ईरान ने मंगलवार को कहा कि वह अपना एक ग्राम भी एनरिच्ड यूरेनियम किसी दूसरे देश नहीं भेजेगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सेक्रेटरी मोहसिन रजाई ने कहा कि जब तक अमेरिका भरोसा जीतने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता और ईरान की सभी शर्तें नहीं मानता, तब तक बातचीत नहीं होगी। ईरान ने अमेरिका के सामने 7 शर्तें रखीं ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका तब तक ईरान का भरोसा नहीं जीत सकता, जब तक वह उसकी सात शर्तें पूरी नहीं करता। ये शर्तें पिछले महीने होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने के लिए रखी गई थीं। ईरान की प्रमुख मांगों में उसके बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करना, तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना और क्षेत्र के सभी मोर्चों पर लड़ाई रोकना शामिल है। ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई भी कह चुके हैं कि हथियार बनाने के लिए जरूरी स्तर के करीब पहुंच चुके एनरिच्ड यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजा जाना चाहिए। परमाणु कार्यक्रम पर दोनों देशों में विवाद ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका के साथ समझौते की राह में बड़ी रुकावट बना हुआ है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसी महीने की शुरुआत में कहा था कि ईरान को यूरेनियम संवर्धन की अपनी क्षमता में ठोस कमी करनी होगी। उनके मुताबिक, ऐसा करना अमेरिकी मांगें मानने और दोनों देशों के बीच आठ महीने से चल रही जंग खत्म करने के लिए जरूरी है। एनरिच्ड यूरेनियम वह यूरेनियम होता है, जिसमें एक खास तरह के परमाणु की मात्रा बढ़ाई जाती है। इसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा बनाने के साथ परमाणु हथियारों में भी हो सकता है। ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप अमेरिका, इजराइल और कई पश्चिमी देश लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं। इन देशों की चिंता की एक बड़ी वजह ईरान का यूरेनियम को 60% तक संवर्धित करना है। आम तौर पर नागरिक परमाणु ऊर्जा के लिए इतने ऊंचे स्तर की जरूरत नहीं होती, जबकि परमाणु हथियारों में इस्तेमाल होने वाले यूरेनियम का संवर्धन स्तर करीब 90% होता है। हालांकि, ईरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है। उसका कहना है कि वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है। पाकिस्तान बातचीत की कोशिश करा रहा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर दोनों देशों के बीच बातचीत दोबारा शुरू कराने के लिए ईरान के दौरे पर हैं। उन्होंने मुनीर के साथ मुलाकात में भी ईरान का यही रुख दोहराया। ईरानी मीडिया के मुताबिक, मंगलवार को राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने तेहरान में मुनीर से मुलाकात की। समाचार एजेंसी नूर न्यूज के अनुसार, इस दौरान क्षेत्र के हालात और बातचीत कराने की कोशिशों पर चर्चा हुई। मुनीर ने ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ से भी मुलाकात की। पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इससे पहले पाकिस्तान की कोशिशों से जून में दोनों देशों के बीच अंतरिम शांति समझौता हुआ था। लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद अमेरिका और ईरान के बीच फिर लड़ाई शुरू हो गई और समझौता टूट गया।
ईरान ने मंगलवार को कहा कि वह अपना एक ग्राम भी एनरिच्ड यूरेनियम किसी दूसरे देश नहीं भेजेगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सेक्रेटरी मोहसिन रजाई ने कहा कि जब तक अमेरिका भरोसा जीतने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता और ईरान की सभी शर्तें नहीं मानता, तब तक बातचीत नहीं होगी। ईरान ने अमेरिका के सामने 7 शर्तें रखीं ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका तब तक ईरान का भरोसा नहीं जीत सकता, जब तक वह उसकी सात शर्तें पूरी नहीं करता। ये शर्तें पिछले महीने होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने के लिए रखी गई थीं। ईरान की प्रमुख मांगों में उसके बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करना, तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना और क्षेत्र के सभी मोर्चों पर लड़ाई रोकना शामिल है। ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई भी कह चुके हैं कि हथियार बनाने के लिए जरूरी स्तर के करीब पहुंच चुके एनरिच्ड यूरेनियम को देश से बाहर नहीं भेजा जाना चाहिए। परमाणु कार्यक्रम पर दोनों देशों में विवाद ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका के साथ समझौते की राह में बड़ी रुकावट बना हुआ है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इसी महीने की शुरुआत में कहा था कि ईरान को यूरेनियम संवर्धन की अपनी क्षमता में ठोस कमी करनी होगी। उनके मुताबिक, ऐसा करना अमेरिकी मांगें मानने और दोनों देशों के बीच आठ महीने से चल रही जंग खत्म करने के लिए जरूरी है। एनरिच्ड यूरेनियम वह यूरेनियम होता है, जिसमें एक खास तरह के परमाणु की मात्रा बढ़ाई जाती है। इसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा बनाने के साथ परमाणु हथियारों में भी हो सकता है। ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप अमेरिका, इजराइल और कई पश्चिमी देश लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं। इन देशों की चिंता की एक बड़ी वजह ईरान का यूरेनियम को 60% तक संवर्धित करना है। आम तौर पर नागरिक परमाणु ऊर्जा के लिए इतने ऊंचे स्तर की जरूरत नहीं होती, जबकि परमाणु हथियारों में इस्तेमाल होने वाले यूरेनियम का संवर्धन स्तर करीब 90% होता है। हालांकि, ईरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है। उसका कहना है कि वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है। ट्रम्प बोले- ईरान परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 15 अक्टूबर को न्यूजमैक्स को दिए इंटरव्यू में दोबारा कहा कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। रॉयटर्स मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार न हों, क्योंकि अगर उसके पास ऐसे हथियार हुए तो वह उनका इस्तेमाल करेगा। ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े पहाड़ के नीचे बने ठिकाने को निशाना बनाने की संभावना भी जताई। उन्होंने कहा कि इस ठिकाने पर हमला करना पड़ सकता है। हालांकि, ट्रम्प ने यह भी साफ किया कि ईरान के खिलाफ जंग में अमेरिका परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं करेगा। पाकिस्तान बातचीत की कोशिश करा रहा पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर दोनों देशों के बीच बातचीत दोबारा शुरू कराने के लिए ईरान के दौरे पर हैं। उन्होंने मुनीर के साथ मुलाकात में भी ईरान का यही रुख दोहराया। ईरानी मीडिया के मुताबिक, मंगलवार को राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने तेहरान में मुनीर से मुलाकात की। समाचार एजेंसी नूर न्यूज के अनुसार, इस दौरान क्षेत्र के हालात और बातचीत कराने की कोशिशों पर चर्चा हुई। मुनीर ने ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ से भी मुलाकात की। पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। इससे पहले पाकिस्तान की कोशिशों से जून में दोनों देशों के बीच अंतरिम शांति समझौता हुआ था।लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद अमेरिका और ईरान के बीच फिर लड़ाई शुरू हो गई और समझौता टूट गया। 28 फरवरी से चल रही है अमेरिका-ईरान की लड़ाई अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और उन खाड़ी देशों में हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है। वहीं ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प मिडटर्म चुनाव हार सकते हैं:10 में से 9 सर्वे में पीछे, महंगाई-ईरान जंग से लोकप्रियता घटी, अपने ही उम्मीदवार दूरी बना रहे अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
अगले 5 साल में अंतरिक्ष में जंग छिड़ सकती है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और चीन जैसे देश एक-दूसरे की सैटेलाइट को निशाना बना सकते हैं। इंटरनेट, टीवी, मौसम की जानकारी और बैंकिंग जैसी कई सेवाएं सैटेलाइट पर निर्भर हैं। अगर युद्ध के दौरान सैटेलाइट को नुकसान पहुंचा, तो इन सेवाओं पर असर पड़ सकता है। विमानों और जहाजों को रास्ता पता करने में भी परेशानी हो सकती है। अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ क्यों बढ़ रही है? चीन के 5 सैटेलाइट ने एक साथ अभ्यास किया अमेरिकी स्पेस फोर्स के मुताबिक, चीन के 5 सैटेलाइट अंतरिक्ष में एक-दूसरे के करीब आए और ऐसी गतिविधियां कीं, जिनका इस्तेमाल जंग में हो सकता है। चीन ऐसी मशीनें बना रहा है, जो अंतरिक्ष में दूसरे सैटेलाइट को पकड़ सकती हैं या उन्हें उनकी जगह से हटा सकती हैं। कुछ रिपोर्टस के मुताबिक रूस के सैन्य सैटेलाइट भी दूसरे देशों के सैटेलाइट के करीब पहुंचकर उनकी निगरानी कर रहे हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को यह आशंका भी है कि रूस के कॉसमॉस-2553 सैटेलाइट में परमाणु हथियार से जुड़े उपकरणों के कुछ हिस्से भेजे गए थे। ब्रिटेन ने अंतरिक्ष की सुरक्षा के लिए यूनिट बनाई ब्रिटेन की वायुसेना ने सितंबर में अपने सैटेलाइट की सुरक्षा के लिए एक यूनिट बनाई है। अमेरिका ने 2019 में अपनी अंतरिक्ष सेना बनाई थी। इसका काम अमेरिकी सैटेलाइट की सुरक्षा करना और अंतरिक्ष में दूसरे देशों की सैन्य गतिविधियों पर नजर रखना है। 4 देश सैटेलाइट को मिसाइल से नष्ट करने की क्षमता का परीक्षण कर चुके दुनिया के कुछ ताकतवर देश सैटेलाइट को नष्ट करने वाली मिसाइलों का परीक्षण भी कर चुके हैं। इनमें शामिल हैं: अंतरिक्ष में हमला किस तरीके से हो सकता है जीपीएस के सिग्नल रोककर सैटेलाइट से मिलने वाले सिग्नल की मदद से मोबाइल, विमान और जहाज अपनी लोकेशन पता करते हैं। अगर कोई देश इन सिग्नल को रोक दे, तो मोबाइल में सही लोकेशन नहीं दिखेगी। विमानों और जहाजों को भी अपनी सही जगह और रास्ता पता करने में परेशानी हो सकती है। युद्ध के दौरान ऐसा करके दूसरे देश की सेना के लिए रास्ता तय करना और अपनी लोकेशन पता करना मुश्किल बनाया जा सकता है। गलत लोकेशन बताकर इस तरीके में नकली सिग्नल भेजकर मोबाइल, विमान या जहाज को उसकी गलत लोकेशन बताई जाती है। इसे स्पूफिंग कहते हैं। उदाहरण के लिए, कोई जहाज समुद्र में एक जगह मौजूद है, लेकिन नकली सिग्नल की वजह से उसके सिस्टम में दूसरी जगह दिखाई देने लगती है। इससे जहाज का रास्ता तय करना मुश्किल हो सकता है। सैटेलाइट को चलाने वाले कंप्यूटर पर हमला करके सैटेलाइट को जमीन पर मौजूद केंद्रों से नियंत्रित किया जाता है। हैकर इन केंद्रों के कंप्यूटर सिस्टम पर हमला कर सकते हैं। इससे सैटेलाइट से संपर्क टूट सकता है, जरूरी जानकारी चोरी हो सकती है या उसका कामकाज प्रभावित हो सकता है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने इजराइलियों से कहा- नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री बनाएं:किसी और को चुना तो ईरान के खिलाफ अमेरिका को अकेले लड़ना पड़ेगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजराइल के लोगों से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बीबी नेतन्याहू आपको कभी निराश नहीं करेंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…
अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। महंगाई, ईरान के साथ जंग और ट्रम्प की घटती लोकप्रियता के बीच रिपब्लिकन पार्टी के लिए कांग्रेस में अपना बहुमत बचाना चुनौती बन गया है। 10 प्रमुख जनमत सर्वेक्षणों में से सिर्फ 1 में रिपब्लिकन पार्टी आगे है। मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति नहीं चुना जाता। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट की सीटों के लिए वोटिंग होती है। फिलहाल दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को मामूली बहुमत है। अगर डेमोक्रेट्स जरूरी सीटें जीत लेते हैं, तो वे एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर सकते हैं। इससे ट्रम्प के लिए अपने एजेंडे को लागू करना मुश्किल हो सकता है। 1. ट्रम्प की लोकप्रियता में गिरावट, 30% तक रेटिंग पहुंची अमेरिका में ट्रम्प के कामकाज से खुश लोगों की संख्या घट रही है। अलग-अलग सर्वे में सिर्फ 30 से 36% लोग ही उनके काम से खुश हैं। NBC न्यूज के सर्वे में 34% लोगों ने ट्रम्प के कामकाज को सही बताया। वॉशिंगटन पोस्ट-ABC न्यूज के सर्वे में 33% और फॉक्स न्यूज के सर्वे में 36% लोगों ने उनका समर्थन किया। प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में ट्रम्प को सबसे कम, यानी 30% लोगों का समर्थन मिला। ये ट्रम्प के पहले कार्यकाल से भी कम हैं। पहले कार्यकाल में ट्रम्प की अप्रूवल रेटिंग सबसे कम जनवरी 2021 में संसद में दंगाईयों के घुसने वाली घटना के बाद हुई थी। तब उनकी रेटिंग 34% पहुंच गई थी। 2. अमेरिकी जनता महंगाई से परेशान 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने वादा किया था कि वे महंगाई कम करेंगे और लोगों का खर्च घटाएंगे। लेकिन अब बढ़ती कीमतें उनकी पार्टी के लिए परेशानी बन रही हैं। अमेरिका में अंडे, दूध, ब्रेड, मांस और सब्जियां जैसी बुनियादी चीजों के दाम 20% से 30% तक महंगे हो चुके हैं। घर का किराया औसतन 1.60 लाख रुपए पहुंच गया है जो अब तक सबसे ऊंचा स्तर है। तेल-गैस की कीमतों में करीब 20% का इजाफा हुआ है। हालांकि लोगों की तनख्वाह में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन महंगाई की वजह से उन्हें इसका फायदा नहीं मिला। रॉयटर्स-इप्सोस के सर्वे में 78% लोगों ने कहा कि चीजों के दाम उनकी कमाई से ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। AP की रिपोर्ट के मुताबिक, 65% अमेरिकी मानते हैं कि महंगाई के लिए ट्रम्प की नीतियां जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के मुताबिक लगभग 37% से अधिक अमेरिकी महंगाई और बढ़ती कीमतों को देश की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या मानते हैं। ऐसे में महंगाई कम करना राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। 3. ईरान जंग से बढ़ी मुश्किल, विदेश नीति से भी नाराज लोग ईरान के साथ जंग ट्रम्प के लिए एक और परेशानी बन गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जंग के कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। इससे अमेरिकी लोगों का रोजमर्रा का खर्च बढ़ सकता है। NBC न्यूज के सर्वे में सिर्फ 29% लोगों ने ईरान जंग को संभालने के ट्रम्प के तरीके को सही माना। वहीं, फॉक्स न्यूज के सर्वे में 64% लोगों ने उनकी विदेश नीति को गलत बताया। हालांकि, ट्रम्प की अपनी पार्टी रिपब्लिकन के समर्थकों में उन्हें अब भी समर्थन मिल रहा है। AP के सर्वे में 69% रिपब्लिकन मतदाताओं ने उनकी विदेश नीति को सही माना। ईरान जंग का चुनाव पर कितना असर पड़ेगा, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन अगर जंग के कारण पेट्रोल-डीजल महंगा होता है और लोग ट्रम्प की नीतियों से नाराज रहते हैं, तो इसका नुकसान उनकी रिपब्लिकन पार्टी को हो सकता है। 4. अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार ट्रम्प से दूरी बनाने लगे ट्रम्प की लोकप्रियता घटने का असर उनकी अपनी पार्टी पर भी दिख रहा है। रॉयटर्स की अक्टूबर में आई रिपोर्ट के मुताबिक, मुकाबले वाली 62 सीटों में से 41 सीटों पर रिपब्लिकन उम्मीदवार ट्रम्प की कुछ नीतियों से असहमति जता रहे हैं या उनसे दूरी बनाकर चल रहे हैं। ये उम्मीदवार ट्रम्प की सभी नीतियों का विरोध नहीं कर रहे। वे कुछ मुद्दों पर उनसे अलग राय रखकर उन लोगों का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, जो किसी पार्टी के पक्के समर्थक नहीं हैं। इन उम्मीदवारों के सामने मुश्किल यह है कि ट्रम्प के करीब रहने पर उनकी गिरती लोकप्रियता का नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं, उनसे ज्यादा दूरी बनाने पर ट्रम्प के वफादार समर्थक नाराज हो सकते हैं। संसद में बहुमत खोने पर ट्रम्प को क्या नुकसान होगा अगर डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस के एक या दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रम्प के लिए अपने फैसलों को लागू करना मुश्किल हो सकता है। कांग्रेस में बजट, सरकारी खर्च और नए कानूनों से जुड़े अहम फैसले लिए जाते हैं। ऐसे में डेमोक्रेट्स के पास बहुमत होने पर वे ट्रम्प के प्रस्तावों को रोक सकते हैं और उनके प्रशासन के कामकाज की जांच भी बढ़ा सकते हैं। हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी के पास कुछ फायदे भी हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, पार्टी के पास चुनाव प्रचार पर खर्च करने के लिए मजबूत संसाधन हैं। इसके अलावा, डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ उम्मीदवारों को लेकर मध्यमार्गी मतदाताओं की चिंता भी रिपब्लिकन के पक्ष में जा सकती है। ——————– ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने इजराइलियों से कहा- नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री बनाएं:किसी और को चुना तो ईरान के खिलाफ अमेरिका को अकेले लड़ना पड़ेगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजराइल के लोगों से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बीबी नेतन्याहू आपको कभी निराश नहीं करेंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल से ऑस्ट्रिया जा रही ऑस्ट्रियन एयरलाइंस की फ्लाइट को बम की धमकी के बाद बुल्गारिया में उतारा गया। एयरबस A320 रविवार रात तेल अवीव से वियना जा रहा था। खतरे की सूचना के बाद बुल्गारिया की वायुसेना ने विमान को एस्कॉर्ट करने के लिए MiG-29 लड़ाकू विमान भेजा। विमान में 51 यात्री और छह क्रू सदस्य सवार थे। सभी को सुरक्षित बाहर निकाला गया। किसी के घायल होने की खबर नहीं है। फ्लाइट तीन घंटे बाद बुल्गारिया में लैंड हुई फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, ऑस्ट्रियन एयरलाइंस की फ्लाइट रविवार शाम 6:46 बजे तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट से रवाना हुई थी। विमान जब रोमानिया के ऊपर था तब इसे बुल्गारिया की राजधानी सोफिया की ओर मोड़ा गया। करीब तीन घंटे बाद 9:10 बजे यह सोफिया के वासिल लेव्स्की एयरपोर्ट पर उतरा। बुल्गारिया के परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, अलर्ट मिलने के करीब 30 मिनट बाद विमान की सुरक्षा जांच शुरू हुई। बुल्गारिया और इजराइली मीडिया ने बताया कि विमान को बम से उड़ाने की धमकी दी गई थी। ऑस्ट्रियन एयरलाइंस ने भी खतरे की पुष्टि की है, लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं दी।
इजराइल से ऑस्ट्रिया जा रही ऑस्ट्रियन एयरलाइंस की फ्लाइट को बम की धमकी के बाद बुल्गारिया में उतारा गया। एयरबस A320 रविवार रात तेल अवीव से वियना जा रहा था। खतरे की सूचना के बाद बुल्गारिया की वायुसेना ने विमान को एस्कॉर्ट करने के लिए MiG-29 लड़ाकू विमान भेजा। विमान में 51 यात्री और छह क्रू सदस्य सवार थे। सभी को सुरक्षित बाहर निकाला गया। किसी के घायल होने की खबर नहीं है। फ्लाइट तीन घंटे बाद बुल्गारिया में लैंड हुई फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, ऑस्ट्रियन एयरलाइंस की फ्लाइट रविवार शाम 6:46 बजे तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट से रवाना हुई थी। विमान जब रोमानिया के ऊपर था तब इसे बुल्गारिया की राजधानी सोफिया की ओर मोड़ा गया। करीब तीन घंटे बाद 9:10 बजे यह सोफिया के वासिल लेव्स्की एयरपोर्ट पर उतरा। बुल्गारिया के परिवहन मंत्रालय के मुताबिक, अलर्ट मिलने के करीब 30 मिनट बाद विमान की सुरक्षा जांच शुरू हुई। बुल्गारिया और इजराइली मीडिया ने बताया कि विमान को बम से उड़ाने की धमकी दी गई थी। ऑस्ट्रियन एयरलाइंस ने भी खतरे की पुष्टि की है, लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं दी। 6 दिन पहले भी इजराइल जा रही फ्लाइट को बम की धमकी मिली थी अमेरिका के न्यूयॉर्क से तेल अवीव पहुंची डेल्टा एयरलाइंस की फ्लाइट को भी 13 अक्टूबर को बम की धमकी मिली। विमान खाली कराकर तलाशी ली गई, लेकिन कोई विस्फोटक नहीं मिला। इससे एक दिन पहले इंडोनेशियाई पायलट के कारण इजराइल ने इथियोपियन एयरलाइंस के कार्गो विमान को उतरने की मंजूरी नहीं दी थी। पायलट बदलने के बाद विमान को अनुमति मिली। दरअसल सितंबर में फ्लाईदुबई की फ्लाइट में हुए हादसे के बाद इजराइल ने सुरक्षा नियम सख्त कर 11 देशों के पायलटों और क्रू पर रोक लगा दी है। इनमें अफगानिस्तान, अल्जीरिया, इंडोनेशिया, ईरान, इराक, कुवैत, नाइजर, कतर, सऊदी अरब, सोमालिया और वेनेजुएला शामिल हैं। इन देशों के इजराइल से राजनयिक संबंध नहीं हैं। पिछले महीने फ्लाईदुबई की फ्लाइट हाईजैक हुई थी 30 सितंबर को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के पायलट ने विमान को हाईजैक कर लिया था। उसने दूसरे पायलट पर चाकू से हमला कर दिया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमलावर विमान को इजराइल के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर गिराने की कोशिश कर रहा था। हालांकि, कई यात्रियों ने बीच में आकर उसे रोक दिया और फाइटर जैट्स की निगरानी में विमान की सऊदी अरब के ताबुक एयरपोर्ट पर इमरजेंसी लैंडिग कराई गई। फ्लाइदुबई की फ्लाइट का रूट देखें… इजराइली न्यूज चैनल 12 के मुताबिक, फ्लाईदुबई पर हमले के अगले दिन इजराइल के परिवहन मंत्रालय ने एयरलाइंस को पत्र भेजा था। इसमें कहा गया था कि दुश्मन देशों के नागरिकों को इजराइल जाने वाली उड़ानों में पायलट, क्रू मेंबर या यात्री के तौर पर सफर करने की अनुमति न दी जाए। ——————- यह खबर भी पढ़ें… कनाडा में सैन्य अड्डे पर धमाका, 4 सैनिकों की मौत:रक्षा मंत्री बोले- ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा; यहां 1300 कर्मचारी तैनात थे कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में सैन्य अड्डे पर शनिवार को जोरदार धमाके के बाद आग लग गई। हादसे में 4 सैनिकों की मौत हो गई, जबकि दर्जनों गंभीर रूप से घायल हैं। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने रविवार को इसकी पुष्टि की। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इजराइल के लोगों से प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को दोबारा प्रधानमंत्री चुनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बीबी नेतन्याहू आपको कभी निराश नहीं करेंगे। ट्रम्प ने चेतावनी दी कि अगर इजराइल ने नेतन्याहू के अलावा किसी दूसरे नेता को चुना, तो अमेरिका को ईरान के खिलाफ लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि वे ऐसा करने के इच्छुक नहीं हैं। ट्रम्प ने इजराइल के लोगों के नाम जारी संदेश में नेतन्याहू को ‘मजबूत, बहादुर और शानदार’ नेता बताया। ट्रम्प बोले- ईरान 51 साल से अमेरिका-इजराइल को मिटाने की धमकी दे रहा ट्रम्प ने ईरान पर पिछले 51 साल से इजराइल और अमेरिका को मिटाने की धमकी देने का आरोप लगाया। उन्होंने ईरान के नारे ‘इजराइल की मौत, अमेरिका की मौत’ का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे बयानों को नजरअंदाज करना खतरनाक है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की सैन्य और आर्थिक ताकत को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया गया है। ट्रम्प ने कहा कि अगर ईरान ने तेजी से अपना रवैया नहीं बदला, तो अमेरिका जल्द ही बाकी काम भी पूरा कर देगा। ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने नेतन्याहू को बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते देखा है। उनके मुताबिक, ऐसे दबाव में आम लोग कमजोर पड़ जाते, लेकिन नेतन्याहू मजबूती से डटे रहे। उन्होंने यह भी कहा कि नेतन्याहू को इजराइल के भीतर से विरोध का सामना करना पड़ा है।
टोरंटो यूनिवर्सिटी की सिटिजन लैब की जांच में खुलासा हुआ है कि इजराइली कंपनी डिस्कवर टेक के विज्ञापनों के जरिए मोबाइल और कंप्यूटर में जासूसी मालवेयर (एक तरह का सॉफ्टवेयर) पहुंचाने की कोशिश की गई। इसके लिए यूजर को विज्ञापन पर क्लिक करने की जरूरत भी नहीं थी। जांच में 1.20 लाख से ज्यादा वेबसाइटों और 75 हजार से ज्यादा ऐप पर ऐसे विज्ञापनों के रिकॉर्ड मिले। इनमें संयुक्त राष्ट्र (UN) और नाटो के नेटवर्क तक विज्ञापन पहुंचने की बात भी सामने आई है। रिकॉर्ड में भारत में इस्तेमाल होने वाले ट्रूकॉलर, एमएक्स प्लेयर और लूडो स्टार जैसे ऐप भी शामिल हैं। मोबाइल नंबर जुटाने की भी कोशिश जांच में ‘डार्क कार्टोग्राफर’ नाम के एक अन्य समूह का भी पता चला। यह समूह विज्ञापनों के जरिए 30 से ज्यादा देशों में लोगों के मोबाइल नंबर पता लगाने की कोशिश कर रहा था। भास्कर एनालिसिस: 6 पॉइंट में समझें, कैसे होती थी जासूसी 1. निशाना कैसे बनाते थे? हैकिंग करने वाले सामान्य विज्ञापनों के जरिए फोन और कंप्यूटर तक पहुंचने की कोशिश करते थे। इसके लिए यूजर का विज्ञापन पर क्लिक करना जरूरी नहीं था। कुछ मामलों में विज्ञापन स्क्रीन पर दिखाई दिए बिना भी कोड डिवाइस तक पहुंच सकता था। 2. डिवाइस की पहचान कैसे करते थे? विज्ञापन से जुड़े कोड के जरिए यह पता लगाने की कोशिश होती थी कि कौन-सा व्यक्ति किस ऐप या वेबसाइट का इस्तेमाल कर रहा है। डिवाइस से जुड़ी जानकारी भी जुटाई जाती थी। 3. जासूसी सॉफ्टवेयर कैसे पहुंचता था? पहले जुटाई गई जानकारी के आधार पर चुनिंदा डिवाइस को निशाना बनाया जाता था। विज्ञापन के जरिए उन डिवाइस तक जासूसी सॉफ्टवेयर पहुंचाने की कोशिश होती थी। यूजर को इसकी जानकारी नहीं होती थी। 4. कितने बड़े पैमाने पर हुई कोशिश? जांच के मुताबिक, डिस्कवर टेक ने 161 देशों में विज्ञापन दिखाने की कोशिश की। कंपनी के एक सर्वर पर जनवरी से जून 2026 के बीच 36.4 लाख से ज्यादा संभावित यूजर्स के रिकॉर्ड मिले। इन यूजर्स के डिवाइस तक कोड पहुंचाने की व्यवस्था थी। जांचकर्ताओं के मुताबिक, इस नेटवर्क का दायरा इससे भी बड़ा हो सकता है। 5. हमले पकड़ में क्यों नहीं आए? विज्ञापन सामान्य दिखाई देते थे और हर यूजर को एक जैसा कोड नहीं भेजा जाता था। चुनिंदा डिवाइस को ही निशाना बनाए जाने से इस गतिविधि का पता लगाना मुश्किल हो सकता था। 6. गूगल ने क्या कार्रवाई की? रिपोर्ट के मुताबिक, डिस्कवर टेक 2020 से गूगल की प्रमाणित विज्ञापन कंपनियों की सूची में शामिल थी। सिटिजन लैब के खुलासे के बाद गूगल ने कंपनी को इस सूची से हटा दिया। ये आंकड़े विज्ञापनों के रिकॉर्ड से जुड़े हैं। सीधे हैक हुए डिवाइस या जासूसी के शिकार यूजर्स की संख्या नहीं है। बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स और रक्षा एजेंसियों तक पहुंचे विज्ञापन जांच में बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, फॉक्स न्यूज, सीबीसी और याहू जैसी वेबसाइटों पर संदिग्ध विज्ञापन दिखने के रिकॉर्ड मिले। इनके अलावा अमेरिका के रक्षा विभाग, स्वीडन के सशस्त्र बलों और नॉर्वे की पुलिस के नेटवर्क तक भी विज्ञापन पहुंचे। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के नेटवर्क पर भी ऐसे विज्ञापन दिखे। कई देशों के सरकारी कार्यालयों और चुनावों की निगरानी करने वाली संस्थाओं के नेटवर्क भी इनके निशाने पर रहे। ————————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने भारत पर 100% टैरिफ लगाने वाला कानून रोका: बोले-इसमें अमेरिका का फायदा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने रूस पर सख्त प्रतिबंध लगाने वाले कानून को फिलहाल रोक दिया है। ट्रम्प ने शुक्रवार को इस फैसले से जुड़े आदेश पर हस्ताक्षर किए और कहा कि यह कदम अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने चुनाव के बाद सत्ता गंवाने का खतरा है। उनके अपने दक्षिणपंथी खेमे की छोटी पार्टियां उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। इनके कारण वोट बंट सकते हैं। वहीं, चुनाव के बाद ये पार्टियां नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से भी इनकार कर सकती हैं। चुनाव से 11 दिन पहले नेतन्याहू इन पार्टियों के वोट अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी को विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाने में जुटे हैं, ताकि प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। 1. नेतन्याहू के लिए छोटी पार्टियां क्यों बनीं चुनौती? इजराइल में दक्षिणपंथी वोटों के लिए बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को ओफर विंटर और योआज हेंडेल की पार्टियों से चुनौती मिल रही है। नेतन्याहू चाहते हैं कि दक्षिणपंथी मतदाता उनकी पार्टी को वोट दें, ताकि चुनाव के बाद उनकी सरकार बनाने की संभावना मजबूत रहे। नेतन्याहू ने विंटर की पार्टी को वोट न देने की अपील की है। उन्हें डर है कि विंटर दक्षिणपंथी वोट लेकर चुनाव के बाद एविगडोर लिबरमैन के साथ जा सकते हैं। यानी वोट मिलने के बावजूद नेतन्याहू को इन पार्टियों का समर्थन मिले, यह जरूरी नहीं है। 2. वोट बंटने से नेतन्याहू को कैसे नुकसान हो सकता है? 3. विंटर ने नेतन्याहू को समर्थन देने पर शर्त रखी 4. विपक्ष में भी PM पद के लिए एक नाम पर सहमति नहीं नेतन्याहू को हराने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों में भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि उनकी पार्टी याशर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बने। इसके लिए वे दूसरी विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं। आइजनकोट का मानना है कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने से प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत होगा। लेकिन इससे दूसरी विपक्षी पार्टियों को नुकसान हो सकता है। ऐसे में चुनाव के बाद नेतन्याहू के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट हो पाएंगे या नहीं, यह भी अहम होगा। नेतन्याहू को देश के लिए खतरा मानते हैं आइजनकोट आइजनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। उनका कहना है कि किसी नेता की पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके नतीजों से होती है। उन्होंने नेतन्याहू को एंटी-लीडर बताते हुए कहा कि किसी भी नाकामी की जिम्मेदारी नेता को खुद लेनी चाहिए, लेकिन नेतन्याहू ऐसा नहीं करते। आइजनकोट का मानना है कि देश को ऐसी सरकार चाहिए, जो गलतियों की जिम्मेदारी ले और इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाए। आइजनकोट की पार्टी याशर विपक्षी खेमे का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही है। लेख में दिए गए सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नेता के सवाल पर आइजनकोट नेतन्याहू से आगे चल रहे थे। एक सर्वे में उन्हें 41% और नेतन्याहू को 38% लोगों ने पसंद किया। दूसरे सर्वे में आइजनकोट को 44% और नेतन्याहू को 38% समर्थन मिला। 5. बहुमत के बिना भी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे आइजनकोट इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए आमतौर पर 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बन सकती है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट इसी संभावना पर विचार कर रहे हैं। वे ऐसी सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने पर संसद में मंजूरी मिल जाए। हालांकि, यह अभी सिर्फ एक संभावना है। आइजनकोट के लिए सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। 6. सरकार नहीं बनी तो कार्यवाहक PM बने रह सकते हैं नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द नई सरकार बने, ताकि बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री न बने रहें। इजराइल में अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच पांच बार चुनाव हुए थे। इस दौरान नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। आइजनकोट इसी स्थिति से बचने के लिए अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि, इसके लिए भी उन्हें संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा। ——————- ये खबर भी पढ़ें… चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते नेतन्याहू:बोले- तेहरान ने हमला किया तब भी विरोधी मुझे जिम्मेदार ठहराएंगे; 27 अक्टूबर को वोटिंग इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने चुनाव के बाद सत्ता गंवाने का खतरा है। उनके अपने दक्षिणपंथी खेमे की छोटी पार्टियां उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही हैं। इनके कारण वोट बंट सकते हैं। वहीं, चुनाव के बाद ये पार्टियां नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से भी इनकार कर सकती हैं। चुनाव से 11 दिन पहले नेतन्याहू इन पार्टियों के वोट अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी को विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाने में जुटे हैं, ताकि प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। 1. नेतन्याहू के लिए छोटी पार्टियां क्यों बनीं चुनौती? इजराइल में दक्षिणपंथी वोटों के लिए बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को ओफर विंटर और योआज हेंडेल की पार्टियों से चुनौती मिल रही है। नेतन्याहू चाहते हैं कि दक्षिणपंथी मतदाता उनकी पार्टी को वोट दें, ताकि चुनाव के बाद उनकी सरकार बनाने की संभावना मजबूत रहे। नेतन्याहू ने विंटर की पार्टी को वोट न देने की अपील की है। उन्हें डर है कि विंटर दक्षिणपंथी वोट लेकर चुनाव के बाद एविगडोर लिबरमैन के साथ जा सकते हैं। यानी वोट मिलने के बावजूद नेतन्याहू को इन पार्टियों का समर्थन मिले, यह जरूरी नहीं है। 2. वोट बंटने से नेतन्याहू को कैसे नुकसान हो सकता है? 3. विंटर ने नेतन्याहू को समर्थन देने पर शर्त रखी 4. विपक्ष में भी PM पद के लिए एक नाम पर सहमति नहीं नेतन्याहू को हराने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों में भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि उनकी पार्टी याशर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बने। इसके लिए वे दूसरी विपक्षी पार्टियों के समर्थकों को अपनी ओर लाने की कोशिश कर रहे हैं। आइजनकोट का मानना है कि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने से प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत होगा। लेकिन इससे दूसरी विपक्षी पार्टियों को नुकसान हो सकता है। ऐसे में चुनाव के बाद नेतन्याहू के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट हो पाएंगे या नहीं, यह भी अहम होगा। नेतन्याहू को देश के लिए खतरा मानते हैं आइजनकोट आइजनकोट का आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। उनका कहना है कि किसी नेता की पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके नतीजों से होती है। उन्होंने नेतन्याहू को एंटी-लीडर बताते हुए कहा कि किसी भी नाकामी की जिम्मेदारी नेता को खुद लेनी चाहिए, लेकिन नेतन्याहू ऐसा नहीं करते। आइजनकोट का मानना है कि देश को ऐसी सरकार चाहिए, जो गलतियों की जिम्मेदारी ले और इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाए। आइजनकोट की पार्टी याशर विपक्षी खेमे का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही है। लेख में दिए गए सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त नेता के सवाल पर आइजनकोट नेतन्याहू से आगे चल रहे थे। एक सर्वे में उन्हें 41% और नेतन्याहू को 38% लोगों ने पसंद किया। दूसरे सर्वे में आइजनकोट को 44% और नेतन्याहू को 38% समर्थन मिला। 5. बहुमत के बिना भी सरकार बनाने की कोशिश करेंगे आइजनकोट इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए आमतौर पर 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बन सकती है। विपक्षी नेता गादी आइजनकोट इसी संभावना पर विचार कर रहे हैं। वे ऐसी सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने पर संसद में मंजूरी मिल जाए। हालांकि, यह अभी सिर्फ एक संभावना है। आइजनकोट के लिए सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। 6. सरकार नहीं बनी तो कार्यवाहक PM बने रह सकते हैं नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजनकोट चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द नई सरकार बने, ताकि बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री न बने रहें। इजराइल में अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच पांच बार चुनाव हुए थे। इस दौरान नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। आइजनकोट इसी स्थिति से बचने के लिए अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि, इसके लिए भी उन्हें संसद में जरूरी समर्थन जुटाना होगा। ——————- ये खबर भी पढ़ें… चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते नेतन्याहू:बोले- तेहरान ने हमला किया तब भी विरोधी मुझे जिम्मेदार ठहराएंगे; 27 अक्टूबर को वोटिंग इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

