दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Hormuz Strait) पर पिछले कुछ महीनों से काफी तनाव था। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच संघर्ष के कारण तेल का परिवहन रुक गया था, जिससे पूरी दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अच्छ
Gold Silver Prices: सोने और चांदी की कीमतों में मंगलवार को बड़ी गिरावट देखने को मिली। विदेशी बाजारों में डॉलर मजबूत होने के कारण दोनों कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ गया। राष्ट्रीय राजधानी के सर्राफा बाजार में सोना ₹3,000 टूटकर ₹1.49 लाख प्रति 10 ग्राम पर आ गया। वहीं, चांदी ₹10,500 लुढ़ककर ₹2.35 लाख प्रति किलो पर पहुंच गई।
ऑल इंडिया सर्राफा एसोसिएशन के मुताबिक, 24 कैरेट वाला सोना 2% गिरकर ₹1,49,300 प्रति 10 ग्राम रह गया। इससे पहले सोना 27 मार्च को करीब इसी स्तर पर ₹1,47,800 प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था।
चांदी में और बड़ी गिरावट देखने को मिली। इसकी कीमत 4.3% यानी ₹10,500 घटकर ₹2,35,000 प्रति किलो रह गई। यह दो महीने से ज्यादा समय का निचला स्तर है। इससे पहले 3 अप्रैल को चांदी ₹2,37,000 प्रति किलो पर थी।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दबाव
विदेशी बाजार में स्पॉट गोल्ड करीब 2% यानी 70.33 डॉलर टूटकर 4,121.10 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। वहीं चांदी 4% से ज्यादा गिरकर 62.27 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करती दिखी।
सोना-चांदी क्यों टूट रहे हैं?
HDFC Securities के सीनियर कमोडिटी एनालिस्ट सौमिल गांधी के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका की वजह से सोने-चांदी पर दबाव बना हुआ है। एनालिस्टों का कहना है कि फिलहाल डॉलर की मजबूती बुलियन बाजार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
Kotak Securities की कमोडिटी रिसर्च प्रमुख कायनात चैनवाला के अनुसार, सोमवार को अमेरिका-ईरान वार्ता में प्रगति की खबरों से सोने को थोड़ी राहत मिली थी। हालांकि, यह तेजी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। ब्याज दरों को लेकर बढ़ती चिंताओं ने फिर से बाजार पर दबाव बना दिया।
फेडरल रिजर्व की चिंता बढ़ा रही दबाव
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना भी निवेशकों को परेशान कर रही है। डॉलर इंडेक्स बढ़कर 101.15 पर पहुंच गया, जो मई 2025 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।
ट्रेडर्स अब एक और ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना को कीमतों में शामिल कर रहे हैं। यही वजह है कि निवेशक सोने और चांदी से दूरी बना रहे हैं।
आगे क्या रह सकता है रुख?
LKP Securities के रिसर्च एनालिस्ट जतीन त्रिवेदी का कहना है कि डॉलर इंडेक्स 101 के ऊपर बने रहने से सोने पर दबाव जारी है। साथ ही अमेरिका-ईरान वार्ता को लेकर बनी अनिश्चितता भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर रही है।
अब निवेशकों की नजर अगले हफ्ते आने वाले अमेरिका के नॉन-फार्म पेरोल (NFP) और बेरोजगारी के आंकड़ों पर रहेगी। ये आंकड़े डॉलर और सोने की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
अब किस ओर जाएंगे दाम
जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, निकट भविष्य में सोना ₹1,44,500 से ₹1,48,500 प्रति 10 ग्राम के दायरे में कारोबार कर सकता है।
वहीं Augmont Bullion की रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 4,200 डॉलर के स्तर से नीचे फिसल चुका है। अब इसका अगला अहम सपोर्ट 4,050-4,100 डॉलर के बीच माना जा रहा है, जो घरेलू बाजार में करीब ₹1.43 लाख से ₹1.44 लाख प्रति 10 ग्राम के बराबर है।
चांदी भी 65 डॉलर का अहम स्तर तोड़ चुकी है। अब इसका अगला सपोर्ट 60-61 डॉलर प्रति औंस के बीच माना जा रहा है। भारतीय बाजार में यह स्तर करीब ₹2.15 लाख से ₹2.20 लाख प्रति किलो के बराबर बैठता है।
Gold Silver Prices: सोने-चांदी में बड़ी गिरावट, ETF भी टूटा; ये 5 कारण हैं जिम्मेदार
Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।
अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर होने के बाद अब दुनिया का ध्यान लड़ाई से हटकर उसके बड़े असर पर केंद्रित हो गया है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आने वाले तेल की सप्लाई को लेकर है। अगर इस अहम समुद्री मार्ग में कोई रुकावट आती है तो इसका असर भारत समेत कई देशों की ऊर्जा जरूरतों पर पड़ सकता है। इस स्थिति ने एक बार फिर यह चर्चा शुरू कर दी है कि भारत ने पिछले कई दशकों में पश्चिम एशिया के बड़े संकटों से कैसे निपटा है। 1973 के योम किप्पुर युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रवैया और हाल के इज़राइल-ईरान तनाव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया, भारत की विदेश नीति के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को दिखाती है।
एक ओर पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का रुख राजनीतिक और वैचारिक समर्थन पर आधारित था, जबकि दूसरी ओर नरेंद्र मोदी की सरकार ने रणनीतिक और व्यावहारिक नीति को प्राथमिकता दी है। आज भारत अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संबंधों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। योम किप्पुर युद्ध अक्टूबर 1973 में शुरू हुआ था। उस समय मिस्र और सीरिया ने अचानक इजरायल पर हमला कर दिया था। इसके बाद यह संघर्ष तेजी से एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल गया। इस टकराव में अमेरिका, सोवियत संघ और अरब देशों के प्रमुख तेल उत्पादक राष्ट्र भी शामिल हो गए थे, जिससे पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई थी।
पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का रुख
1973 के युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुलकर अरब देशों का समर्थन किया था। भारत ने इस संघर्ष के लिए इज़रायल को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसकी सख्त और अड़ियल नीतियां ही क्षेत्र में तनाव और दुश्मनी की मुख्य वजह हैं। भारत ने अरब देशों और फिलिस्तीन के मुद्दे का मजबूती से समर्थन किया। उस समय भारत की विदेश नीति भी काफी हद तक इसी दिशा में थी। हालांकि, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन देने के बावजूद भारत को इसका कोई खास आर्थिक फायदा नहीं मिला।
युद्ध के बाद दुनिया तेल संकट की चपेट में आ गई। कई अरब देशों ने तेल उत्पादन और आपूर्ति को लेकर सख्त कदम उठाए, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। रिपोर्टों के मुताबिक, कच्चे तेल का दाम करीब 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 12 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। तेल की कीमतों में इस भारी बढ़ोतरी का असर भारत पर भी पड़ा। देश को तेल आयात करने के लिए पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़ा, जिससे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया।
हालांकि युद्ध खत्म होने के बाद भी भारत का फिलिस्तीन के प्रति समर्थन जारी रहा। वर्ष 1974 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को पर्यवेक्षक का दर्जा दिलाने की कोशिश का समर्थन किया। इसके एक साल बाद भारत पीएलओ को आधिकारिक मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बन गया। भारत ने नई दिल्ली में पीएलओ का कार्यालय खोलने की भी अनुमति दी। इसके अलावा, भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का भी समर्थन किया था, जिसमें ज़ायोनीवाद को नस्लवाद के समान बताया गया था।
इन फैसलों से साफ होता है कि उस समय भारत के अरब देशों और फिलिस्तीन के साथ काफी करीबी संबंध थे। भारत का मानना था कि इस क्षेत्र के साथ मजबूत राजनीतिक रिश्ते उसके रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी फायदा पहुंचाएंगे। उस दौर में भारत की मध्य पूर्व के तेल पर निर्भरता लगातार बढ़ रही थी। ऐसे में सरकार को उम्मीद थी कि अरब देशों के साथ अच्छे संबंध देश की ऊर्जा सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करने में मदद करेंगे।
मोदी सरकार का रुख
योम किप्पुर युद्ध के लगभग 50 साल बाद पश्चिम एशिया में एक और बड़ा तनाव देखने को मिला। इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने दुनिया भर की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बढ़ी, जो दुनिया में तेल आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। अगर इस रास्ते में किसी तरह की रुकावट आती है, तो इसका असर पूरी दुनिया के तेल कारोबार पर पड़ सकता है। भारत के लिए यह चिंता और भी बड़ी है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किए गए तेल से पूरा करता है।
दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल भारत के लिए इस तरह का तनाव आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है। खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक संकट रहने पर तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, आयात पर खर्च बढ़ सकता है और महंगाई में तेजी आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई चीजों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इससे देश की आर्थिक विकास दर पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
हालांकि, 1973 के मुकाबले इस बार भारत का रुख काफी अलग रहा। इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को भारत ने किसी राजनीतिक पक्ष के नजरिए से नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता के आधार पर देखा। भारत ने किसी एक देश का खुलकर समर्थन करने के बजाय शांति, बातचीत और तनाव कम करने पर जोर दिया। मोदी सरकार लगातार यह कहती रही कि सभी पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालें और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखें।
नई दिल्ली ने इज़रायल, ईरान और खाड़ी देशों समेत पश्चिम एशिया के सभी प्रमुख देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखे। भारत ने किसी एक खेमे में शामिल होने के बजाय संतुलित नीति अपनाई, ताकि हर परिस्थिति में उसके राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहें। इस सोच को अक्सर “भारत पहले” नीति कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चाहे क्षेत्रीय संघर्ष किसी भी दिशा में जाए, भारत की ऊर्जा जरूरतें, आर्थिक हित और कूटनीतिक संबंध प्रभावित न हों।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुख इस पूरे संकट के दौरान व्यावहारिक और स्पष्ट रहा। भारत ने हालात बिगड़ने का इंतजार करने के बजाय पहले से ही जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए। केंद्र सरकार ने कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए नए और अलग-अलग स्रोतों पर ध्यान दिया, ताकि किसी एक क्षेत्र पर ज्यादा निर्भरता न रहे। साथ ही, तेल भंडार को मजबूत करने और रिफाइनरियों का काम लगातार जारी रखने पर भी जोर दिया गया, जिससे देश में ईंधन की आपूर्ति प्रभावित न हो।
भारत ने यह भी सुनिश्चित किया कि ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर किसी तरह का असर कम से कम पड़े। इसके लिए सरकार ने क्षेत्र के सभी प्रमुख देशों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में रहने और काम करने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी गई। भारत ने संघर्ष में शामिल सभी पक्षों के साथ अपने कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बनाए रखे, ताकि जरूरत पड़ने पर भारतीयों की मदद की जा सके और देश के आर्थिक हित सुरक्षित रहें। इस तरह भारत ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को सबसे अधिक महत्व दिया।
बाजार अगले 6-12 महीनो में नई ऊंचाई पर पहुंच सकता है। इनविजन कैपिटल के फाउंडर नीलेश शाह ने यह अनुमान जताया है। उन्होंने पेटीएम के शेयरों में तेजी जारी रहने की उम्मीद जताई है। उनका मानना है कि अच्छी अर्निंग्स ग्रोथ, अनुकूल पॉलिसी और बेहतर होते इनवेस्टर सेंटिमेंट से अगली कुछ तिमाही में पेटीएम के शेयरों में तेजी जारी रह सकती है।
बाजार अगले चरण की तेजी के लिए तैयार
उन्होंने कहा कि लंबे समय तक कंसॉलिडेशन के बाद शेयर बाजारों में अगले चरण की तेजी के लिए एक मजबूत बुनियाद बनी है। बैंकिंग और आईटी जैसे सेक्टर में अच्छी अर्निंग्स ग्रोथ दिख सकती है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) की खरीदारी भी फिर से शुरू होने की उम्मीद है। इससे अगले 6 से 12 महीनों में बाजार के प्रमुख सूचकांक नई ऊंचाई पर पहुंच सकते हैं।
इन वजहों से बढ़ेगी कॉर्पोरेट अर्निंग्स
उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि कंपनियों की अर्निंग्स बढ़ने के बड़े कारण हैं। अगली कुछ तिमाहियों में स्ट्रॉन्ग ग्रोथ दिख सकती है। बीती कुछ तिमाहियों में पॉलिसी के स्तर पर जो कदम उठाए गए हैं, उनका पूरा असर अभी कंपनियों की अर्निंग्स पर नहीं दिखा है।” उन्होंने कहा कि अगर सरकार नए रिफॉर्म्स करती है तो इससे विदेशी कैपिटल की आवक शुरू हो सकती है।
इन सेक्टर का प्रदर्शन कंसॉलिडेशन के दौरान भी बेहतर
शाह ने कहा कि कुल मिलाकर आउटलुक कंस्ट्रक्टिव लगता है। ऐसा लगता है कि बुरा दौर बीत चुका है। उन्होंने उन सेक्टर्स को अपनी पसंद बताया, जिनका प्रदर्शन बाजार में कंसॉलिडेशन के दौरान भी अच्छा रहा। इनमें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, डिफेंस और एयरोस्पेस कंपनियां शामिल हैं।
आने वाले हैं बाजार में बड़े आईपीओ
उन्होंने कहा कि एनएसई और एनएसडीएल के आईपीओ आने वाले हैं। मार्केट में लिक्विडिटी का एक बड़ा हिस्सा इन शेयरों में जाएगा। हालांकि, म्यूचु्अल फंड्स और सिप के जरिए अच्छा निवेश हो रहा है, जिससे मार्केट में अतिरिक्त सप्लाई से कोई निगेटिव असर नहीं पड़ेगा।
यह भी पढ़ें: यूएस फ्यूचर्स, भारत, दक्षिण कोरिया सहित दुनियाभर के शेयर बाजारों में मचा कोहराम
बाजार का सेंटीमेंट अब हो रहा बेहतर
बीते कुछ महीनों में बाजार पर बड़ा दबाव दिखा था, जिसकी वजह मध्यपूर्व में टेंशन से क्रूड की कीमतों में उछाल था। अब क्रूड की कीमतें नीचे आ रही हैं। इसका पॉजिटिव असर मार्केट पर पड़ा है। अमेरिका-ईरान के बीच डील की खबर का भी बाजार पर पॉजिटिव असर पड़ा है।
Gold Silver Prices: सोने और चांदी में मंगलवार को बड़ी गिरावट दिखी। यह ट्रेंड वैश्विक और घरेलू, दोनों बाजारों में दिखा। गोल्ड और सिल्वर ETF भी लाल निशान में ट्रेड करते नजर आए। इसकी वजह फेडरल रिजर्व का रुख और भू-राजनीतिक घटनाक्रम हैं।
ऑल इंडिया ज्वेलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (AIJGF) के राष्ट्रीय महासचिव नितिन केडिया का कहना है कि सितंबर में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने की आशंका है। वहीं, बैंक ऑफ अमेरिका ने 2026 में तीन बार ब्याज दर बढ़ने का अनुमान दिया है। इस फैक्टर ने भी निवेशकों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
सोने और चांदी में कितनी गिरावट
गोल्ड दोपहर 2.40 बजे तक करीब 2100 रुपये यानी 1.42% की गिरावट के साथ 1,46,010 रुपये प्रति 10 ग्राम पर था। हालांकि, एक वक्त यह गिरकर 1,45,510 रुपये तक पर आ गया था। वहीं, चांदी 7300 रुपये यानी 3% से ज्यादा टूटकर 2,27,010 प्रति किलो पर थी। ये भी कारोबार के दौरान गिरकर 2,25,666 रुपये तक आ गई थी।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार की बात करें, तो वहां सोना करीब 2% गिरावट के साथ ट्रेड कर रहा था। वहीं, चांदी में 5% से ज्यादा की गिरावट आई है। गोल्ड और सिल्वर ETF भी लगभग इतना ही टूटे हैं।
गोल्ड-सिल्वर गिरने के 5 बड़े कारण
फेडरल रिजर्व के कड़े संकेत: अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने संकेत दिए हैं कि महंगाई को काबू में रखने के लिए इस साल ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है। ब्याज दरें बढ़ने से निवेशक बॉन्ड्स में निवेश करना पसंद करते हैं। क्योंकि सोने-चांदी में ब्याज नहीं मिलता।
ब्याज दर बढ़ने का अनुमान: बैंक ऑफ अमेरिका ने 2026 में ब्याज दरों में तीन बार बढ़ोतरी का अनुमान दिया है। इसके चलते भी निवेशकों ने सोने और चांदी में बिकवाली बढ़ा दी है।
निवेशकों की मुनाफावसूली: ब्याज दर में बढ़ोतरी की आशंका से निवेशक गोल्ड और सिल्वर में मुनाफावसूली भी कर रहे हैं। गोल्ड-सिल्वर ETF में भी प्रॉफिट बुकिंग दिख रही है।
अमेरिकी डॉलर: डॉलर इंडेक्स में बढ़ोतरी देखने को मिली है। डॉलर मजबूत होने से विदेशी मुद्रा रखने वाले खरीदारों के लिए सोना-चांदी महंगा हो जाता है। इससे ग्लोबल डिमांड पर असर दिखता है।
भू-राजनीतिक तनाव में कमी: अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की बातचीत में सकारात्मक प्रगति हुई है। इससे वैश्विक स्तर पर जोखिम में कुछ नरमी आई है। ऐसे में निवेशक सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने और चांदी से अपना पैसा निकाल रहे हैं।
EPF खाताधारकों के लिए बड़ी खुशखबरी! जल्द खाते में आएगा ब्याज का पैसा, ऐसे चेक करें बैलेंस
Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।
South Korea Stock Market: दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार में 23 जून को कोहराम मच गया। बाजार का प्रमुख सूचकांक कोस्पी 9.99 फीसदी क्रैश कर गया। पहले 8 फीसदी क्रैश करने के बाद ट्रेडिंग 20 मिनट के लिए रोक दी गई। दोबारा ट्रेडिंग शुरू होने पर गिरावट और बढ़ गई। अचानक आई इस बड़ी गिरावट ने इनवेस्टर्स को हैरान कर दिया है।
सेमीकंडक्टर शेयरों में आया था बड़ा उछाल
दक्षिण कोरिया का बाजार इस साल सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाले बाजारों में शामिल था। कोस्पी ने ऊंचाई के कई नए रिकॉर्ड बनाए थे। इसकी बड़ी वजह सेमीकंडक्टर कंपनियों के शेयरों में उछाल थी। विदेशी इनवेस्टर्स ने इन शेयरों में खूब पैसे लगाए। इससे इन कंपनियों के शेयरों में अप्रत्याशित तेजी आई थी। लेकिन, 23 जून को आई गिरावट ने इस तेजी पर बड़ा ब्रेक लगा दिया है।
SK Hynix का शेयर 10 फीसदी से ज्यादा फिसला
सबसे ज्यादा गिरावट SK Hynix के शेयरों में दिखी। यह 10 फीसदी से ज्यादा क्रैश कर गया। Samsung Electronics का शेयर 7.5 फीसदी क्रैश कर गया। बताया जाता है कि सर्किट ब्रेकर हटने के बाद दोबारा ट्रेडिंग शुरू होने पर सैमसंग के शेयरों पर बिकवाली का दबाव बढ़ गया। इससे यह शेयर 9 फीसदी से ज्यादा क्रैश कर गया।
विदेशी निवेशकों ने बेचे 2.6 अरब डॉलर के शेयर
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने दोपहर तक 2.6 अरब डॉलर के शेयर बेचे, जिससे बाजार पर दबाव बढ़ गया। हालांकि, रिटेल ट्रेडर्स ने इस गिरावट में अपनी पोजीशन बढ़ाई। इस महीने कोस्पी 9,000 का लेवल पार कर गया था। इसकी वजह अमेरिका-ईरान में डील की खबर थी। पहले पार कोस्पी इस लेवल पर पहुंचा था।
कई शेयरों की कीमतें एक साल में तीन गुनी
दक्षिण कोरिया के बाजार में लगातार जबर्दस्त तेजी से रिस्क बढ़ गया था। कई शेयरों की कीमतें एक साल में तीन गुनी हो गई हैं। SK Hynix का शेयर इस साल 350 फीसदी से ज्यादा चढ़ा है। इसने प्रतिद्वंद्वी कंपनी सैमसंग के शेयरों को पीछे छोड़ दिया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि चिप बनाने वाली कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी से शेयर की कीमतें आसमान में पहुंच गईं। इसमें लेवरेज्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड का बड़ा हाथ है।
इन शेयरों में भी बड़ी गिरावट
स्टॉक मार्केट में गिरने वाले शेयरों की संख्या गिरने वाले शेयरों के मुकाबले काफी ज्यादा थी। LG Energy Solution का शेयर 2.98 फीसदी नीचे चल रहा था। Hyundai Motor का शेयर 8.78 क्रैश कर गया था। Kia Corp के शेयरों में 6.47 फीसदी गिरावट आई।
यह भी पढ़ें: Share Market Crash: तीन वजहों से मार्केट धड़ाम, Sensex में डे-हाई से 500 अंकों की गिरावट, Nifty आया 24000 के नीचे
इन वजहों से बाजार में गिरावट
एनालिस्ट्स का कहना है कि दक्षिण कोरिया में आज आई गिरावट की कई वजहें हैं। इनमें सबसे बड़ी वजह प्रॉफिट बुकिंग है। दूसरा, इस साल आई बड़ी तेजी की वजह से कई शेयरों की वैल्यूएशंस काफी बढ़ गई थीं। बाजार में एआई शेयरों के दम पर बाजार में आई तेजी के टिकने को लेकर संदेह जताया जा रहा था।
अमेरिकी और ईरान के बीच हुए समझौते पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई। नेतन्याहू ने साफ-साफ कहा था कि शांति समझौते हो ना हो मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने दूंगा। अब ने
अमेरिकी और ईरान के बीच हुए समझौते पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई। नेतन्याहू ने साफ-साफ कहा था कि शांति समझौते हो ना हो मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने दूंगा। अब ने
Stock Market Recovery: निफ्टी की वीकली एक्सपायरी के दिन आज शुरुआती कारोबार में घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज सेंसेक्स और निफ्टी 50 लाल खुले। हालांकि शुरुआती गिरावट से उबरते हुए ये ग्रीन हो गए। इंट्रा-डे के निचले स्तर से सेंसेक्स प्वाइंट्स रिकवर हुआ तो निफ्टी भी एक बार फिर 24100 के पार पहुंच गया। ब्रोडर लेवल पर मार्केट में रौनक बनी हुई है और स्मॉलकैप स्पेस में तो अधिक ही। निफ्टी मिडकैप 100 में आधे फीसदी से कम बढ़त है तो निफ्टी स्मॉलकैप 100 में आधे फीसदी से अधिक।
अब इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज की बात करें तो फिलहाल 10:09 AM पर सेंसेक्स (Sensex) 68.59 प्वाइंट्स यानी 0.09% की मामूली बढ़त के साथ 77,162.66 और निफ्टी 50 (Nifty 50) भी 22.95 प्वाइंट्स यानी 0.10% की तेजी के साथ 24,125.85 पर है। इंट्रा-डे में सेंसेक्स 215.41 प्वाइंट्स टूटकर 76,878.66 तक आ गया था जिससे 313.97 प्वाइंट्स रिकवर होकर यह 77,192.6 तक पहुंचा तो निफ्टी 50 भी 62.85 प्वाइंट्स गिरकर 24,040.05 तक आया था जिससे यह 95.45 प्वाइंट्स चढ़कर 24,135.50 तक पहुंच गया।
Stock Market Recovery: ये है वजह
कच्चे तेल में फिसलन
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर बातचीत आगे बढ़ने से कच्चे तेल की सप्लाई सामान्य होने की उम्मीद बढ़ी है। इससे कच्चा तेल का भाव आज भी नरम पड़ा। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की आंच में ब्रेंट क्रूड एक समय उछलकर प्रति बैरल $120 के करीब पहुंच गया था लेकिन अब यह टूटकर $78 के भी नीचे आ चुका है।
Pharma Sector ने मार्केट को खींच लिया ऊपर
निफ्टी आईटी में डेढ़ फीसदी से अधिक और निफ्टी मेटल में 1% से अधिक की गिरावट को फार्मा सेक्टर ने अकेले संभाल लिया जिसका निफ्टी इंडेक्स 2% से अधिक मजबूत हुआ है। निफ्टी पीएसयू बैंक में आधे फीसदी से अधिक की गिरावट है लेकिन निफ्टी रियल्टी में 1% से अधिक उछाल है।
वैल्यू बाइंग
मार्केट में आज शुरुआती गिरावट का फायदा उठाते हुए निवेशकों ने निचले स्तर पर खरीदारी की जिससे मार्केट को सपोर्ट मिला।
India VIX में नरमी
मार्केट की घबराहट को मापने वाले वोलैटिलिटी इंडेक्स इंडिया वीआईएक्स की नरमी से मार्केट को सपोर्ट मिला। India VIX फिलहाल 2.49% की गिरावट के साथ 12.52 पर है। इसके अधिक होने का मतलब आने वाले दिनों में वोलैटिलिटी के हाई होने और कम होने का मतलब वोलैटिलिटी के कम होने की संभावना है।
Market Prediction Today: US-ईरान शांति समझौते को लेकर सावधानी के बीच, ग्लोबल मार्केट से मिले-जुले संकेतों को देखते हुए, भारतीय स्टॉक मार्केट के बेंचमार्क इंडेक्स, सेंसेक्स और निफ्टी 50, मंगलवार को फ्लैट खुलने की संभावना है। GIFT Nifty के ट्रेंड भी भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स के लिए धीमी शुरुआत का संकेत दे रहे है। गिफ्ट निफ्टी 24,130 के लेवल के आसपास ट्रेड कर रहा था, जो निफ्टी फ्यूचर्स के पिछले क्लोज से लगभग 6 पॉइंट्स का प्रीमियम है।
सोमवार को, US-ईरान शांति वार्ता में प्रोग्रेस की खबरों के बीच भारतीय स्टॉक मार्केट बढ़त के साथ बंद हुआ, जिसमें बेंचमार्क निफ्टी 50 24,100 के लेवल से ऊपर बंद हुआ।सेंसेक्स 291.17 पॉइंट्स या 0.38% बढ़कर 77,094.07 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 89.80 पॉइंट्स या 0.37% बढ़कर 24,102.90 पर बंद हुआ।
ओपनिंग बेल से पहले ग्लोबल संकेत मिले-जुले रहे
वॉल स्ट्रीट रात भर नीचे बंद हुआ, जिसमें टेक्नोलॉजी स्टॉक्स दबाव में रहे। नैस्डैक कंपोजिट 1.32 परसेंट गिरा और S&P 500 0.37 परसेंट गिरा, जिसकी वजह अल्फाबेट समेत बड़े टेक्नोलॉजी नामों में गिरावट रही। हालांकि, हेल्थकेयर और इंडस्ट्रियल स्टॉक्स में बढ़त से डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 0.29 परसेंट बढ़ा।
मंगलवार को एशियाई मार्केट भी धीमे रहे। जापान के बाहर एशिया-पैसिफिक शेयरों का MSCI का सबसे बड़ा इंडेक्स 0.5 परसेंट गिरा, जबकि जापान का निक्केई 0.6 परसेंट फिसला। साउथ कोरिया का कोस्पी लगभग 2 परसेंट गिरा, हालांकि ताइवानी इक्विटीज़ ने नई ऊंचाई को छुआ। इस साल के आखिर में फेडरल रिजर्व के और रेट बढ़ाने की बढ़ती उम्मीदों के बीच इन्वेस्टर सावधान रहे।
इस बीच, पिछले सेशन में तेज गिरावट के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं। ब्रेंट क्रूड लगभग $78 प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि US क्रूड $74 प्रति बैरल से ऊपर ट्रेड कर रहा था, क्योंकि इन्वेस्टर US-ईरान बातचीत में प्रोग्रेस का अंदाज़ा लगा रहे थे और होर्मुज स्ट्रेट से तेल के फ्लो की बहाली पर ज़्यादा क्लैरिटी का इंतज़ार कर रहे थे।
यह उछाल सोमवार को तेल की कीमतों में 3 परसेंट से ज़्यादा की गिरावट के बाद आया है, जब अमेरिका ने ईरान को 60 दिन के बैन से छूट दी और अधिकारियों ने डिप्लोमैटिक बातचीत में प्रोग्रेस पर ज़ोर दिया। इस बढ़ोतरी के बावजूद, क्रूड तेल लड़ाई के पीक के दौरान देखे गए लेवल से काफी नीचे है, जो भारत जैसी तेल इंपोर्ट करने वाली इकॉनमी के लिए एक सपोर्टिव बैकग्राउंड देता है।
क्या कहते है बाजार एक्सपर्ट
एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर के मुताबिक, डिप्लोमैटिक डेवलपमेंट सेंटीमेंट को सपोर्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “भारतीय बाज़ारों में सावधानी से पॉज़िटिव रुझान के साथ ट्रेड करने की उम्मीद है क्योंकि US-ईरान बातचीत में डिप्लोमैटिक प्रोग्रेस से इन्वेस्टर सेंटिमेंट को सपोर्ट मिल रहा है। US वाइस प्रेसिडेंट के इस कमेंट से कि प्रस्तावित एग्रीमेंट को फ़ाइनल करने के लिए ‘अच्छी नींव’ है, इस उम्मीद को और मज़बूत किया है कि बातचीत कंस्ट्रक्टिव रास्ते पर है, जिससे मिडिल ईस्ट में एक स्थायी समाधान की उम्मीदें बढ़ रही हैं।”
जियोपॉलिटिक्स के अलावा, इन्वेस्टर ट्रेड के मोर्चे पर भी डेवलपमेंट पर नज़र रखेंगे। US ट्रेड रिप्रेज़ेंटेटिव जैमीसन ग्रीर के इस हफ़्ते कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल के साथ बातचीत के लिए भारत आने की उम्मीद है, क्योंकि दोनों देश बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट की दिशा में काम कर रहे हैं। टैरिफ़ में छूट या बड़े ट्रेड सहयोग पर कोई भी प्रोग्रेस मार्केट सेंटिमेंट को और सपोर्ट कर सकती है।
एफआईआई फ्लो मिला-जुला
इंस्टीट्यूशनल फ़्लो मिले-जुले रहे। 22 जून को फ़ॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर (FII) नेट सेलर थे, जिन्होंने Rs 635 करोड़ के इक्विटी बेचे। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर (DII) ने Rs 1,000 करोड़ के शेयर खरीदकर सपोर्ट देना जारी रखा।
टेक्निकल मोर्चे पर, पोनमुडी ने कहा कि निफ्टी ज़रूरी सपोर्ट लेवल से ऊपर एक कंस्ट्रक्टिव स्ट्रक्चर बनाए हुए है। अभी की रुकावट 24,200 का निशान है, और इस लेवल से ऊपर लगातार ब्रेकआउट 24,400 की ओर बढ़ने का रास्ता बना सकता है। नीचे की तरफ, 24,000-23,900 ज़ोन एक ज़रूरी सपोर्ट एरिया बना हुआ है। इस रेंज से नीचे ब्रेक होने पर नई प्रॉफ़िट बुकिंग शुरू हो सकती है और इंडेक्स 23,800 की ओर जा सकता है।
(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

