2026 के साहित्य नोबेल का ऐलान आज:चीन की कैन श्वे सबसे आगे, भारत के अमिताव घोष भी दावेदार; सिर्फ 1 भारतीय के पास यह पुरस्कार

2026 के साहित्य नोबेल पुरस्कार का ऐलान आज किया जाएगा। स्वीडिश अकादमी भारतीय समय के मुताबिक शाम 4:30 बजे विजेता के नाम की घोषणा करेगी। ऐलान से पहले बुकमेकरों के अनुमान में चीन की प्रयोगधर्मी लेखिका कैन श्वे सबसे आगे चल रही हैं। भारत के लेखक अमिताव घोष का नाम भी संभावित विजेताओं में शामिल है। भारत से अब तक सिर्फ रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्हें 1913 में यह पुरस्कार दिया गया था। वह नोबेल जीतने वाले पहले एशियाई भी थे। नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। पुरस्कार राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर यानी करीब 11.5 करोड़ रुपए है। सपनों जैसी कहानियां लिखती हैं कैन श्वे चीन की 73 साल की लेखिका कैन श्वे इस बार साहित्य के नोबेल की सबसे मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं। उनका असली नाम डेंग शियाओहुआ है। कैन श्वे की कहानियां आम कहानियों से अलग होती हैं। इनमें सपने जैसे दृश्य होते हैं और कहानी से ज्यादा किरदारों के मन में चल रहे विचारों पर ध्यान दिया जाता है। उनके लेखन की तुलना मशहूर लेखकों फ्रांज काफ्का और जॉर्ज लुइस बोर्खेस से भी की गई है। उनकी चर्चित किताबों में ‘द लास्ट लवर’, ‘लव इन द न्यू मिलेनियम’ और ‘आई लिव इन द स्लम्स’ शामिल हैं। इंटरनेशनल बुकर की शॉर्टलिस्ट में पहुंचे थे अमिताव घोष भारत के लेखक अमिताव घोष की चर्चित किताब ‘सी ऑफ पॉपीज’ 2008 में इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार की शॉर्टलिस्ट में शामिल हुई थी। यह किताब उनके आइबिस ट्रिलॉजी का पहला हिस्सा है। घोष की किताबों में इतिहास, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे प्रमुखता से दिखाई देते हैं। उनकी एक और चर्चित किताब ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट’ जलवायु परिवर्तन और इंसानों पर उसके असर के बारे में है। दक्षिण एशियाई मूल के दूसरे चर्चित लेखकों में सलमान रुश्दी, माइकल ओंडाट्जे और मॉरीशस की भारतीय मूल की लेखिका आनंदा देवी शामिल हैं। जापान-ऑस्ट्रेलिया समेत 10 देशों के लेखक भी नोबेल की रेस में जापान के मशहूर लेखक हारुकी मुराकामी लंबे समय से साहित्य के नोबेल के संभावित विजेताओं में शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया के जेराल्ड मर्नेन और अमेरिका के थॉमस पिंचन भी प्रमुख नामों में हैं। इसके अलावा मेक्सिको की क्रिस्टीना रिवेरा गार्सा, स्पेन के एनरिक विला-मातास, पुर्तगाल की लिडिया जॉर्ज, रूस की ल्यूडमिला उलित्स्काया, कनाडा की मार्गरेट एटवुड और फ्रांस के मिशेल ह्वेलेबेक के नाम भी चर्चा में हैं। हालांकि, ये आधिकारिक दावेदारों की सूची नहीं है। स्वीडिश अकादमी संभावित विजेताओं की शॉर्टलिस्ट सार्वजनिक नहीं करती। पिछले 10 साल में 4 महिलाओं को मिला साहित्य नोबेल पिछले 10 साल में साहित्य का नोबेल 10 लेखकों को मिला, जिनमें 4 महिलाएं थीं। इनमें 6 ने अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में लिखा, जबकि 6 विजेता यूरोप से रहे। 2024 में दक्षिण कोरिया की हान कांग एशिया से पुरस्कार जीतने वाली लेखिका थीं। इस दौरान दक्षिण एशिया से कोई लेखक नहीं जीता। हर साल स्वीडिश अकादमी नॉमिनेशन मंगाती है। इसमें अकादमी के सदस्य, साहित्य और भाषा के प्रोफेसर, पूर्व नोबेल विजेता और लेखक संगठनों के प्रमुख नाम भेज सकते हैं। लेखक खुद को नामांकित नहीं कर सकते। नोबेल कमेटी पहले 15 से 20 नाम चुनती है, फिर मई में इन्हें 5 उम्मीदवारों तक सीमित किया जाता है। इसके बाद स्वीडिश अकादमी के 18 सदस्य वोटिंग से विजेता चुनते हैं। 50 साल तक गोपनीय रहता है नॉमिनेशन स्वीडिश अकादमी नोबेल के नामांकित लेखकों की लॉन्गलिस्ट या शॉर्टलिस्ट जारी नहीं करती। नॉमिनेशन से जुड़ी जानकारी 50 साल तक गोपनीय रहती है। इसलिए 2026 में किन लेखकों को नामांकित किया गया, इसकी पूरी जानकारी 2076 में सामने आएगी। नोबेल रिकॉर्ड के मुताबिक, सरवपल्ली राधाकृष्णन, श्री अरविंद, ताराशंकर बंद्योपाध्याय और आरके नारायण जैसे भारतीय लेखकों को अलग-अलग वर्षों में साहित्य नोबेल के लिए नामांकित किया गया था। ———————————– ये खबर भी पढ़ें… 2026 का केमिस्ट्री नोबेल फ्रांस-जापान के वैज्ञानिकों को:अणुओं के मिरर इमेज की 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई; दवाएं बनाने में मदद मिली 2026 का केमिस्ट्री नोबेल पुरस्कार फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बी. कागन और जापान के केन्सो सोआई को दिया गया है। दोनों वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान की करीब 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

ट्रम्प ने फिर मांगा नोबेल शांति पुरस्कार:कहा- मैंने 8 युद्ध खत्म कराए, सिर्फ तथ्य बता रहा हूं; 2025 में भी मांग की थी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर नोबेल शांति पुरस्कार पर अपना दावा जताया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने 8 युद्ध खत्म कराए हैं। ट्रम्प ने कहा, मैं अपनी तारीफ नहीं कर रहा हूं, सिर्फ तथ्य बता रहा हूं। शायद किसी भी राष्ट्रपति ने इतने युद्ध नहीं सुलझाए हैं। शांति प्रयास जारी हैं और जल्द एक और युद्ध सुलझा सकते हैं। ट्रम्प लंबे समय से अपने कूटनीतिक प्रयासों के लिए इस पुरस्कार के हकदार होने का दावा करते रहे हैं। बुधवार को व्हाइट हाउस लौटने के बाद उन्होंने पत्रकारों से यह बात कही। पुरस्कार की घोषणा 9 अक्टूबर को नॉर्वे की नोबेल समिति करेगी। इससे पहले जून 2025 में भी ट्रम्प ने इस पुरस्कार पर अपना दावा जताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें यह पुरस्कार 4 या 5 बार मिल जाना चाहिए था। ट्रम्प ने 3 बार इस पुरस्कार को लेकर दावे किए ट्रम्प ने पुरस्कार नहीं मिलने पर नाराजगी जताई थी जनवरी 2026 में ट्रम्प की इस पुरस्कार को लेकर नाराजगी नॉर्वे के साथ विवाद तक पहुंच गई थी। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की कोशिश को लेकर विवाद के बीच ट्रम्प ने नॉर्वे के पीएम जोनास गार स्टोर को मैसेज भेजा था। ट्रम्प ने शिकायत की थी कि 8 युद्ध रोकने के बावजूद नॉर्वे ने उन्हें यह पुरस्कार नहीं दिया। इसके बाद स्टोर ने कहा था कि इस पुरस्कार का फैसला नॉर्वे की सरकार नहीं करती, बल्कि स्वतंत्र नॉर्वेजियन नोबेल समिति करती है। 2025 में मारिया मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार मिला था ट्रम्प की नोबेल दावेदारी का एक मामला वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो से भी जुड़ा है। मचाडो को 2025 का यह पुरस्कार लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए उनके काम के लिए दिया गया था। बाद में उन्होंने व्हाइट हाउस में ट्रम्प से मुलाकात की और उन्हें अपना नोबेल मेडल दिया। हालांकि, इससे नोबेल पुरस्कार ट्रम्प को नहीं मिला। पुरस्कार मचाडो के पास ही रहा। नोबेल समिति के मुताबिक, पुरस्कार किसी दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर, साझा या वापस नहीं किया जा सकता। ——————— यह खबर भी पढ़ें… 2026 का केमिस्ट्री नोबेल फ्रांस-जापान के वैज्ञानिकों को:अणुओं के मिरर इमेज की 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई; दवाएं बनाने में मदद मिली 2026 का केमिस्ट्री नोबेल पुरस्कार फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बी. कागन और जापान के केन्सो सोआई को दिया गया है। दोनों वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान की करीब 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई है। पूरी खबर पढ़ें…

फ्रांसिस हैल्जेन को भौतिकी का नोबेल

स्टॉकहोम। बेल्जियम के वैज्ञानिक फ्रांसिस हैल्जेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्हें यह पुरस्कार अंतरिक्ष से धरती तक आने वाले बेहद ताकतवर न्यूट्रिनो को पकड़ने और उनके बारे में पता लगाने में अहम काम के लिए दिया गया है। उन्होंने दक्षिणी ध्रुव की बर्फ में न्यूट्रिनो पकड़ने वाली आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी बनाने का विचार दिया था। उनका प्रयास ब्राह्मांड के रहस्यों को समझने में मददगार होगा।

इससे पहले मेडिसीन का नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों को साझा तौर पर दिया गया। नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है। पुरस्कारों की घोषणा स्टॉकहोम में की जा रही है। शांति के नोबेल पुरस्कार की घोषणा ओस्लो में की जाएगी।

बहरहाल, न्यूट्रिनो बहुत छोटे कण हैं, जो सूरज, तारों और अंतरिक्ष की बेहद ताकतवर घटनाओं से निकलते हैं। अरबों न्यूट्रिनो हर सेकंड हमारे शरीर और धरती के आर पार निकल जाते हैं, लेकिन हमें उनका पता तक नहीं चलता। इन कणों की खास बात यह है कि वे अंतरिक्ष से निकलकर लगभग सीधी दिशा में धरती तक पहुंचते हैं और रास्ते में बहुत कम बदलते हैं। इसलिए अगर वैज्ञानिक इन्हें पकड़ लें, तो वे पता लगा सकते हैं कि ये ब्रह्मांड में कहां और किस घटना से निकले थे। लेकिन न्यूट्रिनो को पकड़ना आसान नहीं है। वे ज्यादातर पदार्थों को बिना टकराए पार कर जाते हैं। इसी समस्या का हल खोजते हुए वैज्ञानिक फ्रांसिस हैल्जेन ने 1988 में दक्षिणी ध्रुव की बर्फ का इस्तेमाल करने का विचार दिया था।

2026 के केमिस्ट्री नोबेल का ऐलान आज:भारतीय मूल के शंकर बालासुब्रमण्यम का नाम चर्चा में; DNA सीक्वेंसिंग के लिए इसी साल वुल्फ केमिस्ट्री पुरस्कार मिला

2026 के केमिस्ट्री नोबेल का ऐलान आज होगा। इस बार पुरुस्कार के लिए भारतीय मूल के ब्रिटिश वैज्ञानिक शंकर बालासुब्रमण्यम का नाम भी चर्चा में है। उन्हें इसी साल डेविड क्लेनरमैन और पास्कल मेयर के साथ वुल्फ केमिस्ट्री पुरस्कार मिला है। तीनों को अगली पीढ़ी की DNA सीक्वेंसिंग को विकसित करने में अहम योगदान के लिए सम्मानित किया गया था। इसके अलावा प्रोटीन में इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर, खुद बनने वाली आणविक परत, पेरोव्स्काइट सोलर सेल और ग्लाइकोप्रोटीन बनाने जैसी खोजों के वैज्ञानिकों के नाम भी चर्चा में हैं। नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है।
शंकर बालासुब्रमण्यम ने DNA पढ़ने की रफ्तार बढ़ाई शंकर बालासुब्रमण्यम और डेविड क्लेनरमैन ने ऐसी तकनीक विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें एक साथ बड़ी संख्या में DNA की कॉपी को पढ़ा जा सकता है। इससे DNA सीक्वेंसिंग की रफ्तार करीब 10 लाख गुना बढ़ी और इसकी लागत भी काफी कम हुई। उनके काम से बनी सीक्वेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल अब दुनिया में होने वाली 90% से ज्यादा सीक्वेंसिंग में होता है। इससे जीन से जुड़ी बीमारियों को समझने, इलाज की योजना बनाने और प्रिसीजन मेडिसिन यानी मरीज के हिसाब से इलाज तय करने में मदद मिली है। पास्कल मेयर ने इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने लायक बनाने में योगदान दिया। उन्होंने केमिस्ट्री, माइक्रोफ्लूडिक्स, ऑप्टिक्स और कंप्यूटर तकनीक को एक साथ जोड़कर हाई-थ्रूपुट सीक्वेंसिंग सिस्टम तैयार करने में मदद की। इससे इंसानी जीनोम की सीक्वेंसिंग की लागत 200 डॉलर से कम तक पहुंचने में मदद मिली। चेन्नई में जन्मे, एक साल की उम्र में ब्रिटेन चले गए शंकर बालासुब्रमण्यम का जन्म 1966 में मद्रास यानी आज के चेन्नई में हुआ था। अगले ही साल वे अपने माता-पिता के साथ ब्रिटेन चले गए। वे फिलहाल यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में हर्शेल स्मिथ प्रोफेसर ऑफ मेडिसिनल केमिस्ट्री हैं। वे कैंसर रिसर्च यूके के कैम्ब्रिज इंस्टीट्यूट में सीनियर ग्रुप लीडर भी हैं। उन्होंने 1988 में कैम्ब्रिज से नेचुरल साइंसेज में BA और 1991 में एंजाइम केमिस्ट्री में PhD की। 1994 में वे कैम्ब्रिज की फैकल्टी से जुड़े। उन्हें 2017 में नाइटहुड से सम्मानित किया गया। उन्हें रॉयल मेडल, मिलेनियम टेक्नोलॉजी प्राइज और ब्रेकथ्रू प्राइज फॉर लाइफ साइंसेज भी मिल चुके हैं। प्रोटीन के अंदर इलेक्ट्रॉन कैसे जाते हैं, यह समझाने वाले वैज्ञानिक भी दावेदार केमिस्ट्री नोबेल के लिए हैरी बी. ग्रे और जे विंकलर के नाम भी चर्चा में हैं। दोनों ने यह समझाने में अहम काम किया कि प्रोटीन के अंदर इलेक्ट्रॉन एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाते हैं। हमारे शरीर में ऊर्जा बनाने वाली कई प्रक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन का एक जगह से दूसरी जगह जाना जरूरी होता है। दोनों वैज्ञानिकों के काम से यह समझने में मदद मिली कि इलेक्ट्रॉन प्रोटीन के अंदर लंबी दूरी कैसे तय करते हैं और इसमें प्रोटीन की बनावट की क्या भूमिका होती है। ——————————– ये खबर भी पढ़ें… 2026 का फिजिक्स नोबेल फ्रांसिस हाल्जेन को मिला:अंतरिक्ष से आने वाले रहस्यमयी कणों को पकड़ने का तरीका खोजा; ब्रह्मांड को समझने में मदद मिली बेल्जियम के वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्हें यह पुरस्कार अंतरिक्ष से धरती तक आने वाले बेहद ताकतवर न्यूट्रिनो को पकड़ने और उनके बारे में पता लगाने में अहम काम के लिए दिया गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

2026 के केमिस्ट्री नोबेल का ऐलान आज:भारतीय मूल के शंकर बालासुब्रमण्यम का नाम चर्चा में; DNA सीक्वेंसिंग के लिए इसी साल वुल्फ केमिस्ट्री पुरस्कार मिला

2026 के केमिस्ट्री नोबेल का ऐलान आज होगा। इस बार पुरुस्कार के लिए भारतीय मूल के ब्रिटिश वैज्ञानिक शंकर बालासुब्रमण्यम का नाम भी चर्चा में है। उन्हें इसी साल डेविड क्लेनरमैन और पास्कल मेयर के साथ वुल्फ केमिस्ट्री पुरस्कार मिला है। तीनों को अगली पीढ़ी की DNA सीक्वेंसिंग को विकसित करने में अहम योगदान के लिए सम्मानित किया गया था। इसके अलावा प्रोटीन में इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर, खुद बनने वाली आणविक परत, पेरोव्स्काइट सोलर सेल और ग्लाइकोप्रोटीन बनाने जैसी खोजों के वैज्ञानिकों के नाम भी चर्चा में हैं। नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है।
शंकर बालासुब्रमण्यम ने DNA पढ़ने की रफ्तार बढ़ाई शंकर बालासुब्रमण्यम और डेविड क्लेनरमैन ने ऐसी तकनीक विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें एक साथ बड़ी संख्या में DNA की कॉपी को पढ़ा जा सकता है। इससे DNA सीक्वेंसिंग की रफ्तार करीब 10 लाख गुना बढ़ी और इसकी लागत भी काफी कम हुई। उनके काम से बनी सीक्वेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल अब दुनिया में होने वाली 90% से ज्यादा सीक्वेंसिंग में होता है। इससे जीन से जुड़ी बीमारियों को समझने, इलाज की योजना बनाने और प्रिसीजन मेडिसिन यानी मरीज के हिसाब से इलाज तय करने में मदद मिली है। पास्कल मेयर ने इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने लायक बनाने में योगदान दिया। उन्होंने केमिस्ट्री, माइक्रोफ्लूडिक्स, ऑप्टिक्स और कंप्यूटर तकनीक को एक साथ जोड़कर हाई-थ्रूपुट सीक्वेंसिंग सिस्टम तैयार करने में मदद की। इससे इंसानी जीनोम की सीक्वेंसिंग की लागत 200 डॉलर से कम तक पहुंचने में मदद मिली। चेन्नई में जन्मे, एक साल की उम्र में ब्रिटेन चले गए शंकर बालासुब्रमण्यम का जन्म 1966 में मद्रास यानी आज के चेन्नई में हुआ था। अगले ही साल वे अपने माता-पिता के साथ ब्रिटेन चले गए। वे फिलहाल यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में हर्शेल स्मिथ प्रोफेसर ऑफ मेडिसिनल केमिस्ट्री हैं। वे कैंसर रिसर्च यूके के कैम्ब्रिज इंस्टीट्यूट में सीनियर ग्रुप लीडर भी हैं। उन्होंने 1988 में कैम्ब्रिज से नेचुरल साइंसेज में BA और 1991 में एंजाइम केमिस्ट्री में PhD की। 1994 में वे कैम्ब्रिज की फैकल्टी से जुड़े। उन्हें 2017 में नाइटहुड से सम्मानित किया गया। उन्हें रॉयल मेडल, मिलेनियम टेक्नोलॉजी प्राइज और ब्रेकथ्रू प्राइज फॉर लाइफ साइंसेज भी मिल चुके हैं। प्रोटीन के अंदर इलेक्ट्रॉन कैसे जाते हैं, यह समझाने वाले वैज्ञानिक भी दावेदार केमिस्ट्री नोबेल के लिए हैरी बी. ग्रे और जे विंकलर के नाम भी चर्चा में हैं। दोनों ने यह समझाने में अहम काम किया कि प्रोटीन के अंदर इलेक्ट्रॉन एक जगह से दूसरी जगह कैसे जाते हैं। हमारे शरीर में ऊर्जा बनाने वाली कई प्रक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन का एक जगह से दूसरी जगह जाना जरूरी होता है। दोनों वैज्ञानिकों के काम से यह समझने में मदद मिली कि इलेक्ट्रॉन प्रोटीन के अंदर लंबी दूरी कैसे तय करते हैं और इसमें प्रोटीन की बनावट की क्या भूमिका होती है। ——————————– ये खबर भी पढ़ें… 2026 का फिजिक्स नोबेल फ्रांसिस हाल्जेन को मिला:अंतरिक्ष से आने वाले रहस्यमयी कणों को पकड़ने का तरीका खोजा; ब्रह्मांड को समझने में मदद मिली बेल्जियम के वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्हें यह पुरस्कार अंतरिक्ष से धरती तक आने वाले बेहद ताकतवर न्यूट्रिनो को पकड़ने और उनके बारे में पता लगाने में अहम काम के लिए दिया गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

2026 के फिजिक्स नोबेल का ऐलान आज:मेटामटेरियल्स, ग्राफीन और क्वांटम तकनीक के वैज्ञानिक दावेदार; 11.5 करोड़ रुपए मिलेंगे

2026 के फिजिक्स नोबेल पुरस्कार की घोषणा आज होगी। स्वीडन की रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज भौतिकी में अहम काम करने वाले वैज्ञानिकों के नाम बताएगी। यह पुरस्कार ऐसी खोज के लिए दिया जाता है, जिसने फिजिक्स को समझने या विज्ञान-तकनीक को आगे बढ़ाने में बड़ी मदद की हो। इस साल मेटामटेरियल्स, ग्राफीन और क्वांटम तकनीक पर काम करने वाले वैज्ञानिक चर्चा में हैं। इनमें जॉन पेंड्री, निकॉला स्पैल्डिन, पाब्लो जारिलो-हरेरो और अलेक्सी किताएव जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, नोबेल कमेटी ने संभावित विजेताओं की कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं की है। नोबेल विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन के स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि मिलेगी। 2026 में नोबेल पुरस्कार की राशि करीब 11.5 करोड़ रुपए है। एक से ज्यादा वैज्ञानिकों को पुरस्कार मिलने पर रकम उनके बीच बांटी जाएगी। फिजिक्स नोबेल के लिए 4 क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के नाम चर्चा में इस साल फिजिक्स नोबेल के लिए चार अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले वैज्ञानिकों के नाम चर्चा में हैं। इनमें मेटामटेरियल्स, ग्राफीन, क्वांटम कंप्यूटिंग और बेहद सटीक घड़ियों पर काम करने वाले वैज्ञानिक शामिल हैं। 1. मेटामटेरियल्स के लिए जॉन पेंड्री जॉन पेंड्री ब्रिटेन के इंपीरियल कॉलेज लंदन के भौतिक विज्ञानी हैं। उनका नाम मेटामटेरियल्स पर काम के लिए चर्चा में है। ये ऐसी कृत्रिम सामग्री होती हैं, जिन्हें खास गुणों के साथ बनाया जाता है। पेंड्री के काम से रोशनी को मोड़ने और नियंत्रित करने की तकनीक को समझने में मदद मिली। इससे ऐसी तकनीक की संभावना सामने आई, जिसमें किसी वस्तु को छिपाने जैसा प्रभाव पैदा किया जा सकता है। इस क्षेत्र में डेविड स्मिथ और फेडेरिको कैपासो के नाम भी चर्चा में हैं। 2.ग्राफीन की परतें घुमाने की तकनीक के लिए तीन नाम की चर्चा पाब्लो जारिलो-हरेरो, एलन मैकडोनाल्ड और ईवा अंद्रेई का नाम ट्विस्ट्रोनिक्स पर काम के लिए चर्चा में है। इसमें ग्राफीन जैसी बेहद पतली सामग्री की दो परतों को थोड़ा घुमाया जाता है। इससे सामग्री के गुण बदल सकते हैं। कुछ स्थितियों में इसमें सुपरकंडक्टिविटी जैसे गुण भी दिखाई दे सकते हैं। इन तीनों को 2026 का कावली नैनोसाइंस पुरस्कार भी मिला है। 3. क्वांटम कंप्यूटिंग के काम के लिए तीन वैज्ञानिक चर्चा में अलेक्सी किताएव, जॉन प्रेस्किल और पीटर शोर के नाम क्वांटम कंप्यूटिंग से जुड़े काम के लिए चर्चा में हैं। क्वांटम कंप्यूटर बहुत संवेदनशील होते हैं। छोटी-सी गड़बड़ी भी उनके नतीजे को बदल सकती है। इन वैज्ञानिकों के काम ने क्वांटम जानकारी को गलतियों से बचाने और ज्यादा भरोसेमंद क्वांटम कंप्यूटर बनाने के तरीकों को समझने में मदद की। 4. बेहद सटीक घड़ियों की तकनीक पर काम करने वाले दो वैज्ञानिक हिदेतोशी कातोरी और जून ये का नाम ऑप्टिकल लैटिस क्लॉक पर काम के लिए चर्चा में है। ये ऐसी घड़ियां हैं, जो समय को बेहद सटीक तरीके से माप सकती हैं। इनमें परमाणुओं और लेजर की मदद ली जाती है। इनका इस्तेमाल वैज्ञानिक प्रयोगों के साथ GPS और कम्युनिकेशन जैसी तकनीकों में भी हो सकता है। 2025 में इलेक्ट्रिक सर्किट से जुड़ी क्वांटम खोज के लिए मिला नोबेल 2025 का फिजिक्स नोबेल जॉन क्लार्क, मिशेल एच. डेवोरेट और जॉन एम. मार्टिनिस को दिया गया था। उन्हें ऐसी खोज के लिए सम्मानित किया गया, जिसमें क्वांटम दुनिया के नियमों को इलेक्ट्रिक सर्किट में देखा गया। वैज्ञानिकों ने दिखाया कि क्वांटम दुनिया में होने वाली घटनाएं सिर्फ बेहद छोटी चीजों में ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रिक सर्किट में भी देखी जा सकती हैं। इस खोज से क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी नई तकनीकों को समझने और आगे बढ़ाने में मदद मिली। —————————— ये खबर भी पढ़ें… दिमागी कोशिकाओं को कंट्रोल करने की तकनीक पर मेडिसिन नोबेल:जर्मनी-अमेरिका के 3 वैज्ञानिकों की रिसर्च; डिप्रेशन और मानसिक बीमारियों को समझना आसान हुआ 2026 का मेडिसिन नोबेल जर्मनी के पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल और अमेरिका के कार्ल डाइसेरोथ को दिया गया है। इन वैज्ञानिकों ने ऑप्टोजेनेटिक्स नाम की ऐसी तकनीक विकसित करने में मदद की, जिससे रोशनी की मदद से दिमाग की अलग-अलग तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करके उनके काम को समझा जा सकता है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Flydubai: ‘इजराइल में फ्लाइट क्रैश करना था सपना’ ओमानी को-पायलट ने पूछताछ में किए चौंकाने वाले खुलासे

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) फ्लाईदुबई फ्लाइट के कॉकपिट पर हमला करने वाले ओमानी नागरिक हमाम अल-हमामी के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई कर सकती है। न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, फ्लाईदुबई विमान को हाईजैक करने के आरोपी को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में मौत की सजा का सामना करना पड़ सकता है। हमाम अल-हमामी ने इजराइल जा रहे यात्रियों से भरे विमान को तेल अवीव के बेन-गुरियन एयरपोर्ट पर क्रैश कराने की कोशिश की थी। इसी बीच आरोपी ने पुछताछ में कई खुलासे किए हैं। अल-हम्मामी ने जांच के दौरान कथित तौर पर बताया कि उसने इजराइल के एक एयरपोर्ट से विमान को टकराने का सपना देखा था।

कर चुका है इजराइल की यात्रा

जेरूसलम पोस्ट के अनुसार, ओमान के 29 वर्षीय नागरिक हमाम अल-हम्मामी ने इजराइल जाने वाली एयरलाइनों के बारे में पहले से जानकारी जुटाई थी। जांच में ये भी सामने आया कि कॉकपिट पर हमला करने से कुछ महीने पहले वह इजराइल की यात्रा कर चुका था। कथित तौर पर हमाम अल-हम्मामी ने जांचकर्ताओं से कहा, “मैंने कई एयरलाइनों में नौकरी पाने की कोशिश की थी। मैंने यह भी पता लगाया कि कौन-कौन सी एयरलाइंस तेल अवीव के लिए उड़ान भरती हैं। इसी वजह से मैंने फ्लाईदुबई को चुना। नौकरी मिलने से पहले ही मैंने इस पूरी योजना के बारे में सोच लिया था।”

जुलाई में बनाई थी योजना

जेरूसलम पोस्ट के अनुसार, हमाम अल-हम्मामी ने फ्लाईदुबई में करीब आठ महीने तक काम किया था। बताया जा रहा कि उसने जुलाई में विमान को क्रैश कराने की योजना बनाई थी, लेकिन उस समय एक क्रू मेंबर के पास होने के कारण उसने अपना इरादा बदल दिया। इसके बाद भी इजराइल की जमीन पर विमान गिराने की कथित योजना उसने नहीं छोड़ी। जांच के दौरान उसने कथित तौर पर कहा, “सपना था बेन-गुरियन (तेल अवीव) एयरपोर्ट से टकराना।”

क्या थी योजना

रिपोर्ट के अनुसार, अल-हम्मामी की कथित योजना थी कि हमला इतनी तेजी से किया जाए कि इजराइली सेना को लड़ाकू विमान भेजकर कार्रवाई करने का पर्याप्त समय न मिल सके। पोस्ट के एक सूत्र के मुताबिक, जांचकर्ताओं को फिलहाल आशंका है कि उसने किसी आतंकी संगठन के निर्देश पर नहीं, बल्कि अपने स्तर पर अकेले यह योजना बनाई थी। उसे ‘लोन वुल्फ’ के तौर पर देखा जा रहा है और UAE में उससे पूछताछ अभी जारी है।

फ्लाइट को क्रैश कराने की थी साजिश

एक वरिष्ठ अमीराती अधिकारी के हवाले से Ynet ने बताया कि फ्लाईदुबई के को-पायलट हमाम अल-हम्मामी को इस मामले में मौत की सजा मिल सकती है। आरोप है कि उसने विमान के कैप्टन स्मित मच्छर पर क्रैश एक्स से हमला किया था। इसके बाद सरकारी वकील आरोपी के खिलाफ सबसे सख्त सजा की मांग कर रहे हैं। फ्लाईदुबई फ्लाइट को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर हमला करने के बाद विमान का कंट्रोल अपने हाथ में लेने की कोशिश की। विमान में करीब 180 लोग सवार थे। कैप्टन मच्छार ने किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया, जिसके बाद यात्रियों और अन्य लोगों ने मिलकर हमलावर को काबू में करने में मदद की।

Nobel Prize Medicine: ‘कैंसर से लेकर ब्रेन डिसऑर्डर तक!’ इस दवा की खोज के लिए 3 वैज्ञानिकों को मिला नोबेल

Nobel Prize Medicine: ‘कैंसर से लेकर ब्रेन डिसऑर्डर तक!’ इस दवा की खोज के लिए 3 वैज्ञानिकों को मिला नोबेल

Nobel Prize in Medicine 2026: साल 2026 के लिए ‘फिजियोलॉजी या मेडिसिन’ क्षेत्र के नोबेल पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है। इस बार यह प्रतिष्ठित सम्मान वैज्ञानिक कार्ल डीसेरोथ, पीटर हेगमैन और जॉर्ज नागेल को संयुक्त रूप से दिया गया है। इन तीनों वैज्ञानिकों को ‘लाइट-गेटेड आयन चैनलों’ और ‘ऑप्टोजेनेटिक्स’ तकनीक से जुड़ी अभूतपूर्व खोजों के लिए चुना गया है। इस तकनीक ने मस्तिष्क के अध्ययन और तंत्रिका विज्ञान की दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है।

स्टॉकहोम स्थित करोलिंस्का इंस्टीट्यूट की नोबेल असेंबली ने सोमवार को इस पुरस्कार का ऐलान किया। असेंबली ने तीनों वैज्ञानिकों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि इनकी खोजों के कारण ही प्रकाश के जरिए मस्तिष्क की विशेष तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित और अध्ययन करना संभव हो पाया है।

इनके इस ऐतिहासिक कार्य ने वैज्ञानिकों को यह समझने का एक बेहद शक्तिशाली जरिया दिया है कि जीवित मस्तिष्क में अलग-अलग न्यूरॉन्स की गतिविधियां स्मृति, भावनाओं और व्यवहार को कैसे प्रभावित करती हैं।

कैसे काम करती है यह नोबेल पुरस्कार विजेता खोज?

ऑप्टोजेनेटिक्स एक ऐसी तकनीक है जो प्रकाश और आनुवंशिकी के मेल से काम करती है। वैज्ञानिकों की इस तिकड़ी ने अपनी खोजों से इसे संभव बनाया:

पीटर हेगमैन की खोज: जर्मन बायोफिजिसिस्ट पीटर हेगमैन के शोध ने यह उजागर करने में मदद की कि कैसे कुछ सूक्ष्मजीव विशेष प्रकार के प्रोटीन के जरिए प्रकाश को महसूस करते हैं।

जॉर्ज नागेल का योगदान: जर्मन न्यूरोवैज्ञानिक जॉर्ज नागेल ने बाद में यह साबित करके दिखाया कि ये सूक्ष्मजीव वाले प्रोटीन प्रकाश द्वारा नियंत्रित होने वाले ‘आयन चैनल’ के रूप में काम कर सकते हैं।

आयन चैनल की भूमिका: आयन चैनल कोशिकाओं की झिल्ली में मौजूद ऐसे प्रोटीन होते हैं, जो विद्युत आवेशित कणों के कोशिका के भीतर और बाहर जाने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। चूंकि आयन की यह हलचल ही तय करती है कि कोई न्यूरॉन सक्रिय होगा या नहीं, इसलिए प्रकाश-संवेदनशील आयन चैनलों ने प्रकाश की मदद से न्यूरॉन्स की गतिविधियों को प्रभावित करने का रास्ता साफ कर दिया।

कार्ल डीसेरोथ का तकनीकी इस्तेमाल: अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में बायोइंजीनियरिंग, साइकियाट्री और बिहेवियरल साइंसेज के प्रोफेसर कार्ल डीसेरोथ और उनके सहयोगियों ने इन बुनियादी खोजों को जीवित जीवों के न्यूरॉन्स को नियंत्रित करने के एक व्यावहारिक और सटीक तरीके में बदल दिया।

जैनेटिक तकनीकों के जरिए इन प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों को न्यूरॉन्स में जोड़कर और सटीक रूप से रोशनी डालकर, शोधकर्ता किसी खास न्यूरल सर्किट को संचालित कर सकते थे और उसके व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभावों को देख सकते थे। इस दृष्टिकोण ने मस्तिष्क के कामकाज को समझने के लिए एक नया दरवाजा खोल दिया। नोबेल असेंबली ने भी कहा कि इन खोजों से यह साबित करना संभव हो पाया है कि जीवित मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाएं यादों, भावनाओं और व्यवहार को किस तरह आकार देती हैं।

कौन हैं 2026 के नोबेल पुरस्कार विजेता?

कार्ल डीसेरोथ (Karl Deisseroth): अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में बायोइंजीनियरिंग, साइकियाट्री और बिहेवियरल साइंसेज के प्रोफेसर हैं। उनके शोध ने न्यूरल सर्किट और व्यवहार की जांच के लिए ऑप्टोजेनेटिक्स को एक व्यावहारिक विधि के रूप में स्थापित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई।

पीटर हेगमैन (Peter Hegemann): जर्मनी के प्रसिद्ध बायोफिजिसिस्ट हैं, जिन्होंने सूक्ष्मजीवों में प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों का गहन अध्ययन किया। उनके शोध ने प्रकाश के माध्यम से कोशिकाओं को नियंत्रित करने की नींव रखी।

जॉर्ज नागेल (Georg Nagel): जर्मनी के प्रमुख न्यूरोवैज्ञानिक हैं, जिन्होंने माइक्रोबियल ऑप्सिन की खोज और उनके लक्षणों को पहचानकर यह दिखाया कि वे प्रकाश-नियंत्रित आयन चैनलों के रूप में काम कर सकते हैं।

इन तीनों वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयास ने माइक्रोबायोलॉजी, मेम्ब्रेन बायोलॉजी और न्यूरोसाइंस के बीच के अंतर को पाट दिया। इनकी इस खोज ने आधुनिक मस्तिष्क अनुसंधान को एक ऐसा हथियार दिया है, जो भविष्य में तंत्रिका तंत्र और मानसिक बीमारियों के इलाज में नई दिशा दिखाएगा।