पेरू में 6.7 तीव्रता का भूकंप आया:झटके कई इलाकों में महसूस हुए, नुकसान की खबर नहीं

पेरू के दक्षिणी हिस्से में गुरुवार को 6.7 तीव्रता का भूकंप आया। भूकंप से नुकसान की कोई खबर नहीं मिली। भूकंप स्थानीय समय के अनुसार दोपहर 1 बजे (भारतीय समयानुसार रात 11:30 बजे) आया। इसका केंद्र आयाकूचो क्षेत्र के पैरिनाकोचास प्रांत में उपाहुआचो शहर से 38 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में था। भूकंप की गहराई 66.7 किलोमीटर थी। दक्षिणी पेरू के कई इलाकों में इसके झटके महसूस किए गए, जिनमें इका और अरेकिपा भी शामिल हैं। पेरू रिंग ऑफ फायर का हिस्सा, अक्सर आते हैं भूकंप पेरू प्रशांत महासागर के रिंग ऑफ फायर का हिस्सा है। यह इलाका भूकंपीय गतिविधियों के लिए जाना जाता है, इसलिए यहां अक्सर भूकंप आते हैं। साल 2007 में इका क्षेत्र के एक प्रांत में 7.9 तीव्रता का भूकंप आया था। इसमें करीब 600 लोगों की मौत हुई थी। साल 2026 में वेनेजुएला में आया सबसे बड़ा भूकंप, 6 हजार मौतें इस साल वेनेजुएला में सबसे बड़ा भूकंप आया। 24 जून को 7.2 की तीव्रता से आए भूकंप में 6 हजार से ज्यादा मौतें हुईं थीं। इसके अलावा कोलंबिया में 10 अगस्त को आए भूकंप में 70 से ज्यादा जानें गईं थीं। ———————– भूकंप से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… कोलंबिया में भूकंप से 224 लोगों की मौत, 1200 घायल: 86 इमारतें गिरीं साउथ अमेरिकी देश कोलंबिया में 11 अगस्त की रात आए 7.4 तीव्रता के भूकंप से अब तक 224 लोगों की मौत हो गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

इमरान खान को अस्पताल ले जाने की तैयारी:इस्लामाबाद के शिफा अस्पताल में भारी सुरक्षा; सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इलाज

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को रावलपिंडी की अडियाला जेल से इलाज के लिए इस्लामाबाद के शिफा इंटरनेशनल अस्पताल ले जाने की तैयारी शुरू हो गई है। उन्हें कुछ ही देर में कड़ी सुरक्षा के बीच अस्पताल शिफ्ट किया जा सकता है। यह कदम पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उठाया जा रहा है। उनके परिवार और वकीलों ने उनकी सेहत को लेकर चिंता जताई थी और अपनी पसंद के डॉक्टरों से इलाज के लिए उन्हें निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की थी। खबर लगातार अपडेट हो रही है…

अमेरिकन वॉरशिप जॉर्ज वॉशिंगटन की अरब सागर में एंट्री:250 दिन से तैनात अब्राहम लिंकन की जगह ली, ईरान के करीब अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी बढ़ी

अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर शिप USS जॉर्ज वॉशिंगटन ने पश्चिम एशिया में ऑपरेशन शुरू कर दिया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने गुरुवार को इसकी जानकारी दी। जॉर्ज वॉशिंगटन अरब सागर क्षेत्र में USS अब्राहम लिंकन की जगह पहुंचा है। अब्राहम लिंकन लगातार 250 दिनों से ज्यादा समय से इस इलाके में तैनात था। जॉर्ज वॉशिंगटन इससे पहले साउथ चाइना सी में तैनात था USS जॉर्ज वॉशिंगटन इससे पहले साउथ चाइना सी में तैनात था। हाल ही में उसने वियतनाम के दा नांग में पोर्ट कॉल भी पूरा किया है। यह पहली बार नहीं है, जब यह एयरक्राफ्ट कैरियर अरब सागर में पहुंचा है। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में भी इसने फारस की खाड़ी में कई ऑपरेशन किए थे। इनमें इराक के कुवैत पर हमले के दौरान की गई तैनाती, 1994 का ऑपरेशन विजिलेंट वॉरियर, 1998 का ऑपरेशन डेजर्ट थंडर और 2002 में अफगान युद्ध के दौरान ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम शामिल हैं। दावा- वॉरशिप अब्राहम लिंकन से नौसैनिकों ने कूदने की कोशिश की थी अमेरिकी वॉरशिप USS अब्राहम लिंकन पर तैनात अमेरिकी नौसैनिक मानसिक और शारीरिक तनाव से गुजर रहे हैं। नेवी टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि जहाज पर तैनात 6 अमेरिकी सैन्यकर्मियों ने जहाज से समुद्र में कूदने की कोशिश की थी। USS अब्राहम लिंकन करीब 9 महीने से समुद्र में है। ये वॉरशिप ईरान जंग के दौरान बिना किसी पोर्ट पर रुके समुद्र में चल रहा है। इस पर करीब 5,000 अमेरिकी मरीन तैनात हैं।
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होर्मुज में अमेरिका पर ईरान भारी पड़ रहा:ट्रम्प की धमकी के बावजूद जहाज ईरानी रास्ते से जा रहे, सिर्फ 3 ने ओमानी रास्ता चुना

होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले ज्यादातर जहाज अपनी पहचान या रास्ता छिपा रहे हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 236 जहाज यहां से गुजरे, लेकिन 148 जहाजों की राह साफ तौर पर पता नहीं चल सकी। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि ट्रम्प की धमकियों के बावजूद कई जहाज ईरानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि होर्मुज स्ट्रेट में इस समय अमेरिका का दबदबा ज्यादा है या ईरान का। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर अमेरिकी सेना का नियंत्रण है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका इस इलाके की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने की कोशिश कर सकता है। वहीं, ईरान का कहना है कि तेहरान की मंजूरी के बिना कोई जहाज होर्मुज स्ट्रेट से नहीं गुजर सकता। ऐसे में दोनों देशों के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि वास्तव में इस रास्ते पर किसका कंट्रोल है। ईरान और अमेरिका के अलग-अलग दावे ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी भी दी है। ओमान अमेरिका का सहयोगी है और होर्मुज स्ट्रेट के दूसरी तरफ ईरान के सामने स्थित है। स्ट्रेट का समुद्री इलाका ईरान और ओमान दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ट्रम्प की धमकी का मकसद मस्कट को तेहरान के साथ होर्मुज स्ट्रेट का संयुक्त संचालन करने के समझौते से रोकना बताया गया है। युद्ध के बाद दो रास्तों में बंटा होर्मुज युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज को एक ही समुद्री रास्ता माना जाता था। जहाज तय रास्ते से गुजरते थे। उनका रास्ता बंदरगाह, जहाज के समझौते और सुरक्षा को देखकर तय होता था। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां दो अलग रास्तों की बात होने लगी। ईरानी रास्ता: यह होर्मुज के उत्तरी हिस्से में ईरान के तट के पास है। यह लारक और किश्म द्वीपों के करीब से गुजरता है और ईरान के बंदरगाहों और तेल टर्मिनलों तक जाता है। ओमानी रास्ता: यह होर्मुज के दक्षिणी हिस्से में ओमान के करीब है और ईरान के तट से दूर है। अमेरिका इसी रास्ते से जहाजों को गुजरने पर जोर देता है। अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा में चलने वाले कई कॉमर्शियल जहाज भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। 80% से ज्यादा जहाजों का रास्ता पता नहीं समुद्री खुफिया कंपनी केप्लर के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 112 तेल, एलपीजी और एलएनजी ले जाने वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें से 21 जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गए, जबकि सिर्फ 2 जहाजों ने ओमानी रास्ते का इस्तेमाल किया। बाकी 89 जहाजों का रास्ता साफ नहीं था। यानी इस दौरान होर्मुज से गुजरने वाले 80% से ज्यादा तेल और गैस वाले जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ट्रैक नहीं हो सकी। ऐसा तब होता है जब जहाज अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर देते हैं। कई बार जहाज का AIS डेटा केप्लर के तय ईरानी या ओमानी रास्तों से मेल भी नहीं खाता। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि जहाज वास्तव में किस रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों में भी ईरानी रास्ता आगे 1 से 19 अगस्त के बीच कुल 236 जहाज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें तेल और गैस के अलावा सूखा माल और रसायन ले जाने वाले जहाज भी शामिल थे। यानी हर 10 में से 6 से ज्यादा जहाज किस रास्ते से गुजरे, यह साफ तौर पर पता नहीं चल सका। जहाज AIS क्यों बंद कर रहे हैं? युद्ध शुरू होने के बाद ईरान और अमेरिका दोनों ने अपने बताए समुद्री रास्तों या नियमों का पालन नहीं करने वाले जहाजों को चेतावनी दी। कुछ मामलों में जहाजों पर हमले भी हुए। इसी वजह से कई जहाज अपना ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं। इससे उनकी सही स्थिति और वे किस रास्ते से जा रहे हैं, इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। ब्रिटेन के थिंक टैंक चैथम हाउस के एसोसिएट फेलो नील क्विलियम ने अल जजीरा से कहा कि ट्रांसपोंडर बंद करने से जहाज की आवाजाही कम दिखाई देती है। हालांकि, इससे समुद्री सुरक्षा का खतरा भी बढ़ जाता है। उनके मुताबिक, कुछ जहाज संचालकों को लगता है कि मौजूदा हालात में व्यापार जारी रखने का फायदा इन सुरक्षा जोखिमों से ज्यादा है। रास्ते में जहाजों के बीच सामान भी बदला जा रहा ट्रांसपोंडर बंद करने की एक वजह समुद्र में दो जहाजों के बीच सामान का ट्रांसफर भी है। एनर्जी एक्सपर्ट मार्क अयूब ने अल जजीरा से कहा कि सऊदी अरब, इराक और कुवैत समेत कुछ खाड़ी देशों ने ओमानी रास्ते से कुछ खेप भेजीं। इसके लिए कुछ जहाजों की ट्रैकिंग बंद की गई और रास्ते में दूसरे जहाजों को माल सौंपा गया। उनके मुताबिक, कुछ ईरानी जहाज भी ओमानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका मकसद प्रतिबंधों और अमेरिकी नाकाबंदी से बचना है। क्या आंकड़े ईरान के दबदबे की ओर इशारा कर रहे हैं? 148 जहाजों का रास्ता साफ नहीं होने की वजह से यह तय करना मुश्किल है कि वास्तव में कितने जहाज ईरानी या ओमानी रास्ते से गुजरे। फिर भी उपलब्ध आंकड़ों से एक बात सामने आती है। अमेरिकी नाकाबंदी और ट्रम्प की धमकियों के बावजूद हर पांच में से एक जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों को मिलाकर देखें तो 35% जहाजों ने सार्वजनिक रूप से ईरानी रास्ते का इस्तेमाल किया। इसके मुकाबले ओमानी या पुराने रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम रही। इससे संकेत मिलता है कि कई जहाज अमेरिकी धमकियों के बावजूद ईरानी रास्ते का इस्तेमाल करने को तैयार हैं। यानी मौजूदा हालात में ईरान को नाराज करने का डर ट्रम्प की धमकियों से ज्यादा असरदार दिखाई दे रहा है। होर्मुज दुनिया के लिए इतना अहम क्यों है अमेरिका-इजराइल का ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के तेल और एलएनजी की करीब एक-पांचवीं सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती थी। तब हर दिन करीब 130 जहाज यहां से गुजरते थे। इसके मुकाबले अगस्त के 19 दिनों में कुल 236 जहाज ही यहां से गुजरे। ईरान ने मार्च की शुरुआत में स्ट्रेट बंद कर दिया था और सिर्फ अपने मित्र देशों के जहाजों को गुजरने दिया। 17 जून को अमेरिका के साथ MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद भी यह जलमार्ग दोनों देशों की बातचीत का सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। इस संकट का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ा। संघर्ष शुरू होने से पहले ब्रेंट कच्चा तेल करीब 66 डॉलर प्रति बैरल था। मार्च में यह 119 डॉलर तक पहुंच गया। बाद में कीमत घटी, लेकिन तनाव बढ़ने के साथ फिर चढ़ गई। गुरुवार सुबह ब्रेंट कच्चा तेल 92.9 डॉलर प्रति बैरल पर था। नील क्विलियम के मुताबिक, अगर जहाजों की आवाजाही पर तेहरान का असर कम होता हुआ माना गया, तो अमेरिका के साथ बातचीत में दबाव बनाने का ईरान का एक अहम हथियार कमजोर पड़ सकता है। ——————————

होर्मुज में अमेरिका पर ईरान भारी पड़ रहा:ट्रम्प की धमकी के बावजूद जहाज ईरानी रूट से जा रहे, सिर्फ 3 ने ओमानी रास्ता चुना

होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले ज्यादातर जहाज अपनी पहचान या रास्ता छिपा रहे हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 236 जहाज यहां से गुजरे, लेकिन 148 जहाजों की राह साफ तौर पर पता नहीं चल सकी। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि ट्रम्प की धमकियों के बावजूद कई जहाज ईरानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि होर्मुज स्ट्रेट में इस समय अमेरिका का दबदबा ज्यादा है या ईरान का। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर अमेरिकी सेना का नियंत्रण है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका इस इलाके की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने की कोशिश कर सकता है। वहीं, ईरान का कहना है कि तेहरान की मंजूरी के बिना कोई जहाज होर्मुज स्ट्रेट से नहीं गुजर सकता। ऐसे में दोनों देशों के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि वास्तव में इस रास्ते पर किसका कंट्रोल है। ईरान और अमेरिका के अलग-अलग दावे ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी भी दी है। ओमान अमेरिका का सहयोगी है और होर्मुज स्ट्रेट के दूसरी तरफ ईरान के सामने स्थित है। स्ट्रेट का समुद्री इलाका ईरान और ओमान दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ट्रम्प की धमकी का मकसद मस्कट को तेहरान के साथ होर्मुज स्ट्रेट का संयुक्त संचालन करने के समझौते से रोकना बताया गया है। युद्ध के बाद दो रास्तों में बंटा होर्मुज युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज को एक ही समुद्री रास्ता माना जाता था। जहाज तय रास्ते से गुजरते थे। उनका रास्ता बंदरगाह, जहाज के समझौते और सुरक्षा को देखकर तय होता था। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां दो अलग रास्तों की बात होने लगी। ईरानी रास्ता: यह होर्मुज के उत्तरी हिस्से में ईरान के तट के पास है। यह लारक और किश्म द्वीपों के करीब से गुजरता है और ईरान के बंदरगाहों और तेल टर्मिनलों तक जाता है। ओमानी रास्ता: यह होर्मुज के दक्षिणी हिस्से में ओमान के करीब है और ईरान के तट से दूर है। अमेरिका इसी रास्ते से जहाजों को गुजरने पर जोर देता है। अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा में चलने वाले कई कॉमर्शियल जहाज भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। 80% से ज्यादा जहाजों का रास्ता पता नहीं समुद्री खुफिया कंपनी केप्लर के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 112 तेल, एलपीजी और एलएनजी ले जाने वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें से 21 जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गए, जबकि सिर्फ 2 जहाजों ने ओमानी रास्ते का इस्तेमाल किया। बाकी 89 जहाजों का रास्ता साफ नहीं था। यानी इस दौरान होर्मुज से गुजरने वाले 80% से ज्यादा तेल और गैस वाले जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ट्रैक नहीं हो सकी। ऐसा तब होता है जब जहाज अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर देते हैं। कई बार जहाज का AIS डेटा केप्लर के तय ईरानी या ओमानी रास्तों से मेल भी नहीं खाता। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि जहाज वास्तव में किस रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों में भी ईरानी रास्ता आगे 1 से 19 अगस्त के बीच कुल 236 जहाज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें तेल और गैस के अलावा सूखा माल और रसायन ले जाने वाले जहाज भी शामिल थे। यानी हर 10 में से 6 से ज्यादा जहाज किस रास्ते से गुजरे, यह साफ तौर पर पता नहीं चल सका। जहाज AIS क्यों बंद कर रहे हैं? युद्ध शुरू होने के बाद ईरान और अमेरिका दोनों ने अपने बताए समुद्री रास्तों या नियमों का पालन नहीं करने वाले जहाजों को चेतावनी दी। कुछ मामलों में जहाजों पर हमले भी हुए। इसी वजह से कई जहाज अपना ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं। इससे उनकी सही स्थिति और वे किस रास्ते से जा रहे हैं, इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। ब्रिटेन के थिंक टैंक चैथम हाउस के एसोसिएट फेलो नील क्विलियम ने अल जजीरा से कहा कि ट्रांसपोंडर बंद करने से जहाज की आवाजाही कम दिखाई देती है। हालांकि, इससे समुद्री सुरक्षा का खतरा भी बढ़ जाता है। उनके मुताबिक, कुछ जहाज कंपनियां खतरे के बावजूद अपना कारोबार जारी रखना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे होने वाला फायदा जोखिम से ज्यादा है। रास्ते में जहाजों के बीच सामान भी बदला जा रहा ट्रांसपोंडर बंद करने की एक वजह समुद्र में दो जहाजों के बीच सामान का ट्रांसफर भी है। एनर्जी एक्सपर्ट मार्क अयूब ने अल जजीरा से कहा कि सऊदी अरब, इराक और कुवैत समेत कुछ खाड़ी देशों ने ओमानी रास्ते से कुछ खेप भेजीं। इसके लिए कुछ जहाजों की ट्रैकिंग बंद की गई और रास्ते में दूसरे जहाजों को माल सौंपा गया। उनके मुताबिक, कुछ ईरानी जहाज भी ओमानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका मकसद प्रतिबंधों और अमेरिकी नाकाबंदी से बचना है। क्या आंकड़े ईरान के दबदबे की ओर इशारा कर रहे हैं? 148 जहाजों का रास्ता साफ नहीं होने की वजह से यह तय करना मुश्किल है कि वास्तव में कितने जहाज ईरानी या ओमानी रास्ते से गुजरे। फिर भी उपलब्ध आंकड़ों से एक बात सामने आती है। अमेरिकी नाकाबंदी और ट्रम्प की धमकियों के बावजूद हर पांच में से एक जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों को मिलाकर देखें तो 35% जहाजों ने सार्वजनिक रूप से ईरानी रास्ते का इस्तेमाल किया। इसके मुकाबले ओमानी या पुराने रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम रही। इससे संकेत मिलता है कि कई जहाज अमेरिकी धमकियों के बावजूद ईरानी रास्ते का इस्तेमाल करने को तैयार हैं। यानी मौजूदा हालात में ईरान को नाराज करने का डर ट्रम्प की धमकियों से ज्यादा असरदार दिखाई दे रहा है। होर्मुज दुनिया के लिए इतना अहम क्यों है अमेरिका-इजराइल का ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के तेल और एलएनजी की करीब एक-पांचवीं सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती थी। तब हर दिन करीब 130 जहाज यहां से गुजरते थे। इसके मुकाबले अगस्त के 19 दिनों में कुल 236 जहाज ही यहां से गुजरे। ईरान ने मार्च की शुरुआत में स्ट्रेट बंद कर दिया था और सिर्फ अपने मित्र देशों के जहाजों को गुजरने दिया। 17 जून को अमेरिका के साथ MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद भी यह जलमार्ग दोनों देशों की बातचीत का सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। इस संकट का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ा। संघर्ष शुरू होने से पहले ब्रेंट कच्चा तेल करीब 66 डॉलर प्रति बैरल था। मार्च में यह 119 डॉलर तक पहुंच गया। बाद में कीमत घटी, लेकिन तनाव बढ़ने के साथ फिर चढ़ गई। गुरुवार सुबह ब्रेंट कच्चा तेल 92.9 डॉलर प्रति बैरल पर था। नील क्विलियम के मुताबिक, अगर जहाजों की आवाजाही पर तेहरान का असर कम होता हुआ माना गया, तो अमेरिका के साथ बातचीत में दबाव बनाने का ईरान का एक अहम हथियार कमजोर पड़ सकता है। —————————- यह भी पढ़ें….. ट्रम्प बोले-आर्थिक हमले से ईरान को दुनिया से काट देंगे: जो देश ईरान का साथ देंगे, वे नतीजे भुगतने के लिए तैया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

चीन बोला-जापान के पास 5500 परमाणु बम बनाने जितना प्लूटोनियम:राजदूत ने कहा- चाहे तो कभी भी परमाणु हथियार बना सकता है

चीन ने जापान की परमाणु क्षमता को लेकर चिंता जताई है। रूस में चीन के राजदूत झांग हानहुई ने दावा किया कि जापान के पास करीब 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम है। उनके मुताबिक, इतनी मात्रा से सैद्धांतिक तौर पर करीब 5,500 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। झांग ने रूसी सरकारी समाचार एजेंसी तास से बातचीत में कहा कि जापान के पास इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करके उसमें से प्लूटोनियम निकालने की तकनीक भी है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि जापान के पास 5,500 परमाणु हथियार हैं। यह चीन की ओर से प्लूटोनियम की मात्रा के आधार पर लगाया गया सैद्धांतिक अनुमान है। जापान ने परमाणु हथियार रखने या बनाने की नीति नहीं अपनाई है। प्लूटोनियम क्या होता है और जापान के पास इतना कैसे आया? प्लूटोनियम एक रेडियोऐक्टिव तत्व है। यह परमाणु रिएक्टर में यूरेनियम के इस्तेमाल के दौरान बनता है। इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करके इसमें से प्लूटोनियम अलग किया जा सकता है। जापान के पास इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करने की तकनीक है। वह परमाणु ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किए गए ईंधन को दोबारा संसाधित करके उसमें से प्लूटोनियम निकालता रहा है। इसी वजह से कई दशकों में जापान के पास प्लूटोनियम का बड़ा भंडार जमा हुआ है। जापान के पास कुल कितना प्लूटोनियम है? झांग हानहुई के मुताबिक, 2024 के अंत तक जापान के पास करीब 44.4 टन अलग किया हुआ प्लूटोनियम था। इसके अलावा करीब 191 टन ऐसा प्लूटोनियम भी बताया गया है, जो अभी इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन से अलग नहीं किया गया है। दोनों आंकड़ों में अंतर समझना जरूरी है। 44.4 टन वह प्लूटोनियम है जिसे ईंधन से अलग किया जा चुका है, जबकि 191 टन अभी ईंधन में मौजूद बताया गया है। चीन का 5,500 परमाणु हथियारों वाला दावा 44.4 टन अलग किए गए प्लूटोनियम की मात्रा पर आधारित है। इसे जापान के पास मौजूद तैयार परमाणु हथियारों की संख्या नहीं माना जा सकता। चीन जापान को लेकर चिंतित क्यों है? चीन के राजदूत ने कहा कि जापान परमाणु अप्रसार संधि यानी NPT का मेंबर है और उसके पास परमाणु हथियार नहीं हैं। लेकिन जापान के पास इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करके प्लूटोनियम निकालने की तकनीक है। झांग के मुताबिक, अगर जापान कभी परमाणु हथियार बनाने का फैसला करता है और उसके पास इसके लिए जरूरी क्षमता होती है, तो उसके लिए परमाणु हथियार बनाने की संभावना सिर्फ कल्पना नहीं रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर टोक्यो परमाणु हथियार बनाने का फैसला करता है तो इससे पूर्वोत्तर एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है और इलाके में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, ये चीनी राजदूत के दावे और आशंकाएं हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि जापान परमाणु हथियार बनाने की तैयारी कर रहा है। जापान की परमाणु नीति क्या है? जापान की परमाणु नीति उसके तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों पर आधारित है। इनकी घोषणा 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ईसाकु सातो ने की थी। बाद में 1971 में जापानी संसद ने इन्हें अपनाया। इन सिद्धांतों के तहत जापान ने तय किया है कि वह: इन सिद्धांतों के पीछे हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमलों का गहरा असर भी माना जाता है। जापान में परमाणु हथियारों को लेकर लंबे समय से विरोध रहा है। ये तीन सिद्धांत कानून नहीं हैं, लेकिन कई दशकों से जापान की सुरक्षा और परमाणु नीति का अहम हिस्सा बने हुए हैं। प्लूटोनियम होने का मतलब परमाणु हथियार होना नहीं जापान के पास बड़ी मात्रा में प्लूटोनियम होने और उसके पास परमाणु हथियार होने में बड़ा अंतर है। प्लूटोनियम एक ऐसा पदार्थ है जिसका इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी होता है। किसी देश के पास इसका भंडार होने से यह साबित नहीं होता कि वह परमाणु हथियार बना रहा है। इसी तरह, चीन का 5,500 हथियारों वाला आंकड़ा भी जापान के पास मौजूद परमाणु हथियारों की संख्या नहीं है। यह 44.4 टन अलग किए गए प्लूटोनियम की मात्रा के आधार पर लगाया गया सैद्धांतिक अनुमान है। इसलिए फिलहाल जापान को परमाणु हथियार संपन्न देश कहना सही नहीं होगा। चीन की चिंता मुख्य रूप से जापान के पास मौजूद प्लूटोनियम और भविष्य में उससे परमाणु हथियार बनाने की संभावित क्षमता को लेकर है। —————————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले-आर्थिक हमले से ईरान को दुनिया से काट देंगे: जो देश ईरान का साथ देंगे, वे नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने समझौते का मौका गंवा दिया है। अब उसे आर्थिक तौर पर अलग-थलग किया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…

कॉमेडियन के टिकट बेचने वाले फेडोरोव अब जेलेंस्की के खिलाफ:यूक्रेन में राष्ट्रपति चुनाव की मांग तेज, पढ़िए दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता के 4 किस्से

यूक्रेन के पूर्व रक्षा मंत्री मिखाइलो फेडोरोव (35) ने युद्ध के बीच चुनाव कराने की मांग कर राष्ट्रपति जेलेंस्की को सीधी चुनौती दी है। उन्होंने कहा, ‘रूस को यह तय करने का अधिकार नहीं कि यूक्रेन के लोग अपनी सरकार कब चुनेंगे। लोकतंत्र को बंधक नहीं बनाया जा सकता।’ 2022 से मार्शल लॉ के कारण यूक्रेन में चुनाव नहीं हुए हैं। कभी जेलेंस्की के करीबी रहे फेडोरोव अब उनके खिलाफ खड़े हैं। इसी बीच जेलेंस्की के दफ्तर से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों पर भ्रष्टाचार की जांच शुरू हुई है। पढ़िए यूक्रेन के दूसरे बड़े चर्चित नेता फेडोरोव के किस्से… फेसबुक से युवाओं को जोड़ा फेडोरोव 2012 में छात्र राजनीति के दौरान जपोरिज्जिया के स्टूडेंट मेयर चुने गए। युवाओं को जोड़ने के लिए उन्होंने एक्टिव-जेड संगठन बनाया, लेकिन फंड की कमी बड़ी चुनौती थी। उन्होंने फेसबुक पर विज्ञापनों के जरिए युवाओं तक पहुंच बनाई और धीरे-धीरे हजारों छात्र उनके अभियानों से जुड़ने लगे। तब यह तरीका छात्र राजनीति तक सीमित था, लेकिन यही डिजिटल सोच आगे चलकर उनकी पहचान बन गई। जेलेंस्की ने अपनी टीम में शामिल किया 22 की उम्र में ही फेडोरोव ने डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी शुरू की। उस दौरान जेलेंस्की कॉमेडियन थे। तब फेडोरोव की टीम को जेलेंस्की के शो के प्रचार का काम मिला। फेडोरोव ने सोशल मीडिया पर विज्ञापन चलवाकर शो के खूब टिकट बिकवाए और वहां पहली बार भीड़ उमड़ी। इससे जेलेंस्की प्रभावित हुए। कुछ साल बाद उन्होंने फेडोरोव को अपनी टीम में शामिल कर लिया। 2019 में फेडोरोव ने उनके ऑनलाइन चुनाव प्रचार की कमान संभाली और जीत में अहम भूमिका निभाई। बाद में उन्हें डिप्टी पीएम बनाया। अफसर के कहे असंभव काम को संभव बना दिया 2019 में डिप्टी पीएम व आईटी मंत्री रहते फेडोरोव ने सरकारी कामों को कागजों से निकालकर स्मार्टफोन तक लाने की योजना बनाई। डिजिटल पासपोर्ट का प्रस्ताव सुनकर स्टेट माइग्रेशन सर्विस का प्रमुख नाराज हो गया। उसने कहा, यह पूरी तरह असंभव है। फेडोरोव नहीं रुके। उन्होंने डिजिटल सिस्टम तैयार कराया और ई-पासपोर्ट लॉन्च किया। बाद में सरकारी सेवाओं को ई-प्लेटफॉर्म पर लाए। टकराव के बाद कुर्सी गई डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन मंत्री रहते फेडोरोव ने यूक्रेनी आर्मी की कायापलट कर दी। सेना में ड्रोन, एआई और डेटा के इस्तेमाल पर जोर दिया। हालांकि उनका काम करने का तरीका पुराने सैन्य ढांचे से अलग था। सेना के कमांडर ओलेक्सांद्र सिरस्की से मतभेद हुआ। 6 महीने बाद इसी जुलाई में फेडोरोव को रक्षा मंत्री पद से हटा दिया गया। तभी से जेलेंस्की-फेडोरोव में मतभेद हैं। जेलेंस्की से आगे, रेटिंग में यूक्रेन के दूसरे चर्चित नेता कीव इंस्टीट्यूट ऑफ सोशियोलॉजी की सर्वे में 63% यूक्रेनियनों ने फेडोरोव पर भरोसा जताया। वे दूसरे बड़े लोकप्रिय नेता हैं। 66% पसंद के साथ पूर्व सेना प्रमुख वालेरी जालुज्नी पहले पायदान पर हैं। किरिलो बुदानोव को 61% और राष्ट्रपति जेलेंस्की पर 56% लोगों का भरोसा मिला। जनवरी की तुलना में फेडोरोव की स्वीकार्यता 38% से बढ़कर 63% हुई।

कनाडा में नमकीन खाते ही करनाल के युवक का हार्टफेल:गर्भवती पत्नी संग सैर पर निकला था; बहू की डिलीवरी के लिए विदेश जाने वाले थे परिजन

कनाडा में रह रहे हरियाणा के करनाल के एक 27 वर्षीय युवक की अचानक हार्ट फेल होने से मौत हो गई। युवक अपनी गर्भवती पत्नी के साथ सैर पर निकला था। इसी दौरान उसने एक दुकान से लेकर नमकीन खाई, जिसके बाद अचानक उसकी तबीयत खराब हो गई। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने डेड डिक्लेयर कर दिया। परिवार के मुताबिक, युवक को कनाडा की नागरिकता (PR) मिल चुकी थी। उसकी पत्नी 7 माह की गर्भवती है। दोनों की करीब दो साल पहले शादी हुई थी। दोनों अपने आने वाले बच्चे को लेकर बेहद खुश था, अचानक खुशियां गम में बदल गईं। बेटे की मौत की खबर के बाद से दोनों परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। अब शव को भारत लाने के प्रयास शुरू हो गए हैं। बताया गया कि गुरुवार को कनाडा में पोस्टमॉर्टम हुआ। कपल के कई रिश्तेदार कनाडा और अमेरिका से मौके पर पहुंचे हैं। 9 साल पहले स्टडी वीजा पर गया कनाडा करनाल के गांव नरूखेड़ी के गुरमेल नरवाल का बेटा रजत वर्ष 2017-18 में स्टडी वीजा पर कनाडा गया था। परिजन दिलबाग ने बताया कि रजत वहां पढ़ाई के साथ प्लंबरिंग का काम भी करता था। वह काफी मेहनती थी और उसे स्थाई नागरिकता (PR) मिल गई थी। फिलहाल वह कनाडा के ब्रैम्पटन, ओंटारियो में रह रहा था। रजत का भाई पम्मी भी वर्ष 2017-18 में अमेरिका गया था और वहां काम करता है। शादी के 2 माह बाद पत्नी को कनाडा ले गया रजत की शादी 4 जनवरी 2025 को पानीपत के मॉडल टाउन निवासी अक्षिता के साथ हुई थी। शादी के करीब दो महीने बाद ही वह पत्नी को लेकर कनाडा चला गया। अक्षिता अभी सात महीने की गर्भवती है। रजत और अक्षिता अपने होने वाले बच्चे को लेकर बेहद उत्साहित थे। अकसर परिवार के साथ होने वाले बच्चे की परवरिश को लेकर चर्चा करते थे। परिजनों के अनुसार, रजत ने मौत से एक दिन पहले ही अपनी मां सुनीता से फोन पर बात की थी। उसने परिवार को बताया था कि सब ठीक-ठाक है। सैर पर निकले थे कपल, तबीयत खराब हुई परिजनों ने बताया कि 18 अगस्त की शाम दोनों रोजाना की तरह सैर पर निकले थे। इस दौरान नमकीन खाने का मन हुआ तो एक दुकान से नमकीन ली। रजत ने जैसे ही नमकीन खाई, अचानक उसकी तबीयत खराब होने लगी। पत्नी घबरा गई। उसकी हालत बिगड़ती देखकर आसपास के लोग मौके पर जुटे और अस्पताल पहुंचाने में मदद की। परिजन दिलबाग के अनुसार, अस्पताल पहुंचने तक रजत का शरीर नीला पड़ चुका था। डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। परिवार का कहना है कि मौत का कारण हार्ट फेल्योर बताया गया है। बहन ने फोन पर दी परिवार को खबर रजत की चचेरी बहन अंशुल भी कनाडा में रहती है। उसने फोन कर परिवार को घटना की जानकारी दी। अचानक उसकी मौत की खबर आने से माता-पिता गुरमेल और सुनीता का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। रजत का भाई पम्मी भी मौत की सूचना मिलने के बाद वह अपने साथियों के साथ अमेरिका से कनाडा पहुंचा है। परिवार ने अब रजत का शव भारत लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। माता-पिता भी जाने वाले थे कनाडा परिजनों ने बताया कि अक्षिता सात महीने की गर्भवती होने के कारण रजत के माता-पिता को भी कनाडा जाना था, ताकि वे उसकी देखभाल में साथ रह सकें। दोनों के पासपोर्ट रिन्यू होने के लिए गए हुए थे। पासपोर्ट मिलते ही उन्हें कनाडा रवाना होना था, लेकिन इससे पहले ही रजत की मौत हो गई। परिवार के लोग अब शव भारत लाने की तैयारी में जुटे हैं। इस दुखद घटना से पूरे गांव में शोक का माहौल है। —————— ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका में करनाल के युवक की मौत:5 साल पहले काम करने गया था, परिजन कर रहे शव को भारत लाने का प्रयास करनाल के चोरकारसा गांव के एक युवक की अमेरिका में हार्ट अटैक से मौत हो गई। युवक पांच साल पहले बेहतर भविष्य के लिए अमेरिका गया था और वहीं ग्रीन कार्ड होल्डर बनकर काम कर रहा था। अचानक तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। (पूरी खबर पढ़ें)

अमेरिका गल्फ देशों से सैनिकों को कम कर सकता है:ईरान जंग के चलते फैसला, यहां 20 सैन्य ठिकानों पर 40 हजार सैनिक तैनात

अमेरिका गल्फ देशों में मौजूद सैनिकों की संख्या कम कर सकता है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इसकी बड़ी वजह ईरान के साथ जारी युद्ध है। इस युद्ध में अमेरिका की 200 से ज्यादा सैन्य फैसिलिटी को नुकसान पहुंचा है। गल्फ देशों से मतलब फारस की खाड़ी के आसपास स्थित देश हैं। इसमें मुख्य रूप से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान, इराक, ईरान शामिल हैं। इस मामले में अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। अमेरिका आमतौर पर जॉर्डन से लेकर ओमान तक फैले करीब 20 सैन्य ठिकानों पर लगभग 40 हजार सैनिक तैनात रखता है। बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है, जबकि कुवैत, कतर और अन्य खाड़ी देशों में अमेरिकी सेना और वायुसेना की बड़ी मौजूदगी है। मार्च में कुवैत स्थित एक सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत भी हुई थी। खबर अपडेट की जा रही है…. —————————– यह भी पढ़ें….. ट्रम्प का ईरान पर सबसे बड़े आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान: बोले- जो देश मदद करेंगे, उन पर भी एक्शन लेंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

अमेरिका गल्फ देशों से सैनिकों को कम कर सकता है:ईरान जंग के चलते फैसला, यहां 20 सैन्य ठिकानों पर 40 हजार सैनिक तैनात

ईरान के साथ युद्ध के बाद अमेरिका फारस की खाड़ी (गल्फ) में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करने पर विचार कर रहा है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन समीक्षा कर रहा है कि क्या अब गल्फ देशों में पहले जितने अमेरिकी सैनिक रखने की जरूरत है। इसकी बड़ी वजह युद्ध में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुआ भारी नुकसान है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान 200 से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सुविधाएं क्षतिग्रस्त या तबाह हुई हैं। फिलहाल अमेरिका जॉर्डन से लेकर ओमान तक फैले करीब 20 सैन्य ठिकानों पर लगभग 40 हजार सैनिक तैनात रखता है। हालांकि, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। पेंटागन, ज्वाइंट स्टाफ और अमेरिकी सेंट्रल कमांड मिलकर यह आकलन कर रहे हैं कि युद्ध के बाद मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य तैनाती कैसी होनी चाहिए। गल्फ में अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य ठिकाने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है। वहीं कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और दूसरे गल्फ देशों में अमेरिका के बड़े सैन्य ठिकाने हैं। अमेरिका कई दशकों से इन सैन्य ठिकानों के जरिए मिडिल ईस्ट में अपने सैन्य अभियान चलाता रहा है और क्षेत्र के सहयोगी देशों की सुरक्षा में मदद करता रहा है। ईरानी हमलों के बाद बदली रणनीति ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने मिसाइल और ड्रोन हमलों की जद में आए। मार्च में कुवैत के एक सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में 6 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध में 200 से ज्यादा अमेरिकी मिलिट्री फैसिलिटी को नुकसान पहुंचा। इस दौरान कुल 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। ईरान के हमलों से बचाव के लिए अमेरिकी सेना को 1000 से ज्यादा एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ीं। इससे पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम के मिसाइल भंडार पर दबाव बढ़ गया। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि भविष्य में ऐसे हमलों का खतरा कम करने के लिए सैनिकों और सैन्य उपकरणों की तैनाती पर दोबारा विचार करना जरूरी है। सैनिकों को दूसरी जगह भेजने पर विचार पेंटागन में इस समय कई प्रस्तावों पर चर्चा चल रही है। इनमें गल्फ देशों से कुछ सैनिकों और सैन्य उपकरणों को जॉर्डन, इजराइल या सऊदी अरब के रेड सी (लाल सागर) तट के करीब तैनात करने का सुझाव दिया गया है। अधिकारियों का मानना है कि ये इलाके ईरान की सीधी मिसाइल और ड्रोन पहुंच से अपेक्षाकृत ज्यादा सुरक्षित हो सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सैनिकों की तैनाती को लेकर ट्रम्प सरकार के भीतर भी अलग-अलग राय है। एक पक्ष चाहता है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करे और संसाधनों का ज्यादा इस्तेमाल घरेलू सुरक्षा तथा चीन से मुकाबले पर करे। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि गल्फ देशों और इजराइल में मजबूत अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बनाए रखना जरूरी है, ताकि क्षेत्र में अमेरिका का प्रभाव कायम रहे। इजराइल में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का भी प्रस्ताव एक प्रस्ताव में कुवैत समेत कुछ गल्फ देशों से सैनिकों और सैन्य उपकरणों को इजराइल के ओवदा एयरबेस भेजने की बात भी कही गई है। हालांकि, इस प्रस्ताव का प्रशासन के भीतर विरोध भी हो रहा है। कुछ अधिकारियों का कहना है कि इजराइल में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ने से संवेदनशील खुफिया जानकारी की सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है। गल्फ देशों पर भी पड़ेगा असर अगर अमेरिका गल्फ देशों से बड़ी संख्या में अपने सैनिक हटाता है, तो इसका सबसे ज्यादा असर वहां के सिक्योरिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पड़ेगा। साथ ही, पूरे मिडिल ईस्ट के सुरक्षा समीकरण भी बदल सकते हैं। दशकों से सऊदी अरब, UAE, कतर, कुवैत, बहरीन और दूसरे खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर निर्भर रहे हैं। सैनिकों की संख्या कम होने पर इन देशों को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ानी पड़ सकती है या नए सुरक्षा साझेदार तलाशने पड़ सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं होगा कि दोनों पक्षों के सुरक्षा संबंध खत्म हो जाएंगे। हथियारों की खरीद, खुफिया जानकारी साझा करने और सैन्य सहयोग जैसी व्यवस्थाएं पहले की तरह जारी रह सकती हैं। सितंबर तक 3.6 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान पेंटागन का अनुमान है कि सितंबर के अंत तक ईरान युद्ध पर अमेरिका का खर्च 37.5 अरब डॉलर (करीब 3.6 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच सकता है। इस अनुमान में क्षतिग्रस्त सैन्य ठिकानों को दोबारा बनाने का खर्च शामिल नहीं है। इसलिए अमेरिका अब सिर्फ उनकी मरम्मत पर नहीं, बल्कि यह भी तय कर रहा है कि सभी ठिकानों को पहले की जगह फिर से बनाया जाए या कुछ को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाए। अमेरिका ने गल्फ देशों में सैन्य ठिकाने क्यों बनाए? 1. तेल और गैस की सप्लाई सुरक्षित रखने के लिए:
दुनिया के बड़े हिस्से को तेल और गैस फारस की खाड़ी से मिलती है। अमेरिका चाहता है कि इन समुद्री रास्तों में कोई बाधा न आए। 2. ईरान की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए:
1979 की ईरानी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। गल्फ में मौजूद सैन्य ठिकाने अमेरिका को ईरान की सैन्य गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करते हैं। 3. सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए:
सऊदी अरब, UAE, कुवैत, कतर और बहरीन लंबे समय से अमेरिका के रणनीतिक साझेदार रहे हैं। अमेरिकी सैन्य ठिकाने इन देशों की सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। 4. मिडिल ईस्ट में सैन्य अभियानों के लिए:
इराक, अफगानिस्तान और ISIS के खिलाफ अभियानों में अमेरिका ने इन्हीं सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया है। —————————– यह भी पढ़ें….. ट्रम्प का ईरान पर सबसे बड़े आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान: बोले- जो देश मदद करेंगे, उन पर भी एक्शन लेंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…