कनाडा के गुरुद्वारे में गोलक के हिसाब को लेकर 2 गुट आपस में भिड़ गए। जिस वक्त ये घटना हुई, गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की मीटिंग चल रही थी। इस दौरान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान एक मेंबर की तरफ बरछा (भाला) ताने हुए नजर आए। मेहर सिंह गुट के लोगों ने आरोप लगाया कि प्रधान ने हमला करने की कोशिश की। इसके बाद दोनों गुटों में भिड़ंत हो गई। उन्होंने एक-दूसरे से धक्कामुक्की की और वहां जमकर हंगामा हो गया। इस झगड़े का CCTV फुटेज सामने आया है। जिसे 2 अगस्त को ‘जट्ट वी लाइक कनाडा’ नाम के इंस्टाग्राम पेज पर शेयर किया गया। इसी पेज पर प्रधान का एक कथित ऑडियो भी पोस्ट किया गया, जिसमें उन पर लड़कियों को फोन करने के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, दैनिक भास्कर इस ऑडियो की पुष्टि नहीं करता। 5 पॉइंट में जानें, CCTV में क्या दिख रहा… प्रधान पर क्या आरोप हैं?
गुरुद्वारे के प्रधान सुरजीत सिंह पंजाब के अमृतसर जिले के चिट्टा गांव के रहने वाले हैं। वह पिछले करीब 10 साल से गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी से जुड़े हैं। आरोप है कि गोलक का हिसाब मांगने पर उन्होंने गुस्से में हमला करने की कोशिश की। पुलिस की ओर से आधिकारिक जानकारी नहीं
खबर लिखे जाने तक मॉन्ट्रियाल पुलिस की ओर से इस मामले में किसी शिकायत, केस दर्ज होने या कार्रवाई की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। घटना का CCTV सोशल मीडिया पर वायरल है। घटना के बाद संगत में नाराजगी
वीडियो सामने आने के बाद कनाडा में सिख संगत और भारतीय समुदाय में नाराजगी है। श्रद्धालुओं ने धार्मिक स्थल पर हिंसा और हथियार निकालने को गुरु घर की मर्यादा के खिलाफ बताया। संगत ने गोलक के पैसों की निष्पक्ष जांच, प्रधान को पद से हटाने और नए प्रबंधक की नियुक्ति की मांग की है। ************** ये खबर भी पढ़ें…
अमेरिकी पुलिस गुरुद्वारे में जूते पहनकर घुसी, VIDEO:सिर भी नंगा; गोलक को लेकर हुआ था झगड़ा अमेरिका की पुलिस एक गुरुद्वारे में जूते पहनकर ही अंदर घुस गई। जिस जगह पुलिस वाले खड़े थे, वहीं पर श्री गुरू ग्रंथ साहिब का पवित्र स्वरूप भी रखा हुआ था। इसका वीडियो सामने आते ही पंजाब में सिख संगठनों में गुस्सा है। उन्होंने इसे मर्यादा के उलट बताया है। पुलिस यहां गोलक को लेकर हुए विवाद के बाद आई थी (पढ़ें पूरी खबर)
प्रशांत महासागर में बसे दुनिया के तीसरे सबसे छोटे देश नौरू ने ऐसा ही एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। अब यह देश आधिकारिक तौर पर ‘रिपब्लिक ऑफ नाओएरो’ कहलाएगा। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी अपने रिकॉर्ड में नया नाम लागू कर दिया है। करीब 12 हजार आबादी वाले इस द्वीपीय देश का कहना है कि ‘नाओएरो’ उसका असली नाम है, जबकि ‘नौरू’ विदेशी लोगों की सुविधा के लिए प्रचलन में आया था। अब सरकार का मानना है कि समय आ गया है कि देश दुनिया के सामने अपनी मूल पहचान के साथ जाना जाए। नाम बदलने का यह फैसला सिर्फ औपचारिकता नहीं है। सरकार इसे अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को सम्मान देने की पहल मान रही है। इसी सोच के तहत देश ने दशकों पुराना नाम छोड़कर अपनी पारंपरिक पहचान को आधिकारिक रूप से वापस अपना लिया है। आखिर नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? नाओएरो सरकार का कहना है कि ‘नौरू’ उसकी पसंद नहीं, बल्कि विदेशियों की सुविधा का नाम था। असली नाम हमेशा ‘नाओएरो’ ही रहा, लेकिन इसका उच्चारण आसान नहीं होने की वजह से दुनिया ने धीरे-धीरे उसे ‘नौरू’ कहना शुरू कर दिया। समय के साथ यही नाम आधिकारिक पहचान भी बन गया। राष्ट्रपति डेविड एडियांग ने जनवरी में संसद में प्रस्ताव रखते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि देश दुनिया के सामने उसी नाम से जाना जाए, जिसे उसके अपने लोग पीढ़ियों से बोलते आए हैं। उनके मुताबिक, यह सिर्फ नाम बदलने का फैसला नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को उसकी वास्तविक पहचान लौटाने की कोशिश है। शादी में विवाद के बाद 10 साल तक गृहयुद्ध चला 19वीं सदी के आखिर तक नाउरू एक छोटा-सा द्वीप था, जहां 12 स्थानीय जनजातियां रहती थीं। यहां कोई आधुनिक सरकार या सेना नहीं थी। लोगों का जीवन मछली पकड़ने, नारियल की खेती और समुद्र से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर था। 1870 के दशक में यूरोपीय व्यापारी नाउरू पहुंचने लगे। वे यहां नारियल और दूसरे सामान का व्यापार करते थे। बदले में उन्होंने स्थानीय लोगों को शराब और बंदूकें बेचना शुरू कर दिया। इससे द्वीप का सामाजिक संतुलन बिगड़ने लगा। 1878 में एक शादी समारोह के दौरान रीति-रिवाज को लेकर बहस हुई। बहस के बीच एक व्यक्ति ने पिस्तौल निकालकर गोली चला दी, जिससे एक कबीलाई प्रमुख के बेटे की मौत हो गई। नाउरू की पारंपरिक संस्कृति में ऐसी हत्या का बदला लेना सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता था। यहीं से बदले का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे पूरे द्वीप के 12 कबीलों के बीच गृहयुद्ध में बदल गया। यह संघर्ष करीब 10 साल तक चला, जिसे नाउरू सिविल वॉर के नाम से जाना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए, कई गांव उजड़ गए और लगभग हर परिवार किसी न किसी रूप में इस हिंसा से प्रभावित हुआ। हालात इतने खराब हो गए कि आखिरकार 1888 में जर्मनी ने हस्तक्षेप कर द्वीप पर नियंत्रण स्थापित किया, हथियार जब्त किए और इस लंबे खूनी संघर्ष को समाप्त कराया। जर्मनी के बाद ऑस्ट्रेलिया ने नौरू पर कब्जा किया 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होते ही हालात बदल गए। ऑस्ट्रेलियाई सेना ने बिना ज्यादा प्रतिरोध के नाओएरो पर कब्जा कर लिया। युद्ध खत्म होने के बाद जर्मनी हार गया और उसे अपने कई विदेशी उपनिवेश छोड़ने पड़े। करीब पांच दशक तक विदेशी सरकार के कब्जे में रहने के बाद नाओएरो को 31 जनवरी 1968 को पूर्ण स्वतंत्रता मिली और यह एक संप्रभु गणराज्य बन गया। फॉस्फेट से बदली किस्मत, उसी वजह से कंगाल हुआ 1900 में ऑस्ट्रेलियाई भूवैज्ञानिक अल्बर्ट फुलर एलिस ने नाओएरो में फॉस्फेट के विशाल भंडार की खोज की। इसके छह साल बाद व्यावसायिक खनन शुरू हुआ। उस समय फॉस्फेट की दुनिया भर में जबरदस्त मांग थी, क्योंकि इसका इस्तेमाल खेती में खाद बनाने के लिए होता था। देखते ही देखते यह छोटा-सा द्वीप दुनिया के सबसे बड़े फॉस्फेट निर्यातकों में शामिल हो गया। 1968 में आजादी मिलने के बाद नाओएरो सरकार ने धीरे-धीरे फॉस्फेट उद्योग पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया। 1970 के दशक तक फॉस्फेट से होने वाली कमाई इतनी बढ़ गई कि यह दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाने लगा। प्रति व्यक्ति आय कई विकसित देशों के बराबर पहुंच गई। सरकार के पास इतना पैसा था कि शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी कई सुविधाएं लोगों को लगभग मुफ्त मिलने लगीं। देश ने विदेशों में होटल, इमारतें और दूसरी संपत्तियां खरीदकर भी निवेश किया। लेकिन यह समृद्धि ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। लगातार खनन की वजह से फॉस्फेट के भंडार तेजी से खत्म होने लगे। आय का सबसे बड़ा स्रोत सूख गया और विदेशों में किए गए कई निवेश भी घाटे में चले गए। 1990 के दशक तक नाओएरो गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया। जिस फॉस्फेट ने कभी इस छोटे से द्वीप को दुनिया के सबसे अमीर देशों की सूची में पहुंचाया था, उसी के खत्म होने के बाद देश आर्थिक तंगी से जूझने लगा। आज भी देश उस दौर के असर से पूरी तरह उबर नहीं पाया है। अब जलवायु परिवर्तन से अस्तित्व पर खतरा आर्थिक चुनौतियों के बीच अब नाओएरो के सामने सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर इस द्वीपीय देश के लिए लगातार खतरा बनता जा रहा है। कई वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि अगर यही स्थिति रही तो आने वाले दशकों में देश के कई हिस्से रहने लायक नहीं बचेंगे। 1993 के बाद से नाओएरो के आसपास समुद्र का जलस्तर हर साल औसतन करीब 5 मिलीमीटर बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत से ज्यादा है। अगर यही रफ्तार बनी रही तो इस सदी के अंत तक समुद्र का स्तर 20 से 57 सेंटीमीटर तक और बढ़ सकता है। समस्या सिर्फ समुद्र के बढ़ने की नहीं है। नाओएरो के पास लोगों को बसाने के लिए सुरक्षित जमीन भी बहुत कम बची है। दशकों तक फॉस्फेट खनन की वजह से द्वीप का करीब 80% अंदरूनी हिस्सा बंजर हो चुका है। ऐसे में आबादी का बड़ा हिस्सा समुद्र किनारे रहने को मजबूर है, जहां हर साल तटीय कटाव और ऊंची लहरों का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसी खतरे से निपटने के लिए सरकार ने विदेशी नागरिकों को निवेश के बदले नागरिकता देने की योजना शुरू की है। इससे मिलने वाली रकम का इस्तेमाल लोगों और जरूरी बुनियादी ढांचे को सुरक्षित ऊंचे इलाकों में बसाने और जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर किया जाएगा। चार साल पहले तुर्किये ने भी नाम बदला था नाओएरो का फैसला दुनिया में बढ़ रहे उस चलन का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें देश अपनी स्थानीय भाषा और ऐतिहासिक पहचान को फिर से प्रमुखता दे रहे हैं। इससे पहले 2018 में अफ्रीकी देश स्वाजीलैंड ने अपना नाम बदलकर इस्वातिनी कर लिया था। वहीं 2022 में तुर्की ने संयुक्त राष्ट्र से अनुरोध कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना आधिकारिक नाम तुर्किये करवा लिया था। नाओएरो का मानना है कि किसी देश की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति और इतिहास से भी तय होती है। इसी सोच के साथ उसने दुनिया के सामने अपनी मूल पहचान को आधिकारिक रूप से वापस स्थापित करने का फैसला किया है।
Pappu Yadav Update: निर्दलीय सांसद पप्पू यादव के दिल्ली स्थित आवास पर रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुए हंगामे और धक्का-मुक्की के मामले में पुलिस ने दो लोगों को हिरासत में लिया है। इनमें से एक आरोपी की पहचान उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर निवासी हैप्पी शर्मा के रूप में हुई है। घटना के बाद सांसद पप्पू यादव ने अपने ऊपर जानलेवा हमले और आरोपियों के पास चाकू होने का आरोप लगाया था जबकि आरोपी हैप्पी शर्मा ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए अपना पक्ष रखा है।
कौन है हैप्पी शर्मा और क्यों आया था दिल्ली?
एएनआई के साथ बातचीत में हैप्पी शर्मा ने बताया है कि वो उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर का रहने वाला है। घटना के वक्त उसके साथ उसका दोस्त सुमित गिरी गोस्वामी भी मौजूद था, जो बुलंदशहर के ही सेहपानी गांव का निवासी है। हैप्पी शर्मा के मुताबिक, वह और उसका दोस्त बुलंदशहर से दिल्ली में साधु-संतों के एक विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने और उनका समर्थन करने आए थे। जब वे धरना स्थल पहुंचे तो वहां से संतों को हटाया जा चुका था। इसके बाद उन्होंने सांसद पप्पू यादव से मिलकर सवाल पूछने का फैसला किया।
हैप्पी शर्मा ने पुलिस और मीडिया को बताया कि उसने खबरों में देखा था कि सांसद पप्पू यादव साधु-संतों, सनातन धर्म, भगवा वस्त्रों और पूज्य देवी-देवताओं को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां करते हैं। आरोपी का कहना है कि वह और उसका साथी सिर्फ सांसद से यह कहने गए थे कि वे भगवान राम और संतों का अपमान करना तथा ऐसी बयानबाजी बंद करें। वे वहां किसी तरह का हमला करने या हिंसा करने की नीयत से नहीं गए थे।
WATCH | Delhi | Chaos at Pappu Yadav’s residence during press conference | One of the accused, Happy Sharma, says, “I am from Bulandshahr…A protest by sadhus and saints was taking place, and we had come from Bulandshahr to support them. We had seen in the news that Pappu Yadav… pic.twitter.com/J7t8VnkqAr
— ANI (@ANI) August 2, 2026
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हंगामे और मारपीट का पूरा वाकया
घटना उस समय हुई जब पप्पू यादव अपने दिल्ली आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। हैप्पी शर्मा का दावा है कि सांसद आवास में प्रवेश करने से पहले मुख्य द्वार पर उनकी बाकायदा सुरक्षा जांच हुई थी। उनके पास कोई हथियार या आपत्तिजनक सामान नहीं था, इसलिए उन्हें अंदर जाने दिया गया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने सांसद से साधु-संतों के अपमान और सांसद अवधेश प्रसाद के चरणों में झुकने को लेकर सवाल किया, जिससे वहां कहासुनी और बहस शुरू हो गई। हैप्पी शर्मा का दावा है कि सिर्फ सवाल पूछने पर पप्पू यादव और उनके समर्थकों ने उन पर हमला कर दिया और उन्हें बहुत बेरहमी से पीटा। हैप्पी शर्मा के अनुसार समर्थकों द्वारा उनके साथ मारपीट किए जाने के बाद ही चप्पलें फेंकी गई थीं।
चाकू और जानलेवा हमले के दावों पर दी सफाई
सांसद पप्पू यादव और उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए चाकू से हमले के आरोपों पर सफाई देते हुए हैप्पी शर्मा ने कहा कि गेट पर चेकिंग होने के कारण अंदर कोई हथियार ले जाना मुमकिन ही नहीं था। उसने कहा कि पूरी घटना पत्रकारों के सामने हुई और लाइव कवरेज हो रही थी, इसलिए चाकू होने का सवाल ही नहीं उठता। उसने आरोप लगाया कि उन्हें झूठे मामले में फंसाने की कोशिश की जा रही है। घटना की सूचना मिलने पर दिल्ली पुलिस ने तुरंत मौके पर पहुंचकर दोनों युवकों को हिरासत में ले लिया। सुमित को पुलिस थाने ले जाया गया जबकि पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है।
रूस के ताजा मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने अमेरिका और यूरोपीय देशों से तुरंत पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम के इंटरसेप्टर मिसाइल भेजने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ये मिसाइलें लोगों की जान बचाने के लिए हैं, इसलिए इन्हें गोदामों में रखने के बजाय यूक्रेन भेजा जाना चाहिए। रूस ने शनिवार रात कीव समेत कई शहरों पर बड़े पैमाने पर हमला किया था। यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक हमले में 9 लोगों की मौत हुई, जबकि करीब 40 लोग घायल हुए हैं। जेलेंस्की बोले- पैट्रियट नहीं, इसलिए सिर्फ एक मिसाइल रोक पाए जेलेंस्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि रूस ने रातभर में 35 मिसाइलें, जिनमें 27 बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, और करीब 185-190 ड्रोन दागे। इनमें से यूक्रेन केवल एक बैलिस्टिक मिसाइल को ही रोक सका, क्योंकि पैट्रियट सिस्टम के लिए इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार लगभग खत्म हो चुका है। उन्होंने कहा, “अमेरिका और यूरोप जानते हैं कि हमें क्या चाहिए। अब केवल राजनीतिक फैसला लेने की जरूरत है। बैलिस्टिक रोधी मिसाइलें लोगों की रक्षा करें, गोदामों में न पड़ी रहें। हर दिन की देरी रूस को हमारे लोगों की जान लेने का एक और मौका देती है।” जेलेंस्की बोले- रूस नई रणनीति अपना रहा, नए प्रतिबंध लगाएं जेलेंस्की ने दावा किया कि रूस अब जेट इंजन से लैस शाहेद ड्रोन का अधिक इस्तेमाल कर रहा है और युद्ध लंबा खिंचने का फायदा उठाकर नई हमलावर रणनीतियां विकसित कर रहा है। उन्होंने अमेरिका और यूरोपीय सहयोगियों से रूस के मिसाइल, लॉन्चर और हथियार उद्योग से जुड़े लोगों और कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाने की भी अपील की। साथ ही कहा कि रूस के तेल शोधन और ईंधन क्षेत्र को मिलने वाली मदद रोकना भी जरूरी है, ताकि उसकी युद्ध क्षमता कमजोर हो सके। रूस बोला- सैन्य ठिकानों को बनाया निशाना रूसी रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि हमले में कीव स्थित यूक्रेन के सैन्य-औद्योगिक प्रतिष्ठानों और लॉजिस्टिक्स केंद्रों को निशाना बनाया गया। वहीं यूक्रेन का कहना है कि हमले में रिहायशी इलाके और नागरिक भी प्रभावित हुए। जेलेंस्की ने रक्षा मंत्री रुस्तम उमेरोव और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अमेरिका के साथ होने वाली आगामी कूटनीतिक बातचीत की भी समीक्षा की। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यूक्रेन को हथियारों और वायु रक्षा प्रणाली को लेकर सहयोगी देशों से ठोस समर्थन मिलेगा। पैट्रियट मिसाइल सिस्टम क्या है पैट्रियट अमेरिका का अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम है, जिसे दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और लड़ाकू विमानों को हवा में ही मार गिराने के लिए बनाया गया है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह बेहद कम समय में आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को भी इंटरसेप्ट कर सकता है। इसी वजह से रूस के लगातार बढ़ते मिसाइल हमलों के बीच यह यूक्रेन की सबसे अहम सुरक्षा ढाल माना जाता है। पैट्रियट सिस्टम में लॉन्चर, रडार, कमांड सेंटर और इंटरसेप्टर मिसाइलें शामिल होती हैं। रडार पहले लक्ष्य की पहचान करता है, फिर कमांड सेंटर खतरे का आकलन कर इंटरसेप्टर मिसाइल दागता है, जो हवा में ही दुश्मन की मिसाइल को नष्ट कर देती है।
ईरान के कार्यवाहक रक्षा मंत्री माजिद इब्न अल-रेजा ने कहा कि अमेरिका अपने सैन्य मकसद पूरे नहीं कर पाया है। लेकिन इससे ईरान को ढील नहीं देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को भविष्य की जंग के लिए और तेजी से तैयारी करनी होगी। माजिद ने कहा, दुश्मन अपने मकसद में नाकाम रहा है, लेकिन हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। जंग की तैयारी, नई तकनीक और रक्षा क्षमता को पहले से ज्यादा तेजी से बढ़ाना होगा। रक्षा मंत्री ने स्पेस टेक्नोलॉजी, इंटेलिजेंस, कम लागत में हथियार बनाने और रक्षा उद्योग को मजबूत करने को सरकार की प्राथमिकता बताया। उधर, एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने शनिवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से फोन पर बात की। उन्होंने ईरान के खिलाफ संभावित बड़े सैन्य हमले पर चिंता जताई और ट्रम्प से संयम बरतने के साथ इस योजना को टालने की अपील की। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 30 जुलाई को दावा किया कि गाजा को लेकर ऐतिहासिक समझौता हो गया है। हमास हथियार छोड़ने के लिए तैयार हो गया है। इसके साथ ही इजराइली सेना भी गाजा से पीछे हट जाएगी। ट्रम्प के ऐलान के बाद से सवाल पूछे जाने लगे हैं कि क्या इजराइल सच में गाजा से अपनी सेना हटा लेगा? यही शर्त अब इजराइल की राजनीति में सबसे बड़े विवाद की वजह बन गई है। इजराइल में कई नेता और वहां का मीडिया इस समझौते को लेकर नाराज हैं।
एक तरफ ट्रम्प दावा कर रहे हैं कि इजराइल इस समझौते से बेहद खुश है। दूसरी तरफ इजराइल ने अब तक इसे लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक इजराइली सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि जब तक हमास के पूरी तरह हथियार छोड़ने का पक्का भरोसा नहीं हो जाता, तब तक गाजा से सेना हटाने का सवाल ही नहीं उठता। गाजा से सेना हटाने का इजराइल में इतना विरोध क्यों? 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल ने गाजा में बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया। तब से अब तक 73 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं और गाजा का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है। इसके बावजूद इजराइल में बड़ी संख्या में लोग अब भी गाजा के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई के पक्ष में हैं। मई में हुए एक सर्वे में 82% यहूदी इजराइलियों ने गाजा के फिलिस्तीनियों को उनके घरों से हटाने का समर्थन किया। 56% लोगों ने इजराइल के भीतर रहने वाले फिलिस्तीनी नागरिकों को भी हटाने की बात कही। जाहिर है कि गाजा से सेना हटाने और वहां दोबारा फिलिस्तीनी सरकार बहाल करने का विचार इजराइल में कई लोगों को पसंद नहीं है। उन्हें डर है कि अगर सेना हट गई तो हमास फिर से मजबूत होकर 7 अक्टूबर जैसा हमला कर सकता है। यही वजह है कि सरकार के कई मंत्री गाजा में भी वेस्ट बैंक की तरह यहूदी बस्तियां बसाने की वकालत कर चुके हैं। ऐसे में गाजा से सेना की वापसी और पुनर्निर्माण की योजना का विरोध होना स्वाभाविक माना जा रहा है।
किन नेताओं ने सबसे ज्यादा विरोध किया? बेजलेल स्मोट्रिच: वित्त मंत्री
नेतन्याहू सरकार में वित्त मंत्री रहे स्मोट्रिच ने कहा कि गाजा से इजराइली सेना नहीं हटनी चाहिए। हमास के लोगों से हथियार छीनना ही पहली शर्त है। आखिरकार इजराइल पूरे गाजा पर नियंत्रण करेगा और वहां फिर से यहूदी बस्तियां बसाई जाएंगी। इतमार बेन ग्विर: राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन ग्विर ट्रम्प के प्लान को बुरा बताते हुए कहा कि अगर हमास के लड़ाकों को निशाना बनाना बंद कर दिया गया, तो उन्हें अगला हमला करने का मौका मिल जाएगा। गाजा में सैन्य कार्रवाई जारी रहनी चाहिए और वहां से लोगों के पलायन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। गादी आइजनकोट:
ट्रम्प के ऐलान का विरोध सिर्फ कट्टर दक्षिणपंथी नेता ही नहीं कर रहे। पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट भी इसके खिलाफ माने जा रहे हैं। इस साल अक्टूबर में होने वाले चुनाव में गादी को नेतन्याहू का सबसे बड़ा विरोधी माना जा रहा है। गादी ने कहा कि अगर हमास की सैन्य और राजनीतिक ताकत पूरी तरह खत्म नहीं होती, तो यह इजराइल की बड़ी नाकामी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि हमास पहले जितना ही मजबूत हो चुका है।
नेतन्याहू सबसे मुश्किल स्थिति में क्यों हैं? प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अभी तक इस समझौते पर सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शायद उनकी चुप्पी ही बताती है कि वे कितनी मुश्किल स्थिति में हैं। एक तरफ ट्रम्प हैं, जो इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहे हैं। दूसरी तरफ नेतन्याहू के अपने कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगी हैं, जो गाजा से सेना हटाने के सख्त खिलाफ हैं। अगर नेतन्याहू गाजा से सेना हटाने पर सहमत होते हैं, तो चुनाव से पहले उनके कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगी और वोटर उनसे दूर हो सकते हैं। दूसरी तरफ अगर वे समझौते को पूरी तरह ठुकरा देते हैं, तो ट्रम्प और अमेरिका नाराज हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि नेतन्याहू शायद बीच का रास्ता अपनाएं। यानी कुछ इलाकों से सेना पीछे हटाने का दिखावा करें, लेकिन गाजा से पूरी तरह न निकलें। ट्रम्प को नाराज करना नेतन्याहू के लिए बहुत मुश्किल
नेतन्याहू पर दबाव सिर्फ इजराइल के भीतर से नहीं, बल्कि अमेरिका से भी है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डोव वैक्समैन के मुताबिक, चुनाव से ठीक पहले नेतन्याहू ट्रम्प से रिश्ते खराब करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेंगे।
हाल के समय में इजराइल में यह चर्चा बढ़ी है कि ट्रम्प सरकार का रुख पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन इस पर लगभग सभी की राय एक है कि अमेरिका का सैन्य और सुरक्षा समर्थन इजराइल के लिए जरूरी है। इसीलिए विपक्ष नेतन्याहू को लगातार चेतावनी देता रहा है कि अगर अमेरिका के साथ रिश्ते बिगड़े, तो इसका राजनीतिक नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ेगा। इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामलों से जूझ रहे नेतन्याहू को ट्रम्प से राजनीतिक और नैतिक समर्थन की उम्मीद है। नेतन्याहू यह भी चाहते होंगे कि ट्रम्प चुनावी माहौल में उनके लिए कोई बड़ा कूटनीतिक या राजनीतिक फायदा दिला सकते हैं। इसमें सऊदी अरब और इजराइल के बीच संबंध सामान्य कराने जैसा बड़ा समझौता या उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों पर समर्थन जैसे कदम भी शामिल हो सकते हैं।
क्या सच में इजराइल गाजा से निकल जाएगा? इस सवाल का जवाब फिलहाल ‘नहीं’ मिलता दिख रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि गाजा से इजराइली सेना की पूरी वापसी की संभावना लगभग नामुमकिन है। नेतन्याहू ट्रम्प को यह दिखा सकते हैं कि समझौता आगे बढ़ रहा है। इसके लिए वे समझौते की घोषणा, हस्ताक्षर समारोह या कुछ और करने का नाटक कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इजराइल गाजा से सेना हटा लेगा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, गाजा से सेना न हटाना सिर्फ चुनावी या राजनीतिक मजबूरी नहीं है। यह नेतन्याहू की सुरक्षा नीति का भी अहम हिस्सा है। उनका हमेशा से मानना रहा है कि खतरों को रोकने के लिए इजराइल को अपनी सीमाओं के बाहर भी सैन्य मौजूदगी बनाए रखनी चाहिए। ऐसे में चुनाव नजदीक आने के साथ नेतन्याहू गाजा से पीछे हटने के बजाय और सख्त रुख अपना सकते हैं।

निखिल रंजन
हमास ने शुक्रवार को इजराइल के साथ युद्ध खत्म करने पर सहमति की घोषणा की है जिसमें उसके हथियार छोड़ने और गाजा पट्टी से इस्राएली सेनाओं की वापसी जैसे मुद्दे हैं। समझौते का मसौदा अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है, ना ही इजराइल की तरफ से कोई बयान आया है। इस डील के बारे में अब तक क्या पता चला है? ALSO READ: क्या हम फफूंद के खतरे को अब तक कम आंकते रहे हैं?
हमास के साथ समझौते में क्या है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने हमास के “पूरी तरह हथियार छोड़ने” की घोषणा की है और इसे गाजा में नई फलीस्तीनी सरकार की तरफ अहम कदम बताया है। ट्रंप का कहना है “हथियार छोड़ना पूरा होने” होने के बाद इजराइली सेना गाजा से निकल जाएगी।
हमास के अधिकारियों ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा है कि गाजा का प्रशासन संभालने के लिए ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस की बनाई एक कमेटी इस्लामी आंदोलन के हथियारों को जमा करने की कार्रवाई को पूरा कराएगी। हमास ने उम्मीद जताई है कि मध्यस्थ और बोर्ड ऑफ पीस यह सुनिश्चित करेंगे की इस्राएल समझौते की शर्तों को माने , जिसमें इजराइल का गाजा से “धीरे धीरे बाहर निकलना” शामिल है।
हमास के वार्ताकारों की टीम में शामिल गाजी हमाद ने कहा है कि आंदोलन, “गाजा पट्टी में हमारे लोगों को मारे जाने और निर्वासन से बचाने के लिए छूट दे रहा है।” हमाद ने यह भी कहा है, “समझौते में इस बात के लिए स्पष्ट प्रावधान हैं कि इजराइल अपनी प्रतिबद्धता पूरी करे। अगर इजराइल ने समझौते का पालन नहीं किया तो हम भी नहीं करेंगे।”
एक राजनयिक सूत्र ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि डील की घोषणा होने से पहले, “सारी सुरंगों, हथियारों के डिपो और हथियार उत्पादन के केंद्रों को खत्म करने की प्रक्रिया” की योजना बनाई गई है। ALSO READ: फ्रांस में पहली बार दिखा आग का बादल आखिर है क्या?
समझौते को लागू कौन कराएगा
बोर्ड ऑफ पीस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर डाले एक पोस्ट में इस बात की पुष्टि की है कि हमास, “गाजा सीजफायर के अगले चरणों को लागू करने के विस्तृत रोडमैप पर सहमत हो गया है।”
संगठन की तरफ से कहा गया है, “हमारा ध्यान अब इसे लागू करने पर है।” इसके साथ ही पोस्ट में यह भी लिखा है कि ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस की बनाई नेशनल कमेटी फॉर एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा (एनसीएजी), “जल्दी ही पूर्ण अधिकार के लिए चरणों में बंटी प्रक्रिया को शुरू करेगी।”
ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स, “गाजा को उसके निवासियों ओर पड़ोसियों के लिए सुरक्षित बनाने पर फलीस्तीन की नई पुलिस के साथ काम करेगी।” ALSO READ: नेपाल: बालेन शाह के खिलाफ जेन-जी में क्यों है उबाल
गाजा में फिलहाल क्या स्थिति है?
2025 के अक्टूबर में इजराइल और हमास के बीच संघर्षविराम हुआ था जो अब भी कायम है, हालांकि इससे गाजा में हिंसा नहीं रुकी है। युद्ध को खत्म करने के लिए स्थायी समझौता करने की कोशिशें रुकी हुई हैं।
इजराइल लगभग रोज हमले करना जारी रखे हुए है। संघर्षविराम के बाद से यहां के 60 फीसदी इलाके पर इस्राएल का नियंत्रण है। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक संघर्षविराम शुरू होने के बाद से अब तक कम से कम 1,214 फलीस्तीनी मारे गए हैं।
मंत्रालय के आंकड़ों को संयुक्त राष्ट्र भरोसे के लायक मानता है। गुरुवार को भी इस्राएली हमलों में कम से कम चार लोगों की मौत हुई। स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक इनमें दो बच्चे भी शामिल हैं।
गाजा में दसियों हजार लोग अब भी टेंट में रह रहे हैं। लगभग तीन साल से चल रहे हमलों में फलीस्तीन के बुनियादी ढांचे और इमारतों का ज्यादातर हिस्सा ध्वस्त हो चुका है।
हमास ने इजराइल पर बार बार संघर्षविराम के उल्लंघन का आरोप लगाया है। इनमें हवाई हमले, आम लोगों पर गोलीबारी और कथित येलो लाइन के पार जाना शामिल है। यह एक अनौपाचिक सीमा है जो इस्राएली सैन्य नियंत्रण ओर हमास के नियंत्रण वाले इलाकों को अलग करती है।
अब आगे क्या होगा?
इजराइल ने समझौते की घोषण पर अब तक प्रतिक्रिया नहीं दी है। मिस्र की सरकार से जुड़े अल काहेरा न्यूज ने शुक्रवार सुबह कहा कि काहिरा जल्दी ही गाजा के मध्यस्थों के साथ बैठक करेगा। इसमें अमेरिका, कतर और तुर्की भी शामिल हैं। इसमें गाजा संघर्षविराम योजना के दूसरे चरण पर ध्यान रहेगा।
बोर्ड ऑफ पीस में गाजा के लिए प्रतिनिधि निकोलाय म्लादेनोव का कहना है कि शुरुआती समझौते से ज्यादा महत्व इसे लागू करने का है। म्लादेनोव ने एक्स पर लिखा है, “लागू और पुष्टि होने को असली होना होगा। सैन्य वापसी और हथियारों को निष्क्रिय करना एक साथ और समान गति से होना चाहिए।”
हमाद ने एएफपी से कहा कि हमास अब समझौते के लागू होने की प्रक्रिया का ब्यौरा मध्यस्थों के साथ साझा करेगा और समझौता पूरा करने के लिए एक टाइमटेबल पर सहमत होगा। हमाद का कहना है, “इस प्रक्रिया में 14 दिन या उससे ज्यादा लगेंगे। हमें हर ब्यौरे पर सहमत होना होगा। कैसे समझौता लागू होगा, कब लागू होगा और इसे लागू करने का तरीका क्या होगा। आने वाले दिनों में यह सब होगा।”

भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कथित कड़ी कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान पर निशाना साधा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान की कार्रवाई की जांच करने और उसे जवाबदेह ठहराने की अपील की है। विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 'निर्दय बल' का इस्तेमाल किया गया।
PoJK में 40 से ज्यादा लोगों की मौत का दावा
जायसवाल के मुताबिक, PoJK में बढ़ती महंगाई, प्रशासनिक उपेक्षा, राजनीतिक भेदभाव और अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित अत्याचारों को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज हुए हैं। उन्होंने कहा कि 27 जुलाई से स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान हुई सुरक्षा कार्रवाई में 40 से अधिक नागरिकों की मौत हुई है और कई लोग घायल हुए हैं। इन प्रदर्शनों का नेतृत्व Joint Awami Action Committee (JAAC) कर रही है।
भारत ने कहा कि PoJK के लोगों ने इन मौतों की स्वतंत्र जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपील की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान की कार्रवाई पर नजर रखनी चाहिए और कथित अत्याचारों के लिए उसे जवाबदेह ठहराना चाहिए।
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भारत ने 'मुजाहिदीन' को लेकर पाकिस्तान पर साधा निशाना
जायसवाल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के राजनीतिक मामलों के विशेष सहायक के कथित बयान का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रतिष्ठान ने जिन 'मुजाहिदीन' को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित, हथियारबंद और वित्त पोषित किया, वही अब पाकिस्तान के खिलाफ हथियार उठा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह बयान पाकिस्तान की नीतियों और उसके द्वारा लंबे समय से अपनाए गए आतंकवाद से जुड़े दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल खड़े करता है। भारत ने यह भी आरोप लगाया कि PoJK के लोगों के प्रति पाकिस्तान के प्रतिष्ठान में 'पूर्ण उदासीनता' दिखाई दे रही है। जायसवाल ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की कथित टिप्पणी का भी जिक्र किया, जिसमें प्रदर्शनकारियों को 'दुश्मन' बताया गया था।
'पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा'
जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत ने एक बार फिर अपनी स्थिति स्पष्ट की। रणधीर जायसवाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का पूरा क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। उन्होंने कहा कि भारत की स्थिति स्पष्ट है कि ये क्षेत्र पहले भी भारत का हिस्सा थे, आज भी भारत का हिस्सा हैं और आगे भी भारत का हिस्सा बने रहेंगे। विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों और संबंधित पक्षों से इस क्षेत्र के लिए भारत के अनुसार सही नाम और शब्दावली का इस्तेमाल करने की अपील की।
New York Times की रिपोर्ट पर भी भारत ने जताई आपत्ति
यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत ने The New York Times की एक रिपोर्ट में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लिए 'Pakistani Kashmir' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। अमेरिका स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अखबार की हेडलाइन को 'भ्रामक और गलत' बताते हुए कहा था कि 'Pakistani Kashmir' नाम का कोई क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह Pakistan-occupied Kashmir है। भारत ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर के संबंध में इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली देश की संप्रभुता और उसके आधिकारिक रुख के अनुरूप होनी चाहिए।
Hamas agrees to phased disarmament in Gaza: गाजा में जारी संघर्ष के बीच एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। फिलिस्तीनी संगठन हमास ने एक रोडमैप पर सहमति जताई है। इसके तहत वह अपने हथियार डालेगा और गाजा का प्रशासनिक नियंत्रण एक फिलिस्तीनी नागरिक समिति को सौंपेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिस्र, कतर और तुर्की के मध्यस्थों के साथ काहिरा में हमास नेताओं की बातचीत के बाद इस कथित ऐतिहासिक समझौते का ऐलान किया है। हालांकि इस रोडमैप के सामने आते ही कई सवाल भी खड़े हुए हैं। सवाल ये उठ रहा है कि अब गाजा पर वास्तविक अधिकार किसका होगा, हथियारों और सुरक्षा पर किसका नियंत्रण रहेगा और गाजा में हुए विध्वंश के बाद इसके पुनर्निर्माण का खर्चा कौन उठाएगी।
इस समझौते में कई शर्तें, पेच और अनसुलझे मुद्दे मौजूद हैं। आइए इसको समझने की कोशिश करते हैं –
1- गाजा का प्रशासन कौन देखेगा?
प्रस्तावित रोडमैप के तहत गाजा के रोजमर्रा के सिविल एडमिनिस्ट्रेशन को संभालने की जिम्मेदारी नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा को दी जाएगी। यह फिलिस्तीनी टेक्नोक्रेट्स की एक गैर-राजनीतिक समिति होगी। इस समिति में हमास की कोई हिस्सेदारी या भागीदारी नहीं होगी। यह समिति सरकारी सेवाओं, कर्मचारियों के प्रबंधन, वित्त और दूसरे प्रशासनिक काम स्वतंत्रता पूर्वक देखेगी।
2- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी और पुनर्निर्माण कौन देखेगा?
गाजा के प्रशासनिक कामकाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर की निगरानी और सुरक्षा से अलग रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता वाला गाजा बोर्ड ऑफ पीस रणनीति, स्थिरता और पुनर्निर्माण की फंडिंग की निगरानी करेगा। ट्रंप के पास इसके चार्टर के तहत व्यापक कार्यकारी अधिकार हैं। इसके फाउंडिंग एग्जीक्यूटिव बोर्ड में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर शामिल हैं। अल जजीरा के मुताबिक एक अलग गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड का भी प्रस्ताव है। ये पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को डायरेक्शन देने और क्षेत्रीय कूटनीतिज्ञों के साथ तालमेल बिठाने का काम करेगा।
3- गाजा में सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी?
जैसे-जैसे हमास हथियार छोड़ने के मामले को आगे बढ़ाएगा और अपने कंट्रोल वाले इलाकों को खाली करेगी, वैसे ही सुरक्षा व्यवस्था दो स्तरों पर संभाली जाएगी। हमास द्वारा खाली किए गए इलाकों की कमान एक नई फिलिस्तीनी पुलिस फोर्स संभालेगी। इस ट्रांजिशन के दौरान सुरक्षा में सहयोग के लिए एक बहुराष्ट्रीय इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स तैनात की जाएगी। इजरायल ने गाजा में बहुराष्ट्रीय बल को प्रवेश देने के लिए कानूनी ढांचे को मंजूरी दे दी है। रॉयटर्स को एक इजरायली अधिकारी ने बताया कि शुरुआती मिशन में युगांडा और मोरक्को जैसे देशों के लगभग 200 कर्मी शामिल होंगे। हर देश की टुकड़ी के लिए अलग से इजरायली मंजूरी की जरूरत होगी। ये टुकड़ियां कब तैनात की जाएंगी, इसकी कोई तारीख अभी तय नहीं है।
4- हमास के हथियारों और सुरंगों का क्या होगा?
हथियारों को लेकर रोडमैप और जमीनी दावों में अंतर देखने को मिल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक इस रोडमैप गाजा में हमास और अन्य सभी सशस्त्र समूहों को पूरी तरह से हथियार छोड़ना होगा। रॉयटर्स को हमास के एक सूत्र ने बताया कि मसौदे के अनुसार हमास के भारी हथियारों को जमा कर फिलिस्तीनी प्रशासन के नियंत्रण में रखा जाएगा और इन हथियारों को इजरायल को नहीं सौंपा जा सकता। बातचीत में शामिल एक राजनयिक ने रॉयटर्स को बताया कि योजना में सुरंगों, हथियारों के जखीरे और हथियार निर्माण सुविधाओं को नष्ट करने का भी आह्वान किया गया है ताकि प्रक्रिया के अंत में गाजा में कोई उग्रवादी ढांचा न बचे।
5- क्या इजरायल ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया है?
इजरायल ने अभी तक घोषित शर्तों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। ट्रंप के ऐलान से पहले एक इजरायली अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि इजरायल ने 15-सूत्रीय प्रस्ताव को खारिज कर दिया था क्योंकि यह पूर्ण निरस्त्रीकरण और विसैन्यीकरण की उसकी मांग का संतोषजनक जवाब नहीं देता था। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक इजरायल को अभी भी इस बात का पूरा यकीन नहीं है कि हमास हथियार डाल ही देगा। गाजा के बड़े हिस्से पर इजरायली सेना का नियंत्रण है। रोडमैप इजरायल की चरणबद्ध वापसी को भी हमास के हथियार डालने के साथ जोड़ा तो गया है लेकिन अंतिम वापसी की कोई समय-सीमा सार्वजनिक नहीं की गई है। हमास के एक सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि यह दस्तावेज फिलहाल एक ड्राफ्ट एग्रीमेंट है। इससे यह साफ होता है कि अंतिम सहमति बनने से पहले कई पेचीदा मुद्दों को सुलझाना बाकी है।
बिहार के भोजपुर में हुए चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर केस में बड़ा अपडेट सामने आया है। पुलिस ने STF के आरोपी जवान अक्षय को आरा से गिरफ्तार कर लिया है। शुक्रवार सुबह स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के इस जवान को गिरफ्तार किया। एक अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है। भरत तिवारी की मौत के बाद इस मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया था। पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे थे और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही थी। भोजपुर के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि STF के जवान को शुक्रवार सुबह आरा से गिरफ्तार किया गया।
भरत तिवारी की मां ने की ये मांग
वहीं, भरत तिवारी की मां आशा देवी ने इस गिरफ्तारी पर संतोष जताया। उन्होंने कहा कि मुठभेड़ में शामिल बाकी पुलिस अधिकारियों को भी जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाना चाहिए। भरत तिवारी की मां आशा देवी ने पत्रकारों से कहा, “यह कार्रवाई मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से हमारी मुलाकात के दौरान मिले आश्वासन का नतीजा है। गिरफ्तारी से कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन मुठभेड़ में शामिल बाकी अधिकारियों को भी जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाना चाहिए।”
17 जून को भरत तिवारी का एनकाउंटर
पुलिस के अनुसार, 17 जून को जब टीम भरत तिवारी को गिरफ्तार करने पहुंची, तो उन्होंने कथित तौर पर पुलिस पर गोली चला दी। पुलिस का कहना है कि इसके बाद आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की गई, जिसमें भरत तिवारी घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। वहीं, भरत तिवारी के परिवार का दावा है कि उन्होंने गोली चलने से पहले ही सरेंडर कर दिया था। परिवार का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो में वह निहत्थे दिखाई दे रहे हैं, जब पुलिस ने उन पर गोली चलाई। हालांकि, PTI इन वीडियो की सत्यता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है।
मामले को लेकर बढ़ते विवाद के बीच राज्य सरकार ने इसकी न्यायिक जांच के आदेश दिए। वहीं, भोजपुर घटना में समय पर कार्रवाई नहीं करने के आरोप में राज्य पुलिस ने पिछले महीने अपने चार पुलिसकर्मियों को निलंबित भी कर दिया था।

