ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने बिना अनुमति के होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने के खिलाफ चेतावनी दी है, और कहा है कि नियमों का पालन न करने वाले जहाजों से निपटा जाएगा और जलमार्ग के माध्यम से एक नए मार्ग की आलोचना की है।दूसरी तरफ, डोनाल्ड ट्रंप ने फिर जोर देकर कहा है कि ईरान इ
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने बिना अनुमति के होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने के खिलाफ चेतावनी दी है, और कहा है कि नियमों का पालन न करने वाले जहाजों से निपटा जाएगा और जलमार्ग के माध्यम से एक नए मार्ग की आलोचना की है।दूसरी तरफ, डोनाल्ड ट्रंप ने फिर जोर देकर कहा है कि ईरान इ
Market Outlook : 25 जून को भारतीय इक्विटी इंडेक्स ने दिन के दौरान हुई ज्यादातर बढ़त गंवा दी और मामूली बढ़त के साथ बंद हुए। निफ्टी 24,050 के आसपास रहा। कारोबारी सत्र के अंत में सेंसेक्स 109.25 अंक या 0.14 प्रतिशत बढ़कर 77,100.47 पर और निफ्टी 34.35 अंक या 0.14 प्रतिशत बढ़कर 24,056.00 पर सेयल हुआ। लगभग 1544 शेयरों में बढ़त हुई,2488 शेयरों में गिरावट आई और 180 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।
निफ्टी में सबसे ज्यादा बढ़त वाले शेयरों में इंटरग्लोब एविएशन,M&M,मैक्स हेल्थकेयर,मारुति सुजुकी और टाटा कंज्यूमर शामिल रहे। जबकि ONGC,पावर ग्रिड कॉर्प,हिंडाल्को और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक महिंद्रा में गिरावट देखने को मिली।
सेक्टोरल इंडेक्स मिले-जुले रहे। FMCG में 0.7%,रियल्टी में 0.3% और ऑटो इंडेक्स में 2% से ज्यादा की बढ़त हुई। जबकि IT,एनर्जी,मीडिया,मेटल और ऑयल एंड गैस इंडेक्स 0.5-1% नीचे रहे। निफ्टी मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.5 प्रतिशत की गिरावट आई।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स में हेड ऑफ रिसर्च विनोद नायर का कहना है कि दिन के शुरुआती कारोबार में हुई बढ़त के बाद प्रॉफिट बुकिंग की वजह से घरेलू बाजार बिना किसी बड़े बदलाव के बंद हुआ। कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट से रुपये को सहारा मिला और कुछ राहत भी मिली,लेकिन यह बढ़त की रफ़्तार बनाए रखने के लिए काफी नहीं थी।
सेक्टर के हिसाब से देखें तो ऑटो शेयरों ने अच्छा प्रदर्शन किया। इसकी वजह रही मेटल की कीमतों में नरमी,सप्लाई चेन की दिक्कतों में कमी और महीने के दौरान रिटेल डिमांड में सुधार।
कुल मिलाकर बाजार का मूड पॉजिटिव रहा। हालांकि,FII की लगातार बिकवाली से तेजी सीमित हो सकती है। आने वाले समय में,Q1 के नतीजों को लेकर कमजोर उम्मीदों और मॉनसून की असमान स्थिति का असर बाजार के मूड पर पड़ सकता है,इसलिए इन पर नजर रखनी होगी।
Hedged.in में एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट, HNI एंड डेरिवेटिव्स,रियांक अरोड़ा का कहना है कि भारतीय इक्विटी मार्केट में आज का ट्रेडिंग सेशन थोड़ा पॉजिटिव रहा। दिन भर उतार-चढ़ाव सीमित दायरे में रहने के बावजूद बेंचमार्क इंडेक्स बढ़त के साथ बंद हुए। अहम सपोर्ट लेवल के ऊपर बने रहना लगातार खरीदारी की रुचि को दिखाता है। मार्केट में नए ट्रिगर्स आने से पहले निवेशक सोच-समझकर कदम उठा रहे हैं।
निफ्टी 30 अंक यानी 0.12%) बढ़कर 24,050 पर बंद हुआ। यह इंडेक्स 24,000 के अहम लेवल के ऊपर बना हुआ है,जो बताता है कि शॉर्ट-टर्म ट्रेंड पॉजिटिव है। इसके लिए तत्काल सपोर्ट 24,000–23,950 के आसपास है और इसके बाद 23,850 के आसपास मजबूत सपोर्ट जोन है। ऊपर की तरफ, रेजिस्टेंस 24,100–24,150 और उसके बाद 24,250 पर दिख रहा है। लगातार इन लेवल के ऊपर बने रहने से और बढ़त का रास्ता खुल सकता है।
BSE सेंसेक्स 105 अंक यानी 0.14% बढ़कर 77,100 पर बंद हुआ। इंडेक्स सीमित दायरे में ट्रेड करता रहा लेकिन पॉजिटिव जोनन में बंद होने में कामयाब रहा,जो निचले लेवल पर लगातार खरीदारी का सपोर्ट दिखाता है। इसके लिए तत्काल सपोर्ट 76,900–76,700 के आसपास है। जबकि रेजिस्टेंस 77,300–77,500 के पास दिख रहा है। इस जोन के ऊपर ब्रेकआउट से बुलिश मोमेंटम और मजबूत हो सकता है।
कुल मिलाकर मार्केट पॉजिटिव रुख के साथ कंसोलिडेट होता रहा,जिससे पता चलता है कि सेशन के दौरान सीमित बढ़त के बावजूद खरीदारों का दबदबा बना हुआ है। जब तक अहम सपोर्ट लेवल बने हुए हैं,तब तक मार्केट का स्ट्रक्चर पॉजिटिव बना रहेगा। ट्रेडर्स अच्छे रिस्क मैनेजमेंट के साथ गिरावट पर खरीदारी की रणनीति अपना सकते हैं, क्योंकि मुख्य ट्रेंड अभी भी पॉजिटिव है।
ब्रिकवर्क रेटिंग्स में हेड ऑफ़ रिसर्च,राजीव शरण का कहना है कि ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल पर आना ग्लोबल कमोडिटी मार्केट की कहानी में एक बड़ा बदलाव है। यह बदलाव मांग में कमी के कारण नहीं,बल्कि जियोपॉलिटिकल तनाव कम होने की वजह से आया है। अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है। इससे सप्लाई में आई वह रुकावट दूर हो रही है।
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े क्रूड आयातक देश भारत के लिए यह निश्चित रूप से अच्छी खबर है। तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की गिरावट से भारत का सालाना आयात बिल लगभग 12 से 15 अरब डॉलर कम हो जाता है। इससे करंट अकाउंट पर दबाव कम होता है और भारतीय रिजर्व बैंक को विकास को बढ़ावा देने के लिए उधार की लागत (ब्याज दरों) को अनुकूल बनाए रखने की अधिक गुंजाइश मिलती है।
घरेलू बाजारों ने इस पर अच्छी प्रतिक्रिया दी है। 25 जून को सेंसेक्स 77,000 के स्तर को पार कर गया और निफ्टी 24,100 के आसपास मज़बूत बना रहा। इसमें ऑटो,एविएशन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर के शेयरों ने बढ़त में अहम भूमिका निभाई। भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए निकट भविष्य का आउटलुक अच्छा दिख रहा है,बशर्ते क्रूड की कीमतें 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में स्थिर रहें और मॉनसून उम्मीद के मुताबिक अच्छा रहे।
इक्विरस वेल्थ के MD और बिज़नेस हेड,अंकुर पुंज का कहना है कि बाजार में लंबी छुट्टी से पहले,निवेशकों ने कारोबारी सत्र के अंतिम हिस्से में मुनाफावसूली की,जिससे बाजार मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ। चूंकि मुहर्रम के कारण शुक्रवार को बाजार बंद रहेंगे,इसलिए निवेशकों ने अपनी इक्विटी होल्डिंग कम कर दी। भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण ग्लोबल मैक्रो-इकोनॉमी पर अभी भी अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं,ऐसे में निवेशकों के लिए चुनिंदा शेयरों में खरीदारी करना एक बेहतर विकल्प हो सकता है।
कोटक सिक्योरिटीज में VP टेक्निकल रिसर्च अमोल अठावले ने कहा कि इस हफ्ते बेंचमार्क इंडेक्स में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। काफी उतार-चढ़ाव के बाद,निफ्टी 0.18 प्रतिशत बढ़कर बंद हुआ। जबकि सेंसेक्स में 297 अंकों की बढ़त हुई। सेक्टरों की बात करें तो फार्मा इंडेक्स में 2 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी आई,जबकि मेटल इंडेक्स में सबसे ज्यादा गिरावट हुई और यह 4.40 प्रतिशत नीचे आया। हफ्ते के दौरान,तेज गिरावट के बाद मार्केट को 50 डे SMA (सिंपल मूविंग एवरेज)के पास सपोर्ट मिला और इसमें तेजी से सुधार हुआ। हालांकि,एक बार फिर इसे 24,200/77,800 के रेजिस्टेंस जोन के पास प्रॉफिट बुकिंग का सामना करना पड़ा।
टेक्निकल तौर पर मार्केट ने एक रेंज-बाउंड पैटर्न बनाया है। नीचे की तरफ,इसे 50 डे SMA या 23,800/76,200 के पास सपोर्ट मिला है,जबकि 24,200-24,250/77,800-78,000 के रेजिस्टेंस लेवल के पास लगातार बिकवाली का दबाव बना हुआ है। पोजीशनल ट्रेडर्स के लिए, 24,000/77,000 एक इमीडिएट सपोर्ट जोनन का काम करेगा। इस लेवल के ऊपर,मार्केट 24,200/77,800 को फिर से टेस्ट कर सकता है। 24,200/77,800 के लेवल को सफलतापूर्वक पार करने पर मार्केट 24,400-24,500/78,400-78,700 की ओर बढ़ सकता है।
दूसरी ओर 24,000/77,000 के नीचे जाने पर मार्केट 23,800/76,200 तक गिर सकता है। गिरावट का सिलसिला जारी रह सकता है और इंडेक्स 23,650/75,700 तक जा सकता है।
बैंक निफ्टी के लिए,सपोर्ट जोन 57,800 और 57,500 पर हैं। इन लेवल के ऊपर,तेजी 58,700-59,000 की ओर जारी रह सकती है। इसके उलट, 57,500 के नीचे जाने पर अपट्रेंड कमजोर हो सकता है।
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LPG Price Today: बुधवार, 24 जून को घरेलू और कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतें स्थिर रही, जबकि US-ईरान शांति वार्ता में प्रगति के कारण ग्लोबल ऑयल की कीमतों में कमी आई है। बता दें कि 7 जून को हुई बढ़ोतरी के बाद से रसोई गैस (14.2 किलोग्राम) की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। उस समय तेल कंपनियों (OMCs) ने 14.2 किलो वाले घरेलू LPG सिलेंडर के दाम 29 रुपये बढ़ाए थे। इससे पहले 7 मार्च को भी सिलेंडर 60 रुपये महंगा किया गया था। वहीं, 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत में पिछली बार करीब 42 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी। इसकी वजह ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते सप्लाई में आई दिक्कतें थीं।
गौरतलब है कि US-ईरान तनाव के कारण पश्चिम एशिया से एनर्जी सप्लाई प्रभावित हुई है और LPG का आयात प्रति माह 2 मिलियन टन से घटकर अप्रैल में 696,000 टन रह गया। पिछले चार महीनों में कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में लगभग 79% की बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि इसकी कीमत सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस (CP) पर आधारित होती है, जिसे सऊदी अरामको हर महीने की शुरुआत में तय करती है।
शहर के हिसाब से घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर की कीमतें
| शहर | घरेलू LPG (14.2 किलोग्राम) | कमर्शियल LPG (19 किलोग्राम) |
|---|---|---|
| नई दिल्ली | ₹942.00 (+₹29.00) | ₹3,113.50 (+₹42.00) |
| कोलकाता | ₹968.00 (+₹29.00) | ₹3,255.50 (+₹53.50) |
| मुंबई | ₹941.50 (+₹29.00) | ₹3,067.50 (+₹43.50) |
| चेन्नई | ₹957.50 (+₹29.00) | ₹3,283.00 (+₹46.00) |
| गुरुग्राम | ₹950.50 (+₹29.00) | ₹3,130.00 (+₹42.00) |
| नोएडा | ₹939.50 (+₹29.00) | ₹3,113.50 (+₹42.00) |
| बेंगलुरु | ₹944.50 (+₹29.00) | ₹3,198.00 (+₹46.00) |
| भुवनेश्वर | ₹968.00 (+₹29.00) | ₹3,290.00 (+₹52.00) |
| चंडीगढ़ | ₹951.50 (+₹29.00) | ₹3,136.00 (+₹43.50) |
| हैदराबाद | ₹994.00 (+₹29.00) | ₹3,367.00 (+₹52.00) |
| जयपुर | ₹945.50 (+₹29.00) | ₹3,141.00 (+₹42.00) |
| लखनऊ | ₹979.50 (+₹29.00) | ₹3,236.00 (+₹42.00) |
| पटना | ₹1,031.50 (+₹29.00) | ₹3,400.00 (+₹53.50) |
| तिरुवनंतपुरम | ₹951.00 (+₹29.00) | ₹3,152.00 (+₹46. |
US-Iran डील के बाद भारत आने वाले कितने जहाज होर्मुज से गुजरे?
पिछले हफ्ते US और ईरान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद, भारत आने वाले कुल 11 जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे। मंगलवार को एक मीडिया ब्रीफिग में विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “17 जून को MoU (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर होने के बाद से, भारत आने वाले 11 जहाज होर्मुज से गुजरे हैं।”
इन जहाजों में 3 भारतीय झंडे वाले कच्चे तेल के टैंकर शामिल हैं, जिनमें प्रत्येक में 2.85 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चा तेल है। इसके अलावा विदेशी झंडे वाला एक LPG कैरियर, विदेशी झंडे वाला एक कच्चे तेल का टैंकर और विदेशी झंडे वाले छह बल्क कैरियर शामिल हैं, जिनमें उर्वरक (खाद) लदा था। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारतीय झंडे वाले 10 जहाज अभी भी फारस की खाड़ी क्षेत्र में हैं, जबकि दो हाल ही में वहां पहुंचे हैं।
क्या भारत के लिए वेस्ट एशिया से आने वाली LPG का कोई स्थायी विकल्प है?
रॉयटर्स ने इंडस्ट्री के सूत्रों के हवाले से बताया है कि जून में अमेरिका से भारत का LPG इंपोर्ट 1 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने वाला है, जो अब तक का सबसे ज्यादा आंकड़ा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इसी महीने संयुक्त अरब अमीरात से सप्लाई में सुधार हुआ है और यह 3,00,000 से 4,00,000 टन के आसपास पहुंच गई है। साथ ही, जून में OMCs को कुवैत से भी लगभग 45,000 टन LPG मिलेगी।
आपको बताते चलें कि अमेरिका-ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से पहले, भारत अपने LPG आयात के लिए पश्चिमी एशिया पर बहुत ज्यादा निर्भर था; इसका लगभग 90% हिस्सा इसी व्यापार मार्ग से आता था।
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US Iran Conflict: मिडिल ईस्ट में कुछ दिनों से थोड़ी शांति है। हालांकि, सीजफायर समझौते के बाद कई ऐसे मौके हुए जब ऐसा लगा है कि कभी भी युद्ध भड़क सकता है। अब इस पर एक बड़ी खबर सामने आई है। अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन यानी सीनेट ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है, जिसमें राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के ईरान के साथ युद्ध करने के अधिकार को चुनौती दी गई है। यह प्रस्ताव व्हाइट हाउस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
सीनेट में यह प्रस्ताव 50-48 के मामूली अंतर से पास हुआ। इस प्रस्ताव के आने के बाद अब ईरान पर हमला करना मुश्किल हो गया है। यह प्रस्ताव ट्रंप को निर्देश देता है कि जब तक अमेरिकी संसद सैन्य कार्रवाई की स्पष्ट अनुमति नहीं देती, तब तक वे ईरान के साथ चल रहे इस युद्ध से अमेरिकी सेना को दूर रखें।
क्या है इस प्रस्ताव का मतलब?
चूंकि यह एक ‘कनकरेंट रेजोल्यूशन’ है, इसलिए इसे राष्ट्रपति ट्रंप के पास हस्ताक्षर या वीटो के लिए नहीं भेजा जाएगा। कानूनी रूप से इसकी बाध्यता को लेकर भले ही विवाद हो, लेकिन इस वोटिंग ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिकी संसद के दोनों सदन अब इस युद्ध के खिलाफ खड़े हैं।
फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद यह युद्ध शुरू हुआ था, जिसने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को हिलाकर रख दिया था। यह अमेरिकी इतिहास में साल 1973 के ‘वॉर पावर्स रेजोल्यूशन’ के बाद पहला मौका है जब संसद के दोनों सदनों ने राष्ट्रपति को सैन्य कार्रवाई रोकने का निर्देश देने वाला ऐसा प्रस्ताव पारित किया है।
शांति समझौते के बीच क्यों बढ़ी ट्रंप की टेंशन?
यह वोटिंग ऐसे समय में हुई है जब ट्रम्प प्रशासन ईरान के साथ हुए शुरुआती शांति समझौते (MoU) को 60 दिनों के भीतर एक अंतिम समझौते में बदलने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। इस समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में ढील और होर्मुज जलडमरूमध्य का विवाद शामिल है।
सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता चक शूमर ने इस वोटिंग के जरिए रिपब्लिकन सांसदों को भी घेर लिया। उन्होंने कहा, ‘रिपब्लिकन बंद दरवाजों के पीछे ट्रंप के युद्ध, उनकी गोपनीयता और ईरान के साथ उनके खराब सौदे की जितनी चाहें उतनी शिकायत कर सकते हैं, लेकिन इस युद्ध को हमेशा के लिए खत्म करने का एकमात्र तरीका यह है कि रिपब्लिकन खुलकर सामने आएं और कार्रवाई करें।’
नवंबर चुनाव और महंगाई का डर
अमेरिकी सांसदों के बीच इस युद्ध को लेकर बढ़ती बेचैनी की एक बड़ी वजह आगामी नवंबर में होने वाले मिडिल-टर्म इलेक्शन हैं। युद्ध के कारण वैश्विक व्यापारिक मार्ग ठप हो गए हैं, जिससे ऊर्जा और तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इससे अमेरिकी जनता महंगाई से बेहाल है और चुनाव से ठीक पहले यह ट्रम्प सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक मुसीबत बन चुका है।
शांति वार्ता के बीच ईरान ने फिर दिखाए कड़े तेवर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के बीच शुरुआती बातचीत के बाद भी कई बड़े विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहे हैं:
परमाणु ठिकानों की जांच से इनकार: ईरान ने साफ कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र (UN) की परमाणु एजेंसी को उन ठिकानों का निरीक्षण करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिन पर पिछले साल अमेरिका और इजरायल ने बमबारी की थी। हालांकि, ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि ईरान ‘सर्वोच्च स्तर’ की जांच के लिए मान गया है।
होर्मुज जलमार्ग पर पाबंदी: ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बगेर गालिबाफ ने दोटूक कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब कभी भी युद्ध से पहले वाले ‘फ्री पैसेज’ के दिनों में नहीं लौटेगा। यानी इस अहम समुद्री तेल मार्ग पर पाबंदियां बनी रहेंगी।
अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर होने के बाद अब दुनिया का ध्यान लड़ाई से हटकर उसके बड़े असर पर केंद्रित हो गया है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आने वाले तेल की सप्लाई को लेकर है। अगर इस अहम समुद्री मार्ग में कोई रुकावट आती है तो इसका असर भारत समेत कई देशों की ऊर्जा जरूरतों पर पड़ सकता है। इस स्थिति ने एक बार फिर यह चर्चा शुरू कर दी है कि भारत ने पिछले कई दशकों में पश्चिम एशिया के बड़े संकटों से कैसे निपटा है। 1973 के योम किप्पुर युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रवैया और हाल के इज़राइल-ईरान तनाव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया, भारत की विदेश नीति के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को दिखाती है।
एक ओर पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का रुख राजनीतिक और वैचारिक समर्थन पर आधारित था, जबकि दूसरी ओर नरेंद्र मोदी की सरकार ने रणनीतिक और व्यावहारिक नीति को प्राथमिकता दी है। आज भारत अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संबंधों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। योम किप्पुर युद्ध अक्टूबर 1973 में शुरू हुआ था। उस समय मिस्र और सीरिया ने अचानक इजरायल पर हमला कर दिया था। इसके बाद यह संघर्ष तेजी से एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल गया। इस टकराव में अमेरिका, सोवियत संघ और अरब देशों के प्रमुख तेल उत्पादक राष्ट्र भी शामिल हो गए थे, जिससे पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई थी।
पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का रुख
1973 के युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुलकर अरब देशों का समर्थन किया था। भारत ने इस संघर्ष के लिए इज़रायल को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसकी सख्त और अड़ियल नीतियां ही क्षेत्र में तनाव और दुश्मनी की मुख्य वजह हैं। भारत ने अरब देशों और फिलिस्तीन के मुद्दे का मजबूती से समर्थन किया। उस समय भारत की विदेश नीति भी काफी हद तक इसी दिशा में थी। हालांकि, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन देने के बावजूद भारत को इसका कोई खास आर्थिक फायदा नहीं मिला।
युद्ध के बाद दुनिया तेल संकट की चपेट में आ गई। कई अरब देशों ने तेल उत्पादन और आपूर्ति को लेकर सख्त कदम उठाए, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। रिपोर्टों के मुताबिक, कच्चे तेल का दाम करीब 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 12 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। तेल की कीमतों में इस भारी बढ़ोतरी का असर भारत पर भी पड़ा। देश को तेल आयात करने के लिए पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़ा, जिससे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया।
हालांकि युद्ध खत्म होने के बाद भी भारत का फिलिस्तीन के प्रति समर्थन जारी रहा। वर्ष 1974 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को पर्यवेक्षक का दर्जा दिलाने की कोशिश का समर्थन किया। इसके एक साल बाद भारत पीएलओ को आधिकारिक मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बन गया। भारत ने नई दिल्ली में पीएलओ का कार्यालय खोलने की भी अनुमति दी। इसके अलावा, भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का भी समर्थन किया था, जिसमें ज़ायोनीवाद को नस्लवाद के समान बताया गया था।
इन फैसलों से साफ होता है कि उस समय भारत के अरब देशों और फिलिस्तीन के साथ काफी करीबी संबंध थे। भारत का मानना था कि इस क्षेत्र के साथ मजबूत राजनीतिक रिश्ते उसके रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी फायदा पहुंचाएंगे। उस दौर में भारत की मध्य पूर्व के तेल पर निर्भरता लगातार बढ़ रही थी। ऐसे में सरकार को उम्मीद थी कि अरब देशों के साथ अच्छे संबंध देश की ऊर्जा सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करने में मदद करेंगे।
मोदी सरकार का रुख
योम किप्पुर युद्ध के लगभग 50 साल बाद पश्चिम एशिया में एक और बड़ा तनाव देखने को मिला। इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने दुनिया भर की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बढ़ी, जो दुनिया में तेल आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। अगर इस रास्ते में किसी तरह की रुकावट आती है, तो इसका असर पूरी दुनिया के तेल कारोबार पर पड़ सकता है। भारत के लिए यह चिंता और भी बड़ी है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किए गए तेल से पूरा करता है।
दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल भारत के लिए इस तरह का तनाव आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है। खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक संकट रहने पर तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, आयात पर खर्च बढ़ सकता है और महंगाई में तेजी आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई चीजों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इससे देश की आर्थिक विकास दर पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
हालांकि, 1973 के मुकाबले इस बार भारत का रुख काफी अलग रहा। इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को भारत ने किसी राजनीतिक पक्ष के नजरिए से नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता के आधार पर देखा। भारत ने किसी एक देश का खुलकर समर्थन करने के बजाय शांति, बातचीत और तनाव कम करने पर जोर दिया। मोदी सरकार लगातार यह कहती रही कि सभी पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालें और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखें।
नई दिल्ली ने इज़रायल, ईरान और खाड़ी देशों समेत पश्चिम एशिया के सभी प्रमुख देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखे। भारत ने किसी एक खेमे में शामिल होने के बजाय संतुलित नीति अपनाई, ताकि हर परिस्थिति में उसके राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहें। इस सोच को अक्सर “भारत पहले” नीति कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चाहे क्षेत्रीय संघर्ष किसी भी दिशा में जाए, भारत की ऊर्जा जरूरतें, आर्थिक हित और कूटनीतिक संबंध प्रभावित न हों।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुख इस पूरे संकट के दौरान व्यावहारिक और स्पष्ट रहा। भारत ने हालात बिगड़ने का इंतजार करने के बजाय पहले से ही जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए। केंद्र सरकार ने कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए नए और अलग-अलग स्रोतों पर ध्यान दिया, ताकि किसी एक क्षेत्र पर ज्यादा निर्भरता न रहे। साथ ही, तेल भंडार को मजबूत करने और रिफाइनरियों का काम लगातार जारी रखने पर भी जोर दिया गया, जिससे देश में ईंधन की आपूर्ति प्रभावित न हो।
भारत ने यह भी सुनिश्चित किया कि ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर किसी तरह का असर कम से कम पड़े। इसके लिए सरकार ने क्षेत्र के सभी प्रमुख देशों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में रहने और काम करने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी गई। भारत ने संघर्ष में शामिल सभी पक्षों के साथ अपने कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बनाए रखे, ताकि जरूरत पड़ने पर भारतीयों की मदद की जा सके और देश के आर्थिक हित सुरक्षित रहें। इस तरह भारत ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को सबसे अधिक महत्व दिया।
Market news : BSE सेंसेक्स और निफ्टी 50 जैसे बेंचमार्क इंडेक्स 23 जून को बढ़त के साथ खुलने की उम्मीद है। GIFT निफ्टी में भी बढ़त देखने को मिल रही है। यह शुरुआती कारोबार में बढ़त के साथ 24,145.50 के आसपास ट्रेड कर रहा था। यहां हम आपके लिए तमाम समाचार प्लेटफॉर्मों पर चल रही आज की ऐसी अहम खबरों की एक सूची जारी कर रहें हैं जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं।
मार्केट ओवरव्यू
शुक्रवार को हुई बिकवाली के बाद,22 जून को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट और US-ईरान शांति वार्ता में प्रगति को लेकर बनी उम्मीदों के चलते निफ्टी ने फिर से तेजी पकड़ी और 24,100 के स्तर के ऊपर बंद हुआ। कारोबार के अंत में,सेंसेक्स 291.17 अंक या 0.38 प्रतिशत बढ़कर 77,094.07 पर और निफ्टी 89.80 अंक या 0.37 प्रतिशत बढ़कर 24,102.90 पर बंद हुआ।
गिफ्ट निफ्टी
सुबह 07.50 बजे के आसपास गिफ्ट निफ्टी 32 अंक यानी 0.13 फीसदी की बढ़त के साथ 24,132 के आसपास कारोबार कर रहा था।
एशियाई बाजार
एशियाई शेयर बाजारों में मिलाजुला रुख देखने को मिल रहा है। जापान के निक्केई में 0.87 फीसदी की कमजोरी देखने को मिल रही है। वहीं,स्ट्रेट टाइम्स 0.24 फीसदी की तेजी दिखा रहा है। हैंगसेंग 0.56 फीसदी की कमजोरी दिखा रहा है। ताइवान के बाजार में 0.19 फीसदी की गिरावट है। कोस्पी 4.14 फीसदी नीचे दिख रहा है। वहीं,शांघाई कंपोजिट में 0.10 फीसदी की हल्की बढ़त नजर आ रही है।
Asian markets today: एशियाई बाजारों में गिरावट, कोस्पी 1.5% टूटा, जापान बॉन्ड यील्ड में बढ़त
अमेरिकी बाजार
सोमवार को S&P 500 और नैस्डैक गिरावट के साथ बंद हुए। इसकी वजह अल्फाबेट जैसी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयरों में आई गिरावट थी। निवेशक अमेरिका-ईरान बातचीत से जुड़ी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थे। वहीं, हेल्थकेयर और इंडस्ट्रियल सेक्टर में तेजी की वजह से डॉओ (Dow)बढ़त के साथ बंद हुआ। डाओ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 148.01 अंक या 0.29% बढ़कर 51,712.71 पर बंद हुआ। S&P 500 में 27.79 अंक या 0.37 फीसदी की गिरावट आई और यह 7,472.79 पर बंद हुआ,जबकि नैस्डैक कम्पोजिट 351.33 अंक या 1.32% गिरकर 26,166.60 पर बंद हुआ।
डॉलर इंडेक्स
छह करेंसी की बास्केट के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला US डॉलर इंडेक्स मजबूत दिख रहा है। यह पिछले साल मई के बाद से अपने सबसे ऊंचे स्तर के करीब आ गया। फिलहाल डॉलर इंडेक्स 101.02 के स्तर पर दिख रहा है।
US बॉन्ड यील्ड
अमेरिका में 10-साल और 2-साल के ट्रेजरी बॉन्ड पर यील्ड में बहुत कम बदलाव हुआ और ये क्रमशः 4.50% और 4.22% पर दिख रहे हैं।
एशियन करेंसी
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ज्यादातर एशियाई करेंसीज कमजोर हुईं हैं। जिससे पूरे क्षेत्र में जोखिम को लेकर सावधानी का माहौल दिखा। फिलीपीन पेसो का प्रदर्शन सबसे खराब दिख रहा है,जिसमें 0.315 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसके बाद इंडोनेशियाई रुपिया में 0.219 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। चीनी रेनमिनबी भी 0.117 प्रतिशत कमजोर हुई है,जबकि दक्षिण कोरियाई वॉन और थाई बहत में क्रमशः 0.075 प्रतिशत और 0.055 प्रतिशत की गिरावट आई है।
उधर जापानी येन में 0.006 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है। जबकि ताइवान डॉलर और सिंगापुर डॉलर में क्रमशः 0.019 प्रतिशत और 0.023 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसके विपरीत,मलेशियाई रिंगित ने 0.305 प्रतिशत की बढ़त हासिल की है।
कच्चा तेल सपाट
पिछले सेशन में भारी गिरावट के बाद मंगलवार को तेल की कीमतों में सुधार हुआ। इसकी वजह US-Iran शांति वार्ता को लेकर बनी थोड़ी उम्मीद थी,जबकि निवेशक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से कच्चे तेल की सप्लाई फिर से शुरू होने में प्रगति के साफ संकेतों का इंतजार करते दिखे। WTI क्रूड में 0.03 फीसदी की और ब्रेंट क्रूड में 0.23 फीसदी की गिरावट आई है।
सोना सपाट
मंगलवार को सोने की कीमतें स्थिर दिख रहीं हैं, क्योंकि निवेशकों ने अमेरिका-ईरान शांति वार्ता पर नजरें बनाए रखी हैं। जबकि, दिसंबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की बढ़ती उम्मीदों का असर इस मेटल पर पड़ा। कोमेक्स पर गोल्ड में 0.18 फीसदी की गिरावट दिख रही है। वहीं, चांदी 0.74 फीसदी की कमजोरी दिखा रहा है।
विदेशी और घरेलू निवेश के आंकड़ों पर एक नजर
22 जून को विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) नेट सेलर रहे और उन्होंने 635 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। वहीं,घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs)ने बाजार को सहारा देना जारी रखा और इस दौरान 1,000 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।
Crude Oil price: पिछले सेशन में तेज़ गिरावट के बाद मंगलवार को तेल की कीमतों में उछाल आया, जिसे US-ईरान के बीच चल रही शांति बातचीत को लेकर उम्मीद की वजह से सपोर्ट मिला। मार्केट पार्टिसिपेंट्स होर्मुज स्ट्रेट से कच्चे तेल का फ्लो फिर से शुरू होने की संभावना से जुड़े डेवलपमेंट पर भी नज़र रखे हुए थे।
ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 24 सेंट या 0.38% बढ़कर $78.15 प्रति बैरल हो गया, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 33 सेंट या 0.46% बढ़कर $74.19 प्रति बैरल हो गया।
सोमवार को तेल की कीमतों में 3% से ज़्यादा की गिरावट आई, जब अमेरिका ने शांति बातचीत के शुरुआती दौर के बाद ईरान को 60 दिन के लिए बैन से छूट दी। इस गिरावट को उन रिपोर्टों से और बल मिला, जिनमें बड़े समझौते के तहत लेबनान में लड़ाई रुकने का संकेत दिया गया था।
आज कच्चे तेल की कीमतों में क्या तेजी है?
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, US और ईरानी अधिकारियों ने फरवरी के आखिर में शुरू हुए संघर्ष को खत्म करने के लिए एक लंबे समय का समझौता करने के मकसद से बातचीत के शुरुआती दौर में अच्छी प्रगति की सूचना दी। हालांकि, मतभेद बने हुए हैं, वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि ईरान देश में न्यूक्लियर इंस्पेक्टरों को आने देने के लिए मान गया है—एक दावा जिसे तेहरान ने खारिज कर दिया है।
इस छूट से लगभग सभी खरीदार, जिसमें US रिफाइनर भी शामिल हैं, ईरानी कच्चा तेल खरीद सकते हैं और उसका पेमेंट कर सकते हैं, हालांकि कुछ संभावित जोखिमों के कारण सावधान रह सकते हैं। इस बीच, हाल के हफ्तों में फारस की खाड़ी से तेल की सप्लाई बढ़ी है, क्योंकि कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने एक्सपोर्ट बनाए रखने के दूसरे तरीके ढूंढ लिए हैं। ईरान ने पिछले हफ्ते 30 मिलियन बैरल से ज़्यादा तेल भी भेजा है।
सोमवार को ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में, ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान हथियारों के इंस्पेक्शन की इजाज़त देगा, जिसका मकसद यह पक्का करना है कि जिसे उन्होंने “न्यूक्लियर ईमानदारी” कहा है।
इस बीच, शिप-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि लगभग 2 मिलियन बैरल तेल ले जा रहे दो कच्चे तेल के टैंकर सोमवार को होर्मुज स्ट्रेट से सफलतापूर्वक गुज़रे, जो रास्ते की सुरक्षा को लेकर चिंताओं के बीच रविवार को कम मूवमेंट के बाद समुद्री ट्रैफिक में सुधार का संकेत है।
एक अलग डेवलपमेंट में, US डिपार्टमेंट ऑफ़ एनर्जी के सोमवार को जारी डेटा से पता चला कि स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व में कच्चे तेल का स्टॉक पिछले हफ़्ते घटकर 331.2 मिलियन बैरल रह गया, जो जून 1983 के बाद सबसे कम लेवल है, क्योंकि US-ईरान लड़ाई के बाद सप्लाई पर दबाव बना हुआ है।
(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।
Explosion in Qatar: कतर के मुख्य नैचुरल गैस एक्सपोर्ट हब में एक जबरदस्त धमाका हुआ है। इसमें कम से कम 54 लोग घायल हो गए और 18 लोग अभी भी लापता हैं। यह घटना अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति वार्ता के दौरान हुई है। तब हुई जब हालिया संघर्ष के दौरान ईरान के हमले के बाद कर्मचारी वहां काम फिर से शुरू कर रहे थे। सरकारी कंपनी ‘कतरएनर्जी’ के मुताबिक, धमाका रास लाफान इंडस्ट्रियल एरिया में बरजान गैस सप्लाई फैसिलिटी में हुआ, जब एक्सपोर्ट फिर से शुरू करने की कोशिशें चल रही थीं। धमाके के बाद आग लग गई। हालांकि नुकसान का सही अंदाजा अभी नहीं लग पाया है।
अधिकारियों ने बताया है कि कतर की मुख्य लिक्विफाइड नेचुरल गैस प्रोसेसिंग फैसिलिटी में हुए धमाके में 54 लोग घायल हो गए हैं और 18 लोग लापता हैं। कतर के गृह मंत्रालय ने सोमवार को बताया कि रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी में हुए अंदरूनी धमाके के बाद लापता लोगों की तलाश के लिए कतरी इंटरनेशनल सर्च एंड रेस्क्यू ग्रुप को तैनात किया गया था।
वायरल वीडियो में क्या है?
ऑनलाइन वायरल हो रहे वीडियो में अंधेरे आसमान के सामने दूर तक तेज़ लपटें उठती दिख रही हैं। आसमान में धुआं फैलता हुआ दिख रहा है और ऊपर एक छोटी सी चमकदार चीज भी दिखाई दे रही है। युद्ध के दौरान ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर अपना कंट्रोल मजबूत करने के बाद कतर ने गैस का उत्पादन रोक दिया था। इससे अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को होने वाली सप्लाई में रुकावट आई थी।
जब संघर्ष को स्थायी रूप से खत्म करने के लिए बातचीत जारी रही और रणनीतिक जलमार्ग पर पाबंदियां कम हुईं, तो अधिकारियों ने एक्सपोर्ट टर्मिनल पर गतिविधियां फिर से शुरू करने का फैसला किया। हालांकि, रविवार रात काम फिर से शुरू करने की कोशिश एक हादसे में बदल गई, जब फैसिलिटी में धमाका हुआ और आग लग गई।
अधिकारियों ने शुरू में बताया था कि बहुत कम लोग घायल हुए हैं। लेकिन कई घंटों बाद, कतर के गृह मंत्रालय ने आंकड़ों में बदलाव करते हुए कहा कि कम से कम 54 लोग घायल हुए हैं और 18 लोगों का अभी भी कोई पता नहीं चल पाया है। इस घटना से ग्लोबल एनर्जी मार्केट में अनिश्चितता बढ़ सकती है, क्योंकि कतर नैचुरल गैस के दुनिया के प्रमुख एक्सपोर्टर्स में से एक है।
अधिकारियों ने पहले कहा था कि मौके पर पहुंची सिविल डिफेंस टीमों ने किसी के घायल होने की जानकारी नहीं दी है। मिनिस्ट्री ने कहा कि फैसिलिटी से कोई लीकेज नहीं हुआ जिससे पब्लिक सेफ्टी को खतरा हो।
इंडस्ट्रियल हब को मैनेज करने वाली कतरएनर्जी ने कहा कि बरजान फैक्ट्री में धमाके के तुरंत बाद इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीमों को तैनात किया गया और फैसिलिटी में लगी आग पर काबू पा लिया गया। रास लफ्फान इंडस्ट्रियल सिटी दोहा से लगभग 80km (50 मील) उत्तर में है। यह दुनिया की सबसे बड़ी LNG एक्सपोर्ट फैसिलिटी का घर है, जो ग्लोबल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा बनाती है।
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मार्च में कतर सरकार ने घोषणा की थी कि ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों का निशाना बनने के बाद इंडस्ट्रियल हब को काफी नुकसान हुआ है। कतरएनर्जी ने हमलों के बाद अपनी सप्लाई की जिम्मेदारियों से खुद को आजाद करने के लिए अपने कुछ कॉन्ट्रैक्ट में फोर्स मेज्योर क्लॉज का इस्तेमाल किया। इससे इटली, बेल्जियम, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों के कस्टमर प्रभावित हुए।
LPG Price Today: LPG सिलेंडर के रेट आज सोमवार को ना तो बढ़े हैं और ना ही घटे हैं। आखिरी बार 7 जून को कंपनियों ने 29 रुपये की बढ़ोतरी घरेलू LPG सिलेंडर के दाम में की थी। वहीं, कॉमर्शियल सिलेंडर के रेट में तब 42 रुपये से 53.50 रुपये का इजाफा हुआ था। अच्छी बात यह है कि अमेरिका-ईरान समझौते बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुल हो गया है। ऐसे में भारत जो कि LPG के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है वो अब आसानी से इंपोर्ट कर पाएगा।
ईरान-अमेरिका युद्ध शुरू होने के बाद घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों में दो बार इजाफा हुआ था। वहीं, कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम तब से अबतक 79% बढ़ चुके हैं।
शहरवार देखें कीमतें
| शहर | घरेलू सिलेंडर की कीमत | कमर्शियल सिलेंडर की कीमत |
| दिल्ली | 942.0 रुपये | 3113.5 रुपये |
| मुंबई | 941.5 रुपये | 3067.5 रुपये |
| कोलकाता | 968.0 रुपये | 3256.0 रुपये |
| चेन्नई | 957.5 रुपये | 3283.0 रुपये |
| बेंगलुरु | 944.5 रुपये | 3198.0 रुपये |
| आईजॉल | 1094.0 रुपये | 3598.5 रुपये |
| लखनऊ | 979.5 रुपये | 3236.0 रुपये |
| गाजियाबाद | 939.50 रुपये | 3113.50 रुपये |
| पटना | 1031.5 रुपये | 3400.5 रुपये |
भारत में LPG की कीमत पड़ोसी देशों से भी कम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत पड़ोसी और कई विकसित देशों के मुकाबले बहुत कम है। नई दिल्ली में 14.2 किलों का एक सिलेंडर 942 रुपये में उपलब्ध है, जबकि पाकिस्तान में इसकी कीमत 1046 रुपये, नेपाल में 1207 रुपये, बांग्लादेश में 1225 रुपये और श्रीलंका में 1241 रुपये, अमेरिका में 1755 रुपये, आस्ट्रेलिया में 1765 रुपये और कनाडा में 2411 रुपये हैं। उज्जवला योजना के तहत लाभार्थियों को यही सिलेंडर 642 रुपये में मिलता है, जो इन देशों के मुकाबले बेहत कम है।
सऊदी अरामको ने बढ़ाया कॉन्ट्रैक्ट प्राइस
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने जून महीने के लिए LPG के आधिकारिक विक्रय मूल्य (OSP) में 1% से 3% तक की बढ़ोतरी की है। कंपनी ने प्रोपेन की कीमत में 10 डॉलर प्रति मीट्रिक टन और ब्यूटेन की कीमत में 20 डॉलर प्रति मीट्रिक टन का इजाफा किया है। इसके बाद प्रोपेन का नया भाव 760 डॉलर प्रति मीट्रिक टन और ब्यूटेन का 820 डॉलर प्रति मीट्रिक टन हो गया है।
दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के दोबारा बंद होने की आशंकाओं ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार में गैस की कीमतों को बढ़ावा मिल रहा है।
क्या होगा असर?
सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस में हुई इस बढ़ोतरी का असर सरकारी खाजने के साथ-साथ आम आदमी की जेब पर भी पड़ेगा। अगर अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में इसी तरह गैस के दाम ऊंचे स्तर पर बने रहे, तो हो सकता है कि 1 जुलाई को सरकारी तेल कंपनियों की अगली समीक्षा बैठक में घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत में एक बार फिर से बढ़ोतरी कर दी जाए।
बता दें कि सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस एक अंतर्राष्ट्रीय बेंचमार्क रेट है, जिस पर सऊदी अरामको हर महीने दुनिया भर के देशों को एलपीजी बेचती है। चूंकि सऊदी अरब दुनिया में LPG का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है इसलिए इसके द्वारा तय की गई कीमत को दुनिया का एलपीजी का आधिकारिक रेट मान लिया जाता है।
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