PM CARES में पड़े ₹8,500 करोड़, फिर भी पानी-बेंच के लिए तरस रहे बच्चे! अभिजीत दीपके की पीएम मोदी से बड़ी मांग

PM CARES में पड़े ₹8,500 करोड़, फिर भी पानी-बेंच के लिए तरस रहे बच्चे! अभिजीत दीपके की पीएम मोदी से बड़ी मांग

Abhijit Dipke PM CARES Fund

Abhijit Dipke PM CARES Fund: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक और सोशल मीडिया पर चर्चित कार्यकर्ता अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक नई और बड़ी मांग की है। दीपके ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा है कि 'PM CARES Fund' में बिना इस्तेमाल के पड़े लगभग 8,500 करोड़ रुपए का इस्तेमाल देश के बच्चों की शिक्षा, बुनियादी सुविधाओं और नए हाई-टेक मॉडल स्कूल बनाने के लिए किया जाना चाहिए।
 

8,500 करोड़ में बन सकते हैं 1000 से ज्यादा मॉडल स्कूल 

अभिजीत दीपके ने हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि PM CARES Fund में लगभग ₹8,500 करोड़ (₹8,452 करोड़) की राशि बिना किसी उपयोग के पड़ी हुई है। उन्होंने गणित समझाते हुए कहा कि अगर हम सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस एक विश्वस्तरीय 'मॉडल स्कूल' बनाने की लागत औसतन 8 करोड़ रुपए भी मानें, तो इस राशि से देश में 1000 से भी ज्यादा नए हाई-टेक मॉडल स्कूल तैयार किए जा सकते हैं। ALSO READ: CJP कार्यकर्ता के पिता की पीट-पीटकर जान ली, बंगाल में सरकारी स्कूल की बदहाली दिखाना पड़ा भारी, दीपके ने साधा निशाना

एक तरफ फंड की कमी, दूसरी तरफ बैंक में पड़ा पैसा 

गांवों और ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर चिंता जताते हुए दीपके ने कहा कि वे पिछले कुछ दिनों से जमीनी स्तर पर स्कूलों का दौरा कर रहे हैं। वहां बच्चों को बैठने के लिए बेंच, पीने का साफ पानी, पक्की सड़कें और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नसीब नहीं हो रही हैं। 

 

उन्होंने कहा कि जब मैंने स्थानीय अधिकारियों और प्रशासन से पूछा कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं हैं, तो जवाब मिला कि फंड की कमी है। एक तरफ हमारे देश के छोटे बच्चे स्कूल में सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं और उनसे कहा जा रहा है कि फंड नहीं है, वहीं दूसरी तरफ PM CARES Fund में 8,500 करोड़ रुपये वैसे ही रखे हुए हैं। यह दोहरा रवैया क्यों?  ALSO READ: CJP प्रोस्टेट पर बोले CJI- युवाओं की बात सुननी चाहिए, हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता

यह जनता का पैसा है, पीएम का नहीं 

अभिजीत दीपके ने देश की जनता और वीडियो देख रहे दर्शकों से अपील की कि वे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर या सोशल मीडिया के जरिए अनुरोध करें कि इस राशि का इस्तेमाल बच्चों के भविष्य के लिए हो। 

 

उन्होंने जोर देकर कहा कि PM CARES Fund में पड़ा पैसा देश की जनता का है, यह किसी व्यक्तिगत नेता या पीएम का पैसा नहीं है। इसलिए इस पैसे का उपयोग देश के गरीब बच्चों की पढ़ाई, उनकी बुनियादी सुविधाओं और बेहतर भविष्य के लिए ही होना चाहिए। प्रधानमंत्री को यह कदम उठाकर दिखाना चाहिए कि वे वाकई देश के बच्चों की परवाह (Care) करते हैं।

104 हेल्थ हेल्पलाइन : एक दशक में कॉल सेंटर से ‘प्रोएक्टिव हेल्थ सिस्टम’ तक पहुंचा उत्तराखंड

104 हेल्थ हेल्पलाइन : एक दशक में कॉल सेंटर से ‘प्रोएक्टिव हेल्थ सिस्टम’ तक पहुंचा उत्तराखंड

104 Health Helpline Uttarakhand Health Services: मेडिकल, पुलिस और अग्निशमन सेवाओं के लिए 108 नंबर से लगभग हर कोई परिचित है, लेकिन उत्तराखंड में 104 हेल्थ हेल्पलाइन पिछले एक दशक में स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी, शिकायत निवारण और लाभार्थियों की सक्रिय निगरानी का अहम माध्यम बन गई है। खास बात यह है कि यह व्यवस्था केवल नागरिकों की कॉल का जवाब नहीं देती, बल्कि जरूरतमंद मरीजों तक खुद पहुंचकर उनके स्वास्थ्य और उपचार की स्थिति का फॉलोअप भी करती है।

 

स्वास्थ्य निदेशालय, देहरादून में संचालित 104 कॉल सेंटर अब तक एक करोड़ 38 लाख से अधिक स्वास्थ्य संबंधी कॉल कर चुका है। यह व्यवस्था राज्य के सभी 13 जिलों में 27 स्वास्थ्य सेवाओं और कार्यक्रमों से जुड़े लाभार्थियों तक पहुंच बना रही है।

 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, जवाबदेह और नागरिक केंद्रित बनाने पर जोर दे रही है। इसी सोच के तहत 104 हेल्पलाइन को केवल सूचना देने वाले कॉल सेंटर के बजाय प्रोएक्टिव हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम के रूप में विकसित किया गया है।

अस्पताल में रजिस्ट्रेशन के बाद शुरू होता है फॉलोअप

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रोएक्टिव ट्रैकिंग सिस्टम है। राज्य के किसी भी जिले में स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में मरीज के पंजीकरण के बाद संबंधित जानकारियाँ 104 कॉल सेंटर पहुंचाई जाती है। इसके बाद स्वास्थ्य संबंधी चुनौती से जूझ रहे लाभार्थी से नियमित रूप से संपर्क कर उसकी स्थिति की जानकारी ली जाती है।

 

खासतौर पर गर्भवती महिलाओं के मामले में यह व्यवस्था और महत्वपूर्ण हो जाती है। गर्भावस्था के तीसरे महीने से लेकर प्रसव तक टीकाकरण और जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं का फॉलोअप किया जाता है। बच्चे के जन्म के बाद करीब डेढ़ वर्ष तक उसके स्वास्थ्य और टीकाकरण की स्थिति पर भी नजर रखी जाती है, ताकि जरूरी टीके और स्वास्थ्य सेवाएं समय पर मिल सकें।

27 स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी निगरानी

104 कॉल सेंटर आयुष्मान भारत योजना, आशा कार्यकर्ता, बाल स्वास्थ्य, चारधाम यात्रा, काउंसलिंग, डेंगू, प्रारंभिक बाल्यावस्था विकास, ई-संजीवनी, हीमोफीलिया, हेपेटाइटिस, उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था, एचआईवी, एचपीवी, उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह, मातृ स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, टीबी और थैलेसीमिया समेत विभिन्न कार्यक्रमों से जुड़े लाभार्थियों से संपर्क करता है।

 

इसके अलावा राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम और एंटी रेबीज सेवाओं के तहत लाभार्थियों को जरूरी जानकारी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए परामर्श भी दिया जाता है।

सिर्फ जानकारी नहीं, योजनाओं की डिलीवरी की भी पड़ताल

104 की भूमिका यहीं खत्म नहीं होती। कॉल सेंटर के माध्यम से मरीजों से सीधे फीडबैक लिया जाता है। केंद्र और राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं के तहत मिलने वाले वित्तीय लाभ और प्रोत्साहन की जानकारी भी लाभार्थियों से क्रॉस-चेक की जाती है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि योजनाओं का लाभ वास्तव में पात्र व्यक्ति तक पहुंचा या नहीं।

 

एक दशक के सफर में 104 हेल्थ हेल्पलाइन ने यह साबित किया है कि एक टोल-फ्री नंबर सिर्फ फोन उठाने की व्यवस्था नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, निगरानी, फॉलोअप और जवाबदेही का प्रभावी तंत्र भी बन सकता है। पहाड़ी और भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण उत्तराखंड में यह मॉडल दूरदराज के लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाना हमारी सरकार की प्राथमिकता है। 104 हेल्थ हेल्पलाइन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो केवल नागरिकों की समस्याओं का समाधान नहीं कर रही, बल्कि लाभार्थियों तक स्वयं पहुंचकर उनकी स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतर निगरानी और फॉलोअप सुनिश्चित कर रही है।

रॉयल एनफील्ड Classic 350 Gorkha Edition लॉन्च, कीमत ₹2.11 लाख; गोरखा रेजिमेंट को समर्पित

रॉयल एनफील्ड Classic 350 Gorkha Edition लॉन्च, कीमत ₹2.11 लाख; गोरखा रेजिमेंट को समर्पित

Royal Enfield Classic 350 Gorkha Edition

रॉयल एनफील्ड ने भारतीय बाजार में Classic 350 Gorkha Edition को लॉन्च कर दिया है। इस स्पेशल एडिशन की एक्स-शोरूम कीमत ₹2.11 लाख (नई दिल्ली) रखी गई है। कंपनी ने इसकी बुकिंग भी शुरू कर दी है। यह मोटरसाइकिल भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट के साहस, दृढ़ता और अदम्य जज्बे को समर्पित है।

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गोरखा-थीम के साथ खास डिजाइन

Classic 350 Gorkha Edition को मौजूदा Classic 350 पर आधारित किया गया है। इसमें खास Gorkha Green पेंट स्कीम दी गई है। बाइक पर कस्टम इंसिग्निया भी मिलता है, जिसमें गोरखा रेजिमेंट की पहचान माने जाने वाली क्रॉस्ड खुकरी का डिजाइन शामिल है। मोटरसाइकिल का ओवरऑल डिजाइन और अपराइट राइडिंग पोजिशन स्टैंडर्ड Classic 350 जैसी ही है।

मिलेंगे ये फीचर्स

फीचर्स की बात करें तो Classic 350 Gorkha Edition में असिस्ट और स्लिपर क्लच के साथ Type-C USB फास्ट चार्जिंग पोर्ट दिया गया है। बाइक में मौजूदा Classic 350 वाला ही इंजन मिलता है। इसमें 349cc, एयर-कूल्ड J-Series इंजन दिया गया है, जो 20.1 bhp की पावर और 27 Nm का पीक टॉर्क जनरेट करता है। इंजन को 5-स्पीड गियरबॉक्स के साथ जोड़ा गया है।

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बाइक के साथ लॉन्च हुआ Gorkha Collection

रॉयल एनफील्ड ने बाइक के साथ Gorkha Collection नाम से राइडिंग गियर और लाइफस्टाइल मर्चेंडाइज भी पेश किया है। इस कलेक्शन में डुअल-सर्टिफाइड Jet और Quest हेलमेट, हाई-एंकल लेदर बूट्स, मल्टी-फंक्शनल हेडगियर, अपैरल और कलेक्टेबल्स शामिल हैं। इन प्रोडक्ट्स के डिजाइन में सैन्य वर्दी, रेजिमेंटल इंसिग्निया और क्रॉस्ड खुकरी से प्रेरित एलिमेंट्स का इस्तेमाल किया गया है।

खैबर पख्तूनख्वा में भी पाक सेना के खिलाफ बगावत, जानें सेना प्रमुख मुनीर के विरोध की असल वजह

खैबर पख्तूनख्वा में भी पाक सेना के खिलाफ बगावत, जानें सेना प्रमुख मुनीर के विरोध की असल वजह

Khyber Pakhtunkhwa Bajaur protests

Khyber Pakhtunkhwa Bajaur protests: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) और बलूचिस्तान में जारी भारी जनाक्रोश के बाद अब खैबर पख्तूनख्वा (KPK) में भी पाकिस्तानी सेना और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के खिलाफ बगावत के सुर तेज हो गए हैं। बाजौर समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में सड़कों पर उतरे लोगों ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और सैन्य अधिकारियों को 'वर्दी वाले दहशतगर्द' करार दिया।

 

असीम मुनीर के खिलाफ लगे तीखे नारे पाकिस्तान में हालात दिन-ब-दिन बेकाबू होते जा रहे हैं। सेना के बढ़ते हस्तक्षेप, मानवाधिकार उल्लंघनों और जबरन गुमशुदगी की घटनाओं से त्रस्त आम जनता का गुस्सा अब सड़कों पर खुलकर सामने आ रहा है। खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर में हुए एक विशाल प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारियों और सेना प्रमुख (फील्ड मार्शल/जनरल) आसिम मुनीर को निशाने पर लिया है। ALSO READ: पाकिस्तान ने धोखे से हड़पा था बलूचिस्तान, क्यों कभी पाक सेना के आगे नहीं झुके धुरंधर बलोच? जानिए बलोच संघर्ष की पूरी कहानी

सड़कों पर गूंजे तीखे नारे

बाजौर में प्रदर्शन के दौरान आम जनता का गुस्सा इस कदर फूटा कि उन्होंने सेना की वर्दी और अधिकारियों के खिलाफ सीधी बयानबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने चिल्ला-चिल्लाकर नारे लगाए— ये वर्दी वाले दहशतगर्द, ये कैप्टन-कर्नल दहशतगर्द, ये मेजर जनरल दहशतगर्द। प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना है कि सुरक्षा के नाम पर स्थानीय निवासियों का उत्पीड़न किया जा रहा है। ALSO READ: PoK का सच दिखाया तो भड़का पाकिस्तान! 'अल जजीरा' पर कसा शिकंजा, जानिए क्या है PoK की हकीकत

क्यों हो रहा है मुनीर का विरोध?

खैबर पख्तूनख्वा में पश्तून समुदाय और स्थानीय निवासियों द्वारा पाकिस्तानी सेना और आसिम मुनीर का कड़ा विरोध करने के पीछे कई कारण हैं। पाकिस्तानी सेना आतंकवाद के खात्मे के नाम पर खैबर पख्तूनख्वा में लगातार सैन्य ऑपरेशन चलाती है, जिसमें निर्दोष पश्तून नागरिकों, महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया जाता है। बलूचिस्तान की तर्ज पर खैबर पख्तूनख्वा से भी पश्तून युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों को सेना द्वारा बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के उठाए जाने और गायब कर दिए जाने के गंभीर आरोप हैं।

संसाधनों का दोहन और स्थानीय लोगों  की उपेक्षा

इस प्रांत के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग तो पूरे पाकिस्तान में किया जाता है, लेकिन स्थानीय लोगों को बुनियादी सुविधाएं, रोजगार और विकास के अवसर नहीं दिए जाते। गौर करने वाली बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी PTI का खैबर पख्तूनख्वा में मजबूत जनाधार है। पाकिस्तान सेना प्रमुख आसिम मुनीर द्वारा इमरान खान और उनके समर्थकों पर की गई सख्त कार्रवाई से भी स्थानीय लोगों में सेना के प्रति गहरा असंतोष और गुस्सा है।

 

पश्तून अधिकारों के लिए लड़ने वाला संगठन पश्तून तहफुज मूवमेंट (PTM) लंबे समय से सेना की ज्यादतियों, फर्जी मुठभेड़ों और चेकपोस्टों पर होने वाले उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाता रहा है, जिससे आम जनता में अपनी जमीन और सम्मान की रक्षा की भावना मजबूत हुई है।

पीओके और मुजफ्फराबाद में भी बगावत

दूसरी ओर, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के रावलाकोट और मुजफ्फराबाद में भी विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेता सरदार अमन खान ने पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पाकिस्तान प्रशासन वहां के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहा है।

जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिसा, मोदी सरकार ने इसे सेफ बनाया, अब्दुल्ला से मिलकर बोले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर

जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिसा, मोदी सरकार ने इसे सेफ बनाया, अब्दुल्ला से मिलकर बोले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर

omar abdulla

अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर अपने पहले कश्मीर दौरे पर श्रीनगर पहुंचे और वहां के बदलते सुरक्षा माहौल की जमकर तारीफ की। उन्होंने कश्मीर को भारत का एक अहम हिस्सा माना और कहा कि मोदी सरकार ने इसे पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित बना दिया है। उनके इस 'सुरक्षित' वाले बयान के बहुत बड़े मायने हैं, जिसे उन्होंने अपने अगले ही वाक्य में साफ भी कर दिया। गोर ने बताया कि वाशिंगटन जल्द ही अपने नागरिकों के लिए जारी 'नेगेटिव ट्रेवल एडवाइजरी' की समीक्षा करने वाला है।

राजदूत सर्जियो गोर ने कश्मीर को भारत का एक 'बेहद खूबसूरत और महत्वपूर्ण हिस्सा'  कहा है।  उन्होंने कहा कि वो पहली बार कश्मीर आए हैं और यहां की सुंदरता को देखकर हैरान हैं। केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों की तारीफें करते हुए गोर ने कहा कि क्षेत्र अब काफी सुरक्षित हो चुका है और बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक यहां आकर इसकी खूबसूरती का अनुभव जरूर करना चाहेंगे।  

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‘मैं दूसरे देश के राजदूत के सामने अपनी शिकायतें नहीं रखता’

 

इससे पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ने कहा कि उमर अब्दुल्ला ने कहा, “मैं उनकी बात सुनने के लिए अधिक उत्सुक हूं। मुझे अपनी शिकायतें किसी दूसरे देश के राजदूत के सामने रखने की आदत नहीं है। हमारे मामले वॉशिंगटन में हल नहीं होने वाले हैं, बल्कि इन्हें हमारे देश की सरकार ही सुलझाएगी।” उन्होंने कहा कि किसी दूसरे देश के राजदूत के सामने शिकायत करना उनके लिए उचित नहीं होगा। 

 

बीजेपी का विरोध प्रदर्शन, उमर ने भ्रष्टाचार के आरोपों पर दिया जवाब

इस बीच, बीजेपी की जम्मू-कश्मीर इकाई ने बुधवार को सिविल सचिवालय के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का कार्यक्रम बनाया है। पार्टी ने उमर अब्दुल्ला सरकार पर कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। बीजेपी के आरोपों पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तंज कसते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार में इतना भी सामर्थ्य नहीं है कि वह इस तरह के कथित भ्रष्टाचार को “छिपा” सके।

बेजुबान, मासूम Laika Dog की वो दर्दनाक कहानी जिसे बनाया अंतरिक्ष की पहली यात्री… जो वापस धरती पर लौट न सकी

बेजुबान, मासूम Laika Dog की वो दर्दनाक कहानी जिसे बनाया अंतरिक्ष की पहली यात्री… जो वापस धरती पर लौट न सकी

3 नवंबर 1957… वो तारीख जब सोवियत संघ ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। Sputnik-2 के जरिए एक Female Dog को अंतरिक्ष में भेजा गया और उसने धरती के चारों ओर चक्कर लगाकर इतिहास रच दिया। इस खास मिशन की स्टार थी Laika, जो अंतरिक्ष में पहुंचने और Earth के चारों ओर घूमने वाली पहली जीवित प्राणी बनी। लेकिन Laika की ये Space Journey सिर्फ एक बड़ी उपलब्धि की कहानी नहीं थी, इसके पीछे एक ऐसी दर्दनाक कहानी भी छिपी थी, जिसे जानकर आज भी दिल भारी हो जाता है।

 उस वक्त इंसानों के अंतरिक्ष में जाने की तैयारी चल रही थी और वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि कोई जीव अंतरिक्ष के बेहद कठिन माहौल में जीवित रह सकता है या नहीं। लेकिन Laika की यह ऐतिहासिक यात्रा एक ऐसी कीमत लेकर आई, जिसकी कहानी आज भी दिल को भारी कर देती है। वह अंतरिक्ष में तो पहुंची, लेकिन उसे वापस धरती पर लाने की कोई व्यवस्था Sputnik-2 में मौजूद नहीं थी। यानी मिशन शुरू होने से पहले ही वैज्ञानिक जानते थे कि यह उसके लिए one-way journey होने वाली है। 

 मॉस्को की गलियों से Space Mission तक पहुंची Laika

 

Laika कोई खास नस्ल की पालतू Dog नहीं थी। वह मॉस्को की सड़कों पर घूमने वाली एक stray dog थी, जिसे सोवियत वैज्ञानिकों ने इसलिए चुना क्योंकि उनका मानना था कि सड़क पर रहने वाले कुत्ते ठंड, भूख और मुश्किल परिस्थितियों को ज्यादा आसानी से सहन कर सकते हैं। उसका वजन करीब 5 किलो बताया गया और उम्र लगभग 3 साल थी। उसका शुरुआती नाम Kudryavka, यानी 'Little Curly' था, जबकि उसे Zhuchka और Limonchik जैसे नामों से भी पुकारा जाता था।बाद में 'Laika' नाम दुनिया भर में मशहूर हुआ। वैज्ञानिकों ने केवल उसके स्वभाव और शारीरिक क्षमता को नहीं देखा, बल्कि उसे अंतरिक्ष यात्रा के लिए बेहद कठिन ट्रेनिंग से भी गुजरना पड़ा। उसे धीरे-धीरे छोटे होते पिंजरों में रखा गया ताकि वह Sputnik-2 के बेहद सीमित केबिन में रहने की आदत डाल सके। इसके अलावा centrifuge में rocket launch जैसी acceleration का simulation कराया गया और spacecraft के शोर का भी अभ्यास कराया गया। 

 

Laika अकेली candidate नहीं थी। मिशन के लिए तीन कुत्तों को तैयार किया गया था—Laika, Albina और Mushka। Albina को backup dog बनाया गया, जबकि Mushka का इस्तेमाल जमीन पर instrumentation और life-support system की testing के लिए किया गया। मिशन से करीब 10 दिन पहले Vladimir Yazdovsky ने Laika को final flight dog के तौर पर चुना। दिलचस्प और भावुक बात यह है कि उड़ान से पहले Yazdovsky उसे अपने घर भी लेकर गए थे, जहां वह उनके बच्चों के साथ रही। बाद में उन्होंने लिखा कि Laika शांत और प्यारी थी और उन्हें उसके लिए कुछ अच्छा करने की इच्छा थी, क्योंकि उन्हें पता था कि उसके पास ज्यादा समय नहीं बचा है। 

 

Sputnik-2 था बेहद छोटा, लेकिन मिशन था बहुत बड़ा

 

Sputnik-2 को तैयार करने के लिए सोवियत वैज्ञानिकों के पास ज्यादा समय नहीं था। Sputnik-1 की सफलता के बाद तत्कालीन सोवियत नेता Nikita Khrushchev चाहते थे कि 7 नवंबर 1957 को होने वाली Bolshevik Revolution की 40वीं वर्षगांठ के आसपास एक और बड़ा अंतरिक्ष मिशन किया जाए। समस्या यह थी कि ज्यादा advanced Sputnik-3 अभी तैयार नहीं था। इसलिए एक नए और comparatively simple spacecraft को बेहद कम समय में तैयार किया गया और उसमें एक जीवित passenger भेजने की योजना बनाई गई। उपलब्ध स्रोतों के मुताबिक Sputnik-2 का design काफी हद तक जल्दबाजी में तैयार किया गया था। 

 

Laika के लिए spacecraft में oxygen generator, carbon dioxide absorber और cabin को ठंडा रखने के लिए fan लगाया गया था। उसे gelatin जैसी खास food supply दी गई थी और उसके शरीर पर sensors लगाए गए थे, जो heartbeat, breathing, blood pressure और movement जैसी चीजों को monitor करते थे। लेकिन cabin इतना छोटा था कि Laika उसमें सिर्फ बैठ, खड़ी या लेट सकती थी; उसके पास घूमने तक की जगह नहीं थी। यानी इंसान के लिए unimaginable लगने वाली सीमाओं के बीच उस छोटे से जीव को अंतरिक्ष यात्रा के लिए तैयार किया गया था। 

 

 Launch के बाद बढ़ी धड़कन, फिर गर्मी ने ले ली जान

 

31 अक्टूबर 1957 के आसपास Laika को Sputnik-2 के capsule में रखा गया था और 3 नवंबर को Baikonur Cosmodrome से spacecraft ने उड़ान भरी। Launch के दौरान उसके शरीर पर लगे sensors ने दिखाया कि acceleration के साथ उसकी सांस लेने की रफ्तार और heartbeat तेजी से बढ़ गई थी। शुरुआती telemetry से यह भी पता चला कि orbit में पहुंचने के बाद वह बेहद stressed थी, हालांकि उसने खाना खाया। लेकिन मिशन की सबसे बड़ी technical problem यहीं सामने आई। Spacecraft का thermal-control system ठीक तरह से काम नहीं कर पाया और insulation से जुड़ी समस्या के कारण cabin का तापमान तेजी से बढ़ने लगा। उपलब्ध वैज्ञानिक विवरणों के अनुसार कुछ घंटों बाद Laika से जीवन के संकेत मिलना बंद हो गए। 

 

कई दशकों तक Laika की मौत को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे। सोवियत अधिकारियों की ओर से लंबे समय तक यह बताया गया कि वह कई दिनों तक अंतरिक्ष में जीवित रही और बाद में oxygen खत्म होने के कारण उसकी मौत हुई। लेकिन बाद में सामने आई जानकारी ने इस कहानी को बदल दिया। 2002 में Sputnik-2 मिशन से जुड़े वैज्ञानिक Dimitri Malashenkov ने बताया कि Laika की मौत overheating की वजह से हुई थी। उनके मुताबिक सीमित समय में spacecraft के लिए भरोसेमंद temperature-control system तैयार करना बेहद मुश्किल साबित हुआ था। यानी जिस mission को सोवियत space program की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया गया, उसकी असली कहानी कहीं ज्यादा दर्दनाक थी। 

 

Laika की मौत ने Science के साथ Ethics पर भी उठाए सवाल

 

Laika की कहानी सिर्फ space race की कहानी नहीं थी। उसके mission ने यह सवाल भी खड़ा किया कि science की तरक्की के लिए किसी जानवर की जान लेना किस हद तक सही है। Sputnik-2 को वापस धरती पर लाने के लिए design ही नहीं किया गया था, इसलिए Laika के mission में उसके सुरक्षित लौटने की उम्मीद नहीं थी। उसके बाद दुनिया के कई हिस्सों में animal testing और scientific experiments को लेकर विरोध देखने को मिला। ब्रिटेन में animal-rights groups ने विरोध किया, वहीं अमेरिका में भी लोगों ने प्रदर्शन किए। उस दौर में Space Race की राजनीतिक होड़ इतनी बड़ी थी कि शुरुआत में मिशन की scientific और political सफलता पर ज्यादा ध्यान दिया गया, लेकिन बाद में Laika की हालत और उसकी मौत को लेकर सवाल तेज होते गए। 

 

समय बीतने के साथ खुद इस mission से जुड़े वैज्ञानिकों में भी पछतावा दिखाई दिया। 1990 के दशक में Oleg Gazenko ने Laika की मौत को लेकर regret जताया और माना कि जानवरों के साथ काम करना बेहद पीड़ादायक था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इतने समय बाद उन्हें लगता है कि Laika की मौत को सही ठहराने लायक पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारी इस मिशन से हासिल नहीं हुई। यह स्वीकारोक्ति Laika की कहानी को सिर्फ एक space achievement से कहीं आगे ले जाती है—यह उस दौर की scientific ambition और उसकी human cost, दोनों की याद दिलाती है। 

 

Laika गई, लेकिन उसकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई

 

Laika के बाद Soviet space program ने ऐसे missions की दिशा में कदम बढ़ाए, जिनमें जानवरों को वापस धरती पर लाने की कोशिश की गई। 1960 में Belka और Strelka सफलतापूर्वक orbit से वापस लौटे और इस तरह यह साबित हुआ कि जीवों को अंतरिक्ष में भेजकर सुरक्षित वापस लाना संभव है। कुछ वर्षों बाद 1961 में Yuri Gagarin के सफल human spaceflight ने अंतरिक्ष इतिहास का अगला बड़ा अध्याय लिख दिया। इस पूरी journey में Laika का नाम भले ही एक tragic chapter की तरह दर्ज हो, लेकिन वह उस दौर के उन शुरुआती experiments का हिस्सा थी, जिन्होंने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि spaceflight का असर किसी जीवित शरीर पर किस तरह पड़ सकता है। 

 

आज Laika को सिर्फ एक Soviet space dog के तौर पर याद नहीं किया जाता। मॉस्को और Star City में उसके सम्मान में monuments बनाए गए, stamps और artworks में उसकी तस्वीर दिखाई दी और किताबों, फिल्मों, संगीत और graphic novels तक में उसकी कहानी को जगह मिली। यहां तक कि 2005 में NASA के Mars Exploration Rover Opportunity mission के दौरान मंगल की सतह पर एक स्थान को unofficially 'Laika' नाम दिया गया था। इतिहास में उसका सफर भले ही कुछ घंटों में खत्म हो गया था, लेकिन इंसानों की collective memory में उसकी कहानी दशकों बाद भी जिंदा है। 

 

Laika की कहानी को अगर सिर्फ 'पहली space dog' कहकर खत्म कर दिया जाए, तो शायद उसके साथ पूरी इंसाफ नहीं होगा। वह एक stray dog थी, जिसे इंसानों की space race ने इतिहास का हिस्सा बना दिया। उसने पृथ्वी की कक्षा में पहुंचकर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जिसने मानव अंतरिक्ष यात्रा की राह में महत्वपूर्ण डेटा दिया, लेकिन उसकी कीमत उसकी अपनी जिंदगी थी। बाद में इंसान अंतरिक्ष में गया और सुरक्षित धरती पर लौटा, मगर Laika को कभी वह मौका नहीं मिला। शायद यही वजह है कि इतने साल बाद भी उसकी तस्वीर सामने आते ही space achievement के साथ एक सवाल भी खड़ा हो जाता है—विज्ञान की उड़ान कितनी ऊंची हो सकती है और उसकी कीमत कितनी होनी चाहिए?

 

दिल्ली के नरेला में रॉकेट लॉन्चरों को नष्ट करने की कार्रवाई, मणिपुर में 2 संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी से जुड़ा मामला

दिल्ली के नरेला में रॉकेट लॉन्चरों को नष्ट करने की कार्रवाई, मणिपुर में 2 संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी से जुड़ा मामला

security in delhi for republic day

दिल्ली के नरेला इलाके में सेना, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की संयुक्त टीम एक विशेष अभियान चला रही है। इस अभियान के तहत मणिपुर में दो संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी से जुड़े मामले में बरामद किए गए रॉकेट लॉन्चरों को नष्ट किया जा रहा है।

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बरामद हथियारों को जांच और निस्तारण के लिए दिल्ली लाया गया था। ये हथियार, गोला-बारूद और विस्फोटक सामग्री के उस जखीरे का हिस्सा थे, जिसे मामले के सिलसिले में मणिपुर में चलाए गए संयुक्त तलाशी अभियान के दौरान जब्त किया गया था।

 

राइफल, सैकड़ों राउंड और विस्फोटक सामग्री बरामद

 

सूत्रों के मुताबिक, जब्त सामग्री में राइफलें, सैकड़ों राउंड जिंदा कारतूस, डेटोनेटर और अन्य विस्फोटक सामग्री शामिल थी। विशेषज्ञ टीमों की निगरानी में यह कार्रवाई की जा रही है। बरामद हथियारों को अभियान के तहत नियंत्रित तरीके से नष्ट किया जा रहा है।

 

इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम

 

सूत्रों ने बताया कि कार्रवाई को देखते हुए नरेला के संबंधित इलाके के आसपास सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। अभियान में शामिल विशेषज्ञ टीमें बरामद हथियारों और विस्फोटक सामग्री का नियंत्रित तरीके से निस्तारण कर रही हैं।

तमिलनाडु की विजय सरकार का यू-टर्न, CJP और लेफ्ट के प्रदर्शन में जाने से छात्रों को रोकने वाला आदेश वापस

तमिलनाडु की विजय सरकार का यू-टर्न, CJP और लेफ्ट के प्रदर्शन में जाने से छात्रों को रोकने वाला आदेश वापस

Vijay Thalapathy

तमिलनाडु की सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने पहले के निर्देश को वापस लेते हुए तीन विभागों को जारी वह आदेश रद्द कर दिया है, जिसमें स्कूल-कॉलेज के छात्रों और युवाओं को विरोध प्रदर्शन व आंदोलनों में शामिल होने से रोकने के लिए समन्वित कार्रवाई करने को कहा गया था।

 

कॉलेजिएट एजुकेशन विभाग की ओर से जारी आधिकारिक सूचना के मुताबिक, यह निर्देश वामपंथी दलों और तमिलनाडु कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आयोजित कार्यक्रमों को लेकर दिए गए थे। कॉलेजिएट एजुकेशन निदेशालय (DCE) ने विभागों और जिला प्रशासन को छात्रों को ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने से हतोत्साहित करने और रोकने के लिए उचित कदम उठाने को कहा था। निर्देश में संबंधित अधिकारियों को आपस में समन्वय कर कार्रवाई करने और उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए भी कहा गया था।

 

राजनीतिक प्रदर्शनों में छात्रों की भागीदारी रोकने का था निर्देश

 

यह निर्देश छात्रों और युवाओं को राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों तथा आंदोलनों में भाग लेने से रोकने के उद्देश्य से जारी किया गया था। हालांकि, सरकार ने अब अपने पहले के आदेश को वापस लेने का फैसला किया है।

तेजस्वी यादव हिरासत में, पटना में RJD के मार्च पर हंगामा, पुलिस ने चलाया वाटर कैनन

तेजस्वी यादव हिरासत में, पटना में RJD के मार्च पर हंगामा, पुलिस ने चलाया वाटर कैनन

Tejashwi Yadav Detained Patna

Tejashwi Yadav Detained Patna: बिहार की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट आ गई है। राजधानी पटना में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राजभवन मार्च के दौरान भारी हंगामा देखने को मिला। छात्रों के हक, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरे RJD कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए पुलिस ने आयकर गोलंबर पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया।

 

इस दौरान पुलिस और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी नोकझोंक हुई, जिसके बाद पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। छात्रों के अधिकार, बेरोजगारी, पेपर लीक, पारदर्शी परीक्षा और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का राजभवन मार्च आयोजित किया गया था।

 

इस मार्च की अगुवाई RJD नेता तेजस्वी यादव कर रहे थे। आयकर गोलंबर पर पुलिस ने रोका मार्च RJD कार्यकर्ताओं का यह विशाल जुलूस जैसे ही पटना के आयकर गोलंबर के पास पहुंचा, वहां पहले से मौजूद भारी पुलिस बल और सुरक्षा बलों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। कार्यकर्ताओं ने जब लोकभवन की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिस और RJD समर्थकों के बीच तीखी झड़प और नोकझोंक शुरू हो गई। भीड़ को तितर-बितर करने और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने तेज रफ्तार वाटर कैनन (पानी की बौछार) का इस्तेमाल किया। ALSO READ: CJP आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, पुलिस बलप्रयोग की जांच के लिए हाईलेवल कमेटी, उधर सरकारी स्कूल में बदली तस्वीर

पानी की बौछार के बीच जमे रहे कार्यकर्ता

पुलिस द्वारा वाटर कैनन चलाए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में RJD कार्यकर्ता सड़क पर ही डटे रहे। पानी की तेज बौछार के बीच प्रदर्शन कर रहे कुछ कार्यकर्ता विरोध जताते हुए सड़क पर 'रेन डांस' करते भी नजर आए। मौके पर स्थिति को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

हम जेल जाने से नहीं डरते

पुलिस हिरासत (डिटेन) में लिए जाने के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए तेजस्वी यादव ने सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा हम लोगों का मार्च राजभवन तक था, लेकिन हमें आयकर गोलंबर पर ही रोक दिया गया। हम इस सरकार के खिलाफ लगातार लड़ते रहेंगे और जेल जाने से डरने वाले नहीं हैं। हमारी यह लड़ाई छात्रों के हक-अधिकार, बेरोजगारी मिटाने, पेपर लीक पर रोक लगाने, पारदर्शी परीक्षा कराने, बेहतर शिक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और बिहार को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए है। ALSO READ: CJP प्रोस्टेट पर बोले CJI- युवाओं की बात सुननी चाहिए, हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता

AK-47 के इस्तेमाल पर उठाए सवाल

तेजस्वी यादव ने राज्य सरकार पर भाई-भतीजावाद का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार केवल अपने लोगों और रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने में व्यस्त है। इसके साथ ही उन्होंने छात्र आंदोलन के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा AK-47 जैसे आधुनिक हथियार के इस्तेमाल पर भी सरकार से कड़ा जवाब मांगा। उन्होंने सवाल किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ इस तरह के घातक हथियारों की क्या आवश्यकता थी?

आखिर क्‍यों CM विजय थलापति ने वापस लिया स्‍टूडेंट को कॉकरोचों से दूर रखने वाला आदेश, क्‍या है वजह?

आखिर क्‍यों CM विजय थलापति ने वापस लिया स्‍टूडेंट को कॉकरोचों से दूर रखने वाला आदेश, क्‍या है वजह?

Vijay Thalapathy

तमिलनाडु सरकार ने छात्रों को कॉकरोच जनता पार्टी और लेफ्ट पार्टियों के प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने वाला आदेश वापस ले लिया है। सरकार की तरफ से जारी इस आदेश में स्कूल और कॉलेज के छात्रों को राजनीतिक प्रदर्शनों से दूर रखने के निर्देश दिए गए थे, जिसे कॉकरोच जनता पार्टी ने गैर-संवैधानिक बताते हुए विरोध किया था। अब विजय की सरकार ने बुधवार को अपना ही दिया आदेश वापस ले लिया है।

कॉलेजिएट शिक्षा विभाग ने बुधवार को अपना पिछला निर्देश वापस ले लिया, जिसमें सरकारी आर्ट्स और साइंस कॉलेजों के छात्रों और युवाओं को विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों में भाग लेने से रोकने के लिए कार्रवाई करने को कहा गया था।

मंगलवार को जारी एक आदेश में कॉलेज शिक्षा की संयुक्त निदेशक सिंथिया सेल्वी पी ने कहा कि इस मामले में विभाग द्वारा 17 अगस्त, 2026 को जारी पिछला आदेश वापस ले लिया गया है। यह आदेश तमिलनाडु के सभी सरकारी आर्ट्स और साइंस कॉलेजों के प्रिंसिपलों को जारी किया गया था।

क्या था आदेश : 17 अगस्त के एक पत्र में, कॉलेज शिक्षा आयुक्त ने सरकारी आर्ट्स और साइंस कॉलेजों के प्रिंसिपलों से कहा कि वे स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा विभागों, पुलिस और ज़िला प्रशासन के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करें कि छात्र-छात्राएं और युवा ऐसे विरोध प्रदर्शनों में शामिल न हों। यह निर्देश 14 अगस्त के एक सरकारी पत्र का ज़िक्र करता है, जिसमें इस मामले पर अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल और मिलकर कार्रवाई करने को कहा गया था। “बेहद ज़रूरी” (Most Urgent) मार्क किए गए इस संदेश में कॉलेजों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे की गई कार्रवाई की जानकारी तुरंत 'डायरेक्टरेट ऑफ़ कॉलेजिएट एजुकेशन' को सौंपें।

सूत्रों के मुताबिक, TVK सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग, उच्च शिक्षा विभाग, पुलिस और ज़िला प्रशासन से कहा है कि वे छात्रों की भागीदारी रोकने के लिए मिलकर कार्रवाई करें। यह आदेश राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने के बीच जारी किया गया है और दो राजनीतिक समूहों द्वारा आयोजित विरोध-प्रदर्शनों में छात्रों और युवाओं की भागीदारी को लेकर सरकार की चिंता के बाद आया है।

सीजेपी पर BJP की प्रतिक्रिया : इस आदेश पर BJP नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। BJP नेता विनोज़ पी. सेल्वम ने वामपंथी संगठनों और CJP को “अराजकता फैलाने वाले” (Agents of Chaos) बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इनके नेता छात्रों को गुमराह करते हैं और उन्हें नतीजों का सामना करने के लिए अकेला छोड़कर खुद अपने घरों को लौट जाते हैं। उन्होंने विजय सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे छात्रों को विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होने से बचने और अपने करियर पर ध्यान देने में मदद मिलेगी। उन्होंने सरकार से यह भी आग्रह किया कि वह अपनी सहयोगी पार्टी CPI(M) के दबाव में आकर इस नोटिफिकेशन को वापस न ले।

क्यों वापस लिया आदेश : तमिलनाडु सरकार के इस आदेश के सामने आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने इसका विरोध किया था और इस आदेश को “गैर-संवैधानिक” बताया था। पार्टी ने विजय सरकार से इसे तुरंत वापस लेने की मांग की थी। यह पूरा विवाद ऐसे समय शुरू हुआ था, जब तमिलनाडु में NEET को लेकर प्रदर्शन चल रहे हैं। CJP और लेफ्ट से जुड़े छात्र संगठन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में छात्रों को इन प्रदर्शनों से दूर रखने का विजय सरकार का आदेश राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया था और इसी वजह से सरकार ने आदेश वापस ले लिया है।