इलाज आपकी थाली में, ध्यान नहीं दिया तो साइलेंट किलर साबित हो सकता है एनीमिया

Treatment of anemia

Treatment of anemia: “जिस देश की आधी से अधिक महिलाएं और दो-तिहाई बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हों, वहां यह केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि विकास का भी मुद्दा बन जाता है।” भारतीय परिप्रेक्ष्य में एनीमिया आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।

 

पांच वर्ष से कम उम्र के करीब 67 प्रतिशत बच्चों में भी खून की कमी पाई गई है। यह स्थिति बताती है कि आर्थिक प्रगति और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बावजूद पोषण संबंधी चुनौतियां अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। हालांकि चिंता से अधिक जरूरत जागरूकता की है, क्योंकि एनीमिया उन समस्याओं में से है जिनकी रोकथाम और उपचार दोनों संभव हैं।

क्या कहते हैं चिकित्सक?

गोरखपुर के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. आलोक कुमार गुप्ता कहते हैं कि एनीमिया से बचाव की शुरुआत घर की रसोई और भोजन की थाली से होती है। हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, चना, गुड़, बाजरा, तिल, मौसमी फल और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ नियमित रूप से भोजन में शामिल किए जाने चाहिए।

 

उनके अनुसार आयरन युक्त भोजन के साथ विटामिन-सी का सेवन शरीर में आयरन के अवशोषण को बढ़ाता है। इसलिए नींबू, आंवला, संतरा या अन्य खट्टे फलों का सेवन लाभकारी होता है। वहीं भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी और भोजन के दौरान कोई भी कोल्ड ड्रिंक पीने से बचना चाहिए, क्योंकि ये आयरन के अवशोषण में बाधा बन सकते हैं। 

साल में सपरिवार एक बार जरूर लें कृमि नाशक दवा

डॉक्टर आलोक के मुताबिक आयरन की कमी के साथ ही आंतों मे पेट के कीड़ों (कृमि) का संक्रमण भी धीरे धीरे रक्त रिसाव का कारक होता है। इसलिए कम से कम वर्ष मे एक बार पूरे परिवार को कोई कृमि नाशक लेना चाहिए। मासिक के दौरान अधिक रक्तस्राव भी एनीमिया का कारक होता है।

खून की कमी का असर सिर्फ शरीर पर नहीं

एनीमिया केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं के स्वास्थ्य, श्रमिकों की कार्यक्षमता और देश की उत्पादकता पर पड़ता है। यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे दुनिया की प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल करता है।

 

दरअसल एनीमिया एक ऐसी समस्या है जो चुपचाप करोड़ों लोगों की सेहत, कार्यक्षमता और भविष्य को प्रभावित करती है। शरीर में हीमोग्लोबिन कम होने पर पर्याप्त ऑक्सीजन अंगों तक नहीं पहुंच पाती। परिणामस्वरूप व्यक्ति को कमजोरी, थकान, चक्कर आना, सांस फूलना और काम करने में परेशानी जैसी समस्याएं होने लगती हैं।

 

इसका सबसे गंभीर असर बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है। बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। सीखने और याद रखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। वहीं गर्भवती महिलाओं में समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले शिशु के जन्म और मातृ मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।

उत्तर प्रदेश के लिए और महत्वपूर्ण है यह लड़ाई

उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। इसी कारण यहां बच्चों, किशोरियों और प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं की संख्या भी सबसे अधिक है। ऐसे में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों की सफलता काफी हद तक एनीमिया पर नियंत्रण पर निर्भर करती है। हाल के वर्षों में राज्य में सकारात्मक प्रगति देखने को मिली है। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर में कमी दर्ज की गई है और गंभीर एनीमिया के मामलों में भी गिरावट आई है। इसमें स्वास्थ्य विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

 

राज्य सरकार पोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चला रही है। पोषण वाटिका और औषधीय वाटिका जैसी पहल इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। इनका उद्देश्य लोगों को पौष्टिक आहार के प्रति जागरूक करना और स्थानीय स्तर पर पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाना है।

सहजन : पोषण का पावर हाउस

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लंबे समय से सहजन (मोरिंगा) के प्रचार-प्रसार पर जोर देते रहे हैं। पोषण विशेषज्ञ भी सहजन को अत्यंत पौष्टिक पौधा मानते हैं। इसकी पत्तियों और फलियों में अनेक प्रकार के विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। तुलनात्मक रूप से देखें तो सहजन में—

  • संतरे की तुलना में अधिक विटामिन-सी
  • गाजर की तुलना में अधिक विटामिन-ए
  • दूध की तुलना में अधिक कैल्शियम
  • केले की तुलना में अधिक पोटैशियम
  • दही की तुलना में अधिक प्रोटीन पाया जाता है।

इसी कारण विद्यालयी पोषण कार्यक्रमों और सामुदायिक पोषण योजनाओं में इसके उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार भी राज्यों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों को पोषण कार्यक्रमों में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित कर चुकी है।

सरकार की पहल और समाज की भूमिका

केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में “एनीमिया मुक्त भारत” अभियान शुरू किया था। इसके तहत आयरन एवं फोलिक एसिड की गोलियों का वितरण, कृमिनाशक दवाओं का सेवन, नियमित जांच और पोषण संबंधी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से आयरन की गोलियां वितरित की जा रही हैं। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और हाई-रिस्क मामलों की पहचान पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

 

फिर भी केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। परिवार और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। संतुलित भोजन, नियमित स्वास्थ्य जांच और पोषण के प्रति जागरूकता ही एनीमिया के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार हैं।

 

दरअसल एनीमिया केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं बल्कि मानव संसाधन विकास का भी विषय है। स्वस्थ बच्चे बेहतर विद्यार्थी बनते हैं। स्वस्थ किशोरियां भविष्य में स्वस्थ माताएं बनती हैं। स्वस्थ महिलाएं और पुरुष अधिक उत्पादक होते हैं। इसलिए खून की कमी दूर करना केवल बीमारी से लड़ना नहीं, बल्कि देश की क्षमता को मजबूत करना भी है।

 

अच्छी बात यह है कि एनीमिया ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान असंभव हो। जागरूकता, संतुलित पोषण, नियमित जांच और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से इस चुनौती पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। विकसित भारत की यात्रा में यह याद रखना होगा कि मजबूत राष्ट्र की नींव स्वस्थ नागरिक ही होते हैं। और स्वस्थ नागरिकों के लिए पर्याप्त खून, पर्याप्त पोषण और पर्याप्त जागरूकता सबसे जरूरी है।

एनीमिया के प्रमुख लक्षण

जल्दी थकान, चक्कर आना, चेहरा पीला पड़ना, सांस फूलना, लगातार कमजोरी महसूस होना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। यदि इनमें से कई लक्षण लगातार दिखाई दें तो चिकित्सकीय जांच अवश्य कराएं।

बाल एकांकी: काला सोना

A scene from a childrens play featuring a character dressed as crude oil, in a short drama centered on petrol, diesel, gas, and kerosene

पात्र –
1- एक बालक आयु लगभग 15 वर्ष- काले लबादे में {क्रूड ऑयल के वेश में}

2- एक बालक रूद्र आयु लगभग 12 वर्ष
3- एक बालिका आद्या आयु लगभग 10 वर्ष
4- चार अन्य बच्चे आयु 10 से 12 वर्ष के बीच

 

मंच का परदा खुलता है और उस पर एक आकृति काला लबादा ओढ़े दिखाई देती है। वह आकृति नाचते हुए गा रही है।

 

      काला सोना काला सोना,

 

      नाम हमारा काला सोना।

 

      हमसे ही संचालित होता,

 

      है धरती का कोना-कोना।

 

      काला सोना काला सोना…….का….ला …

 

{तभी मंच के एक तरफ से आद्या का प्रवेश}

 

आद्या –ये भाई …. क्यों शोर मचा रहे हो, कौन हो तुम और ये काला सोना काला सोना, क्या है सब ये……..।

 

काली आकृति –लो जी लो, अब सुन लो इनकी बात, ये काला सोना भी नहीं जानते। सारी दुनिया में हल्ला है और ये मेम साब पूछती हैं काला सोना क्या है।

 

{तभी दूसरी तरफ से रूद्र का प्रवेश}

 

रूद्र–अरे भाई शांत ..शांत रहो भाई काले आदमी। एक तो यहां हल्ला मचा रहे हो और ठीक से अपना परिचय भी नहीं दे रहे हो।

 

काली आकृति–

 

     पेट्रोल हैं,  डीज़ल हैं हम, 

 

     हम हैं गैस रसोई वाली।

 

     नींद नहीं आती है घर को,

 

     पडा सिलेंडर हो जब खाली।

 

     बिना हमारे जले न चूल्हा,

 

     गरम न होता हाय भगौना

 

     काला सोना काला सोना …..

 

आद्या –रूद्र {एक साथ}-आंय! पेट्रोल, डीज़ल, गैस …..अरे तो क्या आप क्रूड ऑयल हैं -क्रूड ऑयल, काले-काले अंकल। आप यहां क्या कर रहे हैं? {दोनों चहकते हैं}

 

काली आकृति –क्या कर रहे हैं! आश्चर्य मेरे कारण दुनिया में इतनी मारा-मारी मची है और तुम लोग पूछ रहे हो कि यहां क्या कर रहे हो।

 

आद्या –अरे अंकल, अब ठीक से बताओ भी, इतने काले और अकड़ …काले को तो काला ही कहेंगे ना। अच्छा अपने बारे में ठीक से बताओ। यह तो मैंने भी पढ़ा कि पेट्रोल, डीज़ल, गैस इत्यादि क्रूड ऑयल से ही बनता है। लेकिन कैसे, कहां? ठीक से नहीं मालूम। अब आप बताओ। आपका जन्म स्थान कहां है, कैसे इस धरती पर आते हो और कैसे डीज़ल, पेट्रोल, गैस बन जाते हो? ज़रा ठीक से बताओ।

 

काली आकृति –ये बड़ी लम्बी दास्तान है बच्चों। कितनी पीड़ा होती है हमें है, धरती के भीतर, बाहर आने में और फिर बाहर आकर भी।

 

रूद्र –अंकल पूरी कथा सुनाओ प्लीज, बिना रुके, बिना कुछ छुपाए चटपट और झटपट।

 

काली आकृति–बताता हूं, बताता हूं, ध्यान से सुनो-बात करोड़ों साल पुरानी है।समुद्र के नीचे करोड़ों करोड़ सूक्ष्म जीव और वनस्पतियों का जमावड़ा था, जमावड़ा होता रहता था। समय के साथ ये जीव और वनस्पतियां नष्ट होती जाती थीं और समुद्र की तह में जमा होती जाती थीं। धीरे-धीरे उनके ऊपर गाद मिटटी और धूल जमती गई। चट्टानें बनती गईं और ये जीवाश्म तलछट में दबते रहे।

 

आद्या –फिर पेट्रोल कैसे बन गए ?

 

काली आकृति –अरे सुनो भी, कहानी जरा लम्बी है ना ज़रा धैर्य रखो। हां तो जब उन जीवाश्मों पर जब धरती का भारी दबाव पडा और भीतर का तापमान बढ़ा तो ये जीव/पौधे एक चिप चिपे गीले पदार्थ में परिवर्तित हो गए। यह मोम सरीखा पदार्थ केरोसिन कहलाता है और वह क्रिया जिससे यह पदार्थ बनता है, डायजे नेसिस क्रिया कहलाती है।

 

रूद्र –लेकिन ..लेकिन इतना, कितना केरोसिन कहां बनता होगा, ये तो सारी दुनिया में…..कितनी अधिक खपत है पेट्रोल, डीज़ल, गैस की। फिर केरोसिन से पेट्रोल कैसे बना।

 

काली आकृति –फिर जल्द बाजी, बेटे धीरज रखो थोड़ा। असीमित मात्रा में हमारी उपस्थति धरती के भीतर है। लाखों साल पहले जब ये सूक्ष्म पौधे प्रकाश संश्लेषण क्रिया से भोजन बनाते थे ऊर्जा पाते थे और जीवित रहते थे। छोटे छोटे करोड़ों जीव इस वनस्पति को खाकर जीवित रहते थे। इन जीवों का जीवन बहुत छोटा होता था लेकिन ये करोड़ों अरबों की मात्रा में पैदा होते मरते रहते थे। और सागर की तलहटी में डूब जाते थे। भारी दबाव और तापमान से बने केरोसिन भी केटाजेनिस क्रिया से तरल रूप में बदल जाते थे और यही तरल पदार्थ ही कच्चा तेल या क्रूड ऑयल कहलाया, मतलब हम कहलाए।

 

आद्या–लेकिन ..लेकिन यह क्रूड ऑयल, मतलब अंकल आप केरोसिन के वंशज हो, ऊपर धरती पर कैसे आते हो?

 

काली आकृति -गुरुत्वाकर्षण के कारण, धरती का दबाव नीचे की तरफ होने से, हम तरल कम दबाव की तरफ मतलब ऊपर की तरफ आना चाहते हैं लेकिन भारी चट्टानें हमें रोक लेती हैं और, और हम क्रूड ऑयल तरल के रूप में चट्टानों के बीच खाली जगह में एकत्रित होते रहते हैं। और अभी भी करोड़ों लीटर कच्चे तेल के रूप में हमारे भाई वंशज जमीन में चट्टानों के नीचे दबे पड़े हैं। कहीं-कहीं जहां चट्टानें हमारी बाधा नहीं बनतीं,  मिट्‍टी को भेदता हुआ ये तरल मतलब क्रूड ऑयल मतलब हम धरती के ऊपर बिना रोक टोक के आ जाते हैं। यथार्थ में तकनीकी भाषा में हमारे इस क्रूड ऑयल रूप को हाइड्रो कार्बन कहते हैं।

 

रूद्र-तभी तो मजा है ना,  हम लोग खूब सारा पेट्रोल भरवाकर कारों में यहां वहां घूमते हैं। जितना चाहे क्रूड ऑयल धरती से निकालो। आप तो सब जगह हैं न धरती पर-धरती के नीचे अंकल?

 

काली आकृति –अरे ना- ना- ना बच्चों। बहुत कम स्थानों पर निकलते हैं हम। वे क्षेत्र भाग्यवान हैं जहां की धरती में हमारी मौजूदगी रहती है।

 

       जिस धरती के नीचे हैं हम,

 

       लोग वहां के हैं आभारी।

 

       और हमारे कारण ही तो,

 

       लोग वहां के सब पर भारी।

 

       लोग सहेजे रखते हमको, 

 

       जैसे हम हैं मृग का छौना|

 

       काला सोना ….

 

आद्या –अरे यार अंकल आप तो फिर गाने लगे। आपने क्रूड ऑयल की बात तो बताई लेकिन ये क्रूड ऑयल पेट्रोल, डीज़ल, गैस में कैसे बदलता है ये तो बताया ही नहीं। हां अंकल एक बात और आपके वंशज आजकल सबसे ज्यादा किस क्षेत्र में उपलब्ध हैं ?

 

काली आकृति — हम तो बेताज बादशाह हैं बच्चों। जिस क्षेत्र में हम हैं तो हम ही हम हैं। वहां के लोगों की बल्ले-बल्ले है। जिस-जिस की धरती से हम निकले वह देश देखते ही देखते धनवान हो गए। अमेरिका-रूस बहुत से अरब देश, जहां-जहां हम प्रकट हुए वहां धन की कोई कमी नहीं है।

 

मेरे कारण ही दुनिया में,

 

मची हुई है बहुत लड़ाई।

 

बड़े देश छोटे देशों पर,

 

करते बम से हाथापाई।

 

मैं हूं सच में बड़ा कीमती,

 

मैं हूं अब लड्डू का दौना।

 

काला सोना………….

 

रूद्र –और हमारे अपने देश भारत में आप धरती से क्यों नहीं बाहर आते?

 

काली आकृति –बड़े नादान हो बालक, हम जब यहां धरती के नीचे होंगे तब ही तो बाहर आएंगे। लेकिन फिर भी असम, राजस्थान, गुजरात और मुंबई के पास समुद्र के नीचे से हम क्रूड ऑयल बनकर निकल रहे हैं। हमारी तेजी से खोजबीन भी हो रही है, शायद और कई स्थानों पर हम धरती में छुपे मिल जाएं। लेकिन इस देश की मांग दिन पर दिन बढ़ रही है और इतनी कम मात्रा का उत्पादन देश की आपूर्ति नहीं कर सकता आपको बाहरी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

 

आद्या –ठीक है, ठीक है अब बताओ आप काले से गोरे और चमकदार मतलब पेट्रोल कैसे बने और रोज लाखों करोड़ों लीटर की मात्रा में कैसे बन जाते हो? 

 

काली आकृति –ये हुई ना काम की बात। तो सुनो बच्चों- बड़ी-बड़ी मशीनों से धरती को ड्रिल करके कई हज़ार फुट नीचे से कच्चा तेल मतलब हमें बाहर निकाला जाता है। फिर हमें सेपरेशन टेंकों में एकत्रित करते हैं। और बाद में रिफायनरी में भेज दिया जाता है।

 

रूद्र- रिफायनरी मतलब शोधन शाला ना?

 

काली आकृति –हां-हां वही जगह जहां हमारे शरीर से काम के अवयव अलग-अलग कर दिए जाते हैं। शोधन शाला में  बहुत बड़े-बड़े चेंबरनुमा संयंत्र लगे होते हैं। जिनको डिस्टिलेशन टावर कहते हैं। जिसमें हमें बहुत अधिक तापमान पर, लगभग 400 डिग्री सेल्सियस पर गर्म किया जाता है। और गरमी पाकर हम भाप बनने लगते हैं। हमारे जिस-जिस अवयव का बोइलिंग पॉइंट मतलब क्वथनांक सबसे कम होता है वह जल्दी भाप बनकर चेंबर के सबसे ऊपरी भाग में एकत्रित हो जाता है उससे थोडा अधिक क्वथनांक वाला उसके नीचे और अधिक क्वथनांक वाले अवयव क्रमशःनीचे के खण्डों में एकत्रित होते रहते हैं।

 

आद्या– फिर अंकल, फिर क्या होता है?

 

काली आकृति– फिर क्या, सबसे ऊपरी भाग में हमारा एक विशेष रूप एलपीजी उसके नीचे नेप्था उसके नीचे गेसोलीन मतलब पेट्रोल फिर केरोसिन फिर और नीचे डीज़ल फिर फ्यूल आयल और अंत में सबसे नीचे बिटूमिन मतलब डामर अलग होकर एकत्रित हो जाता है। यह क्रिया चलती रहती है। और पेट्रोलियम मतलब मेरे इन उत्पादों का अलग-अलग भण्डारण कर और शुद्धिकरण एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा बाजारों में विक्रय के लिए भेज दिया जाता है। पेट्रोल, डीजल मोबिल आयल इत्यादि पेट्रोल पम्पों पर और अन्य सामान उचित भंडारण घरों अथवा दुकानों पर भेज दिया जाता है|

 

रूद्र–अंकल हवाई जहाज वाला ईंधन इनमें कौन सा वाला है?

 

काली आकृति–अरे! सॉरी बच्चे, वैरी सॉरी, हम तो भूल ही गए केरोसिन और डीज़ल के बीच का उत्पाद ए.टी. ऍफ़. मतलब एविएशन टरबाइन फ्यूल कहलाता है, काले कलूटे हमारे रूप का नया स्वरूप -जो हवाई जहाज उड़ा देता है।

 

स्वच्छ हमारे रंग रूप से,

 

दुनिया के वाहन चल पाते।

 

हमें पेट में भर लेते जब,

 

वायुयान नभ में उड़ पाते।

 

हम हैं तो ही पहुंच सरल है,

 

लंदन, पेरिस, वार्सीलोना।

 

काला सोना ………

 

आद्या –इन्हीं गानों के चक्कर में आप काम की बात भी भूल जाते हैं। काले अंकल, ये जो डामर है जिसे आप सभ्य भाषा में बिटुमिन कहते हैं मुझे बहुत गन्दा लगता है और प्लास्टिक छी-छी …चिपचिपा सा ….

 

काली आकृति –-

 

सड़कों पर जो चम-चम करता,

 

वह डामर भी हम हैं भाई।

 

और प्लास्टिक- पॉलीथिन भी,

 

तो हमने ही है उपजाई।

 

इनकी बनी थैलियां डिब्बे,

 

बच्चों के हैं बने खिलौना।

 

रूद्र -–अरे यार फिर गाना, क्या आप गवैए हो।

 

काली आकृति –हां हां गवैया हूं गवैया। आजकल सारी दुनिया मुझे ही तो गा रही है। एक तो हमारे बिना काम नहीं चलता, हमारा अंधाधुंध उपयोग होता है और जब प्रदूषण होता है गाली भी सब हमें ही देते हैं।

 

होने लगी रोज ही अब तो,

 

घर-घर बात प्रदूषण वाली।

 

जुम्मेवारी इसकी सिर पर,

 

लोगों ने बस हम पर डाली।

 

उनकी गलती का अपने सिर,

 

दोष पड़ रहा हमको ढोना।

 

काला सोना…………...

 

आद्या –क्या बात है काले अंकल, आप क्रूड ऑयल कम और कवि ज्यादा लग रहे हैं।

 

काली आकृति –क्या कहूं यातनाएं सहते-सहते आलोचनाएं सुनते-सुनते जैसे आदमी कवि बन जाता है तो हम भी बन गए। आप लोग दस कदम पैदल नहीं चल सकते, हाथ में कपडे की या कागज़ की थैली लेकर नहीं चल सकते और प्रदूषण के लिए दोष डीज़ल का, पेट्रोल का, पॉलीथिन का और प्लास्टिक का, वाह क्या गजब की सोच है।

 

क्यों उपयोग बढाए जाते,

 

लोग हमारा हर दिन भाई।

 

पैदल दस गज चलने में ही,

 

उन्हें हो रही क्यों कठिनाई।

 

कपड़े वाली थैली हाथों,

 

में लगती क्यों भारी ढोना।

 

काला सोना …………..

 

रूद्र –क्षमा करें अंकल। हमें नहीं मालूम था कि आपको भी आम आदमियों के सेहत की इतनी चिंता है। गलतियां आदमियों से हो रहीं हैं और दोष हम कारखानों को, पेट्रोल को, डीज़ल को,पॉलीथिन को दे रहे हैं। पेट्रोलियम के लिए युद्ध हो रहे हैं, निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो रही है और देश इसके अधिपत्य के लिए अरबों खरबों रुपयों के हथियार बना रहे हैं, बेच रहे हैं और खरीद रहे हैं।

 

अंधाधुंध दोहन धरती का,

 

धरती होती जाती खाली।

 

हुई मानसिकता लोगों की,

 

ज्यादा धन सुविधाओं वाली।

 

बढ़ते रोग अस्थमा दिल के,

 

फैला करता यहां करोना।

 

काला सोना…..

 

आद्या –रूद्र भैया इन अंकल ने तो हमारी आंखें खोल दीं। मुझे भी माफ़ करना मेरे प्रिय काले अंकल। आप काले हैं तो क्या हुआ। आप सच में काला सोना कहलाने के हकदार हैं। आप सोने के सामान कीमती हैं लेकिन आपका ह्रदय पेट्रोल सरीखा चमकदार और ऊर्जावान है।

 

हमें ही सुधरना होगा। हम बच्चों को सोचना होगा। हम ही तो हैं प्रदूषण के हरकारे।

 

{आद्या और रूद्र गाते हैं}

 

पेट्रोल, डीज़ल, पॉलीथिन,

 

घोर प्रदूषण हैं फैलाते।

 

पता नहीं क्यों नहीं नियंत्रण,

 

थोड़ा भी इन पर कर पाते।

 

आम हमे पाना है तो फिर,

 

बीज बबूलों के क्यों बोना।

 

काला सोना….

 

आद्या –रूद्र भैया क्यों न हम अपने मित्रों को भी बुलाकर काले अंकल की बातों का समर्थन कर उनका अभिनन्दन करें?

 

रूद्र –हां हां बिलकुल बहन आद्या, बिलकुल ठीक कहा तुमने। हम अपने मित्रों को अभी बुलाते हैं।

 

{तभी मंच पर चार बच्चे और आ जाते हैं}

 

फिर काली आकृति सहित सब बच्चे गाते हैं –

 

अब हम सबने सोच लिया है,

 

आसपास पैदल जाएंगे।

 

दूर-दूर जाना होगा तो,

 

ही हम वाहन ले जाएंगे।

 

अब कपडे के थैलों का ही,

 

हम उपयोग करेंगे हरदिन।

 

जीना भी अब शुरू करेंगे,

 

बिना प्लास्टिक, पॉलीथिन बिन,

 

पैदल चलने में अब हमको,

 

नहीं आएगा बिलकुल रोना।

 

काला सोना काला सोना ……..

 

{धीरे- धीरे परदा बंद होता है}

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है…)

विकास और विरासत: मोदी युग में नए भारत का नव-उदय

PM Narendra Modi

PM Narendra Modi

भारतीय राजनीति में 10 जून 2026 का दिन एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में दर्ज होगा। लगातार तीसरे कार्यकाल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए देश में सबसे लंबे समय तक चुने जाने वाले राष्ट्रप्रमुख बन जाएंगे। पीएम मोदी का यह कार्यकाल केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के उस अटूट विश्वास का प्रमाण है, जिसने भारत को प्रगति और वैश्विक नेतृत्व के शिखर पर पहुंचाया है। इस शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि नरेंद्र मोदी ने स्वयं को हमेशा 'प्रधान सेवक' के रूप में प्रस्तुत किया और स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (33% महिला आरक्षण) तथा 'मन की बात' जैसे अभियानों के माध्यम से शासन को सीधे जन-भागीदारी से जोड़ दिया।

 

तकनीक से सामाजिक न्याय और अंत्योदय

आर्थिक और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर, सरकार ने जनधन-आधार-मोबाइल यानी 'जैम ट्रिनिटी' की त्रिशक्ति से बिचौलियों और भ्रष्टाचार के पुराने तंत्र को समूल नष्ट कर दिया। डिजिटल तकनीक और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे जरूरतमंदों के खातों में पहुंच रहा है। इसके फलस्वरूप पिछले एक दशक में लगभग 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर आए हैं।

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वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर हर नागरिक को सम्मानित जीवन देने के लिए सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं ने धरातल पर करोड़ों जीवन बदले हैं। मुख्य योजनाओं की पहुंच को हम इन सीधे आंकड़ों से समझ सकते हैं: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (80 करोड़ मुफ्त राशन लाभार्थी), आयुष्मान भारत योजना (55 करोड़ लोगों को 5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य कवच), प्रधानमंत्री आवास योजना (4 करोड़ से अधिक पक्के मकान), पीएम-किसान निधि (11 करोड़ किसानों को सालाना 6,000 की सीधी मदद), जल जीवन मिशन (14 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल से जल), उज्ज्वला योजना (10 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन), पीएम सूर्य घर योजना (1 करोड़ घरों को मुफ्त सौर बिजली) और जनधन योजना (50 करोड़ से अधिक बैंक खाते) आदि हैं।

 

बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता

दूसरी ओर, बुनियादी ढांचे के निर्माण में वर्तमान भारत ने जो गति पकड़ी है, वह पूरी दुनिया के लिए शोध का विषय है। आज देश में प्रतिदिन लगभग 28 से 30 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हो रहा है; रेल नेटवर्क के आधुनिकीकरण के साथ 'वंदे भारत' जैसी स्वदेशी ट्रेनें दौड़ रही हैं और हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। यूपीआई (UPI) के माध्यम से आज भारत वैश्विक डिजिटल भुगतान में सबसे आगे है।

 

स्वास्थ्य क्षेत्र में पहले जहां केवल 7 एम्स (AIIMS) थे, वहीं अब 20 एम्स चालू हो चुके हैं। 'मेक इन इंडिया' की दूरदर्शी नीतियों के चलते भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है और देश अब सेमीकंडक्टर (चिप) निर्माण के क्षेत्र में उतरकर वैश्विक स्तर पर आत्मनिर्भर बन रहा है।

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विदेश नीति और वैश्विक नेतृत्व

वैश्विक मंच पर भारत की विदेश नीति 'राष्ट्र प्रथम' के महामंत्र पर आधारित है, जहां देश बिना किसी महाशक्ति के दबाव में आए स्वतंत्र निर्णय लेता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्षों और वैश्विक मंदी के बीच भी भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए कच्चे तेल का आयात जारी रखा और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक महाशक्ति बना रहा। जी-20 की सफल अध्यक्षता करके भारत 'ग्लोबल साउथ' की सशक्त आवाज और 'विश्वमित्र' के रूप में उभरा है। यही कारण है कि पीएम मोदी को अब तक 24 से अधिक देशों द्वारा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिए जा चुके हैं। हाल ही में, मई 2026 में उन्हें मिला नॉर्वे का सर्वोच्च सम्मान (ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट) उनके अंतरराष्ट्रीय सम्मानों की श्रृंखला में 32वां सम्मान है।

 

एक ऐतिहासिक नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में होती है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने रिकॉर्ड समय में दो प्रमुख टीकों- पूर्णतः स्वदेशी 'कोवैक्सीन' और भारत में निर्मित 'कोविशील्ड- का उत्पादन किया और 'वैक्सीन मैत्री' के तहत दुनिया के दर्जनों देशों को टीके भेजकर 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को चरितार्थ किया।

 

विकास भी, विरासत भी

यह नेतृत्व 'विकास भी, विरासत भी' के संतुलित मंत्र पर चलता है। एक तरफ इसरो (ISRO) ने चंद्रयान, सूर्ययान और गगनयान जैसे ऐतिहासिक अभियानों से अंतरिक्ष में अपना परचम लहराया, तो दूसरी तरफ अयोध्या में भव्य प्रभु श्री राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम व महाकाल लोक का पुनरुद्धार और योग-आयुर्वेद को वैश्विक मान्यता दिलाकर देश के सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया है।

 

इसी तरह, रक्षा क्षेत्र भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा है। 'मेक इन इंडिया' के तहत आईएनएस विक्रांत और तेजस जैसे हथियारों के निर्माण से जहां रक्षा आयात कम हुआ है, वहीं रक्षा निर्यात 21,000 करोड़ के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को पार कर चुका है। सीडीएस (CDS) पद का गठन, अटल व सेला टनल का निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति ने देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को अभेद्य बनाया है।

 

निष्कर्ष

अंततः, आज की यह ऐतिहासिक तिथि कोई ठहराव नहीं, बल्कि 'विकसित भारत @2047' के विराट संकल्प की ओर बढ़ने वाले एक अनंत रथ का नव-प्रस्थान है। आज का न्यू इंडिया एक हाथ में इसरो की आधुनिकतम तकनीक और दूसरे हाथ में अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का गौरव थामे हुए वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति के रूप में खड़ा है। आगामी पीढ़ियां मोदी युग को इतिहास के पन्नों में राष्ट्र के सांस्कृतिक अरुणोदय और वैश्विक महाशक्ति के रूप में उसके सिंहनाद के रूप में याद रखेंगी।

 

Birsa Munda: आदिवासी स्वाभिमान और स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा

Portrait of Birsa Munda, a brave warrior of the Indian freedom struggle and a rich historical personality

Birsa Munda Biography: स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा का बलिदान दिवस 9 जून को मनाया जाता है। भारतीय इतिहास में ‘धरती आबा’ (धरती पिता) के नाम से पूजे जाने वाले बिरसा मुंडा मात्र एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे आदिवासी चेतना, स्वाभिमान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के सबसे बड़े प्रतीक थे। 19वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश हुकूमत और जमींदार मिलकर आदिवासियों का शोषण कर रहे थे, तब बिरसा मुंडा ने एक ऐसी अलख जगाई जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी।

 

1. प्रारंभिक जीवन और चेतना का उदय

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले के उलीहातु गांव में हुआ था। भारत सरकार द्वारा उनके जन्मदिन 15 नवंबर को हर साल 'जनजातीय गौरव दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

 

बचपन और शिक्षा: उनका बचपन चाईबासा के जंगलों और खेतों में बीता। पढ़ाई के लिए उन्होंने कुछ समय ईसाई मिशनरी स्कूल में दाखिला लिया, जहां उनका नाम 'बिरसा डेविड' रखा गया।

 

शोषण के खिलाफ आवाज: स्कूल के दिनों में ही उन्होंने महसूस किया कि मिशनरी और ब्रिटिश व्यवस्था आदिवासियों की संस्कृति, भाषा और उनके पारंपरिक अधिकारों को नष्ट कर रही है। इसके बाद उन्होंने मिशनरी स्कूल छोड़ दिया और अपनी संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया।

 

2. 'बिरसा संप्रदाय' और सामाजिक सुधार

क्रांति से पहले बिरसा मुंडा ने समाज को अंदर से मजबूत करने का काम किया। उन्होंने देखा कि अंधविश्वास और नशे के कारण आदिवासी समाज कमजोर हो रहा है।

 

एकेश्वरवाद की सीख: उन्होंने आदिवासियों को केवल एक ईश्वर (सिंगबोंगा) की पूजा करने की सलाह दी।

 

सामाजिक बुराइयों का अंत: उन्होंने शराबबंदी, पशु बलि के विरोध और स्वच्छता पर जोर दिया।

 

उनके इन विचारों से प्रभावित होकर हजारों लोग उनके अनुयायी बन गए और लोग उन्हें प्यार से 'धरती आबा' कहने लगे।

 

3. 'उलगुलान' (महान विद्रोह) की शुरुआत

'उलगुलान' मुंडारी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है 'महान उथल-पुथल' या 'विद्रोह'। यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार की 'दिक्षु' (बाहरी शोषक, जमींदार और सूदखोर) नीति के खिलाफ था, जो आदिवासियों की ज़मीनें छीन रहे थे।

 

नारा: बिरसा मुंडा ने सिंहभूम और रांची के जंगलों में आदिवासियों को एकजुट किया और नारा दिया- 'अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना (अर्थात: अब हमारा राज शुरू हो गया है और महारानी का राज खत्म हो गया है)।

 

गुरिल्ला युद्ध: मुंडा तीर-कमान और पारंपरिक हथियारों से लैस होकर ब्रिटिश चौकियों, थानों और जमींदारों पर हमला करते थे। डोम्बारी पहाड़ी का युद्ध इस आंदोलन का एक ऐतिहासिक केंद्र बना।

 

4. महानायक का बलिदान

ब्रिटिश सेना आधुनिक हथियारों से लैस थी, फिर भी बिरसा मुंडा की रणनीतियों के सामने उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। आखिरकार, अंग्रेजों ने चाल चली और बिरसा मुंडा पर इनाम रख दिया।

 

गिरफ्तारी: मार्च 1900 में, चक्रधरपुर के जामकोपाई जंगल से सोते समय उन्हें धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया।

 

शहादत: मात्र 24 वर्ष की आयु में, 9 जून 1900 को रांची जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में (अंग्रेजों के अनुसार हैजे के कारण) उन्होंने अंतिम सांस ली। लेकिन इतिहासकारों और उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्हें अंग्रेजों द्वारा जेल में धीमा जहर दिया गया था। उनकी शहादत के बाद अंग्रेजों को आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act, 1908) कानून बनाना पड़ा, जिसने बाहरी लोगों को आदिवासी जमीन खरीदने से रोका।

 

'धरती आबा बिरसा मुंडा का जीवन हमें सिखाता है कि जब बात अपनी संस्कृति, अस्मिता और अधिकारों की हो, तो संसाधनों की कमी कभी भी आपके हौसलों को डिगा नहीं सकती।'

 

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सूर्यकुमार की छुट्टी? ‘रेडीमेड कप्तान है यह खिलाड़ी, 2022 से 2026 तक… हर बड़े मैच का हीरो

33 गेंद… 93 रन… 5 चौके… 9 आसमानी छक्के… और 281.81 का खतरनाक स्ट्राइक रेट!

धर्मशाला की ठंडी रात में रजत पाटीदार ने ऐसा तूफान उठाया कि गुजरात टाइटंस की पूरी टीम उड़ गई। आईपीएल 2026 के क्वालिफायर-1 में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के कप्तान ने सिर्फ मैच नहीं जीता, बल्कि टीम इंडिया के दरवाजे पर जोरदार दस्तक दे दी। RCB लगातार दूसरी बार और कुल चौथी बार आईपीएल फाइनल में पहुंच चुकी है, और इस सफर के सबसे बड़े हीरो बने हैं रजत पाटीदार। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि उन्हें टीम इंडिया में मौका मिलना चाहिए या नहीं… सवाल ये है कि क्या भारत को सूर्यकुमार यादव के बाद अपना अगला टी20 कप्तान मिल चुका है?

 

रजत सिर्फ रन नहीं बना रहे, वो मैच की दिशा बदल रहे हैं। जिस तरह उन्होंने विराट कोहली और देवदत्त पडिक्कल के आउट होने के बाद दबाव को मौके में बदला, उसने बता दिया कि ये खिलाड़ी बड़े मंच के लिए बना है। यही वजह है कि अब क्रिकेट एक्सपर्ट्स से लेकर फैंस तक हर कोई कह रहा है—“रजत पाटीदार को अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”

 

 


 

 1. मिडिल ऑर्डर का सबसे खतरनाक मैच फिनिशर

 

टीम इंडिया लंबे समय से ऐसे बल्लेबाज की तलाश में है जो नंबर 4 या 5 पर आते ही मैच का टेम्पो बदल दे। रजत पाटीदार वही खिलाड़ी साबित हो रहे हैं।

 

आईपीएल 2026 में उनका स्ट्राइक रेट 200 के करीब रहा। वो उन बल्लेबाजों में नहीं हैं जो 30-40 गेंदें खेलकर सेट होते हैं। रजत आते ही गेंदबाजों पर हमला बोलते हैं। गुजरात के खिलाफ 33 गेंदों में नाबाद 93 रन की पारी हो, मुंबई के खिलाफ 20 गेंदों में 53 रन, लखनऊ के सामने 31 गेंदों में 61 या राजस्थान के खिलाफ 63 रन—हर बार उन्होंने दिखाया कि दबाव उन्हें डराता नहीं, बल्कि और खतरनाक बना देता है।

 

सबसे खास बात ये है कि वो पावरप्ले की आक्रामकता को मिडिल ओवर्स तक खींच ले जाते हैं। आधुनिक टी20 क्रिकेट में यही सबसे बड़ी कला मानी जाती है।

 

 

 2. कप्तानी में शांत दिमाग, फैसलों में आक्रामक सोच

 

आईपीएल जैसी हाई-प्रेशर लीग में कप्तानी करना आसान नहीं होता, खासकर तब जब सामने विराट कोहली जैसी बड़ी मौजूदगी हो। लेकिन रजत पाटीदार ने पूरे सीजन जिस परिपक्वता से आरसीबी को संभाला, उसने सबको प्रभावित किया। आरसीबी का बैक-टू-बैक फाइनल में पहुंचना सिर्फ बल्लेबाजी का नहीं, बल्कि शानदार नेतृत्व का भी परिणाम है। रजत मैदान पर ज्यादा शोर नहीं मचाते, लेकिन उनके फैसले बहुत कुछ बोलते हैं। गेंदबाजी बदलाव हो या फील्ड सेटिंग, उन्होंने हर मौके पर मैच पढ़ने की क्षमता दिखाई।

 

टीम इंडिया फिलहाल ऐसे कप्तान की तलाश में है जो शांत भी हो और निडर भी। रजत दोनों बॉक्स टिक करते हैं। यही वजह है कि उन्हें “रेडीमेड कप्तानी विकल्प” कहा जा रहा है।

 

 

 

 3. बड़े मैचों के खिलाड़ी, दबाव में और खतरनाक

 

हर खिलाड़ी लीग मैचों में रन बना सकता है, लेकिन असली सुपरस्टार वही होता है जो नॉकआउट में चमके। रजत पाटीदार बार-बार यही साबित कर चुके हैं।

 

IPL 2022 Eliminator में उन्होंने लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाफ 54 गेंदों में नाबाद 112 रन ठोके थे। उस पारी ने पहली बार पूरे देश को एहसास कराया था कि आरसीबी को एक एक्स-फैक्टर बल्लेबाज मिल चुका है। अब आईपीएल 2026 के क्वालिफायर में 33 गेंदों में 93 रन की विस्फोटक पारी ने साबित कर दिया कि 2022 कोई फ्लूक नहीं था। जब मंच बड़ा होता है, तब रजत का खेल और बड़ा हो जाता है। यही वो क्वालिटी है जो किसी खिलाड़ी को सिर्फ अच्छा बल्लेबाज नहीं, बल्कि मैच विनर और लीडर बनाती है।

 4. स्पिन के खिलाफ भारत का सबसे बड़ा हथियार

 

मौजूदा समय में भारतीय बल्लेबाज विदेशी स्पिनर्स के खिलाफ संघर्ष करते नजर आते हैं। लेकिन रजत पाटीदार की सबसे बड़ी ताकत ही स्पिन अटैक को तहस-नहस करना है। वो फ्रंट फुट पर निकलकर छक्के मारते हैं, बैकफुट पर कट खेलते हैं और मिडिल ओवर्स में रनरेट कभी गिरने नहीं देते।

धर्मशाला में कागिसो रबाडा की ऑफ स्टंप के बाहर पड़ी गुड लेंथ गेंद को कवर स्टैंड के ऊपर पहुंचाना उनकी रेंज और आत्मविश्वास दिखाने के लिए काफी था।

 

टी20 क्रिकेट अब सिर्फ तकनीक का नहीं, इंटेंट का खेल बन चुका है। और रजत का इंटेंट हर गेंद पर दिखाई देता है।

 

 अब और इंतजार क्यों?

 

रजत पाटीदार कोई “वन सीजन वंडर” नहीं हैं।

वो भारत के लिए टेस्ट (3) और वनडे (1) खेल चुके हैं। घरेलू क्रिकेट में मध्य प्रदेश को रणजी ट्रॉफी जिताने में बड़ी भूमिका निभा चुके हैं। आईपीएल में लगातार असर छोड़ रहे हैं। कप्तानी का अनुभव भी है और बड़े मैचों का टेंपरामेंट भी। सूर्यकुमार यादव ने भारतीय टी20 क्रिकेट को नई दिशा दी, लेकिन अब टीम इंडिया को अगले टी20 वर्ल्ड कप और ओलंपिक साइकल के लिए नया चेहरा तैयार करना होगा।

 

और अगर मौजूदा फॉर्म, कप्तानी, मैच-विनिंग क्षमता और दबाव झेलने की ताकत को देखा जाए…

तो शायद भारतीय क्रिकेट के पास जवाब पहले से मौजूद है

 

नाम है… रजत पाटीदार।

अमेरिका और ईरान युद्ध दोबारा भड़का तो क्या होगा?

अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को लागू हुआ युद्धविराम फिलहाल बना हुआ है, लेकिन शाब्दिक नोक-झोंक और पूर्ववत तनावों के बीच उनकी बातचीत में प्रगति के संकेत भी मिल रहे हैं।

 

अमेरिकी न्यूज़ पोर्टल एक्सिओस (Axios) के अनुसार, सबसे नई प्रगति यह है कि एक 'समझौता ज्ञापन' (मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) दोनों देशों के बीच विवाद के सभी प्रमुख मुद्दों को संबोधित करता है। वह कथित तौर पर सभी तरह की शत्रुता को अस्थायी रूप से रोकने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित है। ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना और अमेरिका द्वारा ज़ब्त ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना भी कथित तौर पर चर्चा का विषय है।

 

अमेरिकी के सूत्रों के अनुसार, आशा है कि ईरान युद्धविराम की अवधि के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों के गुज़रने में मदद करेगा। कोई टोल (शुल्क) नहीं लिया जाएगा। जहाज़ों का यातायात जल्द ही 'युद्ध-पूर्व के स्तर' पर लौट जाएगा। किंतु, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि यह युद्धविराम कितने समय तक चलेगा। अमेरिकी सूत्रों ने 60 दिनों की अवधि की बात कही है। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने सरकारी टेलीविज़न पर '30 से 60 दिनों की अवधि' का ज़िक्र किया।

ईरान बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बिछाई गई बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार है। इसके बदले में, अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी नाकेबंदी हटा सकता है और ईरान को बिना किसी रोक-टोक के तेल निर्यात करने की अनुमति दे सकता है। किंतु, इस बारे में ईरान से आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। वहां की समाचार एजेंसी 'फ़ार्स' ने लिखा कि ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या को युद्ध-पूर्व स्तर पर वापस लाने पर सहमति जताई तो है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि युद्ध से पहले जैसी 'मुक्त आवाजाही' की स्थिति फिर से बहाल हो गई है। इसलिए, ट्रंप के बयान को 'अधूरा' माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि वह वास्तविकता को नहीं दर्शाता।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य

ईरान ने कथित तौर पर वादा किया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा। किंतु, उसके यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को निलंबित करने के संबंध में बातचीत अभी होनी है। अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का भंडार भी चर्चा का विषय है; उसे ईरान से संभवतः हटाया जा सकता है। इसके बदले में, अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने और उस की संपत्तियों को मुक्त करने की बात कही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने 'कुछ प्रगति' की बात करते हुए, बहुत सावधानी भरी आशावादिता का स्वर अपनाया। उन्होंने संकेत दिया कि वे संभवतः कुछ ही दिनों के भीतर कोई सही घोषणा कर पाएंगे।

 

दूसरी ओर, अमेरिका में टेक्सास राज्य के रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ ने X पर लिखाः अगर इसका नतीजा 'एक ऐसा ईरानी शासन देखने में आता है— जिसका नेतृत्व अभी भी वे इस्लामी कट्टरपंथी ही कर रहे हैं जो ''अमेरिका का नाश हो'' के नारे लगाते हैं— और जिसे अब अरबों डॉलर मिलते हैं, जो यूरेनियम को समृद्ध करने और परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है और जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर प्रभावी रूप से नियंत्रण रखता है, तो यह एक विनाशकारी ग़लती होगी।' 

ईरानी राष्ट्रपति को अमेरिका पर विश्वास नहीं

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने यथासंभव कूटनीतिक समाधान के प्रति अपनी तत्परता दिखाई, लेकिन उन्होंने वाशिंगटन के प्रति तेहरान के गहरे अविश्वास पर ज़ोर भी दिया। उन्होने कहा, 'हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अमेरिका के साथ पिछली वार्ताओं के अनुभवों ने हमें अत्यधिक सावधानी बरतने पर मज़बूर कर दिया है।'

 

ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के महीनों बाद भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अभी भी बंद है। 'समझौता ज्ञापन' वाला समाचार आने से दो ही दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना था कि ईरान के साथ बातचीत उम्मीद से कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हो रही है। यदि कोई समझौता हो भी जाता है, तब भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य को निरापद बनाने के अभियान के समय अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की ज़रूरत पड़ेगी।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य लिए एक 'प्लान B' की वकालत

स्वीडन के हेलसिंगबोर्ग नगर में 22 मई को हुई नाटो (NATO) के विदेश मंत्रियों की बैठक में बोलते हुए, मार्को रूबियो ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक 'प्लान B' की वकालत की। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ ऐसे किसी भी समझौते का, जिसमें इस जलडमरूमध्य को — जो वैश्विक तेल और गैस बाज़ार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण जलमार्ग है— फिर से खोलने का प्रावधान हो, हर कोई स्वागत ही करेगा। लेकिन, ईरान यदि इस जलडमरूमध्य को फिर से खोलने से इनकार कर देता है और उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने तथा वहां से गुज़रने के लिए टोल (शुल्क) लगाने पर अड़ा रहता है— तो एक 'प्लान B' की ज़रूरत पड़ेगी।

 

अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने बताया कि फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व वाला एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन, वर्तमान टकराव खत्म होने के बाद के लिए एक संभावित नौसैनिक मिशन की तैयारी कर रहा है। साथ ही उनका कहना था कि 'तब भी हमें एक 'प्लान B' की ज़रूरत है, यदि कोई गोलीबारी शुरू कर दे, तो ऐसी स्थिति में आप जलडमरूमध्य को फिर से कैसे खोलेंगे?' उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह ज़रूरी तौर पर नाटो (NATO) का एक मिशन होना चाहिए या नहीं, 'लेकिन इसमें निश्चित रूप से वे नाटो देश शामिल होंगे जो अपना योगदान देने में सक्षम हैं।'

 

रूबियो ने स्वीडन वाले अपने वक्तव्य में इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिका अपने सहयोगियों की मदद पर निर्भर नहीं है। उनके शब्दों में, 'संयुक्त राज्य अमेरिका यह कर सकता है, लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने इस तरह के काम में संभावित रूप से हिस्सा लेने में दिलचस्पी दिखाई — ऐसी नौबत यदि सचमुच आती है।' उन्होंने किसी खास देश का नाम नहीं लिया।

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होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुलना विवाद का विषय

अमेरिका और ईरान के बीच इस समय रुकी हुई बातचीत में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना उनके बीच विवाद के मुख्य बिंदुओं में से एक है। युद्ध शुरू होने के बाद, ईरान ने धमकियां देकर और तेलवाही टैंकरों तथा मालवाही जहाज़ों पर गोलाबारी करके इस जलडमरूमध्य से होकर जहाज़ों की आवाजाही को काफी हद तक बंद कर दिया है। इसके जवाब में, अमेरिका ने भी अपनी तरफ से ईरानी बंदरगाहों की तरफ जहाजों की आवाजाही रोक रखी है।

 

इस दोहरी नाकेबंदी के अलवा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से हो कर जहाज़ों का आना-जाना तब तक इसलिए भी ख़तरे से खाली नहीं होगा, जब तक ईरान द्वारा जलडमरूमध्य की तलहटी में बिछाई गई विस्फोटक सुरंगों को ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट नहीं कर दिया जाता। अमेरिका के लिए यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा बन गया है। दैनिक 'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना, ईरान द्वारा बिछाई गई समुद्री सुरंगों को हटाने में अभी शायद सक्षम नहीं है— न तो तेज़ी से और न ही अकेले। इस काम में यूरोपीय देशों के सहयोग की भी एक प्रमुख भूमिका हो सकती है।

अनगिनत बारूदी सुरंगें, हटाने में छह महीने लग सकते हैं

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की तलहटी में 'महाम,' 'सदाफ़,' 'MDM,' और 'EM-52' आदि नाम वाली अनगिनत बारूदी सुरंगें फैला रखी हैं। अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को बंद दरवाज़े के पीछे दी गई एक ब्रीफ़िंग में, पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) ने कथित तौर पर कहा कि इन सुरंगों को हटाने के अभियान में छह महीने तक का समय लग सकता है।

 

'द टेलीग्राफ़' के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पूर्व अधिकारी केविन आयर ने कहा, 'लगभग 518 वर्ग किलोमीटर का इलाका साफ़ करना होगा। यह बहुत बड़ा समुद्री विस्तार है।' इससे पता चलता है कि ऐसा कोई अभियान कितना जटिल और जोखिम भरा होगा। जिन नौसैनिक जहज़ों की सहायता से यह काम करना होगा, उनका अभी तक असली युद्ध की परिस्थितियों में परीक्षण तक नहीं हुआ है। एक अंदरूनी सूत्र ने 'द टेलीग्राफ' को बताया: 'गठबंधन के भीतर क्षमताओं का सबसे बड़ा हिस्सा यूरोपीय देशों के पास है।'

अमेरिका के लिए यूरोपीय समर्थन

अतीत के रूस-अमेरिकी 'शीत युद्ध' वाले समय के बाद के दौर में अमेरिका ने मुख्य रूप से विमान वाहक जहाज़ों, पनडुब्बियों और विध्वंसक जहाज़ों पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने बारूदी सुरंगों का पता लगाने की अपनी विशेष क्षमताओं को बनाए रखा। 'द टेलीग्राफ' के अनुसार, जर्मनी बारूदी सुरंगों का पता लगाने वाले अपने जहाज़ 'फुल्दा' को पहले ही तैनात कर चुका है। बताया जा रहा है कि ब्रिटेन भी स्वचालित बारूदी सुरंग-खोजी जहाज़ और गोताखोर उपलब्ध करा रहा है, जबकि इटली बारूदी सुरंगें हटाने वाले जहाज़ भेज रहा है।

 

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के दो जहाज— यूएस पायोनियर और यूएस चीफ़— पहले ही फ़ारस की खाड़ी की ओर रवाना हो चुके हैं। हालांकि, वहां पहुंचने के बाद उन्हें काफ़ी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। माना जाता है कि बारूदी सुरंगों संबंधी किसी संभावित सफ़ाई अभियान की स्थिति में अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर ही कोई कदम उठाएगा।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी IEA की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ उपयोगी बातचीत की आशा में उस पर नए हमलों को फिलहाल रोक रखा है। यदि फिर से युद्ध भड़का तो कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोटक बढ़ोतरी होनी तय है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वह और अधिक तेल-भंडारों से तेल जारी करने के लिए तैयार है, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को जल्द खोलना भी बेहद ज़रूरी है।

 

ईरान के भौगोलिक नियंत्रण वाले इस 21 किलोमीटर चौड़े जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। IEA ने चेतावनी दी कि यदि हॉर्मुज जलडरूमध्य दोबारा नहीं खुला या ऊर्जा निर्यात के वैकल्पिक रास्ते नहीं बनाए गए, तो दुनिया तेल की आपूर्ति के और भी बड़े संकट में फंस सकती है।

वैश्विक ऊर्जा संकट की सबसे गंभीर चेतावनी

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने वैश्विक ऊर्जा संकट को लेकर अब तक की सबसे गंभीर चेतावनी जारी की है। एजेंसी के प्रमुख फ़ेथ बिरोल ने कहा है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने वाला यातायात ठप होने से दुनिया के बाजारों से प्रतिदिन करीब 1.4 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति कम हो गई है। वैश्विक तेल भंडार तेजी से घट रहे हैं। मार्च में IEA और उसके 32 सदस्य देशों ने रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल बाज़ार में जारी किया था, लेकिन अब ये भंडार भी लगभग ख़त्म होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। फ़ेथ बिरोल ने चेतावनी दी कि हालत यदि सुधरी नहीं, तो जुलाई तक वैश्विक तेल बाज़ार ख़तरे की घंटी वाले ''रेड ज़ोन'' में पहुंच सकता है।

 

''रेड ज़ोन'' का अर्थ ऐसी स्थिति है, जब वैश्विक तेल आपूर्ति मांग के दबाव को संभालने में असमर्थ हो जाए। यानी, तेल भंडार इतने कम हो जाएं कि कोई भी अतिरिक्त बाधा आपूर्ति संकट और कीमतों में तेज़ उछाल पैदा कर दे। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें फिलहाल 104 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं, जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले यह क़रीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी। बिरोल पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि वर्तमान तेल संकट 1973, 1979 और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान आए तेल संकटों से भी ज्यादा गंभीर है। उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजार से प्रतिदिन 1.4 करोड़ बैरल तेल पहले ही ग़ायब हो चुका है।

दोबारा युद्ध भड़का तो क्या होगा?

मई की शुरुआत में कच्चे तेल की क़ीमतें 114 डॉलर तक पहुंची थीं। यदि युद्ध दोबारा भड़का तो क़ीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। IEA के अनुसार, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान 18.27 करोड़ बैरल तेल जारी किया गया था, लेकिन इस बार 40 करोड़ बैरल जारी करने के बावजूद संकट काबू में नहीं आ रहा है। बिरोल ने कहा कि इस भयावः स्थिति का सबसे अधिक असर गरीब देशों पर पड़ेगा, ख़ासकर अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तो खाद्य संकट तक पैदा हो सकता है! कहने की आवश्यकता नहीं कि तब भारत में भी कुहराम मच जायेगा। किंतु, प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक अंध विरोधी तब भी तेल के अकाल के लिए उन्हें ही दोषी ठहराएंगे।