अमेरिकी अधिकारी बोले- मोदी-ट्रम्प टैरिफ का मुद्दा सुलझाएंगे:कहा- उनके बीच अच्छे संबंध; पहले अमेरिका में भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल पास हुआ था

अमेरिकी राष्ट्रपति के वरिष्ठ सलाहकार नवारो ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। दोनों नेता रूसी तेल से जुड़े 100% टैरिफ के मुद्दे को आपस में सुलझा लेंगे। दरअसल, शुक्रवार को अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर किया था। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। पहले 500%टैरिफ का प्रस्ताव था 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा अगर यह कानून बन जाता है तो 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिल जाएगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। व्हाइट हाउस ने पहले भी रूस पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की थी। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल का संकट आ गया। इस वजह से अमेरिकी प्रशासन को तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए छूट देनी पड़ी थी। भारत ने जून में आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह बिल कानून बना तो भारत पर असर पहली स्थिति: भारत रूस से तेल खरीदता रहे अमेरिका के 100% टैरिफ का सीधा असर भारत के निर्यात बिल पर पड़ सकता है। इससे भारतीय सामान अमेरिका में दोगुना महंगा हो जाएगा। अमेरिकी खरीदार सस्ता विकल्प ढूंढेंगे जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको, चीन। नतीजतन भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, लेदर, समुद्री उत्पाद, केमिकल्स आदि के ऑर्डर घट जाएंगे। दूसरी स्थिति: भारत रूस को छोड़कर दूसरे देशों से तेल खरीदे तो रूस से आने वाले तेल पर प्रतिबंध या टैरिफ का दबाव बढ़ता है, तो भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदना पड़ेगा। यह महंगा पड़ सकता है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। अमेरिका के प्रतिबंध पूरे असरदार नहीं अमेरिका के प्रतिबंध और टैरिफ से कई देशों की अर्थव्यवस्था और कारोबार पर असर पड़ा, लेकिन राजनीतिक मकसद हमेशा पूरे नहीं हुए। 1. क्यूबा: 1960 से अमेरिका ने 1960 में क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। छह दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ये प्रतिबंध क्यूबा की सरकार को बदलने में सफल नहीं हुए। क्यूबा ने 2023 में संयुक्त राष्ट्र में कहा कि इन प्रतिबंधों से उसे अब तक 159 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है। 2. इराक: 1990 से इराक पर 1990 में आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। इनका उसकी अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर बड़ा असर पड़ा। तेल से होने वाली कमाई और जरूरी सामान के आयात पर असर पड़ा। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में प्रतिबंधों के दौरान भूख, बीमारी और गरीबी बढ़ने की बात कही गई। 3. ईरान: 2012 से 2012 में कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बाद ईरान का तेल निर्यात करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन घट गया। उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दो साल तक मंदी में रही। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2012-14 के दौरान प्रतिबंधों से ईरान के निर्यात को 17.1 अरब डॉलर, यानी उसकी GDP के करीब 4.5% का नुकसान हुआ। 4. चीन: 2018 से अमेरिका ने 2018 में चीन से आने वाले करीब 250 अरब डॉलर के सामान पर अतिरिक्त शुल्क (टैरिफ) लगाया। 2019 में चीन से अमेरिका आने वाला सामान 16.2% घटकर 452.2 अरब डॉलर रह गया और दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा 17.6% कम हुआ। लेकिन अमेरिकी व्यापार आयोग के मुताबिक, इन टैरिफ का ज्यादातर खर्च अमेरिकी कंपनियों और खरीदारों ने उठाया। 5. रूस: 2022 से यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और दूसरे देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इससे रूस के लिए विदेशों से पैसा जुटाना, कारोबार करना और जरूरी तकनीक हासिल करना मुश्किल हुआ। IMF ने अप्रैल 2022 में अनुमान लगाया था कि उस साल रूस की अर्थव्यवस्था 8.5% घट सकती है। लेकिन रूस ने तेल समेत अपना सामान दूसरे देशों में बेचकर नुकसान को कुछ कम कर लिया। —————————– ये खबर भी पढ़ें… UK की व्हिस्की, कारें और ब्यूटी प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे:भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आज से लागू, जानें किन चीजों के दाम बदलेंगे भारत में UK की कारें, व्हिस्की, कपड़े और फुटवियर आज से सस्ते मिलेंगे। आज से भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो गया है। यानी अब भारत के 99% सामानों को UK में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं UK के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Balochistan: 11 अगस्त को आजादी मनाने के बाद अब ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ का पासपोर्ट-करेंसी वाला दांव! क्या ये है अगला कदम

Balochistan News: बलूच अलगाववादी आंदोलन एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। 11 अगस्त को ‘बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने के बाद बलूच नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की मांग तेज कर दी है। बलूच अलगाववादी नेता मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बयान जारी कर वैश्विक बिरादरी, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और देशों से अपील की है कि वे बलूचिस्तान को पाकिस्तान का प्रांत कहना, लिखना और मानना तुरंत बंद करें। इसे एक संप्रभु राष्ट्र का दर्जा दें।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग और वैश्विक मंचों से अपील

मीर यार बलूच ने अपने बयान में कहा कि बलूचिस्तान का स्वतंत्रता आंदोलन अब केवल ऐतिहासिक दिवस मनाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह राजनयिक और राजनीतिक मान्यता हासिल करने के एक नए चरण में पहुंच चुका है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों के सदस्य राष्ट्रों से इस मुहिम का समर्थन करने की अपील की है।

बयान में कहा गया है कि बलूच जनता के प्रति नैतिक समर्थन जारी रहना चाहिए ताकि बलूचिस्तान की धरती से पाकिस्तान जैसे संकट को पूरी तरह खत्म किया जा सके। इसके साथ ही बलूच राजनीतिक नेतृत्व के अलग-अलग धड़ों को एकजुट करने के प्रयास भी तेजी से किए जा रहे हैं।

भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का आभार

बलूच अलगाववादी नेता ने बलूचिस्तान के मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों खासकर भारतीय मीडिया, शोधकर्ताओं और थिंक टैंकों का दिल से आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थाओं ने बलूचिस्तान की आवाज को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने और बलूच जनता का पक्ष उजागर करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पासपोर्ट, करेंसी और संप्रभु संस्थानों के गठन का रोडमैप

बलूच नेतृत्व द्वारा साझा की गई योजना के मुताबिक भविष्य का स्वतंत्र बलूचिस्तान एक पूर्ण संप्रभु राष्ट्र के रूप में जाना जाएगा। आने वाले समय में रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान अपना खुद का पासपोर्ट जारी करेगा और अपनी राष्ट्रीय करेंसी लॉन्च करेगा। प्रस्तावित गणराज्य अपने खुद के मीडिया संगठन, व्यापार और वाणिज्य संस्थान और विभिन्न देशों में राजनयिक मिशन स्थापित करेगा। नया बलूच राष्ट्र अपनी विदेश नीति, रक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और संपूर्ण कूटनीति की जिम्मेदारी स्वयं संभालेगा।

11 अगस्त की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके महत्व को भी जानिए

11 अगस्त का दिन बलूच राष्ट्रवादियों के लिए काफी ऐतिहासिक माना जाता है। मीर यार बलूच के मुताबिक ब्रिटिश भारत के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान (कलात रियासत) ने खुद को एक स्वतंत्र और संप्रभु देश घोषित किया था। बलूच अलगाववादी समूह इसी तारीख को अपने मूल स्वतंत्रता दिवस के रूप में मानते आए हैं और अब उनका मुख्य ध्यान इसी आधार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक मान्यता हासिल करने पर केंद्रित है।

पाकिस्तानी सेना की पाबंदियां और ब्लैकआउट के दावे

बलूच नेता ने आरोप लगाया कि 11 अगस्त के स्वतंत्रता समारोहों को रोकने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों और सैन्य बलों ने कड़े प्रतिबंध लगाए थे। बयान में दावा किया गया कि कलात, क्वेटा और खुजदार सहित राज्य के कई हिस्सों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह निलंबित कर दी गईं।

सैन्य छावनियों और पुलिस स्टेशनों के आसपास गहरी खाइयां खोदी गईं और पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर व ड्रोन लगातार निगरानी करते रहे। अलगाववादी समूह ने दावा किया कि इन तमाम पाबंदियों और इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद बलूचिस्तान के विभिन्न हिस्सों में समर्थकों ने स्वतंत्रता दिवस मनाया। हालांकि इंटरनेट सेवा बंद होने की वजह से तस्वीरों, वीडियो और रिपोर्टों के सामने आने में देरी हुई। वैसे बलूच नेता के इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी है।

आपको बता दें कि बलूच नेतृत्व ने बलूचिस्तान को संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र बताते हुए कहा कि प्रस्तावित गणराज्य वैश्विक स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय पहलों में बड़ा योगदान देने में सक्षम है। उनका कहना है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अंतरराष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करेगा और अपने राजनीतिक, आर्थिक व कूटनीतिक संस्थानों का तेजी से विकास करेगा।

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बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। यहां दशकों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। इस क्षेत्र में जबरन गुमशुदगी, मानवाधिकार उल्लंघन और सैन्य कार्रवाई के आरोप लगातार लगते रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तानी अधिकारी अलगाववादी मांगों को खारिज करते हुए बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानते हैं और वहां सक्रिय सशस्त्र समूहों को सुरक्षा के लिए खतरा करार देते हैं।

Colombia Earthquake: कोलंबिया में सबसे शक्तिशाली भूकंप से अब तक 132 मौतें, 570 से ज्यादा लोग घायल, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी

Colombia Earthquake: सोमवार को आए 7.4 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप ने कोलंबिया के पश्चिमी हिस्से में भारी तबाही मचाई है। देश का सबसे गरीब विभाग चोको और मशहूर कॉफी एक्सिस इलाके इस भूकंप से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। बता दें कि इस भयानक आपदा से अब तक कम से कम 132 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 570 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं।

वहीं, भूकंप के तेज झटकों से दर्जनों इमारतें ढह गई हैं और मलबे में अभी भी कई लोगों के फंसे होने की आशंका है। फिलहाल, राहत और बचाव दल लगातार मलबे में फंसे लोगों की तलाश कर रहे हैं और रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है।

कोलंबिया की जियोलॉजिकल सर्विस के मुताबिक, यह 21वीं सदी में देश में दर्ज किया गया अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप है।

1. कोलंबिया का सबसे गरीब इलाका चोको, एक बड़ी बचाव चुनौती का सामना कर रहा है

भूकंप का केंद्र चोको विभाग के सैन जोस डेल पालमार के पास था। चोको कोलंबिया के सबसे गरीब इलाकों में से एक है, जहां दो-तिहाई से ज्यादा आबादी गरीबी में रहती है। इस इलाके में सड़क संपर्क बेहद सीमित है और कई गांव दूर-दराज के क्षेत्रों में बसे हैं। ऐसे में राहत और बचाव टीमों को सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों तक पहुंचने में काफी मुश्किल हो रही है। संचार व्यवस्था प्रभावित होने से रेस्क्यू और राहत अभियान की परेशानी और बढ़ गई है।

2. कॉफी उत्पादन वाले इलाके में भारी तबाही

कोलंबिया के कॉफी उत्पादन वाले इलाके के बीचों-बीच स्थित रिसराल्डा (Risaralda) सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक है। यहां के परेरा (Pereira) में सबसे ज्यादा 60 लोगों की मौत हुई है, जबकि डॉस्क्यूब्राडास (Dosquebradas) में भी भारी तबाही हुई है। अधिकारी तबाही के पैमाने का आकलन कर रहे हैं और बचाव टीमें गिरी हुई और क्षतिग्रस्त इमारतों के बीच काम कर रही हैं।

3. 1,500 से ज्यादा घर क्षतिग्रस्त

राष्ट्रपति अबेलार्डो डे ला एस्प्रिएला ने बताया कि 1,577 रिहायशी इमारतें क्षतिग्रस्त हुई हैं, जिनमें से 37 पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। 60 से ज्यादा इमारतें ढह गई हैं, जबकि 18 स्वास्थ्य केंद्र और 52 स्कूल भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। इसके अलावा, पांच राजधानी शहरों में रेड अलर्ट जारी किया गया है।

4. बचावकर्मी बचे हुए लोगों की तलाश कर रहे हैं, अस्पतालों को भी नुकसान

भूकंप ने कई शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया है। कैली में यूनिवर्सिटी अस्पताल का एक हिस्सा ढह गया, जिससे मरीज अंदर फंस गए। अस्पताल के बुनियादी ढांचे का लगभग 30% हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ, जिसमें बच्चों के इलाज (पीडियाट्रिक्स), इंटरनल मेडिसिन और नवजात शिशु इकाई (नियोनेटल यूनिट) वाले हिस्से शामिल हैं। मलबे से कम से कम चार लोगों को बचाया गया, जबकि अन्य मरीजों को सुरक्षित बाहर निकाला गया।

5. बचाव दल ने तेज किया रेस्क्यू ऑपरेशन

गिरी हुई इमारतों के मलबे में दबे लोगों को खोजने के लिए प्रभावित इलाकों में पुलिस, फायरफाइटर, सैनिक और वॉलंटियर्स को तैनात किया गया है। कैली में, बचावकर्मियों ने गिरी हुई एक इमारत से दो महिलाओं और दो बच्चों को जिंदा बाहर निकाला है। अधिकारियों का कहना है कि बचे हुए लोगों को ढूंढना और उन्हें बचाना सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

6. तबाही से जूझ रहे कोलंबिया की मदद के लिए आगे आए कई देश

भूकंप से हुई भारी तबाही के बीच कई देशों ने कोलंबिया की मदद के लिए रेस्क्यू टीम, मेडिकल स्टाफ और जरूरी उपकरण भेजने की पेशकश की है। इक्वाडोर ने 47 बचावकर्मियों, खोजी कुत्तों और ऐसे उपकरणों की पेशकश की है, जो करीब सात दिनों तक बिना बाहरी मदद के काम कर सकते हैं। इसके अलावा, अल साल्वाडोर और मैक्सिको ने भी सहायता की पेशकश की है। जबकि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर वे कोलंबिया की मदद के लिए तैयार हैं।

बता दें कि यह भूकंप सोमवार को स्थानीय समयानुसार सुबह लगभग 7:34 बजे आया। US जियोलॉजिकल सर्वे के अनुसार, इसका केंद्र चोको (Chocó) में सैन होज़े डेल पालमार के पास ज़मीन से 107 किलोमीटर की गहराई में था। बचाव कार्य जारी रहने के साथ ही, अधिकारी पश्चिमी और मध्य कोलंबिया में हुए नुकसान का आकलन कर रहे हैं और साथ ही टूटी हुई सड़कों, ठप पड़े संचार और ज़रूरी बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याओं से भी निपट रहे हैं।

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El Nino Impact: अल नीनो और युद्ध के बीच भारत के मानसून से दुनिया को क्यों हो रही टेंशन? नए संकट की आहट!

El Nino Impact On Monsoon: वैश्विक स्तर पर खाद्य महंगाई की मार झेल चुकी दुनिया के सामने साल 2026 के अंत तक एक बार फिर से भोजन महंगा होने का नया संकट मंडराने लगा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘फर्स्टपोस्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया और यूक्रेन में जारी युद्ध की वजह से फ्यूल और फर्टीलाइजर की सप्लाई काफी प्रभावित हो रही है।इसके अलावा दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातक देश भारत में मानसून की धीमी और देर से हुई शुरुआत ने वैश्विक चावल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को लेकर दुनिया भर की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

कच्चे तेल के ऊंचे दाम, खाद आपूर्ति में रुकावट और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम कृषि उत्पादन व उसके परिवहन की लागत को लगातार बढ़ा रहे हैं। इस वजह से दुनिया भर के उपभोक्ताओं को इस साल के अंत और वर्ष 2027 के दौरान खाद्य महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में राहत की खबर यह है कि घरेलू स्तर पर सुधरती बारिश और पर्याप्त अनाज भंडार के दम पर भारत पर इसका असर सीमित रहने का अनुमान है।

संयुक्त राष्ट्र ने दिए संकेत: साल के अंत से फिर बढ़ेंगे खाने-पीने के सामान के दाम

साल 2022 में ग्लोबल महंगाई को बढ़ाने में खाद्य कीमतों ने मुख्य भूमिका निभाई थी लेकिन चालू वर्ष में ऊर्जा लागत अधिक रहने के बावजूद खाद्य कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित रही हैं। हालांकि यह राहत अस्थाई साबित हो सकती है। रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेतावनी दी है कि कमोडिटी की कीमतें अब ज्यादा तेजी से बढ़ेंगी और साल के अंत तक खाद्य सामग्री के दाम बढ़ने शुरू हो जाएंगे।

इसका असर अगले साल यानी 2027 में और अधिक देखने को मिलेगा। टोरेरो के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमोडिटी की बढ़ी हुई कीमतों का असर रिटेल यानी खुदरा बाजार में दिखने में तीन से छह महीने का समय लगता है।

हालांकि हाल के महीनों में गेहूं, मक्का और चावल जैसी प्रमुख फसलों की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी देखी गई है, लेकिन यह मौजूदा समय की ठीक-ठाक पैदावार दिखा रही है। असली चुनौती अगली बुवाई के सीजन में उत्पादन लागत बढ़ने से सामने आएगी।

युद्ध की वजह से सप्लाई चेन पर बढ़ा भारी दबाव

ईरान से जुड़े मौजूदा संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा की है। ये दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक है। मैक्सिमो टोरेरो के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह का अवरोध कृषि प्रणालियों और उसके इनपुट्स पर सीधा असर डालता है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की ऊंची दरें सिंचाई, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ा देती हैं। इसके अलावा नेचुरल गैस के दाम बढ़ने से खाद बनाना भी काफी महंगा हो जाता है।

इसी तरह यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस के तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों ने डीजल और नेचुरल गैस के निर्यात पर असर डाला है। इससे दुनिया भर में किसानों की उत्पादन लागत बढ़ रही है। यूरोप, अमेरिका, ब्राजील और एशिया के किसान इस दबाव को महसूस कर रहे हैं और कम मुनाफे की वजह से फसलें उगाएं या न उगाएं, इस सवाल से जूझ रहे हैं।

भारत का मानसून बना दुनिया के लिए अहम वॉचपॉइंट

दुनिया में चावल के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक और सबसे बड़े निर्यातक देश भारत का मानसून अंतरराष्ट्रीय खाद्य बाजारों के लिए एक प्रमुख वॉचपॉइंट बना हुआ है। भारत में मानसून की देरी से शुरुआत और औसत से कम बारिश ने चावल के उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी थीं। अगर भारत के चावल उत्पादन में कोई बड़ी बाधा आती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई टाइट हो सकती है। इससे कीमतें तेजी से ऊपर जा सकती हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर सीमित: बजाज एसेट मैनेजमेंट की रिपोर्ट

बजाज एसेट मैनेजमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में देर से आए मानसून का देश की इकॉनमी पर बड़ा निगेटिव असर पड़ने की संभावना बेहद कम है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जून के आखिरी हफ्ते में बारिश काफी बेहतर हुई है। जुलाई में भी मानसूनी बारिश मजबूत रही। देश के प्रमुख नदी घाटियों और जलाशयों में पानी का स्तर बेहतर स्थिति में है। भारत के पास सरकारी गोदामों में अनाज का भंडार तय बफर नॉर्म्स से लगभग 5 गुना अधिक है। ये खाद्य कीमतों में उछाल को रोकने में एक मजबूत कवच का काम करेगा।

वित्त वर्ष 2027 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा महंगाई दर औसतन 5 से 5.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ये खाद्य आपूर्ति के अस्थाई दबावों की वजह से होगी। हालांकि कोर इन्फ्लेशन दर कंट्रोल में है। भारत की रूरल इकॉनमी मजबूत बनी हुई है। मई में ट्रैक्टरों की बिक्री में सालाना आधार पर 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसी तरह एग्रीकल्चर क्रेडिट करीब 15 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा। गैर-कृषि आय के मजबूत रहने से बुवाई में देरी के बावजूद ग्रामीण खपत बनी हुई है।

रिपोर्ट में ऐतिहासिक तथ्यों के हवाले से कहा गया कि जून 2026 पिछले एक सदी में सबसे शुष्क महीनों में से एक रहा लेकिन पूरे मानसून का नतीजा जून से तय नहीं होता। अगर अगस्त और सितंबर में बारिश का सिलसिला बेहतर बना रहता है तो मानसून घाटे की चिंताएं दूर हो जाएंगी और 2026 को एक रिकवरिंग मानसून वर्ष के रूप में देखा जाएगा।

बढ़ती लागत से किसानों ने घटाई बुवाई: अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया तक संकट

बढ़ती उत्पादन लागत के कारण दुनिया भर के किसानों ने फसलों का रकबा घटाना शुरू कर दिया है। ईरान संघर्ष के शुरुआती तीन महीनों में वैश्विक स्तर पर गेहूं और मक्के की बुवाई में गिरावट आई है। कई अमेरिकी किसानों ने सोयाबीन की ओर रुख किया है क्योंकि इसमें खाद की जरूरत कम होती है। अमेरिकन फार्म ब्यूरो फेडरेशन के अनुमान के मुताबिक अतिरिक्‍त सरकारी मदद के बिना 2027 में 9 प्रमुख फसलें उगाने वाले अमेरिकी किसानों को कुल मिलाकर 32 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है।

दुनिया के बड़े कृषि निर्यातक देशों में शामिल ऑस्ट्रेलिया ने अनुमान लगाया है कि फ्यूल और खाद की अत्यधिक ऊंची कीमतों के साथ इनपुट्स की अनिश्चितता के चलते उसकी सर्दियों की फसल उत्पादन में 21 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।

अल नीनो की आहट से खाद्य सुरक्षा पर मंडराया ‘परफेक्ट स्टॉर्म’

भू-राजनीतिक तनावों के साथ-साथ अल नीनो मौसम पैटर्न के मजबूत होने की आशंका ने संकट को और गहरा कर दिया है। एफएओ ने चेतावनी दी है कि अल नीनो की वजह से मौसम पर पड़ने वाला असर फसलों की पैदावार घट सकती है। ऐसा हुआ तो खाद्य आपूर्ति में कमी आएगी और दुनिया भर में करोड़ों लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की चपेट में आ सकते हैं।

जलवायु का झटका, ऊर्जा की ऊंची कीमतें और फ्यूल-खाद की आपूर्ति में आ रही बाधा, ये सारी बातें मिलकर वैश्विक कृषि क्षेत्र के लिए एक परफेक्ट स्टॉर्म यानी चौतरफा संकट पैदा कर रही हैं। हालांकि कमोडिटी बाजार अब तक कुछ हद तक टिकाऊ बने रहे हैं लेकिन बढ़ती उत्पादन लागत का पूरा असर आने वाले महीनों में सुपरमार्केट और खुदरा दुकानों में सामानों के दामों में दिखाई देगा।

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इससे दुनिया भर के लोगों के लिए महंगाई का खतरा एक बार फिर बढ़ सकता है। दूसरी ओर भारत में सुधरती मानसूनी बारिश, प्रचुर अन्न भंडार और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था के चलते देश के भीतर इसका व्यापक आर्थिक असर सीमित रहने की उम्मीद है।

क्या पाकिस्तान का नक्शा बदलने वाला है और उससे अलग नया देश बन पाएगा बलूचिस्तान? समझिए आजादी के दावे के पीछे कितना दम

Balochistan Claim Explained: रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का दावा करने वाले बलूच समूहों ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील तेज कर दी है। पाकिस्तान से आजादी का ऐलान करने के बाद बलूचों के इस ग्लोबल कैंपेन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बलूचिस्तान वास्तव में दुनिया का सबसे नया संप्रभु देश बन सकता है और क्या इससे पाकिस्तान का नक्शा बदल जाएगा? इसको लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन चल रहे हैं लेकिन इंटरनेशन कानून और ग्लोबल डिप्लोमेसी का इतिहास बताता है कि सिर्फ स्वतंत्रता का ऐलान कर देने से ही कोई नया देश अस्तित्व में नहीं आ जाता। किसी भी क्षेत्र को नए राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए कूटनीतिक मान्यता, रीजनल कंट्रोल और इंटरनेशनल वैलिडेशन की सबसे बड़ी चुनौतियों से पार पाना होता है।

आजादी का ऐलान केवल पहला कदम, संप्रभुता के लिए क्या हैं नियम?

अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी क्षेत्र या समूह द्वारा खुद को स्वतंत्र घोषित करने पर प्रतिबंध नहीं लगाता। हालांकि सिर्फ एकतरफा ऐलान कर देने से ऑटोमेटिकली कोई नया देश नहीं बन जाता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मानदंडों के मुताबिक किसी क्षेत्र को संप्रभु राज्य के रूप में काम करने के लिए मुख्य रूप से चार शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है-

  • 1 – उस क्षेत्र में एक स्थायी आबादी होनी चाहिए।
  • 2 – उस देश की एक डिफाइंड टेरिटरी और बॉर्डर होना चाहिए।
  • 3 – उस देश में एक प्रभावी सरकार होनी चाहिए।
  • 4 – दूसरे संप्रभु देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।

अगर बलूच समूह इनमें से कुछ शर्तों का आंशिक रूप से दावा भी करते हैं तब भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बिना कोई भी नया क्षेत्र वैश्विक संस्थाओं का हिस्सा नहीं बन सकता।

कूटनीतिक मान्यता: बलूचिस्तान के राह की सबसे बड़ी रुकावट

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने ग्लोबल कम्युनिटी से संप्रभुता स्वीकार करने की अपील की तो है लेकिन अब तक दुनिया के किसी भी देश ने इसे आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। कूटनीतिक मान्यता एक संप्रभु देश द्वारा लिया जाने वाला विशुद्ध राजनीतिक निर्णय होता है। जब तक बलूचिस्तान को अन्य देशों से औपचारिक कूटनीतिक मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह संयुक्त राष्ट्र (UN) का सदस्य नहीं बन सकता। इसके अलावा अन्य देशों के साथ सामान्य कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता। इसके साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF, विश्व बैंक) का फायदा उसे नहीं मिल सकता।

जमीनी हकीकत: पाकिस्तान का प्रशासनिक व सैन्य नियंत्रण

संप्रभु देश का दर्जा हासिल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानदंडों में से एक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण है। भले ही बलूचिस्तान के अलग अलग हिस्सों में अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं लेकिन इस्लामाबाद अभी भी अपने नागरिक प्रशासन, सुरक्षा बलों और न्यायिक प्रणाली के माध्यम से इस पूरे प्रांत पर संवैधानिक और प्रशासनिक नियंत्रण रखता है। जब तक पाकिस्तान का इस प्रांत पर व्यावहारिक और प्रशासनिक नियंत्रण बना रहता है तब तक बलूचिस्तान की संप्रभुता के किसी भी दावे को व्यावहारिक धरातल पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर क्या कहता है?

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का तर्क है कि उनके लोगों के पास आत्मनिर्णय का अधिकार है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दस्तावेज आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करते हैं लेकिन इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूदा संप्रभु राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता की भी कड़ाई से रक्षा करता है। ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही किसी देश से अलग होने का समर्थन किया है, जैसे कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति या व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ लंबे समय से जारी सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में।

क्या भारत दे सकता है बलूचिस्तान को मान्यता?

बलूच नेताओं द्वारा कूटनीतिक समर्थन की अपील के बाद यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत बलूचिस्तान को एक अलग देश के रूप में मान्यता दे सकता है? भारत का आधिकारिक और पुराना कूटनीतिक रुख यही रहा है कि वह बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानता है। भारत ने बलूचिस्तान में मानव अधिकारों के उल्लंघन और सुरक्षा चिंताओं का मुद्दा तो बार-बार उठाया है लेकिन उसने अलगाववादी दावों या अलग देश की घोषणा को कभी औपचारिक मान्यता नहीं दी है। किसी भी अलग हुए क्षेत्र को मान्यता देना भारत की लंबी अवधि की विदेश नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव होगा, जिसके व्यापक भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।

इतिहास के सबक: सिर्फ घोषणा से नहीं बनते नए देश

आपको बता दें कि दुनिया का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि सिर्फ स्वतंत्रता की घोषणा करने से राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता। इसे कोसोवो के उदाहरण से समझा जा सकता है। कोसोवो ने 2008 में अपनी आजादी की घोषणा की थी और उसे 100 से अधिक देशों ने मान्यता दी है लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी वैश्विक शक्तियां आज भी इसे पूर्ण देश नहीं मानती हैं। सोमालीलैंड, उत्तरी साइप्रस और ट्रांसनिस्ट्रिया जैसे क्षेत्रों के पास वर्षों से अपना खुद का शासन ढांचा है लेकिन व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता न मिलने की वजह से वे आज भी औपचारिक देशों की श्रेणी से बाहर हैं।

पाकिस्तान के लिए चुनौतियां और बलूचिस्तान का भविष्य

बलूच अलगाववादी समूहों की यह ताजा घोषणा ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता, खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद और बलूचिस्तान में जारी उग्रवाद से जूझ रहा है। 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस घोषित करने और कूटनीतिक अपील करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान के मुद्दे पर ध्यान जरूर आकर्षित हुआ है। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानूनी और कूटनीतिक ढांचे के तहत बलूचिस्तान के एक मान्यता प्राप्त संप्रभु देश बनने की राह बेहद कठिन और अनिश्चित है। जब तक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण, व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता और वैश्विक संस्थाओं में प्रवेश हासिल नहीं होत, तब तक सिर्फ स्वतंत्रता के दावों से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बलूचिस्तान की कानूनी स्थिति रातों-रात नहीं बदल सकती।