वाराणसी में बनेंगे बड़े ब्रांड्स के कपड़े, मिर्जामुराद में ₹100 करोड़ की लागत से तैयार हुई अरविंद मिल्स की यूनिट, यूं मिल रहा रोजगार

यूपी के वाराणसी में जाकी, यूएस पोलो, एरो पैंट-शर्ट, टी शर्ट के रेडीमेड ब्रांडेड कपड़े तैयार होंगे। इसके लिए मिर्जामुराद के खुचवां गांव में अरविंद मिल्स की नई इकाई स्थापित हुई है। इस पर करीब 100 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। करीब 8 एकड़ जमीन पर इस यूनिट को लगाया गया है। इस यूनिट से सीधे तौर पर यहां की सैकड़ों महिलाओं को रोजगार मिलेगा। पूरे पूर्वांचल में अरविंद मिल्स की यह पहली मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट है।

फिलहाल इस विनिर्माण इकाई में जिन महिलाओं को रोजगार मिलेगा उन्हें ट्रेनिंग भी दी जा रही है। शुरुआती दौर में इस इकाई में आस पास के गांव की 300 महिलाओं को सीधे रोजगार का अवसर मिलेगा। बताया जा रहा है इस यूनिट की शुरुआत के बाद इसका विस्तार भी किया जाएगा। जिससे रोजगार के साधन भी बढ़ेंगे। अरविंद मिल्स गुजरात आधारित लोकप्रिय टेक्सटाइल कंपनी है।

पीएम मोदी करेंगे लोकार्पण

बीते दिनों यूपी इन्वेस्टर मीट के दौरान कंपनी ने वाराणसी में विनिर्माण इकाई शुरू करने का प्रस्ताव रखा था। साल 2024 में मिर्जामुराद में इसकी आधारशिला रखी गई थी। करीब 2 साल में यह यूनिट अब बनकर तैयार हो गई है। वाराणसी के डीएम सतेन्द्र कुमार ने बताया की 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब वाराणसी आएंगे तो वह इस यूनिट का लोकार्पण भी करेंगे। इस लिहाज से भी तैयारियां की जा रही हैं।

इन चींजो का होगा उत्पादन

जानकारी के मुताबिक, वाराणसी में स्थापित अरविंद मिल्स के इस मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट में स्पोर्ट्स वियर, अंडर गारमेंट्स, शर्ट, टीशर्ट का उत्पादन होगा। दूसरे फेज में इसके विस्तार के बाद यहां जींस, पैंट और ब्रांडेड शर्ट भी तैयार होंगे। जिससे हजारों लोगों को सीधे रोजगार का मौका मिलेगा।

कपड़ों के अलावा धागे भी तैयार करती है कंपनी

अरविंद मिल्स सिर्फ ब्रांडेड रेडीमेड कपड़े ही नहीं, धागों और कपड़ों को भी तैयार करती है। डेनिम के जींस के धागों को भी तैयार करने का काम यह कंपनी सालों से करती चली आ रही है। इसके अलावा लिनेन के कपड़े, सादे कपड़ों और सूट के फैब्रिक्स को भी अरविंद मिल्स की यूनिट में तैयार किया जाता है।

वाराणसी से अभिषेक जायसवाल की रिपोर्ट

Barda Wildlife Sanctuary: गुजरात की इस वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में फिर सुनाई देने लगी है शेरों की दहाड़, 144 साल बाद बर्दा बना 17 एशियाटिक शेरों का घर

Barda Wildlife Sanctuary: गुजरात की इस वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में फिर सुनाई देने लगी है शेरों की दहाड़, 144 साल बाद बर्दा बना 17 एशियाटिक शेरों का घर

Barda Wildlife Sanctuary: गुजरात में गिर के जंगलों में एशियाई शेरों की आबादी अब सीमित नहीं रह गई है। इसी राज्य का एक और इलाका शेरों की आबादी की पसंदीदा ठिकाना बनकर उभर रहा है। हाल की रिपोर्ट्स के मुताबिक, बर्दा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में लगभग 144 सालों से गायब एशियाई शेरों की दहाड़ फिर से सुनाई देने लगी है। यह जंगल अब 17 एशियाई शेरों का घर है।

PLOS One जर्नल में छपी एक स्टडी में पाया गया है कि बर्दा में सही रहने की जगह, पर्याप्त शिकार और ऐसे माहौल के हालात हैं जो लंबे समय तक शेरों की आबादी को सहारा दे सकते हैं। ये नतीजे गिर के अलावा एशियाई शेरों के लिए इस सैंक्चुअरी को दूसरे घर के तौर पर तैयार करने लिए पर्याप्त बता रहे हैं। इससे एशियाई शेरों आबादी को एक ही जगह इकट्ठा करने से जुड़े खतरों को कम करने में मदद मिलेगी।

एशियाई शेर कैसे लौटे बर्दा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी

‘बियॉन्ड गिर: बर्दा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी एज ए पोटेंशियल स्ट्रॉन्गहोल्ड फॉर एशियन लायंस’ नाम की इस स्टडी में जानवरों की जांच की गई। शोधकर्ताओं ने छह शेरों, एक नर और पांच मादा को GPS कॉलर लगाए, और जनवरी 2023 और जुलाई 2025 के बीच 169,000 से अधिक लोकेशन पॉइंट रिकॉर्ड किए। आंकड़ों से पता चला कि जानवर बर्दा के जंगलों और घास के मैदानों का इस्तेमाल कर रहे थे और सैंक्चुअरी के अंदर अपना क्षेत्र बना रहे थे।

शेरों की वापसी में प्राकृतिक फैलाव और एक योजनाबद्ध संरक्षण कोशिश, दोनों शामिल थे। एक नर शेर गिर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों से बर्दा में आया। गुजरात फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने बाद में आबादी बनाने में मदद के लिए पांच मादा शेरों को दाखिल किया।

राज्य सरकार ने दशकों पहले बर्दा को एक संभावित वैकल्पिक हैबिटैट के तौर पर पहचाना था। 1979 में, जिस साल सैंक्चुअरी को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था, उसने जंगल को एशियाई शेरों के लिए एक और घर के तौर पर विकसित करने के लिए गिर-बर्दा प्रोजेक्ट शुरू किया।

जंगली सूअर बने शेरों के भोजन का 55% हिस्सा

शेरों की आबादी के पनपने का एक अहम फैक्टर है शिकार की उपलब्धता। इससे तय होता है कि कोई हैबिटैट एक बड़ी शिकारी आबादी को बनाए रख सकता है या नहीं। बार्दा स्टडी में पाया गया कि जंगली सूअरों का रिकॉर्डेड डाइट में 55% हिस्सा था, जबकि पालतू मवेशियों का 17% हिस्सा था।

नतीजे इस बात पर जोर देते हैं कि जैसे-जैसे शेरों की संख्या बढ़ रही है, जंगली शिकार की आबादी को बचाना कितना जरूरी है। एक हैबिटैट उन्हें छिपने और रहने की जगह दे सकता है, लेकिन जानवरों के लंबे समय तक जिदा रहने के लिए एक टिकाऊ फूड सप्लाई भी उतनी ही जरूरी है।

एशियाई शेरों के संरक्षण के लिए बार्दा क्यों जरूरी है?

एशियाई शेर ज्यादातर गुजरात में पाए जाते हैं, और गिर उनका मुख्य गढ़ है। एक और रहने लायक आबादी बनाने से उन खतरों को कम करने में मदद मिल सकती है जो इतनी सारी प्रजातियों के एक ही इलाके में जमा होने से आते हैं। बार्दा गिर से फैलने वाले शेरों के लिए पॉपुलेशन बफर का भी काम कर सकता है। गुजरात के जंगल और एनवायरनमेंट मिनिस्टर अर्जुन मोढवाडिया ने छोटे हैबिटैट को बचाने और उनके बीच संपर्क बनाए रखने की अहमियत पर जोर दिया है, ताकि वाइल्डलाइफ लैंडस्केप में घूम सकें।

बर्दा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी कहां है?

बर्दा वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में, पोरबंदर और देवभूमि द्वारका जिलों के कुछ हिस्सों में है। यह 192.31 स्क्वायर किलोमीटर में फैला है और पोरबंदर शहर से लगभग 15 km दूर है। अपने बेहद छोटे आकार के बावजूद, यह सैंक्चुअरी बबूल, धव, रायन, बेर, जामुन, अमली और बांस सहित कई तरह के पेड़-पौधों का समर्थन करती है। यह गुग्गल जैसे औषधीय पौधों के साथ-साथ कई दुर्लभ पौधों की प्रजातियों का भी घर है। बड़े वाइल्डलाइफ समुदाय में तेंदुए, लकड़बग्घा और सियार के साथ-साथ सांभर, चीतल और चिंकारा जैसे हिरण भी शामिल हैं।

क्या टूरिस्ट बार्दा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी जा सकते हैं?

गुजरात के जंगलों और वाइल्डलाइफ में दिलचस्पी रखने वाले यात्रियों के लिए बार्दा एक विकल्प है। सफारी के मौके सुबह और दोपहर में मिल सकते हैं, लेकिन आगंतुकों को ट्रिप प्लान करने से पहले गुजरात वन विभाग से मौजूदा व्यवस्था और टाइमिंग कन्फर्म कर लेनी चाहिए।

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फेमिनिस्‍ट औरतों को एक तख़्ती पर मर्दों के लिए यह भी लिखना चाहिए

फेमिनिस्‍ट औरतों को एक तख़्ती पर मर्दों के लिए यह भी लिखना चाहिए

Feminist

आख़िरकार औरतों ने मर्दों पर कविताएं लिखीं, भले वे बहुत बेहूदा और ख़राब ही क्यों न थीं!

औरतों ने वो काम कर दिखाया जो मर्द ख़ुद अपने लिए नहीं कर सका। अब किसी औरत से मैं चाहता हूं कि वो मर्द के पसीने पर पसीने से भीगी हुई कोई कविता लिखेगी।

मैं चाहता हूं कि एक तख्ती पर यह भी लिखा जाना चाहिए कि कैसे मर्दों ने घर बनाए। खेत उगाये। फ़सल उगाई। बाग़ लगाए और बागों में फूल उगाए। भले तोड़कर नहीं ला सके, पर कैसे औरतों को उनके लिए चांद- तारे तोड़ लाने के ख़्वाब दिखाए?

लिखो कि मर्दों ने तुमसे वो भी कहा जो वो नहीं कर सकते थे!

एक तख्ती पर लिखो कि कैसे मर्दों ने औरतों को सुंदर कहा, लिखो कि जब औरतों को यकीन नहीं हुआ कि वे सुंदर हैं तो उसने उनके लिए शीशे भी बना डाले।

औरतों को चाहिए कि एक तख्ती पर वो लिखे कि कैसे मर्द दफ़्तर के किसी कोने में ता-उम्र एक वक्त सिर्फ़ ठंडी रोटियां खाता रहा?

औरतों! यह भी लिखो कि वो कितना उदास दिखता है जब अकेले- अकेले खाना खाता है?

लिखो कि कैसे मर्द फोन करते- करते यह सोचकर रुक जाता है कि अभी वो सो रही होगी।

एक तख्ती पर यह भी लिखो कि जब वो बारिश में भीगकर घर लौटता है तो कैसे उसकी देह का एक हिस्सा सड़क के कीचड़ में बहकर चला जाता है? कैसे गर्म सड़कों पर धूप हमेशा के लिए उसका रंग चुरा लेती है?

यह भी लिखो कि कैसे वो सर्दियों में अपनी हड्डियां बेचकर घर लौटता रहा?

लिखो कि मर्द अक्सर अपने घर के लिए ही जल्दी घर लौटता है। एक तख्ती पर यह भी तो लिखो कि कई बार औरतों की वजह से ही वो घर नहीं लौटाता!

लिखो कि ज़्यादातर मर्दों ने सबसे पहले बेटियां ही क्यों पैदा करना चाही?

औरतों! साहस करो, एक तख्ती पर यह भी लिखो कि तुम्हारा भाई और बाप भी एक मर्द है।

लिखो कि आख़िर क्यों ज़्यादातर दोस्तियां मर्द ही निभाते रहे?

यह भी तो लिखो कि वो तभी रोता है जब उसके आसपास कोई नहीं होता और तभी हंसता है जब सभी उसके साथ होते हैं।

कुछ पड़ताल यह भी करो कि मर्द किसी के मरने पर भी दहाड़ मारकर क्यों नहीं रोता?

लिखो कि जो प्रेम में रो पड़ता है, वो श्मशानों में पत्थर क्यों हो जाता है?

पता करो, मर्द क्यों चाहता है कि मरे हुए मर्दों की आत्माएं हमेशा के लिए मुक्त हो जाए?

एक तख्ती पर लिखो कि तमाम मृत्युओं का बोझ वो कहां रखता होगा?

एक तख्ती पर लिखो कि क्यों वो ईश्वर के खिलाफ़ हर सुबह फिर से पैदा होकर उठ खड़ा हो जाता है?

एकआध तख्तियों पर यह भी लिखना चाहिए कि क्यों सबसे ज़्यादा उसकी पीठ और तलवों में छाले पड़ते हैं?
एक तख्ती पर मर्द की उदासी का भी ज़िक्र करो तो जानें!

लिखो कि ज़िंदगी के तमाम रंज ओ ग़म के बावजूद मर्द ने देवता क्यों नहीं बनना चाहा?

यह भी लिखो कि मर्द की देह आखिर थकती क्यों नहीं?

एक तख्ती पर लिखो कि एक बार जाने के बाद उसकी आत्मा वापस लौटना क्यों नहीं चाहती?

लद्दाख के हीरो- बचाईं कंबल और जाल से 47 Snow Leopards की जान | Khenrab Phuntsog | Ladakh

बर्फ से ढके पहाड़ों में रहने वाला Snow Leopard सिर्फ एक खूबसूरत जानवर नहीं, बल्कि पूरे हिमालय के संतुलन के लिए बहुत ज़रूरी है। लेकिन Climate Change, कम होते प्राकृतिक आवास और इंसानों के साथ बढ़ते टकराव की वजह से आज इनका अस्तित्व खतरे में है।
ऐसे समय में खेनरब फुंत्सोग जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति की रक्षा सिर्फ जंगलों में नहीं, बल्कि हमारी सोच से भी शुरू होती है। एक व्यक्ति का समर्पण कई बार उन ज़िंदगियों को बचा लेता है, जिनकी आवाज़ हम तक कभी पहुंच ही नहीं पाती।
अगर हम इंसान और वन्यजीव साथ मिलकर जीना सीख जाएं, तो आने वाली पीढ़ियां भी हिमालय की वादियों में Snow Leopard की दहाड़ सुन सकेंगी।

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Vijay Varma: क्या विजय वर्मा ने आरक्षण और विशेषाधिकार के बारे में पोस्ट किया था शेयर? वायरल स्क्रीनशॉट पर एक्टर ने तोड़ी चुप्पी

Vijay Varma: कई दिनों से सोशल मीडिया पर विजय वर्मा की इंस्टाग्राम स्टोरी का एक स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है। इस पोस्ट में एक्टर आरक्षण और विशेषाधिकार पर अपनी राय रखते हुए दिखे, जिससे अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इस पर काफी चर्चा और बहस छिड़ गई। जैसे-जैसे यह स्क्रीनशॉट और ज़्यादा चर्चा में आ रहा है, विजय ने अब इस वायरल दावे पर अपनी बात रखी है।

जैसे ही सोशल मीडिया पर यह स्क्रीनशॉट फैला, कई लोगों ने इसे असली मान लिया और इसमें कही गई बातें विजय की बताईं। इस पोस्ट से ऑनलाइन चर्चा तेज़ हो गई। लेकिन, जैसे-जैसे अटकलें बढ़ीं, विजय ने शनिवार को X (जिसे पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था) पर आकर इस वायरल दावे पर सफाई दी।

उन्होंने वायरल स्क्रीनशॉट को रीपोस्ट करते हुए लिखा, “मैंने कभी ऐसा पोस्ट नहीं किया। यह सब झूठ है।” एक्टर ने फिर से स्क्रीनशॉट रीपोस्ट किया और अपनी बात दोहराते हुए कहा, “मैंने कभी ऐसा पोस्ट नहीं किया। यह मेरी कहानी नहीं है।”

विजय के नाम से जुड़े वायरल स्क्रीनशॉट में लिखा था, “मेरे जन्म के समय मेरे पिता ने मारुति 800 खरीदी थी। जब मैं 12वीं क्लास में पहुँचा, तो उन्होंने मेरे लिए होंडा सिविक खरीदी। मैं उसी कार से कोचिंग जाता था, जबकि मेरा सबसे अच्छा दोस्त, जो मारवाड़ी परिवार से था, तब भी 12 साल पुरानी हीरो होंडा चलाता था। हमने एक सरकारी परीक्षा दी। उसके अच्छे नंबर आए लेकिन उसे सीट नहीं मिली। रिज़ल्ट वाले दिन वह रोते हुए अपनी बाइक से घर लौटा, जबकि मैं ठीक था। मुझे रिज़र्वेशन की ज़रूरत नहीं थी, लेकिन उसे थी। यह उसका अधिकार था। अगर वह नहीं, तो कम से कम उसे बराबरी का मौका तो मिलना ही चाहिए था।”

इस बीच, विजय ने कथित NEET पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में हो रहे छात्र विरोध-प्रदर्शनों के लिए अपना समर्थन खुलकर ज़ाहिर किया है। उन्होंने छात्र विरोध-प्रदर्शनों के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े पर भी प्रतिक्रिया दी। इस घोषणा के बाद एक्टर ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर किया, जिसमें उन्होंने फ़िल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ के गाने ‘चन्ना मेरेया’ की एक लाइन का इस्तेमाल किया।

फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII) से ग्रेजुएट विजय ने ‘पिंक’, ‘राग देश’, ‘मंटो’ और ‘मिडल क्लास अब्बायि’ जैसी फिल्मों में छोटे रोल किए थे। इसके बाद उन्हें जोया अख्तर की ‘गली बॉय’ में एक छोटा लेकिन चर्चा में रहने वाला रोल मिला, जिससे उन्हें पहचान मिली। पिछले कुछ सालों में, विजय ने ‘डार्लिंग्स’, ‘दहाड़’ और ‘मिर्ज़ापुर’ जैसी फिल्मों और शो में अपने काम के लिए काफी तारीफें बटोरी हैं।

उन्हें आखिरी बार ‘मटका किंग’ में देखा गया था। 1960 के दशक के मुंबई पर आधारित ‘मटका किंग’ का पहला सीज़न एक महत्वाकांक्षी कॉटन व्यापारी की कहानी है, जो सम्मान और पहचान पाने का सपना देखता है। वह ‘मटका’ नाम का एक नया जुए का खेल शुरू करता है, जो जल्द ही पूरे शहर में छा जाता है और एक ऐसे बिज़नेस को बदल देता है जो पहले सिर्फ अमीर और प्रभावशाली लोगों तक ही सीमित था। इस शो को क्रिटिक्स और दर्शकों, दोनों से ही अच्छे रिव्यू मिले। विजय वर्मा के अलावा, इस सीरीज़ में कृतिका कामरा, साई ताम्हणकर, सिद्धार्थ जाधव, भूपेंद्र जदावत और गुलशन ग्रोवर ने भी अहम भूमिकाएँ निभाईं। इस साल की शुरुआत में, ‘मटका किंग’ सीज़न 1 को मिले ज़बरदस्त रिस्पॉन्स के बाद प्राइम वीडियो ने आधिकारिक तौर पर इस शो को दूसरे सीज़न के लिए रिन्यू किया।