El Nino Impact: अल नीनो का कहर! 2026 बन सकता है अब तक का सबसे गर्म साल, रिकॉर्ड गर्मी से क्या बदलेगा बारिश का पैटर्न?

El Nino & Monsoon update: प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहे अल नीनोके असर से साल 2026 के इतिहास का सबसे गर्म साल बनने की संभावना बेहद बढ़ गई है। अमेरिका के नॉन प्रॉफिट रिसर्च ग्रुप बर्कले अर्थ के ग्लोबल वेदर के मंथली एनालिसिस के मुताबिक अल नीनो के शक्तिशाली रूप लेने के कारण 2026 के सबसे गर्म साल बनने की संभावना जुलाई में दर्ज 12 फीसदी से बढ़कर अगस्त में सीधे 69 फीसदी पर पहुंच गई है। रिसर्चर्स का मानना है कि इसके अलावा साल 2027 में गर्मी के नए रिकॉर्ड बनने की पूरी उम्मीद है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक बर्कले अर्थ के चीफ साइंटिस्ट रॉबर्ट रोडे ने इसे लेकर चेतावनी देते हुए कहा है कि अगले एक साल या उससे थोड़े अधिक समय में हम कुछ बहुत ही नाटकीय बदलाव देख सकते हैं। यह हमें ऐसी मौसमी स्थितियां देगा जिसकी उम्मीद हम आम तौर पर एक दशक या उससे अधिक समय बाद करते हैं। यह एक बहुत बड़ी घटना साबित होने वाली है।

क्या होता है अल नीनो और कैसे बदलेगा बारिश का पैटर्न?

अल नीनो महीनों तक चलने वाला एक रिकरिंग वेदर फेज है। इसके ग्लोबल लेबल पर गंभीर असर होते हैं। अल नीनो के असर से दुनिया के कई हिस्सों में सूखा पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा प्रतिकूल असर भारत, पश्चिमी और दक्षिणी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में देखने को मिलता है। अल नीनो की वजह से इन इलाकों में बारिश की कमी हो जाती है। वहीं दूसरी ओर अल नीनो की वजह से कुछ दूसरे क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश होती है। उदाहरण के लिए इसके असर से दक्षिणी अमेरिका के इलाकों में भारी बारिश की संभावना बढ़ जाती है।

कितना शक्तिशाली है यह अल नीनो?

वैज्ञानिक पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के एक विशिष्ट क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान से अल नीनो की ताकत का आकलन करते हैं। अनुमान बताते हैं कि प्रशांत महासागर के उस विशिष्ट हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 4 डिग्री सेल्सियस तक असाधारण रूप से अधिक बढ़ जाएगा। इसकी तुलना में 2015 से 2016 के अल नीनो के दौरान समुद्र का तापमान सामान्य से 2.75 डिग्री सेल्सियस अधिक बढ़ा था। इससे यह साफ पता चल रहा है कि मौजूदा अल नीनो कितना खतरनाक है।

यह अल नीनो इस साल जून में शुरू हुआ था। हालांकि इस साल देर वसंत और शुरुआती गर्मियों में पड़ी भीषण गर्मी के लिए अल नीनो जिम्मेदार नहीं था क्योंकि तब तक इसका असर इतना तेज नहीं हुआ था।

जून-जुलाई में टूटे गर्मी के रिकॉर्ड

बर्कले अर्थ के मुताबिक प्रमुख जलवायु डेटासेट के मुताबिक बीता जुलाई का महीना अब तक दर्ज किया गया सबसे गर्म या दूसरा सबसे गर्म जुलाई रहा। जुलाई के महीने में भीषण गर्मी की वजह से फ्रांस और स्पेन में विनाशकारी जंगलों की आग भड़क उठी जबकि अमेरिका के कई हिस्से हीट डोम की वजह से झुलस गए। अमेरिका के मुख्य भूभाग में जुलाई का औसत अधिकतम तापमान 90 साल पुराने उस रिकॉर्ड को तोड़ गया जो डस्ट बाउल के दौर में बना था। वैज्ञानिक रोडे ने चुटकी लेते हुए कहा कि दुनिया का इतना बड़ा हिस्सा झुलस रहा है कि उन जगहों का नाम लेना आसान है जो गर्म नहीं हैं, अंटार्कटिका में इस बार बहुत ही अत्यधिक ठंड वाली सर्दियां रही हैं।

ग्लोबल इकॉनमी और व्यापार पर अल नीनो की मार

कई देशों विशेष रूप से उभरते बाजारों में अल नीनो द्वारा लाई गई भीषण गर्मी और मूसलाधार बारिश ईरान युद्ध के कारण उपजे आर्थिक संकट को और बढ़ा सकती है। उदाहरण के लिए समुद्र के पानी के गर्म होने की वजह से पेरू में एंकोवी मछली के शिकार/पकड़ने पर पूरी तरह से रोक लग गई है।

ग्रीनहाउस गैसों का स्थायी असर

बर्कले अर्थ के वैज्ञानिक ज़ेक हॉसफादर ने अल नीनो की तुलना एक बड़े हथौड़े से करते हुए कहा कि अल नीनो एक विशाल हथौड़े की तरह है जिससे जलवायु पर प्रहार होता है इसलिए यह बहुत सी अलग-अलग चीजों को अस्त-व्यस्त कर देगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि हालांकि अल नीनो किसी एक महीने या साल के तापमान को नाटकीय रूप से प्रभावित कर सकता है लेकिन ग्रीनहाउस गैसों के प्रदूषण से होने वाली ग्लोबल वार्मिंग हमेशा मौजूद रहती है और लगातार बढ़ रही है।

पुतिन पहली बार जापान के दावे वाले कुरील आइलैंड पहुंचे:जापान बोला- ये हमारा हिस्सा; 80 साल से 4 द्वीपों को लेकर दोनों में विवाद

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को पहली बार जापान के दावे वाले विवादित कुरील द्वीप समूह का दौरा किया। क्रेमलिन ने पुतिन के दौरे का वीडियो जारी किया। उन्होंने कुरील द्वीप पर एक फिश प्रोसेसिंग प्लांट का दौरा किया। पुतिन की इस यात्रा के बाद जापान ने कड़ा विरोध जताया और कहा कि यह इलाका उसका हिस्सा है। रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में 4 द्वीपों को लेकर 80 साल से विवाद है। जापान इसे नॉर्दर्न टेरिटरीज कहता है जबकि रूस इन्हें कुरील आइलैंड ग्रुप का हिस्सा मानता है। पुतिन की दौरे से जुड़ी 2 फोटोज रूस और जापान में 4 द्वीपों को लेकर विवाद रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में स्थित चार द्वीपों को लेकर विवाद है। जापान इन्हें नॉर्दर्न टेरिटरीज (उत्तरी क्षेत्र) कहता है, जबकि रूस इन्हें कुरील द्वीप समूह का हिस्सा मानता है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में 1945 में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद यहां रहने वाले करीब 17 हजार जापानी नागरिकों को वहां से हटा दिया गया। 1945 में इन द्वीपों पर कब्जा करने के बाद सोवियत संघ ने यहां हवाई और नौसैनिक अड्डे बनाए। प्रशांत महासागर में अहम जगह पर होने की वजह से इनका सैन्य महत्व बढ़ता गया। आज भी रूस यहां बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य उपकरण तैनात रखता है। तब से इन द्वीपों पर रूस का नियंत्रण है और उसने यहां सैन्य ठिकाने भी बना रखे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ज्यादातर देशों ने आपस में शांति समझौते (पीस ट्रीटी) पर हस्ताक्षर कर दिए थे। कुरील द्वीपों के विवाद की वजह से रूस और जापान आज तक ऐसा नहीं कर पाए हैं। दोनों देशों में नाम लगभग एक जैसे खास बात यह है कि इन विवादित द्वीपों के नाम दोनों देशों में लगभग एक जैसे हैं। रूस इन्हें कुनाशिर, इतुरुप, शिकोतान और हाबोमाई कहता है, जबकि जापान इन्हें कुनाशिरी, एतोरोफू, शिकोतान और हाबोमाई के नाम से जानता है। इन चारों द्वीपों पर करीब 20 हजार लोग रहते हैं। यहां बहुत ठंड पड़ती है, लेकिन सोना-चांदी जैसे खनिज और मछलियों के बड़े भंडार होने की वजह से इन द्वीपों की आर्थिक अहमियत काफी ज्यादा है। रूस 2 द्वीप देने का तैयार हुआ, जापान नहीं माना 1956 में सोवियत संघ और जापान के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने के बाद विवाद सुलझाने की कोशिश शुरू हुई। उस समय सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने शांति समझौते के बदले शिकोतान और हाबोमाई द्वीप जापान को लौटाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन जापान चार से कम मानने को तैयार नहीं था। 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद भी रूस और जापान के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। 2010 में तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव इन विवादित द्वीपों का दौरा करने वाले पहले रूसी राष्ट्रपति बने। इसके बाद रूस ने यहां अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत की, जबकि जापान लगातार अपना दावा दोहराता रहा। यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो गए। अब पुतिन का यह दौरा इन विवादित द्वीपों पर रूस के दावे को फिर से मजबूत करने के मैसेज के तौर पर देखा जा रहा है।

पुतिन पहली बार जापान के दावे वाले कुरील आइलैंड पहुंचे:जापान बोला- ये हमारा हिस्सा; 80 साल से 4 द्वीपों को लेकर दोनों में विवाद

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को पहली बार जापान के दावे वाले विवादित कुरील द्वीप समूह का दौरा किया। क्रेमलिन ने पुतिन के दौरे का वीडियो जारी किया। उन्होंने कुरील द्वीप पर एक फिश प्रोसेसिंग प्लांट का दौरा किया। पुतिन की इस यात्रा के बाद जापान ने कड़ा विरोध जताया और कहा कि यह इलाका उसका हिस्सा है। रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में 4 द्वीपों को लेकर 80 साल से विवाद है। जापान इसे नॉर्दर्न टेरिटरीज कहता है जबकि रूस इन्हें कुरील आइलैंड ग्रुप का हिस्सा मानता है। पुतिन की दौरे से जुड़ी 2 फोटोज रूस और जापान में 4 द्वीपों को लेकर विवाद रूस और जापान के बीच प्रशांत महासागर में स्थित चार द्वीपों को लेकर विवाद है। जापान इन्हें ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज’ (उत्तरी क्षेत्र) कहता है, जबकि रूस इन्हें कुरील द्वीप समूह का हिस्सा मानता है। द्वितीय विश्व युद्ध के आखिरी दिनों में 1945 में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद यहां रहने वाले करीब 17 हजार जापानी नागरिकों को वहां से हटा दिया गया। कब्जे के बाद सोवियत संघ ने यहां हवाई और नौसैनिक अड्डे बनाए। प्रशांत महासागर में रणनीतिक स्थिति होने की वजह से इन द्वीपों का सैन्य महत्व लगातार बढ़ता गया। आज भी रूस यहां बड़ी संख्या में सैनिक और आधुनिक सैन्य उपकरण तैनात रखता है। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ज्यादातर देशों ने आपस में शांति संधि (पीस ट्रीटी) पर हस्ताक्षर कर दिए थे, लेकिन कुरील द्वीपों के विवाद की वजह से रूस और जापान आज तक ऐसा नहीं कर सके हैं। दोनों देशों में नाम लगभग एक जैसे खास बात यह है कि इन विवादित द्वीपों के नाम दोनों देशों में लगभग एक जैसे हैं। रूस इन्हें कुनाशिर, इतुरुप, शिकोतान और हाबोमाई कहता है, जबकि जापान इन्हें कुनाशिरी, एतोरोफू, शिकोतान और हाबोमाई के नाम से जानता है। इन चारों द्वीपों पर करीब 20 हजार लोग रहते हैं। यहां बहुत ठंड पड़ती है, लेकिन सोना-चांदी जैसे खनिज और मछलियों के बड़े भंडार होने की वजह से इन द्वीपों की आर्थिक अहमियत काफी ज्यादा है। रूस 2 द्वीप देने का तैयार हुआ, जापान नहीं माना 1956 में सोवियत संघ और जापान के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने के बाद विवाद सुलझाने की कोशिश शुरू हुई। उस समय सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने शांति समझौते के बदले शिकोतान और हाबोमाई द्वीप जापान को लौटाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन जापान चार से कम मानने को तैयार नहीं था। 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद भी रूस और जापान के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। 2010 में तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव इन विवादित द्वीपों का दौरा करने वाले पहले रूसी राष्ट्रपति बने। इसके बाद रूस ने यहां अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत की, जबकि जापान लगातार अपना दावा दोहराता रहा। यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते और खराब हो गए। अब पुतिन का यह दौरा इन विवादित द्वीपों पर रूस के दावे को फिर से मजबूत करने के मैसेज के तौर पर देखा जा रहा है।

————————— जापान में 200kmph की रफ्तार से आया डॉल्फिन तूफान:2.6 लाख लोगों को घर छोड़ने का आदेश; टोयोटा ने 9 फैक्ट्रियों में काम रोका
जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

चीन में 150 kmph की रफ्तार से टकराया डॉल्फिन तूफान:शंघाई में 150 साल में सबसे ज्यादा बारिश, 10 लाख लोग सुरक्षित जगह पहुंचाए गए

चीन के पूर्वी हिस्से से रविवार को करीब 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान टकराया है। इसके असर से पूर्वी और मध्य चीन में तेज बारिश हो रही है। शंघाई में 150 साल में सबसे ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई है। चीनी अधिकारियों के मुताबिक, तूफान के कारण पिछले कुछ दिनों में 10 लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया गया। साथ ही, 1,500 से ज्यादा इमरजेंसी शेल्टर बनाए गए। चीन के नेशनल मेटियोरोलॉजिकल सेंटर (NMC) ने सोमवार सुबह टाइफून अलर्ट को घटाकर सबसे निचले स्तर के ब्लू अलर्ट पर कर दिया। हालांकि, झेजियांग के कुछ हिस्सों में फ्लैश फ्लड का सबसे गंभीर अलर्ट अभी भी जारी है। कई जगह लैंडफॉल की भी खबरें सामने आई हैं। 943 उड़ाने रद्द की गई, लोकल ट्रेन भी बंद शंघाई में भारी बारिश से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। शहर के दो प्रमुख एयरपोर्ट पर सोमवार को 943 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। दक्षिण-पश्चिम चीन के चेंगदू से रविवार को शंघाई जा रही एक फ्लाइट बारिश के कारण शंघाई में लैंड नहीं कर सकी। विमान को कुछ देर शंघाई के ऊपर चक्कर लगाने के बाद बीजिंग डायवर्ट कर दिया गया। वहां उतरने के बाद विमान रात में चेंगदू लौट गया। इसके अलावा लोकल ट्रेन समेत कई आम लोगों के लिए परिवहन सेवाएं भी बंद रहीं। झेजियांग के निंगबो इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सोमवार दोपहर से उड़ानें फिर शुरू कर दी गईं। हालांकि, एयरपोर्ट ने कहा कि तूफान का असर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में कुछ उड़ानों में देरी हो सकती है या उन्हें रद्द करना पड़ सकता है। बीजिंग में बारिश का रेड अलर्ट जारी चीन की राजधानी बीजिंग भी अलर्ट पर है। शहर के पांच जिलों में सोमवार को भारी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया गया। कुछ इलाकों में भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बताया गया। बीजिंग के मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों तक बारिश जारी रहने की चेतावनी दी है। लोगों को जरूरी काम के अलावा बाहर न निकलने और आउटडोर गतिविधियां रोकने की सलाह दी गई है। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, तूफान अब उत्तर-पश्चिम दिशा में 15 से 20 kmph की रफ्तार से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक, डॉल्फिन का क्लाउड सिस्टम करीब 1,300 km तक फैला है। चीन में बार-बार टाइफून क्यों आते हैं? 1. भूमध्य रेखा के पास और उत्तर में स्थित होना पश्चिमी प्रशांत महासागर में हर साल सबसे ज्यादा 25 से 30 तूफान आते हैं। यह दुनिया भर में आने वाले कुल तूफानों का लगभग 30% है। इसकी वजह इस इलाके का भूमध्य रेखा के पास (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में) स्थित होना है। पृथ्वी के घूमने के कारण यहां हवाओं को गोल घुमाने वाला बल (कोरियोलिस इफेक्ट) बहुत मजबूत होता है। तूफान बनने के बाद ये हवाओं के बहाव के साथ जापान, ताइवान, चीन, कोरिया और फिलीपींस की तरफ बढ़ते हैं। यही वजह है कि इन देशों में सबसे ज्यादा तूफान आते हैं। 2. समुद्र का तेजी से गर्म होना टाइफून बनने और मजबूत होने की सबसे बड़ी वजह गर्म समुद्र है। जब समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है, तो पानी तेजी से भाप बनकर ऊपर उठता है। यह भाप तूफान के लिए ईंधन का काम करती है, जिससे हवाएं और बारिश दोनों बेहद तेज हो जाती हैं। 1901 में दुनिया भर के महासागरों की सतह का औसत तापमान लगभग 15.2°C से 15.3°C था। बीते कुछ साल में यह औसतन वैश्विक समुद्र सतह तापमान 21.1°C को पार कर गया है, जो इतिहास में सबसे ज्यादा है।

चीन में 150 kmph की रफ्तार से टकराया डॉल्फिन तूफान:शंघाई में 150 साल में सबसे ज्यादा बारिश, 10 लाख लोग सुरक्षित जगह पहुंचाए गए

जापान में तबाही मचाने के बाद डॉल्फिन तूफान अब चीन पहुंच गया है। रविवार देर रात इसने पूर्वी चीन के तटीय इलाकों में दस्तक दी। उस समय इसकी रफ्तार करीब 150 किमी प्रति घंटे थी। इसके बाद कई शहरों में तेज बारिश शुरू हो गई। सबसे ज्यादा असर शंघाई में दिखा, जहां पिछले 150 साल में सबसे ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई। चीनी अधिकारियों के मुताबिक, खतरे को देखते हुए 10 लाख से ज्यादा लोगों को पहले ही सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया गया था। चीनी मीडिया SCMP के मुताबिक अब तूफान कमजोर पड़ रहा है। इसलिए चीन की मौसम एजेंसी ने चेतावनी का स्तर घटा दिया है। हालांकि, लगातार बारिश की वजह से बाढ़ आने का खतरा बना हुआ है। कुछ जगहों पर पहाड़ों से मिट्टी और चट्टानें खिसकने की घटनाएं भी हुई हैं। टाइफून की तस्वीरें… 943 उड़ाने रद्द की गई, लोकल ट्रेन भी बंद शंघाई में भारी बारिश से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। शहर के दो प्रमुख एयरपोर्ट पर सोमवार को 943 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। दक्षिण-पश्चिम चीन के चेंगदू से रविवार को शंघाई जा रही एक फ्लाइट बारिश के कारण शंघाई में लैंड नहीं कर सकी। विमान को कुछ देर शंघाई के ऊपर चक्कर लगाने के बाद बीजिंग डायवर्ट कर दिया गया। वहां उतरने के बाद विमान रात में चेंगदू लौट गया। इसके अलावा लोकल ट्रेन समेत कई आम लोगों के लिए परिवहन सेवाएं भी बंद रहीं। झेजियांग के निंगबो इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर सोमवार दोपहर से उड़ानें फिर शुरू कर दी गईं। हालांकि, एयरपोर्ट ने कहा कि तूफान का असर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में कुछ उड़ानों में देरी हो सकती है या उन्हें रद्द करना पड़ सकता है। बीजिंग में बारिश का रेड अलर्ट जारी चीन की राजधानी बीजिंग भी अलर्ट पर है। शहर के पांच जिलों में सोमवार को भारी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया गया। कुछ इलाकों में भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बताया गया। बीजिंग के मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों तक बारिश जारी रहने की चेतावनी दी है। लोगों को जरूरी काम के अलावा बाहर न निकलने और आउटडोर गतिविधियां रोकने की सलाह दी गई है। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, तूफान अब उत्तर-पश्चिम दिशा में 15 से 20 kmph की रफ्तार से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक, डॉल्फिन का क्लाउड सिस्टम करीब 1,300 km तक फैला है। चीन में बार-बार टाइफून क्यों आते हैं? 1. भूमध्य रेखा के पास और उत्तर में स्थित होना पश्चिमी प्रशांत महासागर में हर साल सबसे ज्यादा 25 से 30 तूफान आते हैं। यह दुनिया भर में आने वाले कुल तूफानों का लगभग 30% है। इसकी वजह इस इलाके का भूमध्य रेखा के पास (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में) स्थित होना है। पृथ्वी के घूमने के कारण यहां हवाओं को गोल घुमाने वाला बल (कोरियोलिस इफेक्ट) बहुत मजबूत होता है। तूफान बनने के बाद ये हवाओं के बहाव के साथ जापान, ताइवान, चीन, कोरिया और फिलीपींस की तरफ बढ़ते हैं। यही वजह है कि इन देशों में सबसे ज्यादा तूफान आते हैं। 2. समुद्र का तेजी से गर्म होना टाइफून बनने और मजबूत होने की सबसे बड़ी वजह गर्म समुद्र है। जब समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है, तो पानी तेजी से भाप बनकर ऊपर उठता है। यह भाप तूफान के लिए ईंधन का काम करती है, जिससे हवाएं और बारिश दोनों बेहद तेज हो जाती हैं। 1901 में दुनिया भर के महासागरों की सतह का औसत तापमान लगभग 15.2°C से 15.3°C था। बीते कुछ साल में यह औसतन वैश्विक समुद्र सतह तापमान 21.1°C को पार कर गया है, जो इतिहास में सबसे ज्यादा है।

जापान में 200kmph की रफ्तार से बढ़ रहा डॉल्फिन तूफान:2.6 लाख लोगों को घर छोड़ने का आदेश; टोयोटा ने 9 फैक्ट्रियों में काम रोका

जापान की ओर करीब 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से डॉल्फिन तूफान बढ़ रहा है। इसकी वजह से 2.6 लाख लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं। जबकि 500 से ज्यादा उड़ानें रद्द कर दी गई हैं। हालात को देखते हुए टोयोटा ने भी अपनी 9 फैक्ट्रियों में काम रोक दिया है। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) के मुताबिक, डॉल्फिन कैटेगरी-1 का तूफान है। इसकी लगातार हवा की रफ्तार 144 किमी प्रति घंटा और झोंकों की रफ्तार 198 किमी प्रति घंटा तक पहुंच रही है। यह तूफान क्यूशू और ओकिनावा के बीच स्थित द्वीपों की ओर बढ़ रहा है। ओकिनावा द्वीप पर सबसे ज्यादा असर तूफान की वजह से जापान का ओकिनावा द्वीप बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां छुट्टियां मनाने गए कई हांगकांग के पर्यटक उड़ानें रद्द होने के कारण फंस गए हैं। उन्हें अब जरूरी सामान की कमी, बिजली कटने और पानी की सप्लाई बाधित होने की आशंका का सामना करना पड़ रहा है। हांगकांग से जुड़े ट्रैवल सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा की गई तस्वीरों में सुपरमार्केट की ब्रेड की अलमारियां खाली दिखाई दे रही हैं। वहीं, कई इलाकों में मूसलाधार बारिश और तेज हवाएं चल रही हैं। रविवार को चीन पहुंच सकता है तूफान डॉल्फिन तूफान तेजी से चीन के पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा है। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक, शुक्रवार तक यह तूफान तट से करीब 820 किलोमीटर दूर था। इसके रविवार दोपहर से सोमवार सुबह के बीच झेजियांग और उत्तरी फुजियान के बीच कहीं टकराने की आशंका है। मौसम विभाग ने येलो अलर्ट जारी रखा है, जो चार स्तरों वाली चेतावनी प्रणाली में तीसरा सबसे गंभीर स्तर है। झेजियांग, फुजियान और ताइवान में तेज हवाओं और भारी बारिश की चेतावनी दी गई है। मौसम वैज्ञानिक शेन यूयांग के मुताबिक, शुक्रवार सुबह तक इस तूफान का दायरा झेजियांग प्रांत से करीब 13 गुना बड़ा हो चुका था। झेजियांग का आकार भारत के बिहार राज्य के बराबर है। मौसम विभाग ने कहा कि तूफान का दायरा बहुत बड़ा है, इसलिए सिर्फ तटीय नहीं बल्कि अंदरूनी इलाकों के लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। चीन में AI और ड्रोन की मदद से बचाव कार्य फिलहाल यह साफ नहीं है कि चीन में टकराने के बाद यह किस दिशा में जाएगा। तूफान के 48 घंटे के अलर्ट जोन में पहुंचने के बाद चीन ने तैयारियां और तेज कर दी हैं। सरकारी टीवी सीसीटीवी के मुताबिक, नेशनल मरीन एनवायरनमेंटल फोरकास्टिंग सेंटर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सिस्टम तैयार किया है, जो अगले 240 घंटे (10 दिन) तक तूफान की दिशा, ताकत और कहां टकराएगा, इसका अनुमान लगा सकता है। इसके साथ ही ड्रोन और अन्य आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। जापान और चीन में बार-बार टाइफून क्यों आते हैं? 1. भूमध्य रेखा के पास और उत्तर में स्थित होना पश्चिमी प्रशांत महासागर में हर साल सबसे ज्यादा 25 से 30 तूफान आते हैं। यह दुनिया भर में आने वाले कुल तूफानों का लगभग 30% है। इसकी वजह इस इलाके का भूमध्य रेखा के पास (उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में) स्थित होना है। पृथ्वी के घूमने के कारण यहां हवाओं को गोल घुमाने वाला बल (कोरियोलिस इफेक्ट) बहुत मजबूत होता है। तूफान बनने के बाद ये हवाओं के बहाव के साथ जापान, ताइवान, चीन, कोरिया और फिलीपींस की तरफ बढ़ते हैं। यही वजह है कि इन देशों में सबसे ज्यादा तूफान आते हैं। 2. समुद्र का तेजी से गर्म होना टाइफून बनने और मजबूत होने की सबसे बड़ी वजह गर्म समुद्र है। जब समुद्र की सतह का तापमान बढ़ता है, तो पानी तेजी से भाप बनकर ऊपर उठता है। यह भाप तूफान के लिए ईंधन का काम करती है, जिससे हवाएं और बारिश दोनों बेहद तेज हो जाती हैं। 1901 में दुनिया भर के महासागरों की सतह का औसत तापमान लगभग 15.2°C से 15.3°C था। बीते कुछ साल में यह औसतन वैश्विक समुद्र सतह तापमान 21.1°C को पार कर गया है, जो इतिहास में सबसे ज्यादा है।

रूस- मौत के मुआवजे के लिए शादी कर रही महिलाएं:घायल सैनिकों से मैरिज के मामले बढ़े; अस्पताल और सेना पर भी मिलीभगत के आरोप

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूस में एक नया घोटाला सामने आया है। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक कुछ महिलाओं पर आरोप है कि वे युद्ध पर जाने वाले सैनिकों से जल्दबाजी में शादी करती हैं और उनकी मौत के बाद मिलने वाले सरकारी मुआवजे पर कब्जा कर लेती हैं। रूसी मीडिया और अधिकारी ऐसी महिलाओं को ‘ब्लैक विडो’ कह रहे हैं। रूस में हाल के महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें सैनिकों ने मोर्चे पर जाने से ठीक पहले या अस्पताल में मौत से पहले शादी की। इस पूरे स्कैम में अस्पताल से लेकर सेना तक पर मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं। सबसे चर्चित मामले में एक सैन्य अस्पताल की नर्स पर आरोप लगा कि उसने इलाज करा रहे पांच घायल सैनिकों से अलग-अलग समय पर शादी की। आरोप था कि सैनिकों की मौत के बाद वह उनका मुआवजा लेना चाहती थी। मामला सामने आने के बाद उसे नौकरी से निकाल दिया गया। पिता की मौत के बाद बेटी को पता चला- दो दिन पहले हुई थी शादी सेंट पीटर्सबर्ग की रहने वाली मारिया को सेना ने बताया कि उनके 59 साल पिता यूरी की यूक्रेन युद्ध में गोली लगने से मौत हो गई। लेकिन उन्हें सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब पता चला कि युद्ध पर भेजे जाने से सिर्फ दो दिन पहले उनके पिता ने शादी कर ली थी। मारिया का कहना है कि उन्होंने उस महिला का नाम पहले कभी नहीं सुना था। वह उनके पिता से 22 साल छोटी थी। शादी के बाद वही कानूनी रूप से यूरी की सबसे करीबी रिश्तेदार बन गई और सरकारी मुआवजे की हकदार भी। मारिया का आरोप है कि उनके पिता के साथ धोखा हुआ। उनका यह भी दावा है कि पिता का फ्लैट भी बेच दिया गया और अब उनके पास पिता की याद में सिर्फ उस घर की चाबियां बची हैं, जो अब किसी काम की नहीं हैं। सैनिक की मौत पर मिलता है भारी मुआवजा रूस में युद्ध में मारे गए सैनिक के परिवार को सरकार की ओर से कम से कम 50 लाख रूबल (करीब 62 लाख भारतीय रुपए) की एकमुश्त मदद मिलती है। कई अन्य भुगतान और बीमा जोड़ दिए जाएं तो यह रकम और भी ज्यादा हो सकती है। आरोप है कि कुछ महिलाएं इसी पैसे के लालच में अकेले, बुजुर्ग या कमजोर सैनिकों को शादी के लिए फंसाती हैं। सैनिक की मौत के बाद पूरा मुआवजा पत्नी को मिल जाता है। परिवार के बाकी लोगों को कुछ भी नहीं मिल पाता। सरकार ने जल्दी शादी को बढ़ावा दिया, इसके बाद स्कैम बढ़ा फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने सेना में भर्ती होने वाले लोगों के लिए शादी के नियम आसान कर दिए। आमतौर पर रूस में शादी के लिए आवेदन देने के बाद कुछ समय इंतजार करना पड़ता है, लेकिन युद्ध के दौरान इस प्रक्रिया में छूट दे दी गई। नए सैनिक चाहें तो भर्ती के तुरंत बाद शादी कर सकते थे। सरकार का मानना था कि इससे सैनिकों को परिवार का सहारा मिलेगा और अगर युद्ध में उनकी मौत हो जाती है, तो पत्नी और परिवार को सरकारी आर्थिक मदद आसानी से मिल सकेगी। ‘सैनिक से शादी करो, फ्लैट खरीद लो’ पिछले साल साइबेरिया के टॉम्स्क शहर के एक पॉडकास्ट में रूसी वकील और रियल स्टेट एजेंट मरीना ओरलोवा का बयान बहुत वायरल हुआ था। उन्होंने कहा था, अगर फ्लैट खरीदना है तो किसी ऐसे सैनिक से शादी कर लो जो युद्ध पर जा रहा हो। उसकी मौत के बाद मिलने वाले पैसे से घर खरीद लेना। आजकल कई महिलाएं इसी तरह सस्ते फ्लैट खरीद रही हैं। यह एक बहुत अच्छा बिजनेस है। इसके बाद एजेंट और पॉडकास्ट की होस्ट के खिलाफ मुकदमा चला। दोनों को सामुदायिक सेवा की सजा दी गई और सैनिकों व उनके परिवारों से सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी। तलाक से पहले सैनिक की मौत, पत्नी को मुआवजा नहीं मिला रूसी सैनिक जॉर्जी कोस्तिरको छुट्टी पर जब घर आए तो उसी दौरान उनकी मुलाकात एंजेलिना वार्यूखिना से हुई थी। दोनों ने मुलाकात के महज 10 दिन बाद शादी कर ली। शादी के कुछ ही समय बाद जॉर्जी फिर से यूक्रेन युद्ध के मोर्चे पर लौट गए। जॉर्जी की मां ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद एंजेलिना सोशल मीडिया पर दूसरे पुरुषों के साथ तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करने लगी थीं। इससे दोनों के रिश्ते बिगड़ गए और जॉर्जी ने तलाक की प्रक्रिया शुरू कर दी। हालांकि, एंजेलिना ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि दोनों के बीच बाद में सुलह हो गई थी और सोशल मीडिया पर डाली गई तस्वीरें सिर्फ जॉर्जी को जलाने के लिए थीं। तलाक की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही यूक्रेनी हमले में जॉर्जी की मौत हो गई। रूसी कानून के मुताबिक, उस समय एंजेलिना उनकी कानूनी पत्नी थीं, इसलिए सरकारी मुआवजा पाने का अधिकार उन्हें मिल गया। इस पर जॉर्जी के परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने एंजेलिना को सबसे करीबी कानूनी रिश्तेदार का दर्जा रद्द कर दिया। इस फैसले के बाद उन्हें मुआवजे का अधिकार नहीं मिला। यह मामला पूरे रूस में चर्चा का विषय बना और इसके बाद सैनिकों की मौत के मुआवजे के लिए की जा रही संदिग्ध शादियों पर बहस तेज हो गई। सेना के अधिकारियों पर भी लगे गंभीर आरोप कुछ मामलों में आरोप सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रहे। रूस के प्रिमोर्स्की क्षेत्र में जांच एजेंसियों ने एक वारंट ऑफिसर, एक सार्जेंट और सेना के एक अकाउंटेंट पर भी जांच शुरू की। आरोप है कि ये लोग अनाथों और ऐसे पुरुषों को ढूंढ़ते थे जिनका कोई करीबी रिश्तेदार नहीं था। उनकी जल्दबाजी में शादी कराई जाती थी और फिर उन्हें युद्ध के सबसे खतरनाक मोर्चों पर भेजा जाता था। अगर उनकी मौत हो जाती, तो मुआवजे की रकम आपस में बांट ली जाती। सांसद बोले- परिवारों को बचाइए रूसी सांसद लियोनिद स्लुत्स्की ने कहा कि अब सैनिकों के परिवारों को ऐसे लोगों से बचाने की जरूरत है, जो शादी और मुआवजे के नाम पर ठगी कर रहे हैं। ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए सरकार को जल्द सख्त कानून बनाकर कार्रवाई करनी चाहिए। यूक्रेन युद्ध लंबा खिंचने के साथ रूस में आर्थिक मुश्किलें बढ़ रही हैं। बड़ी संख्या में सैनिकों की मौत हो रही है और लोगों में नाराजगी भी बढ़ रही है। ऐसे माहौल में सैनिकों के मुआवजे के लिए फर्जी शादी कराने के मामले भी तेजी से सामने आ रहे हैं। यही वजह है कि यह मुद्दा अब पूरे रूस में चर्चा का विषय बन गया है।
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यह खबर भी पढ़ें… दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश ने अपना नाम बदला:अब ‘नौरू’ नहीं ‘नाओएरो’ कहलाएगा; 21वीं सदी में 8 देशों ने नाम बदले प्रशांत महासागर में बसे दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश नौरू ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अपना नाम बदल दिया है। अब यह देश आधिकारिक तौर पर ‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’ कहलाएगा। पूरी खबर यहां पढ़ें…

दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश ने अपना नाम बदला:अब ‘नौरू’ नहीं ‘नाओएरो’ कहलाएगा; UN रिकॉर्ड्स में आज से नया नाम लागू

प्रशांत महासागर में बसे दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश नौरू ने ऐसा ही एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। अब यह देश आधिकारिक तौर पर ‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’ कहलाएगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी अपने रिकॉर्ड में नया नाम लागू कर दिया है। करीब 12 हजार आबादी वाले इस द्वीपीय देश का कहना है कि ‘नाओएरो’ उसका असली नाम है, जबकि ‘नौरू’ विदेशी लोगों की सुविधा के लिए प्रचलन में आया था। अब सरकार का मानना है कि समय आ गया है कि देश दुनिया के सामने अपनी मूल पहचान के साथ जाना जाए। नाम बदलने का यह फैसला सिर्फ औपचारिकता नहीं है। सरकार इसे अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को सम्मान देने की पहल मान रही है। इसी सोच के तहत देश ने दशकों पुराना नाम छोड़कर अपनी पारंपरिक पहचान को आधिकारिक रूप से वापस अपना लिया है। आखिर नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? नाओएरो सरकार का कहना है कि ‘नौरू’ उसकी पसंद नहीं, बल्कि विदेशियों की सुविधा का नाम था। असली नाम हमेशा ‘नाओएरो’ ही रहा, लेकिन इसका उच्चारण आसान नहीं होने की वजह से दुनिया ने धीरे-धीरे उसे ‘नौरू’ कहना शुरू कर दिया। समय के साथ यही नाम आधिकारिक पहचान भी बन गया। राष्ट्रपति डेविड एडियांग ने जनवरी में संसद में प्रस्ताव रखते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि देश दुनिया के सामने उसी नाम से जाना जाए, जिसे उसके अपने लोग पीढ़ियों से बोलते आए हैं। उनके मुताबिक, यह सिर्फ नाम बदलने का फैसला नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को उसकी वास्तविक पहचान लौटाने की कोशिश है। शादी में विवाद के बाद 10 साल तक गृहयुद्ध चला 19वीं सदी के आखिर तक नाउरू एक छोटा-सा द्वीप था, जहां 12 स्थानीय जनजातियां रहती थीं। यहां कोई आधुनिक सरकार या सेना नहीं थी। लोगों का जीवन मछली पकड़ने, नारियल की खेती और समुद्र से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर था। 1870 के दशक में यूरोपीय व्यापारी नाउरू पहुंचने लगे। वे यहां नारियल और दूसरे सामान का व्यापार करते थे। बदले में उन्होंने स्थानीय लोगों को शराब और बंदूकें बेचना शुरू कर दिया। इससे द्वीप का सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगा। 1878 में एक शादी समारोह के दौरान रीति-रिवाज को लेकर बहस हुई। बहस के बीच एक व्यक्ति ने पिस्तौल निकालकर गोली चला दी, जिससे एक कबीलाई प्रमुख के बेटे की मौत हो गई। नाउरू की पारंपरिक संस्कृति में ऐसी हत्या का बदला लेना सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता था। यहीं से बदले का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे पूरे द्वीप के 12 कबीलों के बीच गृहयुद्ध में बदल गया। यह संघर्ष करीब 10 साल तक चला, जिसे नाउरू सिविल वॉर के नाम से जाना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए, कई गांव उजड़ गए और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में इस हिंसा से प्रभावित हुआ। हालात इतने खराब हो गए कि आखिरकार 1888 में जर्मनी ने हस्तक्षेप कर द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया, हथियार जब्त किए और इस लंबे खूनी संघर्ष को समाप्त कराया। जर्मनी के बाद ऑस्ट्रेलिया ने नौरू पर कब्जा किया 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होते ही हालात बदल गए। ऑस्ट्रेलियाई सेना ने बिना ज्यादा प्रतिरोध के नाओएरो पर कब्जा कर लिया। युद्ध खत्म होने के बाद जर्मनी हार गया और उसे अपने कई विदेशी उपनिवेश छोड़ने पड़े। करीब पांच दशक तक विदेशी सरकार के कब्जे में रहने के बाद नाओएरो को 31 जनवरी 1968 को पूर्ण स्वतंत्रता मिली और यह एक संप्रभु गणराज्य बन गया। फॉस्फेट से बदली किस्मत, उसी वजह से कंगाल हुआ 1900 में ऑस्ट्रेलियाई भूवैज्ञानिक अल्बर्ट फुलर एलिस ने नाओएरो में फॉस्फेट के विशाल भंडार की खोज की। इसके छह साल बाद व्यावसायिक खनन शुरू हुआ। उस समय फॉस्फेट की दुनिया भर में जबरदस्त मांग थी, क्योंकि इसका इस्तेमाल खेती में खाद बनाने के लिए होता था। देखते ही देखते यह छोटा-सा द्वीप दुनिया के सबसे बड़े फॉस्फेट निर्यातकों में शामिल हो गया। 1968 में आजादी मिलने के बाद नाओएरो सरकार ने धीरे-धीरे फॉस्फेट उद्योग पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया। 1970 के दशक तक फॉस्फेट से होने वाली कमाई इतनी बढ़ गई कि यह दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाने लगा। प्रति व्यक्ति आय कई विकसित देशों के बराबर पहुंच गई। सरकार के पास इतना पैसा था कि शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी कई सुविधाएं लोगों को लगभग मुफ्त मिलने लगीं। देश ने विदेशों में होटल, इमारतें और दूसरी संपत्तियां खरीदकर भी निवेश किया। लेकिन यह समृद्धि ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। लगातार खनन की वजह से फॉस्फेट के भंडार तेजी से खत्म होने लगे। आय का सबसे बड़ा स्रोत सूख गया और विदेशों में किए गए कई निवेश भी घाटे में चले गए। 1990 के दशक तक नाओएरो गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया। जिस फॉस्फेट ने कभी इस छोटे से द्वीप को दुनिया के सबसे अमीर देशों की सूची में पहुंचाया था, उसी के खत्म होने के बाद देश आर्थिक तंगी से जूझने लगा। आज भी देश उस दौर के असर से पूरी तरह उबर नहीं पाया है। अब जलवायु परिवर्तन से अस्तित्व पर खतरा आर्थिक चुनौतियों के बीच अब नाओएरो के सामने सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर इस द्वीपीय देश के लिए लगातार खतरा बनता जा रहा है। कई वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाले दशकों में देश के कई हिस्से रहने लायक नहीं बचेंगे। 1993 के बाद से नाओएरो के आसपास समुद्र का जलस्तर हर साल औसतन करीब 5 मिलीमीटर बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत से ज्यादा है। अगर यही रफ्तार बनी रही तो इस सदी के अंत तक समुद्र का स्तर 20 से 57 सेंटीमीटर तक और बढ़ सकता है। समस्या सिर्फ समुद्र के बढ़ने की नहीं है। नाओएरो के पास लोगों को बसाने के लिए सुरक्षित जमीन भी बहुत कम बची है। दशकों तक फॉस्फेट खनन की वजह से द्वीप का करीब 80% अंदरूनी हिस्सा बंजर हो चुका है। ऐसे में आबादी का बड़ा हिस्सा समुद्र किनारे रहने को मजबूर है, जहां हर साल तटीय कटाव और ऊंची लहरों का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसी खतरे से निपटने के लिए सरकार ने विदेशी नागरिकों को निवेश के बदले नागरिकता देने की योजना शुरू की है। इससे मिलने वाली रकम का इस्तेमाल लोगों और जरूरी बुनियादी ढांचे को सुरक्षित ऊंचे इलाकों में बसाने और जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर किया जाएगा। चार साल पहले तुर्किये ने भी नाम बदला था नाओएरो का फैसला दुनिया में बढ़ रहे उस चलन का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें देश अपनी स्थानीय भाषा और ऐतिहासिक पहचान को फिर से प्रमुखता दे रहे हैं। इससे पहले 2018 में अफ्रीकी देश स्वाजीलैंड ने अपना नाम बदलकर इस्वातिनी कर लिया था। वहीं 2022 में तुर्की ने संयुक्त राष्ट्र से अनुरोध कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना आधिकारिक नाम तुर्किये करवा लिया था। नाओएरो का मानना है कि किसी देश की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति और इतिहास से भी तय होती है। इसी सोच के साथ उसने दुनिया के सामने अपनी मूल पहचान को आधिकारिक रूप से वापस स्थापित करने का फैसला किया है।

El Nino Counter: अल-नीनो के खतरे के बीच आई बड़ी खुशखबरी! पॉजिटिव IOD लाएगा झमाझम बारिश, WMO की रिपोर्ट में दावा

India Mansoon Update: मानसून सत्र के दौरान जहां अल-नीनो के असर से सामान्य से कम बारिश का खतरा मंडरा रहा है। वहीं इस बीच एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पॉजिटिव इंडियन ओशन डिपोल (Positive IOD) बनने की संभावना जताई गई है। यह पॉजिटिव IOD अल-नीनो के निगेटिव इंपैक्ट को आंशिक रूप से बेअसर कर सकता है, जिससे देश भर में बारिश की स्थिति में सुधार होने की उम्मीद है।

क्या है अल-नीनो और पॉजिटिव IOD? समझिए मौसम का गणित

मौसम के इस चक्र और मानसून पर इसके प्रभाव को समझने के लिए दोनों स्थितियों का अंतर जानना जरूरी है। अल-नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह के पानी के गर्म होने का एक जलवायवीय पैटर्न है। भारत में इसका सीधा संबंध कमजोर मानसून और भीषण गर्मी से होता है। पॉजिटिव IOD उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर (Indian Ocean) के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों की समुद्री सतह के तापमान का अंतर है। जब पॉजिटिव IOD बनता है तो इससे मानसून की हवाएं मजबूत होती हैं जो देश में बेहतर और झमाझम बारिश में मदद करती हैं।

दक्षिण भारत को राहत की उम्मीद, 22% की कमी होगी पूरी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के पूर्वानुमान से उन इलाकों को सबसे ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद है जहां अब तक बारिश की कमी रही है। 1 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की 22% कमी दर्ज की गई है। अब पॉजिटिव IOD के सक्रिय होने से न सिर्फ दक्षिण भारत, बल्कि देश के कई अन्य हिस्सों में भी मानसूनी बारिश की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है।

सुपर अल-नीनो जैसी कोई आधिकारिक कैटिगरी नहीं: सरकार

उधर पिछले दिनों केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में अल-नीनो से जुड़े भ्रम को दूर करते हुए स्थिति स्पष्ट की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि WMO या पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा आधिकारिक तौर पर सुपर अल-नीनो नाम की कोई कैटिगरी परिभाषित नहीं है। भूमध्यरेखीय मध्य प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान की विसंगतियों के आधार पर अल-नीनो घटनाओं को कमजोर, मध्यम, मजबूत या बहुत मजबूत श्रेणियों में बांटा जाता है।

जून में कमजोर, जुलाई में मध्यम हुआ अल-नीनो: IMD का अपडेट

राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक IMD ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान अल-नीनो स्थितियां विकसित होने की भविष्यवाणी की थी। जून 2026 के दौरान अल-नीनो की स्थिति कमजोर थी, जो जुलाई 2026 में बढ़कर मध्यम स्तर तक पहुंच गई।

अक्टूबर से दिसंबर 2026 के सीजन के दौरान अल-नीनो के और मजबूत होने की संभावना है और यह बहुत मजबूत श्रेणी तक पहुंच सकता है। भारत पर इसका सटीक असर सिर्फ अल-नीनो ही नहीं बल्कि महासागर और वायुमंडल के संयुक्त संबंधों के क्रमिक विकास पर निर्भर करता है।

IMD जारी कर रहा है नियमित चेतावनियां और आईबीएफ रिपोर्ट

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) अल-नीनो और अन्य जलवायु घटकों की लगातार निगरानी कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ दूसरे स्टेकहोल्डर्स को नियमित रूप से मौसमी, मासिक और विस्तारित सीमा के पूर्वानुमान जारी किए जा रहे हैं।

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इसके अतिरिक्त, आपदा प्रबंधन अधिकारियों, राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों की तैयारियों व त्वरित प्रतिक्रिया में सहायता के लिए IMD दैनिक आधार पर अगले 7 दिनों के लिए प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान और जोखिम-आधारित चेतावनियां दी जा रही हैं।

IMD की चेतावनी- अल-नीनो की वजह से अगस्त-सितंबर में बारिश को लेकर आया नया अनुमान, मौसम विभाग ने कही चिंता वाली बात

El Nino impact: दक्षिण-पश्चिम मानसून के दूसरे चरण यानी अगस्त और सितंबर महीने को लेकर भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक चिंताजनक पूर्वानुमान जारी किया है। मौसम विभाग ने बताया है कि अल-नीनो के मजबूत होने की वजह से देश में मानसून के दूसरे छमाही के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। मौसम विभाग ने अगस्त 2026 के लिए बारिश और तापमान के डिटेल अनुमान के साथ-साथ प्रशांत महासागर और हिंद महासागर की मौसमी स्थितियों पर भी अपनी रिपोर्ट साझा की है।

अगस्त-सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान

IMD के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 के दूसरे चरण (अगस्त-सितंबर) के दौरान देश भर में कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) के 94 प्रतिशत से कम यानी सामान्य से कम रहने की संभावना है। इसी दौरान देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होगी।वैसे प्रायद्वीपीय भारत कुछ हिस्सों, मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत के उत्तरी क्षेत्रों और पूर्व व पूर्वोत्तर भारत के कुछ इलाकों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की जा सकती है।

अगस्त महीने में कैसा रहेगा बारिश का हाल?

अगस्त 2026 के लिए विशेष रूप से जारी पूर्वानुमान में IMD ने बताया कि इस महीने भी देश भर में कुल बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के 94 प्रतिशत से कम यानी सामान्य से कम रहने की उम्मीद है। देश के बड़े हिस्से में सूखा या कम बारिश का सामना करना पड़ सकता है। इस महीने में भी पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कई क्षेत्रों, उत्तर-पश्चिम व मध्य भारत के कुछ हिस्सों और पूर्व व पूर्वोत्तर भारत के अलग-अलग इलाकों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान जताया गया है।

अगस्त में तापमान का पूर्वानुमान: बढ़ेगी गर्मी और उमस

बारिश में कमी के साथ-साथ अगस्त महीने में देश के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने वाला है। अगस्त 2026 के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में मासिक औसत अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। सिर्फ उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों और उससे सटे दक्षिणी प्रायद्वीप के छिटपुट इलाकों में औसत अधिकतम तापमान सामान्य या सामान्य से कम रह सकता है। देश के अधिकांश हिस्सों में रात और सुबह का मासिक औसत न्यूनतम तापमान भी सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक दर्ज किए जाने की उम्मीद है।

अल-नीनो बना बड़ी चिंता, इसके और मजबूत होने के संकेत

मौसम विभाग ने मानसून के दूसरे चरण में बारिश की कमी की मुख्य वजह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में बने अल-नीनो असर को बताया है। अभी मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बना हुआ है। ऐसे में मॉडरेट अल-नीनो देखने को मिल रहा है। मानसून मिशन कपल्ड फॉरकास्ट सिस्टम (MMCFS) के पूर्वानुमान के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून के बाकी सीजन के दौरान अल-नीनो की यह स्थिति और अधिक मजबूत होने की आशंका है, जो मानसूनी हवाओं और बारिश को प्रभावित कर सकती है।

हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) की क्या है स्थिति?

अभी हिंद महासागर में न्यूट्रल इंडियन ओशिनिक डिपोल (IOD) की स्थिति बनी हुई है। MMCFS के मॉडल संकेत देते हैं कि मानसून सीजन के बाकी बचे समय में यह तटस्थ स्थिति जारी रह सकती है। कुछ अंतरराष्ट्रीय पूर्वानुमान केंद्रों के जलवायु अनुमानों से संकेत मिलता है कि सितंबर 2026 के दौरान पॉजिटिव आईओडी स्थितियां भी बन सकती हैं। ये मानसून के लिए कुछ हद तक राहतकारी साबित हो सकती हैं।

आज 1 अगस्त भारी बारिश की चेतवानी: IMD ने 21+ राज्यों के लिए बारिश का अलर्ट दिया, दिल्ली-राजस्थान से गुजरात तक मौसम का रौद्र रूप