलों में नुकसान (Loss) को अगले सालों में कैरी फॉरवर्ड करने जैसी टैक्स सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता।

आखिरी समय का इंतजार न करें

हर साल डेडलाइन के करीब पोर्टल पर ट्रैफिक काफी बढ़ जाता है। ऐसे में तकनीकी दिक्कतें भी आ सकती हैं। इसलिए बेहतर होगा कि जरूरी दस्तावेज जुटाकर समय रहते ITR दाखिल कर दें। इससे लेट फीस, ब्याज और दूसरी परेशानियों से बचा जा सकता है।

Income Tax Return: रिटर्न फाइल करने में नहीं करें देर, PhonePe और जियो फाइनेंस 24 रुपये में दे रही सुविधा

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।