‘रामायणम्’ में कैकेयी और मंथरा के रूप में नजर आएंगी लारा दत्ता और शीबा चड्ढा

फिल्म ‘रामायणम्’ के निर्माताओं ने रानी कैकेयी के रूप में लारा दत्ता और मंथरा के रूप में शीबा चड्ढा के कैरेक्टर पोस्टर जारी किए हैं। ये दोनों किरदार रामायण की कहानी के अहम मोड़ से जुड़े हैं, जिनके फैसलों और संवादों से भगवान राम के जीवन की दिशा बदल जाती है।

निर्माताओं की ओर से जारी पोस्टरों में लारा दत्ता को रानी कैकेयी के शाही अंदाज में दिखाया गया है। पारंपरिक पोशाक और आभूषणों से सुसज्जित उनका लुक अयोध्या की रानी की भव्यता को दर्शाता है। वहीं, शीबा चड्ढा मंथरा के किरदार में एक अलग अंदाज में नजर आ रही हैं।

फिल्म की कहानी में कैकेयी की दो इच्छाएं राजा दशरथ और भगवान राम के जीवन में निर्णायक बदलाव लाती हैं। वहीं, मंथरा की सलाह कैकेयी के फैसले को प्रभावित करती है, जिसके परिणामस्वरूप राम को वनवास जाना पड़ता है और अयोध्या की राजनीति एवं राजपरिवार का भविष्य बदल जाता है।

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निर्माताओं ने सोशल मीडिया पर पोस्टर साझा करते हुए कैकेयी की इच्छाओं को राम के भाग्य में बदलाव और मंथरा की बातों को घटनाओं की दिशा बदलने वाली कड़ी के रूप में पेश किया है।

इससे पहले फिल्म में राजा दशरथ की भूमिका निभा रहे अरुण गोविल का पोस्टर जारी किया गया था। टेलीविजन पर भगवान राम की भूमिका से लोकप्रिय हुए अरुण गोविल अब इस फिल्म में अयोध्या के राजा दशरथ के किरदार में नजर आएंगे।

नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही ‘रामायणम्’ में रणबीर कपूर भगवान राम, साई पल्लवी सीता, यश रावण, सनी देओल हनुमान और रवि दुबे लक्ष्मण की भूमिका निभा रहे हैं।

नमित मल्होत्रा के प्राइम फोकस स्टूडियोज ने डीएनईजी और यश की मॉन्स्टर माइंड क्रिएशंस के साथ मिलकर इस फिल्म का निर्माण किया है। दो भागों में बन रही यह फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम भाषाओं में रिलीज होगी। फिल्म का पहला भाग दिवाली 2026 और दूसरा भाग दिवाली 2027 में दुनियाभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की योजना है। फिल्म को आईमैक्स प्रारूप में भी रिलीज किया जाएगा।

Pic Credit : UNI

Maatrubhumi Release: सलमान खान की वॉर ड्रामा को मिली सरकार की मंजूरी? ये बड़े बदलाव किए गए

Maatrubhumi Release: सलमान खान की वॉर ड्रामा फिल्म ‘मातृभूमि’ का सफर काफ़ी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। फिल्म का नाम बदला गया, टीजर पर लोगों की प्रतिक्रियाएं, रिलीज कई बार टली और हाल ही में तो यह भी पक्का नहीं था कि यह फिल्म कभी रिलीज होगी या नहीं। लेकिन एक नई रिपोर्ट के मुताबिक़ अब ये सब पुरानी बातें हो चुकी हैं। ‘मातृभूमि’ अगले महीने ही सिनेमाघरों में आ सकती है।

‘मातृभूमि’ को सरकार से NOC मिली

खबर थी कि ‘मातृभूमि’ – जो शुरू में गलवान में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच टकराव पर आधारित थी – या तो रोक दी गई थी या उसमें देरी हो रही थी। वजह…. केंद्र सरकार को यह पक्का नहीं था कि इसमें चीन को कैसे दिखाया जाएगा। अब बॉलीवुड हंगामा ने एक सूत्र के हवाले से कहा है कि I&B मंत्रालय फिल्म के नए वर्जन से ‘संतुष्ट’ है और उसने पिछले हफ्ते ही इसे NOC दे दी है।

बताया जाता है कि रक्षा मंत्रालय की ओर से फिल्म के शुरुआती चीन-विरोधी रुख पर आपत्ति जताए जाने के बाद ‘मातृभूमि’ की कई बार दोबारा शूटिंग (रीशूट) की गई। रिपोर्ट में सूत्र के हवाले से कहा गया है- “‘मातृभूमि’ का नया वर्जन ओरिजिनल वर्जन की तुलना में काफी बदला हुआ है। इसके अलावा अब इसमें भारत और चीन के रिश्तों को भी सकारात्मक नजरिए से दिखाया गया है।”

‘मातृभूमि’ की रिलीज डेट?

हालांकि ‘मातृभूमि’ के मेकर्स ने अभी तक इस बारे में कोई पुष्टि नहीं की है। लेकिन बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सलमान खान ने रिलीज के लिए एक तारीख सोच रखी है। रिपोर्ट में सूत्र के हवाले से कहा गया है, “सलमान खान अब 13 नवंबर पर नजरें गड़ाए हुए हैं। उनका मानना ​​है कि दिवाली के बाद का समय – जब लोग जश्न के मूड में होंगे – फिल्म की रिलीज के लिए सही रहेगा।

हालांकि सेंसर की प्रक्रिया अभी बाकी है। मेकर्स जल्द ही फिल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के पास जमा करेंगे। अगर CBFC फिल्म को मंजूरी दे देता है और यह प्रक्रिया इसी महीने पूरी हो जाती है, तो सलमान और उनकी टीम शायद 13 नवंबर को ‘मातृभूमि’ को सिनेमाघरों में ले आएगी। इस बारे में अगले 10 दिनों में साफ तस्वीर सामने आ जाएगी।” अगर ऐसा होता है, तो ‘मातृभूमि’ फिल्म नितेश तिवारी की बड़े बजट वाली फिल्म ‘रामायण पार्ट वन’ के रिलीज़ होने के एक हफ्ते बाद सिनेमाघरों में आ सकती है।

‘मातृभूमि’ के बारे में

सलमान खान फिल्म्स के बैनर तले सलमा खान द्वारा प्रोड्यूस की गई फिल्म ‘मातृभूमि: मे वॉर रेस्ट इन पीस’ का निर्देशन अपूर्व लाखिया ने किया है और इसमें चित्रांगदा सिंह भी अहम भूमिका में हैं। इस साल की शुरुआत में नाम बदलने से पहले इस फिल्म का टाइटल ‘बैटल ऑफ गलवान’ था। असल में यह फिल्म भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच 2020 में हुई गलवान घाटी की झड़प पर आधारित थी, लेकिन खबरों के मुताबिक दोबारा शूटिंग के बाद फिल्म से चीन से जुड़े सभी संदर्भ हटा दिए गए।

ढलते सूरज में जगत सेठों की नई बिसात !

बेसिक, छोटा सा सवाल है नरेंद्र मोदी, अमित शाह की उम्र लंबी है या रिलायंस-अडानी कॉरपोरेट की? चुनाव छोड़े, और सोचे मोदी-शाह के शासन का सूरज जनता की निगाहों में ढलता हुआ है या नहीं? मोदी कितने कितने साल और राज करेंगे? अब किन-किनको कितना और बरबाद या बना सकते है? और क्या भविष्य मोदी-शाह, उनके चंगू-मंगूओं के कटघरे में खड़े होने के अवसर लिए हुए नहीं है? मगर इनके साथ क्या मुकेश अंबानी, गौतम अडानी का भी दिन ढलता हुआ है? नहीं। मैं इन इस दो सेठों के ऐसे अवसर कम मानता हूं। क्योंकि भारत की सत्ता, कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका याकि पूरे सिस्टम को खरीदने की सेठों की ताकत असीम है। हिंदूओं का इतिहास है कि उसके हर काल में, हर राज में वणिकों के जगत सेठों ने दरबारों को नचाए रखा है।

सचमुच  भारत में राजा, प्रधानमंत्री कोई बना हो, गांधी से ले कर, गरीबों की मसीहा इंदिरा गांधी व झोली ले कर चल देने की बाते करने वाले नरेंद्र मोदी आदि सभी जीडी बिडला, धीरूभाई अंबानी, गौतम अडानी के कृतज्ञ व कृपानिधान दोनों रहे है।

पर भारत के धन्नासेठ इतने मूर्ख कभी नहीं रहे जो अस्त होती सत्ता, ढलते सूरज के साथ अपनी भी रात बना डाले। तभी मामूली बात नहीं जो गौतम अडानी ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से घंटों बात की। कांग्रेस को मैसेज दिया। अब मुकेश अंबानी के मौजूदा समय के नंबर एक दरबार प्रबंधक परिमल नाथवानी ने अपने बेटे धनराज नाथवानी को अखिलेश यादव से राज्यसभा उम्मीदवार बनवाया है।

मतलब विपक्ष की  धुरी में राहुल-प्रियंका-खडगे के प्रिय डीके शिवकुमार, विपक्ष की तय संभावना हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव ( ध्यान रहे झारखंड में दोनों के विधायकों के वोट ले कर ही खुद परिमल झारखंड से सासंद बने है) और अखिलेश यादव का जूनियर परिमल का उम्मीदवार बनना भी बहुत कुछ बताता है।

निश्चित ही गौतम अडानी हो या मुकेश अंबानी-परिमल नाथवानी ने मोदी और शाह को बता कर विपक्ष की बिसात में एंट्री ली है। सोचने वाले भले सोचे कि मोदी-शाह ने खुद ही समय बदलता देख वैसे ही अंबानी-अडानी से विपक्ष में विभीषण पैदा करने की बिसात बिछाई है जैसे 2024 में तुरत-फुरत चंद्रबाबू नायडु को मैनेज करने की बनी था। ताजा चाले भी मोदी-शाह की 2029 की शतरंज का हिस्सा है।

लेकिन समय बड़ा बलवान। समय कहां चैन लेने दे रहा है? मई 2025 के आपरेशन सिंदूर से 2 अक्टूबर 2026 के 16 महिने के एक-एक दिन का हिसाब लिखाए क्या उससे रावण के अंतिम समय के महिनों ( राम-रावण युद्ध कितने महिनों चला था?) जैसी पटकथा दीवाल पर नहीं लिखी दिखती है? सोलह महीनों के लबोलुआब रामायण के उन अंतिम अंक वाले हैं जहाँ अंहकार, निर्णयों से रावणी सत्ता का चरित्र अपने आप प्रकट होता हुआ था। समय का यह सत्य ध्यान रखना चाहिए कि इतिहास अंततः व्यक्तियों की घोषणाओं, हवाबाजी, झूठ से नहीं बल्कि समाज पर वास्तविक असर, नैतिक मूल्यों, निर्णयों से संस्थागत प्रभावों व परिणामों से निष्कर्ष दर्ज कराए हुए होता है।

सोचे, मोदी-शाह के असर में न्यायपालिका के चीफ जस्टीस के एक शब्द  कॉकरोच से क्या गुल खिला?  एक ज्ञानेश कुमार से चुनाव आयोग संस्था की कैसी गंदी तस्वीर बनी?  आपरेशन सिंदूर से भारतीय सेना को लेकर वैश्विक नजरिया कैसा बदला? सभी वैश्विक सूंचकाकों, वित्तिय निवेशकों, कूटनीति में मोदी भारत की कैसी छिछोलेदारी हो रही है? शेयर बाजार से लेकर, आंकड़ों, मीडिया, वैश्विक नैरेटिव में भारत की अब कैसी तस्वीर है? इन सबके बावजूद भी क्या कोई समझदार मानेगा कि अंबानी-अडानी मोदी की बिसात के अभी भी मोहरे है न कि वे जगतसेठ जो मोदी के बाद के भविष्य के घोड़ों पर दांव के बिना अब रह ही नहीं सकते? और अपनी नई बिसात बिछा बदलती हवा में नए घोड़े, नए दांव चले?

राष्ट्रधर्म, शिक्षा और लोक कल्याण को आजीवन समर्पित रहे महंत दिग्विजयनाथ

राष्ट्रधर्म, शिक्षा और लोक कल्याण को आजीवन समर्पित रहे महंत दिग्विजयनाथ

राष्ट्रीयता, कृतज्ञता, सांस्कृतिक स्वाभिमान और गुरु-परंपरा के प्रति अटूट निष्ठा की संवाहक गोरक्षपीठ में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी पितरों (पूर्वजों) की स्मृति में अध्यात्म और राष्ट्रचेतना के स्वर गूंज रहे हैं। अवसर है युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह का।

 

गोरक्षपीठ में 23 सितंबर से श्रीमद्भागवत महापुराण कथा एवं 24 सितंबर से समसामयिक विषयों पर सम्मेलन जारी है। इसी क्रम में आश्विन कृष्ण तृतीया (मंगलवार, 29 सितंबर) को ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं पुण्यतिथि पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में विशाल श्रद्धांजलि सभा गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में आयोजित होगी, जिसमें देशभर के अनेकानेक संतजन उपस्थित रहेंगे।

 

आजीवन और स्मृतिशेष होकर भी अपने विचारों, संकल्पों और कार्यों से भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करने वाले, 1935 से 1969 तक नाथपंथ की विश्वविख्यात गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर रहे महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज को इतिहास ‘युगपुरुष’ के रूप में स्मरण करता है। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज न केवल गोरखनाथ मंदिर के वर्तमान स्वरूप के शिल्पी रहे, बल्कि उनका पूरा जीवन राष्ट्र, धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा व समाजसेवा के जरिये लोक कल्याण को समर्पित रहा। तरुणाई से ही वह देश की आजादी की लड़ाई में जोरदार भागीदारी निभाते रहे तो देश के स्वतंत्र होने के बाद सामाजिक एकता और उत्थान के लिए। इसके लिए शैक्षिक जागरण पर उनका सर्वाधिक जोर रहा।

मेवाड़ में जन्मे थे महंत दिग्विजयनाथ 

महंत दिग्विजयनाथ का जन्म वर्ष 1894 में वैशाख पूर्णिमा के दिन चित्तौड़, मेवाड़ ठिकाना ककरहवां (राजस्थान) में हुआ था। उनके बचपन का नाम नान्हू सिंह था। पांच वर्ष की उम्र में 1899 में इनका आगमन गोरखपुर की गोरक्षपीठ में हुआ। अपनी जन्मभूमि मेवाड़ की माटी का प्रभाव था कि बचपन से ही उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति और स्वाभिमान से समझौता न करने की प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी। उनकी शिक्षा गोरखपुर में ही हुई और उन्हें खेलों से भी गहरा लगाव था। 15 अगस्त 1933 को गोरखनाथ मंदिर में उनकी योग दीक्षा हुई और 15 अगस्त 1935 को वह गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर बने। वह अपने जीवन के तरुणकाल से ही आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते रहे। देश को स्वतंत्र देखने का उनका जुनून था कि उन्होंने 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के समर्थन में स्कूल छोड़ दिया। ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से उन पर लगातार आरोप लगते थे कि वह क्रांतिकारियों को संरक्षण और सहयोग देते हैं। 1922 के चौरीचौरा के घटनाक्रम में भी उनका नाम आया लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता के सामने ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और उन्हें रिहा कर दिया गया।

श्रीराम मंदिर आंदोलन में नींव के पत्थर हैं ब्रह्मलीन महंतश्री

अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर के निर्माण को लेकर हुए आंदोलनों में गोरक्षपीठ की महती भूमिका को सभी जानते हैं। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज इस आंदोलन में नींव के पत्थर हैं। 1934 से 1949 तक उन्होंने लगातार अभियान चलाकर आंदोलन को न केवल नई ऊंचाई दी, बल्कि 1949 में वह श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के नेतृत्वकर्ता भी रहे। 22-23 दिसंबर 1949 को अयोध्या में भगवान रामलला की मूर्ति प्रकट होने के नौ दिन पहले महंत दिग्विजयनाथ जी के नेतृत्व में अखंड रामायण पाठ का आयोजन शुरू हो गया था।

 

रामलला के प्रकट होने के समय महंत जी स्वयं वहां उपस्थित थे। पांच सौ वर्षों के इंतजार के बाद अयोध्या में प्रभु श्रीराम अपनी जन्मभूमि स्थित मंदिर में विराजमान हो चुके हैं। प्रभु रामलला के मंदिर निर्माण के लिए चले आंदोलन को उनके बाद उनके शिष्य महंत अवेद्यनाथ जी ने निर्णायक बनाया। एक सुखद संयोग यह भी है कि न्यायालय के निर्णय के बाद मंदिर निर्माण की जब शुभ घड़ी आई तब राज्य की सत्ता का नेतृत्व भी गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं। ऐसे में जब भी अयोध्या के श्रीराम मंदिर का जिक्र होगा तो वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर के दादागुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी स्वत: सबको स्मरण होंगे। 

शिक्षा की जलाई ज्योति से प्रकाशित हो रहा पूर्वांचल

महंत दिग्विजयनाथ जी ने गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों के लिए शिक्षा की जो ज्योति जलाई, उससे आज पूरा पूर्वांचल प्रकाशित हो रहा है। शिक्षा क्रांति के लिए उन्होंने 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। एक किराए के मकान में परिषद के अंतर्गत महाराणा प्रताप क्षत्रिय स्कूल शुरू हुआ। 1935 में इसे जूनियर हाईस्कूल की मान्यता मिली और 1936 में हाईस्कूल की भी पढाई शुरू हुई। नाम ‘महाराणा प्रताप हाई स्कूल’ हो गया। इसी बीच महंत दिग्विजयनाथ जी के प्रयास से गोरखपुर के सिविल लाइंस में पांच एकड भूमि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को प्राप्त हो गयी और महाराणा प्रताप हाईस्कूल का केंद्र सिविल लाइंस हो गया तथा देश के आजाद होते समय यह विद्यालय महाराणा प्रताप इंटरमीडिएट कालेज के रुप में प्रतिष्ठित हुआ। 1949-50 में इसी परिसर में महाराणा प्रताप डिग्री कालेज की स्थापना महंतश्री के नेतृत्व में हुई।

 

शिक्षा को लेकर उनकी सोच दूरदर्शी और निजी हित से परे थी। यही वजह थी कि उन्होंने 1958 में अपनी दो संस्थाओं महाराणा प्रताप डिग्री कालेज व महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय को गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु दान में दिया। बाद में परिषद की तरफ से उनकी स्मृति में महंत दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय की स्थापना की गई। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद द्वारा वर्तमान में चार दर्जन से अधिक शिक्षण संस्थाएं गोरखपुर क्षेत्र में संचालित हो रही हैं। इनमें प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय, चिकित्सा शिक्षा एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा तक के प्रकल्प सम्मिलित हैं।

राजनीति को भी लोक कल्याण का ध्येय माना

महंत दिग्विजयनाथ जी ने राजनीति में भी गोरक्षपीठ की लोक कल्याण की परंपरा को ही ध्येय बनाया। 1937 में हिंदू महासभा में शामिल होकर उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की विधिवत शुरुआत की। महंत जी ने 1944 में हिंदू महासभा के प्रांतीय अधिवेशन का ऐतिहासिक आयोजन गोरखपुर में कराया। महासभा के राजनीतिज्ञ होने के कारण 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के मिथ्यारोप में उन्हें बंदी बना लिया गया, लेकिन सरकार को उन्हें 1949 में दस माह बाद ससम्मान बरी करना पड़ा। राष्ट्रहित में उन्होंने 1956 में पृथक पंजाबी राज्य के लिए मास्टर तारा सिंह के आमरण अनशन को सूझबूझ से समाप्त कराया।

 

वह 1961 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष (हिंदू राष्ट्रपति के रूप में) निर्वाचित हुए। धर्म व सामाजिक एकता के क्षेत्र में भी उनका योगदान अतुलनीय है। 1939 में अखिल भारतीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा की स्थापना कर पूरे देश के संत समाज को लोक कल्याण व राष्ट्रहित में एकजुट करने के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। 1960 में हरिद्वार में अखिल भारतीय षडदर्शन सभा सम्मेलन की अध्यक्षता, 1961 में दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदू सम्मेलन का आयोजन व 1965 में दिल्ली में अखिल विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन भी उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल है। 1967 में गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए महंतजी 1969 में ब्रह्मलीन हुए, लेकिन उनके व्यक्तित्व व कृतित्व की अमरता अहर्निश बनी हुई है। इन महातपस्वी के आदर्श, शिक्षा संस्थान और राष्ट्रीय दृष्टि आज भी समाज को गति और दिशा प्रदान कर रहे हैं।

 

Ramayana: मेकर्स ने देर रात रिलीज किए ‘रामायणम्’ के नए पोस्टर, रणबीर कपूर-यश को देख इंप्रेस हुए यूजर्स

Ramayana: नमित मल्होत्रा ​​और नितेश तिवारी ने ‘रामायणम् पार्ट वन’ के लिए शनिवार को मुंबई में एक इवेंट रखा। आधी रात के बाद उन्होंने फिल्म के नए पोस्टर जारी किए, जिनमें मुख्य कलाकार रणबीर कपूर, साई पल्लवी, यश और रवि दुबे नजर आए। फैन्स नए पोस्टर्स से बहुत इंप्रेस लग रहे हैं। यूजर्स को ये पोस्टर टीम द्वारा अब तक जारी किए गए सभी लुक से ये पोस्टर से बेहतर लगे हैं।

‘रामायण’ के नए पोस्टर जारी

‘वर्ल्ड ऑफ रामायण’ के ऑफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट्स ने एक पोस्टर जारी किया, जिसमें रणबीर कपूर राम के रूप में, साई पल्लवी सीता के रूप में और रवि दुबे लक्ष्मण के रूप में वनवास गेटअप में दिख रहे हैं। इसके साथ कैप्शन लिखा था, “हमेशा धर्म के साथ।” पोस्टर में तीनों सादे, पारंपरिक कपड़ों में वनवास के दौरान एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

इसके बिल्कुल उलट एक और पोस्टर है, जिसमें यश अपनी सुनहरी लंका में रावण के रूप में दिख रहे हैं। काले कपड़ों और सोने के गहनों से सजे वे अपने महल के सामने खड़े होकर डरावने और प्रभावशाली लग रहे हैं। इसे पोस्ट करते हुए ‘रामायण’ अकाउंट ने लिखा, “तीनों लोकों का स्वामी रावण।” उन्होंने यह भी लिखा- “हमारा सच… हमारा इतिहास।”

नए पोस्टर्स से फैन्स हुए इंप्रेस्ड

पोस्टर्स जारी करने में देरी के बावजूद फैन्स बहुत उत्साहित दिखे। X पर एक पोस्ट में लिखा था, “#Ramayana की नई तस्वीरें आ गई हैं, पोस्टर शानदार लग रहे हैं।” एक और यूजर ने लिखा, “पहला वाला पोस्टर तो बहुत पहले ही जारी कर देना चाहिए था यार।” वनवास वाले पोस्टर का ज़िक्र करते हुए एक X यूजर ने लिखा, “आखिरकार वो पोस्टर आ ही गया… बहुत सुंदर… ।”

एक X यूजर ने अपनी राय दी, “मुझे पता है कि पुरानी यादों (नॉस्टेल्जिया) की वजह से बहुत से लोगों को यह बात पसंद नहीं आएगी, लेकिन यह फिल्म युगो साको की ‘रामायण: द लीजेंड ऑफ प्रिंस राम’ और रामानंद सागर की ‘रामायण’ से कहीं बेहतर साबित होगी।” रेडिट पर कई लोग रणबीर, साई और रवि के पोस्टर को लेकर बंटे हुए दिखे, लेकिन वे यश के पोस्टर से प्रभावित थे। एक कमेंट में लिखा था, “अब तक का सबसे अच्छा पोस्टर। यश अच्छे लग रहे हैं और फिल्म का स्केल भी ज्यादा साफ तौर पर दिख रहा है।”

यश के पोस्टर के बारे में एक रेडिटर ने कहा- “शायद यहीं मुझे कुछ बड़े पैमाने पर काम होता दिख रहा है। साथ ही यश की पोस्टर पर मौजूदगी भी जबरदस्त है।” वहीं एक और यूजर ने लिखा, “वह खतरनाक लग रहे हैं और उनमें निश्चित रूप से सही तरह का औरा है!”

मिस्टरबीस्ट ने रामायण इवेंट में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए

शनिवार को मशहूर अमेरिकी यूट्यूबर जिमी डोनाल्डसन, जिन्हें मिस्टरबीस्ट के नाम से जाना जाता है, रामायणम् के प्रमोशनल इवेंट में शामिल हुए। वहां उन्होंने ‘जय श्री राम’ का नारा लगाकर दर्शकों को हैरान कर दिया। जब दर्शकों में से किसी ने यही नारा लगाया तो रणबीर ने कंटेंट क्रिएटर को भी वह नारा दोहराने में मदद की। मिस्टरबीस्ट ने कहा, “बहुत मजा आया और फिल्म का ट्रेलर शानदार है, यह जबरदस्त लग रहा है।”

Mahakavya Shri Ramayan Katha: भाव, भक्ति और मर्यादा के साथ बड़े पर्दे पर लौटी देव शर्मा-अंजलि अरोड़ा स्टारर ‘रामायण’

Mahakavya Shri Ramayan Katha: कुछ कहानियां हमें विरासत में मिलती हैं। ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ कुछ ऐसी है। रामायण सिर्फ एक महाकाव्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति का ऐसा हिस्सा है, जिसकी कहानियां पीढ़ियों से घरों, मंदिरों, रामलीलाओं और परिवारों के बीच आगे बढ़ती रही है।

निर्देशक अभिषेक सिंह रामायण को किसी ऐसी कहानी के तौर पर पेश करने की कोशिश नहीं करते, जिसे नए सिरे से बदलने की जरूरत हो। फिल्म को उसी भरोसे, प्यार, आस्था, त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और भक्ति की भावना के साथ बनाया गया है, जो इसे लेकर हर भारतीय अनुभव करता है।

फिल्म की खास बात यह है कि यह ऑरिजनल रामायण के इमोशन को बरकरार रखते हुए आज के दर्शक से कनेक्ट करने की कोशिश करती है। कथा की मूल पहचान को बदले बिना फिल्म के कई प्रसंगों में ऐसे भाव उभरते हैं, जिनसे वर्तमान पीढ़ी भी आसानी से जुड़ सकती है।

‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ का फोकस सिर्फ रॉयल सीन्स या बड़े पैमाने पर कहानी दिखाने के बजाय उन रिश्तों पर अधिक है, जो रामायण की आत्मा हैं। श्री राम और माता सीता का प्रेम, लक्ष्मण की अपने बड़े भाई के प्रति अटूट निष्ठा, हनुमान की श्री राम के प्रति पूर्ण भक्ति और राम की मर्यादा के सामने रावण का अहंकार — यही फिल्म की नींव हैं।

देव शर्मा ने श्री राम के किरदार को काफी संयम और गरिमा के साथ निभाया है। उनके एक्सप्रेशन सिर्फ वीरता दिखाने तक सीमित नहीं , बल्कि श्री राम के धैर्य, करुणा और मर्यादा को भी सामने लाते हैं। उनके किरदार में एक ठहराव दिखाई देता है। अंजलि अरोड़ा के किरदार को लेकर दर्शकों शक था, लेकिन माता सीता उन्होंने शानदार तरीके से निभाया हैं। फिल्म सीता के किरदार को सिर्फ राम की कहानी का हिस्सा बनाकर नहीं रखती, बल्कि उनके विश्वास, आत्मसम्मान और आंतरिक शक्ति को भी महत्व देती है।

शील वर्मा लक्ष्मण के रूप में राम परिवार की कहानी में एक महत्वपूर्ण इमोशनल परत जोड़ते हैं। श्री राम और माता सीता के प्रति उनका समर्पण और अपने बड़े भाई के साथ उनका रिश्ता फिल्म की यात्रा में लगातार महत्वपूर्ण बना रहता है। वहीं निर्भय वाधवा हनुमान के किरदार में ऊर्जा और भक्ति लेकर आते हैं। हनुमान की मौजूदगी वाले हिस्सों में उनका उत्साह कहानी को अलग गति देता है। जबकि राजनेश दुग्गल रावण के रूप में जच रहे हैं।

फिल्म का संगीत सुनने में अच्छा लगता है। संगीत कहानी के माहौल के साथ सटीक बैठता है। ‘सिया राम’ को जावेद अली ने अपनी आवाज दी है। वहीं फरहाद बिवंडीवाला की आवाज में ‘राम जी की सेना’ फिल्म में ऊर्जा और उत्साह लेकर आता है। कैलाश खेर का ‘हे हनुमान’ हनुमान से जुड़े सीन्स में भक्ति और जोश को बढ़ाता है। इसके अलावा शान, शाहिद मल्ल्या और वैशाली सामंत जैसे गायकों की आवाजें भी साउंडट्रैक का हिस्सा हैं।

बात वीएफएक्स की करें तो कुछ बड़े सीन्स में और बेहतर काम किया जा सकता था। खास कर युद्ध वाले सीन या लंका से जुड़े सीन थोड़े फीके लगते हैं। फिर भी यह कमी फिल्म की कहानी से जुड़ाव को पूरी तरह कमजोर नहीं करती है। अयोध्या से वनवास, सीता हरण, हनुमान के आगमन, लंका की ओर बढ़ती कहानी रावण के अंत तक की जर्नी दिखाती है।

शायद फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह अपने दर्शकों को अच्छी तरह समझती है। महाकाव्य श्री रामायण कथा रामायण को किसी चौंकाने वाले या पूरी तरह अलग रूप में पेश करने की कोशिश नहीं करती। यह आस्था और उन मूल्यों को केंद्र में रखती है, जिनके कारण यह कथा आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है। फिल्म को हम 3.5 रेटिंग देते हैं।

फिल्म का निर्देशन अभिषेक सिंह ने किया है और इसका निर्माण प्रकाश महोबिया और संजय बुंदेला ने महोबिया फिल्म्स प्रोडक्शन के बैनर तले किया है। फिल्म को एजे फिल्म एंटरटेनमेंट वर्ल्ड और अजय कनोजिया प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि हनी कुलदीप अग्रवाल और मोनिका सेन सह-निर्माता हैं।

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पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व: श्राद्ध पक्ष

Shraddh Paksha 2026

क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि हम कौन हैं? हमारा नाम, हमारा परिचय और हमारी व्यक्तिगत पहचान निश्चित ही हमारी अपनी है, लेकिन हमारे अस्तित्व की जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं। हमारे भीतर हमारे माता-पिता का अंश है, उनके भीतर हमारे दादा-दादी का, और उनके पीछे अनगिनत पीढ़ियों का वह इतिहास है जिसने हमारे वर्तमान को आकार दिया है। हमारे शरीर में रक्त के साथ उनकी विरासत प्रवाहित होती है, हमारे संस्कारों में उनकी छाप होती है और हमारे जीवन में उनके संघर्षों की अनुगूंज सुनाई देती है।

 

लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य दुनिया को जानने के लिए बेचैन है और अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, पर अपनी जड़ों को जानने के लिए उसके पास समय नहीं है। मोबाइल में हजारों तस्वीरें हैं और दुनिया की हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है, मगर अपने ही परदादा की तस्वीर कहाँ है, उनका जीवन कैसा था और उन्होंने परिवार के लिए क्या किया, यह बताने वाला कोई नहीं है। हम भविष्य की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि उस अतीत को भूलते जा रहे हैं, जिसकी नींव पर हमारा वर्तमान खड़ा है।

 

यहीं से श्राद्ध पक्ष की सार्थकता आरंभ होती है। यह केवल पंचांग की कुछ तिथियां नहीं हैं; यह हमारी सामूहिक स्मृति को जगाने वाला वह अवसर है, जब वर्तमान कुछ क्षण के लिए अतीत के सामने खड़ा होता है और स्वीकार करता है कि हम अकेले नहीं हैं—हमारे अस्तित्व के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है।

 

‘श्राद्ध’ का वास्तविक अर्थ और पितृऋण

‘श्राद्ध’ शब्द का सीधा संबंध ‘श्रद्धा’ से है। इसलिए श्राद्ध का मूल अर्थ केवल पिंडदान, तर्पण या ब्राह्मण भोजन कराना ही नहीं है। ये भले ही परंपरागत विधियां हैं, लेकिन इनके केंद्र में जो मूल भाव है, वह है—अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मीय स्मरण।

 

भारतीय सनातन परंपरा ने मृत्यु को संबंधों का पूर्ण विराम नहीं माना है। शरीर समाप्त हो जाता है, किंतु स्मृति और संस्कार जीवित रहते हैं। मनुष्य चला जाता है, लेकिन उसके कर्म परिवार की अगली पीढ़ियों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। यही कारण है कि भारतीय जीवन-दर्शन में पितरों के प्रति दायित्व को विशेष स्थान दिया गया है, जिसे ‘पितृऋण’ कहा जाता है।

 

हमारे माता-पिता ने हमें जीवन दिया और हमारे दादा-दादी व पूर्वजों ने परिवार को संभाला। किसी ने अभाव में जीवन जिया, किसी ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया, तो किसी ने परिवार के लिए अपने सुख त्याग दिए और उन संस्कारों की परंपरा को सुरक्षित रखा जो आज हमारे हाथों में है। हम जिस जीवन को अपना कहते हैं, उसकी नींव में उन सबका योगदान है। इसलिए पितृऋण कोई ऐसा ऋण नहीं है जिसे धन देकर चुकाया जा सके। इसे चुकाने का सबसे सुंदर मार्ग है—माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का सम्मान, परिवार में प्रेम, समाज के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन और आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ संस्कार देना।

 

तर्पण और परंपराओं के पीछे छिपा भाव

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, अन्नदान और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं। जल, तिल और कुश आदि के माध्यम से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करने की परंपरा है। आस्था मानती है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों को तृप्ति व शांति प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद परिवार को मिलता है। लेकिन तर्पण को केवल एक बाहरी कर्मकांड मानना, उसके भीतर छिपे गहरे भाव से वंचित रहना है।

 

तर्पण की जलधारा केवल जल नहीं होती; वह स्मृति और कृतज्ञता की धारा होती है। जब कोई व्यक्ति अपने पिता, दादा, परदादा या अन्य पूर्वजों का नाम लेकर जल अर्पित करता है, तो वह अपने अतीत को प्रणाम करता है। वह मानो यह स्वीकार करता है कि उसके वर्तमान में उसका अपना श्रम जितना है, उतना ही योगदान उन लोगों का भी है जो आज उसके साथ नहीं हैं।

 

श्राद्ध परंपरा में कौवे, गाय और कुत्ते को भोजन कराना तथा ब्राह्मण, अतिथि या किसी जरूरतमंद को भोजन कराने का विधान है। इन परंपराओं में जीव-दया, अन्नदान, सेवा और सह-अस्तित्व की भावना दिखाई देती है। पूर्वजों के नाम पर यदि किसी भूखे का पेट भर जाए या किसी जीव को अन्न मिल जाए, तो श्रद्धा का दायरा और विस्तृत हो जाता है।

 

भारतीय धार्मिक साहित्य और महाकाव्यों में पितृकर्म का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। चाहे महाभारत में कर्ण से जुड़ी कथा हो या रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा पिता राजा दशरथ के निमित्त किया गया श्राद्ध—ये प्रसंग भारतीय समाज में पितरों के प्रति दायित्व की गहरी भावना को दर्शाते हैं।

 

इसी श्रृंखला में ‘सर्वपितृ अमावस्या’ भी व्यापक स्मरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो सका, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए यह तिथि बनी है। यह ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों को नमन करने का दिन है।

 

आधुनिक दौर में श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता

आज श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। परिवार छोटे हो रहे हैं और संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवार ले रहे हैं। घरों में भौतिक सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन पीढ़ियों के बीच का संवाद घटता जा रहा है। बच्चे अपने दादा-दादी के जीवन-संघर्षों से परिचित नहीं हैं और अनेक बार उन्हें अपने परदादा का नाम तक मालूम नहीं होता। ऐसे समय में श्राद्ध पक्ष केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पारिवारिक स्मृतियों को बचाने का माध्यम बन सकता है:

  • घर के बुजुर्ग बच्चों को अपने पूर्वजों की कहानियां सुनाएं।
  • परिवार का एक ‘वंश-वृक्ष’ (Family Tree) तैयार किया जाए।
  • पुरानी तस्वीरों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाए।
  • पूर्वजों के संघर्षों, उनके व्यवसाय, सामाजिक योगदान और जीवन-मूल्यों की जानकारी नई पीढ़ी को दी जाए।
  • क्योंकि जिसे अपनी जड़ों का पता नहीं होता, उसकी पहचान की ऊंचाई भी अधूरी रह जाती है।

 

भय नहीं, कृतज्ञता का नाम है श्राद्ध

पितृदोष जैसी धार्मिक मान्यताएं भी श्राद्ध परंपरा से जुड़ी हुई हैं। अनेक श्रद्धालु पितरों की शांति और परिवार के कल्याण की कामना से तर्पण, पाठ और आध्यात्मिक साधनाएं करते हैं। इन आस्थाओं का सम्मान करते हुए यह समझना भी जरूरी है कि श्राद्ध का व्यापक संदेश भय फैलाना नहीं, बल्कि कृतज्ञता, आत्मचिंतन और सदाचार सिखाना है।

 

यदि हम पितरों की शांति की कामना करते हैं, तो केवल कर्मकांड पर्याप्त नहीं हो सकता। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का आदर, परिवार में प्रेम, जरूरतमंदों की सहायता, जीवों के प्रति करुणा और अपने आचरण में सत्य व संयम रखना भी पितृ-सम्मान का ही विस्तार है।

 

  • आखिर पूर्वजों को सबसे बड़ा सम्मान क्या है?
  • क्या केवल एक दिन जल अर्पित कर देना?
  • क्या केवल भोजन करा देना और दान दे देना?
  • या फिर उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखना?

 

उत्तर स्पष्ट है—यदि उन्होंने परिवार को जोड़कर रखा था, तो हम भी परिवार को जोड़ें। यदि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखा था, तो हम भी धैर्य रखें। यदि उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता की थी, तो हम भी सेवा करें। और यदि उन्होंने हमें संस्कार दिए थे, तो हम उन संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं। यहीं पर श्राद्ध कर्मकांड से ऊपर उठकर ‘जीवन का संस्कार’ बन जाता है।

 

स्मृति की अंजलि

श्राद्ध पक्ष मृत्यु का शोक नहीं, बल्कि स्मृति का उत्सव है। यह अतीत में लौटने का हठ नहीं, बल्कि अतीत से शक्ति लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि हम किसी शून्य से पैदा नहीं हुए हैं; हमारे पीछे अनेक पीढ़ियों का श्रम, संघर्ष, त्याग और संस्कार खड़े हैं।

 

इसलिए इस श्राद्ध पक्ष में जब हम पितरों को जल अर्पित करें, तो अपने भीतर भी कृतज्ञता का दीप जलाएं। जब अन्न अर्पित करें, तो सेवा का संकल्प लें। जब पूर्वजों का नाम लें, तो उनके जीवन से कोई एक श्रेष्ठ गुण अपने आचरण में उतारने का प्रयास करें। और जब अपने बच्चों को उनके पूर्वजों की कहानियां सुनाएं, तो उन्हें यह अहसास कराएं कि वे केवल वर्तमान के व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा के उत्तराधिकारी हैं।

 

पूर्वज चले जाते हैं, उनकी स्मृतियां नहीं।

चेहरे मिट जाते हैं, संस्कार नहीं।

पीढ़ियां बदल जाती हैं, विरासत नहीं।

 

इसीलिए श्राद्ध केवल पितरों को स्मरण करने का पर्व नहीं है, बल्कि स्वयं को पहचानने का पर्व है। अंततः पितरों को सच्ची श्रद्धांजलि केवल जल की एक अंजलि भर नहीं है; सच्ची श्रद्धांजलि है—एक ऐसा जीवन जीना जिसमें हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ संस्कार दिखाई दें, और ऐसा परिवार बनाना जिसे देखकर हमारी आने वाली पीढ़ी भी अपनी जड़ों पर गर्व कर सके।

 

श्राद्ध की सबसे बड़ी अंजलि जल की नहीं, स्मृति की है। सबसे बड़ा तर्पण कर्मकांड का नहीं, कृतज्ञता का है; और पितरों को सबसे बड़ा सम्मान यह है कि उनके अच्छे संस्कार हमारे जीवन में निरंतर सांस लेते रहें।

Shah Rukh Khan Net Worth: एक साल में 2490 करोड़ कम हुई शाहरुख खान की नेटवर्थ, हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2026 में ये एक्टर्स के नाम भी शामिल

Shah Rukh Khan Net Worth: बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान भारत के सबसे अमीर एक्टर्स की लिस्ट में नंबर 1 पर हैं। लेकिन पिछले साल से उनकी अनुमानित संपत्ति में काफी कमी आई है। हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2026 के अनुसार एक्टर की संपत्ति ₹10,000 करोड़ है, जिससे वे अमिताभ बच्चन, सलमान खान और ऋतिक रोशन से आगे हैं।

शाहरुख खान की संपत्ति में गिरावट

यह नया आंकड़ा 2025 की हुरुन इंडिया रिच लिस्ट में शाहरुख की 12,490 करोड़ की नेट वर्थ से कम है। यानी एक साल में एक्टर की नेटवर्थ में 2,490 करोड़ का अंतर आया है। एक्टर की संपत्ति सिर्फ फिल्मों से हुई कमाई तक सीमित नहीं है। इसमें उनके बिजनेस भी शामिल हैं, खासकर रेड चिलीज एंटरटेनमेंट और नाइट राइडर्स स्पोर्ट्स के जरिए कोलकाता नाइट राइडर्स के साथ पार्टनरशिप।

हालांकि ये आंकड़े अनुमानित हैं और प्राइवेट कंपनियों, निवेश और अन्य एसेट्स की वैल्यू के आधार पर बदल सकते हैं। इस साल की शुरुआत में जारी हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट में शाहरुख की संपत्ति का अनुमान ₹10,800 करोड़ लगाया गया था।

अमिताभ बच्चन दूसरे स्थान पर

अमिताभ बच्चन 2026 की लिस्ट में ₹4,000 करोड़ की अनुमानित संपत्ति के साथ दूसरे सबसे अमीर एक्टर हैं। 2025 की लिस्ट में बताई गई ₹1,630 करोड़ की नेट वर्थ की तुलना में उनकी नेट वर्थ में काफी बढ़ोतरी हुई है। दिग्गज एक्टर की संपत्ति न केवल उनके दशकों लंबे फिल्मी करियर से जुड़ी है, बल्कि निवेश, रियल एस्टेट और उनके फैमिली ऑफिस के जरिए मैनेज की जाने वाली एसेट्स से भी जुड़ी है। उनकी लेटेस्ट वैल्यूएशन उन्हें टॉप नामों में शामिल अन्य एक्टर्स से काफी आगे रखती है।

सलमान खान-ऋतिक रोशन

भाईजान भी ₹3,000 करोड़ की अनुमानित संपत्ति के साथ लिस्ट में शामिल हुए हैं। ऋतिक रोशन ₹2,500 करोड़ के साथ उनके बाद हैं, जो 2025 में बताई गई उनकी ₹2,160 करोड़ की नेट वर्थ से अधिक है। उनका फिटनेस और लाइफस्टाइल ब्रांड HRX उनके बिजनेस का एक अहम हिस्सा बना हुआ है।

जूही चावला और करण जौहर लिस्ट से बाहर

पिछले साल की रैंकिंग में कुछ खास बदलाव भी हुए हैं। जूही चावला और करण जौहर, जो दोनों 2025 की हुरुन इंडिया रिच लिस्ट में शामिल थे, 2026 की लिस्ट में नहीं हैं। 2025 में जूही की अनुमानित नेट वर्थ ₹7790 करोड़ थी, जबकि करण जौहर की नेट वर्थ ₹1880 करोड़ थी।

इस लिस्ट में फिल्म इंडस्ट्री के बिज़नेस से जुड़े लोग भी शामिल हैं। ‘रामायण’ के प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ​​के पिता नरेश मल्होत्रा ​​की अनुमानित संपत्ति ₹16,000 करोड़ है। भूषण कुमार, रॉनी स्क्रूवाला और कलानिधि मारन जैसे फिल्म प्रोड्यूसर भी इस लिस्ट में शामिल हैं।

Ramayana Poster: ‘रामायणम्’ का नया पोस्टर हुआ रिलीज, राम-सीता का दिखा मनमोहक अंदाज

Ramayana Poster: ‘रामायणम्’ के मेकर्स ने एक नया पोस्टर जारी किया है, जिसमें रणबीर कपूर राम के रोल में और साई पल्लवी सीता के रोल में नजर आ रहे हैं। यह बहुत प्यारा है। नया पोस्टर उनके रिश्ते के सॉफ्ट पल को खूबसूरती से दिखा रहा है। सोशल मीडिया पर पोस्टर तेजी से रिलीज हो रहा है।

‘रामायणम्’ का पोस्टर रिलीज

पोस्टर में राम और सीता को सेफ्रॉन कपड़ों में नदी के किनारे बैठे हुए दिखाया गया है। ये पल उनके वनवास के समय का है। राम प्यार से सीता के बाल ठीक करते हुए दिख रहे हैं, जबकि सीता शरमाते हुए मुस्कुरा रही हैं। यह एक बहुत ही साधारण पल है, लेकिन यही बात इस पोस्टर को खास बनाती है। मेकर्स ने “सिया राम के मजबूत रिश्के” का जश्न मनाते हुए इसे शेयर किया।

‘रामायणम्’ का पहला गाना आज रिलीज होगा!

लेकिन सिर्फ पोस्टर ही नहीं आ रहा है। इसके रिलीज होने के बाद मेकर्स ‘रामायण’ का पहला गाना ‘जय जय राम’ लॉन्च करेंगे। इस गाने को एआर रहमान ने कंपोज किया है और इसके बोल डॉ. कुमार विश्वास ने लिखे हैं। इस गाने में भारतीय संगीत की दो सबसे बड़ी आवाजें – श्रेया घोषाल और अरिजीत सिंह – शामिल हैं।

मेकर्स ने बड़ी घोषणा की

मेकर्स ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि फिल्म का म्यूजिकल सफर आधिकारिक तौर पर गणेश चतुर्थी पर शुरू होगा, जिसमें ‘सिया राम’ पोस्टर का अनावरण किया जाएगा और उसके बाद पहला गाना ‘जय जय राम’ रिलीज किया जाएगा। नोट में लिखा था, “हर शुभ शुरुआत एक प्रार्थना के साथ होती है। इस गणेश चतुर्थी पर ‘रामायणम्’ का म्यूजिकल सफर सुबह 7:30 बजे (IST) हमारे ‘सिया राम’ पोस्टर के अनावरण के साथ शुरू होगा। इसके तुरंत बाद हमारा पहला म्यूजिकल तोहफा ‘जय जय राम’ आएगा। संगीत एआर रहमान बोल- डॉ. कुमार विश्वास, गायक- श्रेया घोषाल और अरिजीत सिंह।” इसके साथ ही मेकर्स ने कैप्शन में लिखा- “गणपति बप्पा के आशीर्वाद से हम कल ‘रामायणम्’ का म्यूजिकल सफर शुरू कर रहे हैं।”

‘रामायणम्’ के बारे में

नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित ‘रामायणम्’ को इस महाकाव्य के दो-भाग वाले रूपांतरण के रूप में बनाया जा रहा है। रणबीर कपूर भगवान राम की भूमिका निभा रहे हैं, साई पल्लवी सीता के रूप में हैं, यश रावण की भूमिका निभा रहे हैं, रवि दुबे लक्ष्मण का किरदार निभा रहे हैं, और सनी देओल हनुमान के रूप में नजर आएंगे। इसके साथ ही मेकर्स ने कैप्शन में लिखा- “गणपति बप्पा के आशीर्वाद से हम कल ‘रामायणम्’ का म्यूजिकल सफर शुरू कर रहे हैं।”

यूपी का मतलब अल्टीमेट पोटेंशियल, टेक्सटाइल सेक्टर बनेगा नई औद्योगिक ताकत : CM योगी

यूपी का मतलब अल्टीमेट पोटेंशियल, टेक्सटाइल सेक्टर बनेगा नई औद्योगिक ताकत : CM योगी

UP Textiles Conclave 2026

UP Textiles Conclave 2026: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यूपी का मतलब अप यानी ‘अल्टीमेट पोटेंशियल’ है। उत्तर प्रदेश के पास विरासत, हुनर, मानव संसाधन, उद्योग, उद्यमिता और देश का सबसे बड़ा बाजार है। दुनिया की सबसे युवा वर्कफोर्स भी हमारे पास है। अब इसी ताकत के सहारे उत्तर प्रदेश को ग्लोबल टेक्सटाइल हब बनाना है। हमारा लक्ष्य फाइबर से यार्न, यार्न से फैब्रिक, फैब्रिक से गारमेंट और गारमेंट से ब्रांड होते हुए ग्लोबल मार्केट तक पूरी वैल्यू चेन प्रदेश में विकसित करने का है।

 

मुख्यमंत्री योगी मंगलवार को दो दिवसीय यूपी टेक्सटाइल्स कॉन्क्लेव-2026 के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने यूपी टेक मित्र पोर्टल लॉन्च करने के साथ हथकरघा बुनकर समृद्धि योजना का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में टेक्सटाइल सेक्टर में 5,196 करोड़ रुपये के नए निवेश प्रस्तावों के एमओयू किए गए। साथ ही 163 करोड़ रुपये के लेटर ऑफ कम्फर्ट और 60 करोड़ रुपये की सब्सिडी का वितरण किया गया। मुख्यमंत्री ने देशभर से आए टेक्सटाइल सेक्टर के प्रतिष्ठित उद्यमियों, निवेशकों, निर्यातकों, प्रदेश के परंपरागत बुनकरों, हथकरघा संचालकों और इस क्षेत्र में भविष्य तलाश रहे युवाओं का स्वागत और अभिनंदन किया।

फैब्रिक सेक्टर में यूपी चौथा सबसे बड़ा निर्यातक राज्य

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की टेक्सटाइल पहचान हजारों वर्षों पुरानी है। वैदिक साहित्य से लेकर रामायण और महाभारत तक में काशी के रेशमी वस्त्रों का उल्लेख मिलता है। वाराणसी की सिल्क साड़ी, भदोही का कारपेट, लखनऊ की चिकनकारी, बरेली की जरी, कानपुर का टेक्सटाइल इकोसिस्टम और मेरठ में टेक्निकल टेक्सटाइल की संभावनाएं प्रदेश की विरासत और औद्योगिक क्षमता का प्रमाण हैं।

 

प्रदेश में दो लाख हैंडलूम और पांच लाख से अधिक पावरलूम बुनकर इस सेक्टर की असली ताकत हैं। कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार का सृजन वस्त्र उद्योग करता है। उत्तर प्रदेश फैब्रिक मैन्युफैक्चरिंग में देश में तीसरे स्थान पर है और कुल फैब्रिक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 13 से 14 प्रतिशत है। पिछले छह वर्षों में प्रदेश के वस्त्र, परिधान और हस्तशिल्प निर्यात में करीब 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यूपी इस सेक्टर में देश का चौथा सबसे बड़ा निर्यातक राज्य बन गया है। वर्ष 2025-26 में 21 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निर्यात के साथ गौतमबुद्ध नगर देश के प्रमुख निर्यातक जिलों में दूसरे स्थान पर पहुंचा है।

यूपी के 17 टेक्सटाइल उत्पादों को जीआई टैग

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने 2030 तक 350 बिलियन अमेरिकी डॉलर की टेक्सटाइल एवं अपैरल इकोनॉमी और 100 बिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य रखा है। इस राष्ट्रीय संकल्प में उत्तर प्रदेश अपनी पूरी क्षमता से भागीदारी करेगा। ओडीओपी के माध्यम से प्रदेश के 35 से अधिक जिलों के वस्त्र और हैंडलूम उत्पादों को नई पहचान मिली है। प्रदेश के 17 टेक्सटाइल उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाखों महिलाएं भी इस सेक्टर से जुड़कर आत्मनिर्भर हो रही हैं। दुनिया की सबसे युवा वर्कफोर्स प्रदेश में उपलब्ध है, जो टेक्सटाइल सेक्टर को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

2017 से पहले वसूली की पर्ची लेकर लौट जाते थे निवेशक

मुख्यमंत्री ने पिछली सरकारों पर हमला करते हुए कहा कि 2017 से पहले प्रदेश की पहचान ‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन माफिया’ की बन गई थी। हर जनपद में माफिया की समानांतर सरकार चलती थी। कानून व्यवस्था चौपट थी। माफिया जहां हाथ रख देता, वह जमीन उसकी हो जाती और तत्कालीन सरकार मौन बनी रहती थी। निवेशक व्यापार का सपना लेकर आता था और वसूली की पर्ची लेकर लौट जाता था। दंगे, कर्फ्यू, गुंडा टैक्स और माफिया के कारण उद्योग लगाना मुश्किल था। बिजली और विकास एक परिवार तक सीमित था। आज यूपी कर्फ्यू, दंगा, माफिया और उपद्रव से मुक्त है। अब किसी ने बेटी, व्यापारी या निवेशक की सुरक्षा में सेंध लगाने का दुस्साहस किया तो उसके लिए दो ही जगह होंगी- जेल या जहन्नुम। अब कोई यूपी में खुलेआम पिस्टल लहरा कर नहीं चल सकता।

यूपी का नाम सुनकर दूरी बना लेते थे लोग

सीएम ने कहा कि 2017 से पहले प्रदेश के नागरिकों के सामने पहचान का संकट पैदा हो गया था। यूपी का नाम सुनकर प्रदेश के बाहर लोग यहां के नागरिकों को किराये पर मकान देने और होटल में कमरा देने तक से कतराते थे। किसी समाज और नागरिक के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है। यूपी का परिचय देने पर व्यक्ति को कई बार सामाजिक रूप से दूरी का सामना करना पड़ता था। यहां कोई पर्व और त्योहार शांतिपूर्ण तरीके से नहीं गुजरता था। उत्सव से पहले ही उपद्रव शुरू हो जाता था। पूरे प्रदेश में लोग दंगों की आग में झुलसते थे। बरेली, मथुरा के कोसीकलां, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जैसे स्थानों पर बड़े दंगे हुए। व्यापक पैमाने पर पलायन हुआ और महीनों तक कर्फ्यू लगा रहा।

अराजकता का शिकार बनीं कानपुर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलें

मुख्यमंत्री ने कहा कि कानपुर की ऐतिहासिक कपड़ा मिलें भी इसी अराजक व्यवस्था की शिकार बनीं। मगहर की कताई मिल 1977 में बनी और 1997 में बंद हो गई। बुनकरों और छोटे टेक्सटाइल उद्यमियों को बैंक से ऋण मिलने में भी कठिनाई होती थी। डीबीटी की व्यवस्था के अभाव में सरकारी योजनाओं का लाभ न तो नागरिकों तक पहुंचता था और न ही उद्यमियों तक। 2017 के बाद उत्तर प्रदेश में बड़ा बदलाव आया है। अब यहां कानून का राज है।

यूपी के पास हैं 36 सेक्टोरल पॉलिसी

सीएम ने कहा कि कानून व्यवस्था में बदलाव और निवेश अनुकूल नीतियों का परिणाम है कि आज प्रदेश के पास 36 सेक्टोरल पॉलिसी हैं। देश के 55 प्रतिशत मोबाइल और 60 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट का उत्पादन यूपी में हो रहा है। यूपी डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के 6 स्ट्रेटेजिक नोड में 35 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। प्रदेश में एमएसएमई के 12 प्लेज पार्क भी तैयार हो रहे हैं।

 

पिछले 9 वर्ष में यूपी पर कैपिटा इनकम तीन गुना करने और वूमेन वर्कफोर्स की भागीदारी भी तीन गुना बढ़ाने में सफल रहा है। यूपी पिछले 6 वर्षों से रेवेन्यू सरप्लस स्टेट है। यह निवेशकों का भरोसा है कि हमें पिछले 9 वर्षों में 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए, जिसमें 15 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव धरातल पर उतर चुके हैं। 65 लाख से अधिक युवाओं को रोजगार दिलाने में सफलता मिली है। हमने हर एमएसएमई को 5 लाख रुपये की सोशल सिक्योरिटी गारंटी दी है। आज यूपी में सर्वाधिक 96 लाख एमएसएमई यूनिट हैं।

नोएडा बन रहा है अपैरल सिटी

उन्होंने कहा कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री अब केवल धागे, कपड़े और फैशन तक सीमित नहीं है। डिफेंस, हेल्थकेयर, कृषि और स्पोर्ट्स जैसे क्षेत्रों में टेक्निकल टेक्सटाइल तेजी से उभर रहा है। इसलिए उत्तर प्रदेश को ट्रेडिशनल टेक्सटाइल से आगे बढ़कर टेक्निकल टेक्सटाइल में भी अपनी ताकत बढ़ानी होगी। पीएम मित्र पार्क और संत कबीर टेक्सटाइल पार्क जैसी पहल इसी दिशा में आगे बढ़ रही हैं। वाराणसी, अमरोहा, बरेली, संतकबीरनगर और बिजनौर में परियोजनाओं के लिए भूमि आरक्षित की गई है। सीतापुर, मऊ, कानपुर, झांसी और रायबरेली में टेक्सटाइल एवं अपैरल पार्क के लिए भूमि चिन्हित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। नोएडा को अपैरल सिटी के रूप में विकसित किया जा रहा है।

ग्लोबल वैल्यू चेन पार्टनर बनें एमएसएमई

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार चाहती है कि एमएसएमई केवल सब-कॉन्ट्रैक्टर नहीं, ग्लोबल वैल्यू चेन के पार्टनर बनें। युवा केवल जॉब सीकर नहीं, टेक्सटाइल एंटरप्रेन्योर और इनोवेटर बनें तथा कारीगर केवल सप्लायर नहीं, अपने ब्रांड के मालिक बनें। ‘डिजाइन इन यूपी, मेड इन यूपी और एक्सपोर्टेड फ्रॉम यूपी’ के मंत्र से प्रदेश के हुनर को वैश्विक पहचान मिले। निफ्ट रायबरेली और उत्तर प्रदेश टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट कानपुर युवाओं को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप तैयार कर रहे हैं। यूपी आज पॉलिसी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, टैलेंट और मार्केट हर स्तर पर तैयार है। अब प्रदेश की सांस्कृतिक पूंजी को आर्थिक पूंजी में बदलना है। बुनकर का हुनर, उद्यमी का कारोबार, युवाओं का रोजगार, महिलाओं की भागीदारी, निवेश और निर्यात बढ़ाकर उत्तर प्रदेश को दुनिया के प्रमुख टेक्सटाइल केंद्रों में स्थापित किया जाएगा।

 

कार्यक्रम में खादी एवं ग्रामोद्योग, रेशम, हथकरघा एवं वस्त्र उद्योग मंत्री राकेश सचान, उत्तर प्रदेश ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के सीईओ मनोज कुमार सिंह, प्रमुख सचिव वस्त्र उद्योग अनिल कुमार सागर सहित देशभर के प्रमुख उद्यमी, निवेशक, निर्यातक और टेक्सटाइल सेक्टर के प्रतिनिधि मौजूद रहे।