ट्रम्प की वफादार कैरोलिन लेविट ने नौकरी छोड़ी:पत्रकारों पर तंज के लिए मशहूर थीं, कहा- अच्छी मां बनना चाहती हूं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिनी जाने वाली व्हाइट हाउस प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। 28 साल की लेविट इस महीने के आखिर में व्हाइट हाउस छोड़ देंगी। ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी देते हुए कहा कि लेविट अब अपने परिवार और दो छोटे बच्चों को ज्यादा समय देना चाहती हैं। हालांकि, वह ट्रम्प की बाहरी सलाहकार बनी रहेंगी और रिपब्लिकन पार्टी के लिए काम करती रहेंगी। लेविट 27 साल की उम्र में अमेरिका के इतिहास की सबसे कम उम्र की व्हाइट हाउस प्रेस सचिव बनी थीं। मई में बेटी के जन्म के बाद वह कुछ समय के मातृत्व अवकाश पर गई थीं और कुछ दिन पहले काम पर लौटी थीं। उनका एक दो साल का बेटा भी है। प्रेस सचिव रहते हुए कई बार विवादों में रहीं लेविट करीब 20 महीने तक कैरोलिन लेविट व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सबसे भरोसेमंद प्रवक्ता रहीं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब भी ट्रम्प की नीतियों, फैसलों या विवादों पर मुश्किल सवाल पूछे जाते, तो उनका जवाब देने की जिम्मेदारी अक्सर लेविट ही संभालती थीं। उन्होंने कई बार ट्रम्प का आक्रामक तरीके से बचाव किया और मीडिया के सवालों का तीखे अंदाज में जवाब दिया। प्रेस ब्रीफिंग के दौरान पत्रकारों के साथ उनकी कई बार तीखी नोकझोंक हुई, जो सुर्खियों में रही। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सवाल पूछने वाले एक रिपोर्टर को ‘वामपंथी सोच वाला’ और ‘पत्रकार के नाम पर कलंक’ तक कह दिया था। इस बयान के बाद काफी विवाद हुआ। लेविट कई बार मेनस्ट्रीम मीडिया पर पक्षपात का आरोप भी लगाती थीं। उनका कहना था कि कुछ मीडिया संस्थान ट्रम्प सरकार के खिलाफ एजेंडा चलाते हैं। वहीं, उन पर आरोप लगता था कि वे पत्रकारों के सवालों से बचने के लिए उन पर व्यक्तिगत हमले करती हैं। प्रेस ब्रीफिंग में पहली बार यूट्यूबर्स को एंट्री दिलाई लेविट ने व्हाइट हाउस की प्रेस ब्रीफिंग का तरीका भी काफी बदला। उनके कार्यकाल में पहली बार सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, पॉडकास्ट होस्ट, यूट्यूब क्रिएटर्स और ट्रम्प समर्थक डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी प्रेस ब्रीफिंग में सवाल पूछने का मौका मिला। ट्रम्प सरकार का कहना था कि इससे ऐसे लोगों तक भी सरकार की बात पहुंचेगी, जो मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं देखते। हालांकि, इस फैसले की काफी आलोचना भी हुई। पत्रकारों का कहना था कि सरकार अपनी आलोचना से डरती है और ट्रम्प समर्थकों को ज्यादा अहमियत दी जा रही है। ट्रम्प की बात नहीं मानी तो AP को प्रेस पूल से बाहर किया लेविट उस समय भी विवादों में आ गई थीं, जब व्हाइट हाउस ने समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) को प्रेस पूल से बाहर कर दिया। यह विवाद इसलिए हुआ क्योंकि एजेंसी ने ट्रम्प सरकार की इच्छा के बावजूद ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ नाम इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था और अपनी रिपोर्टों में पहले से चल रहे नाम ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ का ही इस्तेमाल जारी रखा। अमेरिकी राष्ट्रपति हर जगह सैकड़ों पत्रकारों को साथ नहीं ले जा सकते। इसलिए कुछ चुनिंदा पत्रकारों और मीडिया संस्थानों का एक छोटा समूह बनाया जाता है। इसे प्रेस पूल कहा जाता है। यह टीम राष्ट्रपति के साथ यात्रा करती है और उनकी बैठकों, कार्यक्रमों और बयानों को सबसे पहले कवर करती है। इसके बाद यही जानकारी बाकी मीडिया संस्थानों के साथ भी साझा की जाती है। यानी प्रेस पूल की खबरें पूरे मीडिया तक पहुंचती हैं।

अमेरिका-भारतीय मूल के लड़के पर मां-भाई की हत्या का आरोप:ChatGPT पर परिवार को मारने से जुड़ी चैट मिली; पुलिस ने पार्किंग लॉट से पकड़ा

अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य में भारतीय मूल के 17 वर्षीय अर्जुन अरविंद पर अपनी मां और छोटे भाई की हत्या का आरोप लगा है। पुलिस ने उसे बुधवार सुबह गिरफ्तार किया। अधिकारियों के मुताबिक, उसने अपनी 45 वर्षीय मां सुधा वेंकटेशन और 14 वर्षीय भाई सिद्धार्थ अरविंद की हत्या की। उसके खिलाफ हत्या के दो मामलों के अलावा परिवार के सदस्यों पर हमला, मारपीट और बिना इजाजत मां की कार लेकर फरार होने समेत कई अन्य आरोप भी लगाए गए हैं। जांच के दौरान सामने आया कि अर्जुन पिछले कुछ समय से इंटरनेट और ChatGPT पर अपने परिवार की हत्या से जुड़ी काल्पनिक कहानियां और ऐसे विषयों पर जानकारी खोज रहा था। पुलिस अब उसकी ऑनलाइन गतिविधियों को भी जांच का हिस्सा मानकर पड़ताल कर रही है। अलग-अलग जगह पड़े मिले मां-बेटे के शव घटना का खुलासा उस समय हुआ, जब मंगलवार शाम करीब साढ़े छह बजे एक ट्यूटर पढ़ाने के लिए घर पहुंची। काफी देर तक दरवाजा नहीं खुला तो उसने अर्जुन के पिता को फोन किया। पिता भी पत्नी और बेटे से संपर्क नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने पुलिस से घर जाकर हालचाल देखने को कहा। पुलिस जब घर पहुंची तो बेसमेंट में सुधा वेंकटेशन और पहली मंजिल पर सिद्धार्थ अरविंद का शव मिला। अधिकारियों ने बताया कि दोनों के शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे। हालांकि मौत की वजह और वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार की जानकारी अभी सामने नहीं आई है। इसकी जांच जारी है। हत्या के बाद कार समेत गायब था आरोपी वारदात के बाद अर्जुन और उसकी मां की कार दोनों घर से गायब थीं। इससे पुलिस को शक हुआ कि आरोपी घटनास्थल से कार लेकर भागा है। इसके बाद पुलिस ने तुरंत उसकी तलाश शुरू की और आसपास के सभी शहरों की पुलिस को अलर्ट जारी कर दिया। बुधवार सुबह मैसाचुसेट्स के वेइलैंड इलाके में एक पार्किंग में पुलिस को संदिग्ध कार खड़ी मिली। अधिकारियों ने कार की घेराबंदी की और जांच करने पर अंदर अर्जुन मौजूद मिला। पुलिस ने उसे बिना किसी विरोध या झड़प के हिरासत में ले लिया। बाद में पूछताछ और शुरुआती जांच के आधार पर उसे अपनी मां सुधा वेंकटेशन और 14 वर्षीय भाई सिद्धार्थ अरविंद की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वारदात के बाद अर्जुन कहां-कहां गया और उसका मकसद क्या था। ChatGPT से काल्पनिक कहानियां लिखने में मदद मांगी जांच में पता चला है कि अर्जुन पिछले कुछ समय से इंटरनेट और ChatGPT पर परिवार की हत्या जैसे विषयों पर जानकारी खोज रहा था। उसने ChatGPT से हत्या और रहस्य से जुड़ी काल्पनिक कहानियां लिखने में भी मदद मांगी थी। इन कहानियों में ऐसे किरदार थे, जो अपने ही परिवार के लोगों की हत्या करते हैं। उसने ChatGPT से इस तरह के कई सवाल भी पूछे थे। हालांकि, जांच एजेंसियों ने यह नहीं कहा है कि ChatGPT ने उसे हत्या करने का तरीका बताया या योजना बनाने में मदद की। अधिकारियों का सिर्फ इतना कहना है कि उसकी चैट हिस्ट्री में परिवार की हत्या से जुड़े काल्पनिक विषयों पर बातचीत और सर्च मिले हैं। हत्या के पीछे की वजह जानने की कोशिश कर रही पुलिस पुलिस ने अभी तक हत्या के पीछे की वजह (मोटिव) का खुलासा नहीं किया है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है और आगे और जानकारी सामने आ सकती है। अर्जुन को पहले किशोर अदालत में पेश किया जाना था। लेकिन अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य में हत्या जैसे गंभीर मामलों की सुनवाई किशोर अदालत में नहीं होती। इसलिए उसके खिलाफ हत्या और अन्य आरोपों की सुनवाई सामान्य अदालत (क्रिमिनल कोर्ट) में की जाएगी।

रिपोर्ट-ईरान को पता था तुर्किये में कहां रुकेंगे ट्रम्प:बिल्डिंग के फ्लोर की भी जानकारी; कल ट्रम्प ने कहा था- ईरान के डर से प्लेन बदला

ईरानी एजेंट्स को पता था कि 7 जुलाई को तुर्की के अंकारा में हुए NATO समिट में ट्रम्प किस बिल्डिंग में रुके हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी इंटेलिजेंस ने यह आकलन किया है। ईरान को यह भी पता था कि ट्रम्प बिल्डिंग के किस फ्लोर पर रुके हैं। इसी जानकारी के बाद ट्रम्प को तुर्की से दूसरे विमान में ले जाया गया। मंगलवार को ट्रम्प ने भी ईरान के डर से विमान बदलने की बात मानी थी। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे जिस प्लेन से नाटो समिट में हिस्सा लेने गए थे, उस पर हमले का सबसे ज्यादा खतरा था। ट्रम्प ने यह भी बताया कि उन्हें सुरक्षा कारणों से एयरपोर्ट के कैटरिंग ट्रक में बैठाकर दूसरे विमान तक ले जाया गया। ट्रम्प पुराने एयरफोर्स वन में दाखिल हुए एयरफोर्स वन के पीछे एक केटरिंग ट्रक नजर आ रही है ट्रम्प के खिलाफ खास खतरे की जानकारी मिली रिपोर्ट में दावा किया गया कि ट्रम्प को ले जाने वाले किसी भी विमान पर जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल से हमला किया जा सकता था। अमेरिकी इंटेलिजेंस को पता चला कि नाटो शिखर सम्मेलन के आसपास एक व्यक्ति कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल के साथ भी देखा गया था। इसके बाद सीक्रेट सर्विस और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने ट्रम्प को तुर्की से निकालने के लिए ऑपरेशन तैयार किया। कतर के गिफ्ट किए प्लेन में बैठकर गए, मिलिट्री प्लेन से लौटे इससे पहले वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया था कि 8 जुलाई को अंकारा से रवाना होते समय ट्रम्प कैमरों के सामने बोइंग 747-8 एयर फोर्स वन में सवार हुए थे। यह विमान उन्हें कतर ने गिफ्ट किया था। इसके बाद एयरपोर्ट पर सामान और खाना पहुंचाने वाली केटरिंग गाड़ी की मदद से उन्हें चुपचाप अमेरिकी वायुसेना के वीआईपी सैन्य विमान C-32A तक ले जाया गया। मीडिया को भी नहीं पता था कि ट्रम्प दूसरे विमान में हैं अमेरिकी राष्ट्रपति जब भी किसी दौरे पर जाते हैं, तो उनके साथ कुछ पत्रकार भी यात्रा करते हैं। सुरक्षा कारणों से हर जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती, लेकिन इन पत्रकारों को इतना जरूर पता होता है कि राष्ट्रपति किस विमान में हैं और कहां जा रहे हैं। तुर्किये से उड़ान भरते समय पत्रकारों को लगा कि ट्रम्प भी उसी पुराने एयर फोर्स वन में हैं, लेकिन हकीकत अलग थी। उड़ान के दौरान पत्रकारों को अपनी खिड़कियों के शेड नीचे रखने को कहा गया। यानी उन्हें बाहर देखने की इजाजत नहीं थी। ऐसी सावधानी आमतौर पर तब बरती जाती है, जब विमान किसी खतरे वाले इलाके से गुजर रहा हो। बाद में पत्रकारों ने ट्रम्प से पूछा कि खिड़कियों के शेड बंद रखने को क्यों कहा गया था। ट्रम्प ने कहा, “शायद हम एक खतरनाक फ्लाइट पर थे। उनकी सूची में सबसे ऊपर मेरा नाम है। अगर मैं मरूंगा, तो आप भी मरेंगे।” ट्रम्प वाला छोटा विमान पहले ब्रिटेन पहुंचा ट्रम्प को लेकर छोटा C-32A विमान रात करीब 10:20 बजे ब्रिटेन के RAF मिल्डेनहॉल एयरबेस पहुंचा। इसके कुछ मिनट बाद पुराना एयरफोर्स वन भी वहां पहुंच गया। इस विमान में पत्रकार सवार थे। इसके बाद उन्हें चुपचाप पुराने एयर फोर्स वन में लाया गया। कुछ देर बाद वे उसी विमान से उतरते दिखे, जिससे पत्रकारों को लगा कि वे पूरी यात्रा उसी में कर रहे थे। हालांकि, यह साफ नहीं है कि C-32A से उतरने के बाद ट्रम्प पुराने एयरफोर्स वन तक कैसे पहुंचे। ट्रम्प ने पत्रकारों की तरफ हाथ हिलाया, लेकिन उनसे बात नहीं की। इसके बाद फिर वे आधिकारिक प्लेन यानी कि एयरफोर्स वन में बैठ गए और उसी से अमेरिका पहुंचे। ऐसा तरीका पहले भी अपनाया जा चुका है राष्ट्रपति को खतरे से बचाने के लिए उनके असली सफर को छिपाने का तरीका नया नहीं है। साल 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पाकिस्तान गए थे। तब उन्हें एक ऐसे सरकारी विमान से भेजा गया था, जिस पर राष्ट्रपति के विमान की कोई पहचान नहीं थी। वहीं, उनका असली एयरफोर्स वन दूसरे रास्ते से भेजा गया था, ताकि लोगों को पता न चले कि राष्ट्रपति किस विमान में हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ईरान से मिले विश्वसनीय खतरे के इनपुट के बाद यह पूरा सुरक्षा ऑपरेशन कुछ ही घंटों में तैयार किया गया था। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ समेत कुछ चुनिंदा अधिकारी इसमें शामिल थे। कतर से मिले नए विमान की सुरक्षा पर भी सवाल उठे ट्रम्प जिस बोइंग 747-8 विमान से तुर्किये पहुंचे थे, वह कतर के शाही परिवार ने पिछले साल अमेरिका को दिया था। अमेरिकी डिफेंस कंपनी L3 हैरिस टेक्नोलॉजीज ने इसे राष्ट्रपति के सफर के लिए तैयार किया है। ट्रम्प ने पहली बार इस विमान का इस्तेमाल 1 जुलाई को नॉर्थ डकोटा जाने के लिए किया था। कुछ दिन बाद वे इसी विमान से अपनी पहली विदेश यात्रा पर तुर्किये पहुंचे। इस विमान की सुरक्षा को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने एयरफोर्स वन में राष्ट्रपति को हमले से बचाने के लिए कुछ खास सुरक्षा इंतजाम हैं, जो कतर से मिले विमान में नहीं हैं या उनकी क्षमता अलग है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी अधिकारी बोले- मोदी-ट्रम्प टैरिफ का मुद्दा सुलझाएंगे:कहा- उनके बीच अच्छे संबंध; 5 दिन पहले अमेरिका में भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल पास हुआ था
अमेरिकी राष्ट्रपति के सलाहकार पीटर नवारो ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। दोनों नेता रूसी तेल से जुड़े 100% टैरिफ के मुद्दे को आपस में सुलझा लेंगे। पूरी खबर पढ़ें…
8 जुलाई को बदला गया विमान यह खतरा 8 जुलाई को सामने आया, जब ट्रम्प नाटो शिखर सम्मेलन के आखिरी दिन अंकारा से रवाना होने की तैयारी कर रहे थे। ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह पुराने एयरफोर्स वन विमान से तुर्की से निकलेंगे, जिसे उन्होंने “पुराने समय की याद के लिए” बताया था। कैमरों के सामने ट्रम्प को उसी विमान में सवार होते देखा गया। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में उन्हें गुप्त रूप से एयरपोर्ट के कैटरिंग कंटेनर के जरिए उस विमान से निकाला गया और छोटे सैन्य विमान में ले जाया गया। पुराना एयरफोर्स वन विमान ट्रम्प के साथ व्हाइट हाउस के अधिकारियों, सुरक्षा कर्मचारियों और पत्रकारों को लेकर रवाना हुआ। इस तरह वह विमान एक डिकॉय के तौर पर काम कर रहा था। इसके बाद ट्रम्प ब्रिटेन में रुके। वहां उन्होंने गुप्त रूप से दोबारा उस विमान में सवारी की और बाद में कतर से मिले बोइंग 747-8 विमान में लौटे। ट्रम्प ने कहा- मुझे दूसरे विमान में भेजना चाहते थे ट्रम्प ने मंगलवार को पुष्टि की कि उन्हें दूसरे विमान में ले जाया गया था। उन्होंने बताया कि सीक्रेट सर्विस और सेना ने उनसे कहा था कि वे चाहते हैं कि ट्रम्प किसी दूसरे विमान से जाएं। द एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, ट्रम्प ने पत्रकारों से कहा, “वे चाहते थे कि मैं दूसरी फ्लाइट, दूसरे विमान से जाऊं।” उन्होंने कहा, “शायद बाहर कोई खतरा था। मैंने इसके बारे में ज्यादा नहीं पूछा। मुझे बहुत धमकियां मिलती हैं।” ट्रम्प ने खतरे को कम करके बताया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें लगता है कि जिस विमान से वह वास्तव में गए थे, वह शायद ज्यादा खतरे में था। डिकॉय ऑपरेशन को असामान्य क्यों माना गया खतरनाक जगहों की यात्राओं के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति पहले भी गुप्त यात्रा योजनाओं और डिकॉय विमानों का इस्तेमाल कर चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 2023 में गुप्त रूप से कीव की यात्रा की थी। वह पहले पोलैंड गए और वहां से रात में गुप्त ट्रेन के जरिए यूक्रेन पहुंचे। दो पत्रकार उनके साथ थे और यात्रा शुरू होने के बाद उन्होंने इस दौरे की जानकारी दर्ज की थी। ट्रम्प ने 2019 में अफगानिस्तान की गुप्त थैंक्सगिविंग यात्रा भी की थी। अधिकारियों ने एक डिकॉय विमान और अलग प्रेस पूल का इस्तेमाल किया था, ताकि यह impression बना रहे कि ट्रम्प छुट्टियां अपने मार-ए-लागो एस्टेट में मना रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बराक ओबामा और बिल क्लिंटन ने भी सुरक्षा कारणों से गुप्त यात्राएं की थीं या यात्रा के दौरान भ्रम पैदा करने वाली व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया था। ट्रम्प के मामले में असामान्य बात यह थी कि वह तत्काल खतरे वाले इलाके से निकलने के बाद भी यह धोखा जारी रहा। उनके साथ यात्रा कर रहे प्रेस पूल को नहीं बताया गया कि राष्ट्रपति उस विमान में नहीं थे, जिसे वे राष्ट्रपति को ले जाने वाला विमान समझ रहे थे। “रेवेन रॉक” किताब के लेखक गैरेट एम ग्राफ ने एपी से कहा कि राष्ट्रपति पहले भी बिना पहचान वाले या डिकॉय विमानों से यात्रा कर चुके हैं। हालांकि, उन्होंने ट्रम्प के ठिकाने को लेकर लंबे समय तक जानकारी छिपाए जाने को अभूतपूर्व बताया। ईरान पहले भी ट्रम्प को निशाना बना चुका है ट्रम्प पहले भी ईरान से जुड़ी धमकियों और साजिशों का निशाना बन चुके हैं। 2024 में पेंसिलवेनिया के बटलर में चुनावी रैली के दौरान एक संभावित हमलावर की गोली उन्हें छूकर निकल गई थी। उसी साल बाद में फ्लोरिडा के उनके गोल्फ कोर्स में एक हथियारबंद व्यक्ति ने भी उन्हें निशाना बनाया था। हत्या के ये दोनों प्रयास ईरान से जुड़ी धमकियों से अलग थे। इसके अलावा, ट्रम्प की हत्या के लिए सुपारी देने की साजिश के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया था। इस साजिश का पता बाइडेन प्रशासन के दौरान चला था। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा था कि यह साजिश ईरानी एजेंट्स के एक प्रॉक्सी के जरिए काम करने से जुड़ी थी। द न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ताजा खुफिया जानकारी ट्रम्प के अंकारा में रहने के दौरान मिले एक खास खतरे से जुड़ी थी।

रिपोर्ट-ईरान को पता था तुर्किये में कहां रुकेंगे ट्रम्प:बिल्डिंग के फ्लोर की भी जानकारी; कल ट्रम्प ने कहा था- ईरान के डर से प्लेन बदला

ईरानी एजेंट्स को पता था कि 7 जुलाई को तुर्की के अंकारा में हुए NATO समिट में ट्रम्प किस बिल्डिंग में रुके हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी इंटेलिजेंस ने यह आकलन किया है। ईरान को यह भी पता था कि ट्रम्प बिल्डिंग के किस फ्लोर पर रुके हैं। इसी जानकारी के बाद ट्रम्प को तुर्की से दूसरे विमान में ले जाया गया। मंगलवार को ट्रम्प ने भी ईरान के डर से विमान बदलने की बात मानी थी। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे जिस प्लेन से नाटो समिट में हिस्सा लेने गए थे, उस पर हमले का सबसे ज्यादा खतरा था। ट्रम्प ने यह भी बताया कि उन्हें सुरक्षा कारणों से एयरपोर्ट के कैटरिंग ट्रक में बैठाकर दूसरे विमान तक ले जाया गया। ट्रम्प पुराने एयरफोर्स वन में दाखिल हुए एयरफोर्स वन के पीछे एक केटरिंग ट्रक नजर आ रही है ट्रम्प के खिलाफ खास खतरे की जानकारी मिली रिपोर्ट में दावा किया गया कि ट्रम्प को ले जाने वाले किसी भी विमान पर जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल से हमला किया जा सकता था। अमेरिकी इंटेलिजेंस को पता चला कि नाटो शिखर सम्मेलन के आसपास एक व्यक्ति कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल के साथ भी देखा गया था। इसके बाद सीक्रेट सर्विस और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने ट्रम्प को तुर्की से निकालने के लिए ऑपरेशन तैयार किया। कतर के गिफ्ट किए प्लेन में बैठकर गए, मिलिट्री प्लेन से लौटे इससे पहले वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया था कि 8 जुलाई को अंकारा से रवाना होते समय ट्रम्प कैमरों के सामने बोइंग 747-8 एयर फोर्स वन में सवार हुए थे। यह विमान उन्हें कतर ने गिफ्ट किया था। इसके बाद एयरपोर्ट पर सामान और खाना पहुंचाने वाली केटरिंग गाड़ी की मदद से उन्हें चुपचाप अमेरिकी वायुसेना के वीआईपी सैन्य विमान C-32A तक ले जाया गया। मीडिया को भी नहीं पता था कि ट्रम्प दूसरे विमान में हैं अमेरिकी राष्ट्रपति जब भी किसी दौरे पर जाते हैं, तो उनके साथ कुछ पत्रकार भी यात्रा करते हैं। सुरक्षा कारणों से हर जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती, लेकिन इन पत्रकारों को इतना जरूर पता होता है कि राष्ट्रपति किस विमान में हैं और कहां जा रहे हैं। तुर्किये से उड़ान भरते समय पत्रकारों को लगा कि ट्रम्प भी उसी पुराने एयर फोर्स वन में हैं, लेकिन हकीकत अलग थी। उड़ान के दौरान पत्रकारों को अपनी खिड़कियों के शेड नीचे रखने को कहा गया। यानी उन्हें बाहर देखने की इजाजत नहीं थी। ऐसी सावधानी आमतौर पर तब बरती जाती है, जब विमान किसी खतरे वाले इलाके से गुजर रहा हो। बाद में पत्रकारों ने ट्रम्प से पूछा कि खिड़कियों के शेड बंद रखने को क्यों कहा गया था। ट्रम्प ने कहा, “शायद हम एक खतरनाक फ्लाइट पर थे। उनकी सूची में सबसे ऊपर मेरा नाम है। अगर मैं मरूंगा, तो आप भी मरेंगे।” ट्रम्प वाला छोटा विमान पहले ब्रिटेन पहुंचा ट्रम्प को लेकर छोटा C-32A विमान रात करीब 10:20 बजे ब्रिटेन के RAF मिल्डेनहॉल एयरबेस पहुंचा। इसके कुछ मिनट बाद पुराना एयरफोर्स वन भी वहां पहुंच गया। इस विमान में पत्रकार सवार थे। इसके बाद उन्हें चुपचाप पुराने एयर फोर्स वन में लाया गया। कुछ देर बाद वे उसी विमान से उतरते दिखे, जिससे पत्रकारों को लगा कि वे पूरी यात्रा उसी में कर रहे थे। हालांकि, यह साफ नहीं है कि C-32A से उतरने के बाद ट्रम्प पुराने एयरफोर्स वन तक कैसे पहुंचे। ट्रम्प ने पत्रकारों की तरफ हाथ हिलाया, लेकिन उनसे बात नहीं की। इसके बाद फिर वे आधिकारिक प्लेन यानी कि एयरफोर्स वन में बैठ गए और उसी से अमेरिका पहुंचे। ऐसा तरीका पहले भी अपनाया जा चुका है राष्ट्रपति को खतरे से बचाने के लिए उनके असली सफर को छिपाने का तरीका नया नहीं है। साल 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पाकिस्तान गए थे। तब उन्हें एक ऐसे सरकारी विमान से भेजा गया था, जिस पर राष्ट्रपति के विमान की कोई पहचान नहीं थी। वहीं, उनका असली एयरफोर्स वन दूसरे रास्ते से भेजा गया था, ताकि लोगों को पता न चले कि राष्ट्रपति किस विमान में हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ईरान से मिले विश्वसनीय खतरे के इनपुट के बाद यह पूरा सुरक्षा ऑपरेशन कुछ ही घंटों में तैयार किया गया था। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ समेत कुछ चुनिंदा अधिकारी इसमें शामिल थे। कतर से मिले नए विमान की सुरक्षा पर भी सवाल उठे ट्रम्प जिस बोइंग 747-8 विमान से तुर्किये पहुंचे थे, वह कतर के शाही परिवार ने पिछले साल अमेरिका को दिया था। अमेरिकी डिफेंस कंपनी L3 हैरिस टेक्नोलॉजीज ने इसे राष्ट्रपति के सफर के लिए तैयार किया है। ट्रम्प ने पहली बार इस विमान का इस्तेमाल 1 जुलाई को नॉर्थ डकोटा जाने के लिए किया था। कुछ दिन बाद वे इसी विमान से अपनी पहली विदेश यात्रा पर तुर्किये पहुंचे। इस विमान की सुरक्षा को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने एयरफोर्स वन में राष्ट्रपति को हमले से बचाने के लिए कुछ खास सुरक्षा इंतजाम हैं, जो कतर से मिले विमान में नहीं हैं या उनकी क्षमता अलग है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी अधिकारी बोले- मोदी-ट्रम्प टैरिफ का मुद्दा सुलझाएंगे:कहा- उनके बीच अच्छे संबंध; 5 दिन पहले अमेरिका में भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल पास हुआ था
अमेरिकी राष्ट्रपति के सलाहकार पीटर नवारो ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। दोनों नेता रूसी तेल से जुड़े 100% टैरिफ के मुद्दे को आपस में सुलझा लेंगे। पूरी खबर पढ़ें…
8 जुलाई को बदला गया विमान यह खतरा 8 जुलाई को सामने आया, जब ट्रम्प नाटो शिखर सम्मेलन के आखिरी दिन अंकारा से रवाना होने की तैयारी कर रहे थे। ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह पुराने एयरफोर्स वन विमान से तुर्की से निकलेंगे, जिसे उन्होंने “पुराने समय की याद के लिए” बताया था। कैमरों के सामने ट्रम्प को उसी विमान में सवार होते देखा गया। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, बाद में उन्हें गुप्त रूप से एयरपोर्ट के कैटरिंग कंटेनर के जरिए उस विमान से निकाला गया और छोटे सैन्य विमान में ले जाया गया। पुराना एयरफोर्स वन विमान ट्रम्प के साथ व्हाइट हाउस के अधिकारियों, सुरक्षा कर्मचारियों और पत्रकारों को लेकर रवाना हुआ। इस तरह वह विमान एक डिकॉय के तौर पर काम कर रहा था। इसके बाद ट्रम्प ब्रिटेन में रुके। वहां उन्होंने गुप्त रूप से दोबारा उस विमान में सवारी की और बाद में कतर से मिले बोइंग 747-8 विमान में लौटे। ट्रम्प ने कहा- मुझे दूसरे विमान में भेजना चाहते थे ट्रम्प ने मंगलवार को पुष्टि की कि उन्हें दूसरे विमान में ले जाया गया था। उन्होंने बताया कि सीक्रेट सर्विस और सेना ने उनसे कहा था कि वे चाहते हैं कि ट्रम्प किसी दूसरे विमान से जाएं। द एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, ट्रम्प ने पत्रकारों से कहा, “वे चाहते थे कि मैं दूसरी फ्लाइट, दूसरे विमान से जाऊं।” उन्होंने कहा, “शायद बाहर कोई खतरा था। मैंने इसके बारे में ज्यादा नहीं पूछा। मुझे बहुत धमकियां मिलती हैं।” ट्रम्प ने खतरे को कम करके बताया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें लगता है कि जिस विमान से वह वास्तव में गए थे, वह शायद ज्यादा खतरे में था। डिकॉय ऑपरेशन को असामान्य क्यों माना गया खतरनाक जगहों की यात्राओं के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति पहले भी गुप्त यात्रा योजनाओं और डिकॉय विमानों का इस्तेमाल कर चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 2023 में गुप्त रूप से कीव की यात्रा की थी। वह पहले पोलैंड गए और वहां से रात में गुप्त ट्रेन के जरिए यूक्रेन पहुंचे। दो पत्रकार उनके साथ थे और यात्रा शुरू होने के बाद उन्होंने इस दौरे की जानकारी दर्ज की थी। ट्रम्प ने 2019 में अफगानिस्तान की गुप्त थैंक्सगिविंग यात्रा भी की थी। अधिकारियों ने एक डिकॉय विमान और अलग प्रेस पूल का इस्तेमाल किया था, ताकि यह impression बना रहे कि ट्रम्प छुट्टियां अपने मार-ए-लागो एस्टेट में मना रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बराक ओबामा और बिल क्लिंटन ने भी सुरक्षा कारणों से गुप्त यात्राएं की थीं या यात्रा के दौरान भ्रम पैदा करने वाली व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया था। ट्रम्प के मामले में असामान्य बात यह थी कि वह तत्काल खतरे वाले इलाके से निकलने के बाद भी यह धोखा जारी रहा। उनके साथ यात्रा कर रहे प्रेस पूल को नहीं बताया गया कि राष्ट्रपति उस विमान में नहीं थे, जिसे वे राष्ट्रपति को ले जाने वाला विमान समझ रहे थे। “रेवेन रॉक” किताब के लेखक गैरेट एम ग्राफ ने एपी से कहा कि राष्ट्रपति पहले भी बिना पहचान वाले या डिकॉय विमानों से यात्रा कर चुके हैं। हालांकि, उन्होंने ट्रम्प के ठिकाने को लेकर लंबे समय तक जानकारी छिपाए जाने को अभूतपूर्व बताया। ईरान पहले भी ट्रम्प को निशाना बना चुका है ट्रम्प पहले भी ईरान से जुड़ी धमकियों और साजिशों का निशाना बन चुके हैं। 2024 में पेंसिलवेनिया के बटलर में चुनावी रैली के दौरान एक संभावित हमलावर की गोली उन्हें छूकर निकल गई थी। उसी साल बाद में फ्लोरिडा के उनके गोल्फ कोर्स में एक हथियारबंद व्यक्ति ने भी उन्हें निशाना बनाया था। हत्या के ये दोनों प्रयास ईरान से जुड़ी धमकियों से अलग थे। इसके अलावा, ट्रम्प की हत्या के लिए सुपारी देने की साजिश के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया था। इस साजिश का पता बाइडेन प्रशासन के दौरान चला था। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा था कि यह साजिश ईरानी एजेंट्स के एक प्रॉक्सी के जरिए काम करने से जुड़ी थी। द न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ताजा खुफिया जानकारी ट्रम्प के अंकारा में रहने के दौरान मिले एक खास खतरे से जुड़ी थी।

‘ईरान बरबाद हो चुका है, सैनिकों को वेतन नहीं, 300% महंगाई… होर्मुज पर अमेरिका ने बना दी स्टील की दीवार’, डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दावा

रान अमेरिका युद्ध किस ओर जाएगा, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। अमेरिका और ईरान हर रोज अपने-अपने दावे कर रहे हैं। इस बीच होर्मुज को लेकर दोनों देशों के बीच खींचतान जारी है। ताजा घटना क्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर बड़ा दावा किया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिय

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इमरान खान की मौत का दावा झूठा:पाकिस्तानी पत्रकार एक दिन बाद ही पलटा, PTI बोली- मिलने दो, नहीं तो सड़कों पर उतरेंगे

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की मौत की आशंका जताने वाला पाकिस्तानी पत्रकार दावे से पलट गया है। अमेरिका में रह रहे पाकिस्तानी पत्रकार वजाहत सईद खान ने मंगलवार रात 11 बजे एक वीडियो जारी कर इमरान की मौत की आशंका जाहिर की थी। वजाहत ने बुधवार दोपहर कहा कि इमरान की मौत की आशंका सेना के अफसरों की सूचनाओं के आधार पर किया गया एक आकलन था। इमरान अगस्त 2023 से रावलपिंडी की अडियाला जेल में बंद हैं। पाकिस्तानी पत्रकार के दावे के बाद इमरान की बहनों ने भी सवाल उठाया कि उन्हें भाई से मिलने नहीं दिया जा रहा है। इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने चेतावनी दी है कि अगर इमरान से मिलने नहीं दिया गया, तो समर्थक सड़कों पर उतर जाएंगे। पाकिस्तानी पत्रकार का वीडियो देखिए… पत्रकार वजाहत सईद खान ने इमरान की मौत का दावा करने वाले वीडियो में कहा था- रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय के कम से कम तीन वरिष्ठ अधिकारियों को डर है कि इमरान खान अब जिंदा नहीं हैं। बाद में उन्होंने कहा कि यह कोई पक्की खबर नहीं, बल्कि केवल सेना के अंदर की आशंकाओं के आधार पर एक आकलन था। इमरान की पार्टी बोली- सड़कों पर उतरेंगे पत्रकार के दावे के बाद इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने कहा है कि अगर उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई, तो 20 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं। पार्टी ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया है। नवंबर 2025 में इमरान से मिली थीं बहनें इमरान खान की बहन उज्मा खान ने नवंबर 2025 में अडियाला जेल में उनसे मुलाकात की। जेल से बाहर आकर उज्मा ने बताया था कि भाई इमरान पूरी तरह ठीक हैं। दोनों के बीच करीब 20 मिनट तक मुलाकात हुई थी।

उन्होंने कहा था- इमरान खान की सेहत बिल्कुल ठीक है, लेकिन वे बेहद गुस्से में हैं। उन्हें मेंटली टॉर्चर किया जा रहा है और इस सब के लिए आसिम मुनीर जिम्मेदार हैं। उनकी बाहरी दुनिया तक कोई पहुंच नहीं है। प्रशासन ने नहीं मिलने दिया तो फैली थी अफवाह नवंबर 2025 की शुरुआत में ही इमरान खान से मिलने उनके समर्थक और परिवार वाले पहुंचे थे, लेकिन जेल प्रशासन ने उन्हें इजाजत नहीं दी। इसके बाद यह अफवाह फैल गई थी कि इमरान की मौत हो गई है और पाकिस्तान सरकार इसे छिपा रही है। इसके बाद पाकिस्तान में बड़ा प्रदर्शन किया गया था, जिसे देखते हुए रावलपिंडी से लेकर इस्लामाबाद तक हाई अलर्ट जारी कर दिया गया था। पिछली बार मई 2024 में नजर आए थे इमरान इमरान खान पिछली बार 16 मई 2024 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे। इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि आम चुनाव से 5 दिन पहले मुझे अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया गया, जिससे मैं चुनाव से दूर रहूं। इमरान ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा- केजरीवाल को भी भारत में चुनाव के दौरान कैंपेन के लिए जमानत दी गई थी। इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में बंद हैं इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में हैं। भ्रष्टाचार मामले में उन्हें 14 साल की सजा सुनाई जा चुकी है, जिसमें सरकारी गिफ्ट (तोशाखाना केस) बेचने और सरकारी सीक्रेट लीक करने जैसे आरोप शामिल हैं। इमरान पर आरोप है कि उन्होंने अल-कादिर ट्रस्ट के लिए पाकिस्तान सरकार की अरबों रुपए की जमीन को सस्ते में बेच दिया था। इस मामले में इमरान को 9 मई 2023 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद पूरे मुल्क में फौज के कई अहम ठिकानों पर हमले हुए थे।​​​ पाकिस्तान के नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (NAB) ने अल-कादिर ट्रस्ट केस में दिसंबर 2023 में इमरान खान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी और अन्य 6 व्यक्तियों पर मामला दर्ज किया था। हालांकि जब इमरान के खिलाफ ये केस दर्ज हुआ, उससे पहले से ही वे तोशाखाना केस में अडियाला जेल में बंद थे। ​​​​ 50 अरब का स्कैम है अल-कादिर ट्रस्ट केस
—————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने माना- ईरान के डर से प्लेन बदलना पड़ा:हमला होता तो एयरफोर्स वन पर होता; ट्रक में छिपकर दूसरे विमान तक पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मान लिया है कि उन्होंने पिछले महीने तुर्किये में ईरान के डर से प्लेन बदला था। उन्होंने कहा कि वे जिस प्लेन से NATO समिट में हिस्सा लेने गए थे उस पर हमले का सबसे ज्यादा खतरा था। पूरी खबर पढ़ें…

कोलंबिया भूकंप के 2 दिन बाद मलबे में मिला नवजात:5 मंजिला इमारत गिरी थी, रेस्क्यू टीम को आवाज देकर बोला शख्स- यहां बच्चे के साथ हूं

साउथ अमेरिकी देश कोलंबिया में सोमवार रात आए 7.4 तीव्रता के भूकंप के करीब 48 घंटे बाद मलबे से एक बच्चे को जिंदा निकाला गया। बच्चा एक गिरी हुई पांच मंजिला रिहायशी इमारत के मलबे में फंसा था। उसके साथ एक आदमी भी दबा हुआ था। यह रेस्क्यू बुधवार को भूकंप के बाद चल रहे तीसरे दिन के सर्च ऑपरेशन के दौरान हुआ। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, रेस्क्यू टीम ने बताया कि उन्हें मलबे के नीचे से एक आदमी की आवाज सुनाई दी। आदमी ने कहा- ‘हां, मैं यहीं हूं। मैं एक बच्चे के साथ हूं।’ इसके बाद मौके पर मौजूद रेस्क्यू टीम और बाकी लोगों ने तुरंत हाथों से मलबा हटाना शुरू कर दिया। एक भारी कंक्रीट स्लैब के नीचे एक शख्स और नवजात बच्चा फंसा हुआ था। लोगों ने स्लैब को उठाया और दोनों को बचाया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, बच्चे का सिर बैंगनी जैसा पड़ गया था, क्योंकि उसे सांस लेने में परेशानी हो रही थी। भारत बोला- हम हर संभव मदद के लिए तैयार भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि कोलंबिया में जान-माल के नुकसान से वे बेहद दुखी हैं। उन्होंने मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायलों के जल्द ठीक होने की कामना की। उन्होंने कहा कि भारत जरूरत पड़ने पर कोलंबिया को हर संभव मदद देने के लिए तैयार है। भूकंप से जुड़ी 5 फोटोज बेघर लोगों को आर्थिक मदद देगा कोलंबिया कोलंबिया के राष्ट्रपति अबेलार्डो डे ला एस्प्रिएला ने प्रभावित इलाकों का दौरा कर राहत और बचाव कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने रिसाराल्दा प्रांत में प्रभावित लोगों को 3 महीने तक घरेलू सेवाओं के बिल से राहत देने का आदेश दिया है। जिन लोगों के घर पूरी तरह तबाह हो गए हैं, उन्हें अस्थायी आवास के लिए आर्थिक मदद दी जाएगी। बाद में घरों की मरम्मत और दोबारा निर्माण में भी सहायता दी जाएगी। परेरा में सबसे ज्यादा मौतें परेरा शहर में अकेले 60 लोगों की मौत हुई है। करीब 5 लाख की आबादी वाला यह शहर भूकंप के केंद्र से 64 किलोमीटर से भी कम दूरी पर है। राजधानी बोगोटा समेत कई शहरों में भी तेज झटके महसूस किए गए। एहतियात के तौर पर लोग इमारतों से बाहर निकलकर सड़कों पर आ गए। चोको और रिसाराल्डा में भारी नुकसान अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक, भूकंप सोमवार सुबह करीब 7:34 बजे आया। इसका केंद्र चोको इलाके में सैन जोसे डेल पालमार के पास था। भूकंप की गहराई 107 किलोमीटर थी। कोलंबिया में ज्यादा भूकंप क्यों आते हैं कोलंबिया दुनिया के सबसे ज्यादा भूकंप प्रभावित देशों में से एक है। यहां हर साल हजार से ज्यादा छोटे-बड़े भूकंप आते हैं। कोलंबिया में बार-बार भूकंप आने की सबसे बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह देश ‘रिंग ऑफ फायर’ नाम के भूकंप और ज्वालामुखी वाले क्षेत्र में आता है। यहां नाजका, कोकोस और दक्षिण अमेरिकी जैसी कई बड़ी टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती हैं। इनमें से एक प्लेट दूसरी के नीचे धंसती रहती है। इसी वजह से जमीन के अंदर लगातार हलचल होती रहती है, जिससे अक्सर तेज भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट होते हैं। ———————— यह खबर भी पढ़ें… कोलंबिया में 7.4 तीव्रता का भूकंप, 100 से ज्यादा मौतें:कई लोग मलबे में दबे, सैकड़ों घायल; इमारतें खाली कराई गईं दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया में 7.4 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया। इसमें अब तक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई हैं। भूकंप स्थानीय समय के मुताबिक सोमवार सुबह करीब 7 बजे आया। लोग घबराकर घरों से बाहर निकल आए। कई इमारतें खाली कराई गई हैं। सैकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। पूरी खबर पढ़ें…

रूस की तरफ से मध्यस्थ बनेंगे पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़:यूक्रेन के सरकारी बैंक से चल रहा विवाद; रूस पर संपत्ति छीनने का आरोप

रूस ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ को यूक्रेन के सरकारी बैंक ओश्चादबैंक से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में अपना मध्यस्थ बनाया है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला यूक्रेन और रूस के बीच 1998 में हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते के तहत चल रहा है। ओश्चादबैंक का कहना है कि 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले की वजह से उसे दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया क्षेत्रों में अपनी संपत्तियां और कारोबार गंवाना पड़ा। इन इलाकों में ओश्चादबैंक की बैंक शाखाएं, ATM, दफ्तर, जमीन, और दूसरे कारोबारी संसाधन थे। रूस के कब्जे के बाद बैंक इन संपत्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सका। कई शाखाएं बंद हो गईं और बैंक का कारोबार ठप पड़ गया। बैंक के मुताबिक, इससे उसे भारी नुकसान हुआ। इस ही वजह से बैंक ने कई सौ मिलियन डॉलर का दावा किया है। तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल करेगा सुनवाई बैंक ने जुलाई 2025 में रूस को विवाद का नोटिस भेजा था। रूस की ओर से जवाब नहीं मिलने पर उसने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू कर दी। इस मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल करेगा। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ से पहले भी भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई पूर्व जज अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता और ट्रिब्यूनल में अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। पहले रूस के दो प्रस्तावों को ठुकरा चुके थे चंद्रचूड़ रूस इससे पहले भी डीवाई चंद्रचूड़ को दो बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में अपनी ओर से मध्यस्थ बनाना चाहता था। रिपोर्ट के मुताबिक, पहला मामला जर्मनी की ऊर्जा कंपनी विंटरशाल डीया से जुड़ा था। इस कंपनी ने रूस पर आरोप लगाया था कि यूक्रेन युद्ध के बाद उसकी रूस में मौजूद गैस और तेल प्रोजेक्ट्स पर कब्जा कर लिया गया, जिससे उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ। दूसरा मामला यूक्रेन की सरकारी बिजली ट्रांसमिशन कंपनी उक्रएनरगो का था। कंपनी का आरोप है कि रूस के कब्जे वाले इलाकों में उसकी बिजली से जुड़ी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया या उन पर कब्जा कर लिया गया। इन दोनों मामलों में रूस ने डीवाई चंद्रचूड़ से अपनी ओर से मध्यस्थ बनने का अनुरोध किया था। हालांकि, उन्होंने यह जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की थी। अब तक दोनों मामलों का अंतिम नतीजा नहीं आया है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता क्या है? जब दो देशों की कंपनियों या किसी देश और विदेशी कंपनी के बीच कारोबार या निवेश को लेकर बड़ा विवाद हो जाता है, तो वे हर बार अदालत नहीं जाते। कई बार दोनों पक्ष मिलकर कुछ विशेषज्ञ चुनते हैं। यही विशेषज्ञ दोनों पक्षों की बात सुनते हैं और फैसला देते हैं। इसे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कहा जाता है। इसे आसान उदाहरण से समझिए मान लीजिए दो कंपनियों के बीच करोड़ों रुपये का विवाद हो गया। अगर वे कोर्ट जाएंगी, तो फैसला आने में कई साल लग सकते हैं। इसलिए दोनों मिलकर कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञ चुन लेती हैं। ये विशेषज्ञ दोनों पक्षों की बात सुनते हैं और तय करते हैं कि किसका दावा सही है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में क्या होता है? 1. दोनों पक्ष अपने-अपने विशेषज्ञ चुनते हैं: आमतौर पर दोनों पक्ष एक-एक मध्यस्थ चुनते हैं। इसके बाद दोनों मिलकर तीसरे मध्यस्थ का चयन करते हैं। ये तीनों मिलकर एक ट्रिब्यूनल बनाते हैं। 2. दोनों पक्ष अपनी बात रखते हैं: दोनों पक्ष अपने दस्तावेज, सबूत और दलीलें ट्रिब्यूनल के सामने पेश करते हैं। 3. ट्रिब्यूनल फैसला सुनाता है: सभी पक्षों की बात सुनने के बाद ट्रिब्यूनल अपना फैसला देता है। इसे ‘अवार्ड’ कहा जाता है। 4. फैसले का पालन करना होता है: ज्यादातर मामलों में ट्रिब्यूनल का फैसला दोनों पक्षों के लिए मानना जरूरी होता है। यह अदालत से कैसे अलग है? भारत से जुड़े दो चर्चित ट्रिब्यूनल मामले 1. केयर्न एनर्जी बनाम भारत क्या मामला था? ब्रिटेन की कंपनी केयर्न एनर्जी ने 2006 में भारत में अपने कारोबार में कुछ बदलाव किए थे। उस समय सरकार ने इस पर कोई टैक्स नहीं लगाया। लेकिन 2012 में भारत सरकार ने नया टैक्स कानून बनाया और कहा कि यह कानून पुराने सौदों पर भी लागू होगा। इसके बाद सरकार ने केयर्न से हजारों करोड़ रुपये का टैक्स मांगा और उसकी कुछ संपत्तियां भी अपने कब्जे में ले लीं। फैसला क्या आया? कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में शिकायत की। 2020 में ट्रिब्यूनल ने कहा कि भारत की टैक्स वसूली सही नहीं थी। उसने भारत को कंपनी को करीब 1.2 अरब डॉलर (करीब 9 हजार करोड़ रुपए) लौटाने का आदेश दिया। फिर क्या हुआ? 2021 में भारत सरकार ने यह पुराना टैक्स कानून वापस ले लिया। इसके बाद दोनों पक्षों में समझौता हो गया और मामला खत्म हो गया 2. वोडाफोन बनाम भारत क्या मामला था? 2007 में वोडाफोन ने भारत की एक मोबाइल कंपनी खरीदी थी। उस समय इस सौदे पर कोई टैक्स नहीं लगा। लेकिन 2012 में सरकार ने नया कानून बनाकर कहा कि पुराने सौदों पर भी टैक्स लगेगा। इसके बाद वोडाफोन से करीब 2.2 अरब डॉलर (करीब 16 हजार करोड़ रुपए) टैक्स मांगा गया। फैसला क्या आया? वोडाफोन भी अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल पहुंची। 2020 में ट्रिब्यूनल ने कहा कि भारत सरकार को इतने साल बाद पुराने सौदे पर टैक्स नहीं लगाना चाहिए था। इसलिए फैसला वोडाफोन के पक्ष में आया। फिर क्या हुआ? 2021 में भारत सरकार ने यह कानून वापस ले लिया। इसके बाद वोडाफोन और भारत के बीच विवाद भी खत्म हो गया। —————–

ब्रिटेन में कट्टरपंथी नेता के सामने कूड़ेदान वाला उम्मीदवार:अजीबोगरीब वादों से सुर्खियां बटोर रहा, कहा- हर वोटर को सस्ता घर दूंगा

ब्रिटेन के क्लैक्टन संसदीय क्षेत्र में होने वाला उपचुनाव इस बार एक अनोखे उम्मीदवार की वजह से चर्चा में है। यहां दक्षिणपंथी पार्टी रिफॉर्म यूके के नेता नाइजेल फराज के सामने काउंट बिनफेस चुनाव लड़ रहे हैं। बिनफेस की खास बात यह है कि वे चुनाव प्रचार के दौरान कचरे के डिब्बे जैसी पोशाक पहनते हैं और खुद को मजाकिया अंदाज में ‘ग्रह सिग्मा IX का एलियन’ बताते हैं। काउंट बिनफेस का दावा है कि चुनाव का नतीजा चाहे जो भी हो, जीत आखिर उनकी ही होगी। काउंट बिनफेस अपने अजीबोगरीब वादों की वजह से खूब चर्चा में है। वह हर नागरिक को सस्ता घर देने का वादा कर रहे हैं। कॉपीराइट को लेकर विवाद हुआ, फिर नाम पड़ा काउंट बिनफेस काउंट बिनफेस का किरदार 46 वर्षीय लेखक और कॉमेडियन जॉन हार्वे निभाते हैं। वे काउंट बिनफेस नाम से कई बार चुनाव लड़ चुके हैं। हार्वे ने पहली बार 2017 के ब्रिटिश आम चुनाव में लॉर्ड बकेटहेड नाम से तत्कालीन पीएम थेरेसा मे के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इस नाम को लेकर कॉपीराइट विवाद हो गया। दरअसल, लॉर्ड बकेटहेड भी एक व्यंग्यात्मक काल्पनिक किरदार है। यह काले रंग की टोपी पहनता है जो कि बाल्टी जैसा दिखता है। सबसे पहले 1984 में माइक ली नाम के एक शख्स ने लॉर्ड बकेटहेड नाम से यह चुनाव लड़ा था। इसके बाद हार्वे को लॉर्ड बकेटहेड नाम छोड़ना पड़ा। इसके बाद हार्वे ने काउंट बिनफेस किरदार को 2018 में चुनाव से कुछ महीने पहले लॉन्च किया। काउंट बिनफेस नाम का मतलब क्या है यह नाम 2 शब्दों से मिलकर बना है। काउंट, बिनफेस। काउंट राजशाही से जुड़ी एक उपाधि है। जैसे कि लॉर्ड, अर्ल या बैरन भी एक उपाधि है। ऐसे में काउंट बिनफेस का मतलब है- कूड़ेदान के चेहरे वाला काउंट। काउंट बिनफेस ने 2019 में तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के खिलाफ चुनाव लड़ा। इसके बाद वे 2021 और 2024 के लंदन मेयर चुनाव, 2023 उपचुनाव, 2024 आम चुनाव और 2026 में एक उपचुनाव में भी उम्मीदवार रहे। काउंट बिनफेस क्या चुनाव जीत पाएंगे? मौजूदा हालात में काउंट बिनफेस चुनाव जीत जाएंगे इसकी संभावना बहुत कम है। दरअसल, क्लैक्टन सीट से फराज सांसद रह चुके हैं। पिछले चुनाव में उन्हें 46% वोट मिले थे। हालिया सर्वे में उन्हें करीब 73% वोट मिलने का अनुमान जताया गया है। ब्रिटेन की लेबर, कंजर्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेट जैसी बड़ी पार्टियों ने इस उपचुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारा है। इससे फराज की जीत की संभावना और मजबूत हो गई है। काउंट बिनफेस इस चुनाव में फराज के सबसे चर्चित प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन वे अकेले नहीं हैं। इस उपचुनाव में कुल 33 उम्मीदवार मैदान में हैं। काउंट बिनफेस के लिए असली जीत सीट जीतना नहीं, बल्कि अच्छा वोट हासिल करना होगा। अब तक उन्हें सबसे ज्यादा 2021 के लंदन मेयर चुनाव में करीब 1% वोट मिले थे। क्लैक्टन उपचुनाव में बड़ी पार्टियों के शामिल नहीं होने से काउंट बिनफेस फराज के सबसे चर्चित प्रतिद्वंद्वी बन गए हैं। अगर उन्हें 5% या उससे ज्यादा वोट मिल जाते हैं, तो उनकी 500 पाउंड की जमानत राशि वापस मिल जाएगी। इसे उनके लिए बड़ी सफलता माना जाएगा। काउंट बिनफेस के चर्चित चुनावी वादे काउंट बिनफेस जैसे 3 और उम्मीदवार फराज के खिलाफ काउंट बिनफेस के अलावा 3 और उम्मीदवार हैं जो अपने व्यंग्यात्मक अंदाज के लिए जाने जाते हैं। ये तीनों उम्मीदवार ऑफिशियल मॉन्स्टर रेविंग लूनी पार्टी से हैं। यह ब्रिटेन की व्यंग्यात्मक राजनीतिक पार्टी है जो चुनाव में ऐसे उम्मीदवार उतारने के लिए जानी जाती है। इसकी स्थापना 1983 में संगीतकार डेविड सैच ने की थी। इस पार्टी के उम्मीदवार अक्सर अजीब पोशाक पहनते हैं और ऐसे चुनावी वादे करते हैं, जिनका मकसद लोगों को हंसाने के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान दिलाना होता है। हालांकि पार्टी के कई मजाकिया सुझाव बाद में सच भी साबित हुए। इनमें 24 घंटे पब खोलने की अनुमति, पालतू जानवरों के पासपोर्ट और जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के जरिए फैसले जैसे विचार शामिल हैं, जिन्हें बाद में ब्रिटिश सरकारों ने अलग-अलग समय पर लागू किया। ब्रिटेन में ऐसे उम्मीदवारों की पुरानी परंपरा ब्रिटेन में 18 साल या उससे अधिक उम्र का कोई भी ब्रिटिश, आयरिश या पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक संसदीय चुनाव लड़ सकता है। इसके लिए 500 पाउंड की जमानत राशि जमा करनी होती है और स्थानीय क्षेत्र के 10 लोगों का समर्थन चाहिए। इसी वजह से ब्रिटेन के चुनावों में अक्सर मजाकिया या व्यंग्यात्मक उम्मीदवार भी मैदान में उतरते हैं। कोई कार्टून किरदार की पोशाक पहनता है तो कोई अजीब वेशभूषा में प्रचार करता है। इनका मकसद चुनाव जीतने से ज्यादा चर्चा में आना और राजनीति पर व्यंग्य करना होता है।

Donald Trump: ‘मैं ईरान पर भरोसा करने वाला आखिरी इंसान’,आखिर ट्रंप ने ऐसा क्यों कहा? तुर्किए से लौटते वक्त विमान बदलने की भी बताई वजह

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर अपना रुख एक बार फिर साफ कर दिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें ईरान पर बिल्कुल भरोसा नहीं है और वे ईरान पर भरोसा करने वाले आखिरी व्यक्ति हैं। उन्होंने फिर दोहराया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अब अमेरिका के नियंत्रण में ह

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