
जब आप किसी मेडिकल स्टोर पर कोई दवा खरीदने जाते हैं, आप दवाओं का सिर्फ एक डोज चाहते हैं, मसलन, आपको सिर्फ 3 टेबलेट चाहिए, लेकिन मेडिकल संचालक आपको टेबलेट का पूरा स्ट्रिप थमा देता है। यानी आपको चाहिए सिर्फ 3 टेबलेट, लेकिन खरीदना पड़ती है 10 गोलियां। यह भारत में ज्यादातर मरीजों के साथ होता है।
इसके लिए सरकार में दवाओं की पैकेजिंग और उन पर बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट की प्रिंटिंग को लेकर बदलाव की योजना बनाई थी, लेकिन वो अब तक लागू नहीं हो सकी है, नतीजा यह है कि आज भी मरीजों को दो गोली की जगह मेडिसिन का पूरा पत्ता यानी स्ट्रिप खरीदना पड़ रही है। अगर ऐसा होता है तो इसमें भी एक अलग समस्या पैदा हो सकती है। केमिस्टों का मानना है कि पैकेजिंग बदलेगी तो उसका बोझ भी मरीजों की जेब पर आएगा।
मरीज की मजबूरी : दरअसल, नियम यह है कि कानूनी रूप से आपको या किसी भी मरीज को मेडिकल संचालक पूरी स्ट्रिप लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, लेकिन इसके पीछे कुछ तकनीकी खामियां हैं, जिसकी वजह से केमिस्ट वाले ऐसा करने के लिए मजबूर हैं। जानते हैं क्या हैं दवाओं को खरीदने के नियम और सरकार इस लूपहोल से निपटने के लिए क्या योजना बना रही है।
मरीजों के साथ क्यों हो रहा ऐसा : दरअसल, दवाओं पर उनकी बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट छपी होती है। स्ट्रिप को काटकर उसमें से कुछ ही गोलियां निकालने पर स्ट्रिप के एक हिस्से में यह जानकारी नहीं मिल पाती है, क्योंकि यह जानकारी स्ट्रिप के एक ही हिस्से में लिखी होती है। जबकि ग्राहक के लिए यह जानना जरूरी है कि जो दवा वो खरीद रहा है, उनकी बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट क्या है। केमिस्ट स्ट्रिप पर लिखी जानकारी मिटने और नुकसान के डर से ऐसा करते हैं। हालांकि, नियमों में सख्ती और नई पैकेजिंग आने के बाद यह समस्या जल्द ही पूरी तरह खत्म होने का दावा किया जा रहा है।
किन वजहों से केमिस्ट ऐसा करते हैं?
जानकारी गायब होने का डर : दरअसल, दवा की स्ट्रिप के पीछे बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट छपी होती है। अगर केमिस्ट स्ट्रिप को बीच से काट कर दो गोलियां दे देता है, तो बाकी बची स्ट्रिप से यह जरूरी जानकारी गायब हो सकती है। बिना एक्सपायरी डेट या लेबल वाली दवाएं रखना या बेचना ड्रग नियमों के खिलाफ माना जाता है।

दवा कंपनियों का नियम: दवा कंपनियों और डिस्ट्रीब्यूटर्स का यह नियम होता है कि वे केवल पूरी और बिना कटी हुई स्ट्रिप ही वापस (Return) लेते हैं। अगर मेडिकल स्टोर वाला कोई धीमी बिकने वाली दवा (Slow-moving drug) काट कर दे देता है और बची हुई दवाएं एक्सपायर हो जाती हैं, तो कंपनी उसे वापस नहीं लेती। इसका पूरा आर्थिक नुकसान छोटे मेडिकल स्टोर संचालक को उठाना पड़ता है।
दवाइयों की बर्बादी: कुछ दवाइयां बहुत कम बिकती हैं (स्लो मूविंग ड्रग्स)। उनकी कटी हुई स्ट्रिप दुकान में महीनों पड़ी रह सकती है और अंत में केमिस्ट को उसे फेंकना पड़ता है।
पूर्व सिविल सर्जन डॉ प्रवीण जड़िया ने बताया कि तकनीकी खामियों और इन वजह से मरीज की जेब पर होने वाले भार और मेडिसिन की पूरी जानकारी भी बरकरार रखने के इरादे के साथ ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) और उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय इस समस्या को खत्म करने के लिए नए नियमों पर काम की योजना तो बनाई थी, हालांकि उस पर अब तक कुछ हो नहीं सका है।
क्या कहते हैं मेडिकल संचालक और केमिस्ट : दरअसल, इस पूरे मसले में तकनीकी खामी है। कुछ केमिस्ट संचालकों का कहना है कि स्ट्रिप की हर गोली पर क्यूआर कोड और बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट प्रिंट करना संभव नहीं है। अगर ऐसा होता है तो पैकेजिंग में कई तरह के बदलाव करना होगा। यह दवा कंपनियों के लिए एक महंगा सौदा साबित होगा। ऐसे में दवा कंपनियां मेडिसिन के दाम बढाएगी और उसका बोझ मरीज की ही जेब पर पड़ेगा।
लंबी बीमारी में तो ठीक, आम बीमारियों में बोझ : दरअसल, लाइफ लॉन्ग बीमारियां जैसे शूगर हार्ट, बीपी ओर कैंसर में तो मरीज दो महीने या तीन महीने के डोज खरीदता ही है, लेकिन आम बीमारियों के इलाज में लगने वाली दवाओं को खरीदने में मरीज पर बोझ बरकरार है, क्योंकि आम शिकायतों में मरीज को 2 या तीन डोज लेना होते हैं।
इस नई योजना पर चल रहा काम: सटीक मात्रा बेचने का प्रस्ताव (Exact Quantity Dispensing): DCGI ने एक नए नियम का प्रस्ताव रखा है जिसके तहत फार्मासिस्टों को उतनी ही दवाएं काट कर देनी होंगी, जितनी डॉक्टर के पर्चे पर लिखी हैं।
हर गोली पर QR कोड और जानकारी: पैकेजिंग टेक्नोलॉजी में बदलाव के सुझाव दिए गए हैं ताकि हर एक सिंगल टैबलेट या कैप्सूल के पीछे या उसकी पैकेजिंग पर एक्सपायरी डेट, बैच नंबर और QR कोड अंकित हो। इससे पत्ता काटने पर भी जानकारी सुरक्षित रहेगी।
परफोरेशन्स (Perforation) तकनीक: दवा कंपनियों को ऐसी स्ट्रिप्स बनाने की सलाह दी जा रही है, जिन्हें बिना कैंची के आसानी से सिंगल यूनिट में अलग किया जा सके।
केमिस्ट और मरीज के बीच विवाद: नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन (NCH) के मुताबिक इस तरह की शिकायतों की संख्या में तेजी आई है। NCH को कंज्यूमर अफेयर्स मिनिस्ट्री रन करती है। इससे मिले आंकड़ों के आधार पर ही मिनिस्ट्री विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रही है। मंत्रालय ने हाल में फार्मा और मेडिकल डेवाइसेज इंडस्ट्री के नुमाइंदों के साथ सलाह-मशविरा किया था। इसमें ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) के टॉप अधिकारी भी शामिल हुए। क्योंकि अक्सर केमिस्ट और मरीज के बीच इसे लेकर विवाद हो रहे हैं।