ट्रम्प ने भारत की चुनाव व्यवस्था की तारीफ की:कहा- 64.6 करोड़ वोटर्स के पास फोटो आईडी, अमेरिका में भी हो जरूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत की चुनाव व्यवस्था का हवाला देते हुए ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पास कराने की अपील की है। उन्होंने कहा कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से पूछा था कि वैध फोटो पहचान पत्र के बिना अमेरिका में चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं। ट्रम्प ने कहा कि हर अमेरिकी मतदाता के लिए फोटो आईडी जरूरी होनी चाहिए, ताकि चुनावी धोखाधड़ी पर रोक लगाई जा सके। उन्होंने ये बातें ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहीं। पंजीकरण के लिए नागरिकता का प्रमाण दिखाना जरूरी सेव अमेरिका एक्ट के तहत अमेरिका में वोटर के तौर पर पंजीकरण कराने के लिए नागरिकता का प्रमाण दिखाना जरूरी होगा। इसके अलावा, पूरे देश में मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता लागू करने का प्रस्ताव है। इस कानून में डाक से वोट देने की प्रक्रिया को काफी सीमित करने की बात भी कही गई है। ट्रंप लगातार सेफगार्ड अमेरिकन वोटर एलिजिबिलिटी (SAVE) यानी सेव अमेरिका एक्ट को पास कराने पर जोर दे रहे हैं और उनका दावा है कि इससे चुनावी धोखाधड़ी पर रोक लगेगी। सीनेट में आगे नहीं बढ़ी प्रक्रिया इस मुद्दे पर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों पार्टी में मतभेद हैं। इसी वजह से अमेरिकी सीनेट इस महीने की शुरुआत में कानून पास करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाए बिना पांच हफ्ते के अवकाश पर चली गई। ————- ये खबर पढ़ें… ट्रम्प बोले- लेविट को मुझसे ज्यादा अपने बच्चे पसंद:व्हाइट हाउस में उनकी जगह लेना मुश्किल; लेविट का प्रेस सेक्रेटरी के पद से इस्तीफा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट के पद छोड़ने पर मजाक किया। पूरी खबर पढ़ें…

ईरान-अमेरिका के बीच 60 दिन की डेडलाइन खत्म:फिर ट्रम्प ने हमले का आदेश क्यों नहीं दिया; दुश्मन को 3 तरफ से घेरने की स्ट्रैटजी

अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिन का समझौता सोमवार को खत्म हो गया। इसका मकसद दोनों देशों के बीच युद्ध रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विवाद का समाधान निकालना था। डेडलाइन खत्म होने के बावजूद न तो कोई फाइनल समझौता हुआ, न ही अमेरिका ने ईरान पर बड़ा हमला शुरू किया। 60 दिनों के दौरान ट्रम्प ने कई बार कहा कि अगर बातचीत नाकाम रही तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। माना जा रहा था कि डेडलाइन खत्म होते ही अमेरिका फिर बड़ा हमला कर सकता है। समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले ट्रम्प का रुख बदलता दिखा। एक्सियोस को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, “हम पहले के मुकाबले हल्का रुख अपना रहे हैं।” वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका, ईरान को तीन तरीके से घेर रहा है। 1. आर्थिक दबाव- ईरान की कमाई और अर्थव्यवस्था को कमजोर करना। 2. नौसैनिक नाकाबंदी- ईरान के लिए समुद्र के रास्ते व्यापार मुश्किल करना। 3. बातचीत- सीधे या दूसरे देशों के जरिए ईरान से समझौते की कोशिश करना। ट्रम्प के इस बयान का मतलब अभी अमेरिका सीधे बड़ा हमला करने की बजाय ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है, समुद्र के रास्ते उसका व्यापार रोक रहा है और बातचीत से समझौते की कोशिश भी कर रहा है। ट्रम्प हमला रोककर क्या हासिल करना चाहते हैं? ट्रम्प की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका युद्ध को खत्म नहीं मान रहा है। ट्रम्प को लगता है कि फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना सैन्य हमले से ज्यादा असरदार हो सकता है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने ईरान की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। ट्रम्प का मानना है कि अगर ईरान युद्ध में नहीं उलझा रहेगा तो उसे अपनी असली आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। जैसे कि बर्बाद बुनियादी ढांचा, कमजोर अर्थव्यवस्था, महंगाई और पैसों की कमी। यानी अमेरिका का दांव यह है कि युद्ध रोककर ईरान को कमजोर होने दिया जाए। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने शनिवार को कहा कि अमेरिका कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य तीनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि युद्ध जारी रहने पर ईरानी सरकार अपनी आर्थिक परेशानियों के लिए जंग को जिम्मेदार ठहरा सकती है। जब युद्ध नहीं होगा, तब जनता और सरकार को आर्थिक संकट का सामना सीधे करना पड़ेगा। ट्रम्प को ईरान के खिलाफ रणनीति क्यों बदलनी पड़ी? ट्रम्प ने फरवरी में इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। शुरुआत में उम्मीद थी कि संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन यह कई महीनों तक खिंच गया। अब अमेरिका के सामने दो तरह का दबाव है। एक तरफ वह ईरान के खिलाफ अपने सैन्य लक्ष्य हासिल करना चाहता है, दूसरी तरफ लंबे युद्ध की बढ़ती लागत भी उसके लिए चिंता बन रही है। ट्रम्प लगातार कहते रहे हैं कि ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका के सामने दो रास्ते हैं- या तो ईरान को आर्थिक रूप से टूटने दिया जाए या फिर उस पर बहुत बड़ा सैन्य हमला किया जाए। फिलहाल ट्रम्प पहला रास्ता आजमाते दिख रहे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका ने टकराव खत्म कर दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प सरकार चीन की उन रिफाइनरियों पर नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है जो ईरानी तेल खरीदती हैं। इसके अलावा ईरान के साथ लेन-देन करने वाले चीनी बैंकों और उन संस्थाओं पर भी कार्रवाई की तैयारी है, जिन पर प्रतिबंधों से बचने में ईरान की मदद करने का आरोप है। यानी हमला भले ही रुका हुआ है, लेकिन दबाव कम नहीं हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा सौदेबाजी का मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा टकराव में होर्मुज स्ट्रेट सबसे बड़ा दांव बन गया है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किसी भी तरह की रुकावट का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। ईरान इस मुद्दे पर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है। 9 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि ओमान के साथ समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। लेकिन तेहरान ने यह भी साफ कर दिया कि ओमान के साथ समझौता होने का मतलब यह नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करे, प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा दे। यानी अमेरिका चाहता है कि समुद्री रास्ते और जहाजों की आवाजाही सामान्य हो, जबकि ईरान इसे अमेरिकी रियायतों से जोड़कर देख रहा है। इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा सौदेबाजी का हथियार बन चुका है। युद्ध की बड़ी कीमत चुका रहा अमेरिका सूत्रों के मुताबिक, ईरान के साथ पांच महीने चले युद्ध में अमेरिका ने लंबी दूरी तक मार करने वाली बड़ी संख्या में मिसाइलें इस्तेमाल की हैं। इनमें ATACMS और प्रिसीजन स्ट्राइक मिसाइल शामिल हैं। दो सूत्रों ने दावा किया कि अमेरिका ने इन हथियारों का लगभग पूरा भंडार इस्तेमाल कर लिया है, हालांकि उन्होंने सटीक संख्या नहीं बताई। अमेरिका युद्ध के दौरान कम से कम 45 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन भी गंवा चुका है। यह उसके कुल बेड़े का करीब 25% है। अमेरिकी वायुसेना के मुताबिक, एक रीपर ड्रोन की कीमत उसके उपकरणों के आधार पर 3 से 5 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, इन नुकसानों की कुल कीमत 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती है। इन ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास निगरानी और हमलों के लिए किया गया था। कम ऊंचाई और धीमी गति के कारण ये ईरानी बलों और ईरान समर्थित समूहों के निशाने पर रहे। युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका के पास करीब 185 रीपर ड्रोन थे। इनमें 165 वायुसेना और 20 मरीन कॉर्प्स के पास थे। मई में अमेरिकी वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डेविड टैबर ने सीनेट को बताया था कि वायुसेना के पास करीब 135 रीपर ड्रोन बचे हैं। पेंटागन पहले से ही रीपर ड्रोन को धीरे-धीरे हटाकर उनकी जगह कम कीमत वाले नए हथियारबंद ड्रोन लाने की योजना पर काम कर रहा है। लंबी दूरी की मिसाइलों की कीमत भी 10 लाख डॉलर से ज्यादा होती है। इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में भी किया गया है। अगर अमेरिका के पास इन हथियारों का भंडार कम होता है तो भविष्य में ईरान पर बड़े हमले या रूस और चीन जैसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उसकी सैन्य क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि एक अन्य अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका दुनिया भर में मौजूद अपने सैन्य भंडार से इन हथियारों की फिर से आपूर्ति कर सकता है। ईरान की मांगें क्या हैं? अमेरिका आर्थिक दबाव बढ़ाकर ईरान को समझौते के लिए तैयार करना चाहता है। लेकिन ईरान भी अपने पास मौजूद विकल्पों का इस्तेमाल कर रहा है। होर्मुज स्ट्रेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज खोलने के लिए 6 मांगें रखी हैं। यानी अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जबकि ईरान दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग पर अपनी पकड़ को दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत की गुंजाइश होते हुए भी समझौते की राह आसान नहीं है।
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ईरान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी दी:कहा- ईरान मुद्दे पर बीच में न आए; IRGC का अमेरिका से बातचीत का दावा खारिज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में बाधा बना, तो अमेरिका उस पर ‘बमबारी करेगा’। पूरी खबर यहां पढ़ें…

ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी दी:कहा- ईरान मुद्दे पर बीच में न आए; IRGC का अमेरिका से बातचीत का दावा खारिज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में बाधा बना, तो अमेरिका उस पर ‘बमबारी करेगा’। रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को फोन पर हुई बातचीत में ट्रम्प ने यह धमकी दी। हालांकि, ट्रम्प ने यह नहीं बताया कि ओमान ने ऐसा क्या किया था जिसे वह रुकावट मान रहे हैं। ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि अमेरिका का ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के साथ सीक्रेट बातचीत जारी है। हालांकि, IRGC ने कुछ देर बाद ही ट्रम्प के इस दावे को खारिज कर दिया और कहा कि अमेरिका के साथ उसकी कोई बातचीत नहीं हो रही है। अमेरिका-ईरान की बातचीत में ओमान मध्यस्थ देश ओमान लंबे समय से खुद को इस संघर्ष में तटस्थ देश बताता रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में भी वह मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद ईरान की ओर से ओमान पर कई हमले हुए, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच बातचीत कराने में उसकी भूमिका बनी रही। ट्रम्प का बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह पहली बार है जब उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे ओमान को सीधे सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है। होर्मुज स्ट्रेट पर टिकी है पूरी बातचीत ओमान इस समय होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने के मुद्दे पर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में अहम भूमिका निभा रहा है। युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही काफी हद तक रोक रखी है। दुनिया 20% कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से गुजरता है। इसलिए इस समुद्री मार्ग को दोबारा खोलना दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। ईरान बोला- जहाजों के रास्ते पर समझ बनी ट्रम्प की धमकी से कुछ घंटे पहले ईरान ने दावा किया था कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच समझ बन गई है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने सोमवार को तेहरान में पत्रकारों से कहा कि दोनों पक्ष जहाजों के आने-जाने के रास्ते पर सहमत हो गए हैं। अब सिर्फ बाकी तकनीकी और प्रशासनिक विवरण तय किए जाने हैं, जिसके बाद संयुक्त बयान जारी किया जाएगा। IRGC ने ट्रम्प के दावे को झूठ बताया ट्रम्प के इस दावे को ईरान की अर्ध-सरकारी न्यूज एजेंसी तस्नीम न्यूज के हवाले से IRGC ने खारिज कर दिया। IRGC के एक प्रवक्ता ने कहा कि उसके अधिकारियों और अमेरिका के बीच किसी तरह की बातचीत नहीं हो रही है। उन्होंने ट्रम्प के बयान को झूठ बताते हुए कहा कि यह युद्ध में हार और निराशा से पैदा हुई उनकी कल्पना है। IRGC ईरान की सबसे प्रभावशाली सैन्य संस्थाओं में से एक है। देश की सुरक्षा, राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी उसकी अहम भूमिका मानी जाती है। होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले मुआवजा चाहता है ईरान ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस महीने की शुरुआत में कह चुके हैं कि होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका ईरान को मुआवजा देता है या नहीं। ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने दोनों देशों के बीच हुए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) का उल्लंघन किया है। रॉयटर्स ने पहले एक ईरानी अधिकारी के हवाले से बताया था कि ईरान चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के माल की कीमत का 5 से 7% शुल्क लिया जाए। ट्रम्प बोले- युद्ध खत्म करने की कोई जल्दी नहीं फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रम्प ने कहा कि उन्हें ईरान के साथ युद्ध खत्म करने की कोई जल्दी नहीं है। उन्होंने ईरान की तुलना अच्छे पोकर खिलाड़ी से करते हुए कहा कि ईरान के लोग अच्छे खिलाड़ी हैं, लेकिन वे मर रहे हैं। ट्रम्प ने कहा कि उनकी कोई समय सीमा तय नहीं है। नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों का भी उनके फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने अमेरिका के हथियारों के भंडार को लेकर उठ रही चिंताओं को भी खारिज करते हुए कहा कि इस्तेमाल किए गए हथियार उसकी कुल सैन्य क्षमता के मुकाबले बहुत कम हैं। अमेरिका-ईरान के बीच 60 दिन का MoU आज खत्म हो रहा अमेरिका और ईरान के बीच 18 जून को हुआ 60 दिन का एमओयू 17 अगस्त को खत्म हो रहा है। इसका मकसद दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखना और स्थायी समझौते तक पहुंचना था। हालांकि, दोनों देशों ने बाद में एक-दूसरे पर फिर हमले शुरू कर दिए और 8 जुलाई को ट्रम्प ने युद्धविराम खत्म होने का ऐलान कर दिया। अब MoU की अवधि पूरी होने के बीच दोनों देशों के बीच बातचीत का सबसे अहम मुद्दा फिर से होर्मुज स्ट्रेट को खोलना बना हुआ है। ट्रम्प ने फिर दोहराया- ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे MoU की अवधि खत्म होने से पहले ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर कहा कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता यही रहेगी कि ईरान किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल न कर सके। यानी एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, वहीं दूसरी तरफ ट्रम्प ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अपना सख्त रुख भी बनाए हुए हैं।

ईरान पर अमेरिका करेगा परमाणु हमला? होर्मुज पर तनाव के बीच मार्जोरी टेलर के दावे से दुनिया भर में हड़कंप

ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज को लेकर तनाव चरम पर है। ट्रंप लगातार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपने कंट्रोल का दावा कर रहे हैं। हालांकि फिलहाल दोनों देशों के बीच मिसाइल अटैक तो नहीं हो रहा लेकिन गतिरोध बना हुआ है। इस बीच अब एक अमेरिकी नेत्री के दावे ने दुनिया भर में टेंशन बढ़ा दी है।

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नेचिरवान बरजानी कौन हैं, जिनके जरिए हुई अमेरिका-ईरान बातचीत:ट्रम्प IRGC चीफ तक नहीं पहुंच पाए, बरजानी के जरिए हुई सीक्रेट बात

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के दौरान मई में दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए एक सीक्रेट चैनल बनाया गया था। अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस के मुताबिक, इस संपर्क में इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति नेचिरवान बरजानी ने अहम भूमिका निभाई। बरजानी ऐसे नेताओं में गिने जाते हैं, जिनके अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे रिश्ते हैं। दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म करने को लेकर बातचीत शुरू हुई थी। अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान की ओर से संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची बातचीत कर रहे थे। लेकिन बातचीत के बीच अमेरिका के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। उसे यह पता करना था कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का भी समर्थन हासिल है या नहीं। इसके लिए अमेरिका ने बरजानी की मदद ली। बरजानी ने IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी से सीधे संपर्क किया। अमेरिका खुद IRGC चीफ तक नहीं पहुंच पा रहा था अमेरिका खुद वाहिदी से संपर्क नहीं कर पा रहा था। ट्रम्प प्रशासन जानता था कि ईरान में खासकर सुरक्षा और परमाणु जैसे संवेदनशील मामलों में सिर्फ सरकार नहीं IRGC का भी बड़ा रोल है। मई की शुरुआत तक व्हाइट हाउस को लग रहा था कि दोनों देशों के बीच समझौता हो सकता है। लेकिन बातचीत अचानक अटक गई। ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव पर करीब 10 दिन तक कोई जवाब नहीं दिया। इससे ट्रम्प प्रशासन को शक हुआ कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची शायद अंतिम फैसला लेने की स्थिति में नहीं हैं। अमेरिका यह जानना चाहता था कि जो बातें दोनों नेता कर रहे हैं, क्या IRGC भी उनसे सहमत है या नहीं। बरजानी ही क्यों बने अमेरिका की पसंद? नेचिरवान बरजानी इराक के उत्तरी हिस्से में मौजूद कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति हैं। यह इलाका इराक का हिस्सा है, लेकिन यहां अपनी सरकार, संसद और सुरक्षा बल हैं। इसकी राजधानी एरबिल है। कुर्दिस्तान क्षेत्र लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है। वहीं, इसकी ईरान से भी नजदीकी है। बरजानी के ईरान से पुराने व्यक्तिगत रिश्ते भी हैं। ईरान-इराक युद्ध के दौरान बरजानी ने ईरान में समय बिताया और तेहरान यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। वह फारसी भाषा बोलते हैं और ईरान के कई बड़े नेताओं और अधिकारियों से उनके निजी संबंध हैं। यानी बरजानी की खासियत यह थी कि उनके पास अमेरिका और ईरान दोनों तक पहुंच थी। यही वजह थी कि वह दोनों पक्षों के बीच बातचीत में मदद करने के लिए उपयोगी साबित हुए। बरजानी परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता नेचिरवान बरजानी का जन्म 1966 में एरबिल में हुआ था। वे कुर्द राजनीति के सबसे प्रभावशाली बरजानी परिवार से आते हैं। उनके दादा मुस्तफा बरजानी आधुनिक कुर्द आंदोलन के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। वहीं, उनके चाचा मसूद बरजानी कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति रह चुके हैं। यानी नेचिरवान ऐसे परिवार से आते हैं, जिसकी कई पीढ़ियों से कुर्द राजनीति में मजबूत पकड़ रही है। सद्दाम हुसैन के दौर में ईरान जाना पड़ा सद्दाम हुसैन के शासनकाल में कुर्दों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई हुई थी। इसी दौरान बरजानी परिवार को इराक छोड़कर ईरान जाना पड़ा। नेचिरवान ने अपने शुरुआती साल ईरान में बिताए। वहीं उन्होंने पढ़ाई की, फारसी भाषा सीखी और ईरान के कई प्रभावशाली लोगों से संपर्क बनाए। बाद में यही रिश्ते उनकी राजनीति में भी काम आए। ईरान में बिताए समय की वजह से उन्हें वहां की भाषा, समाज और राजनीतिक व्यवस्था की अच्छी समझ थी। 1990 के दशक में कुर्दिस्तान लौटे नेचिरवान बरजानी 1990 के दशक में कुर्दिस्तान लौटे और राजनीति में सक्रिय हो गए। वे कुर्दिस्तान की राजनीति में तेजी से आगे बढ़े। 1999 से 2019 के बीच वे कई बार कुर्दिस्तान क्षेत्र के प्रधानमंत्री रहे। इसके बाद 2019 में वे कुर्दिस्तान क्षेत्र के राष्ट्रपति बने। आज वे इराकी कुर्दिस्तान के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। तुलसी गबार्ड ने बरजानी को फोन किया एक्सियोस के मुताबिक, अमेरिका की तत्कालीन राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने करीब 10 मई को बरजानी से पहली बार संपर्क किया। गबार्ड ने उनसे कहा कि ट्रम्प प्रशासन को IRGC कमांडर जनरल अहमद वाहिदी से संपर्क करने में उनकी मदद चाहिए। गबार्ड ने बरजानी को बताया कि वह यह अनुरोध राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मंजूरी के बाद कर रही हैं। अमेरिका यह भी जानना चाहता था कि IRGC की कोई अलग मांग तो नहीं है और क्या वह ईरानी वार्ताकारों की बातचीत का समर्थन करता है। बरजानी ने एन्क्रिप्टेड फोन से वाहिदी से बात की बरजानी ने गबार्ड की बात मान ली और अपने संपर्कों के जरिए IRGC तक अमेरिकी संदेश पहुंचाया। इसके बाद वाहिदी ने बरजानी से सीधे बात करने की इच्छा जताई। 14 मई को IRGC का एक अधिकारी एरबिल में बरजानी के कार्यालय पहुंचा। वह अपने साथ एक एन्क्रिप्टेड फोन लेकर आया, ताकि बरजानी सुरक्षित तरीके से वाहिदी से बात कर सकें। इसके बाद बरजानी और वाहिदी के बीच सीधे फोन पर बातचीत हुई। बरजानी ने वाहिदी से पूछा कि क्या वह ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची के साथ हैं। वाहिदी ने इसका जवाब हां में दिया। उन्होंने कहा कि वह दोनों वार्ताकारों का पूरा समर्थन करते हैं और यह IRGC का भी रुख है। उन्होंने यह भी कहा कि IRGC इस संकट का समाधान बातचीत के जरिए करना चाहता है। वाहिदी का संदेश व्हाइट हाउस तक पहुंचा बातचीत के बाद बरजानी ने तुलसी गबार्ड से संपर्क किया और वाहिदी का संदेश उन्हें बताया। गबार्ड ने यह जानकारी व्हाइट हाउस तक पहुंचा दी। इससे ट्रम्प प्रशासन को यह भरोसा मिला कि ईरान की ओर से बातचीत कर रहे गालिबाफ और अराघची को IRGC का समर्थन हासिल है। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने बरजानी से एक और मदद मांगी। अमेरिका चाहता था कि बरजानी एरबिल में अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडलों के बीच सीक्रेट मीटिंग की मेजबानी करें। हालांकि, यह बैठक नहीं हो सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी पक्ष को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता थी। बरजानी की अहमियत क्यों बढ़ी? नेचिरवान बरजानी को सबसे प्रभावशाली कुर्द नेताओं में गिना जाता है। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनके अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे रिश्ते हैं। उनके तुर्की और अरब देशों के नेताओं से भी संपर्क हैं। इसी वजह से वह अलग-अलग पक्षों के बीच बातचीत में मदद करने वाले नेता के तौर पर सामने आए हैं। इस मामले में भी उनकी भूमिका इसलिए अहम रही क्योंकि अमेरिका खुद IRGC कमांडर तक नहीं पहुंच पा रहा था। बरजानी ने अपने पुराने ईरानी संपर्कों का इस्तेमाल कर अमेरिकी टीम को IRGC नेतृत्व तक पहुंचाया।

शी जिनपिंग ने तियानमेन प्रदर्शन कुचलने को सही ठहराया:बोले- कम्युनिस्ट पार्टी का फैसला सही था; 36 साल पहले टैंक लेकर उतरी थी चीनी सेना

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 1989 के तियानमेन प्रदर्शन को रोकने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की गई कार्रवाई का समर्थन किया। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन की भी तारीफ की। शी ने कहा कि उस समय जियांग ने पार्टी के फैसले का साथ दिया और शंघाई में हालात को काबू में रखने में अहम भूमिका निभाई। शी ने यह बात सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में कही। उन्होंने चीन के सामने मौजूद चुनौतियों का भी जिक्र किया। शी ने लोगों से मुश्किल वक्त में हार न मानने और हर चुनौती का डटकर सामना करने की अपील की। जिनपिंग ने कहा कि चीन के सामने चाहे कितनी भी बड़ी चुनौती आए, वह पीछे नहीं हटेगा। 1989 में तियानमेन स्क्वायर पर क्या हुआ था? 1989 में चीन की राजधानी बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर पर लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए थे। कई हफ्तों तक चले इन प्रदर्शनों में हजारों छात्र और आम नागरिक शामिल हुए थे। इसके बाद चीनी सेना ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया और प्रदर्शन को कुचल दिया। कार्रवाई में सेना और टैंकों का इस्तेमाल किया गया था। इस घटना में कितने लोगों की मौत हुई, इसका कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। चीन की सरकार ने 200 से ज्यादा लोगों की मौत की बात कही थी। वहीं, अलग-अलग विदेशी स्रोतों और अनुमानों में मृतकों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों तक बताई गई है। तियानमेन की यह घटना आज भी चीन में बेहद संवेदनशील मानी जाती है। इस घटना से जुड़ी चर्चा और जानकारी के प्रसार पर चीन में कड़े प्रतिबंध हैं। तियानमेन के बाद जियांग जेमिन बने चीन के टॉप लीडर तियानमेन प्रदर्शन कुचले जाने के कुछ समय बाद जियांग जेमिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने थे। उनसे पहले इस पद पर झाओ जियांग थे। झाओ जियांग को प्रदर्शनकारियों के प्रति नरम रुख रखने वाला माना गया था। इसी वजह से उन्हें पद से हटा दिया गया था। इसके बाद जियांग जेमिन तेजी से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में पहुंचे। 1993 तक जियांग चीन के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल हो चुके थे। वे 1993 से 2002 तक चीन के राष्ट्रपति रहे। 30 नवंबर 2022 को 96 साल की उम्र में उनका निधन हुआ था। जियांग ने चीन की इकोनॉमी दुनिया के लिए खोली जियांग जेमिन के शासनकाल में चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी। इस दौरान चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए और खोला। अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में भी सुधार हुआ। 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ का सदस्य बना। उस समय अमेरिका ने भी चीन के डब्ल्यूटीओ में शामिल होने का समर्थन किया था। इसके बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की भूमिका और मजबूत हुई। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के रिश्ते काफी बदल गए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर कई बार तनाव बढ़ा है। इसके अलावा ताइवान, तकनीक और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी दोनों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक टकराव बढ़ा है। जिनपिंग ने चीन की उपलब्धियों का जिक्र किया शी ने अपने भाषण में चीन की उपलब्धियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चीन के लोगों का जीवन लगातार बेहतर हो रहा है। हालांकि, हाल के आर्थिक आंकड़े चीन की आर्थिक विकास दर में धीमापन दिखा रहे हैं। इसके बावजूद शी ने चीन के भविष्य को लेकर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान की संभावनाएं उज्ज्वल हैं। उनके मुताबिक, कई पीढ़ियों से चीन जिस सपने को पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा है, वह धीरे-धीरे हकीकत बन रहा है। जियांग जेमिन की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में चीन के शीर्ष नेता मौजूद रहे। चीन की सबसे ताकतवर पोलित ब्यूरो स्थायी समिति के सभी सात सदस्य कार्यक्रम में शामिल हुए।

रूस का यूक्रेन पर मिसाइल हमला:भारतवंशी अरबपति लक्ष्मी मित्तल की स्टील कंपनी को निशाना बनाया, 2 की मौत

रूस ने शनिवार रात यूक्रेन के क्रिवी रिह शहर में भारतीय मूल के अरबपति लक्ष्मी मित्तल की कंपनी आर्सेलरमित्तल के स्टील प्लांट पर मिसाइल हमला किया। हमले में दो लोगों की मौत हो गई और 13 कर्मचारी व ठेकेदार घायल हुए हैं। यह यूक्रेन का सबसे बड़ा स्टील प्लांट है। हमले के बाद प्लांट में प्रोडक्शन का कुछ काम रोकना पड़ा। प्लांट की ऊर्जा व्यवस्था और ब्लास्ट फर्नेस से जुड़े अहम हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। हमले के बाद दमकलकर्मी, बचाव दल और मेडिकल टीमें मौके पर पहुंचीं। राहत और बचाव का काम जारी है। प्लांट में क्या बनता है? क्रिवी रिह का आर्सेलरमित्तल प्लांट यूक्रेन का सबसे बड़ा स्टील प्लांट है। यहां स्टील बनाने के लिए बड़े ब्लास्ट फर्नेस और दूसरी उत्पादन इकाइयां हैं। रूस के हमले में इन्हीं उत्पादन से जुड़े कुछ अहम हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। इसलिए कंपनी ने प्लांट का कुछ काम अस्थायी रूप से रोक दिया है। 2022 में भी हुआ था हमला इस प्लांट पर रूस पहले भी हमला कर चुका है। 2022 में हुए रूसी मिसाइल हमले में प्लांट की एक रोलिंग मिल नष्ट हो गई थी और एक कर्मचारी की मौत हुई थी। इस बार का हमला ऐसे समय हुआ है, जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है और रूसी हमले यूक्रेन के अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं। लक्ष्मी मित्तल की कंपनी यूक्रेन में क्यों अहम है? आर्सेलरमित्तल क्रिवी रिह यूक्रेन की अर्थव्यवस्था के लिए अहम औद्योगिक इकाई है। यह कंपनी दुनिया की बड़ी स्टील कंपनियों में शामिल आर्सेलरमित्तल का हिस्सा है, जिसके चेयरमैन और प्रमुख शेयरधारक भारतीय मूल के उद्योगपति लक्ष्मी निवास मित्तल हैं। प्लांट यूक्रेन के बड़े औद्योगिक शहर क्रिवी रिह में स्थित है। यह शहर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की का गृहनगर भी है। मित्तल ने 2005 में खरीदा था यूक्रेन का यह स्टील प्लांट यूक्रेन का क्रिवी रिह स्टील प्लांट पहले सरकारी कंपनी के पास था। 2005 में लक्ष्मी मित्तल की कंपनी मित्तल स्टील ने इसे खरीद लिया। इसके बाद मित्तल स्टील का आर्सेलर के साथ विलय हुआ और 2006 में आर्सेलरमित्तल बनी। तब से यह प्लांट इसी कंपनी का हिस्सा है। लक्ष्मी मित्तल भारतीय मूल के बड़े उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। उनकी कंपनी आर्सेलरमित्तल दुनिया की बड़ी स्टील कंपनियों में शामिल है और कई देशों में कारोबार करती है। ———————- ये खबर भी पढ़ें…. रूस पर यूक्रेन का सबसे बड़ा ड्रोन हमला:6 की मौत; मॉस्को के पास ई-कॉमर्स गोदाम में आग लगी; रूस ने 1400 ड्रोन मार गिराए यूक्रेन ने रविवार को रूस पर युद्ध शुरू होने के बाद अब तक का सबसे बड़े ड्रोन हमला किया है। इसमें कम से कम 6 लोगों की मौत हो गई। इन ड्रोन हमलों में मॉस्को के पास रूसी ई-कॉमर्स कंपनी वाइल्डबेरिज के डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर में आग लग गई। पूरी खबर यहां पढ़ें…

ट्रम्प बोले- लेविट को मुझसे ज्यादा अपने बच्चे पसंद:व्हाइट हाउस में उनकी जगह लेना मुश्किल; लेविट का प्रेस सेक्रेटरी के पद से इस्तीफा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट के पद छोड़ने पर मजाक किया। उन्होंने कहा, “मुझे पता चला है कि कैरोलिन लेविट मुझे पसंद करने से ज्यादा अपने बच्चों को पसंद करती हैं। मैं इसे लेकर बहुत चिंतित हूं।” ट्रम्प ने साथ ही कहा कि लेविट की जगह लेना आसान नहीं होगा। लेविट अगस्त के आखिर में व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी की नौकरी छोड़ेंगी। उन्होंने अपने दो छोटे बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने के लिए यह फैसला लिया है। ट्रम्प ने फॉक्स न्यूज रिपोर्टर से पूछा- आप उनकी जगह लेंगी? लेविट के जाने के बाद अगली प्रेस सेक्रेटरी कौन होगी, इसका अभी ऐलान नहीं हुआ है। फॉक्स न्यूज की रिपोर्टर एलेक्सिस मैकएडम्स ने ट्रम्प से इसी बारे में सवाल किया। ट्रम्प ने मैकएडम्स की ओर देखकर कहा, “आप?” फिर उन्होंने पूछा, “आप उनकी जगह क्यों नहीं लेतीं?” ट्रम्प ने मैकएडम्स की तारीफ करते हुए कहा कि वह यह काम अच्छी तरह कर सकती हैं। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि वह वास्तव में उन्हें अगली प्रेस सेक्रेटरी बनाने पर विचार कर रहे हैं या यह सिर्फ मजाक था। लेविट ने क्यों छोड़ी नौकरी? लेविट ने इसी हफ्ते पद छोड़ने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि वह अपने परिवार और दो छोटे बच्चों को ज्यादा समय देना चाहती हैं। उन्होंने 1 मई 2026 को अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया था। इसके बाद वह मातृत्व अवकाश पर गई थीं और 16 जुलाई को प्रेस ब्रीफिंग में वापस लौटी थीं। ट्रम्प ने उनके फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद भी लेविट उनकी टीम से जुड़ी रहेंगी और बाहरी सलाहकार के तौर पर काम करेंगी। लेविट की जगह लेना क्यों मुश्किल होगा? लेविट करीब 20 महीने तक ट्रम्प प्रशासन का मीडिया के सामने प्रमुख चेहरा रहीं। प्रेस ब्रीफिंग में वह ट्रम्प की नीतियों और फैसलों का बचाव करती थीं और मुश्किल सवालों पर प्रशासन का पक्ष रखती थीं। उनके जाने के बाद व्हाइट हाउस को ऐसा चेहरा तलाशना होगा, जो रोजाना पत्रकारों के सवालों का जवाब दे सके और ट्रम्प प्रशासन की नीतियों को मजबूती से सामने रख सके। फिलहाल उनके उत्तराधिकारी के नाम का ऐलान नहीं हुआ है। इस्तीफे को लेकर अटकलें भी सामने आईं लेविट के पद छोड़ने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने उनके फैसले को जुलाई में तुर्किये की राजधानी अंकारा में ट्रम्प से जुड़े एक सुरक्षा मामले से जोड़ने की कोशिश की। दक्षिण अफ्रीका में ईरानी दूतावास ने दावा किया था कि सुरक्षा खतरे के कारण ट्रम्प को एक विमान से दूसरे विमान में भेजा गया और लेविट पीछे रह गईं। व्हाइट हाउस ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि लेविट उस विमान में थीं ही नहीं। ट्रम्प ने भी कहा था कि सुरक्षा अधिकारियों ने ईरान से जुड़े संभावित खतरे के कारण विमान बदलने की सलाह दी थी। लेविट ने कहा है कि उनके पद छोड़ने की वजह उनका परिवार है। व्हाइट हाउस ने अभी तक उनकी जगह लेने वाले नए प्रेस सेक्रेटरी का नाम घोषित नहीं किया है।

ट्रम्प बोले- लेविट को मुझसे ज्यादा अपने बच्चे पसंद:व्हाइट हाउस में उनकी जगह लेना मुश्किल; लेविट का प्रेस सेक्रेटरी के पद से इस्तीफा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट के पद छोड़ने पर मजाक किया। उन्होंने कहा, “मुझे पता चला है कि कैरोलिन लेविट मुझे पसंद करने से ज्यादा अपने बच्चों को पसंद करती हैं। मैं इसे लेकर बहुत चिंतित हूं।” ट्रम्प ने साथ ही कहा कि लेविट की जगह लेना आसान नहीं होगा। लेविट अगस्त के आखिर में व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी की नौकरी छोड़ेंगी। उन्होंने अपने दो छोटे बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने के लिए यह फैसला लिया है। लेविट ने क्यों छोड़ी नौकरी? लेविट ने इसी हफ्ते पद छोड़ने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि वह अपने परिवार और दो छोटे बच्चों को ज्यादा समय देना चाहती हैं। उन्होंने 1 मई 2026 को अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया था। इसके बाद वह मातृत्व अवकाश पर गई थीं और 16 जुलाई को प्रेस ब्रीफिंग में वापस लौटी थीं। ट्रम्प ने उनके फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद भी लेविट उनकी टीम से जुड़ी रहेंगी और बाहरी सलाहकार के तौर पर काम करेंगी। 26 साल की उम्र में व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी बनीं कैरोलिन लेविट का जन्म 24 अगस्त 1997 को न्यू हैम्पशायर के एटकिंसन में हुआ। उनका परिवार राजनीति के बजाय छोटे कारोबार से जुड़ा था। पिता यूज्ड ट्रक का कारोबार करते थे और परिवार आइसक्रीम स्टैंड चलाता था। लेविट ने स्कूल-कॉलेज में सॉफ्टबॉल खेला और कम्युनिकेशन व पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई की। कॉलेज के दौरान फॉक्स न्यूज में इंटर्नशिप की। इसके बाद ट्रम्प के पहले कार्यकाल में व्हाइट हाउस में काम किया और रिपब्लिकन सांसद एलिस स्टेफनिक की कम्युनिकेशन डायरेक्टर बनीं। 2022 में न्यू हैम्पशायर से कांग्रेस चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं। 2024 में ट्रम्प के चुनाव अभियान की प्रेस सेक्रेटरी बनीं। जनवरी 2025 में 26 साल की उम्र में व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी बनकर इस पद पर पहुंचने वाली सबसे कम उम्र की व्यक्ति बनीं। ट्रम्प ने फॉक्स न्यूज रिपोर्टर से पूछा- आप उनकी जगह लेंगी? लेविट के जाने के बाद अगली प्रेस सेक्रेटरी कौन होगी, इसका अभी ऐलान नहीं हुआ है। फॉक्स न्यूज की रिपोर्टर एलेक्सिस मैकएडम्स ने ट्रम्प से इसी बारे में सवाल किया। ट्रम्प ने मैकएडम्स की ओर देखकर कहा, “आप?” फिर उन्होंने पूछा, “आप उनकी जगह क्यों नहीं लेतीं?” ट्रम्प ने मैकएडम्स की तारीफ करते हुए कहा कि वह यह काम अच्छी तरह कर सकती हैं। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि वह वास्तव में उन्हें अगली प्रेस सेक्रेटरी बनाने पर विचार कर रहे हैं या यह सिर्फ मजाक था। लेविट को इस्तीफे को लेकर अटकलें भी सामने आईं लेविट के पद छोड़ने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने उनके फैसले को जुलाई में तुर्किये की राजधानी अंकारा में ट्रम्प से जुड़े एक सुरक्षा मामले से जोड़ने की कोशिश की। दक्षिण अफ्रीका में ईरानी दूतावास ने दावा किया था कि सुरक्षा खतरे के कारण ट्रम्प को एक विमान से दूसरे विमान में भेजा गया और लेविट पीछे रह गईं। व्हाइट हाउस ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि लेविट उस विमान में थीं ही नहीं। ट्रम्प ने भी कहा था कि सुरक्षा अधिकारियों ने ईरान से जुड़े संभावित खतरे के कारण विमान बदलने की सलाह दी थी। ————————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने PAK-सऊदी-तुर्किये के रक्षा समझौते पर खुशी जताई:बोले- तीनों देश मजबूती से अपनी रक्षा कर सकेंगे; एक पर हमला हुआ तो मिलकर जवाब देंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि इस डील से तीनों देश मिलकर अपनी रक्षा ज्यादा मजबूती से कर सकेंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

ट्रम्प ने PAK-सऊदी-तुर्किये के रक्षा समझौते पर खुशी जताई:बोले- तीनों देश मजबूती से अपनी रक्षा कर सकेंगे; एक पर हमला हुआ तो मिलकर जवाब देंगे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि इस डील से तीनों देश मिलकर अपनी रक्षा ज्यादा मजबूती से कर सकेंगे। ट्रम्प ने रविवार को ट्रुथ सोशल पर लिखा, “मुझे बहुत खुशी है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने आखिरकार मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इससे पता चलता है कि मिडिल-ईस्ट एकजुट हो रहा है और देश अब ज्यादा मजबूती से अपनी रक्षा कर सकेंगे।” ट्रम्प ने तीनों देशों के नेताओं को बधाई देते हुए डील को “बड़ा, साहसी और अहम पहला कदम” बताया। 7 अगस्त को मक्का समझौते पर साइन हुए इस समझौते पर 7 अगस्त को मक्का में हस्ताक्षर हुए थे। समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए। एर्दोगन ने कहा है कि आगे दूसरे देश भी इस रक्षा व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। उन्होंने खास तौर पर मिस्र के जुड़ने की संभावना बताई है। डील का मकसद तीनों देशों के बीच सैन्य और सुरक्षा सहयोग बढ़ाना है। यानी किसी एक देश पर हमला होने पर बाकी दोनों देश उसके साथ खड़े होंगे। एक पर हमला हुआ तो बाकी दो देश साथ देंगे इस समझौते की सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब या तुर्किये में से किसी एक देश पर हमला हुआ तो इसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। यानी जिस देश पर हमला होगा, उसे बाकी दोनों देशों का साथ मिलेगा। कैसे मदद करेंगे तीनों देश? भारत की भी इस डील पर नजर भारत ने कहा है कि वह इस समझौते के असर की समीक्षा कर रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि भारत इसे अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति के नजरिए से देख रहा है। उन्होंने कहा कि भारत अपने हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। ———————- ये खबर भी पढ़ें… दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यास घटाएगा अमेरिका:ट्रम्प बोले- इससे नॉर्थ कोरिया को गलत मैसेज जाता है, किम जोंग उन से मेरे अच्छे रिश्ते अमेरिका ने दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले सैन्य अभ्यासों को कम करने का ऐलान किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को अभ्यासों में कटौती करने का आदेश दिया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…