बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक, 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक,  9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day

बलूचिस्तान के सुराब इलाके के गोंधान गांव में पाकिस्तानी सेना की कथित एयरस्ट्राइक से हड़कंप। आजादी के जश्न के बीच आधी रात हुए इस कायराना हमले में 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत की खबर। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

बलूचिस्तान से एक बेहद दर्दनाक और आक्रोश पैदा करने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पाकिस्तानी सेना और बलोच जनता के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है। दावा किया जा रहा है कि बलूचिस्तान में आजादी का जश्न मना रहे आम नागरिकों पर पाकिस्तानी सेना ने आधी रात को एयरस्ट्राइक कर दी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बलूचिस्तान के सुराब इलाके में स्थित गोंधान गांव (Gondhan Village) को निशाना बनाकर यह कायराना हवाई हमला किया गया।

रात के अंधेरे में तबाही: 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 की मौत का दावा
स्थानीय सूत्रों और बलोच कार्यकर्ताओं के दावों के मुताबिक, आधी रात को जब ग्रामीण अपने घरों में मौजूद थे, तब पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने गोंधान गांव पर बमबारी शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले से इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई मकान जमींदोज हो गए।

कुल मौतें: शुरुआती दावों में 28 लोगों की जान जाने की बात कही जा रही है।

मासूम शिकार: मृतकों में 9 मासूम बच्चे और 7 महिलाएं शामिल हैं।

घायल: इस भीषण हमले में 17 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।

यदि इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो यह पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना द्वारा आम नागरिकों के खिलाफ किए गए सबसे भीषण मानवाधिकार उल्लंघनों में से एक माना जाएगा। हालांकि, संघर्ष प्रभावित और दूरदराज के क्षेत्रों में मीडिया की सीमित पहुंच के कारण हताहतों की सटीक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार है।

आम गांव को क्यों बनाया निशाना?
इस सैन्य कार्रवाई के बाद गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं:
क्या पाकिस्तानी सेना ने केवल स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहे निहत्थे नागरिकों को अपनी बौखलाहट का शिकार बनाया?
क्या किसी प्रतिबंधित संगठन के खिलाफ सैन्य अभियान के नाम पर आम बलोच नागरिकों को निशाना बनाया गया?
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई का बहाना बनाकर अक्सर बलोच आम जनता को प्रताड़ित किया जाता रहा है।

बलूचिस्तान में असंतोष की जड़ें: आखिर क्यों जल रहा है बलूचिस्तान?
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, जो प्राकृतिक संसाधनों (गैस, खनिज और तेल) से समृद्ध होने के बावजूद आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ा हुआ है। दशकों से बलोच जनता पाकिस्तान के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रही है। असंतोष की मुख्य वजहें निम्न हैं:

संसाधनों का दोहन: बलोच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि पंजाब केंद्रित पाकिस्तान सरकार उनके प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करती है, लेकिन स्थानीय लोगों को इसका लाभ नहीं मिलता।

सुरक्षा बलों का अत्याचार: 'मिसिंग पर्सन्स' (जबरन गायब किए गए लोग) बलूचिस्तान की एक विकराल समस्या है। मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि हजारों बलोच युवाओं को सेना उठाकर ले गई है, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला।

राजनीतिक अधिकारों का हनन: बलोच समुदाय लगातार स्वायत्तता, रोजगार और बुनियादी विकास की मांग करता रहा है, जिसे इस्लामाबाद हमेशा बलप्रयोग से दबाता आया है।

जनरल आसिम मुनीर और पाक सेना की भूमिका पर सवाल
बलूचिस्तान में बिगड़ते हालात के बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि बलोच विद्रोह और असंतोष को बातचीत के जरिए सुलझाने के बजाय सैन्य बल के कठोर इस्तेमाल से कुचला जा रहा है, जिससे स्थिति सुधरने की जगह और अधिक विस्फोटक होती जा रही है।

सुराब के गोंधान गांव में हुई यह घटना पाकिस्तान के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक संकट बन सकती है। विश्व समुदाय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों से मांग की जा रही है कि वे इस कथित एयरस्ट्राइक की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराएं, ताकि बेकसूर बच्चों और महिलाओं की मौत का सच दुनिया के सामने आ सके।

Balochistan: 11 अगस्त को आजादी मनाने के बाद अब ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ का पासपोर्ट-करेंसी वाला दांव! क्या ये है अगला कदम

Balochistan News: बलूच अलगाववादी आंदोलन एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। 11 अगस्त को ‘बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने के बाद बलूच नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की मांग तेज कर दी है। बलूच अलगाववादी नेता मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बयान जारी कर वैश्विक बिरादरी, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और देशों से अपील की है कि वे बलूचिस्तान को पाकिस्तान का प्रांत कहना, लिखना और मानना तुरंत बंद करें। इसे एक संप्रभु राष्ट्र का दर्जा दें।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग और वैश्विक मंचों से अपील

मीर यार बलूच ने अपने बयान में कहा कि बलूचिस्तान का स्वतंत्रता आंदोलन अब केवल ऐतिहासिक दिवस मनाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह राजनयिक और राजनीतिक मान्यता हासिल करने के एक नए चरण में पहुंच चुका है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों के सदस्य राष्ट्रों से इस मुहिम का समर्थन करने की अपील की है।

बयान में कहा गया है कि बलूच जनता के प्रति नैतिक समर्थन जारी रहना चाहिए ताकि बलूचिस्तान की धरती से पाकिस्तान जैसे संकट को पूरी तरह खत्म किया जा सके। इसके साथ ही बलूच राजनीतिक नेतृत्व के अलग-अलग धड़ों को एकजुट करने के प्रयास भी तेजी से किए जा रहे हैं।

भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का आभार

बलूच अलगाववादी नेता ने बलूचिस्तान के मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों खासकर भारतीय मीडिया, शोधकर्ताओं और थिंक टैंकों का दिल से आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थाओं ने बलूचिस्तान की आवाज को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने और बलूच जनता का पक्ष उजागर करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पासपोर्ट, करेंसी और संप्रभु संस्थानों के गठन का रोडमैप

बलूच नेतृत्व द्वारा साझा की गई योजना के मुताबिक भविष्य का स्वतंत्र बलूचिस्तान एक पूर्ण संप्रभु राष्ट्र के रूप में जाना जाएगा। आने वाले समय में रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान अपना खुद का पासपोर्ट जारी करेगा और अपनी राष्ट्रीय करेंसी लॉन्च करेगा। प्रस्तावित गणराज्य अपने खुद के मीडिया संगठन, व्यापार और वाणिज्य संस्थान और विभिन्न देशों में राजनयिक मिशन स्थापित करेगा। नया बलूच राष्ट्र अपनी विदेश नीति, रक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और संपूर्ण कूटनीति की जिम्मेदारी स्वयं संभालेगा।

11 अगस्त की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके महत्व को भी जानिए

11 अगस्त का दिन बलूच राष्ट्रवादियों के लिए काफी ऐतिहासिक माना जाता है। मीर यार बलूच के मुताबिक ब्रिटिश भारत के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान (कलात रियासत) ने खुद को एक स्वतंत्र और संप्रभु देश घोषित किया था। बलूच अलगाववादी समूह इसी तारीख को अपने मूल स्वतंत्रता दिवस के रूप में मानते आए हैं और अब उनका मुख्य ध्यान इसी आधार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक मान्यता हासिल करने पर केंद्रित है।

पाकिस्तानी सेना की पाबंदियां और ब्लैकआउट के दावे

बलूच नेता ने आरोप लगाया कि 11 अगस्त के स्वतंत्रता समारोहों को रोकने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों और सैन्य बलों ने कड़े प्रतिबंध लगाए थे। बयान में दावा किया गया कि कलात, क्वेटा और खुजदार सहित राज्य के कई हिस्सों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह निलंबित कर दी गईं।

सैन्य छावनियों और पुलिस स्टेशनों के आसपास गहरी खाइयां खोदी गईं और पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर व ड्रोन लगातार निगरानी करते रहे। अलगाववादी समूह ने दावा किया कि इन तमाम पाबंदियों और इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद बलूचिस्तान के विभिन्न हिस्सों में समर्थकों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया। हालांकि इंटरनेट सेवा बंद होने की वजह से तस्वीरों, वीडियो और रिपोर्टों के सामने आने में देरी हुई। वैसे बलूच नेता के इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी है।

आपको बता दें कि बलूच नेतृत्व ने बलूचिस्तान को संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र बताते हुए कहा कि प्रस्तावित गणराज्य वैश्विक स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय पहलों में बड़ा योगदान देने में सक्षम है। उनका कहना है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अंतरराष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करेगा और अपने राजनीतिक, आर्थिक व कूटनीतिक संस्थानों का तेजी से विकास करेगा।

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बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यहां दशकों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। इस क्षेत्र में जबरन गुमशुदगी, मानवाधिकार उल्लंघन और सैन्य कार्रवाई के आरोप लगातार लगते रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तानी अधिकारी अलगाववादी मांगों को खारिज करते हुए बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानते हैं और वहां सक्रिय सशस्त्र समूहों को सुरक्षा के लिए खतरा करार देते हैं।

Balochistan Independence Day: 11 अगस्त को ही आजादी सेलिब्रेट करने वाला था बलूचिस्तान, जानिए आज ही के दिन वहां क्या क्या हुआ

Balochistan Independence Day: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘आजादी दिवस’ मनाए जाने को लेकर एक बार फिर अलग देश की मांग तेज हो गई है। बलूचिस्तान में आज यानी 11 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाया जा रहा है। इस मौके पर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की है कि बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश के तौर पर कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक मान्यता दी जाए।

बलोच नेता मीर यार बलोच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी जाए। इस मौके पर बलूच नेता ने पाकिस्तान पर दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप भी लगाए हैं।

X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के छह करोड़ लोग हर साल 11 अगस्त को अपना राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। आज हम उस मुकाम पर पहंच गए हैं जहां हम सिर्फ अपनी आजादी का जश्न ही नहीं मनाते। बल्कि दुनिया से यह मांग भी करते हैं कि बलूचिस्तान की आजादी को कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक रूप से मान्यता दी जाए। आजादी के इस पवित्र अवसर पर बलूचिस्तान में रहने वाले बलोच, पश्तून, हिंदू, सिख, ईसाई और सभी धर्मों के भाइयों और बहनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।”

भारत का किया जिक्र

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य दुनिया के और खासकर भारत के बहादुर मुख्यधारा के मीडिया, थिंक टैंक, शोधकर्ताओं, कवियों, लेखकों, छात्रों, वकीलों, नागरिक समाज, व्यापारिक समुदाय, धार्मिक नेताओं, सांसदों और उन सभी भाइयों और बहनों का दिल से आभार व्यक्त करता है जिन्होंने बलोचिस्तान की आवाज को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया और हमारे लोगों की आवाज बने। बलूचिस्तान के लोगों को नैतिक समर्थन मिलना जारी रहना चाहिए ताकि हम अपनी जमीन, बलूचिस्तान से पाकिस्तान रूपी कैंसर को हटा सकें।”

50 हजार बलोच पाकिस्तान में कैद

बलूचिस्तान में आजादी को दबाने के पाकिस्तान के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हुए मीर यार बलोच ने दावा किया कि 50 हजार से ज्यादा बलोच अभी भी पाकिस्तान की यातना कोठरियों में अमानवीय अत्याचार सह रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम उन्हें कभी नहीं भूलेंगे। आज की आजादी की सफलता हमारे महान शहीदों, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं और कैदियों के अमर बलिदानों की वजह से मिली है।”

बलूचिस्तान में कुर्बानियों के मजबूत इतिहास को याद करते हुए उन्होंने कहा, “बलूचिस्तान के लोगों ने हमेशा विदेशी हमलावरों को रोका है। उन्हें बलूचिस्तान से पीछे हटने पर मजबूर किया है। पाकिस्तान के पास भले ही हजारों टैंक, सैकड़ों लड़ाकू विमान, तोपखाने और एक बड़ी सेना हो, फिर भी शारीरिक, मानसिक और लड़ने की क्षमता के मामले में बलूचिस्तान की सेना पाकिस्तान की सेना से 10 गुना ज्यादा ताकतवर और सफल है।

बलूचिस्तान की सेना एक मजबूत फोर्स है जो हर स्थिति का सामना करने में सक्षम है। दुनिया की पेशेवर सेनाओं से मुकाबला करने के लिए तैयार है। बलूचिस्तान के इलाके को देखते हुए एक बड़ी सेना की जरूरत है। इसलिए बलूचिस्तान गणराज्य ने पांच लाख सैनिकों की सेना तैयार की है।”

11 अगस्त को ही क्यों चुना अपनी ‘आजादी’ का दिन?

जब बलूचिस्तान ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित किया, तो ‘वर्ल्ड पीस यूनाइटेड’ के एम्बेसडर डॉ. परविंदर सिंह ने कहा, “1947 में जब अंग्रेज भारत से गए, तो पाकिस्तान और बांग्लादेश अपने मौजूदा रूप में मौजूद नहीं थे। लेकिन बलूचिस्तान मौजूद था। उसने 11 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से अपनी आजादी का ऐलान किया था। अगर बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाना चाहते हैं, तो उन्हें इसकी इजाजत मिलनी चाहिए। इसे विश्व शांति की दिशा में एक कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान की ज़मीन खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों, जैसे सोना और कीमती पत्थरों से बहुत समृद्ध है। अगर बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो जाता है, तो पाकिस्तान को अपने आर्थिक आधार का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा गंवाना पड़ सकता है, क्योंकि यह इलाका चीन और दूसरे देशों को खनिजों के निर्यात का मुख्य स्रोत है।”

उन्होंने आगे कहा, “बलूचिस्तान का हाथ से निकलना पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। यही वजह है कि पाकिस्तान उस पर से अपना नियंत्रण नहीं छोड़ना चाहता। आज 56 से ज्यादा देश बलूचिस्तान की आजादी का समर्थन करते हैं। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। एक ऐसा दौर जिसमें टकराव और जबरदस्ती से अब कोई नतीजा नहीं निकलता।”

दुनिया भर में मनाया गया आजादी का जश्न

मंगलवार को बलूचिस्तान ने अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। यह एक वार्षिक परंपरा का हिस्सा है, जिसे कई बलूच मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान की ओर से क्षेत्र के ‘अवैध कब्जे’ के विरोध के रूप में देखते हैं। बलूच स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ें 1947 तक जाती हैं, जब ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद कलात रियासत ने कुछ समय के लिए खुद को स्वतंत्र घोषित किया था। हालांकि, 1948 में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का विलय कर लिया, जिसका बलूच राष्ट्रवादी समूह लगातार विरोध करते रहे हैं।

सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म X पर मीर यार बलूच ने आरोप लगाया कि ‘कब्जा करने वाली’ पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में व्यापक प्रतिबंध लगाए हैं। उनके अनुसार, राष्ट्रीय आयोजनों को रोकने के लिए 7 अगस्त से 30 अगस्त तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखने का फैसला किया है। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती, सैन्य संसाधनों या हवाई शक्ति के इस्तेमाल के बावजूद पाकिस्तान बलूचिस्तान में अपनी मौजूदगी को अनिश्चित समय तक बनाए नहीं रख सकता, क्योंकि बलूच जनता का संकल्प मजबूत है।

मीर ने कहा, “बलूचिस्तान गणराज्य बलूच लोगों को उग्रवादी या अलगाववादी बताने की कोशिशों को खारिज करता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानी बलूचिस्तान की रक्षा, सुरक्षा और सैन्य ताकत का हिस्सा हैं और उन्हें छह करोड़ बलूच लोगों का समर्थन प्राप्त है। लोग उन पर भरोसा करते हैं क्योंकि वे इसी मिट्टी के बेटे-बेटियां हैं और अपने राष्ट्र के हित में काम करते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “ये बल किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं लड़ रहे हैं और न ही अशांति या हिंसा फैलाने के लिए काम कर रहे हैं। वे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य निभा रहे हैं, जिसमें शांति और सुरक्षा बनाए रखना, लोगों की रक्षा करना और एक शांतिपूर्ण, समृद्ध तथा विकसित बलूचिस्तान की नींव रखना शामिल है।”

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मीर ने दावा किया कि बलूच सशस्त्र समूहों की कार्रवाइयों का उद्देश्य उन नेटवर्कों को खत्म करना और बाहर निकालना है, जिन्हें वे पाकिस्तान से जुड़ा मानते हैं और जो उनके अनुसार बलूचिस्तान में अस्थिरता, असुरक्षा और हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं।

पाकिस्तान के 4 में से 2 सूबों में बागी तेवर:सरकार की पकड़ कमजोर; बलूचिस्तान-खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ी चुनौती

पाकिस्तान के चार सूबे हैं। इनमें से बलूचिस्तान सूबे में अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वा सूबे में अफगा​न तालिबान का दबदबा है। आए दिन तालिबान के हमलों से यहां पाक फौज के पांव उखड़ रहे हैं। पढ़िए बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा से भास्कर संवाददाता सिकंदर सूरी की ग्राउंड रिपोर्ट… बलूचिस्तान- PAK के हाथ से 70% क्षेत्र गया बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा है। यह देश के करीब 45% हिस्से में फैला है और इसकी सीमा ईरान से लगती है। दूर-दूर तक रेगिस्तान और वीरान पहाड़ हैं। लेकिन इन दिनों इस वीराने में सबसे ज्यादा गूंज गोलियों की सुनाई देती है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाके अलग देश की मांग को लेकर लड़ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का सूबे के करीब 70% हिस्से पर कब्जा है। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पाकिस्तानी सेना कितने विद्रोहियों को मार रही है या पकड़ रही है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार यहां पुलिस थाने चला पा रही है? क्या हाईवे सुरक्षित हैं? क्या बाजार खुल रहे हैं? और क्या लोग बिना डर के एक शहर से दूसरे शहर जा सकते हैं? बलूचिस्तान के कई इलाकों में हथियारबंद लड़ाके बेखौफ होकर क्वेटा, खुजदार और मस्तुंग जैसे शहरों में घुसते हैं। पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले करते हैं। कई जगह BLA के लड़ाके और पश्तून गुट सड़कों पर अपने नाके लगा लेते हैं। वहां से गुजरने वाले वाहनों की तलाशी लेते हैं और खुलेआम वसूली करते हैं। यही पैसा BLA के फंड में जाता है। गुस्सा… खनिज और पोर्ट पर चीन-अमेरिका का कब्जा है बलूचिस्तान को पाकिस्तान के खनिजों की खदान भी कहते हैं। बात शुरू की तो खुजदार शहर के युवक मोमिन का पाक सरकार पर गुस्सा फूट पड़ा। मोमिन कहते हैं यहां के ग्वादर पोर्ट पर चीन का कब्जा है। चीन ने सीपैक के नाम पर यहां लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। ग्वादर पोर्ट पर चीन की फिशिंग बोट्स का कब्जा है। स्थानीय बलूच मछुआरों को चीनी बोट्स खदेड़ देती हैं। इनकी बोट्स बड़ी और ज्यादा पावर वाली होती हैं। ज्यादातर बलूच मछुआरों के पास अब भी पालदार नौकाएं हैं। बलूच बेरोजगार हो रहे हैं। 55 साल के असलम का कहना है कि यहां के रेयर अर्थ मिनरल पर अमेरिका का कब्जा है। पाक आर्मी चीफ मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने मिनरल की नुमाइश करते हैं। इस खजाने पर केवल बलूचों का हक है। खैबर…यहां तालिबानी शरिया सरकार काबिज
खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। खैबर में पाक सरकार के कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदू, मिंगाेरा और मर्दन में ‘लोया जिरगा’ के जरिए ही कानून चलता है। ये जिरगा असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान इसका संरक्षक है। अफगान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) संगठन को अपने ठिकानों में पनाह देता है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में TTP के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही TTP ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब TTP काबिज है। आए दिन TTP के हमलों के कारण स्कूल और काॅलेज बंद रहते हैं। पंजाब और सिंध के मूल निवासी कर्मचारी खैबर में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते हैं। खौफ… हमलों से पाक की 50 फौजी चौकियां खाली खैबर पख्तूनख्वा में TTP के आए दिन होने वाले हमलों से पाक सेना में खौफ है। इस साल TTP फौज पर 145 से ज्यादा हमले कर चुकी है, इनमें 48 सैनिक मारे गए। खैबर में डूरंड लाइन पर अभी पाक सेना की 50 फौजी चौकियां खाली हैं। 22 पोस्ट पर ही पाक फौज तैनात है। स्वात में रहने वाले सगीर (22) का कहना है कि खैबर के लोग अपनी हुकूमत चाहते हैं। पाक सरकारों ने यहां पंजाबियों और सिंध के रिटायर्ड फौजियों को मुफ्त जमीन देकर बसाने की कोशिशें भी कीं। ये हमारी कबिलाई पहचान को मिटाने की साजिश थी। एक रणनीतिक विशेषज्ञ का कहना है कि TTP और इस्लामिक स्टेट खुरासान यानी आईएसकेपी जैसे संगठन हमलों में आपसी सहयोग कर रहे हैं। इन दोनों संगठनों की ताकत से अब खैबर में पाक सरकार के पांव उखड़ रहे हैं।

पाकिस्तान के 4 में से 2 सूबों में बागी तेवर:सरकार की पकड़ कमजोर; बलूचिस्तान-खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ी चुनौती

पाकिस्तान के चार सूबे हैं। इनमें से बलूचिस्तान सूबे में अलगाववादी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया हुआ है। खैबर पख्तूनख्वा सूबे में अफगा​न तालिबान का दबदबा है। आए दिन तालिबान के हमलों से यहां पाक फौज के पांव उखड़ रहे हैं। पढ़िए बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा से भास्कर संवाददाता सिकंदर सूरी की ग्राउंड रिपोर्ट… बलूचिस्तान- PAK के हाथ से 70% क्षेत्र गया बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा है। यह देश के करीब 45% हिस्से में फैला है और इसकी सीमा ईरान से लगती है। दूर-दूर तक रेगिस्तान और वीरान पहाड़ हैं। लेकिन इन दिनों इस वीराने में सबसे ज्यादा गूंज गोलियों की सुनाई देती है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के लड़ाके अलग देश की मांग को लेकर लड़ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का सूबे के करीब 70% हिस्से पर कब्जा है। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पाकिस्तानी सेना कितने विद्रोहियों को मार रही है या पकड़ रही है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार यहां पुलिस थाने चला पा रही है? क्या हाईवे सुरक्षित हैं? क्या बाजार खुल रहे हैं? और क्या लोग बिना डर के एक शहर से दूसरे शहर जा सकते हैं? बलूचिस्तान के कई इलाकों में हथियारबंद लड़ाके बेखौफ होकर क्वेटा, खुजदार और मस्तुंग जैसे शहरों में घुसते हैं। पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले करते हैं। कई जगह BLA के लड़ाके और पश्तून गुट सड़कों पर अपने नाके लगा लेते हैं। वहां से गुजरने वाले वाहनों की तलाशी लेते हैं और खुलेआम वसूली करते हैं। यही पैसा BLA के फंड में जाता है। गुस्सा… खनिज और पोर्ट पर चीन-अमेरिका का कब्जा है बलूचिस्तान को पाकिस्तान के खनिजों की खदान भी कहते हैं। बात शुरू की तो खुजदार शहर के युवक मोमिन का पाक सरकार पर गुस्सा फूट पड़ा। मोमिन कहते हैं यहां के ग्वादर पोर्ट पर चीन का कब्जा है। चीन ने सीपैक के नाम पर यहां लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। ग्वादर पोर्ट पर चीन की फिशिंग बोट्स का कब्जा है। स्थानीय बलूच मछुआरों को चीनी बोट्स खदेड़ देती हैं। इनकी बोट्स बड़ी और ज्यादा पावर वाली होती हैं। ज्यादातर बलूच मछुआरों के पास अब भी पालदार नौकाएं हैं। बलूच बेरोजगार हो रहे हैं। 55 साल के असलम का कहना है कि यहां के रेयर अर्थ मिनरल पर अमेरिका का कब्जा है। पाक आर्मी चीफ मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने मिनरल की नुमाइश करते हैं। इस खजाने पर केवल बलूचों का हक है। खैबर…यहां तालिबानी शरिया सरकार काबिज
खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। खैबर में पाक सरकार के कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदू, मिंगाेरा और मर्दन में ‘लोया जिरगा’ के जरिए ही कानून चलता है। ये जिरगा असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान इसका संरक्षक है। अफगान तालिबान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) संगठन को अपने ठिकानों में पनाह देता है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में TTP के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही TTP ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब TTP काबिज है। आए दिन TTP के हमलों के कारण स्कूल और काॅलेज बंद रहते हैं। पंजाब और सिंध के मूल निवासी कर्मचारी खैबर में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहते हैं। खौफ… हमलों से पाक की 50 फौजी चौकियां खाली खैबर पख्तूनख्वा में TTP के आए दिन होने वाले हमलों से पाक सेना में खौफ है। इस साल TTP फौज पर 145 से ज्यादा हमले कर चुकी है, इनमें 48 सैनिक मारे गए। खैबर में डूरंड लाइन पर अभी पाक सेना की 50 फौजी चौकियां खाली हैं। 22 पोस्ट पर ही पाक फौज तैनात है। स्वात में रहने वाले सगीर (22) का कहना है कि खैबर के लोग अपनी हुकूमत चाहते हैं। पाक सरकारों ने यहां पंजाबियों और सिंध के रिटायर्ड फौजियों को मुफ्त जमीन देकर बसाने की कोशिशें भी कीं। ये हमारी कबिलाई पहचान को मिटाने की साजिश थी। एक रणनीतिक विशेषज्ञ का कहना है कि TTP और इस्लामिक स्टेट खुरासान यानी आईएसकेपी जैसे संगठन हमलों में आपसी सहयोग कर रहे हैं। इन दोनों संगठनों की ताकत से अब खैबर में पाक सरकार के पांव उखड़ रहे हैं।

क्या पाकिस्तान का नक्शा बदलने वाला है और उससे अलग नया देश बन पाएगा बलूचिस्तान? समझिए आजादी के दावे के पीछे कितना दम

Balochistan Claim Explained: रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का दावा करने वाले बलूच समूहों ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील तेज कर दी है। पाकिस्तान से आजादी का ऐलान करने के बाद बलूचों के इस ग्लोबल कैंपेन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बलूचिस्तान वास्तव में दुनिया का सबसे नया संप्रभु देश बन सकता है और क्या इससे पाकिस्तान का नक्शा बदल जाएगा? इसको लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन चल रहे हैं लेकिन इंटरनेशन कानून और ग्लोबल डिप्लोमेसी का इतिहास बताता है कि सिर्फ स्वतंत्रता का ऐलान कर देने से ही कोई नया देश अस्तित्व में नहीं आ जाता। किसी भी क्षेत्र को नए राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए कूटनीतिक मान्यता, रीजनल कंट्रोल और इंटरनेशनल वैलिडेशन की सबसे बड़ी चुनौतियों से पार पाना होता है।

आजादी का ऐलान केवल पहला कदम, संप्रभुता के लिए क्या हैं नियम?

अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी क्षेत्र या समूह द्वारा खुद को स्वतंत्र घोषित करने पर प्रतिबंध नहीं लगाता। हालांकि सिर्फ एकतरफा ऐलान कर देने से ऑटोमेटिकली कोई नया देश नहीं बन जाता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मानदंडों के मुताबिक किसी क्षेत्र को संप्रभु राज्य के रूप में काम करने के लिए मुख्य रूप से चार शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है-

  • 1 – उस क्षेत्र में एक स्थायी आबादी होनी चाहिए।
  • 2 – उस देश की एक डिफाइंड टेरिटरी और बॉर्डर होना चाहिए।
  • 3 – उस देश में एक प्रभावी सरकार होनी चाहिए।
  • 4 – दूसरे संप्रभु देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।

अगर बलूच समूह इनमें से कुछ शर्तों का आंशिक रूप से दावा भी करते हैं तब भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बिना कोई भी नया क्षेत्र वैश्विक संस्थाओं का हिस्सा नहीं बन सकता।

कूटनीतिक मान्यता: बलूचिस्तान के राह की सबसे बड़ी रुकावट

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने ग्लोबल कम्युनिटी से संप्रभुता स्वीकार करने की अपील की तो है लेकिन अब तक दुनिया के किसी भी देश ने इसे आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। कूटनीतिक मान्यता एक संप्रभु देश द्वारा लिया जाने वाला विशुद्ध राजनीतिक निर्णय होता है। जब तक बलूचिस्तान को अन्य देशों से औपचारिक कूटनीतिक मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह संयुक्त राष्ट्र (UN) का सदस्य नहीं बन सकता। इसके अलावा अन्य देशों के साथ सामान्य कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता। इसके साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF, विश्व बैंक) का फायदा उसे नहीं मिल सकता।

जमीनी हकीकत: पाकिस्तान का प्रशासनिक व सैन्य नियंत्रण

संप्रभु देश का दर्जा हासिल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानदंडों में से एक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण है। भले ही बलूचिस्तान के अलग अलग हिस्सों में अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं लेकिन इस्लामाबाद अभी भी अपने नागरिक प्रशासन, सुरक्षा बलों और न्यायिक प्रणाली के माध्यम से इस पूरे प्रांत पर संवैधानिक और प्रशासनिक नियंत्रण रखता है। जब तक पाकिस्तान का इस प्रांत पर व्यावहारिक और प्रशासनिक नियंत्रण बना रहता है तब तक बलूचिस्तान की संप्रभुता के किसी भी दावे को व्यावहारिक धरातल पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर क्या कहता है?

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का तर्क है कि उनके लोगों के पास आत्मनिर्णय का अधिकार है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दस्तावेज आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करते हैं लेकिन इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूदा संप्रभु राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता की भी कड़ाई से रक्षा करता है। ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही किसी देश से अलग होने का समर्थन किया है, जैसे कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति या व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ लंबे समय से जारी सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में।

क्या भारत दे सकता है बलूचिस्तान को मान्यता?

बलूच नेताओं द्वारा कूटनीतिक समर्थन की अपील के बाद यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत बलूचिस्तान को एक अलग देश के रूप में मान्यता दे सकता है? भारत का आधिकारिक और पुराना कूटनीतिक रुख यही रहा है कि वह बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानता है। भारत ने बलूचिस्तान में मानव अधिकारों के उल्लंघन और सुरक्षा चिंताओं का मुद्दा तो बार-बार उठाया है लेकिन उसने अलगाववादी दावों या अलग देश की घोषणा को कभी औपचारिक मान्यता नहीं दी है। किसी भी अलग हुए क्षेत्र को मान्यता देना भारत की लंबी अवधि की विदेश नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव होगा, जिसके व्यापक भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।

इतिहास के सबक: सिर्फ घोषणा से नहीं बनते नए देश

आपको बता दें कि दुनिया का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि सिर्फ स्वतंत्रता की घोषणा करने से राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता। इसे कोसोवो के उदाहरण से समझा जा सकता है। कोसोवो ने 2008 में अपनी आजादी की घोषणा की थी और उसे 100 से अधिक देशों ने मान्यता दी है लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी वैश्विक शक्तियां आज भी इसे पूर्ण देश नहीं मानती हैं। सोमालीलैंड, उत्तरी साइप्रस और ट्रांसनिस्ट्रिया जैसे क्षेत्रों के पास वर्षों से अपना खुद का शासन ढांचा है लेकिन व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता न मिलने की वजह से वे आज भी औपचारिक देशों की श्रेणी से बाहर हैं।

पाकिस्तान के लिए चुनौतियां और बलूचिस्तान का भविष्य

बलूच अलगाववादी समूहों की यह ताजा घोषणा ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता, खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद और बलूचिस्तान में जारी उग्रवाद से जूझ रहा है। 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस घोषित करने और कूटनीतिक अपील करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान के मुद्दे पर ध्यान जरूर आकर्षित हुआ है। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानूनी और कूटनीतिक ढांचे के तहत बलूचिस्तान के एक मान्यता प्राप्त संप्रभु देश बनने की राह बेहद कठिन और अनिश्चित है। जब तक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण, व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता और वैश्विक संस्थाओं में प्रवेश हासिल नहीं होत, तब तक सिर्फ स्वतंत्रता के दावों से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बलूचिस्तान की कानूनी स्थिति रातों-रात नहीं बदल सकती।