फिर बंद होगा होर्मुज? ईरान की बड़ी चेतावनी, अमेरिका-इजरायल पर लगाया सीजफायर तोड़ने का आरोप!

ईरान ने एक बार फिर दुनिया की ऊर्जा सप्लाई के लिए बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को व्यावसायिक जहाजों के लिए बंद करने का ऐलान किया है। ईरानी सेना के शीर्ष कमान का कहना है कि अमेरिका ने शांति समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया है, जबकि इजरायल लगातार लेबनान में हमले जारी रखे हुए है।

ईरान के खातम अल-अनबिया सेंट्रल मुख्यालय ने बयान जारी कर कहा कि अमेरिका ने संघर्षविराम समझौते की पहली शर्त का खुला उल्लंघन किया है और इजरायल दक्षिणी लेबनान में लगातार हमले कर रहा है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य को जहाजों की आवाजाही के लिए बंद किया जा रहा है।

“यह सिर्फ पहला कदम है”

ईरान ने चेतावनी दी है कि यह शांति समझौते के उल्लंघन के जवाब में उठाया गया पहला कदम है। अगर “आक्रामक कार्रवाई” जारी रही तो आगे और कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल और गैस निर्यात का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है।

लेबनान से सेना हटाने की मांग

ईरान लंबे समय से मांग कर रहा है कि इजरायल अपनी सेना लेबनान से वापस बुलाए। लेकिन इजरायल ने इस मांग को मानने से इनकार कर दिया है और हिजबुल्लाह के ठिकानों पर कार्रवाई जारी रखी है।

हालांकि शुक्रवार को इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्षविराम की घोषणा हुई थी, लेकिन इसके बाद भी हिंसा थमती नजर नहीं आ रही है।

शनिवार को दक्षिणी लेबनान के सैदा (सिडोन) के पास एक गांव पर इजरायली हमले में कम से कम 7 लोगों की मौत हो गई। वहीं, लेबनान की सिविल डिफेंस एजेंसी के मुताबिक, नबातियेह जिले में हुए हमलों में 16 लोगों की जान गई।

हिजबुल्लाह सांसद हसन फदलाल्लाह ने कहा कि संगठन को इजरायली हमलों का जवाब देने का पूरा अधिकार है।

स्विट्जरलैंड जा सकते हैं जेडी वेंस

इस बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि वह जल्द ही ईरान के साथ वार्ता के लिए स्विट्जरलैंड जा सकते हैं।

उन्होंने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते के तहत घोषित संघर्षविराम अभी भी कायम है और उन्हें ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वास्तव में बंद कर दिया गया है।

शांति वार्ता पर संकट

अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में होने वाली नई वार्ता शुक्रवार को टाल दी गई थी। इन बातचीतों का उद्देश्य 60 दिनों के भीतर लंबित मुद्दों, खासकर ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम, पर स्थायी समाधान तलाशना था।

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विककोफ वार्ता को फिर से शुरू कराने के लिए स्विट्जरलैंड पहुंच चुके हैं। वहीं, ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के भी वहां पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।

ट्रंप ने फिर जताई नाराजगी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार खुद को क्षेत्रीय युद्ध रोकने वाले नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने हाल ही में कहा था कि अमेरिकी समर्थन के बिना इजरायल की स्थिति बेहद कमजोर हो सकती थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप इजरायल की लगातार सैन्य कार्रवाई से नाराज हैं और उन्होंने इस महीने की शुरुआत में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बातचीत के दौरान उनके रवैये पर असंतोष भी जताया था।

अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या होर्मुज जलडमरूमध्य वास्तव में बंद होता है और क्या अमेरिका-ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता दोबारा पटरी पर लौट पाती है।

फिर बंद कर दिया होर्मुज? ईरान ने बताई पूरी सच्चाई, लेबनान पर इजरायल के हमले से बढ़ा तनाव!

ईरान ने शुक्रवार को उन खबरों का खंडन किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद कर दिया गया है। ईरान ने कहा कि 18 जून को अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते के तहत इस अहम जलमार्ग से कमर्शियल शिपिंग जारी है। सरकारी ब्रॉडकास्टर ‘प्रेस टीवी’ से बात करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इन दावों को “बेबुनियाद” और गलत बताया।

बघाई ने स्ट्रेट के बंद होने की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि MoU पर हस्ताक्षर के बाद, तेहरान ने सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इस जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही “फिलहाल सामान्य रूप से चल रही है”।

दरअसल कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये दावा किया गया था कि ईरान की नौसेना ने अचानक एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला ऐलान कर दिया। ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को दोबारा पूरी तरह बंद कर दिया है।

रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान ने साफ कहा है कि जब तक इजरायल लेबनान से अपनी सेना नहीं हटाता और अमेरिका इस इलाके को खाली नहीं करता, तब तक यह रास्ता बंद रहेगा।

दावा- ईरान ने दी थी खुली धमकी!

इसमें बताया गया कि समुद्री रेडियो चैनलों पर ईरान के सबसे खतरनाक सैन्य संगठन इरेक्ट (IRGC – इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) ने एक बयान जारी कर अमेरिका पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। ईरान का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के बीच बुधवार को जो समझौता हुआ था, अमेरिका उसका पालन नहीं कर रहा है।

ईरानी सेना ने सख्त लहजे में चेतावनी दी, “क्योंकि लेबनान से इजरायल की वापसी, समुद्री नाकाबंदी को पूरी तरह हटाना और अमेरिकी आतंकवादी ताकतों का फारस की खाड़ी से बाहर निकलना हमारी मुख्य शर्तें थीं, इसलिए जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ बंद रहेगा। सभी जहाजों से अनुरोध है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए इस रास्ते के पास न आएं। अगर किसी भी जहाज ने इस आदेश को मानने से इनकार किया, तो उसे सीधे निशाना बनाया जाएगा (यानी उड़ा दिया जाएगा)।”

आपको बता दें कि दुनिया का लगभग 20% (पांचवां हिस्सा) तेल और गैस का व्यापार इसी रास्ते से होता है। इसी साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद भी इसे बंद कर दिया गया था, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम आसमान पर पहुंच गए थे।

लेबनान पर इजरायल के हमले से नाराज हुआ ईरान!

बताया गया कि ईरान के इस गुस्से के पीछे इजरायल का लेबनान पर किया गया ताजा हमला है। अमेरिका-ईरान डील के तहत यह माना जा रहा था कि इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच भी जंग रुक जाएगी। लेकिन कल आधी रात से इजरायल ने लेबनान के 11 शहरों पर भीषण हवाई हमले किए, जिसमें कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई और 33 घायल हो गए।

इस बीच, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कह दिया है कि उनकी सेना “जब तक जरूरी होगा” लेबनान में ही रहेगी। वहीं, इजरायल के धुर दक्षिणपंथी मंत्री इतामार बेन ग्विर ने सोशल मीडिया पर लिख दिया कि “पूरे लेबनान को जल जाना चाहिए।” इस पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह किसी मामूली पागल का बयान नहीं है, बल्कि इजरायली सरकार के सुरक्षा मंत्री की सोच है। तेल अवीव (इजरायल) में बैठी यह सरकार पूरी मानवता के लिए खतरा है और इसका मकसद सिर्फ स्थायी युद्ध (Permanent War) करना है।”

अमेरिका का दावा: “हमने तो रास्ता खोल दिया था”

दूसरी तरफ, अमेरिका की सेंट्रल कमांड ने गुरुवार को ही ऐलान किया था कि उसने पिछले दो महीनों से ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी नाकाबंदी को आधिकारिक रूप से हटा लिया है। ऐसे में अमेरिका के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि ईरान किस अधूरी नाकाबंदी की बात कर रहा है।

यहां तक कि समुद्री जहाजों पर नजर रखने वाली एजेंसी ‘AXSMarine’ के मुताबिक, इस समझौते के तुरंत बाद गुरुवार को रिकॉर्ड 25 कमर्शियल जहाज इस रास्ते से सुरक्षित गुजरे थे, जो पिछले दो महीनों में सबसे बड़ी संख्या थी। लेकिन अब ईरान के इस नए कदम ने पूरी दुनिया को एक बार फिर महायुद्ध और भयंकर आर्थिक संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

मोजतबा खामेनेई का बड़ा दावा, ईरान डील के लिए ‘बेताब’ ट्रंप ने हर तरह के हथकंडे अपनाए

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Mojtaba Khamenei: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने एक खास पोस्ट के जरिए अमेरिका के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यह समझौता ईरान की इच्छा से नहीं, बल्कि अमेरिका की मजबूरी की वजह से हुआ है। खामेनेई ने अपने पोस्ट में लिखा, “जैसा कि आपको बताया गया है, ईरान और अमेरिका के राष्ट्रपतियों के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।”

उन्होंने कहा कि हालांकि ईरानी अधिकारियों ने इस समझौते तक पहुंचने के लिए ईमानदारी से काम किया था, लेकिन अमेरिकी पक्ष ने ही इसके लिए सबसे ज्यादा जोर डाला था। खामेनेई के मुताबिक, “अमेरिकी राष्ट्रपति ने ही मजबूरी में आकर इसे अंजाम देने के लिए हर तरह के दबाव और साधनों का इस्तेमाल किया।”

बता दें कि समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा वर्साय पैलेस में आयोजित डिनर के दौरान किए गए। यह कार्यक्रम G7 शिखर सम्मेलन के समापन के बाद हुआ था। मैक्रों ने X पर इस घटनाक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि यह समझौता “स्थायी शांति का रास्ता बनाता है और होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की अनुमति देता है।”

औपचारिक हस्ताक्षर समारोह पहले शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आयोजित होने वाला था। हालांकि, तेहरान ने पुष्टि की है कि जिनेवा में प्रस्तावित बैठक अपने तय कार्यक्रम के अनुसार होगी।

अमेरिका-ईरान समझौते में क्या कहा गया है?

इस दस्तावेज का औपचारिक नाम “संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के इस्लामी गणराज्य के बीच इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन” है। इसमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करने की बात कही गई है।

इसकी शर्तों के तहत, अमेरिका ने 30 दिनों के भीतर ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी हटाने का वादा किया है। उम्मीद है कि इस दौरान जहाजों की आवाजाही युद्ध से पहले के स्तर पर लौट आएगी। अमेरिका अंतिम समझौता होने के 30 दिनों के भीतर ईरान के आस-पास से अपनी सेना हटाने पर भी सहमत हो गया है।

वहीं, ईरान ने भी कमर्शियल जहाजों को 60 दिनों तक बिना किसी शुल्क के सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करने पर सहमति जताई है।

बता दें कि संधि पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद, दोनों पक्षों के पास व्यापक अंतिम समझौते की शर्तों पर बातचीत करने के लिए 60 दिन का समय है।

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कुरान ए पाक को चूमकर ईरान की टीम विश्वकप खेलने मैक्सिको हुई रवाना (Video)

कुरान ए पाक को चूमकर ईरान के फुटबॉल खिलाड़ी फीफा विश्वकप खेलने के लिए मेक्सिको रवाना हुए।  इस वाक्ये की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खासी वायरल हुई जब एयरपोर्ट पर खिलाड़ियों ने विदेशी उड़ान शुरु करने से पहले ऐसा किया।

गौरतलब है कि उत्तरी अमेरिका में होने वाले विश्वकप में ईरान ने ठीक वैसे ही अपने लिए एक अगल मेजबान स्थल की मांग की जैसे पाकिस्तान ने भारत में हुए टी-20 विश्वकप के लिए की थी। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच अभी भी युद्ध पूरी तरह नहीं थमा है। हालांकि टीम मेक्सिको से अमेरिका जाएगी, जहां उसे ग्रुप चरण के तीन मैच खेलने हैं।

टीम की इस विश्व कप में भागीदारी पहले से ही ईरान और अमेरिका के बीच राजनीतिक तनाव तथा इजराइल के साथ युद्ध जैसी स्थिति के कारण जटिल बनी हुई है। अमेरिका और इस्राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया जिसमें उसके शीर्ष नेता और कई आला अधिकारी मारे गए । ईरान ने जवाब में इस्राइल, अमेरिकी सेना और खाड़ी के अरब देशों को निशाना बनाया। इसने फारस की खाड़ी के संकरे मुहाने होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी कब्जा कर रखा है जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है।मामूली युद्धविराम के बावजूद ईरान और अमेरिका ने अभी तक स्थायी तौर पर युद्ध बंद नहीं किया है और हमले जारी हैं।

ईरान अपना पहला मैच 15 जून को न्यूजीलैंड के खिलाफ लॉस एंजिलिस में खेलेगा, इसके बाद छह दिन बाद बेल्जियम से भिड़ेगा। इसके बाद टीम 26 जून को सिएटल में मिस्र के खिलाफ खेलेगी।ईरान और अमेरिका की टीमें यदि अपने-अपने ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहती हैं, तो दोनों के बीच राउंड ऑफ 32 में मुकाबला भी संभव है।

फुटबॉल में ईरान जापान के बाद एशिया की दूसरी ताकतवर टीम है। यही कारण है विश्वकप से पहले टीम तुर्किए में अपने अभ्यास शिविर में करीब 15 दिनों तक पसीना बहा रही थी। टीम चाहेगी कि वह दुश्मन मुल्क में अपना लोहा मनवा के आए।