जब दुनिया थमने लगी, तब भारत ने दिखाया दम! युद्ध के बीच जारी रही पेट्रोल-डीजल और LPG की सप्लाई, ईंधन संकट से बचने की अनकही कहानी

Fuel Crisis News: फरवरी 2026 में जब अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को बंद कर दिया, तो पूरी दुनिया पेट्रोल-डीजल और LPG को लेकर हड़कंप मच गया। होर्मुज वह रास्ता है जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। भारत के लिए यह स्थिति किसी बड़ी आपदा से कम नहीं थी। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है।

भारत अपनी जरूरत का 90% कच्चा तेल और 60% एलपीजी (LPG) आयात करता है। ईंधन संकट की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि भारत का 50% तेल और 90% एलपीजी इसी रास्ते से आता था, जो अगले चार महीनों के लिए पूरी तरह ठप हो गया।

संकट के बीच भारत ने दिखाया दम

पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़े संघर्ष के कारण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई। इसके बावजूद भारत ने पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए संभावित ईंधन संकट को टाल दिया। सरकार का दावा है कि करीब चार महीने तक आपूर्ति बाधित रहने के बावजूद देश में कहीं भी घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राशनिंग लागू नहीं करनी पड़ी। इस दौरान ईंधन की उपलब्धता सामान्य बनी रही।

जरूरत का लगभग 90% तेल आयात करता है भारत

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत और एलपीजी का करीब 60 प्रतिशत आयात करता है। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत कच्चा तेल और 90 प्रतिशत एलपीजी होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इस मार्ग के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया। भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल से अधिक पहुंच गई। जबकि ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक चला गया। एलपीजी के आयात में भी करीब 46 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

सरकार ने कई मोर्चों पर बनाई रणनीति

ईंधन संकट के शुरुआती दिनों में ही केंद्र सरकार ने नियंत्रण संबंधी आदेश जारी किए। घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ वैकल्पिक देशों से तेल और गैस की खरीद तेज कर दी। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (OMCs) को निर्देश दिया गया कि वे बढ़ी हुई लागत का अधिकांश बोझ खुद वहन करें ताकि आम उपभोक्ताओं पर इसका असर कम से कम पड़े।

सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती भी की। इससे उपभोक्ताओं को राहत मिली। इस फैसले से केंद्र सरकार को लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये के रेवेन्यू का त्याग करना पड़ा।

बीते एक दशक में मजबूत हुई ऊर्जा सुरक्षा

सरकार का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किए गए निवेश का लाभ इस संकट के दौरान मिला। वर्ष 2014 में जहां देश में 11 एलपीजी आयात टर्मिनल थे। वहीं, अब उनकी संख्या बढ़कर 22 हो गई है। इसी अवधि में एलपीजी आयात क्षमता 12 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़कर 32.3 मिलियन टन प्रति वर्ष हो गई।

इसके अलावा भारत अब 27 की बजाय 41 देशों से कच्चे तेल का आयात कर रहा है। लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए देशों को भी सप्लाई चेन में शामिल किया गया है। रूस और अमेरिका से भी आयात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सरकार ने वैकल्पिक समुद्री रूट्स का भी इस्तेमाल बढ़ाया, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हुई।

एथेनॉल मिश्रण से भी मिली राहत

सूत्रों का कहना है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ने से भी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिली। सरकार का कहना है कि इससे हर साल बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की बचत हो रही है।

तेल कंपनियों पर पड़ा भारी वित्तीय बोझ

सरकार के अनुसार, सार्वजनिक तेल कंपनियों ने दो महीने से अधिक समय तक खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की। बाद में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई। इसके बावजूद कंपनियां एक समय प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये के अंडर रिकवरी का सामना कर रही थीं। यह बाद में घटकर करीब 650 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गई। अनुमान है कि चालू तिमाही में तेल कंपनियों को 1 से 1.2 लाख करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

आसमान छूती कीमतें और सरकार पर बढ़ता दबाव

होर्मुज होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गईं। भारत जो तेल $70 प्रति बैरल में खरीद रहा था, उसकी कीमत महज चार हफ्तों में $120 के पार पहुंच गई। वहीं ब्रेंट क्रूड $126 प्रति बैरल के अपने उच्चतम स्तर पर जा पहुंच गया। दूसरी ओर, एलपीजी की कीमतों में 46% की भारी बढ़ोतरी हुई। इससे एक 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू सिलेंडर की आयात लागत बढ़कर 1,600 रुपये से अधिक हो गई। जहाजों का युद्ध-जोखिम बीमा (War-risk insurance) भी कई गुना बढ़ चुका था।

संकट के चक्रव्यूह को भारत ने कैसे तोड़ा?

इस अभूतपूर्व संकट के बीच भारत सरकार, तेल कंपनियों और कूटनीतिज्ञों ने मिलकर एक बहुआयामी रणनीति तैयार की, ताकि आम जनता पर इसका सीधा असर न पड़े:-

1. 10 साल की तैयारी आई काम (इन्फ्रास्ट्रक्चर का अपग्रेड)

भारत पिछले 10 वसालों से अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) पर लगातार निवेश कर रहा था। साल 2014 में जहाँ देश में केवल 11 एलपीजी आयात टर्मिनल थे। वहीं, 2026 में इनकी संख्या बढ़कर 22 हो गई। इस वजह से एलपीजी आयात क्षमता 12 मिलियन टन (2014) से बढ़कर 2026 में 32.3 मिलियन टन प्रति वर्ष हो गई। इसने संकट के समय एक बड़े सुरक्षा कवच का काम किया.

2. नए देशों से दोस्ती और नए रास्ते की खोज

भारत ने केवल होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते पर निर्भर रहने के बजाय आक्रामक आपूर्ति की नीति अपनाई। साल 2014 में भारत जहां 27 देशों से कच्चा तेल खरीदता था, वहीं 2026 में यह संख्या बढ़कर 41 देश हो गई। भारत ने लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए देशों से तेल मंगाना शुरू किया। साथ ही अमेरिका और रूस से तेल के आयात को और गहरा किया। नए समुद्री रास्तों की खोज की गई, जिससे होर्मुज स्ट्रेट पर भारत की निर्भरता पहले के मुकाबले काफी कम हो गई।

3. घरेलू मोर्चे पर राहत और सरकारी खजाने पर बोझ

सरकार ने तुरंत डिमांड मैनेजमेंट (Demand-management) लागू किया और घरेलू स्तर पर तेल उत्पादन को तेजी से बढ़ाया। इसके अलावा, पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) के ऊंचे स्तर ने एक बड़ा सहारा दिया। इससे हर साल भारी मात्रा में कच्चे तेल के आयात की बचत होती है।

सबसे बड़ा फैसला यह था कि सरकार ने कीमतों का बोझ सीधे आम जनता पर नहीं डाला। सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) ने दो महीने से अधिक समय तक खुदरा कीमतों को स्थिर रखा। बाद में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में केवल 7 रुपये प्रति लीटर की मामूली बढ़ोतरी की। इस वजह से तेल कंपनियों को प्रति दिन करीब 650 करोड़ रुपये से लेकर 1,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ा। इस तिमाही में उन्हें कुल 1 लाख करोड़ से 1.2 लाख करोड़ रुपये का घाटा होने का अनुमान है।

अर्थव्यवस्था पर सीमित रहा असर

सरकार का दावा है कि पूरे संकट के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार 728 अरब डॉलर से अधिक के स्तर पर बना रहा। चालू खाते का घाटा नियंत्रण में रहा। साथ ही खुदरा महंगाई भी भारतीय रिजर्व बैंक की तय सीमा के भीतर रही। जीडीपी वृद्धि दर करीब 7 प्रतिशत के आसपास बनी रही।

दूसरे देशों से अलग रही भारत की रणनीति

रिपोर्ट के अनुसार, जहां कई देशों को पेट्रोल-डीजल की राशनिंग लागू करनी पड़ी। वहीं भारत ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश और इथियोपिया जैसे देशों ने ईंधन संकट से निपटने के लिए अलग-अलग प्रतिबंध लगाए। जबकि जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों ने अपने रणनीतिक भंडार का उपयोग किया। साथ ही उपभोक्ताओं को सब्सिडी दी।

भारत में घरेलू उपभोक्ताओं के लिए न तो ईंधन की राशनिंग लागू की गई और न ही स्कूल बंद करने या वर्किंग डे घटाने जैसे कदम उठाए गए। केवल कमर्शियल एवं थोक एलपीजी तथा डीजल और एविएशन फ्यूल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए ताकि घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दी जा सके।

अब सामान्य हो रही स्थिति

सरकार के अनुसार, होर्मुज फिर से खुलने के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटकर लगभग 74 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई हैं। भारत के पास फिलहाल कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी का लगभग दो महीने का भंडार उपलब्ध है। साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (ISPRL) की क्षमता बढ़ाने का काम भी जारी है। इससे भविष्य में किसी भी वैश्विक आपूर्ति संकट से बेहतर तरीके से निपटा जा सके। हालांकि, खबर है कि अमेरिका-ईरान के बीच एक बार फिर से तनाव बढ़ने की आशंका है।

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कच्चे तेल की नरमी और जियोपॉलिटिकल जोखिम कम होने से इन सेक्टर्स को होगा फायदा, इन पर रहे नजर

अमर सिंह

दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश के तौर पर,भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा तेल आयात करता है। इसलिए,कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से उसे फायदा होता है। ब्रेंट क्रूड की कीमत में प्रति बैरल $1 की गिरावट से देश के सालाना आयात बिल में आम तौर पर लगभग 10,000 से 13,000 करोड़ रुपये की बचत होती है।

इसके साथ ही जियोपॉलिटिकल जोखिम कम हो रहे हैं। मिडिल ईस्ट में तनाव का घटना,ईरान-इजरायल युद्ध का समाधान,होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही का शुरू होना भी भारत के लिए फायदेमंद है। इससे देश को महंगाई कम होने,करंट अकाउंट घाटा घटने,रुपये को सहारा मिलने और RBI व सरकार के लिए पॉलिसी बनाने की बेहतर गुंजाइश मिलने जैसे फायदे होंगे।

इतिहास गवाह है कि तेल की कीमतों में भारी गिरावट (जैसे 2014-16 के दौरान) ने कुछ खास सेक्टर को काफी फायदा पहुंचाया है,भले ही ग्लोबल ग्रोथ की रफ्तार धीमी रही हो। मौजूदा हालात से फायदे में रहने वाले सेक्टर एक जैसे नहीं हैं। ये फायदे उन इंडस्ट्रीज़ तक सीमित हैं जहां फ्यूल या कच्चे तेल से जुड़े कच्चे माल की लागत का हिस्सा बहुत ज्यादा होता है,या जहां कम महंगाई और ज्यादा डिस्पोजेबल इनकम से बिक्री की मात्रा(वॉल्यूम)सीधे तौर पर बढ़ती है।

कच्चे तेल के भाव कम होने से एविएशन सेक्टर को सीधा और बड़ा फायदा मिलता है। भारतीय एयरलाइंस के ऑपरेटिंग खर्च में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF)का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत होता है। कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट से ATF की कीमतें तुरंत कम हो जाती हैं,जिससे इंडिगो,एयर इंडिया और स्पाइसजेट के ऑपरेटिंग मार्जिन में सीधे तौर पर बढ़ोतरी होती है।

तेल के भाव घटने से एयरलाइंस या तो अपने मार्जिन को सुरक्षित रख सकती हैं या कम किराए के जरिए डिमांड बढ़ा सकती हैं। ये दोनों ही बातें इस सेक्टर के लिए अच्छी हैं। कीमतों में उतार-चढ़ाव कम होने से हेजिंग की लागत भी कम हो जाती है। पहले के दौर में,तेल की कीमतों में बदलाव पर एयरलाइन शेयरों ने अच्छी तेजी दिखाई है। घरेलू हवाई ट्रैफिक में अभी भी मजबूत बढ़त बनी हुई है,इसलिए ईंधन की कम लागत इनके मुनाफे और क्षमता बढ़ाने में आने वाली एक बड़ी रुकावट को दूर कर सकती है।

इसके बाद डाउनस्ट्रीम ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs)और कच्चे तेल से जुड़े मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का नंबर आता है। इंडियन ऑयल,BPCL और HPCL जैसी कंपनियों को कच्चा तेल खरीदने की कम लागत का फायदा मिलता है। जब रिटेल फ्यूल की कीमतों में बदलाव में देरी होती है या टैक्स की वजह से कीमतों में आई गिरावट का कुछ हिस्सा एडजस्ट हो जाता है। ऐसे में इनका मार्केटिंग मार्जिन बढ़ जाता है। इनको इन्वेंट्री से होने वाला फायदा भी मिल सकता है।

कच्चे तेल की कीमतों में कमी से पेंट सेक्टर को फायदा होता है। इनके कच्चे माल की लागत (जैसे सॉल्वैंट्स,रेजिन और कुछ एडिटिव्स)का 35-50 प्रतिशत हिस्सा कच्चे तेल से जुड़ा होता है। ऐसे में कच्चे तेल में नरमी से एशियन पेंट्स,बर्जर पेंट्स और ऐसी दूसरी कंपनियों को अच्छे मार्जिन या कीमतें तय करने में लचीलेपन का फायदा मिलता है।

टायर बनाने वाली कंपनियों (अपोलो टायर्स,MRF,सिएट,JK टायर)को सिंथेटिक रबर और कार्बन ब्लैक की लागत में कमी से राहत मिल रही है। लुब्रिकेंट्स और कुछ खास केमिकल सेगमेंट को भी इसका फायदा हो रहा है। जब कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है तो इन कंपनियों के लिए लागत कम,मार्जिन ज्यादा वाली क्लासिक स्थितियां बनती हैं।

तेल की कीमतों में कमी से ऑटोमोबाइल और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को लागत और मांग,दोनों ही फ्रंट पर फायदा होता है। टू-व्हीलर और पैसेंजर गाड़ियों के मामले में,पेट्रोल और डीजल की कम कीमतें गाड़ियों की कुल ओनरशिप लागत (टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप)को बेहतर बनाती हैं। कीमत को लेकर संवेदनशील बाजार में यह खरीदारी का एक अहम कारण होता है। पहले भी देखा गया है कि जब ईंधन की कीमतें कम रही हैं,तब एंट्री-लेवल और मास-मार्केट सेगमेंट में रिटेल बिक्री में तेजी आई है।

इसके अलावा क्रूड की कीमतों में कमी से कमर्शियल गाड़ियों और बड़े लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम (ट्रकिंग,लास्ट-माइल डिलीवरी)को डीजल खर्च पर सीधे बचत होती है,जो वेरिएबल कॉस्ट का एक बड़ा हिस्सा होता है। इससे लॉजिस्टिक्स कंपनियों की ऑपरेटिंग लेवरेज बेहतर होती है और ज्यादा ब्याज दरों वाले माहौल में वॉल्यूम रिकवरी में मदद मिल सकती है। भारत में सामान की ढुलाई के लिए सड़क परिवहन ही मुख्य जरिया (70%) है,इसलिए सप्लाई चेन पर इसका मल्टीप्लायर असर काफी अहम है।

कच्चे तेल में नरमी से कंज्यूमर-फेसिंग सेक्टर और फाइनेंशियल सेक्टर को मैक्रो-लेवल पर दूसरे दौर के फायदे मिलते हैं। फ्यूल और ट्रांसपोर्ट की लागत कम होने से महंगाई कम होती है। इससे RBI को पॉलिसी रेट्स को मैनेज करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिलती है। इससे क्रेडिट ग्रोथ और एसेट क्वालिटी में सुधार होता है। जिन बैंकों और NBFCs का रिटेल और SME पोर्टफोलियो मज़बूत है,उन्हें कम महंगाई,स्थिर या कम रेट्स और बेहतर होते कॉर्पोरेट कैश फ्लो के अच्छे चक्र से फायदा होता है।

इसके अलावा ईंधन और ट्रांसपोर्ट पर खर्च कम होने से’कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी’और कुछ खास FMCG कैटेगरी में खर्च करने लायक आय(डिस्पोजेबल इनकम)में थोड़ी लेकिन वास्तविक बढ़ोतरी देखने को मिलती है। अगर कम महंगाई और बेहतर फिस्कल हेडरूम (ईंधन सब्सिडी का दबाव कम होने से)से बेहतर कैपेक्स(पूंजीगत व्यय)माहौल बनता है या ब्याज दरों पर निर्भर मांग में सुधार होता है,तो रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियों को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा हो सकता है।

भू-राजनीतिक जोखिम कम होने से इन प्रभावों का असर सिर्फ तेल के गणित से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है। ग्लोबलअनिश्चितता कम होने से इक्विटी रिस्क प्रीमियम घटता है,FII निवेश को बढ़ावा मिलता है और कुल मिलाकर जोखिम लेने की क्षमता बेहतर होती है। ग्लोबल ट्रेड और कैपिटल एक्सपेंडिचर से जुड़े सेक्टर जैसे कुछ कैपिटल गुड्स,चुनिंदा मैन्युफैक्चरिंग और टूरिज़्म/हॉस्पिटैलिटी शेयरों के लिए अनुकूल माहौल बनता है। सप्लाई-चेन में स्थिरता से आयात पर निर्भर असेंबली इंडस्ट्रीज को भी मदद मिलता है।

सस्ती एनर्जी और शांत भू-राजनीतिक स्थिति का मेल वोलैटिलिटी के उन मुख्य कारणों में से एक को घटाता है,जिन्होंने समय-समय पर भारत की विकास गाथा में बाधा डाली है।

एक बार होने वाले इन्वेंट्री या मार्जिन से मिलने वाले फायदे और लगातार होने वाली कमाई में बढ़ोतरी के बीच फ़र्क करना जरूरी है। ग्राहकों को कितना फायदा होगा और कंपनियां कितना फायदा अपने पास रखेंगी,यह टैक्स पॉलिसी,कॉम्पिटिशन की तीव्रता और प्राइसिंग डिसिप्लिन पर निर्भर करेगा। फायदा पाने वाले सेक्टर की हर कंपनी को एक जैसा फायदा नहीं होगा। बैलेंस-शीट की मजबूती,प्राइसिंग पावर और ऑपरेशनल क्षमता के आधार पर बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां ज्यादा बेहतर स्थिति में रहेंगी।

बुनियादी नज़रिए से देखें तो,कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और कम होते जियोपॉलिटिकल तनाव का मेल भारत के लिए एक अच्छा संकेत है। इससे बाहरी फैक्टर का दबाव कम होता है,महंगाई पर लगाम लगती है और ज्यादा कर्ज वाले सेक्टर में कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है। जब तेल की कीमतें गिरती हैं और तो बाजार अक्सर तुरंत सकारात्मक प्रतिक्रिया देता है।

इस स्थिति में निवेशकों को ऐसी कंपनियों पर फोकस करना चाहिए जिनका ऑपरेटिंग लेवरेज ज़्यादा हो (खासकर ईंधन या कच्चे तेल से जुड़े इनपुट के मामले में),जिनकी बैलेंस शीट मज़बूत हो (ताकि वे किसी भी तरह के उतार-चढ़ाव का सामना कर सकें) और जिनकी वॉल्यूम ग्रोथ भरोसेमंद हो। ऐसे माहौल में, एविएशन,OMCs,पेंट,टायर,ऑटोमोबाइल,लॉजिस्टिक्स और ब्याज दरों से प्रभावित होने वाले फाइनेंशियल सेक्टर में चुनिंदा निवेश करना,भारत की जारी स्ट्रक्चरल ग्रोथ स्टोरी में शामिल होने का एक भरोसेमंद तरीका है।

अमर सिंह एंजेल वन में रिसर्च के सीनियर VP हैं.

 

Market View : गिरते बाजार में वोलैटिलिटी को खतरा नहीं,मौका मानें, डेट से पैसा निकालकर इक्विटी निवेश बढ़ाने का अच्छा मौका

 

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Iran-US War Update: ईरान का अमेरिका पर जोरदार पलटवार, कुवैत और बहरीन में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से किया हमला

Iran-US War Update: ईरान और अमेरिका के बीच फिर से युद्ध शुरू हो गया है। अमेरिकी हमले के बाद अब ईरान ने अमेरिका पर जोरदार पलटवार किया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने घोषणा की है कि उसकी नौसेना और एयरोस्पेस बलों ने ईरानी क्षेत्र पर ताजा अमेरिकी हमलों के जवाब में कुवैत और बहरीन में अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए एक संयुक्त मिसाइल और ड्रोन ऑपरेशन शुरू किया है। इस हमले के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ गया है।

IRGC ने कहा है कि उसने खाड़ी देशों में मौजूद 8 अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए हैं। इससे पहले अमेरिका ने दूसरे दिन लगातार रविवार तड़के ईरान पर बड़ा हमला किया है। ईरान के मिसाइल और ड्रोन फैसिलिटी पर हमले के बाद ट्रंप ने ईरान पर सीजफायर उल्लंघन का आरोप लगाया। साथ ही ईरान को नक्शे से मिटाने की धमकी दी है।

IRGC ने क्या कहा?

IRGC की नेवल और एयरोस्पेस यूनिट्स ने मिलकर यह ऑपरेशन किया है। इसे ईरान के अंदर हाल ही में हुए अमेरिकी हमलों का बदला बताया गया। गार्ड्स ने एक बयान में कहा, “कुवैत में अली अल-सलेम बेस और बहरीन के पोर्ट सलमान में फिफ्थ फ्लीट नेवल बेस पर आठ ज़रूरी अमेरिकी मिलिट्री ठिकानों को तबाह कर दिया।”

गार्ड्स ने कहा, “दुश्मन की किसी भी आक्रामकता का चाहे उसका बहाना कुछ भी हो, और चाहे वह मामूली लक्ष्यों के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो…करारा जवाब दिया जाएगा।” IRGC के अनुसार, यह हमला शनिवार को अमेरिकी सेना की उस कार्रवाई के जवाब में किया गया है जिसमें ईरान के मिसाइल और ड्रोन डिपो के साथ-साथ तटीय रडार सुविधाओं को निशाना बनाया गया था।

ईरान के सरकारी मीडिया ने यह भी आरोप लगाया कि वाशिंगटन ने ईरान के पांच तटीय ठिकानों पर हमला किया था। साथ ही, उसने आरोप लगाया कि अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में एक जहाज से जुड़ी घटना का इस्तेमाल इस सैन्य अभियान को सही ठहराने के लिए किया।

कुवैत ने मिसाइलों और ड्रोनों को रोका

कुवैत की सेना ने कहा है कि उसके एयर डिफेंस सिस्टम ने उसके हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने वाली दुश्मन मिसाइलों और ड्रोनों को रोका। पूरे देश में हवाई हमले के सायरन बजाए गए। जबकि बहरीन ने भी एहतियात के तौर पर चेतावनी वाले सायरन बजाए। अमेरिकी अधिकारियों की ओर से इस बारे में कोई तत्काल बयान नहीं आया कि क्या निशाना बनाए गए सैन्य ठिकानों को कोई नुकसान पहुंचा है या कोई हताहत हुआ है।

होर्मुज स्टेट में सिंगापुर के कमर्शियल जहाज द्वारा ईरान के निर्देश ना मानने पर उस पर ड्रोन हमला किया गया है। अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए। जबाब में ईरान ने भी खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें और ड्रोन दागे है।

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इस बीच, संयुक्त राष्ट्र ने होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे जहाजों को ईरानी और ओमान के समुद्री इलाकों से निकालने के लिए दो नए रास्तों की घोषणा की है। ईरान ने इस योजना को खारिज कर दिया और कहा कि इसकी घोषणा बिना किसी बातचीत के की गई थी। ताइवान द्वारा संचालित ‘एवर लवली’ जहाज पर ओमान के तट के पास एक संदिग्ध ईरानी ड्रोन से हमला हुआ, जिससे जहाज को कुछ नुकसान तो हुआ। लेकिन चालक दल के किसी सदस्य को चोट नहीं आई।

Iran-US War: अमेरिका ने ईरान पर लगातार दूसरी बार किया हमला, ट्रंप बोले- ‘तेहरान का अब अस्तित्व ही नहीं रहेगा’

Iran-US War: पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर से युद्ध शुरू हो गया है। अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान पर हमले किए हैं। इन हमलों की वजह एक कमर्शियल जहाज पर हुआ हमला बताया गया है। शनिवार 27 जून को हुए ये नए हमले इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हुए समझौते के तहत लागू हुआ सीजफायर (युद्धविराम) अब टूटने की कगार पर पहुंच गया है। अमेरिकी सेना का कहना है कि ईरान ने पनामा के तेल टैंकर पर ड्रोन हमला कर सीजफायर को तोड़ा है।

अमेरिकी सेना ने सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर ईरान समझौते को नहीं मानता तो उसकी अस्तिव ही नहीं रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार तड़के कहा कि अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर नए सैन्य हमले किए हैं। उन्होंने दावा किया कि यह कार्रवाई ईरान द्वारा युद्धविराम समझौते का फिर से उल्लंघन करने के बाद की गई।

‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट में ट्रंप ने कहा, “अमेरिकी विमानों ने युद्धविराम समझौते का ‘फिर से’ उल्लंघन करने के कारण ईरान के मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज ठिकानों तथा तटीय रडार साइटों पर हमला किया है!” उन्होंने आगे कहा, “बहुत मुमकिन है कि वे कभी न सीखें! एक समय ऐसा आ सकता है जब हम समझदारी से काम न ले पाएं और हमें उस काम को मिलिट्री के ज़रिए पूरा करने के लिए मजबूर होना पड़े, जिसे हमने बहुत कामयाबी से शुरू किया था।”

ट्रंप ने ईरान को दी कड़ी चेतावनी

ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, “अगर ऐसा हुआ, तो इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा!” अमेरिकी सेना के अनुसार, ये हमले ट्रंप के निर्देश पर किए गए थे। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि शनिवार को एक कमर्शियल जहाज पर हमले के बाद अमेरिकी सैन्य विमानों ने ईरान के सैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया।

ईरान में कहां किया हमला?

CENTCOM ने बताया कि इस ऑपरेशन में ईरान के मिलिट्री सर्विलांस इंफ्रास्ट्रक्चर, कम्युनिकेशन सिस्टम, एयर डिफेंस साइट्स, ड्रोन स्टोरेज फैसिलिटीज और माइन-लेयरिंग क्षमताओं को निशाना बनाया गया। बाद में यह साफ किया गया कि इन हमलों में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और उसके आसपास कई जगहों पर ईरान के 10 मिलिट्री ठिकानों को निशाना बनाया गया।

सेना ने कहा कि ईरान के पास सीजफायर समझौते का सम्मान करने का मौका था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, उसकी सेनाओं ने कथित तौर पर ‘किकू’ (Kiku) नाम के ऑयल टैंकर पर वन-वे ड्रोन से हमला किया।

अमेरिका ने हमलों को ऑयल टैंकर पर हुए हमले से जोड़ा

CENTCOM के अनुसार, जब ‘किकू’ होर्मुज स्ट्रैट से गुज़र रहा था, तब उस पर हमला हुआ। उस समय उसमें 20 लाख बैरल से अधिक कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) लदा हुआ था। यह टैंकर पिछले हफ्ते की शुरुआत में कतर के एक ऑयल फील्ड से निकला था और ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) में स्थित संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के एक बंदरगाह की ओर जा रहा था।

न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) की शिप-ट्रैकिंग जानकारी के अनुसार, ऐसा लग रहा था कि यह जहाज ओमान के तट के पास वाले रास्ते का इस्तेमाल कर रहा था। यह रूट ईरान द्वारा अपने जलक्षेत्र से तय किए गए रास्ते के विकल्प के तौर पर उभरा है।

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मिडिल ईस्ट में फिर छिड़ी जंग? अमेरिकी एयरस्ट्राइक के बाद ईरान की खुली धमकी- ‘वाशिंगटन को भुगतना होगा अंजाम’

US Iran Conflict: मिडिल ईस्ट में अभी शांति समझौता पूरी तरह लागू भी नहीं हुआ था कि अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई है। हाल ही में हुए सीजफायर के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी, लेकिन इसी बीच अमेरिकी फाइटर जेट्स ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर भीषण बमबारी कर दी है।

इस हमले के बाद ईरान भड़क उठा है। ईरानी संसद के राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने शनिवार को अमेरिका को सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि इस हरकत के बाद वाशिंगटन को सिर्फ ‘पीछे हटना और पछताना’ पड़ेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि अब अमेरिका का यह ‘ब्लेम गेम’ यानी एक-दूसरे पर दोष मढ़ने का खेल नहीं चलेगा। आइए जानते हैं कि इस ताजा विवाद की असल वजह क्या है।

क्यों भड़का विवाद? अमेरिका ने क्यों किए ईरान पर हमले?

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने शुक्रवार को ईरान के मिसाइल और ड्रोन स्टोरेज लोकेशन्स के साथ-साथ तटीय रडार साइटों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए। अमेरिका ने साफ किया कि यह कार्रवाई ईरान द्वारा एक कमर्शियल जहाज पर किए गए हमले का बदला है।

25 जून की घटना: अमेरिकी सेना के मुताबिक, 25 जून को ईरान ने ओमान के तट के पास जलडमरूमध्य से गुजर रहे सिंगापुर के झंडे वाले मालवाहक जहाज ‘एम/वी एवर लवली’ पर वन-वे अटैक ड्रोन से हमला किया था।

रणनीतिक रास्ता: यह हमला होर्मुज जलडमरूमध्य के पास हुआ, जो दुनिया के कुल ऊर्जा व्यापार के लगभग पांचवें हिस्से का मुख्य रास्ता है। इसी के जवाब में अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक्शन लिया।

ईरान का पलटवार: ‘बातचीत के बीच में पीठ पर छुरा घोंपा’

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पूर्व कमांडर और सांसद इब्राहिम अजीजी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अमेरिका को आड़े हाथों लिया। उन्होंने लिखा, ‘अमेरिका ने एक बार फिर बातचीत के बीच में ही ईरान पर हमला कर दिया है। नाकाम अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिखा दिया है कि वह बातचीत या सीजफायर के सिद्धांतों को नहीं मानते हैं।’

अजीजी ने चेतावनी दी कि सीजफायर का यह लापरवाह उल्लंघन अमेरिका को भारी पड़ेगा। अजीजी के इस बयान के कुछ ही घंटों बाद IRGC ने भी ऐलान कर दिया कि उसने देश के दक्षिणी हिस्से पर हुए अमेरिकी हमलों के जवाब में पूरे क्षेत्र में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है।

‘हिंसा का जवाब हिंसा से मिलेगा’

इस बीच अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी ईरान को दोटूक चेतावनी दी है। उन्होंने ‘X’ पर लिखा, ‘ईरान ने सीजफायर समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और हमने उसका सम्मान किया। अगर उन्हें एमओयू (MOU) के लागू होने के तरीके को लेकर कोई आपत्ति या असहमति थी, तो वे बात कर सकते थे। लेकिन हिंसा का जवाब हमेशा हिंसा से ही दिया जाएगा।’ वेंस ने ईरान से अपील की कि वे विवादों को सुलझाने के लिए बातचीत का रास्ता अपनाएं।

नाजुक मोड़ पर बातचीत: क्या फिर छिड़ेगी जंग?

यह पूरा टकराव बेहद नाजुक समय पर हुआ है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को खत्म करने के लिए राजनयिक बातचीत चल रही थी। पिछले हफ्ते ही दोनों पक्षों के बीच सीजफायर का ऐलान हुआ था, जिसके बाद एक व्यापक फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देने के लिए 60 दिनों का बातचीत का समय तय किया गया था। लेकिन इन हमलों के बाद शांति की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है और मिडिल ईस्ट में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं।

US Attack Iran: अमेरिका ने 24 घंटे के अंदर ईरान के हमले का लिया बदला, ड्रोन-मिसाइल ठिकानों को बनाया निशाना; दोनों देशों के बीच फिर बढ़ा तनाव

अमेरिका और ईरान के बीच एक फिर तनाव बढ़ गया है। दोनों देश एक दूसरे को निशाना बना रहे हैं। शुक्रवार को ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजर रहे कमर्शियल जहाज पर हमला किया था। इसके जवाब में 24 घंटे के अंदर अमेरिका सेना ने ईरान के ड्रोन-मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाकर

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अमेरिका ने ईरान के मिसाइल-ड्रोन ठिकानों पर हमला किया:ट्रम्प बोले- ईरान ने सीजफायर तोड़ा; एक दिन पहले कार्गो शिप पर ड्रोन अटैक हुआ था

अमेरिका ने शुक्रवार को ईरान पर करीब एक घंटे तक हमला किया। अमेरिकी सेना ने मिसाइल-ड्रोन ठिकानों और तटीय रडार साइट्स को निशाना बनाया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि ईरान ने सीजफायर तोड़ा, इसलिए जवाबी कार्रवाई की गई। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, 25 जून को ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट में सिंगापुर के कार्गो शिप एमवी एवर लवली पर ड्रोन हमला किया था। एयरस्ट्राइक से पहले ट्रम्प ने कहा, ‘उन्होंने कल एक नहीं, चार बार हमला किया।’ जब उनसे पूछा गया कि बातचीत जारी रहने के बावजूद हमला क्यों किया गया, तो उन्होंने कहा- ईरान थोड़ा अलग है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट ईरान के नियंत्रण में है और वहां से गुजरने वाले जहाजों को उसके नियमों का पालन करना होगा। उन्होंने कहा कि यह सीजफायर का उल्लंघन नहीं, बल्कि सीजफायर मैनेजमेंट है। हिजबुल्लाह बोला- इजराइल बिना शर्त लेबनान छोड़े हिजबुल्लाह ने इजराइल से लेबनान से पूरी सेना वापस बुलाने की मांग की है। हिजबुल्लाह चीफ कासिम नईम ने कहा कि इजराइली सैनिकों को लेबनान की जमीन का एक-एक इंच खाली करना होगा। कासिम ने शुक्रवार को टीवी पर प्रसारित अपने संबोधन में यह बात कही। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका की मध्यस्थता में लेबनान और इजराइल के बीच युद्धविराम को लेकर बातचीत एक और दिन के लिए बढ़ा दी गई है, ताकि किसी समझौते पर पहुंचा जा सके। हालांकि युद्धविराम लागू होने के बाद लेबनान पर इजराइल के हमले पहले के मुकाबले कम हुए हैं, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। इजराइल ने नबतियेह अल-फौका कस्बे पर हवाई हमला किया। इससे पहले मायफदून कस्बे पर हुए हमले में दो लोगों की मौत की खबर सामने आई। इसके अलावा इजराइली सेना ने दक्षिणी शहर मंसूरी में पर्चे गिराकर लोगों से इलाका खाली करने को कहा। यह जानकारी लेबनान के सरकारी मीडिया ने दी। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. NATO देशों पर ईरान का निशाना- ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिका और इजराइल के हमले में साथ देने वाले NATO सदस्य देशों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा कि इन देशों को बताना चाहिए कि उन्होंने इस सैन्य कार्रवाई का समर्थन क्यों किया। 2. होर्मुज में जहाज पर हमला, समुद्री सुरक्षा पर फिर संकट- ओमान के तट के पास होर्मुज जलडमरूमध्य में एक मालवाहक जहाज पर अज्ञात हथियार से हमला हुआ। जहाज के ब्रिज को नुकसान पहुंचा, हालांकि कोई हताहत नहीं हुआ। घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र ने 11 हजार नाविकों को निकालने का अभियान फिलहाल रोक दिया। 3. लेबनान में फिर बढ़ा तनाव- इजराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान के अल-मंसूरी इलाके में लोगों को घर खाली करने की चेतावनी दी। वहीं, हिजबुल्लाह प्रमुख नईम कासिम ने कहा कि इजराइल को लेबनान की पूरी जमीन से बिना शर्त हटना होगा और संगठन किसी भी हाल में इजराइल से रिश्ते सामान्य नहीं करेगा। 4. ईरान-अमेरिका समझौते की दिशा में बढ़ी बातचीत- अमेरिका और ईरान के बीच तकनीकी स्तर की वार्ता पूरी हुई। दोनों देशों ने चार संयुक्त कमेटियां बनाने और 60 दिन में अंतिम समझौते का रोडमैप तैयार करने पर सहमति जताई। रूस ने भी कहा कि अंतिम समझौता होने पर वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसका समर्थन करेगा। 5. परमाणु कार्यक्रम और तेल बाजार दोनों पर नजर- IAEA ने कहा कि उसकी टीम जल्द ही ईरान के परमाणु ठिकानों का निरीक्षण करेगी। दूसरी ओर, होर्मुज में तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई, जबकि भारत ने कमर्शियल LPG की सप्लाई पर लगी पाबंदियां हटाकर आपूर्ति सामान्य करने का फैसला लिया।

होर्मुज में फिर बढ़ी टेंशन: ट्रंप का दावा…ईरान ने सीजफायर का किया उल्लंघन, जहाजों पर किया ड्रोन अटैक

अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर होर्मुज स्ट्रेट से गुजर रहे कारोबारी जहाजों पर ड्रोन से हमला करने का आरोप लगाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आज जानकारी दी कि ईरान ने सीजफायर तोड़ दिया है। उसने होर्मुज से गुजर रहे एक जहाज पर ड्रोन अटैक कर दिया। जवाबी कार्रवाई में अमेरिका सेना ने भी पलटवार किया और ईरान के तीन ड्रोन मार गिराए। ट्रंप ने ईरान की इस कार्रवाई को मूर्खतापूर्ण बताया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति का बड़ा दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा है कि एक मालवाहक जहाज पर हमला किया गया, जबकि अमेरिकी सेना ने तीन अन्य ड्रोन को रास्ते में ही मार गिराया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग से गुजर रहे जहाजों पर चार आत्मघाती ड्रोन भेजे, जो दोनों देशों के बीच हुए सीजफायर का खुला उल्लंघन है। यह आरोप ऐसे समय में सामने आया है, जब हाल ही में दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की कोशिशें की गई थीं, लेकिन क्षेत्र में हालात अब भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।

ईरान ने जहाजों पर किए ड्रोन हमले

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे जहाजों पर कम से कम चार आत्मघाती ड्रोन से हमला किया। ट्रंप के अनुसार, इनमें से एक ड्रोन एक बड़े मालवाहक जहाज के ऊपरी हिस्से से टकराया। इस हमले में जहाज को नुकसान पहुंचा, लेकिन वह अपना सफर जारी रखने में सफल रहा।

उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सेना ने बाकी तीन ड्रोन को समय रहते मार गिराया। ट्रंप ने इसे अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम (सीजफायर) का खुला उल्लंघन बताया। हालांकि, ट्रंप ने उस जहाज का नाम सार्वजनिक नहीं किया जिस पर कथित हमला हुआ था। उन्होंने हमले में हुए नुकसान या किसी के घायल होने की भी कोई अतिरिक्त जानकारी नहीं दी।

 जहाज पर हमले से बढ़ी चिंता

अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए सीजफायर के बाद पहली बड़ी चुनौती तब सामने आई, जब गुरुवार को सिंगापुर के झंडे वाले एक मालवाहक जहाज पर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरते समय कथित हमला हुआ। इस घटना को दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह हुए उस समझौते के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य लंबे समय से जारी तनाव को कम करना और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक पर सामान्य आवाजाही बहाल करना था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया है कि यह हमला ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने किया। बताया जा रहा है कि यह घटना ईरान की उस चेतावनी के कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें बिना मंजूरी वाले समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही गई थी।

ईरान ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाज पर किया ड्रोन हमला, आगबबूला हुए डोनाल्ड ट्रंप; बोले- बेहद महंगा था वो शिप, हमने भी…

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को ईरान की कड़ी निंदा की। उन्होंने आरोप लगाया कि इस्लामिक रिपब्लिक ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजर रहे कमर्शियल जहाजों पर कम से कम चार वन-वे अटैक ड्रोन से हमला किया, जिसे उन्होंने सीजफायर समझौते का सीधा उल्लंघन बताया।अपने ‘ट्र

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LPG Rule Changes: होटल-रेस्तरां और फैक्ट्रियों को बड़ी राहत, कमर्शियल एलपीजी पर लगी सभी पाबंदियां हटीं, जानें- नए नियम

LPG Rule Changes: पश्चिम एशिया में हालात सामान्य होने और अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने को लेकर बनी सहमति के बाद केंद्र सरकार ने कमर्शियल और इंडस्ट्रियल एलपीजी उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दी है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने गैर-घरेलू पैक्ड एलपीजी (Commercial LPG) की आपूर्ति पर लगाई गई सभी क्षेत्रीय पाबंदियां तत्काल प्रभाव से हटा दी हैं। इसके साथ ही कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई को संकट से पहले जैसे हालत पर बहाल कर दिया गया है।

सरकार ने बल्क एलपीजी की आपूर्ति भी आंशिक रूप से बहाल कर दी है। अब इंडस्ट्रियल और कमर्शियल उपभोक्ताओं को संकट से पहले खपत के 50 प्रतिशत तक बल्क एलपीजी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे होटल, रेस्तरां और अन्य उद्योगों को राहत मिलने की उम्मीद है। सरकार का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति में सुधार देखा जा रहा है।

ईरान युद्ध समाप्त होने के बाद मिली राहत

अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के फिर से सुचारु रूप से खुलने का रास्ता साफ हुआ है। यह समुद्री रूट्स भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के कच्चे तेल और एलपीजी आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है।

सरकार ने बताया कि हाल के दिनों में घरेलू एलपीजी उत्पादन में बढ़ोतरी और आयातित एलपीजी कार्गो की बेहतर उपलब्धता के कारण आपूर्ति की स्थिति मजबूत हुई है। इसी को देखते हुए कमर्शियल एलपीजी पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध हटाने का निर्णय लिया गया है।

बल्क एलपीजी की आपूर्ति भी बहाल

सरकार ने बल्क एलपीजी की आपूर्ति भी आंशिक रूप से बहाल कर दी है। पश्चिम एशिया संकट के दौरान बल्क एलपीजी की सप्लाई रोक दी गई थी। लेकिन अब इसे संकट-पूर्व खपत के 50 प्रतिशत तक अनुमति दे दी गई है। इससे होटल, रेस्तरां, कैटरिंग व्यवसाय, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और अन्य औद्योगिक उपभोक्ताओं को काफी राहत मिलेगी, जो अपने डेली कामों के लिए एलपीजी पर निर्भर रहते हैं।

सरकार ने बल्क LPG की सप्लाई को संकट के चरम पर रोक दिया था। अब बल्क LPG की सप्लाई संकट से पहले के खपत स्तर के 50 प्रतिशत तक करने की अनुमति होगी। इससे कमर्शियल और इंडस्ट्रियल उपभोक्ताओं को काफी राहत मिलेगी। ईरान युद्ध के दौरान केंद्र ने आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया था कि C3-C4 हाइड्रोकार्बन स्ट्रीम का इस्तेमाल केवल LPG उत्पादन के लिए किया जाए।

क्यों कड़े किए गए थे नियम?

इस कदम से इन फीडस्टॉक को पेट्रोकेमिकल और अन्य डाउनस्ट्रीम उद्योगों से हटाकर घरेलू LPG की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की गई थी। सप्लाई की स्थिति में सुधार के साथ, सरकार ने अब LPG पूल के लिए C3-C4 स्ट्रीम के डायवर्जन को कम करने और पेट्रोकेमिकल तथा अन्य महत्वपूर्ण सेक्टर्स के लिए आवंटन बढ़ाने का फैसला किया है।

मंत्रालय के अनुसार, नॉन-LPG इस्तेमाल के लिए C3-C4 स्ट्रीम का बढ़ा हुआ आवंटन घरेलू LPG उपलब्धता को प्रभावित किए बिना लागू किया जाएगा। घरेलू LPG उत्पादन को कम से कम 40 हजार मीट्रिक टन (TMT) प्रति दिन बनाए रखा जाएगा। केंद्र ने सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी (CHT) को निर्देश दिया है कि वह बढ़ी हुई C3-C4 स्ट्रीम का संगठन-वार आवंटन जारी करे और मंत्रालय को समय-समय पर रिपोर्ट सौंपे।

युद्ध के कारण लगी थी पाबंदियां

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आपूर्ति संकट के दौरान सरकार ने विशेष कदम उठाए थे। उस समय सी3-सी4 हाइड्रोकार्बन स्ट्रीम्स का उपयोग केवल एलपीजी उत्पादन के लिए करने का निर्देश दिया गया था। इसके चलते पेट्रोकेमिकल और अन्य डाउनस्ट्रीम उद्योगों को मिलने वाली कच्चे माल की आपूर्ति सीमित कर दी गई थी। ताकि घरेलू उपभोक्ताओं के लिए रसोई गैस की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।

अब हालात में सुधार के बाद सरकार ने सी3-सी4 स्ट्रीम्स का बड़ा हिस्सा फिर से पेट्रोकेमिकल और अन्य महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों को आवंटित करने का फैसला किया है। मंत्रालय का कहना है कि इससे उद्योगों को आवश्यक कच्चा माल मिलेगा और उत्पादन गतिविधियों को गति मिलेगी। जबकि घरेलू एलपीजी आपूर्ति पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि ग्लोबल सप्लाई में रुकावट शुरू होने के बाद से ही घरेलू उपभोक्ताओं को बिना रुकावट LPG सप्लाई सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है।

मंत्रालय ने कहा, “इस मकसद को ध्यान में रखते हुए कमर्शियल पैक्ड LPG की सप्लाई पर कुछ समय के लिए पाबंदियां लगाई गई थीं। मुश्किल ग्लोबल सप्लाई चेन के बावजूद, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) की समय पर की गई पॉलिसी से जुड़ी कोशिशों और तालमेल से सप्लाई को स्थिर बनाए रखने में मदद मिली।”

पेट्रोलियम मंत्रालय का फ्यूचर प्लान

पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश में स्वदेशी एलपीजी उत्पादन न्यूनतम 40 हजार मीट्रिक टन प्रतिदिन (TMT) के लेवल पर बनाए रखा जाएगा। साथ ही सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी (CHT) को विभिन्न संगठनों के लिए सी3-सी4 स्ट्रीम्स का आवंटन तय करने और समय-समय पर मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।

मंत्रालय ने कहा कि वैश्विक आपूर्ति संकट के दौरान भी घरेलू उपभोक्ताओं को निर्बाध एलपीजी उपलब्ध कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। तेल विपणन कंपनियों (OMCs) और सरकार के समन्वित प्रयासों के कारण चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद देश में एलपीजी की आपूर्ति स्थिर बनी रही।

सरकार ने थपथपाई पीठ

सरकार का मानना है कि ताजा फैसला ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक जरूरतों और घरेलू उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे उद्योगों को राहत मिलेगी। आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और देश में स्वच्छ एवं सुरक्षित ईंधन की उपलब्धता को और मजबूत किया जा सकेगा।

मंत्रालय ने आगे कहा कि यह नया फ़ैसला सरकार के उस संतुलित नज़रिए को दिखाता है, जिसमें देश की एनर्जी सिक्योरिटी की सुरक्षा के साथ-साथ उद्योगों और व्यवसायों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना और पूरे देश में साफ और सुरक्षित ईंधन की उपलब्धता बढ़ाना शामिल है।

पाबंदियों में ढील से कई तरह के कमर्शियल प्रतिष्ठानों को फीयदा होने की उम्मीद है, जिनमें होटल, रेस्टोरेंट, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और दूसरे ऐसे औद्योगिक उपभोक्ता शामिल हैं जो अपने कामकाज के लिए काफ़ी हद तक LPG पर निर्भर हैं।

स्टोरी की मुख्य बातें (All You Need To Know)

बल्क LPG सप्लाई भी बहाल: संकट के समय सरकार ने बल्क एलपीजी (Bulk LPG) की सप्लाई पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। अब इसे आंशिक रूप से बहाल कर दिया गया है। अब उद्योग अपनी जरूरत का 50% तक बल्क एलपीजी ले सकेंगे।

पेट्रोकेमिकल सेक्टर को फायदा: संकट के दौरान सरकार ने जरूरी वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) लागू करके C3-C4 हाइड्रोकार्बन स्ट्रीम्स का पूरा इस्तेमाल सिर्फ घरेलू एलपीजी बनाने में करने का निर्देश दिया था. अब हालात सुधरने पर इस डायवर्जन को कम कर दिया गया है। इससे पेट्रोकेमिकल और अन्य संबंधित उद्योगों को फिर से पर्याप्त कच्चा माल मिल सकेगा।

घरेलू एलपीजी पर आंच नहीं: सरकार ने साफ किया है कि उद्योगों को दी जाने वाली इस ढील से घरेलू रसोई गैस (Domestic LPG) की उपलब्धता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। देश में घरेलू एलपीजी का उत्पादन न्यूनतम 40 हजार मीट्रिक टन (TMT) प्रतिदिन पर बरकरार रखा जाएगा।

किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा?

सरकार के इस फैसले से उन सभी कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सेक्टरों को सीधा फायदा पहुंचेगा जो एलपीजी पर निर्भर हैं:-

होटल और रेस्टोरेंट इंडस्ट्री

मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स

छोटे और बड़े औद्योगिक उपभोक्ता