Hero Pleasure+ price and variants explained

Hero Pleasure+ Xtec: Price and Variants explained

The Pleasure+ is one of Hero’s longest-running scooters on sale. It is also the brand’s most affordable scooter and is available in three variants. Here’s a feature breakdown of those variants.

The Pleasure+ Xtec is available in three variants

LX 

All three variants are mechanically identical and powered by the same 109.5cc single-cylinder air-cooled engine. The differences between them are limited to features and equipment.

The LX is the base variant of the Pleasure+. It rides on steel wheels instead of cast alloy wheels and does not get telescopic front suspension. This variant also misses out on Hero’s i3S idle start-stop system and Bluetooth connectivity.

It features a fully analogue instrument cluster and a halogen headlight. While chrome fascia and accents are present, it does not offer a pillion backrest. The inner panel is also finished in black.

The Base LX variant of the Pleasure+ is priced at Rs 69,766 (ex-showroom, Delhi).

VX

The VX sits above the LX and adds telescopic front suspension along with cast alloy wheels. It also gets the i3S idle start-stop system.

The instrument cluster is a digi-analogue unit, but Bluetooth connectivity is still not offered. Lighting duties continue to be handled by a halogen headlight. Like the LX, it does not get a pillion backrest, and the inner panel remains black with chrome accents.

At Rs 72,779, the VX commands a premium of Rs 3,013 over the LX for the added equipment.

XTEC ZX 

The XTEC ZX is the top-spec variant in the Pleasure+ line-up. It gets telescopic suspension, cast alloy wheels and the i3S system, similar to the VX.

In addition, it features Bluetooth connectivity paired with a fully digital instrument cluster. It also gets a projector LED headlamp and a dual-textured inner panel finish. This is the only variant to offer a pillion backrest.

At Rs 77,162, the XTEC ZX costs Rs 4,383 more than the VX and Rs 7,396 more than the LX, positioning it as the most feature-rich version in the range.
 

ईरान युद्ध से अमेरिका का सुपर पॉवर तमगा डगमगाया

Iran US War: अहंकार की लड़ाई जब दो व्यक्तियों में हो तो दो परिवार प्रभावित या बरबाद होते हैं, लेकिन जब ये दो देशों के बीच हो तो समूचा विश्व प्रभावित होता है और टकराने वाले दोनों ही देश बरबाद हो सकते हैं। रूस-यूक्रैन में टकराव तो 2014 से ही प्रारंभ हो गया था, किंतु पूर्णकालिक युद्ध 24 फरवरी 2022 से शुरू हुआ, जिसमें सीधे दोनों ने मैदान पकड़ लिया है, जिसमें अभी तक कोई कमजोर पड़ता नहीं दिखाई देता। इसी तरह से अमेरिका-वियतनाम के बीच 1955 में शुरू हुआ युद्ध 1975 में समाप्त हो सका था, वह भी अमेरिका सेना के पीछे हट जाने से। पीछे तो उसे अफगानिस्तान से भी हटना पड़ा, लेकिन फटे में टांग अड़ाने का अब भी कोई मौका वह नहीं छोड़ता। ऐसा ही है ईरान के साथ अमेरिका व इजराइल का हालिया पंगा, जो गले की हड्‌डी बन अटका है।

 

इस समय पूरी दुनिया में एक ही चर्चा है कि मध्य पूर्व एशिया में हाल-फिलहाल शांति हो पायेगी या अमेरिका-इजराइल का ईरान के साथ युद्ध चलता रहेगा? इस लाख टके के सवाल का अभी तो एक भी सही जवाब देने का माद्दा किसी में नहीं है। इन युद्धरत देशों में भी। फिर भी अभी तक के हालात के परिप्रेक्ष्य में यह तो कहा ही जा सकता है कि ईरान ने ऐंठ दिखाकर और अमेरिका ने युद्ध छेड़कर अक्लमंदी तो नहीं की। इजराइल तो आजीवन युद्धरत रहा है तो उसकी तो दिनचर्या ही ऐसी हो चुकी है। फिर भी, वह भी तीसमारखां तो नहीं बन पाया। इतिहास इस कालखंड का जब निर्मम, बेबाक और वास्तविक तथ्यों पर आधारित विश्लेषण करेगा, तब समूची दुनिया के लिए वे ऐसे सबक होंगे, जो आगामी काल के लिए निर्णायक और विषम परिस्थितियों में सटीक फैसले लेने में सहायक होंगे।

 

कोई माने या न माने, यह अटल सत्य है कि सुपर पॉवर का तमगा लिए दुनिया के सामने इतराने वाले अमेरिका की बुरी गत हुई है। यह न तो उसके लिए न शेष विश्व के लिए अच्छा संकेत है। जिस आतंकवाद से समूची दुनिया थर्राती आई है, उसे नकेल डालने में जो भूमिका अमेरिका निभा सकता था, यह उस पर संशय खड़े करता है। हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि विश्व में आतंकवाद को पल्लवित करने में अमेरिका का प्रमुख हाथ रहा है। भले ही वह अपनी हथियार लॉबी की ब्लैकमेलिंग या ताकत के आगे झुककर फैसले लेते रहा हो। इक्कीसवीं सदी में अब जो आगे होगा, वह अमेरिका के एकाधिकार के खात्मे का इतिहास बनेगा। इसके लिए निर्विवाद रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ही दोषी करार दिए जाएंगे। 

 

बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में अभी तक इतना भ्रमित, विचलित, विवादास्पद, सनकी और तानाशाही के मिश्रित चरित्र वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प पर ठप्पा लगेगा कि उन्होंने अमेरिका के सुपर पॉवर की छवि वाली बंद मुट्‌ठी को अंगुलियां मरोड़कर खोल दिया। यह कोई मामूली बात नहीं है कि उनके अपने देश में 60 लाख लोग उनकी युद्ध नीति के खिलाफ सड़क पर उतर आए थे। वे भले ही कार्यकाल पूरा करें, लेकिन इतना तय जान लीजिए कि वे जितने समय व्हाइट हाउस में काबिज रहेंगे, उतना अधिक अमेरिका गर्त की ओर लुढ़केगा।

 

अब, जबकि कुछ दिन शांति के मिले हैं, तब दुनिया यह विश्लेषित करने में जुटी है कि आखिरकार इस युद्ध के भड़कने के कारण क्या थे? हम यह तो नहीं कह सकते कि ईरान निर्दोष है या ट्रम्प एकतरफा गलत हैं, लेकिन विभीषिका के इस स्वरूप की जरूरत तो बिल्कुल नहीं थी। जिन मुद्दों पर सीधे मिसाइलें दाग दी गईं, वे हलवे की तरह चट कर जाने वाले नहीं हैं। ईरान के पास परमाणु हथियारों के होने का अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिला है और न उसने किसी ऐसी वैश्विक आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली घटना को अंजाम दिया था, जो उसके खिलाफ जंग का एलान करवा दे। जो गलती अमेरिका ने अतीत में इराक के पास रासायनिक हथियार होने का कारण बताकर वहां अमेरिकी फौजें उतार कर की थी, वही उन्होंने ईरान के साथ करना चाहा। यह पासा इसलिए उलटा पड़ा कि ईरान के पास अस्त्र-शस्त्र का ऐसा विरल भंडार भरा था, जिसकी कल्पना अमेरिका समेत दुनिया में शायद ही किसी को रही होगी। यह तो अब पता चला कि उसने ऑइल मनी को चीन, रूस से हथियारों का जखीरा जमा करने के लिए उपयोग किया था। चूंकि दोनों ही देश अमेरिका के खिलाफ हैं तो स्वाभाविक रूप से ईरान से दोस्ती का हाथ बढ़ाना फायदेमंद ही रहना था। हो सकता है, होर्मुज के सामरिक व आर्थिक महत्व से भी वे परिचित रहे हों।

 

अमेरिका-ईरान के बीच पहली शांति वार्ता असफल होने के बाद दूसरी, तीसरी, चौथी होती रही, जो बेनतीजा ही कही जाएगी। ईरान-अमेरिका दोनों ही अब भी मोल-तौल करने की स्थिति में है। युद्ध विराम करने के बदले भी ईरान ने 10 सूत्री मांग पत्र थमाया था, जिस पर अमेरिका सहमत नहीं है। इसमें चार मांगें बेहद खास हैं, जिन पर ईरान अड़ा है और अमेरिका कतई तैयार नहीं है। ईरान खाड़ी देशों (सउदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन व जॉर्डन) से 25 लाख करोड़ रुपए का मुआवजा चाहता है, जिस पर अभी तो कोई सहमत नहीं।

 

दूसरा, वह होर्मुज से गुजरने वाले तेल जहाजों से प्रति बैरल एक डॉलर टोल चाहता है तो दूसरी तरफ अमेरिका होर्मुज पर खुद कब्जा चाहता है। अमेरिका ने सैन्य नाकाबंदी भी की, लेकिन चीन समेत अन्य जहाज वहां से सुरिक्षत निकल चुके हैं। तीसरा, ईरान परमाणु कार्यक्रम 5 साल तक रोकेगा, जबकि अमेरिका 20 साल तक इसे रोकना चाहता है। चौथा, युद्ध विराम में लेबनान भी शामिल रहेगा, जिस पर इजराइल को आपत्ति है। अब देखना दिलचस्प है कि बाजुओं का जोर दिखाने में किसकी रुचि है और कौन हाथ मिलाने को तैयार है।

 

इस युद्ध ने दुनिया के सामने एक और पहलू पर ध्यान दिलाया है। अब लड़ाई के लिए तोप-मिसाइलें, जल-थल-नभ सेना की मजबूती ज्यादा मायने नहीं रखती। यह दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स (एआई) का है, जिससे ड्रोन संचालित होते हैं। ये युद्ध की समूची दिशा बदलने में सक्षम है, जो ईरान ने कर दिखाया। यूक्रेन भी इसी बूते रूस को पानी पिला रहा है। अमेरिका-इजराइल की सबसे बड़ी चूक यही हुई कि वे मिसाइल हमले रोकने की व्यूह रचना करते रहे और ईरान ने छोटा बम, बड़ा धमाका की तर्ज पर ड्रोन हमले कर बड़े लक्ष्य भेद डाले। खाड़ी देशों में ईरानी ड्रोन ने जो कहर बरपाया है, उस नुकसान से उबरने में इन्हें 3 से 5 साल तक लगेंगे और अरबों डॉलर का खर्च होगा, वह अलग। ड्रोन हमलों की मार यूक्रैन दिखा चुका है, जिसने महाशक्ति रूस को नाको चने चबवा रखे हैं।

 

इस युद्ध से एक और तस्वीर साफ हुई कि अब अमेरिका अकेला सब कुछ नहीं कर सकता। जिस तरह से नाटो देशों ने उसका साथ देने से स्पष्ट इनकार किया, वह दुनिया के सामने बड़ी चेतावनी है। इसका संदेश साफ है कि प्रत्येक देश अब अपने हित-अहित पहले देखेगा, फिर पंचायत में उलझेगा। ट्रम्प की खीज ने यह बताया है कि वे मुगालते में थे कि मित्र देश ईरान पर टूट पड़ेंगे। यदि वाकई ऐसा होता तो रूस-यूक्रेन (5 वर्ष हो चुके हैं) की तरह यह भी अनिश्चित काल चलता रहता और रूस व चीन को भी हस्तक्षेप का मौका मिल जाता, जो पूरी दुनिया की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था को तहस-नहस करने की ओर ले जाता। इसकी विभीषिका तीसरे विश्व युद्ध के समान होती, जिसमें क्या-क्या गुल खिलते, कोई नहीं कह पाता।

 

सबसे प्रमुख बात-इसमें भारत की क्या स्थिति रही? उसने निष्पक्ष रहकर स्वयं को सुरक्षित रखा। जिसका नतीजा यह हुआ कि चलते युद्ध में गैस व तेल से भरे टैंकर आते रहे, वह ईरान से ही सात साल के लिए तेल खरीदने का समझौता कर सका और चीन के साथ उसके मालवाहक जहाज निकलते रहे। यह लड़ाई हमारी किसी भी तरह से नहीं थी, बावजूद इसके कि ऑपरेशन सिंदूर में ईरान ने पाकिस्तान को ड्रोन व हथियार दिए थे। इसके उलट हमारा तंत्र ईरान के समानांतर लोगों से बात करता रहा, जिसे ईरान ने सकारात्मक माना। भविष्य में इसके वास्तविक संदेश नजर आएंगे और काफी हद तक वे भारत के पक्ष में रहेंगे।

 

एक जो सबसे चिंताजनक बात उभरी है, वह यह कि ट्रम्प इसे गली-मोहल्ले के दादा-पहलवानों की तरह लड़ रहे हैं और पल-पल में उनकी बदलती रीति-नीति ने उलझनों को बढ़ाया ही है। वे कभी अपने हित साधने वाले व्यापारी हो जाते हैं तो कभी तानाशाह। कभी दुनिया को कदमों तले मानकर पेश आते हैं तो कभी जादूगर की तरह डमरू बजाकर मसले हल करने का दावा करते हैं। उनके विरोधाभासी चरित्र को यूं तो दुनिया ने टैरिफ लागू करते हुए बखूबी देख ही लिया है, लेकिन युद्ध जैसे संवेदनशील व दूरगामी मसलों में उनका रवैया बचकाना रहा, जो विश्व के लिये बड़े खतरे का आगाज है। उन्हें रोका नहीं गया तो इस दुनिया को ज्वालामुखी के लावे की तरह बहते देखना भी नसीब हो जाएगा।

Vedanta Oil & Gas का शेयर 20% भागा, समूह की बाकी तीन कंपनियों के शेयरों को भी लगे पंख

वेदांता लिमिटेड के डीमर्जर के बाद बनी चारों कंपनियों के शेयर 1 जुलाई को रॉकेट बन गए। वेदांता एल्युमीनियम, वेदांता आयरन एंड स्टील, वेदांता ऑयल एंड गैस और वेदांता पावर में से सबसे ज्यादा तेजी वेदांता ऑयल एंड गैस के शेयरों में दिखी। इसकी वजह यह है कि चारों कंपनियों के शेयर बुधवार को ट्रेड-टू-ट्रेड सेगमेंट से बाहर आ गए। ये चारों शेयर स्टॉक एक्सचेंजों में 15 जून को लिस्ट हुए थे। पहले 10 कारोबारी दिनों के लिए इन्हें टी2टी सेगमेंट में डाला गया था।

टी2टी सेगमेंट के शेयरों पर लागू होती हैं ये शर्तें

T2T सेगमेंट में शामिल शेयरों में हर ट्रांजेक्शन पर डिलीवरी जरूरी होती है। इन शेयरों में इंट्रा-डे बाइंग और सेलिंग की इजाजत नहीं होती है। शेयर की कीमत चढ़ने या उतरने की स्थिति में 5 फीसदी पर ही सर्किट लग जाता है। इन चारों शेयरों के 1 जुलाई को टी2टी सेगमेंट से बाहर आने के बात ये बंदिशें खत्म हो गई हैं। इन शेयरों में इंट्रा-डे ट्रेडिंग भी हो सकेगी। इससे इनमें लिक्विडिटी बढ़ेगी। साथ ही कीमतों में उतार-चढ़ाव भी दिखेगा।

वेदांता ऑयल के शेयरों में 20 फीसदी तक उछाल

2:15 बजे Vedanta Oil & Gas का शेयर 19.98 फीसदी चढ़कर 38.68 रुपये पर चल रहा था। वेदांता पावर का शेयर 11.30 फीसदी के उछाल के 45 रुपये पर चल रहा था। वेदांता आयरन का शेयर 9.98 फीसदी की तेजी के साथ 38.78 रुपये पर था। वेदांता एल्युमीनियम का शेयर 2.60 फीसदी चढ़कर 460.10 रुपये पर चल रहा था। शेयर बाजारों में 1 जुलाई को अच्छी तेजी दिखी। निफ्टी और सेंसेक्स दोनों में करीब 0.70 फीसदी की मजबूती थी।

कंपनी विदेशी कंपनियों से कर रही पार्टनरशिप

ब्रोकरेज फर्म पीएल कैपिटल ने वेदांता ऑयल एंड गैस के बारे में कहा है कि कंपनी ने एंड-टू-एंड आउटसोर्सिंग एप्रोच के इस्तेमाल का प्लान बनाया है। इसके लिए वह ग्लोबल लेवल की सीजमिक, सबसर्फेस इवोल्यूशन, ड्रिलिंग और फील्ड डेवलपमेंट के लिए पार्टनरशिप कर रही है। इससे कंपनी को अपनी क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे एफिशियंसी बढ़ेगी, जिसका पॉजिटिव असर वॉल्यूम ग्रोथ पर पड़ेगा।

टॉप 3 प्राइवेट कंपनियों में आने का लक्ष्य

ब्रोकरेज फर्म ने वेदांता पावर के बारे में कहा है कि कंपनी स्थापित क्षमता के लिहाज से भारत के टॉप पांच प्राइवेट बिजली उत्पादक कंपनियों में शामिल है। कंपनी FY33 तक टॉप 3 प्राइवेट बिजली उत्पादक कंपनियों में अपनी जगह बनाना चाहती है। कंपनी कोयला आधारित अपनी क्षमता 4.2GW से बढ़ाकर इस वित्त वर्ष के अंत तक 4.8GW करना चाहती है।

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वेदांता ऑयल का भी बड़ा प्लान

ब्रोकरेज फर्म यस सिक्योरिटीज ने वेदांता ऑयल एंड गैस के बारे में कहा कि मैनेजमेंट ने अपनी उत्पादन क्षमता में बड़ी वृद्धि करने के प्लान के बारे में बताया है। कंपनी के प्रमुख फोकस एरिया में राजस्थान नॉर्थ में एएसपी का डेप्लॉयमेंट, राजस्थान साऊथ में डीप गैस डेवलपमेंट और केजी बेसिन में डीपवाटर शामिल हैं। इससे पोर्टफोलियो की लंबी अवधि की ग्रोथ में मदद मिलेगी।

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Next Gen BMW X5 exterior image gallery

BMW X5

BMW has unveiled the fifth-generation X5 with a completely redesigned exterior based on its latest Neue Klasse design language. While it retains its familiar SUV proportions, the new X5 gets a taller front end, new lighting signatures, cleaner surfacing and new ‘BMW Winglet’ door handles integrated into the bodywork. The luxury SUV gets slimmer tail-lamps, redesigned bumpers, 11 exterior colours and alloy wheels ranging from 21 to 23 inches. The new X5 will be offered globally with petrol, diesel, plug-in hybrid, electric and, later, hydrogen powertrains.

“नेताओं को राजनीतिक मजाक बर्दाश्त करना चाहिए”: राघव चड्ढा मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी

Raghav Chadha

दिल्ली हाईकोर्ट ने भाजपा नेता राघव चड्ढा मामले में बुधवार को बड़ा फैसला किया। अदालत ने सोशल मीडिया से 5 मानहानिकारक पोस्ट हटाने के आदेश दिया। बाकी कंटेंट हटाने की मांग खारिज की। हाईकोर्ट ने कहा कि नेताओं को राजनीतिक मजाक को बर्दाश्त करना चाहिए। व्यंग्यात्मक आलोचना का मतलब हमेशा मानहानि नहीं होता। ALSO READ: अयोध्या राम मंदिर दान चोरी पर बागेश्वर बाबा का विस्फोटक दावा, कहा- अगर उनकी पर्ची खोल दी तो….

 

मजाक राजनीति का एक अहम हिस्सा 

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि राजनीतिक पार्टियों के गठबंधन, कामकाज या नीतियों में बदलाव को लेकर मजाक राजनीति का एक अहम हिस्सा है। किसी भी पार्टी के नेता के किसी भी काम पर जनता या विरोधी पार्टियों के सदस्यों की तरफ से आलोचना हो सकती है। कभी-कभी यह आलोचना व्यंग्यात्मक मजाक के रूप में भी सामने आ सकती है।

 

'पर्सनैलिटी राइट्स' का कोई मामला नहीं

राघव चड्ढा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पैसे के लिए खुद को बेचने के आरोप वाले कंटेंट को हटाने की मांग की थी। उन्होंने अपने पर्सनैलिटी और प्राइवेसी राइट्स की सुरक्षा के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी।

 

मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने राघव चड्ढा के खिलाफ पोस्ट किए गए 5 मानहानि करने वाले कंटेंट को हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उनके केस में 'पर्सनैलिटी राइट्स' का कोई मामला शामिल नहीं है। ALSO READ: एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल बना वाहनों का 'दुश्मन'? इंदौर के मैकेनिकों की चौंकाने वाली रिपोर्ट

 

अंतरिम अर्जी पर फैसला सुरक्षित रखते हुए जस्टिस प्रसाद ने कहा कि प्रथम दृष्टया, विवादित पोस्ट में चड्ढा के बीजेपी में शामिल होने के राजनीतिक फैसले की आलोचना थी और मानहानि और आलोचना के बीच की रेखा बहुत बारीक है।

PF, क्रेडिट कार्ड, पासपोर्ट फीस, Aadhaar अपडेट, LPG रेट, ITR डेडलाइन… 1 जुलाई से बदल गईं ये चीजें

Rules Changing From July 1 2026:  1 जुलाई से देश में कई जरूरी फाइनेंशियल और और नीतिगत बदलाव लागू हो गए हैं। इन बदलावों का सीधा असर इनकम टैक्स, सैलरीड क्लास, पेंशन पाने वालों, बैंक कस्टमर और विदेश यात्रा करने वाले लोगों पर पड़ने जा रहा है। एलपीजी सिलेंडर की कीमतों और पासपोर्ट फीस से लेकर ईपीएफओ सेवाओं, आधार नियमों और क्रेडिट कार्ड के फायदों में कई बड़े अपडेट किए गए हैं। आइए आपको इन बड़े बदलावों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं ताकि आप किसी तरह की असुविधा से बचें और बजट को बेहतर तरीके से प्लान कर पाएं।

1- कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर हुआ सस्ता, घरेलू दाम स्थिर

सरकार ने 1 जुलाई से 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में ₹183.50 की कटौती की है। इससे होटलों, रेस्तरां और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़ी राहत मिली है। इस कटौती के बाद दिल्ली में कमर्शियल सिलेंडर की कीमत ₹3113.50 से घटकर ₹2930 हो गई है। हालांकि 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यह कटौती 2026 की पहली छमाही के दौरान कमर्शियल एलपीजी की कीमतों में हुई कई तेज वृद्धियों के बाद आई है।

2- FY 2025-26 के लिए ITR फाइलिंग की डेडलाइन

करदाताओं को इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की समय-सीमा का विशेष ध्यान रखना होगा। वित्तीय वर्ष 2025-26 (आकलन वर्ष 2026-27) के लिए ITR-1 और ITR-2 फॉर्म भरने वाले व्यक्तिगत करदाताओं के लिए रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2026 है। ऐसे करदाता जो ITR-3 और ITR-4 दाखिल करते हैं और जिन पर टैक्स ऑडिट की आवश्यकता लागू नहीं होती है, उनके पास अपना रिटर्न जमा करने के लिए 31 अगस्त 2026 तक का समय है। तय समय-सीमा चूकने पर जुर्माना लग सकता है, टैक्स रिजीम को चुनने पर रोक लग सकती है और नुकसान को आगेल कैरी फॉरवर्ड करने की सर्विस से भी हाथ धोना पड़ सकता है।

3- EPFO 3.0: UPI आधारित पीएफ विड्रॉल की सुगबुगाहट

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से बहुप्रतीक्षित EPFO 3.0 प्लेटफॉर्म को लॉन्च किया जा रहा है। इसके तहत ईपीएफ सब्सक्राइबर्स को यूपीआई प्लेटफॉर्म के माध्यम से तुरंत पैसे निकालने की सुविधा मिलने की उम्मीद है।

4- पासपोर्ट फीस में हुआ भारी इजाफा

सरकार ने पासपोर्ट नियम, 1980 में संशोधन करके पासपोर्ट आवेदन शुल्क में बदलाव किया है। ये बदलाव भी 1 जुलाई से प्रभावी हो गया है। अब 36 पन्नों के नए सामान्य पासपोर्ट की फीस 1500 से बढ़ाकर 2500 रुपये कर दी गई है। इसी कैटेगरी में तत्काल शुल्क को 3500 से बढ़ाकर 5000 रुपये कर दिया गया है। 60 पन्नों के पासपोर्ट और खोए या कटे-फटे पासपोर्ट को बदलने की फीस में भी बढ़ोतरी की गई है। वरिष्ठ नागरिकों और 8 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नए आवेदनों पर 10 प्रतिशत की छूट मिलती रहेगी।

5- आधार (Aadhaar) में ईमेल अपडेट करना हुआ फ्री

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने आधिकारिक आधार मोबाइल ऐप के माध्यम से पंजीकृत ईमेल पते को अपडेट करने पर लगने वाले ₹75 के शुल्क को माफ कर दिया है। यह मुफ्त सुविधा 1 जुलाई से 31 दिसंबर 2026 तक उपलब्ध रहेगी।

6- मिस-सेलिंग पर RBI की सख्ती, टेलीमार्केटिंग का समय तय

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों द्वारा वित्तीय उत्पादों की गलत तरीके से बिक्री को रोकने और ग्राहकों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम पेश किए हैं। अगर किसी ग्राहक को उचित सहमति के बिना या भ्रामक तरीकों से उत्पाद बेचे जाते हैं तो वे रिफंड और मुआवजे के हकदार होंगे। बैंकों को निर्देश दिया गया है कि वे टेलीमार्केटिंग और प्रमोशनल कॉल्स को सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे के बीच ही सीमित रखें।

7- HDFC बैंक ने क्रेडिट कार्ड रिवॉर्ड और लाउंज नियमों को बदला

एचडीएफसी बैंक ने अपने रेगेलिया गोल्ड और डाइनर्स क्लब प्रिविलेज क्रेडिट कार्ड के लिए रिवॉर्ड पॉइंट स्ट्रक्चर और ट्रैवल बेनिफिट्स में बदलाव किया है। रिवॉर्ड कैलकुलेशन से जुड़े बदलाव पहले ही लागू किए जा चुके हैं जबकि एयरपोर्ट लाउंज एक्सेस से जुड़ी संशोधित शर्तें 1 जुलाई से प्रभावी हो गई हैं। नए नियमों के मुताबिक रेगेलिया गोल्ड कार्डधारकों को कॉम्प्लीमेंट्री डोमेस्टिक एयरपोर्ट लाउंज एक्सेस का लाभ उठाने के लिए पिछली तिमाही में कम से कम 60000 रुपये खर्च करने होंगे।

8- SBI कार्ड ने लगाई रिवॉर्ड पॉइंट्स पर कैपिंग

एसबीआई कार्ड ने अपने दो वेरिएंट्स PhonePe SBI Card Purple और PhonePe SBI Card Select Black के नियमों में बदलाव की घोषणा की है। 1 जुलाई से प्रभावी नियमों के तहत कंपनी ग्राहकों द्वारा कमाए जाने वाले रिवॉर्ड पॉइंट्स पर मंथली कैप लगाएगी। इंश्योरेंस से जुड़े खर्चों और अन्य श्रेणियों के खर्चों के लिए अलग-अलग सीमाएं लागू होंगी। ऑनलाइन लेनदेन पर मिलने वाले अधिकतम रिवॉर्ड पॉइंट्स को भी कम कर दिया गया है।

Video: फिर भी दिल है हिंदुस्तानी…अलग अंदाज में दिखे संजय सिंह, मिलाए सुर से सुर

आप प्रवक्ता संजय सिंह का अलग अंदाज देखने को मिला। एक वायरल वीडियो में संजय सिंह गाना गाते दिखे। लोगों को उनका ये अंदाज काफी पसंद आ रहा है। देखें वीडियो

दिल्ली की इस महिला के साथ उसके किराएदारों ने कर दिया ₹18 करोड़ का फ्रॉड! किराए पर देते हैं घर तो हो जाएं सावधान

Delhi Fraud News: अगर आप भी अपना घर या फ्लैट किराए पर देते हैं तो यह घटना आपके लिए एक बड़ा सबक साबित हो सकती है। देश की राजधानी दिल्ली से धोखाधड़ी का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जहां किराएदारों ने मिलकर मकान मालकिन के नाम पर करोड़ों रुपये का चूना लगा दिया। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की रहने वाली एक महिला के साथ उसके किराएदारों ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर ₹18 करोड़ का लोन ले लिया और महिला को एक बड़े आइडेंटिटी फ्रॉड का शिकार बना दिया।

11 शेल कंपनियों के जरिए ठिकाने लगाए ₹18 करोड़

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक आरोपियों ने मकान मालकिन के फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करके कई अलग-अलग कंपनियों के नाम पर बैंकों या वित्तीय संस्थानों से लोन के रूप में फंड हासिल किया। इसके बाद इस रकम को चालाकी से छुपाने के लिए 11 शेल कंपनियों में ट्रांसफर किया गया और बाद में इस भारी-भरकम राशि को निकाल लिया गया। पुलिस ने बताया कि इस मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है। दूसरे आरोपी की तलाश अभी भी जारी है।

साल 2012 में किराएदार बनकर आए थे दो शख्स

इस पूरे फ्रॉड की शुरुआत जून 2012 में हुई थी। पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार की रहने वाली 55 वर्षीय उषा रानी सेठी ने विवेक विहार के ब्लॉक-डी में दो नए फ्लैट खरीदे थे। वह इन दोनों फ्लैट्स को किराए पर देने के लिए किरायेदारों की तलाश कर रही थीं। इसी दौरान सचिन और संजय नाम के दो व्यक्ति उषा रानी के पास आए और फ्लैट किराए पर लेने की इच्छा जताई। इनमें से मुख्य आरोपी सचिन ने खुद को एक बिजनेसमैन बताया और दावा किया कि वह जगदंबा मेटल्स नाम की एक मेटल ट्रेडिंग फर्म का मालिक है। संजय ने खुद को सचिन का बिजनेस एसोसिएट बताया।

सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में बकायदा रजिस्टर्ड हुआ था रेंट एग्रीमेंट

पीड़ित महिला उषा रानी सेठी ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया कि मैंने अपने दूसरे फ्लोर का फ्लैट सचिन को करीब 47000 रुपये प्रति महीने के किराए पर दिया था। तीसरे फ्लोर का छोटा फ्लैट संजय को 17000 रुपये प्रति महीने के किराए पर दिया था।

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महिला ने आगे बताया कि दोनों फ्लैटों के रेंट डीड बाकायदा सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में रजिस्टर्ड कराए गए थे। इसके बाद दोनों आरोपी कुछ समय तक वहां किराए पर रहे और फिर फ्लैट खाली करके वहां से चले गए। बाद में महिला के दस्तावेजों का दुरुपयोग कर इस ₹18 करोड़ के बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया।

श्रीराम को चढ़ावे की नहीं, हमारे विश्वास की जरूरत है

Ayodhya Ram Mandir

Shri Ram Janmabhoomi Temple controversy: “Quis custodiet ipsos custodes?” — पहरेदारों की निगरानी कौन करेगा? लगभग दो हजार वर्ष पहले रोमन व्यंग्यकार जुवेनाल ने यह प्रश्न पूछा था। यह प्रश्न रोमन साम्राज्य के लिए था, लेकिन समय ने उसे सार्वभौमिक बना दिया। आधुनिक लोकतंत्रों से लेकर धार्मिक संस्थाओं तक, हर सभ्यता अंततः इसी प्रश्न के सामने आकर खड़ी होती है।

 

भारतीय सार्वजनिक जीवन में आज यह प्रश्न एक बार फिर प्रासंगिक हो उठा है। और इस बार इसका संबंध किसी सरकार, निगम या राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि उस नाम से जुड़ा है जो करोड़ों भारतीयों के लिए केवल धर्म नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति और नैतिकता का पर्याय है—श्रीराम।

 

भारतीय सभ्यता के सबसे बड़े नैतिक और सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक श्रीराम हैं। वे केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक विचार हैं; केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत स्मृति हैं। वे राजा भी हैं और निर्वासित भी। विजेता भी हैं और त्यागी भी। उन्होंने सत्ता पाई, लेकिन सत्ता के लिए नियम नहीं बदले। उन्होंने विजय प्राप्त की, लेकिन विजय के बाद अहंकार को स्थान नहीं दिया। उन्होंने राज किया, लेकिन स्वयं को राजधर्म से ऊपर कभी नहीं माना।

 

यही कारण है कि भारतीय परंपरा ने उन्हें केवल पूजा नहीं, बल्कि अनुकरण के योग्य माना। विडंबना यह है कि मर्यादा के इस सबसे बड़े प्रतीक के नाम पर खड़ी हुई संस्थाओं के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न भी मर्यादा का ही है—सार्वजनिक विश्वास की मर्यादा का। इतिहास हमें सिखाता है कि संस्थाएं बाहर से कम और भीतर से अधिक कमजोर होती हैं।

 

रोमन साम्राज्य का पतन केवल बर्बर आक्रमणों की कहानी नहीं था; वह आंतरिक संस्थागत क्षरण की भी कहानी था। यूरोप के मध्यकालीन चर्च केवल धार्मिक संकटों से नहीं जूझे; वे वित्तीय और नैतिक संकटों से भी जूझे। सोलहवीं शताब्दी में मार्टिन लूथर का सुधार आंदोलन केवल धर्मशास्त्र का विवाद नहीं था; उसके केंद्र में चर्च की वित्तीय पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के प्रश्न भी थे।

 

भारत भी इससे अलग नहीं रहा। दक्षिण भारत के चोल और विजयनगर काल के मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं थे; वे विश्वविद्यालय, नियोक्ता, वित्तीय संस्थान और स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र थे। मंदिरों को मिली भूमि, दान और संपत्तियों का विस्तृत विवरण पत्थरों पर अंकित किया जाता था ताकि समुदाय स्वयं उसका साक्षी बने। पारदर्शिता आधुनिक लोकतंत्र का आविष्कार नहीं है। यह सभ्यताओं का पुराना ज्ञान है।

 

अयोध्या आने वाला श्रद्धालु केवल धन नहीं देता। वह विश्वास देता है। किसी ने दानपात्र में बीस रुपये डाले होंगे। किसी ने परिवार की स्मृतियों से जुड़ा कोई आभूषण चढ़ाया होगा। किसी उद्योगपति ने करोड़ों रुपए का चेक सौंपा होगा। उनकी आर्थिक क्षमता अलग हो सकती है, लेकिन उनकी धार्मिक भावना का मूल्य समान है। उनकी अपेक्षा भी समान है। जो कुछ राम को अर्पित किया गया है, उसका उपयोग उसी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ हो, जिसके साथ वह दिया गया था।

 

यहीं एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है। ईश्वर और संस्थाएं एक ही चीज़ नहीं हैं। आस्था दिव्य हो सकती है, लेकिन उसका प्रबंधन हमेशा मानवीय होता है। चमत्कार समुद्र को विभाजित कर सकते हैं, लेकिन वे खातों का मिलान नहीं करते। सोना अब भी तौला जाता है। नकदी अब भी गिनी जाती है। ताले अब भी मनुष्य लगाते हैं और रजिस्टर अब भी मनुष्य भरते हैं।

 

देवताओं ने इतिहास में अनेक चमत्कार किए होंगे, लेकिन लेखांकन उनमें कभी शामिल नहीं रहा। यह कार्य हमेशा मनुष्यों के हिस्से आया है। और मनुष्यों के साथ हमेशा एक शब्द जुड़ा रहता है—जवाबदेही। आधुनिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उसने मनुष्य को बेहतर बना दिया। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने यह स्वीकार किया कि मनुष्य पूर्ण नहीं है। इसी स्वीकार्यता से संस्थाएं पैदा हुईं। इसी स्वीकार्यता से ऑडिट पैदा हुआ। इसी स्वीकार्यता से स्वतंत्र न्यायपालिका, सूचना का अधिकार और सार्वजनिक निगरानी की अवधारणा विकसित हुई। 

 

विश्वास और सत्यापन को विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक माना गया। ब्रिटिश इतिहासकार लॉर्ड एक्टन ने लिखा था, “Power tends to corrupt, and absolute power corrupts absolutely.” शक्ति केवल राजनीतिक नहीं होती। धार्मिक प्रतिष्ठा भी शक्ति होती है। नैतिक वैधता भी शक्ति होती है। सांस्कृतिक प्रभाव भी शक्ति होता है। और हर शक्ति, चाहे वह किसी भी रूप में हो, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करती है।

 

समस्या तब शुरू होती है जब संस्थाओं पर उठे प्रश्नों को आस्था पर हमला घोषित कर दिया जाता है। ऑडिट को अविश्वास का पर्याय बना दिया जाता है। पारदर्शिता को विरोध और आलोचना को ईशनिंदा का रूप दे दिया जाता है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? क्या कोई धार्मिक संस्था अपने अनुयायियों के प्रति जवाबदेह हुए बिना भी उनकी आस्था की संरक्षक बनी रह सकती है? या फिर सच्चाई इसके ठीक विपरीत है कि जवाबदेही ही आस्था की सबसे बड़ी संरक्षक होती है?

 

भारत में राम केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं रहे हैं। पिछले चार दशकों में उन्होंने भारतीय राजनीति, सार्वजनिक विमर्श और राष्ट्रीय कल्पना को गहराई से प्रभावित किया है। बहुत कम प्रतीकों ने आधुनिक भारत के राजनीतिक भूगोल को उतना बदला है जितना श्रीराम के नाम ने बदला। लेकिन इतिहास एक कठोर शिक्षक है। वह विशेषाधिकारों के साथ जिम्मेदारियां भी देता है। जो प्रतीक जितना बड़ा होता है, उसके साथ जुड़ी संस्थाओं से समाज की अपेक्षाएं भी उतनी ही बड़ी होती हैं।

 

भव्य मंदिर केवल भव्य स्थापत्य नहीं बनाते। वे भव्य नैतिक दायित्व भी निर्मित करते हैं। जिस मजदूर ने अपनी दिनभर की कमाई में से बीस रुपए निकाले और जिस उद्योगपति ने करोड़ों रुपए का दान किया, दोनों की आस्था का मूल्य समान है। दोनों का अधिकार समान है। दोनों यह पूछ सकते हैं कि उनकी भेंट का क्या हुआ। आस्था अमीर और गरीब में भेद नहीं करती। जवाबदेही को भी नहीं करना चाहिए।

 

अंततः यह विवाद धन का नहीं है। यह विश्वास का है। सभ्यताओं की सबसे बड़ी संपत्ति उनके स्मारक नहीं होते। साम्राज्यों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सेनाएं नहीं होतीं। और मंदिरों की सबसे बड़ी पूंजी उनकी तिजोरियों में रखा सोना नहीं होता। उनकी सबसे बड़ी पूंजी वह विश्वास होता है, जिसे लोग स्वेच्छा से उनके चरणों में रख देते हैं।

 

श्रीराम को शायद कभी धन की आवश्यकता नहीं थी। उन्हें हमेशा केवल हमारे विश्वास की आवश्यकता थी। और विश्वास का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है। उसे अर्जित करने में पीढ़ियां लग जाती हैं। उसे खोने में केवल एक क्षण।