इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट से बड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। गुरुवार को सामने आए जमान इजराइल के नए सर्वे में आइजेनकोट की विपक्षी पार्टी यशार को 25 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। वहीं नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 21 सीटों पर सिमट सकती है। यानी यशार ने लिकुड पर 4 सीट की बढ़त बना ली है। पिछले कुछ हफ्तों के ज्यादातर सर्वे में भी यशार आगे रही है, लेकिन अंतर बहुत कम था। कई सर्वे में लिकुड बराबरी पर थी या सिर्फ 1-2 सीट पीछे थी। नए सर्वे में यह अंतर बढ़कर 4 सीट हो गया है। 120 सीटों वाली संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी यशार के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद चुनाव के बाद सरकार बनना आसान नहीं होगा। इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और बहुमत के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। सर्वे में नेतन्याहू विरोधी दलों के ‘चेंज ब्लॉक’ को 58 सीटें मिलने का अनुमान है। यानी यह गठबंधन बहुमत से सिर्फ 3 सीट दूर नजर आ रहा है। दूसरी ओर नेतन्याहू के समर्थक दलों को कुल 50 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब पार्टियों को 12 सीटें मिल सकती हैं। इनमें राम पार्टी और हदाश-ताल को 6-6 सीटें मिलने का अनुमान है। इसका मतलब है कि चुनाव से पहले किसी भी बड़े खेमे के पास सरकार बनाने लायक साफ बहुमत नहीं है। आइजेनकोट बोले- सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मौका मिलना चाहिए आइजेनकोट की बढ़त के बीच नेतन्याहू विरोधी खेमे के विपक्षी नेता याइर लैपिड की पार्टी बीयाचद ने कहा है कि वह विपक्षी सरकार बनने के रास्ते में रुकावट नहीं डालेगी। लेकिन जब लैपिड से पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन करेगी, तो उन्होंने सीधा जवाब नहीं दिया। बीयाचद में लैपिड दूसरे नंबर के नेता हैं। पार्टी का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के हाथ में है। वह खुद भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर सामने आते रहे हैं। आइजेनकोट ने इससे पहले कहा था कि अगला प्रधानमंत्री उसी व्यक्ति को होना चाहिए जो नेतन्याहू विरोधी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी का नेता हो। उनका यह बयान 2021 से 2022 तक प्रधानमंत्री रहे नफ्ताली बेनेट के कार्यकाल की ओर भी इशारा करता है। उस समय बेनेट की पार्टी के पास नेसेट में सिर्फ 7 सीटें थीं। इसके बावजूद गठबंधन के जरिए वह प्रधानमंत्री बने थे। इसी वजह से उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर उस समय काफी बहस हुई थी। रिपोर्ट- ईरान इजराइली नेताओं को नुकसान पहुंचा सकता है चैनल 12 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की ओर से इजराइली नेताओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिशों के संकेत मिले हैं। पीएम नेतन्याहू के पास सराकरी सुरक्षा है लेकिन आइजेनकोट को फिलहाल सरकारी सुरक्षा का औपचारिक अधिकार नहीं है। इसी वजह से आइजेनकोट की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत के बीच भी उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता सामने आई है। चुनाव अभियान तेज होने के साथ इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी ‘शिन बेट’ उन्हें हथियारबंद सुरक्षा देने पर विचार कर रही है।
तालिबान के काबुल पर कब्जे के आज पांच साल पूरे हो गए हैं। पांच साल में अफगानिस्तान की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। तालिबान ने पूरे देश पर अपना नियंत्रण मजबूत किया और अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार आया। लेकिन दूसरी तरफ महिलाओं के अधिकारों पर सख्त पाबंदियां लगीं, प्रेस की आजादी घटी और शारीरिक सजाएं फिर आम हो गईं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2021 से नवंबर 2022 के बीच अदालतों ने कम से कम 18 मामलों में शारीरिक सजा का आदेश दिया। इनमें ज्यादातर मामले तथाकथित नैतिक अपराधों से जुड़े थे। दिसंबर 2022 में परवान प्रांत के एक स्टेडियम में भीड़ के सामने 27 लोगों को सबके सामने कोड़े मारे गए। तालिबान से पहले की अफगान सरकारों के दौर में भी शारीरिक सजा मौजूद थी, लेकिन तालिबान के शासन में इसे खुले तौर पर और नियमित रूप से लागू किया जाने लगा। 15 अगस्त 2021: काबुल में दाखिल हुआ तालिबान अफगानिस्तान में 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। कुछ ही घंटों में अफगान सरकार का पतन हो गया। कमर्शियल फ्लाइट रद्द हो गईं और हजारों लोग देश छोड़ने के लिए काबुल एयरपोर्ट पहुंच गए। तालिबान ने उस समय महिलाओं के अधिकार बनाए रखने और अमेरिका व पिछली अफगान सरकार के साथ काम करने वालों को माफी देने का वादा किया था। प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा था कि लोगों को अपनी संपत्ति, जान या सम्मान को लेकर खतरा नहीं होगा। लेकिन अगले पांच साल में तस्वीर इन वादों के बिल्कुल उलट नजर आई। छात्राओं को सेकेंडरी स्कूल और यूनिवर्सिटी जाने से रोका अफगानिस्तान अब दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां छात्राओं को औपचारिक रूप से सेकेंडरी स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ने से रोक दिया गया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद महिलाओं पर पाबंदियां लगातार बढ़ती गईं। नौकरी करने, और सार्वजनिक जगहों पर जाने को लेकर भी कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं। UN की रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान के राज में अब तक महिलाओं के खिलाफ 100 से ज्यादा फरमान जारी हो चुके हैं। सर्वे में शामिल 10 में से 7 महिलाओं ने अपनी मानसिक स्थिति को खराब या बहुत खराब बताया। आधे से ज्यादा महिलाओं ने कहा कि वे महीने में सिर्फ एक या दो बार घर से बाहर निकलती हैं। करीब तीन-चौथाई महिलाओं ने पुरुष अभिभावक के बिना घर से बाहर निकलने में असुरक्षा महसूस होने की बात कही। रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में सिर्फ 7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 84% है। प्रेस पर दबाव, सैकड़ों पत्रकारों ने देश छोड़ा तालिबान शासन में पत्रकारिता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स यानी CPJ ने अफगानिस्तान को पत्रकारों के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक और मुश्किल जगहों में शामिल किया है। 2021 के बाद से कई अफगान पत्रकार देश छोड़ चुके हैं। तालिबान शासन में अफगानिस्तान की इकोनॉमी बढ़ीं तालिबान के शासन में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद नहीं हुई। कुछ क्षेत्रों में सुधार के संकेत मिले हैं। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक 2025 में अफगानिस्तान की वास्तविक GDP 4.8% बढ़ी। सरकार का घरेलू राजस्व भी बढ़कर GDP का 19.8% हो गया। लेकिन इस ग्रोथ का फायदा आम लोगों तक व्यापक रूप से नहीं पहुंचा। प्रति व्यक्ति आय घटी है और महंगाई बढ़ी है। देश अभी भी बड़े स्तर पर आयात पर निर्भर है। बिजली की कमी, बैंकिंग सुविधाओं तक सीमित पहुंच, बड़े अनौपचारिक कैश सेक्टर और विदेशी मदद में कमी भी आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती हैं। अफीम की खेती में 95% गिरावट तालिबान के सत्ता में आने के समय अफगानिस्तान दुनिया में अफीम का सबसे बड़ा स्रोत था। UNODC के मुताबिक 2022 में दुनिया की करीब 80% अफीम अफगानिस्तान से आती थी। अप्रैल 2022 में तालिबान ने पोस्ता (अफीम का पौधा) की खेती पर रोक लगा दी। इसका सीधा असर खेती पर पड़ा। UNODC के 2023 के सर्वे के मुताबिक पोस्ता की खेती में 95% की गिरावट आई। रूस ने तालिबान सरकार को मान्यता दी तालिबान सरकार को अब तक सिर्फ रूस ने औपचारिक रूप से मान्यता दी है। हालांकि तालिबान का कहना है कि वह करीब 40 देशों के संपर्क में है और औपचारिक मान्यता के लिए जरूरी शर्तें पूरी कर चुका है। भारत ने भी तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दिए बिना काबुल के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं। अक्टूबर 2025 में तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी भारत आए थे। यह तालिबान सरकार के किसी वरिष्ठ अधिकारी की भारत की पहली यात्रा थी। चीन और UAE ने भी तालिबान द्वारा नियुक्त राजदूतों को स्वीकार किया है, हालांकि दोनों ने अब तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। —————- यह खबर भी पढ़ें… PM रहमान की भारत यात्रा से पहले बांग्लादेश की शर्त: शेख हसीना को राजनीति से दूर रखा जाए; 21 अगस्त को दिल्ली आ सकते हैं बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान 21 अगस्त को पहली बार भारत दौरे पर आ सकते हैं। यात्रा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन इसे अंतिम रूप देने से पहले दोनों देशों के बीच कुछ अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का है। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिका-ईरान युद्ध अब होर्मुज पर आकर अटक गया है। डोनाल्ड ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर हर दिन कोई न कोई दावा करते हैं और ईरान इस पर प्रतिक्रिया देने से चूकता नहीं है। ताजा घटना क्रम में डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज को लेकर बड़ा बयान दिया है। जिसका मुंहतोड़ जवाब ईरान ने भी दे दिया
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान 21 अगस्त को पहली बार भारत दौरे पर आ सकते हैं। यात्रा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन इसे अंतिम रूप देने से पहले दोनों देशों के बीच कुछ अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का है। ढाका से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, बांग्लादेश चाहता है कि भारत में रह रहीं शेख हसीना को राजनीतिक गतिविधियां चलाने या बांग्लादेश की राजनीति को प्रभावित करने वाले बयान देने की अनुमति न दी जाए। हसीना के बयानों से बांग्लादेश सरकार नाराज शेख हसीना अगस्त 2024 में सत्ता से हटने के बाद से भारत में रह रही हैं। बांग्लादेश का आरोप है कि वह भारत से लगातार राजनीतिक बयान दे रही हैं। ढाका का कहना है कि इससे देश की आंतरिक राजनीति प्रभावित हो रही है और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। बांग्लादेशी अधिकारियों के मुताबिक, भारत की ओर से इस मुद्दे पर कुछ अच्छे संकेत मिले हैं। लेकिन ढाका चाहता है कि भारत का रुख और स्पष्ट हो, ताकि तारिक रहमान की यात्रा से पहले इस मुद्दे को लेकर कोई गलतफहमी न रहे। 5 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बढ़ा तनाव दरअसल इसी महीने 5 तारीख को शेख हसीना ने वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें उन्होंने अवामी लीग सरकार के सत्ता से हटने की दूसरी बरसी पर पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए और बांग्लादेश की राजनीति पर भी अपनी बात रखी। इस पर बांग्लादेश सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई। ढाका का कहना था कि भारत में रहते हुए हसीना का सार्वजनिक रूप से राजनीतिक बयान देना दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस की इजाजत पर फिर बढ़ा तनाव बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरकार इस घटनाक्रम से ‘नाराज और निराश’ है। मंत्रालय ने आपत्ति जताई कि मानवता के खिलाफ अपराध के एक मामले में मौत की सजा पा चुकी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की अनुमति दी गई। विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसने पहले ही भारत को आगाह किया था कि इस तरह के घटनाएं दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य बनाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। गौरतलब है कि भारत ने शेख हसीना का प्रेस कॉन्फ्रेंस रोकने से इनकार कर दिया था। भारत ने कहा था कि उनका कार्यक्रम एक निजी मीडिया संस्था आयोजित कर रही है। इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान 21 अगस्त को पहली बार भारत दौरे पर आ सकते हैं। यात्रा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन इसे अंतिम रूप देने से पहले दोनों देशों के बीच कुछ अहम मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का है। ढाका से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, बांग्लादेश चाहता है कि भारत में रह रहीं शेख हसीना को राजनीतिक गतिविधियां चलाने या बांग्लादेश की राजनीति को प्रभावित करने वाले बयान देने की अनुमति न दी जाए। हसीना के बयानों से बांग्लादेश सरकार नाराज शेख हसीना अगस्त 2024 में सत्ता से हटने के बाद से भारत में रह रही हैं। बांग्लादेश का आरोप है कि वह भारत से लगातार राजनीतिक बयान दे रही हैं। ढाका का कहना है कि इससे देश की आंतरिक राजनीति प्रभावित हो रही है और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। बांग्लादेशी अधिकारियों के मुताबिक, भारत की ओर से इस मुद्दे पर कुछ अच्छे संकेत मिले हैं। लेकिन ढाका चाहता है कि भारत का रुख और स्पष्ट हो, ताकि तारिक रहमान की यात्रा से पहले इस मुद्दे को लेकर कोई गलतफहमी न रहे। 5 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बढ़ा तनाव दरअसल इसी महीने 5 तारीख को शेख हसीना ने वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें उन्होंने अवामी लीग सरकार के सत्ता से हटने की दूसरी बरसी पर पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए और बांग्लादेश की राजनीति पर भी अपनी बात रखी। इस पर बांग्लादेश सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई। ढाका का कहना था कि भारत में रहते हुए हसीना का सार्वजनिक रूप से राजनीतिक बयान देना दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकता है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस बारे में भारत को पहले आगाह किया गया था लेकिन फिर भी भारत ने उन्हें यह प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की अनुमति दी। गौरतलब है कि भारत ने शेख हसीना का प्रेस कॉन्फ्रेंस रोकने से इनकार कर दिया था। भारत ने कहा था कि उनका कार्यक्रम एक निजी मीडिया संस्था आयोजित कर रही है। इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। पीएम रहमान की पार्टी उनके भारत यात्रा के खिलाफ तारिक रहमान की भारत यात्रा को लेकर बांग्लादेश में राजनीतिक विरोध भी हो रहा है। रूलिंग पार्टी BNP के नेताओं ने भारत में शेख हसीना की राजनीतिक गतिविधियों पर सवाल उठाए हैं। वहीं, 2024 में आंदोलन से पैदा हुई नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) ने भी तारिक रहमान की भारत यात्रा का विरोध किया है। NCP नेता ने कहा कि जब तक शेख हसीना के प्रत्यर्पण और भारत-बांग्लादेश के रिश्तों के नए ढांचे पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक तारिक रहमान को भारत नहीं जाना चाहिए। नाहिद ने यह भी आरोप लगाया कि नई दिल्ली में हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस भारत सरकार के सीधे या परोक्ष समर्थन से हुई। उनके मुताबिक, दिल्ली से हसीना के दिए गए बयान को सिर्फ उनकी निजी राय नहीं माना जा सकता। इससे भारत के रुख का भी संकेत मिलता है। विरोध के बावजूद यात्रा की तैयारियां जारी राजनीतिक विरोध के बावजूद दोनों देशों के बीच तारिक रहमान की यात्रा की तैयारियां चल रही हैं। भारतीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, वह अगले हफ्ते के बीच में दो दिन के दौरे पर नई दिल्ली आ सकते हैं। यात्रा की तारीख 21 या 22 अगस्त बताई जा रही है। हालांकि, अंतिम कार्यक्रम में एक-दो दिन का बदलाव हो सकता है। भारत ने बिम्सटेक का मौजूदा अध्यक्ष होने के नाते तारिक रहमान को सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी शामिल होने का न्योता दिया है। हालांकि, वह इस सम्मेलन में जाएंगे या नहीं, इसका अभी फैसला नहीं हुआ है। बिजली कटौतियों के बीच भारत से डीजल मांग रहा बांग्लादेश बांग्लादेश में बिजली संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। देश के कई हिस्सों में रोज 8 से 10 घंटे तक बिजली कट रही है। बिजली संकट से निपटने के लिए बांग्लादेश ने अब भारत से अतिरिक्त डीजल देने की मांग की है। बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद ने पिछले हफ्ते भारतीय हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात के दौरान ज्यादा डीजल की मांग रखी थी। महमूद ने पत्रकारों से कहा कि भारत के साथ एक पाइपलाइन है, जिससे बांग्लादेश को डीजल मिलता है। उन्होंने भारत से इसकी सप्लाई बढ़ाने का अनुरोध किया है। भारत और बांग्लादेश के बीच इंडिया-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन 2017 में शुरू हुई थी। दोनों देशों के बीच 15 साल का समझौता है। इसके तहत भारत को हर साल बांग्लादेश को 1.80 लाख मीट्रिक टन डीजल देना है। पश्चिम एशिया में हालिया संकट के दौरान भारत मार्च और अप्रैल में बांग्लादेश को पहले ही 30 हजार टन से ज्यादा डीजल भेज चुका है। ——————– यह खबर भी पढ़ें… शेख हसीना बोलीं- दिसंबर में बांग्लादेश लौटूंगी:2 साल बाद वर्चुअल भाषण दिया, कैमरा ऑफ था; बांग्लादेश सरकार बोली- दिल्ली में बैठकर जहर उगला बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दो साल बाद बुधवार को लोगों को वर्चुअली संबोधित किया। जब हसीना बोल रही थीं, उस दौरान उनका कैमरा बंद था। पूरी खबर पढ़ें…
इंडोनेशिया के पूर्वी तट के पास शनिवार सुबह 7.7 तीव्रता का भूकंप आया। देश की जियोफिजिक्स एजेंसी BMKG ने बताया कि इसके बाद कई आफ्टरशॉक भी आए हैं। कई इलाकों में सुनामी की चेतावनी जारी की गई। कुछ जगहों पर एक मीटर से कम ऊंचाई की सुनामी लहरें रिकॉर्ड हुईं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी के प्रवक्ता डोडी युलेओवा ने बताया कि कई लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, भूकंप से नुकसान की कोई रिपोर्ट नहीं मिली थी। खबर अपडेट हो रही है…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान को हराने के बाद वे होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का ‘इलाका’ घोषित करेंगे। उन्होंने यह बात शुक्रवार को न्यूयॉर्क में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कही। वे न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन पार्टी की रैली को संबोधित कर रहे थे। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान करीब छह महीने से चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए समझौते की कोशिश कर रहे हैं। उनके इस बयान के बाद ईरान ने भी पलटवार किया। उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि होर्मुज ईरान की था, है और रहेगा। इसे किसी ट्वीट या चुनावी भाषण के जरिए नहीं कब्जाया जा सकता। उन्होंने कहा कि ईरान न तो धमकियों से डरता है और न ही किसी ताकत के आगे झुकता है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता माना जाता है। इसी रास्ते से दुनिया के कई देशों तक तेल, प्राकृतिक गैस और खाद पहुंचती है। युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती थी।
ट्रम्प बोले- अमेरिका का होर्मुज पर पूरा कंट्रोल ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज पर नियंत्रण को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। इससे पहले भी ट्रम्प दावा कर चुके हैं कि अमेरिका का इस समुद्री मार्ग पर पूरा नियंत्रण है और वह इसे अपने नियंत्रण में बनाए रखेगा। ट्रम्प ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को स्टील की दीवार बताया था। उन्होंने दावा किया था कि ईरान के पास इसका मुकाबला करने का कोई रास्ता नहीं है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि तेहरान का सैन्य ढांचा बुरी तरह कमजोर हो चुका है। ईरान ने ट्रम्प के दावे को खारिज किया ट्रम्प के बयान के तुरंत बाद ईरान ने उनके दावे को खारिज कर दिया। ईरान ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट अब भी बंद है और जब तक उसकी शर्तें नहीं मानी जातीं, इसे दोबारा नहीं खोला जाएगा। पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने भी कहा कि अमेरिकी अधिकारियों के बार-बार यह कहने से कि होर्मुज स्ट्रेट खुल गया है, जमीनी हकीकत नहीं बदलती। अथॉरिटी के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट अभी भी बंद है और ईरान की शर्तें पूरी होने तक बंद ही रहेगा
ईरान ने रखीं 7 बड़ी शर्तें होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान ने भी अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदार के मुताबिक, अमेरिका को… 28 फरवरी से होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई प्रभावित रही 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई लगातार प्रभावित रही। समुद्री बारूदी सुरंगों, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे, अमेरिका और ईरान की नाकेबंदी तथा बढ़ी बीमा लागत के कारण इस रास्ते से हर दिन गुजरने वाला कच्चा तेल 2 करोड़ बैरल से घटकर 37 लाख बैरल रह गया। होर्मुज पर ईरान दावा क्यों करता है? हॉर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इसका उत्तरी किनारा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी किनारा ओमान के पास है। सबसे संकरी जगह पर इसकी चौड़ाई सिर्फ 21 नॉटिकल मील (करीब 39 किलोमीटर) है। शुरुआत में दोनों देशों का समुद्री क्षेत्र सिर्फ 3 नॉटिकल मील तक माना जाता था। लेकिन बाद में समुद्री कानूनों में बदलाव के बाद ईरान ने 1959 में और ओमान ने 1972 में अपने-अपने समुद्री क्षेत्र की सीमा बढ़ाकर 12-12 नॉटिकल मील (करीब 22-22 किलोमीटर) कर दी। इस फैसले के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट का सबसे संकरा हिस्सा पूरी तरह ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों में आ गया। हालांकि समुद्री आवाजाही जारी रहे इसके 2-2 नॉटिकल मील का चौड़ा ट्रांजिट लेन बनाया गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान को हराने के बाद वे होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का ‘इलाका’ घोषित करेंगे। उन्होंने यह बात शुक्रवार को न्यूयॉर्क में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कही। वे न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन पार्टी की रैली को संबोधित कर रहे थे। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान करीब छह महीने से चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए समझौते की कोशिश कर रहे हैं। उनके इस बयान के बाद ईरान ने भी पलटवार किया। उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि होर्मुज ईरान की था, है और रहेगा। इसे किसी ट्वीट या चुनावी भाषण के जरिए नहीं कब्जाया जा सकता। उन्होंने कहा कि ईरान न तो धमकियों से डरता है और न ही किसी ताकत के आगे झुकता है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता माना जाता है। इसी रास्ते से दुनिया के कई देशों तक तेल, प्राकृतिक गैस और खाद पहुंचती है। युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती थी। ट्रम्प बोले- अमेरिका का होर्मुज पर पूरा कंट्रोल ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज पर नियंत्रण को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। इससे पहले भी ट्रम्प दावा कर चुके हैं कि अमेरिका का इस समुद्री मार्ग पर पूरा नियंत्रण है और वह इसे अपने नियंत्रण में बनाए रखेगा। ट्रम्प ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को स्टील की दीवार बताया था। उन्होंने दावा किया था कि ईरान के पास इसका मुकाबला करने का कोई रास्ता नहीं है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि तेहरान का सैन्य ढांचा बुरी तरह कमजोर हो चुका है। ईरान ने ट्रम्प के दावे को खारिज किया ट्रम्प के बयान के तुरंत बाद ईरान ने उनके दावे को खारिज कर दिया। ईरान ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट अब भी बंद है और जब तक उसकी शर्तें नहीं मानी जातीं, इसे दोबारा नहीं खोला जाएगा। पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने भी कहा कि अमेरिकी अधिकारियों के बार-बार यह कहने से कि होर्मुज स्ट्रेट खुल गया है, जमीनी हकीकत नहीं बदलती। अथॉरिटी के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट अभी भी बंद है और ईरान की शर्तें पूरी होने तक बंद ही रहेगा ईरान ने रखीं 7 बड़ी शर्तें होर्मुज स्ट्रेट खोलने के बदले ईरान ने भी अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदार के मुताबिक, अमेरिका को… 28 फरवरी से होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई प्रभावित रही 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई लगातार प्रभावित रही। समुद्री बारूदी सुरंगों, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे, अमेरिका और ईरान की नाकेबंदी तथा बढ़ी बीमा लागत के कारण इस रास्ते से हर दिन गुजरने वाला कच्चा तेल 2 करोड़ बैरल से घटकर 37 लाख बैरल रह गया। होर्मुज पर ईरान दावा क्यों करता है? हॉर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इसका उत्तरी किनारा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी किनारा ओमान के पास है। सबसे संकरी जगह पर इसकी चौड़ाई सिर्फ 21 नॉटिकल मील (करीब 39 किलोमीटर) है। शुरुआत में दोनों देशों का समुद्री क्षेत्र सिर्फ 3 नॉटिकल मील तक माना जाता था। लेकिन बाद में समुद्री कानूनों में बदलाव के बाद ईरान ने 1959 में और ओमान ने 1972 में अपने-अपने समुद्री क्षेत्र की सीमा बढ़ाकर 12-12 नॉटिकल मील (करीब 22-22 किलोमीटर) कर दी। इस फैसले के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट का सबसे संकरा हिस्सा पूरी तरह ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों में आ गया। हालांकि समुद्री आवाजाही जारी रहे इसके 2-2 नॉटिकल मील का चौड़ा ट्रांजिट लेन बनाया गया।
अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए चीनी प्रोडक्ट्स को भारत के रास्ते अमेरिकी बाजारों में पहुंचाया जा रहा है। यह दावा व्हाइट हाउस की रिपोर्ट ‘द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम: राइज, स्कोप एंड कॉस्ट्स’ में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से आने वाले सामान या पार्ट्स को पहले भारत समेत दूसरे एशियाई देशों में भेजा जाता है। वहां उन्हें प्रोसेस, असेंबल या किसी दूसरे प्रोडक्ट में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद तैयार सामान को अमेरिका निर्यात किया जाता है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इससे चीन पर लगाए गए टैरिफ से बचने का रास्ता मिल सकता है। रिपोर्ट में इसके लिए दुनिया भर में ट्रेड रूट्स का नेटवर्क बनने की बात कही गई है। भारत के पुणे, गुजरात और चेन्नई को चीन से आने वाले सामान के एक अहम रास्ते के तौर पर बताया गया है। रिपोर्ट में यहां बनने वाले इंडस्ट्रियल पंप और कंप्रेसर में चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल होने की संभावना का खास तौर पर जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में रूट नेटवर्क को ‘अग्ली सिस्टर सिटीज’ कहा गया चीनी सामान को तीसरे देशों के जरिए अमेरिका भेजने के लिए इस्तेमाल हो रहे रूट नेटवर्क को रिपोर्ट में ‘अग्ली सिस्टर सिटीज’ कहा गया है। इसका मतलब शहरों की सुंदरता या बदसूरती से नहीं है। यह शब्द अलग-अलग देशों के ऐसे औद्योगिक शहरों के लिए इस्तेमाल किया गया है, जहां एक जैसे प्रोडक्ट बनते हैं और वे अमेरिकी बाजार में एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं। भारत के मामले में रिपोर्ट ने पुणे, गुजरात और चेन्नई की तुलना अमेरिका के ओहायो राज्य के सिनसिनाटी, डेटन और कोलंबस से की है। इन अमेरिकी शहरों में भी पंप, कंप्रेसर और दूसरे औद्योगिक सामान का उत्पादन और कारोबार होता है। रिपोर्ट का तर्क है कि अगर तीसरे देशों के जरिए कम टैरिफ पर सामान अमेरिका पहुंचता है, तो वहां के स्थानीय निर्माताओं को नुकसान हो सकता है। अमेरिकी कंपनियों को कम कीमत वाले आयात से मुकाबला करना पड़ सकता है। इसका असर उत्पादन, ऑर्डर और नौकरियों पर भी पड़ सकता है। मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड का भी जिक्र व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में सिर्फ भारत का जिक्र नहीं है। इसमें मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड के उन इलाकों का भी जिक्र है, जहां बड़े पैमाने पर सामान बनाया और दूसरे देशों को भेजा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे रास्तों से हर साल अरबों डॉलर का सामान अमेरिकी बाजार तक पहुंच सकता है, जिसमें चीनी पार्ट्स का इस्तेमाल किया गया हो। क्या ये टैरिफ से बचने की कोशिश को साबित करता है? किसी प्रोडक्ट में चीनी पार्ट का इस्तेमाल होना और चीन का सामान सिर्फ भारत के रास्ते अमेरिका भेजना, दोनों अलग बातें हैं। अगर भारत में किसी प्रोडक्ट की असली मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली और उस पर काफी काम हो रहा है, तो उसे सिर्फ चीन का सामान घुमाकर अमेरिका भेजना नहीं माना जा सकता। इसलिए यह देखा जाता है कि प्रोडक्ट बनाने में असल काम और प्रोडक्ट की कीमत में कितना हिस्सा किस देश में तैयार हुआ है। सिर्फ किसी प्रोडक्ट में चीनी पार्ट लगा होने से यह साबित नहीं होता कि टैरिफ से बचने की कोशिश हुई है। आज की ग्लोबल सप्लाई चेन में एक प्रोडक्ट के अलग-अलग पार्ट कई देशों में बनते हैं और उसकी आखिरी असेंबली किसी दूसरे देश में हो सकती है। अमेरिका अब AI और डेटा से संदिग्ध शिपमेंट पकड़ेगा रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब अमेरिका तीसरे देशों के जरिए टैरिफ से बचने की कोशिशों पर निगरानी बढ़ा रहा है। व्हाइट हाउस ने सीमा पर आने वाले सामान की जांच में टेक्नोलॉजी और डेटा एनालिसिस के ज्यादा इस्तेमाल की बात कही है। रिपोर्ट में ऐसे AI सिस्टम का भी जिक्र है, जो अमेरिकी कस्टम अधिकारियों को संदिग्ध शिपमेंट की पहचान करने में मदद कर सकता है। इसका मकसद पूरी सप्लाई चेन को ट्रैक करना है। —————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी सर्वे-10 में 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं: भारतीयों के लिए रूस सबसे अहम पार्टनर, पाकिस्तानियों की पहली पसंद चीन 10 में से 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं, ये बात अमेरिकी प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में सामने आई है। इंडियंस भी अपना सबसे बड़ा दुश्मन पाकिस्तान को ही मानते हैं। सर्वे में कहा गया कि दोनों देशों के लोग पड़ोसी के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन भरोसे की कमी है। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के नए सर्वे में सामने आया है कि करीब 10 में से 9 पाकिस्तानी भारत को खतरा मानते हैं। वहीं भारतीय भी पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। सर्वे में दावा किया गया है कि दोनों देशों के लोग अपने पड़ोसी के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं। लेकिन दोनों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है। दूसरी ओर, भारत रूस को अपना सबसे बड़ा दोस्त मानता है। वहीं, पाकिस्तान ने चीन को अपना सबसे बड़ा सहयोगी देश माना है। 21% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान पर पॉजिटिव राय रखी प्यू के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पाकिस्तान को लेकर नेगेटिव सोच कोई नई बात नहीं है। हालांकि, भारत के अलग-अलग समुदायों में राय एक जैसी नहीं है। 21% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान के बारे में पॉजिटिव राय जताई। हिंदुओं में यह आंकड़ा 6% रहा। खतरे के सवाल पर भी अंतर दिखा। 34% भारतीय मुस्लिमों ने पाकिस्तान को भारत का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक खतरा बताया, जबकि हिंदुओं में यह आंकड़ा 57% था। दूसरी ओर, सर्वे में पाकिस्तानियों की भारत को लेकर यह नेगेटिव सोच पाकिस्तान के अलग-अलग साजाजिक समूहों में ज्यादा दिखाई दी है। पहलगाम हमले के बाद रिश्ते और बिगड़े सर्वे में भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव का भी जिक्र है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने 26 लोगों की हत्या कर दी थी। इनमें ज्यादातर पर्यटक थे। इसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया। इसके बाद भारत सरकार ने 1960 की सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला किया। सिंधु जल संधि पाकिस्तान के लिए खास तौर पर अहम है। पाकिस्तान की खेती और पानी की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। 58% भारतीयों की रूस को लेकर पॉजिटिव राय भारत में 36% लोगों ने रूस को अपना सबसे जरूरी सहयोगी बताया। अमेरिका को 16% लोगों ने चुना। वहीं, पाकिस्तान में 75% लोगों ने चीन को अपना बड़ा सहयोगी माना। 12% ने सऊदी अरब को देश का दोस्त बताया। रूस चीन अमेरिका भारत की विदेश नीति किसी एक देश के साथ नहीं जुड़ी सर्वे से भारत की विदेश नीति की एक और अहम बात सामने आती है। भारत में किसी एक विदेशी देश को लेकर पाकिस्तान जैसी एकतरफा मजबूत पसंद नहीं दिखती। भारत की विदेश नीति में कई बड़े देशों के साथ एक साथ रिश्ते बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है। भारत अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ रूस के साथ उसके पुराने रक्षा संबंध हैं। चीन के साथ सीमा पर तनाव और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है, लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देश कई मुद्दों पर साथ भी काम करते हैं। इसे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और मल्टी-अलाइनमेंट की नीति से जोड़कर देखा जा सकता है। मल्टी-अलाइनमेंट यानी कई देशों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते रखना। यानी भारत किसी एक बड़े देश के खेमे में पूरी तरह जाने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हित के हिसाब से रिश्ते बनाए रखना चाहता है। ——————- पाकिस्तान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तानी PM की धमकी- पानी रोका तो मुंहतोड़ जवाब देंगे: कश्मीर पर रुख कभी नहीं बदलेंगे, मुनीर की लीडरशिप में हमने दुश्मन को हराया पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते को लेकर भारत को एक बार फिर धमकी दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई समझौता नहीं होगा। अगर इसे रोकने या कम करने की कोशिश हुई तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…

