Pakistan-Balochistan Conflict: ‘सेना हटाओ, हथियार यहीं छोड़कर जाओ..’; बलूचिस्तान का पाकिस्तान को फिर अल्टीमेटम

Pakistan-Balochistan Conflict: पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान को लेकर एक बार फिर बड़े स्तर पर तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। बलूच अलगाववादी नेता मीर यार बलूच ने पाकिस्तान को नया अल्टीमेटम जारी करते हुए क्षेत्र से सभी पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों को वापस बुलाने की मांग की है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की भी अपील की है।

मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान में पाकिस्तान की सेना पर बलूचिस्तान में अवैध रूप से तैनात होने और क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों तथा खनिजों के दोहन का आरोप लगाया। बयान में कहा गया कि पाकिस्तानी सैन्य मौजूदगी से बलूचिस्तान के लोगों की जान, संपत्ति और कारोबार को खतरा है।

पाकिस्तानी सेना को बताया ‘कब्जा करने वाली ताकत’

बयान में बलूचिस्तान की ओर से पाकिस्तानी सेना को एक आक्रमणकारी और कब्जा करने वाली ताकत करार दिया है। मीर यार बलूच ने दावा किया कि क्षेत्र में पाकिस्तानी सैन्य मौजूदगी स्थानीय लोगों के अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने पाकिस्तान से केवल सैनिकों को वापस बुलाने की मांग नहीं की, बल्कि सैन्य उपकरण भी बलूचिस्तान में छोड़ने को कहा है।

‘हथियार और उपकरण यहीं छोड़कर जाएं’

मीर यार बलूच ने मांग की है कि पाकिस्तान की सेना बलूचिस्तान से वापस जाते समय अपने युद्धक विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक, भारी तोपखाने, नौसैनिक पोत और अन्य सैन्य उपकरण बलूच बलों को सौंपे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के पास मौजूद ये सैन्य संसाधन कथित तौर पर बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों से हासिल धन से खरीदे गए हैं। इसलिए पाकिस्तान को इन्हें अपने साथ ले जाने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

1947 और 1971 का किया जिक्र

अपने बयान में मीर यार बलूच ने साल 1947 में ब्रिटिश शासन के भारत छोड़ने और 1971 में बांग्लादेश के युद्ध का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि जिस तरह ब्रिटेन भारत छोड़ते समय सैन्य हथियार और उपकरण भारत को सौंपकर गया था, उसी तरह 1971 में युद्ध के बाद पाकिस्तान ने भी बांग्लादेश में अपनी सैन्य संपत्ति वहां की सेनाओं के हवाले की थी।

उन्होंने इसी तर्ज पर पाकिस्तान से बलूचिस्तान से सेना हटाने की तारीख और डेडलाइन घोषित करने की मांग की। बयान में यह भी कहा गया कि पाकिस्तानी सेना को वापस जाते समय कथित तौर पर एक भी गोली साथ ले जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि, बलूच नेता का यह दावा कि पाकिस्तान बलूचिस्तान में जमीनी युद्ध हार चुका है, स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है।

1971 के बांग्लादेश युद्ध से की तुलना

मीर यार बलूच ने बलूचिस्तान की मौजूदा स्थिति की तुलना 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से की है। उन्होंने पाकिस्तान पर बलूचिस्तान में बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि बलूचिस्तान के लोग कथित अत्याचारों को नहीं भूलेंगे और पाकिस्तान को उनके मुताबिक निरर्थक युद्ध जारी रखने के बजाय अपनी सेनाएं वापस बुला लेनी चाहिए।

इंटरनेशनल समुदाय से ‘स्वतंत्र देश’ की मांग

बयान में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील की गई। साथ ही पाकिस्तान की सैन्य वापसी सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम उठाने का आग्रह किया गया। मीर यार बलूच ने पाकिस्तान की रक्षा, सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और खनिज संसाधनों की निगरानी से जुड़े बलों के अलावा पाकिस्तानी वायुसेना और नौसेना की मौजूदगी खत्म करने की भी मांग की। उन्होंने बलूचिस्तान में तैनात गैर-बलूच पाकिस्तानी नागरिकों से भी सेना, फ्रंटियर कॉर्प्स, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थानों से क्षेत्र छोड़ने की अल्टीमेटम दिया।

‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ का ऐलान

यह बयान ऐसे समय आया है जब 11 अगस्त को बलूच अलगाववादी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के गठन की घोषणा करने का दावा किया था। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बलूचिस्तान की पाकिस्तान से स्वतंत्रता को मान्यता देने की अपील की थी। बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बना हुआ है।

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अलगाववादी संगठन पाकिस्तान से स्वतंत्रता की मांग करते हैं और इस्लामाबाद पर राजनीतिक उपेक्षा तथा क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों के कथित शोषण का आरोप लगाते हैं। वहीं, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) समेत अलगाववादी समूह पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और सरकारी दफ्तरों पर हमलों की जिम्मेदारी लेते रहे हैं। इसके जवाब में पाकिस्तान सरकार ने सुरक्षा अभियान तेज किए हैं।

पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या कितनी? आसिफ अली जरदारी के दावे और जनगणना के आंकड़ों में कितना फर्क, जानें कहां रहते हैं

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने हाल ही में देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों और हिंदू समुदाय की स्थिति पर बात की। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी करीब 4 फीसदी बताई। हालांकि, पाकिस्तान की हालिया जनगणना के आंकड़े इस दावे से अलग तस्वीर दिखाते हैं। इससे हिंदू आबादी को लेकर दिए गए आंकड़े पर सवाल उठने लगे हैं।

पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या कितनी?

पाकिस्तान की 2023 की जनगणना के अनुसार, देश में 38,67,729 लोगों ने खुद को हिंदू बताया, जो कुल आबादी का करीब 1.61 फीसदी है। वहीं, 13,49,487 लोगों को शेड्यूल्ड कास्ट की श्रेणी में दर्ज किया गया, जो 0.56 फीसदी है। दोनों आंकड़ों को जोड़ने पर यह संख्या 52,17,216 यानी कुल आबादी का करीब 2.17 फीसदी बैठती है। यानी पाकिस्तान के आधिकारिक जनगणना आंकड़ों में हिंदू आबादी 4 फीसदी नहीं, बल्कि अलग-अलग श्रेणियों को मिलाने पर भी करीब 2.17 फीसदी है।

आसिफ अली जरदारी के दावे और जनगणनी के आंकड़ों में कितना फर्क

पाकिस्तान की 2023 की जनगणना में धर्म के आधार पर आबादी के आंकड़े भी जारी किए गए हैं। इसमें कुल 24.04 करोड़ से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया। आंकड़ों के मुताबिक, इनमें करीब 23.16 करोड़ मुस्लिम, 33 लाख ईसाई और 38.67 लाख हिंदू जाति के लोग दर्ज हैं। इसके अलावा करीब 13.49 लाख लोगों को शेड्यूल्ड कास्ट की श्रेणी में रखा गया है। जनगणना के हिसाब से केवल हिंदू जाति की आबादी 1.61 फीसदी है, जबकि हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट को मिलाकर यह आंकड़ा 2.17 फीसदी हो जाता है।

पाकिस्तान की जनगणना में हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट की आबादी को अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया गया है। ऐसे में केवल हिंदू आबादी के 1.61 फीसदी आंकड़े को देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता, क्योंकि शेड्यूल्ड कास्ट में 13 लाख से ज्यादा लोग शामिल हैं। हालांकि, दोनों आंकड़ों को जोड़ने पर भी कुल संख्या करीब 52.2 लाख होती है, जो पाकिस्तान की कुल आबादी का 2.17 फीसदी है, 4 फीसदी नहीं। पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स ने 2023 की जनगणना के विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक किए हैं, जिनमें देश, प्रांत और ग्रामीण-शहरी स्तर पर धर्म से जुड़े आंकड़े शामिल हैं।

1951 में हुई थी पहली जनगणना 

पाकिस्तान में पहली जनगणना 1951 में, देश के बंटवारे के करीब चार साल बाद हुई थी। उस समय पाकिस्तान दो हिस्सों में बंटा हुआ था, जिन्हें वेस्ट पाकिस्तान और ईस्ट पाकिस्तान कहा जाता था। पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के अनुसार, 1951 की जनगणना में दोनों हिस्सों की आबादी को दर्ज किया गया था और अकेले वेस्ट पाकिस्तान की आबादी करीब 3.37 करोड़ थी।

पाकिस्तान की पुरानी जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में हिंदू आबादी की संख्या समय के साथ बढ़ी है। 1998 की जनगणना में पाकिस्तान में करीब 24.4 लाख हिंदू दर्ज किए गए थे। यह उस समय देश की कुल आबादी का लगभग 2.02 फीसदी था। यानी संख्या के लिहाज से हिंदू आबादी में बढ़ोतरी देखने को मिली है, हालांकि कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी अलग-अलग जनगणना में बदलती रही है।

पाकिस्तान की 2023 की जनगणना में हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट की कुल संख्या बढ़कर 52 लाख से ज्यादा हो गई। हालांकि, आबादी में इनकी हिस्सेदारी अब भी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बताए 4 फीसदी से काफी कम है। 1998 की जनगणना में हिंदू आबादी 2.02 फीसदी थी, जबकि 2023 में हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट को मिलाकर भी यह आंकड़ा सिर्फ 2.17 फीसदी रहा।

पाकिस्तान की पुरानी जनगणना के आंकड़ों की आज के आंकड़ों से सीधी तुलना करना आसान नहीं है। इसकी वजह यह है कि 1951 की जनगणना में पूर्वी पाकिस्तान भी शामिल था, जो बाद में अलग होकर बांग्लादेश बन गया। इसलिए उस समय के आंकड़ों को आज के पाकिस्तान से मिलाते समय एक जैसे क्षेत्रों को आधार बनाना जरूरी है, ताकि तुलना सही तरीके से की जा सके।

सिंध में रहते हैं सबसे ज्यादा हिन्दू 

पाकिस्तान की 2023 की जनगणना के मुताबिक, देश की हिंदू आबादी का बड़ा हिस्सा सिंध प्रांत में रहता है। यहां 35,75,848 लोग हिंदू जाति और 13,25,559 लोग शेड्यूल्ड कास्ट के तौर पर दर्ज किए गए हैं। दोनों को मिलाकर यह संख्या करीब 49 लाख है, जो सिंध की कुल आबादी का 8.81 फीसदी है। देशभर में हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट के रूप में दर्ज कुल आबादी में सिंध की हिस्सेदारी करीब 94 फीसदी है।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत की तुलना में दूसरे हिस्सों में हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट की आबादी काफी कम दर्ज की गई है। 2023 की जनगणना के अनुसार, पंजाब में करीब 2.49 लाख लोग इन दोनों श्रेणियों में शामिल हैं, जो राज्य की आबादी का लगभग 0.20 फीसदी है। बलूचिस्तान में यह संख्या करीब 59 हजार, जबकि खैबर पख्तूनख्वा में लगभग 6,100 रही। वहीं, इस्लामाबाद में हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट को मिलाकर 900 से भी कम लोग दर्ज किए गए।

सिंध प्रांत में हिंदू समुदाय की आबादी खासतौर पर दक्षिण-पूर्वी इलाकों में अधिक है। 2023 की जनगणना के मुताबिक, उमरकोट पाकिस्तान का एकमात्र जिला है, जहां हिंदू आबादी बहुमत में है। सिंध में हिंदू समुदाय से जुड़े सुरक्षा, जबरन धर्म परिवर्तन और पलायन जैसे मुद्दे भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि पाकिस्तान की हिंदू आबादी का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है।

पाकिस्तान की 2023 की जनगणना के मुताबिक, हिंदू और शेड्यूल्ड कास्ट समुदाय की आबादी शहरों की तुलना में गांवों में ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार, गांवों में करीब 27 लाख हिंदू जाति और 11.69 लाख शेड्यूल्ड कास्ट के लोग रहते हैं, जबकि शहरों में इनकी संख्या क्रमशः करीब 11.64 लाख और 1.80 लाख है। दोनों श्रेणियों को मिलाकर करीब 52.2 लाख लोगों में से लगभग 38.7 लाख ग्रामीण इलाकों में और करीब 13.5 लाख शहरी क्षेत्रों में रहते हैं।

सिंध में हिंदू समुदाय का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। इन इलाकों में रहने वाले लोगों के सामने आर्थिक परेशानियों के साथ-साथ सरकारी सुविधाओं और संस्थानों तक पहुंच की कमी जैसी चुनौतियां भी बताई गई हैं। अधिकार समूहों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हिंदू समुदाय की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

पाकिस्तानी PM बोले- भारत पानी रोकेगा तो मुंहतोड़ जवाब देंगे:कश्मीर पर रुख कभी नहीं बदलेंगे, मुनीर की लीडरशिप में हमने दुश्मन को हराया

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते को लेकर एक बार फिर से भारत को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई समझौता नहीं होगा। अगर इसे रोकने या कम करने की कोशिश हुई तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। प्रधानमंत्री शहबाज ने गुरुवार को इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित करते कहा कि कश्मीर पर पाकिस्तान का रुख कभी नहीं बदलेगा। अपने भाषण में शहबाज ने एक बार फिर सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की तारीफ करते हुए दावा किया कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को हराया। चीन की दोस्ती को हिमालय से भी मजबूत बताया शहबाज ने अपने भाषण में चीन-पाकिस्तान की दोस्ती को हिमालय से भी बुलंद बताया। उन्होंने कहा कि चीन पाकिस्तान का अजीम दोस्त है। हर मुश्किल घड़ी में वह चट्टान की तरह देश के साथ रहा है। फिर दोहराया- ट्रम्प ने कराया था युद्धविराम शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में एक बार फिर दावा किया कि मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष रोकने में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अहम भूमिका रही थी। उन्होंने ट्रम्प की तारीफ करते हुए कहा कि उनकी पहल से समय रहते युद्धविराम संभव हो सका। हालांकि भारत लगातार यह कहता रहा है कि संघर्ष विराम दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सीधे बातचीत से हुआ था और इसमें किसी तीसरे देश की कोई मध्यस्थता नहीं थी। कश्मीर, फिलिस्तीन और अफगानिस्तान पर भी बोले अपने भाषण में शहबाज शरीफ ने कहा कि कश्मीर पर पाकिस्तान का रुख नहीं बदलेगा और कश्मीरियों की कुर्बानी बेकार नहीं जाने दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान फिलिस्तीन के लोगों के अधिकारों का समर्थन करता रहेगा। अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार से उन्होंने अपील की कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने दे। साथ ही दावा किया कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई है। भारत ने पहलगाम हमले के बाद संधि पर लगाई थी रोक अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला किया था। तभी से यह मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव की बड़ी वजह बना हुआ है। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और भरोसेमंद कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि पर रोक जारी रहेगी। वहीं, पाकिस्तान का दावा है कि यह संधि अब भी कानूनी रूप से प्रभावी है और इसे एकतरफा निलंबित नहीं किया जा सकता। 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई सिंधु जल संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों का बंटवारा किया गया था। इसी संधि को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं और हाल के महीनों में यह विवाद फिर से गहरा गया है। गंभीर जल संकट का सामना कर रहा पाकिस्तान रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान इस समय गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। खासकर सिंध और बलूचिस्तान में पानी की कमी लगातार बढ़ रही है। सिंध के सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक- पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था के अहम हिस्से सुक्कुर बैराज को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। पानी का स्तर लगातार घटने से कृषि और अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक, 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक,  9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान के सुराब इलाके के गोंधान गांव में पाकिस्तानी सेना की कथित एयरस्ट्राइक से हड़कंप। आजादी के जश्न के बीच आधी रात हुए इस कायराना हमले में 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत की खबर। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

बलूचिस्तान से एक बेहद दर्दनाक और आक्रोश पैदा करने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पाकिस्तानी सेना और बलोच जनता के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है। दावा किया जा रहा है कि बलूचिस्तान में आजादी का जश्न मना रहे आम नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना ने आधी रात को एयरस्ट्राइक कर दी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बलूचिस्तान के सुराब इलाके में स्थित गोंधान गांव (Gondhan Village) को निशाना बनाकर यह कायराना हवाई हमला किया गया।

रात के अंधेरे में तबाही: 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 की मौत का दावा
स्थानीय सूत्रों और बलोच कार्यकर्ताओं के दावों के मुताबिक, आधी रात को जब ग्रामीण अपने घरों में मौजूद थे, तब पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने गोंधान गांव पर बमबारी शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले से इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई मकान जमींदोज हो गए।

कुल मौतें: शुरुआती दावों में 28 लोगों की जान जाने की बात कही जा रही है।

मासूम शिकार: मृतकों में 9 मासूम बच्चे और 7 महिलाएं शामिल हैं।

घायल: इस भीषण हमले में 17 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।

यदि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना द्वारा आम नागरिकों के खिलाफ किए गए सबसे भीषण मानवाधिकार उल्लंघनों में से एक माना जाएगा। हालांकि, संघर्ष प्रभावित और दूरदराज के क्षेत्रों में मीडिया की सीमित पहुंच के कारण हताहतों की सटीक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है।

आम गांव को क्यों बनाया निशाना?
इस सैन्य कार्रवाई के बाद गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं:
क्या पाकिस्तानी सेना ने केवल स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहे निहत्थे नागरिकों को अपनी बौखलाहट का शिकार बनाया?
क्या किसी प्रतिबंधित संगठन के खिलाफ सैन्य अभियान के नाम पर आम बलोच नागरिकों को निशाना बनाया गया?
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का बहाना बनाकर अक्सर बलोच आम जनता को प्रताड़ित किया जाता रहा है।

बलूचिस्तान में असंतोष की जड़ें: आखिर क्यों जल रहा है बलूचिस्तान?
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों (गैस, खनिज और तेल) से समृद्ध होने के बावजूद आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ा हुआ है। दशकों से बलोच जनता पाकिस्तान के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रही है। असंतोष की मुख्य वजहें निम्न हैं:

संसाधनों का दोहन: बलोच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि पंजाब केंद्रित पाकिस्तान सरकार उनके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करती है, लेकिन स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिलता।

सुरक्षा बलों का अत्याचार: 'मिसिंग पर्सन्स' (जबरन गायब किए गए लोग) बलूचिस्तान की एक विकराल समस्या है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि हजारों बलोच युवाओं को सेना उठाकर ले गई है, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला।

राजनीतिक अधिकारों का हनन: बलोच समुदाय लगातार स्वायत्तता, रोजगार और बुनियादी विकास की मांग करता रहा है, जिसे इस्लामाबाद हमेशा बलप्रयोग से दबाता आया है।

जनरल आसिम मुनीर और पाक सेना की भूमिका पर सवाल
बलूचिस्तान में बिगड़ते हालात के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि बलोच विद्रोह और असंतोष को बातचीत के जरिए सुलझाने के बजाय सैन्य बल के कठोर इस्तेमाल से कुचला जा रहा है, जिससे स्थिति सुधरने की जगह और अधिक विस्फोटक होती जा रही है।

सुराब के गोंधान गांव में हुई यह घटना पाकिस्तान के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक संकट बन सकती है। विश्व समुदाय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों से मांग की जा रही है कि वे इस कथित एयरस्ट्राइक की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराएं, ताकि बेकसूर बच्चों और महिलाओं की मौत का सच दुनिया के सामने आ सके।

Balochistan: 11 अगस्त को आजादी मनाने के बाद अब ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ का पासपोर्ट-करेंसी वाला दांव! क्या ये है अगला कदम

Balochistan News: बलूच अलगाववादी आंदोलन एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। 11 अगस्त को ‘बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने के बाद बलूच नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की मांग तेज कर दी है। बलूच अलगाववादी नेता मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बयान जारी कर वैश्विक बिरादरी, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और देशों से अपील की है कि वे बलूचिस्तान को पाकिस्तान का प्रांत कहना, लिखना और मानना तुरंत बंद करें। इसे एक संप्रभु राष्ट्र का दर्जा दें।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग और वैश्विक मंचों से अपील

मीर यार बलूच ने अपने बयान में कहा कि बलूचिस्तान का स्वतंत्रता आंदोलन अब केवल ऐतिहासिक दिवस मनाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह राजनयिक और राजनीतिक मान्यता हासिल करने के एक नए चरण में पहुंच चुका है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों के सदस्य राष्ट्रों से इस मुहिम का समर्थन करने की अपील की है।

बयान में कहा गया है कि बलूच जनता के प्रति नैतिक समर्थन जारी रहना चाहिए ताकि बलूचिस्तान की धरती से पाकिस्तान जैसे संकट को पूरी तरह खत्म किया जा सके। इसके साथ ही बलूच राजनीतिक नेतृत्व के अलग-अलग धड़ों को एकजुट करने के प्रयास भी तेजी से किए जा रहे हैं।

भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का आभार

बलूच अलगाववादी नेता ने बलूचिस्तान के मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों खासकर भारतीय मीडिया, शोधकर्ताओं और थिंक टैंकों का दिल से आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थाओं ने बलूचिस्तान की आवाज को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने और बलूच जनता का पक्ष उजागर करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पासपोर्ट, करेंसी और संप्रभु संस्थानों के गठन का रोडमैप

बलूच नेतृत्व द्वारा साझा की गई योजना के मुताबिक भविष्य का स्वतंत्र बलूचिस्तान एक पूर्ण संप्रभु राष्ट्र के रूप में जाना जाएगा। आने वाले समय में रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान अपना खुद का पासपोर्ट जारी करेगा और अपनी राष्ट्रीय करेंसी लॉन्च करेगा। प्रस्तावित गणराज्य अपने खुद के मीडिया संगठन, व्यापार और वाणिज्य संस्थान और विभिन्न देशों में राजनयिक मिशन स्थापित करेगा। नया बलूच राष्ट्र अपनी विदेश नीति, रक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और संपूर्ण कूटनीति की जिम्मेदारी स्वयं संभालेगा।

11 अगस्त की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके महत्व को भी जानिए

11 अगस्त का दिन बलूच राष्ट्रवादियों के लिए काफी ऐतिहासिक माना जाता है। मीर यार बलूच के मुताबिक ब्रिटिश भारत के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान (कलात रियासत) ने खुद को एक स्वतंत्र और संप्रभु देश घोषित किया था। बलूच अलगाववादी समूह इसी तारीख को अपने मूल स्वतंत्रता दिवस के रूप में मानते आए हैं और अब उनका मुख्य ध्यान इसी आधार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक मान्यता हासिल करने पर केंद्रित है।

पाकिस्तानी सेना की पाबंदियां और ब्लैकआउट के दावे

बलूच नेता ने आरोप लगाया कि 11 अगस्त के स्वतंत्रता समारोहों को रोकने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों और सैन्य बलों ने कड़े प्रतिबंध लगाए थे। बयान में दावा किया गया कि कलात, क्वेटा और खुजदार सहित राज्य के कई हिस्सों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह निलंबित कर दी गईं।

सैन्य छावनियों और पुलिस स्टेशनों के आसपास गहरी खाइयां खोदी गईं और पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर व ड्रोन लगातार निगरानी करते रहे। अलगाववादी समूह ने दावा किया कि इन तमाम पाबंदियों और इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद बलूचिस्तान के विभिन्न हिस्सों में समर्थकों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया। हालांकि इंटरनेट सेवा बंद होने की वजह से तस्वीरों, वीडियो और रिपोर्टों के सामने आने में देरी हुई। वैसे बलूच नेता के इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी है।

आपको बता दें कि बलूच नेतृत्व ने बलूचिस्तान को संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र बताते हुए कहा कि प्रस्तावित गणराज्य वैश्विक स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय पहलों में बड़ा योगदान देने में सक्षम है। उनका कहना है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अंतरराष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करेगा और अपने राजनीतिक, आर्थिक व कूटनीतिक संस्थानों का तेजी से विकास करेगा।

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बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यहां दशकों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। इस क्षेत्र में जबरन गुमशुदगी, मानवाधिकार उल्लंघन और सैन्य कार्रवाई के आरोप लगातार लगते रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तानी अधिकारी अलगाववादी मांगों को खारिज करते हुए बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानते हैं और वहां सक्रिय सशस्त्र समूहों को सुरक्षा के लिए खतरा करार देते हैं।

Balochistan Independence Day: 11 अगस्त को ही आजादी सेलिब्रेट करने वाला था बलूचिस्तान, जानिए आज ही के दिन वहां क्या क्या हुआ

Balochistan Independence Day: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘आजादी दिवस’ मनाए जाने को लेकर एक बार फिर अलग देश की मांग तेज हो गई है। बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया जा रहा है। इस मौके पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की है कि बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश के तौर पर कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक मान्यता दी जाए।

बलोच नेता मीर यार बलोच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी जाए। इस मौके पर बलूच नेता ने पाकिस्तान पर दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप भी लगाए हैं।

X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के छह करोड़ लोग हर साल 11 अगस्त को अपना राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। आज हम उस मुकाम पर पहंच गए हैं जहां हम सिर्फ अपनी आजादी का जश्न ही नहीं मनाते। बल्कि दुनिया से यह मांग भी करते हैं कि बलूचिस्तान की आजादी को कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक रूप से मान्यता दी जाए। आजादी के इस पवित्र अवसर पर बलूचिस्तान में रहने वाले बलोच, पश्तून, हिंदू, सिख, ईसाई और सभी धर्मों के भाइयों और बहनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।”

भारत का किया जिक्र

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य दुनिया के और खासकर भारत के बहादुर मुख्यधारा के मीडिया, थिंक टैंक, शोधकर्ताओं, कवियों, लेखकों, छात्रों, वकीलों, नागरिक समाज, व्यापारिक समुदाय, धार्मिक नेताओं, सांसदों और उन सभी भाइयों और बहनों का दिल से आभार व्यक्त करता है जिन्होंने बलोचिस्तान की आवाज को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया और हमारे लोगों की आवाज बने। बलूचिस्तान के लोगों को नैतिक समर्थन मिलना जारी रहना चाहिए ताकि हम अपनी जमीन, बलूचिस्तान से पाकिस्तान रूपी कैंसर को हटा सकें।”

50 हजार बलोच पाकिस्तान में कैद

बलूचिस्तान में आजादी को दबाने के पाकिस्तान के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हुए मीर यार बलोच ने दावा किया कि 50 हजार से ज्यादा बलोच अभी भी पाकिस्तान की यातना कोठरियों में अमानवीय अत्याचार सह रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम उन्हें कभी नहीं भूलेंगे। आज की आजादी की सफलता हमारे महान शहीदों, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं और कैदियों के अमर बलिदानों की वजह से मिली है।”

बलूचिस्तान में कुर्बानियों के मजबूत इतिहास को याद करते हुए उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के लोगों ने हमेशा विदेशी हमलावरों को रोका है। उन्हें बलूचिस्तान से पीछे हटने पर मजबूर किया है। पाकिस्तान के पास भले ही हजारों टैंक, सैकड़ों लड़ाकू विमान, तोपखाने और एक बड़ी सेना हो, फिर भी शारीरिक, मानसिक और लड़ने की क्षमता के मामले में बलूचिस्तान की सेना पाकिस्तान की सेना से 10 गुना ज्यादा ताकतवर और सफल है।

बलूचिस्तान की सेना एक मजबूत फोर्स है जो हर स्थिति का सामना करने में सक्षम है। दुनिया की पेशेवर सेनाओं से मुकाबला करने के लिए तैयार है। बलूचिस्तान के इलाके को देखते हुए एक बड़ी सेना की जरूरत है। इसलिए बलूचिस्तान गणराज्य ने पांच लाख सैनिकों की सेना तैयार की है।”

11 अगस्त को ही क्यों चुना अपनी ‘आजादी’ का दिन?

जब बलूचिस्तान ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित किया, तो ‘वर्ल्ड पीस यूनाइटेड’ के एम्बेसडर डॉ. परविंदर सिंह ने कहा, “1947 में जब अंग्रेज भारत से गए, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश अपने मौजूदा रूप में मौजूद नहीं थे। लेकिन बलूचिस्तान मौजूद था। उसने 11 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से अपनी आजादी का ऐलान किया था। अगर बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाना चाहते हैं, तो उन्हें इसकी इजाजत मिलनी चाहिए। इसे विश्व शांति की दिशा में एक कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान की ज़मीन खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों, जैसे सोना और कीमती पत्थरों से बहुत समृद्ध है। अगर बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो जाता है, तो पाकिस्तान को अपने आर्थिक आधार का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ सकता है, क्योंकि यह इलाका चीन और दूसरे देशों को खनिजों के निर्यात का मुख्य स्रोत है।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान का हाथ से निकलना पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। यही वजह है कि पाकिस्तान उस पर से अपना नियंत्रण नहीं छोड़ना चाहता। आज 56 से ज्यादा देश बलूचिस्तान की आजादी का समर्थन करते हैं। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। एक ऐसा दौर जिसमें टकराव और जबरदस्ती से अब कोई नतीजा नहीं निकलता।”

दुनिया भर में मनाया गया आजादी का जश्न

मंगलवार को बलूचिस्तान ने अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। यह एक वार्षिक परंपरा का हिस्सा है, जिसे कई बलूच मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान की ओर से क्षेत्र के ‘अवैध कब्जे’ के विरोध के रूप में देखते हैं। बलूच स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ें 1947 तक जाती हैं, जब ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद कलात रियासत ने कुछ समय के लिए खुद को स्वतंत्र घोषित किया था। हालांकि, 1948 में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का विलय कर लिया, जिसका बलूच राष्ट्रवादी समूह लगातार विरोध करते रहे हैं।

सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म X पर मीर यार बलूच ने आरोप लगाया कि ‘कब्जा करने वाली’ पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में व्यापक प्रतिबंध लगाए हैं। उनके अनुसार, राष्ट्रीय आयोजनों को रोकने के लिए 7 अगस्त से 30 अगस्त तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखने का फैसला किया है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती, सैन्य संसाधनों या हवाई शक्ति के इस्तेमाल के बावजूद पाकिस्तान बलूचिस्तान में अपनी मौजूदगी को अनिश्चित समय तक बनाए नहीं रख सकता, क्योंकि बलूच जनता का संकल्प मजबूत है।

मीर ने कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य बलूच लोगों को उग्रवादी या अलगाववादी बताने की कोशिशों को खारिज करता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानी बलूचिस्तान की रक्षा, सुरक्षा और सैन्य ताकत का हिस्सा हैं और उन्हें छह करोड़ बलूच लोगों का समर्थन प्राप्त है। लोग उन पर भरोसा करते हैं क्योंकि वे इसी मिट्टी के बेटे-बेटियां हैं और अपने राष्ट्र के हित में काम करते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “ये बल किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं लड़ रहे हैं और न ही अशांति या हिंसा फैलाने के लिए काम कर रहे हैं। वे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य निभा रहे हैं, जिसमें शांति और सुरक्षा बनाए रखना, लोगों की रक्षा करना और एक शांतिपूर्ण, समृद्ध तथा विकसित बलूचिस्तान की नींव रखना शामिल है।”

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मीर ने दावा किया कि बलूच सशस्त्र समूहों की कार्रवाइयों का उद्देश्य उन नेटवर्कों को खत्म करना और बाहर निकालना है, जिन्हें वे पाकिस्तान से जुड़ा मानते हैं और जो उनके अनुसार बलूचिस्तान में अस्थिरता, असुरक्षा और हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं।

पाकिस्तान के 4 में से 2 सूबों में बागी तेवर:सरकार की पकड़ कमजोर; बलूचिस्तान-खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ी चुनौती

पाकिस्तान के चार सूबे हैं। इनमें से बलूचिस्तान सूबे में अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वा सूबे में अफगा​न तालिबान का दबदबा है। आए दिन तालिबान के हमलों से यहां पाक फौज के पांव उखड़ रहे हैं। पढ़िए बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा से भास्कर संवाददाता सिकंदर सूरी की ग्राउंड रिपोर्ट… बलूचिस्तान- PAK के हाथ से 70% क्षेत्र गया बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा है। यह देश के करीब 45% हिस्से में फैला है और इसकी सीमा ईरान से लगती है। दूर-दूर तक रेगिस्तान और वीरान पहाड़ हैं। लेकिन इन दिनों इस वीराने में सबसे ज्यादा गूंज गोलियों की सुनाई देती है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाके अलग देश की मांग को लेकर लड़ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का सूबे के करीब 70% हिस्से पर कब्जा है। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पाकिस्तानी सेना कितने विद्रोहियों को मार रही है या पकड़ रही है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार यहां पुलिस थाने चला पा रही है? क्या हाईवे सुरक्षित हैं? क्या बाजार खुल रहे हैं? और क्या लोग बिना डर के एक शहर से दूसरे शहर जा सकते हैं? बलूचिस्तान के कई इलाकों में हथियारबंद लड़ाके बेखौफ होकर क्वेटा, खुजदार और मस्तुंग जैसे शहरों में घुसते हैं। पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले करते हैं। कई जगह BLA के लड़ाके और पश्तून गुट सड़कों पर अपने नाके लगा लेते हैं। वहां से गुजरने वाले वाहनों की तलाशी लेते हैं और खुलेआम वसूली करते हैं। यही पैसा BLA के फंड में जाता है। गुस्सा… खनिज और पोर्ट पर चीन-अमेरिका का कब्जा है बलूचिस्तान को पाकिस्तान के खनिजों की खदान भी कहते हैं। बात शुरू की तो खुजदार शहर के युवक मोमिन का पाक सरकार पर गुस्सा फूट पड़ा। मोमिन कहते हैं यहां के ग्वादर पोर्ट पर चीन का कब्जा है। चीन ने सीपैक के नाम पर यहां लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। ग्वादर पोर्ट पर चीन की फिशिंग बोट्स का कब्जा है। स्थानीय बलूच मछुआरों को चीनी बोट्स खदेड़ देती हैं। इनकी बोट्स बड़ी और ज्यादा पावर वाली होती हैं। ज्यादातर बलूच मछुआरों के पास अब भी पालदार नौकाएं हैं। बलूच बेरोजगार हो रहे हैं। 55 साल के असलम का कहना है कि यहां के रेयर अर्थ मिनरल पर अमेरिका का कब्जा है। पाक आर्मी चीफ मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने मिनरल की नुमाइश करते हैं। इस खजाने पर केवल बलूचों का हक है। खैबर…यहां तालिबानी शरिया सरकार काबिज
खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। खैबर में पाक सरकार के कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदू, मिंगाेरा और मर्दन में ‘लोया जिरगा’ के जरिए ही कानून चलता है। ये जिरगा असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान इसका संरक्षक है। अफगान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) संगठन को अपने ठिकानों में पनाह देता है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में TTP के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही TTP ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब TTP काबिज है। आए दिन TTP के हमलों के कारण स्कूल और काॅलेज बंद रहते हैं। पंजाब और सिंध के मूल निवासी कर्मचारी खैबर में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते हैं। खौफ… हमलों से पाक की 50 फौजी चौकियां खाली खैबर पख्तूनख्वा में TTP के आए दिन होने वाले हमलों से पाक सेना में खौफ है। इस साल TTP फौज पर 145 से ज्यादा हमले कर चुकी है, इनमें 48 सैनिक मारे गए। खैबर में डूरंड लाइन पर अभी पाक सेना की 50 फौजी चौकियां खाली हैं। 22 पोस्ट पर ही पाक फौज तैनात है। स्वात में रहने वाले सगीर (22) का कहना है कि खैबर के लोग अपनी हुकूमत चाहते हैं। पाक सरकारों ने यहां पंजाबियों और सिंध के रिटायर्ड फौजियों को मुफ्त जमीन देकर बसाने की कोशिशें भी कीं। ये हमारी कबिलाई पहचान को मिटाने की साजिश थी। एक रणनीतिक विशेषज्ञ का कहना है कि TTP और इस्लामिक स्टेट खुरासान यानी आईएसकेपी जैसे संगठन हमलों में आपसी सहयोग कर रहे हैं। इन दोनों संगठनों की ताकत से अब खैबर में पाक सरकार के पांव उखड़ रहे हैं।

पाकिस्तान के 4 में से 2 सूबों में बागी तेवर:सरकार की पकड़ कमजोर; बलूचिस्तान-खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ी चुनौती

पाकिस्तान के चार सूबे हैं। इनमें से बलूचिस्तान सूबे में अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वा सूबे में अफगा​न तालिबान का दबदबा है। आए दिन तालिबान के हमलों से यहां पाक फौज के पांव उखड़ रहे हैं। पढ़िए बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा से भास्कर संवाददाता सिकंदर सूरी की ग्राउंड रिपोर्ट… बलूचिस्तान- PAK के हाथ से 70% क्षेत्र गया बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा है। यह देश के करीब 45% हिस्से में फैला है और इसकी सीमा ईरान से लगती है। दूर-दूर तक रेगिस्तान और वीरान पहाड़ हैं। लेकिन इन दिनों इस वीराने में सबसे ज्यादा गूंज गोलियों की सुनाई देती है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाके अलग देश की मांग को लेकर लड़ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का सूबे के करीब 70% हिस्से पर कब्जा है। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पाकिस्तानी सेना कितने विद्रोहियों को मार रही है या पकड़ रही है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार यहां पुलिस थाने चला पा रही है? क्या हाईवे सुरक्षित हैं? क्या बाजार खुल रहे हैं? और क्या लोग बिना डर के एक शहर से दूसरे शहर जा सकते हैं? बलूचिस्तान के कई इलाकों में हथियारबंद लड़ाके बेखौफ होकर क्वेटा, खुजदार और मस्तुंग जैसे शहरों में घुसते हैं। पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले करते हैं। कई जगह BLA के लड़ाके और पश्तून गुट सड़कों पर अपने नाके लगा लेते हैं। वहां से गुजरने वाले वाहनों की तलाशी लेते हैं और खुलेआम वसूली करते हैं। यही पैसा BLA के फंड में जाता है। गुस्सा… खनिज और पोर्ट पर चीन-अमेरिका का कब्जा है बलूचिस्तान को पाकिस्तान के खनिजों की खदान भी कहते हैं। बात शुरू की तो खुजदार शहर के युवक मोमिन का पाक सरकार पर गुस्सा फूट पड़ा। मोमिन कहते हैं यहां के ग्वादर पोर्ट पर चीन का कब्जा है। चीन ने सीपैक के नाम पर यहां लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। ग्वादर पोर्ट पर चीन की फिशिंग बोट्स का कब्जा है। स्थानीय बलूच मछुआरों को चीनी बोट्स खदेड़ देती हैं। इनकी बोट्स बड़ी और ज्यादा पावर वाली होती हैं। ज्यादातर बलूच मछुआरों के पास अब भी पालदार नौकाएं हैं। बलूच बेरोजगार हो रहे हैं। 55 साल के असलम का कहना है कि यहां के रेयर अर्थ मिनरल पर अमेरिका का कब्जा है। पाक आर्मी चीफ मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने मिनरल की नुमाइश करते हैं। इस खजाने पर केवल बलूचों का हक है। खैबर…यहां तालिबानी शरिया सरकार काबिज
खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। खैबर में पाक सरकार के कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदू, मिंगाेरा और मर्दन में ‘लोया जिरगा’ के जरिए ही कानून चलता है। ये जिरगा असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान इसका संरक्षक है। अफगान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) संगठन को अपने ठिकानों में पनाह देता है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में TTP के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही TTP ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब TTP काबिज है। आए दिन TTP के हमलों के कारण स्कूल और काॅलेज बंद रहते हैं। पंजाब और सिंध के मूल निवासी कर्मचारी खैबर में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते हैं। खौफ… हमलों से पाक की 50 फौजी चौकियां खाली खैबर पख्तूनख्वा में TTP के आए दिन होने वाले हमलों से पाक सेना में खौफ है। इस साल TTP फौज पर 145 से ज्यादा हमले कर चुकी है, इनमें 48 सैनिक मारे गए। खैबर में डूरंड लाइन पर अभी पाक सेना की 50 फौजी चौकियां खाली हैं। 22 पोस्ट पर ही पाक फौज तैनात है। स्वात में रहने वाले सगीर (22) का कहना है कि खैबर के लोग अपनी हुकूमत चाहते हैं। पाक सरकारों ने यहां पंजाबियों और सिंध के रिटायर्ड फौजियों को मुफ्त जमीन देकर बसाने की कोशिशें भी कीं। ये हमारी कबिलाई पहचान को मिटाने की साजिश थी। एक रणनीतिक विशेषज्ञ का कहना है कि TTP और इस्लामिक स्टेट खुरासान यानी आईएसकेपी जैसे संगठन हमलों में आपसी सहयोग कर रहे हैं। इन दोनों संगठनों की ताकत से अब खैबर में पाक सरकार के पांव उखड़ रहे हैं।

क्या पाकिस्तान का नक्शा बदलने वाला है और उससे अलग नया देश बन पाएगा बलूचिस्तान? समझिए आजादी के दावे के पीछे कितना दम

Balochistan Claim Explained: रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का दावा करने वाले बलूच समूहों ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील तेज कर दी है। पाकिस्तान से आजादी का ऐलान करने के बाद बलूचों के इस ग्लोबल कैंपेन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बलूचिस्तान वास्तव में दुनिया का सबसे नया संप्रभु देश बन सकता है और क्या इससे पाकिस्तान का नक्शा बदल जाएगा? इसको लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन चल रहे हैं लेकिन इंटरनेशन कानून और ग्लोबल डिप्लोमेसी का इतिहास बताता है कि सिर्फ स्वतंत्रता का ऐलान कर देने से ही कोई नया देश अस्तित्व में नहीं आ जाता। किसी भी क्षेत्र को नए राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए कूटनीतिक मान्यता, रीजनल कंट्रोल और इंटरनेशनल वैलिडेशन की सबसे बड़ी चुनौतियों से पार पाना होता है।

आजादी का ऐलान केवल पहला कदम, संप्रभुता के लिए क्या हैं नियम?

अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी क्षेत्र या समूह द्वारा खुद को स्वतंत्र घोषित करने पर प्रतिबंध नहीं लगाता। हालांकि सिर्फ एकतरफा ऐलान कर देने से ऑटोमेटिकली कोई नया देश नहीं बन जाता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मानदंडों के मुताबिक किसी क्षेत्र को संप्रभु राज्य के रूप में काम करने के लिए मुख्य रूप से चार शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है-

  • 1 – उस क्षेत्र में एक स्थायी आबादी होनी चाहिए।
  • 2 – उस देश की एक डिफाइंड टेरिटरी और बॉर्डर होना चाहिए।
  • 3 – उस देश में एक प्रभावी सरकार होनी चाहिए।
  • 4 – दूसरे संप्रभु देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।

अगर बलूच समूह इनमें से कुछ शर्तों का आंशिक रूप से दावा भी करते हैं तब भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बिना कोई भी नया क्षेत्र वैश्विक संस्थाओं का हिस्सा नहीं बन सकता।

कूटनीतिक मान्यता: बलूचिस्तान के राह की सबसे बड़ी रुकावट

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने ग्लोबल कम्युनिटी से संप्रभुता स्वीकार करने की अपील की तो है लेकिन अब तक दुनिया के किसी भी देश ने इसे आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। कूटनीतिक मान्यता एक संप्रभु देश द्वारा लिया जाने वाला विशुद्ध राजनीतिक निर्णय होता है। जब तक बलूचिस्तान को अन्य देशों से औपचारिक कूटनीतिक मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह संयुक्त राष्ट्र (UN) का सदस्य नहीं बन सकता। इसके अलावा अन्य देशों के साथ सामान्य कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता। इसके साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF, विश्व बैंक) का फायदा उसे नहीं मिल सकता।

जमीनी हकीकत: पाकिस्तान का प्रशासनिक व सैन्य नियंत्रण

संप्रभु देश का दर्जा हासिल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानदंडों में से एक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण है। भले ही बलूचिस्तान के अलग अलग हिस्सों में अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं लेकिन इस्लामाबाद अभी भी अपने नागरिक प्रशासन, सुरक्षा बलों और न्यायिक प्रणाली के माध्यम से इस पूरे प्रांत पर संवैधानिक और प्रशासनिक नियंत्रण रखता है। जब तक पाकिस्तान का इस प्रांत पर व्यावहारिक और प्रशासनिक नियंत्रण बना रहता है तब तक बलूचिस्तान की संप्रभुता के किसी भी दावे को व्यावहारिक धरातल पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर क्या कहता है?

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का तर्क है कि उनके लोगों के पास आत्मनिर्णय का अधिकार है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दस्तावेज आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करते हैं लेकिन इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूदा संप्रभु राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता की भी कड़ाई से रक्षा करता है। ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही किसी देश से अलग होने का समर्थन किया है, जैसे कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति या व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ लंबे समय से जारी सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में।

क्या भारत दे सकता है बलूचिस्तान को मान्यता?

बलूच नेताओं द्वारा कूटनीतिक समर्थन की अपील के बाद यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत बलूचिस्तान को एक अलग देश के रूप में मान्यता दे सकता है? भारत का आधिकारिक और पुराना कूटनीतिक रुख यही रहा है कि वह बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानता है। भारत ने बलूचिस्तान में मानव अधिकारों के उल्लंघन और सुरक्षा चिंताओं का मुद्दा तो बार-बार उठाया है लेकिन उसने अलगाववादी दावों या अलग देश की घोषणा को कभी औपचारिक मान्यता नहीं दी है। किसी भी अलग हुए क्षेत्र को मान्यता देना भारत की लंबी अवधि की विदेश नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव होगा, जिसके व्यापक भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।

इतिहास के सबक: सिर्फ घोषणा से नहीं बनते नए देश

आपको बता दें कि दुनिया का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि सिर्फ स्वतंत्रता की घोषणा करने से राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता। इसे कोसोवो के उदाहरण से समझा जा सकता है। कोसोवो ने 2008 में अपनी आजादी की घोषणा की थी और उसे 100 से अधिक देशों ने मान्यता दी है लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी वैश्विक शक्तियां आज भी इसे पूर्ण देश नहीं मानती हैं। सोमालीलैंड, उत्तरी साइप्रस और ट्रांसनिस्ट्रिया जैसे क्षेत्रों के पास वर्षों से अपना खुद का शासन ढांचा है लेकिन व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता न मिलने की वजह से वे आज भी औपचारिक देशों की श्रेणी से बाहर हैं।

पाकिस्तान के लिए चुनौतियां और बलूचिस्तान का भविष्य

बलूच अलगाववादी समूहों की यह ताजा घोषणा ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता, खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद और बलूचिस्तान में जारी उग्रवाद से जूझ रहा है। 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस घोषित करने और कूटनीतिक अपील करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान के मुद्दे पर ध्यान जरूर आकर्षित हुआ है। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानूनी और कूटनीतिक ढांचे के तहत बलूचिस्तान के एक मान्यता प्राप्त संप्रभु देश बनने की राह बेहद कठिन और अनिश्चित है। जब तक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण, व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता और वैश्विक संस्थाओं में प्रवेश हासिल नहीं होत, तब तक सिर्फ स्वतंत्रता के दावों से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बलूचिस्तान की कानूनी स्थिति रातों-रात नहीं बदल सकती।