Suzlon Energy Share Price: ये 6 बातें तय करेंगी शेयरों की चाल, समझ लें सुजलॉन में निवेश से पहले

Suzlon Energy Share Price: 8 अक्टूबर को एक साल के निचले स्तर पर आने के बाद से विंट टर्बाईन बनाने वाली सुजलॉन एनर्जी के शेयरों ने शानदार वापसी की है। ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल के बुलिश रुझान से इसे और सपोर्ट मिला और यह 3% से अधिक उछल पड़ा। मोतीलाल ओसवाल ने ₹65 के टारगेट प्राइस के साथ इसकी खरीदारी की रेटिंग को बरकरार रखा है। ओवरऑल इसे कवर करने वाले 12 एनालिस्ट्स में से 10 ने इसे खरीदारी और 2 ने होल्ड रेटिंग दी है। किसी भी एनालिस्ट ने इसे बेचने की सलाह नहीं दी है। अब शेयरों की बात करें तो फिलहाल बीएसई पर यह 1.84% की बढ़त के साथ ₹38.27 पर है। इंट्रा-डे में यह 3.14% उछलकर ₹38.76 तक पहुंच गया था।

Suzlon पर Motilal Oswal को भरोसा क्यों कायम?

तीन महीने में सुजलॉन एनर्जी के शेयर 31% नीचे आए। इस गिरावट के साथ अब यह वित्त वर्ष 2028 की प्रति शेयर कमाई (EPS) के मुकाबले 17.5 गुना पर है जोकि इसके एक साल के औसत फारवर्ड P/E से करीब 20% डिस्काउंट पर है। ऐसे में सुजलॉन का शेयरों का वैल्यूएशन काफी आकर्षक हो गया। ब्रोकरेज फर्म के मुताबिक सुजलॉन की कमाई वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में अधिक होती रही है और कंपनी के सालाना EBITDA में इसकी 60-65% हिस्सेदारी रहती है। ऐसे में इस बार भी वित्त वर्ष 2027 की दूसरी छमाही में ऐसी ही मजबूती के आसार हैं क्योंकि डिलीवरी पहली छमाही में 1.2 गीगावाट से बढ़कर दूसरी छमाही में 2.1 गीगावाट पहुंच सकती है।

जून तिमाही के आखिरी में सुजलॉन एनर्जी की ऑर्डर बुक 5.9 GW थी, जिससे वित्त वर्ष 2028 की तीसरी तिमाही तक डिलीवरी की तस्वीर साफ दिख रही है। ब्रोकरेज फर्म को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2026-2028 के दौरान सुजलॉन एनर्जी का EBITDA सालाना 22% की रफ्तार यानी CAGR से बढ़ेगा।

इस वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में देश की विंड कैपेसिटी 3 गीगावाट बढ़ी और ब्रोकरेज फर्म के मुताबिक अब तक दूसरी छमाही में पहली की तुलना में डेढ़ गुना इंस्टॉलेशन होता रहा है तो इस बार दूसरी छमाही में करीब 4.5 गीगावाट के इंस्टॉलेशन की उम्मीद है जोकि सुजलॉन जैसी विंड टर्बाईन बनाने वाली कंपनियों के लिए पॉजिटिव है। सरकार ने इस वित्त वर्ष 2027 में 7.5–8 GW नई पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ने का लक्ष्य तय किया हुआ है।

मोतीलाल ओसवाल का कहना है कि शाम के समय बिजली की बढ़ती मांग से विंड-सोलर हाइब्रिड और FDRE (फर्म एंड डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी) प्रोजेक्ट्स के जरिए विंड कैपेसिटी बढ़ोतरी को सपोर्ट मिल सकता है और यह सुजलॉन एनर्जी के लिए पॉजिटिव है।

मोतीलाल ओसवाल के मुताबिक सुजलॉन एनर्जी को तीन वजहों- DevCo को अच्छे रिस्पांस, निर्यात और पुराने टर्बाईनों को बदलने के मौके से मजबूत सपोर्ट मिल सकता है। डेवको मॉडल की बात करें तो इस वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में ही 600 MW से अधिक के ऑर्डर मिले, जो कुल ऑर्डर का 60% हिस्सा हैं।

मोतीलाल ओसवाल के मुताबिक सुजलॉन को सरकार के स्थानीय प्रोत्साहन से मजबूत सपोर्ट मिल रहा है।

एक साल में कैसी रही शेयरों की चाल

सुजलॉन एनर्जी के शेयरों ने निवेशकों को तगड़ा शॉक दिया है। पिछले साल 6 नवंबर, 2025 को बीएसई पर यह ₹61.45 के भाव पर था, जो इसके शेयरों के लिए एक साल का रिकॉर्ड हाई लेवल है। इस हाई लेवल से 11 महीने में यह 40.93% टूटकर 8 अक्टूबर 2026 को यह एक साल के निचले स्तर ₹36.30 पर आ गया।

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

How to read stock chart: चार्ट पढ़ने का सही तरीका, धड़ाधड़ बनेगा शेयर मार्केट से पैसा

How to read stock chart: अगर आप स्टॉक मार्केट में ट्रेडिंग करते हैं तो प्राइस चार्ट में एक चीज जरूर नोटिस की होगी कि भाव एक सीधी रेखा में नहीं चलते हैं। वे अक्सर कुछ खास प्राइस लेवल पर रुकती हैं, उछाल लेती हैं या अपनी दिशा बदल देती हैं। ऐसा बार-बार होता है, जैसे कि कोई फर्श (Floor) या छत (Ceiling) मौजूद हो। यह कोई संयोग नहीं है बल्कि टेक्निकल एनालिसिस की सबसे पुरानी और अहम अवधारधाओं में से एक है। ऐसे में ट्रेडिंग के लिए सपोर्ट और रेजिस्टेंस को समझना बहुत जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ चार्ट देखने वाले शख्स और इसे वास्तव में समझने वाले के बीच बड़ा फर्क पैदा करता है।

क्या है Support और Resistance

सपोर्ट वह प्राइस लेवल होता है, जहां किसी गिरावट के दौरान भाव का नीचे जाना रुक सकता है या यह ऊपर की तरफ मुड़ सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस लेवल पर खरीदारी करने वालों की दिलचस्पी इतनी बढ़ जाती है कि वे बिकवाली के दबाव को कम कर देते हैं। यह एक तरह से फर्श की तरह काम करता है, जहां से नीचे जाने में शेयर को कठिनाई हो सकती है।

रेजिस्टेंस इसके बिल्कुल विपरीत होता है। यह वह प्राइस लेवल है, जहां तेजी के दौरान शेयरों के भाव का ऊपर जाना रुक सकता है या कीमत वापस नीचे की तरफ मुड़ सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस स्तर पर बिकवाली का दबाव खरीदारी के दबाव से अधिक हो जाता है। यह एक छत (Ceiling) की तरह होता है, जिसे ऊपर की तरफ तोड़ना मुश्किल होता है।

एक उदाहरण से समझें। नीचे चार्ट में Siemens के शेयरों की छह महीने में ₹3300 और ₹4200 के बीच की उठा-पटक का चार्ट है। इसमें देख सकते हैं कि जब भी शेयर की कीमत ₹3,300 के करीब गिरती है, तो खरीदार एक्टिव हो जाते हैं और भाव चढ़ने लगते हैं तो दूसरी तरफ जब भी शेयर की कीमत ₹4,150–₹4,200 के करीब पहुंचती है, तो सेलर्स एक्टिव हो जाते हैं और भाव फिसलने लगते हैं। इस स्थिति में ₹3300 सपोर्ट और ₹4150-₹4200 रेजिस्टेंस के तौर पर काम कर रहा है।

support

क्यों होते हैं ये लेवल्स

सपोर्ट और रेजिस्टेंस लेवल कोई मैजिक लाइन नहीं हैं, जो किस्मत से नहीं बनती हैं बल्कि ये ट्रेडर्स के खरीदारी-बिक्री के पैटर्न को दिखाते हैं। इनके बनने की कुछ वजह हैं-

मार्केट साइकोलॉजी: ट्रेडर्स को पुराने अहम प्राइस लेवल याद रहते हैं। जब शेयरों की कीमत दोबारा उन लेवल पर पहुंचती है, तो वे फिर से खरीदने या बेचने का फैसला ले सकते हैं। इससे ये लेवल मजबूत हो सकते हैं।

सप्लाई और डिमांड: सपोर्ट के पास खरीदारी बढ़ सकती है, जबकि रेजिस्टेंस के पास बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है।

मनोवैज्ञानिक स्तर: ₹1,000, ₹2,000 या ₹5,000 जैसे राउंड नंबर्स अक्सर अहम प्राइस लेवल के तौर पर काम करती हैं।

संस्थागत ट्रेडिंग: बड़े संस्थागत निवेशक और ट्रेडर्स कई बार अहम प्राइस लेवल के आसपास बड़े ऑर्डर लगाते हैं।

ऑर्डर क्लस्टरिंग: सपोर्ट और रेजिस्टेंस के आस-पास स्टॉप लॉस ऑर्डर और प्रॉफिट टारगेट हो सकते हैं। जब शेयर ये लेवल तोड़ती हैं, तो कई ऑर्डर एक साथ एक्टिव हो सकते हैं, जिससे तेज ब्रेकआउट या ब्रेकडाउन देखने को मिल सकता है।

Role Reversal: सपोर्ट बन सकता है रेजिस्टेंस तो रेजिस्टेंस नया सपोर्ट

सपोर्ट और रेजिस्टेंस फिक्स्ड नहीं होते हैं बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि सपोर्ट अगला रेजिस्टेंस बन जाए या रेजिस्टेंस नया सपोर्ट बन जाए। इस रोल रिवर्सल को पोलरिटी फ्लिपिंग कहते हैं।

अगर कोई प्राइस लेवल काफी समय से सपोर्ट का काम कर रहा था, लेकिन भाव उससे भी नीचे आ गए। ऐसे में जिन ट्रेडर्स ने उस स्तर पर शेयर खरीदे थे, वे घाटे में आ गए तो शेयर जब दोबारा पुराने सपोर्ट लेवल तक पहुंचती है, तो उनमें से कुछ ट्रेडर्स अपने नुकसान से बाहर निकलने या ब्रेक-ईवन पर बेचने की कोशिश कर सकते हैं। इससे उस लेवल पर बिकवाली बढ़ सकती है और जो स्तर पहले सपोर्ट था, वह अब रेजिस्टेंस बन सकता है।

वहीं दूसरी तरफ जब शेयर किसी रेजिस्टेंस को तोड़कर ऊपर निकलते हैं, तो बाद में उसी लेवल पर वापस आने पर वहां खरीदारी बढ़ सकती है। इस तरह पुराना रेजिस्टेंस नया सपोर्ट बन सकता है।

उदाहरण के लिए, पेटीएम का शेयर ₹1,250–₹1,270 के लेवल के ऊपर टिक नहीं पा रहा था और यह लेवल रेजिस्टेंस का काम कर रहा था। हालांकि जब शेयर इस रेजिस्टेंस को तोड़कर ऊपर निकल गया और ₹1,400 तक पहुंच गया और इसके बाद शेयर वापस गिरकर ₹1,290 तक आए और फिर वहां से उछलकर ऊपर जाने लगे। इस स्थिति में ₹1,250–₹1,270 का पुराना रेजिस्टेंस अब नए सपोर्ट के रूप में काम करने लगा।

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