अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार को पेंटागन को दक्षिण कोरिया के साथ होने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास कम करने का आदेश दिया। ट्रम्प ने कहा कि दक्षिण कोरिया ने ईरान को परमाणु हथियारों से मुक्त करने की अमेरिकी कोशिश में मदद करने से इनकार कर दिया था। उत्तर कोरिया ने शुक्रवार को अमेरिका और दक्षिण कोरिया के खिलाफ कड़े कदम उठाने की धमकी दी थी। उसने सैन्य अभ्यासों को आक्रामक युद्ध की तैयारी बताया और कहा कि इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है। ट्रम्प ने अभ्यास को महंगा और अनुचित बताया ट्रम्प ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति से इस कोशिश में अमेरिका का साथ देने को कहा था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ये सैन्य अभ्यास महंगे हैं और उत्तर कोरिया को गलत संदेश देते हैं। दक्षिण कोरिया के 18 हजार सैनिकों वाले 11 दिन के ये सैन्य अभ्यास इसी हफ्ते शुरू होने थे। ट्रम्प ने कहा कि अब इन्हें पूरी तरह रद्द करना संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने युद्ध सचिव पीट हेगसेथ को अभ्यासों में काफी कटौती करने का आदेश दिया है। अभ्यास से क्षेत्रीय शांति में दोनों देशों की भूमिका मजबूत होगी अमेरिकी और दक्षिण कोरियाई सेनाओं को साथ मिलकर अलग-अलग परिस्थितियों में सैन्य अभियान का अभ्यास करना था। इसमें लाइव-फायर, पानी से भरे इलाके को पार करना और सैन्य उपकरण पहुंचाना शामिल था। अमेरिकी सेना ने कहा कि इससे क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा में दोनों देशों की भूमिका मजबूत होगी। ट्रम्प और किम तीन बार मिल चुके हैं ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान उत्तर कोरियाई के सुप्रीम लीडर किम जोंग-उन से तीन बार मिले थे। इन बैठकों में उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा हुई थी और दोनों की आखिरी मुलाकात 2019 में हुई थी। अभ्यास घटाने की उनकी घोषणा से एक दिन पहले उन्होंने किम के साथ अपनी एक फोटो पोस्ट की थी। ट्रम्प ने फोटो के साथ लिखा था कि दोनों नेताओं के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं, लेकिन इस फोटो में चेहरा दोस्ताना नहीं दिख रहा है। पहले भी सैन्य अभ्यास रोकने की घोषणा कर चुके हैं ट्रम्प यह पहली बार नहीं है, जब ट्रम्प ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया के सैन्य अभ्यास खत्म करने की कोशिश की है। अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने अचानक घोषणा कर इन युद्ध अभ्यासों को उकसाने वाला बताया था। 2018 में सिंगापुर में किम जोंग-उन से मुलाकात के बाद ट्रम्प ने पत्रकारों से कहा था, हम युद्ध अभ्यास रोकेंगे, जिससे हमारे बहुत पैसे बचेंगे। यह तब तक रहेगा, जब तक हमें यह नहीं लगता कि भविष्य की बातचीत सही दिशा में नहीं जा रही है।
ईरान की सेना ने किसी अमेरिकी सैनिक को मारने या पकड़ने वाले व्यक्ति को 25 लाख रुपए का इनाम देने का ऐलान किया है। अगर यह काम कोई महिला करती है तो इनाम की रकम दोगुनी कर दी जाएगी। ईरानी सेना के कमांडर-इन-चीफ अमीर हातमी ने कहा कि यह योजना उन लोगों की कई मांगों के बाद बनाई गई है। उन लोगों के लिए जो फाइनेंशियल जिहाद के जरिए देश के युद्ध प्रयासों में आर्थिक रूप से मदद करना चाहते हैं। हातमी ने तेहरान में एक भाषण के दौरान यह बात कही। हातमी ने ट्रम्प पर साधा निशाना हातमी ने कहा कि इस संघर्ष ने अमेरिका के सैन्य दबदबे को कमजोर कर दिया है और कई देशों को अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है। उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प के उस बयान की भी आलोचना की, जिसमें उन्होंने ईरान की हार के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अमेरिका का क्षेत्र घोषित करने की बात कही थी। द जेरूसलम पोस्ट के मुताबिक, हातमी ने दावा किया कि अमेरिकी सेना को प्रभावी रूप से पीछे हटने पर मजबूर किया गया है और अब उसे फारस की खाड़ी, ओमान सागर या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में प्रवेश की अनुमति नहीं है। 28 फरवरी से होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई प्रभावित रही 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई लगातार प्रभावित रही। समुद्री बारूदी सुरंगों, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे, अमेरिका और ईरान की नाकेबंदी तथा बढ़ी बीमा लागत के कारण इस रास्ते से हर दिन गुजरने वाला कच्चा तेल 2 करोड़ बैरल से घटकर 37 लाख बैरल रह गया। ———- ये खबर भी पढ़ें… ईरान से समझौते को लेकर खाड़ी देश ट्रम्प से नाराज:बातचीत का नतीजा नहीं निकलने से सहयोगी देशों की बेचैनी बढ़ी ईरान के साथ समझौते की अमेरिकी कोशिशों से उसके कुछ खाड़ी सहयोगी निराश हैं। द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इन देशों को लग रहा है कि लंबे समय से बातचीत चलने के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच अब तक कोई पक्का समझौता नहीं हो पाया है। पूरी खबर पढ़ें…
ईरान की सेना ने किसी अमेरिकी सैनिक को मारने या पकड़ने वाले व्यक्ति को 25 लाख रुपए का इनाम देने का ऐलान किया है। अगर यह काम कोई महिला करती है तो इनाम की रकम दोगुनी कर दी जाएगी। ईरानी सेना के कमांडर-इन-चीफ अमीर हातमी ने कहा कि यह योजना उन लोगों की कई मांगों के बाद बनाई गई है। उन लोगों के लिए जो फाइनेंशियल जिहाद के जरिए देश के युद्ध प्रयासों में आर्थिक रूप से मदद करना चाहते हैं। हातमी ने तेहरान में एक भाषण के दौरान यह बात कही। हातमी ने ट्रम्प पर साधा निशाना हातमी ने कहा कि इस संघर्ष ने अमेरिका के सैन्य दबदबे को कमजोर कर दिया है और कई देशों को अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है। उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प के उस बयान की भी आलोचना की, जिसमें उन्होंने ईरान की हार के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अमेरिका का क्षेत्र घोषित करने की बात कही थी। द जेरूसलम पोस्ट के मुताबिक, हातमी ने दावा किया कि अमेरिकी सेना को प्रभावी रूप से पीछे हटने पर मजबूर किया गया है और अब उसे फारस की खाड़ी, ओमान सागर या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में प्रवेश की अनुमति नहीं है। 28 फरवरी से होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई प्रभावित रही 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल ढुलाई लगातार प्रभावित रही। समुद्री बारूदी सुरंगों, मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे, अमेरिका और ईरान की नाकेबंदी तथा बढ़ी बीमा लागत के कारण इस रास्ते से हर दिन गुजरने वाला कच्चा तेल 2 करोड़ बैरल से घटकर 37 लाख बैरल रह गया। ———- ये खबर भी पढ़ें… ईरान से समझौते को लेकर खाड़ी देश ट्रम्प से नाराज:बातचीत का नतीजा नहीं निकलने से सहयोगी देशों की बेचैनी बढ़ी ईरान के साथ समझौते की अमेरिकी कोशिशों से उसके कुछ खाड़ी सहयोगी निराश हैं। द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इन देशों को लग रहा है कि लंबे समय से बातचीत चलने के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच अब तक कोई पक्का समझौता नहीं हो पाया है। पूरी खबर पढ़ें…
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान का भारत दौरा फिलहाल टल गया है। ढाका के विदेश मंत्रालय ने रविवार को कहा कि पहले भारत पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को वापस भेजे। इसके बाद ही पीएम रहमान के भारत दौरे की तैयारियां आगे बढ़ेंगी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ए.के. शाहिदुल करीम ने कहा कि मौजूदा हालात में यात्रा के लिए सही माहौल नहीं है। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री 21 अगस्त को दिल्ली आने वाले थे। इस दौरे को लेकर दोनों देशों में बातचीत चल रही थी। हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बिगड़ा माहौल शाहिदुल करीम ने कहा- नई दिल्ली में 5 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने भारत की जमीन से राजनीतिक बयान दिए। इससे यात्रा के लिए बना माहौल खराब हुआ। करीम ने कहा कि बांग्लादेश पहले भी इस मुद्दे पर अपना रुख साफ कर चुका है। हम चाहते हैं कि पीएम तारिक की यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच सही माहौल बना सकें। तारिक के अगस्त के तीसरे हफ्ते में भारत आने की खबरें आई थीं। बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में दोषी ठहरा चुकी है। बांग्लादेश ने भारत के सामने 2 मांगें रखीं विदेश मंत्रालय ने कहा कि अब बांग्लादेश भारत के जवाब का इंतजार कर रहा है। पीएम रहमान की पार्टी उनकी भारत यात्रा के खिलाफ भारत ने तारिक को दिल्ली आने का न्योता दिया था भारत की ओर से तारिक रहमान को दिल्ली आने का न्योता पहले ही दिया जा चुका है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला 17 फरवरी को तारिक के प्रधानमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह में ढाका पहुंचे थे, तब उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उन्हें निमंत्रण दिया था। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने कहा था कि बंगाल की खाड़ी से जुड़े देशों के अंतरराष्ट्रीय संगठन का अध्यक्ष होने के नाते तारिक को सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने का भी न्योता मिला है। भारतीय हाई कमिश्नर ने पीएम तारिक से मुलाकात की बांग्लादेश में भारतीय हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी ने 10 अगस्त को प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मुलाकात की। दोनों के बीच कई अहम द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हुई। इस दौरान ढाका ने शेख हसीना के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया जल्द पूरी करने की उम्मीद भी जताई। मुलाकात के बाद त्रिवेदी ने कहा कि दोनों देश आगे की ओर देख रहे हैं और द्विपक्षीय रिश्तों को लेकर सकारात्मक सोच है। इसके कुछ ही घंटों बाद त्रिवेदी नई दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इसके बाद तारिक की दिल्ली यात्रा को लेकर उम्मीदें बढ़ी थीं। ——————- यह खबर भी पढ़ें… शेख हसीना बोलीं- दिसंबर में बांग्लादेश लौटूंगी:2 साल बाद वर्चुअल भाषण दिया, कैमरा ऑफ था; बांग्लादेश सरकार बोली- दिल्ली में बैठकर जहर उगला बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दो साल बाद बुधवार को लोगों को वर्चुअली संबोधित किया। जब हसीना बोल रही थीं, उस दौरान उनका कैमरा बंद था। पूरी खबर पढ़ें…
यूक्रेन ने रविवार को रूस पर युद्ध शुरू होने के बाद अब तक का सबसे बड़े ड्रोन हमला किया है। इसमें कम से कम 6 लोगों की मौत हो गई। इन ड्रोन हमलों में मॉस्को के पास रूसी ई-कॉमर्स कंपनी वाइल्डबेरिज के डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर में आग लग गई। यह गोदाम करीब 2 लाख वर्ग मीटर में फैला है। सामने आई तस्वीरों में इमारत का बड़ा हिस्सा आग की चपेट में दिखाई दिया। आसमान में दूर तक काला धुआं उठता नजर आया। रूस के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि उसने पिछले 24 घंटे में 9 यूक्रेनी क्रूज मिसाइल और कुल 1,478 ड्रोन मार गिराए हैं। मॉस्को के मेयर सर्गेई सोब्यानिन ने बताया कि करीब 600 ड्रोन राजधानी की ओर दागे गए थे। उन्होंने इसे पिछले दो साल में मॉस्को पर हुआ सबसे बड़ा हवाई हमला बताया। यूक्रेन ने 1,500 मील तक हमला करने की क्षमता बढ़ाई यूक्रेन ने 2026 में अपनी लंबी दूरी की ड्रोन और मिसाइल क्षमता में तेजी से इजाफा किया है। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अब वह रूस की सीमा से करीब 1,500 मील दूर तक मौजूद ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम है। यूक्रेन इन हथियारों से रूस के गोदामों, तेल रिफाइनरियों, बंदरगाहों और सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहा है। इससे युद्ध में पहली बार रूस की लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता को कड़ी चुनौती मिल रही है। दोनों देशों की एयर डिफेंस यानी हवाई हमलों को रोकने वाले सिस्टम पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है। वाइल्डबेरीज के ठिकाने क्यों निशाने पर? पिछले एक महीने में यूक्रेन ने वाइल्डबेरीज से जुड़ी कई इमारतों और सुविधाओं को निशाना बनाया है। कंपनी रूस के ऑनलाइन कारोबार में बड़ी भूमिका निभाती है और इसके डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर देशभर में फैले हैं। यूक्रेन के हमलों में करीब 20 गोदामों और दूसरी इमारतों को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है। ऐसे हमलों का मकसद रूस की सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। रूस के हमलों में यूक्रेन में 7 लोगों की मौत इसी दौरान रूस ने यूक्रेन पर भी ड्रोन और मिसाइल हमले किए। इन हमलों में कम से कम 7 लोगों की मौत हुई। यूक्रेन के सूमी सीमा क्षेत्र में 2 लोगों की मौत हुई, जबकि देश के दूसरे हिस्सों में 3 और लोगों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है। रविवार सुबह करीब 3 बजे कीव पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया गया। इसमें 6 लोग घायल हुए और राजधानी में कई जगह आग लग गई। कीव के ओबोलोंस्की जिले में पेट्रोव्का बुक मार्केट का बड़ा हिस्सा जल गया। दुकानदारों के मुताबिक, आग में उनकी किताबों का पूरा स्टॉक नष्ट हो गया। जेलेंस्की बोले- रूस नागरिक इलाकों को निशाना बना रहा यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इमरजेंसी सर्विस के कर्मचारियों की तारीफ की। उन्होंने रूस पर नागरिक इलाकों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने का आरोप लगाया। जेलेंस्की ने कहा कि रूस अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की पहुंच वाले इलाकों में नागरिक ढांचे पर हमला कर रहा है। उनके मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में रूस ने यूक्रेन के शहरों और दूसरे इलाकों पर 1,550 से ज्यादा ड्रोन, करीब 1,560 गाइडेड बम और 62 मिसाइल दागीं। इनमें बड़ी संख्या बैलिस्टिक मिसाइलों की थी। बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकना यूक्रेन के लिए बड़ी चुनौती यूक्रेन धीमी गति से आने वाले ड्रोन को रोकने में काफी हद तक सफल रहा है। लेकिन तेज गति से आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकना उसके लिए बड़ी चुनौती है। ऐसी मिसाइलों को रोकने में अमेरिका की Patriot एयर डिफेंस प्रणाली अहम भूमिका निभाती है। हालांकि, लगातार हो रहे रूसी हमलों के कारण यूक्रेन के पास इन इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार सीमित हो गया है।
ईरान के साथ समझौते की अमेरिकी कोशिशों से उसके कुछ खाड़ी सहयोगी निराश हैं। द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इन देशों को लग रहा है कि लंबे समय से बातचीत चलने के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच अब तक कोई पक्का समझौता नहीं हो पाया है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने खाड़ी देशों के ट्रम्प से नाराज होने की खबरों को खारिज किया है। एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि ट्रम्प के खाड़ी देशों के नेताओं के साथ अच्छे रिश्ते हैं और युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका लगातार उनके संपर्क में है। ट्रम्प ने फिलहाल ईरान पर नए हमले की तैयारी से इनकार किया एक्सियोस के मुताबिक, ट्रम्प ने पिछले हफ्ते कहा था कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर नए हमले की तैयारी नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के साथ “आधी-अधूरी बातचीत” कर रहा है और वहां के खराब आर्थिक हालात पर नजर रख रहा है। इससे पहले ट्रम्प ने ईरान पर होने वाला एक हमला भी रोक दिया था। उनका कहना था कि अगर जल्द समझौता हो जाता है तो सैन्य कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। होर्मुज स्ट्रेट खोलने पर अटका समझौता अमेरिका और ईरान की बातचीत में होर्मुज स्ट्रेट अहम मुद्दा बना हुआ है। ट्रम्प चाहते हैं कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत और पूरी तरह खोला जाए। वहीं, ईरान की मांग है कि अमेरिका पहले अपनी नौसैनिक नाकाबंदी हटाए और ईरान के पास तैनात अमेरिकी सैनिकों को पीछे करे। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि ईरान और ओमान के बीच होर्मुज को लेकर बातचीत चल रही है। इसमें समुद्र में जहाजों के लिए रास्ता तय करने जैसे तकनीकी मुद्दों पर चर्चा हो रही है। उन्होंने साफ किया कि यह बातचीत अमेरिका के साथ चल रही बातचीत से अलग है। ईरान को लेकर खाड़ी देशों का रुख अलग-अलग अमेरिका के सहयोगी होने के बावजूद खाड़ी देश ईरान से निपटने के तरीके पर एकमत नहीं हैं। संयुक्त अरब अमीरात ईरान पर ज्यादा सैन्य दबाव बनाने के पक्ष में है। उसका मानना है कि ईरान का रिवोल्यूशनरी गार्ड तभी पीछे हटेगा, जब अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ाए और होर्मुज पर नियंत्रण सुनिश्चित करे। वहीं, सऊदी अरब बातचीत और तनाव कम करने के पक्ष में है। उसने पहले होर्मुज को सैन्य ताकत से खोलने की अमेरिकी योजना का विरोध किया था। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी ट्रम्प से फोन पर बात कर सैन्य कार्रवाई नहीं करने की अपील की थी। कतर ने ईरान, अमेरिका और ओमान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। कतर के अधिकारियों ने ट्रम्प को बताया था कि ईरान ने होर्मुज को लेकर एक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है। ईरान का आरोप- अमेरिका और इजराइल खाड़ी देशों को हमारे खिलाफ कर रहे ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजराइल खाड़ी देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं। ईरानी सरकारी टीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि दोनों देश ईरान की अंदरूनी समस्याओं का फायदा उठा रहे हैं। उन्होंने पड़ोसी खाड़ी देशों के साथ रिश्ते मजबूत करने पर भी जोर दिया। ———————— ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले-ईरान की हार के बाद होर्मुज अमेरिका का होगा:ईरान का पलटवार- सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कब्जा नहीं होता, ये हमारा ही रहेगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान को हराने के बाद वे होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का ‘इलाका’ घोषित करेंगे। उन्होंने यह बात शुक्रवार को न्यूयॉर्क में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कही। वे न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन पार्टी की रैली को संबोधित कर रहे थे। पूरी खबर यहां पढ़ें…
ईरान के साथ समझौते की अमेरिकी कोशिशों से उसके कुछ खाड़ी सहयोगी निराश हैं। द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इन देशों को लग रहा है कि लंबे समय से बातचीत चलने के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच अब तक कोई पक्का समझौता नहीं हो पाया है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने खाड़ी देशों के ट्रम्प से नाराज होने की खबरों को खारिज किया है। एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि ट्रम्प के खाड़ी देशों के नेताओं के साथ अच्छे रिश्ते हैं और युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका लगातार उनके संपर्क में है। ट्रम्प ने फिलहाल ईरान पर नए हमले की तैयारी से इनकार किया एक्सियोस के मुताबिक, ट्रम्प ने पिछले हफ्ते कहा था कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर नए हमले की तैयारी नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के साथ “आधी-अधूरी बातचीत” कर रहा है और वहां के खराब आर्थिक हालात पर नजर रख रहा है। इससे पहले ट्रम्प ने ईरान पर होने वाला एक हमला भी रोक दिया था। उनका कहना था कि अगर जल्द समझौता हो जाता है तो सैन्य कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। ईरान को लेकर खाड़ी देशों का रुख अलग-अलग अमेरिका के सहयोगी होने के बावजूद खाड़ी देश ईरान से निपटने के तरीके पर एकमत नहीं हैं। संयुक्त अरब अमीरात ईरान पर ज्यादा सैन्य दबाव बनाने के पक्ष में है। उसका मानना है कि ईरान का रिवोल्यूशनरी गार्ड तभी पीछे हटेगा, जब अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ाए और होर्मुज पर नियंत्रण सुनिश्चित करे। वहीं, सऊदी अरब बातचीत और तनाव कम करने के पक्ष में है। उसने पहले होर्मुज को सैन्य ताकत से खोलने की अमेरिकी योजना का विरोध किया था। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी ट्रम्प से फोन पर बात कर सैन्य कार्रवाई नहीं करने की अपील की थी। कतर ने ईरान, अमेरिका और ओमान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। कतर के अधिकारियों ने ट्रम्प को बताया था कि ईरान ने होर्मुज को लेकर एक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है। ईरान का आरोप- अमेरिका और इजराइल खाड़ी देशों को हमारे खिलाफ कर रहे ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजराइल खाड़ी देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं। ईरानी सरकारी टीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि दोनों देश ईरान की अंदरूनी समस्याओं का फायदा उठा रहे हैं। उन्होंने पड़ोसी खाड़ी देशों के साथ रिश्ते मजबूत करने पर भी जोर दिया। होर्मुज स्ट्रेट खोलने पर अटका समझौता अमेरिका और ईरान की बातचीत में होर्मुज स्ट्रेट अहम मुद्दा बना हुआ है। ट्रम्प चाहते हैं कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत और पूरी तरह खोला जाए। वहीं, ईरान की मांग है कि अमेरिका पहले अपनी नौसैनिक नाकाबंदी हटाए और ईरान के पास तैनात अमेरिकी सैनिकों को पीछे करे। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि ईरान और ओमान के बीच होर्मुज को लेकर बातचीत चल रही है। इसमें समुद्र में जहाजों के लिए रास्ता तय करने जैसे तकनीकी मुद्दों पर चर्चा हो रही है। उन्होंने साफ किया कि यह बातचीत अमेरिका के साथ चल रही बातचीत से अलग है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले-ईरान की हार के बाद होर्मुज अमेरिका का होगा:ईरान का पलटवार- सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कब्जा नहीं होता, ये हमारा ही रहेगा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान को हराने के बाद वे होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का ‘इलाका’ घोषित करेंगे। उन्होंने यह बात शुक्रवार को न्यूयॉर्क में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कही। वे न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन पार्टी की रैली को संबोधित कर रहे थे। पूरी खबर यहां पढ़ें…
हरियाणा के जींद से यूरोप गए 22 वर्षीय युवक की डूबने से मौत हो गई। वो मॉल्डोवा में दोस्तों के साथ वीकएंड पर समुद्र घूमने गया था। जिस बोट में वो बैठा अचानक से थे, वह डूबने लगी। समुद्र में डूबने से युवक की मौत हो गई। युवक 9 महीने पहले यूरोप स्टडी वीजा पर गया था। पढ़ाई के साथ-साथ वहां पर एक होटल में पार्ट टाइम डिलीवरी बॉय का काम करता था। युवक के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। इसी कारण उसे विदेश भेजा गया था ताकि वो पढ़ाई के साथ वहां जॉब कर पैसे भेज सके। युवक के पिता की 7 साल पहले मौत हो चुकी है। मां ने रिश्तेदारों से पैसे उधार लेकर इकलौते बेटे को भेजा था। अब 10 लाख रुपए खर्च कर युवक का शव गांव लाया गया। शव गांव पहुंचने पर आज बड़ी बहन ने भाई का अंतिम संस्कार किया और मुखाग्नि दी। 9 महीने पहले विदेश भेजा था चचेरे भाई प्रवीन कुमार ने बताया कि गांव चांदपुर के रहने वाले परिवार ने करीब 9 महीने पहले निहाल सिंह (22) को स्टडी वीजा पर विदेश भेजा था। परिवार को उम्मीद थी कि वह वहां पढ़ाई के साथ कमाई करके आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद करेगा। विदेश भेजने में 15 लाख रुपए खर्च किए प्रवीन के मुताबिक, निहाल को विदेश भेजने में परिवार ने करीब 15 लाख रुपए खर्च किए थे। मां के पास इतने पैसे नहीं थे, इसलिए रिश्तेदारों और जानकारों से रकम जुटाई गई थी। अब शव भारत लाने में भी करीब 10 लाख रुपए खर्च हुए हैं, जिसमें कुछ राशि परिवार और कुछ भाईचारे से जुटाई गई। पिता की मौत के बाद निहाल था सहारा प्रवीन ने बताया कि निहाल के पिता कृष्ण कुमार की 7 साल पहले ही हार्ट अटैक से मौत हो चुकी थी। इसके बाद मां सुनीता देवी ने दोनों बच्चों का पालन-पोषण किया। घर के पास उनकी करियाना की दुकान है और निहाल परिवार में अकेला कमाने वाला था। निहाल से परिवार को बड़ी उम्मीदें थीं परिवार को उम्मीद थी कि निहाल विदेश में पढ़ाई पूरी करने के साथ कमाई कर मां और बहन का सहारा बनेगा। उसकी मौत के बाद परिवार की उम्मीदें टूट गईं। गांव में शव पहुंचने के बाद परिवार में मातम छा गया। दोपहल 2 बजे निहाल का अंतिम संस्कार किया गया।
इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर रहे जेसन अर्डे का 41 साल की उम्र में निधन हो गया। वे शिक्षा और समाज से जुड़े विषयों पर रिसर्च और अध्यापन करते थे। शुक्रवार दोपहर करीब 3 बजे उन्हें दक्षिण लंदन के बैटरसी स्थित उनके घर में बेहोश पाया गया। एंबुलेंस टीम ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उनकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, उनकी मौत अचानक हुई। अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे मौत को संदिग्ध माना जाए। पुलिस परिवार के संपर्क में है और मामले की जांच कर रही है। मौत से कुछ दिन पहले ही कैम्ब्रिज से दिया था इस्तीफा जेसन अर्डे ने 5 अगस्त को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इस्तीफा दिया था। यह फैसला उनकी कुछ रिसर्च को लेकर उठे सवालों के बीच आया था। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने उनकी नियुक्ति और यूनिवर्सिटी में उनके कामकाज की जांच भी शुरू की थी। यूनिवर्सिटी यह पता लगा रही थी कि अर्डे को 2022 में प्रोफेसर की नौकरी कैसे मिली और उनके काम के दौरान क्या हुआ। इस्तीफा देने के बाद अर्डे ने कहा था कि लगातार लग रहे आरोपों और उनके बारे में सार्वजनिक रूप से की जा रही टिप्पणियों का उन पर बहुत गहरा असर पड़ा। रिसर्च के कुछ हिस्सों पर नकल के आरोप लगे थे अर्डे ने 2015 में ब्रिटेन की लिवरपूल जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी से पीएचडी की थी। इस दौरान उन्होंने एक रिसर्च रिपोर्ट लिखी थी। बाद में उनकी रिसर्च के कुछ हिस्सों पर आरोप लगे कि उन्होंने दूसरे लोगों के लिखे काम को बिना उचित श्रेय दिए अपनी रिसर्च में इस्तेमाल किया। आसान भाषा में कहें तो उन पर रिसर्च में नकल करने का आरोप लगा था। अर्डे ने इन आरोपों को गलत बताया था। इसके बाद उनकी कुछ दूसरी रिसर्च में भी गलतियां होने के आरोप लगाए गए। नियुक्ति पर भी उठे थे सवाल अर्डे की कैम्ब्रिज में नियुक्ति को लेकर भी विवाद हुआ था। कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्हें उनकी योग्यता के बजाय यूनिवर्सिटी की विविधता बढ़ाने वाली नीति के तहत नौकरी दी गई। इस तरह की नीतियों को आम तौर पर DEI कहा जाता है। इसका मतलब है कि अलग-अलग समुदायों और कम प्रतिनिधित्व वाले लोगों को संस्थानों में बराबर मौके दिए जाएं और उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए। हालांकि, ब्रिटेन की शिक्षक यूनियन के नेता डेनियल कबेडे ने अर्डे का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि अर्डे को सार्वजनिक रूप से बहुत बुरी तरह निशाना बनाया गया। उन्होंने ब्रिटिश मीडिया और दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों के एक वर्ग पर अर्डे के खिलाफ नस्लवादी अभियान चलाने का आरोप लगाया था। परिवार बोला- गलत जानकारी के अभियान ने उन्हें बहुत परेशान किया अर्डे के परिवार ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया। परिवार ने कहा कि जेसन के बारे में फैलाई जा रही गलत जानकारी के अभियान का उन पर बहुत बुरा असर पड़ा था। परिवार के मुताबिक, अर्डे शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और हमेशा दूसरों में अच्छाई देखने की कोशिश करते थे। परिवार ने मीडिया से अपील की कि अब उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए। उन्होंने जेसन और उनके परिवार के खिलाफ लंबे समय से चल रहे उत्पीड़न को रोकने की भी अपील की। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की प्रमुख डेबोरा प्रेंटिस ने अर्डे की मौत पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि इस मुश्किल समय में उनकी संवेदनाएं अर्डे के परिवार और दोस्तों के साथ हैं। ब्रिटेन की शिक्षा मंत्री लूसी पॉवेल ने भी उनके निधन पर शोक जताया। 2022 में कैम्ब्रिज में बनाया था इतिहास जेसन अर्डे 2022 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर बने थे। वे यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर थे। कैम्ब्रिज में लंबे समय से अश्वेत लोगों की संख्या कम रही है। ऐसे में अर्डे की नियुक्ति को यूनिवर्सिटी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था। उनकी मौत ऐसे समय हुई है, जब उनकी नियुक्ति और रिसर्च को लेकर यूनिवर्सिटी में जांच चल रही थी।
इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर रहे जेसन अर्डे का 41 साल की उम्र में निधन हो गया। वे शिक्षा और समाज से जुड़े विषयों पर रिसर्च और अध्यापन करते थे। शुक्रवार दोपहर करीब 3 बजे उन्हें दक्षिण लंदन के बैटरसी स्थित उनके घर में बेहोश पाया गया। एंबुलेंस टीम ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उनकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, उनकी मौत अचानक हुई। अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे मौत को संदिग्ध माना जाए। पुलिस परिवार के संपर्क में है और मामले की जांच कर रही है। मौत से कुछ दिन पहले ही कैम्ब्रिज से दिया था इस्तीफा जेसन अर्डे ने 5 अगस्त को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इस्तीफा दिया था। यह फैसला उनकी कुछ रिसर्च को लेकर उठे सवालों के बीच आया था। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने उनकी नियुक्ति और यूनिवर्सिटी में उनके कामकाज की जांच भी शुरू की थी। यूनिवर्सिटी यह पता लगा रही थी कि अर्डे को 2022 में प्रोफेसर की नौकरी कैसे मिली और उनके काम के दौरान क्या हुआ। इस्तीफा देने के बाद अर्डे ने कहा था कि लगातार लग रहे आरोपों और उनके बारे में सार्वजनिक रूप से की जा रही टिप्पणियों का उन पर बहुत गहरा असर पड़ा। रिसर्च के कुछ हिस्सों पर नकल के आरोप लगे थे अर्डे ने 2015 में ब्रिटेन की लिवरपूल जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी से पीएचडी की थी। इस दौरान उन्होंने एक रिसर्च रिपोर्ट लिखी थी। बाद में उनकी रिसर्च के कुछ हिस्सों पर आरोप लगे कि उन्होंने दूसरे लोगों के लिखे काम को बिना उचित श्रेय दिए अपनी रिसर्च में इस्तेमाल किया। आसान भाषा में कहें तो उन पर रिसर्च में नकल करने का आरोप लगा था। अर्डे ने इन आरोपों को गलत बताया था। इसके बाद उनकी कुछ दूसरी रिसर्च में भी गलतियां होने के आरोप लगाए गए। नियुक्ति पर भी उठे थे सवाल अर्डे की कैम्ब्रिज में नियुक्ति को लेकर भी विवाद हुआ था। कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्हें उनकी योग्यता के बजाय यूनिवर्सिटी की विविधता बढ़ाने वाली नीति के तहत नौकरी दी गई। इस तरह की नीतियों को आम तौर पर DEI कहा जाता है। इसका मतलब है कि अलग-अलग समुदायों और कम प्रतिनिधित्व वाले लोगों को संस्थानों में बराबर मौके दिए जाएं और उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए। हालांकि, ब्रिटेन की शिक्षक यूनियन के नेता डेनियल कबेडे ने अर्डे का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि अर्डे को सार्वजनिक रूप से बहुत बुरी तरह निशाना बनाया गया। उन्होंने ब्रिटिश मीडिया और दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों के एक वर्ग पर अर्डे के खिलाफ नस्लवादी अभियान चलाने का आरोप लगाया था। DEI क्या है और इसे लेकर विवाद क्या है? DEI यानी डायवर्सिटी, इक्विटी एंड इंक्लूजन का मतलब अलग-अलग समुदायों, नस्लों और कम प्रतिनिधित्व वाले लोगों को संस्थानों में बराबर मौके देना और उनकी भागीदारी बढ़ाना है। यूनिवर्सिटीज में DEI नीतियों का मकसद ऐसे लोगों की संख्या बढ़ाना है, जिनकी शिक्षा और नौकरियों में लंबे समय से कम भागीदारी रही है। इसके आलोचकों का कहना है कि इससे कभी-कभी योग्यता के बजाय किसी व्यक्ति की पहचान को ज्यादा महत्व मिलने का खतरा रहता है। समर्थकों का तर्क है कि बराबरी के मौके देने के लिए ऐसे कदम जरूरी हैं। परिवार बोला- गलत जानकारी के अभियान ने उन्हें बहुत परेशान किया अर्डे के परिवार ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया। परिवार ने कहा कि जेसन के बारे में फैलाई जा रही गलत जानकारियों का उन पर बहुत बुरा असर पड़ा था। परिवार के मुताबिक, अर्डे शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और हमेशा दूसरों में अच्छाई देखने की कोशिश करते थे। परिवार ने मीडिया से अपील की कि अब उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए। उन्होंने जेसन और उनके परिवार के खिलाफ लंबे समय से चल रहे उत्पीड़न को रोकने की भी अपील की। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की प्रमुख डेबोरा प्रेंटिस ने अर्डे की मौत पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि इस मुश्किल समय में उनकी संवेदनाएं अर्डे के परिवार और दोस्तों के साथ हैं। ब्रिटेन की शिक्षा मंत्री लूसी पॉवेल ने भी उनके निधन पर शोक जताया।

